Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 463

तीर्थवृन्द माहात्म्य वर्णन

अध्याय 462अध्याय-सूचीअध्याय 464

श्लोक 1 (skanda.7.463.1)

प्रह्लाद उवाच। ततो गच्छेद्द्विजश्रेष्ठा गदातीर्थमनुत्तमम्। यत्र स्नात्वा नरो भक्त्या लभेद्भूदानजं फलम्

prahlāda uvāca| tato gacchedvijaśreṣṭhā gadātīrthamanuttamam| yatra snātvā naro bhaktyā labhedbhūdānajaṁ phalam

प्रह्लाद जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! तदनन्तर उत्तम गदातीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य भूदान के समान फल प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (skanda.7.463.2)

तर्पयेत्पितृदेवांश्च ऋषींश्चैव यथाक्रमम्। श्राद्धं च कारयेत्तत्र पितॄणां तृप्तिहेतवे

tarpayetpitṛdevāṁśca ṛṣīṁścaiva yathākramam| śrāddhaṁ ca kārayettatra pitṝṇāṁ tṛptihetave

वहाँ यथाक्रम पितरों, देवताओं और ऋषियों का तर्पण करे तथा पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध कराए।

श्लोक 3 (skanda.7.463.3)

गदातीर्थे तु देवेशं विष्णुं वाराहरूपिणम्। समभ्यर्च्य नरो भक्त्या विष्णुलोके महीयते

gadātīrthe tu deveśaṁ viṣṇuṁ vārāharūpiṇam| samabhyarcya naro bhaktyā viṣṇuloke mahīyate

गदातीर्थ में वराहरूपधारी देवेश्वर विष्णु का भक्तिपूर्वक पूजन कर मनुष्य विष्णुलोक में महिमा को प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.7.463.4)

नागतीर्थं ततो गच्छेत्सरः परमशोभनम्। यत्र स्नात्वा नरः सम्यङ्नागलोकमवाप्नुयात्

nāgatīrthaṁ tato gacchetsaraḥ paramaśobhanam| yatra snātvā naraḥ samyaṅnāgalokamavāpnuyāt

तदनन्तर नागतीर्थ नामक परम सुन्दर सरोवर को जाए, जहाँ स्नान करने से मनुष्य भलीभाँति नागलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 5 (skanda.7.463.5)

भद्रतीर्थं ततो गच्छेत्सरस्त्रिभुवनार्चितम्। स्नानमात्रेण लभते तिलधेनुफलं नरः

bhadratīrthaṁ tato gacchetsarastribhuvanārcitam| snānamātreṇa labhate tiladhenuphalaṁ naraḥ

तदनन्तर त्रिभुवनपूजित भद्रतीर्थ नामक सरोवर को जाए; केवल स्नानमात्र से मनुष्य तिलधेनु दान के फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 6 (skanda.7.463.6)

चित्रातीर्थं ततो गच्छेत्सरः परमशोभनम्। स्नानमात्रेण लभते घृतधेनुफलं नरः

citrātīrthaṁ tato gacchetsaraḥ paramaśobhanam| snānamātreṇa labhate ghṛtadhenuphalaṁ naraḥ

तदनन्तर परम सुन्दर चित्रातीर्थ सरोवर को जाए; केवल स्नानमात्र से मनुष्य घृतधेनु दान के फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (skanda.7.463.7)

यदा द्वारावती विप्रा प्लाविता सागरेण हि। पुण्यानि बहुतीर्थानि च्छन्नानि जलपांसुभिः

yadā dvārāvatī viprā plāvitā sāgareṇa hi| puṇyāni bahutīrthāni cchannāni jalapāṁsubhiḥ

हे विप्रो! जब द्वारावती समुद्र से आप्लावित हुई, तब अनेक पुण्यमय तीर्थ जल और बालू से ढक गए।

श्लोक 8 (skanda.7.463.8)

दृश्यानि कतिचित्संति ह्यदृश्यान्यपराणि च। तानि सर्वाणि विप्रेन्द्राः कथयिष्यामि सर्वतः

dṛśyāni katicitsaṁti hyadṛśyānyaparāṇi ca| tāni sarvāṇi viprendrāḥ kathayiṣyāmi sarvataḥ

उनमें से कुछ दृश्य हैं और कुछ अदृश्य हैं। हे विप्रेन्द्रो! मैं उन सबका पूर्ण रूप से वर्णन करूँगा।

श्लोक 9 (skanda.7.463.9)

चंद्रभागां ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशिनीम्। यत्र स्नात्वा नरो भक्त्या वाजपेयफलं लभेत्

caṁdrabhāgāṁ tato gacchetsarvapāpapraṇāśinīm| yatra snātvā naro bhaktyā vājapeyaphalaṁ labhet

तदनन्तर सर्वपापनाशिनी चन्द्रभागा नदी को जाए, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान कर मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करे।

श्लोक 10 (skanda.7.463.10)

देवी चंद्रार्चिता यत्र यशोदा नंदनंदिनी। कौमारिका शक्तिहस्ता खङ्गखेटकधारिणी

devī caṁdrārcitā yatra yaśodā naṁdanaṁdinī| kaumārikā śaktihastā khaṅgakheṭakadhāriṇī

वहाँ नन्द की पुत्री यशोदा नामक देवी हैं, जो चन्द्रमा द्वारा पूजित हैं — कुमारी रूपा, हाथ में शक्ति धारण किए तथा खड्ग और ढाल धारण करने वाली।

श्लोक 11 (skanda.7.463.11)

केश्यादिदैत्यदलिनी स्वसा वै रामकृष्णयोः। यस्या दर्शनमात्रेण सर्वान्कामानवाप्नुयात्

keśyādidaityadalinī svasā vai rāmakṛṣṇayoḥ| yasyā darśanamātreṇa sarvānkāmānavāpnuyāt

वह केशी आदि दैत्यों का विदारण करने वाली तथा राम और कृष्ण की बहिन हैं, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 12 (skanda.7.463.12)

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं महिषसंज्ञकम्। यस्य दर्शनमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः

tato gacchet viprendrāstīrthaṁ mahiṣasaṁjñakam| yasya darśanamātreṇa mucyate sarvapātakaiḥ

हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर महिष नामक तीर्थ को जाना चाहिए, जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 13 (skanda.7.463.13)

मुक्तिद्वारं ततो गच्छेत्तीर्थं पाप प्रणाशनम्

muktidvāraṁ tato gacchettīrthaṁ pāpa praṇāśanam

तदनन्तर मुक्तिद्वार नामक तीर्थ को जाना चाहिए, जो पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 14 (skanda.7.463.14)

वसिष्ठेन समानीता मुनिना यत्र गोमती। स्नातो भवति गंगायां यत्र स्नात्वा कलौ युगे

vasiṣṭhena samānītā muninā yatra gomatī| snāto bhavati gaṁgāyāṁ yatra snātvā kalau yuge

वहाँ मुनि वसिष्ठ द्वारा लाई गई गोमती नदी है, जहाँ कलियुग में स्नान करने से गंगा-स्नान के समान फल प्राप्त होता है।

श्लोक 15 (skanda.7.463.15)

गोमती निःसृता यस्मात्प्रविष्टा वरुणालयम्। तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या अश्वमेधफलं लभेत्

gomatī niḥsṛtā yasmātpraviṣṭā varuṇālayam| tatra snātvā naro bhaktyā aśvamedhaphalaṁ labhet

जहाँ से निकलकर गोमती वरुणालय (समुद्र) में प्रविष्ट होती है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान कर मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (skanda.7.463.16)

भृगुणा हि तपस्तप्तं स्थापिता यत्र चांबिका। भृग्वर्चिता ततो देवी प्रसिद्धा श्रूयते क्षितौ

bhṛguṇā hi tapastaptaṁ sthāpitā yatra cāṁbikā| bhṛgvarcitā tato devī prasiddhā śrūyate kṣitau

जहाँ भृगु ऋषि ने तपस्या की और अम्बिका देवी की स्थापना की, वह भृगु द्वारा पूजित देवी पृथ्वी पर प्रसिद्ध रूप से विख्यात हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.463.17)

संसिद्धिं परमां याति यस्याः संस्मरणान्नरः। शिवलिंगान्यनेकानि यत्र सन्ति महीतले

saṁsiddhiṁ paramāṁ yāti yasyāḥ saṁsmaraṇānnaraḥ| śivaliṁgānyanekāni yatra saṁti mahītale

जिनके स्मरणमात्र से मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, वहाँ भूतल पर अनेक शिवलिंग विद्यमान हैं।

श्लोक 18 (skanda.7.463.18)

ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः कालिन्दीसर उत्तमम्। कालिन्दी सूर्यतनया सरश्चक्रे त्वनुत्तमम्

tato gacchet viprendrāḥ kālindīsara uttamam| kālindī sūryatanayā saraścakre tvanuttamam

हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर उत्तम कालिन्दी सरोवर को जाए; सूर्यपुत्री कालिन्दी ने ही यह अनुपम सरोवर बनाया।

श्लोक 19 (skanda.7.463.19)

तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या न दुर्गतिमवाप्नुयात्। सांबतीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशनम्

tatra snātvā naro bhaktyā na durgatimavāpnuyāt| sāṁbatīrthaṁ tato gacchetsarvapāpapraṇāśanam

वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान कर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। तदनन्तर सर्वपापनाशक साम्बतीर्थ को जाए।

श्लोक 20 (skanda.7.463.20)

कृत्वा श्राद्धं च विधिवल्लभेद्गोदानजं फलम्

kṛtvā śrāddhaṁ ca vidhivallabhedgodānajaṁ phalam

वहाँ विधिपूर्वक श्राद्ध करने से मनुष्य गोदान के समान फल प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.7.463.21)

गच्छेच्च शांकरं तीर्थं ततस्त्रैलोक्यपावनम्। यत्र स्नात्वा नरो भक्त्या लभेद्बहुसुवर्णकम्

gacchecca śāṁkaraṁ tīrthaṁ tatastrailokyapāvanam| yatra snātvā naro bhaktyā labhedbahusuvarṇakam

फिर त्रैलोक्य को पवित्र करने वाले शांकर तीर्थ को जाए, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान कर मनुष्य बहुत सुवर्ण दान के फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (skanda.7.463.22)

ततो नागसरो गच्छेत्तीर्थं पापप्रणाशनम्। पितॄन्सन्तर्प्य विधिवन्नागलोकमवाप्नुयात्

tato nāgasaro gacchettīrthaṁ pāpapraṇāśanam| pitṝnsantarpya vidhivannāgalokamavāpnuyāt

तदनन्तर पापनाशक नागसर तीर्थ को जाए; वहाँ विधिपूर्वक पितरों को तर्पण देकर मनुष्य नागलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (skanda.7.463.23)

लक्ष्मीं नदीं ततो गच्छेद्गच्छन्तीं सागरं प्रति। यस्या दर्शनमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः

lakṣmīṁ nadīṁ tato gacchedgacchaṁtīṁ sāgaraṁ prati| yasyā darśanamātreṇa mucyate sarvapātakaiḥ

तदनन्तर समुद्र की ओर बहती हुई लक्ष्मी नदी को जाए, जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 24 (skanda.7.463.24)

श्राद्धे कृते तु विप्रेन्द्राः पितरो मुक्तिमाप्नुयुः। दाने मनोरथावाप्तिर्जायते नात्र संशयः

śrāddhe kṛte tu viprendrāḥ pitaro muktimāpnuyuḥ| dāne manorathāvāptirjāyate nātra saṁśayaḥ

हे विप्रेन्द्रो! वहाँ श्राद्ध करने से पितर मुक्ति को प्राप्त होते हैं और दान करने से मनोरथ की सिद्धि होती है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 25 (skanda.7.463.25)

कंबुसरस्ततो गच्छेत्तीर्थं पापप्रणाशनम्। तर्पणे च कृते श्राद्धे ह्यग्निष्टोमफलं लभेत्

kaṁbusarastato gacchettīrthaṁ pāpapraṇāśanam| tarpaṇe ca kṛte śrāddhe hyagniṣṭomaphalaṁ labhet

तदनन्तर पापनाशक कम्बुसर तीर्थ को जाए; वहाँ तर्पण और श्राद्ध करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 26 (skanda.7.463.26)

कुशतीर्थं ततो गच्छेत्स्नात्वा सन्तर्पयेत्पितॄन्। दानं दत्त्वा यथाशक्त्या निर्मलं लोकमाप्नुयात्

kuśatīrthaṁ tato gacchetsnātvā saṁtarpayetpitṝn| dānaṁ dattvā yathāśaktyā nirmalaṁ lokamāpnuyāt

तदनन्तर कुशतीर्थ को जाए; वहाँ स्नान कर पितरों का तर्पण करे और यथाशक्ति दान देकर निर्मल लोक को प्राप्त करे।

श्लोक 27 (skanda.7.463.27)

द्युम्नतीर्थं च तत्रैव सर्वपापप्रणाशनम्। कृत्वा श्राद्धं च तत्रैव वाजिमेधफलं लभेत्

dyumnatīrthaṁ ca tatraiva sarvapāpapraṇāśanam| kṛtvā śrāddhaṁ ca tatraiva vājimedhaphalaṁ labhet

वहीं सर्वपापनाशक द्युम्नतीर्थ है; वहीं श्राद्ध करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 28 (skanda.7.463.28)

कुशतीर्थं ततो गच्छेत्पितॄणां तृप्तिरक्षया। यत्र श्राद्धात्तर्पणाच्च जायते नात्र संशयः

kuśatīrthaṁ tato gacchetpitṝṇāṁ tṛptirakṣayā| yatra śrāddhāttarpaṇācca jāyate nātra saṁśayaḥ

तदनन्तर कुशतीर्थ को जाए, जहाँ श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 29 (skanda.7.463.29)

जालतीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपापहरं शुभम्। दुर्वाससा यत्र शप्ताः कोपाद्यदुकुमारकाः

jālatīrthaṁ tato gacchetsarvapāpaharaṁ śubham| durvāsasā yatra śaptāḥ kopādyadukumārakāḥ

तदनन्तर सर्वपापहारी शुभ जालतीर्थ को जाए, जहाँ यदुकुमारों को दुर्वासा मुनि ने क्रोधवश शाप दिया था।

श्लोक 30 (skanda.7.463.30)

देवो जालेश्वरस्तत्र सं बभूव उमापतिः। जालेश्वरं नरो दृष्ट्वा सद्यः पापात्प्रमुच्यते

devo jāleśvarastatra saṁ babhūva umāpatiḥ| jāleśvaraṁ naro dṛṣṭvā sadyaḥ pāpātpramucyate

वहाँ उमापति भगवान् शिव जालेश्वर के रूप में प्रकट हुए। जालेश्वर के दर्शन मात्र से मनुष्य तत्काल पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.7.463.31)

संपूज्य देवं भक्त्या च शिवलोकमवाप्नुयात्

saṁpūjya devaṁ bhaktyā ca śivalokamavāpnuyāt

उस देवता का भक्तिपूर्वक पूजन कर मनुष्य शिवलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 32 (skanda.7.463.32)

चक्रस्वामिसुतीर्थं च ततो गच्छेद्धि मानवः। कृत्वा स्नानं पितॄंस्तर्प्य विष्णुलोकमवाप्नुयात्

cakrasvāmisutīrthaṁ ca tato gacchaddhi mānavaḥ| kṛtvā snānaṁ pitṝṁstarpya viṣṇulokamavāpnuyāt

तत्पश्चात् मनुष्य चक्रस्वामी सुतीर्थ को जाए; वहाँ स्नान कर और पितरों को तर्पण देकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 33 (skanda.7.463.33)

जरत्कारुकृतं तीर्थं सर्वपापप्रणाशनम्। स्नात्वा तत्र द्विजश्रेष्ठा न दुर्गतिमवाप्नुयात्

jaratkārukṛtaṁ tīrthaṁ sarvapāpapraṇāśanam| snātvā tatra dvijaśreṣṭhā na durgatimavāpnuyāt

हे द्विजश्रेष्ठो! जरत्कारु मुनि द्वारा बनाया गया तीर्थ समस्त पापों का नाश करने वाला है; वहाँ स्नान कर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 34 (skanda.7.463.34)

ततो गच्छेद्द्विजश्रेष्ठास्तीर्थं खञ्जनकाभिधम्। आसीत्खञ्जनको नाम दैत्यश्चातिबलान्वितः

tato gacchedvijaśreṣṭhāstīrthaṁ khañjanakābhidham| āsītkhañjanako nāma daityaścātibalānvitaḥ

हे द्विजश्रेष्ठो! तदनन्तर खञ्जनक नामक तीर्थ को जाए। खञ्जनक नामक एक अत्यन्त बलवान दैत्य था।

श्लोक 35 (skanda.7.463.35)

ततः खञ्जनकं तीर्थं तस्य नाम्नेति विश्रुतम्। तत्र स्नात्वा नरो याति सोमलोकं न संशयः

tataḥ khañjanakaṁ tīrthaṁ tasya nāmneti viśrutam| tatra snātvā naro yāti somalokaṁ na saṁśayaḥ

उसी के नाम से वह तीर्थ खञ्जनक के नाम से विख्यात हुआ। वहाँ स्नान कर मनुष्य निःसंदेह सोमलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 36 (skanda.7.463.36)

सन्ति तीर्थान्यनेकानि सुगुप्तानि द्विजोत्तमाः। तानि गच्छेत्तु विप्रेन्द्राः सर्वपापापनुत्तये

saṁti tīrthānyanekāni suguptāni dvijottamāḥ| tāni gacchettu viprendrāḥ sarvapāpāpanuttaye

हे द्विजोत्तमो! वहाँ अनेक सुरक्षित तीर्थ हैं। हे विप्रेन्द्रो! समस्त पापों के निवारण के लिए उन तीर्थों में जाना चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.7.463.37)

ततो गच्छेद्द्विजश्रेष्ठास्तीर्थमानकदुन्दुभेः। शूरतीर्थं परमकं गदतीर्थमतः परम्

tato gacchedvijaśreṣṭhāstīrthamānakaduṁdubheḥ| śūratīrthaṁ paramakaṁ gadatīrthamataḥ param

हे द्विजश्रेष्ठो! तदनन्तर आनकदुन्दुभि (वसुदेव) के तीर्थ को जाए; उससे आगे परम शूरतीर्थ और फिर गदतीर्थ हैं।

श्लोक 38 (skanda.7.463.38)

गावल्गणस्य तीर्थं च अक्रूरस्य महात्मनः। बलदेवस्य तीर्थं तु उग्रसेनस्य चापरम्

gāvalgaṇasya tīrthaṁ ca akrūrasya mahātmanaḥ| baladevasya tīrthaṁ tu ugrasenasya cāparam

गावल्गणि (संजय) का तीर्थ तथा महात्मा अक्रूर का तीर्थ है; उसके आगे बलदेव का तीर्थ और उग्रसेन का तीर्थ है।

श्लोक 39 (skanda.7.463.39)

अर्जुनस्य च तीर्थं तु सुभद्रातीर्थमेव च। देवकीतीर्थमाद्यं तु रोहिणीतीर्थमेव च

arjunasya ca tīrthaṁ tu subhadrātīrthameva ca| devakītīrthamādyaṁ tu rohiṇītīrthameva ca

अर्जुन का तीर्थ तथा सुभद्रा का तीर्थ है; आदिभूत देवकी का तीर्थ तथा रोहिणी का तीर्थ भी है।

श्लोक 40 (skanda.7.463.40)

उद्धवस्य च तीर्थं तु सारंगाख्यं तथैव च। सत्यभामाकृतं तीर्थं भद्रातीर्थमतः परम्

uddhavasya ca tīrthaṁ tu sāraṁgākhyaṁ tathaiva ca| satyabhāmākṛtaṁ tīrthaṁ bhadrātīrthamataḥ param

उद्धव का तीर्थ तथा सारंग नामक तीर्थ भी है; सत्यभामा द्वारा बनाया गया तीर्थ तथा उससे आगे भद्रातीर्थ है।

श्लोक 41 (skanda.7.463.41)

जामदग्न्यस्य तीर्थं तु रामस्य च महात्मनः। भासतीर्थं च तत्रैव शुकतीर्थमतः परम्

jāmadagnyasya tīrthaṁ tu rāmasya ca mahātmanaḥ| bhāsatīrthaṁ ca tatraiva śukatīrthamataḥ param

जामदग्न्य महात्मा परशुराम का तीर्थ है; वहीं भासतीर्थ तथा उससे आगे शुकतीर्थ है।

श्लोक 42 (skanda.7.463.42)

कर्दमस्य च तीर्थं तु कपिलस्य महात्मनः। सोमतीर्थं च तत्रैव रोहिणीतीर्थमेव च

kardamasya ca tīrthaṁ tu kapilasya mahātmanaḥ| somatīrthaṁ ca tatraiva rohiṇītīrthameva ca

कर्दम प्रजापति का तीर्थ तथा महात्मा कपिल का तीर्थ है; वहीं सोमतीर्थ और रोहिणीतीर्थ भी हैं।

श्लोक 43 (skanda.7.463.43)

एतान्यन्यानि संक्षेपान्मया वः कथितानि च। सर्वपापहराणीह मोक्षदानि न संशयः

etānyanyāni saṁkṣepānmayā vaḥ kathitāni ca| sarvapāpaharāṇīha mokṣadāni na saṁśayaḥ

ये और अन्य तीर्थ मैंने आपको संक्षेप में बताए हैं; ये सब यहाँ समस्त पापों का हरण करने वाले तथा मोक्षदायक हैं, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 44 (skanda.7.463.44)

प्रच्छन्नानि द्विजवरास्तीर्थानि कलिसंक्रमे। प्लावितानि समुद्रेण पांसुनाऽप्युदकेन च

pracchannāni dvijavarāstīrthāni kalisaṁkrame| plāvitāni samudreṇa pāṁsunā'pyudakena ca

हे द्विजवरो! कलियुग के आगमन पर ये तीर्थ लुप्त हो गए, समुद्र के द्वारा जल और बालू से आप्लावित होकर।

श्लोक 45 (skanda.7.463.45)

एतन्मया वः कथितं संक्षेपात्तीर्थविस्तरम्। आत्मप्रज्ञानुमानेन किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ

etanmayā vaḥ kathitaṁ saṁkṣepāttīrthavistaram| ātmaprajñānumānena kimanyacchrotumicchatha

यह मैंने आपको संक्षेप में तीर्थों का विस्तार बताया है, अपनी बुद्धि के अनुमान से। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?

श्लोक 46 (skanda.7.463.46)

शृणुयात्परया भक्त्या तीर्थयात्रामिमां द्विजाः। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति

śṛṇuyātparayā bhaktyā tīrthayātrāmimāṁ dvijāḥ| sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa gacchati

हे द्विजो! जो इस तीर्थयात्रा के वर्णन को परम भक्ति से सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

अध्याय 462अध्याय-सूचीअध्याय 464