प्रभास खण्ड · अध्याय 466
चक्रतीर्थ में कृष्ण-बलराम-दुर्वासा समागम एवं स्नानाह्निक विधि वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.466.1)
प्रह्लाद उवाच। तच्छ्रुत्वा देवदेवेशश्चिंतयित्वा पुनःपुनः। उवाच वचनं तत्र दुर्वाससमकल्मषम्
prahlāda uvāca| tacchrutvā devadeveśaściṁtayitvā punaḥpunaḥ| uvāca vacanaṁ tatra durvāsasamakalmaṣam
प्रह्लाद जी ने कहा — यह सुनकर देवाधिदेव ने बार-बार विचार कर निष्पाप दुर्वासा से वहाँ यह वचन कहा।
श्लोक 2 (skanda.7.466.2)
श्रीभगवानुवाच। पराधीनोऽस्मि विप्रेन्द्र भक्त्या क्रीतोऽस्मि नान्यथा। बलेरादेशकारी च दैत्येन्द्रवशगो ह्यहम्
śrībhagavānuvāca| parādhīno'smi viprendra bhaktyā krīto'smi nānyathā| baler ādeśakārī ca daityendravaśago hyaham
श्री भगवान् ने कहा — हे विप्रेन्द्र! मैं पराधीन हूँ, भक्ति द्वारा ही खरीदा गया हूँ, अन्यथा नहीं। मैं बलि का आदेशपालक तथा दैत्यराज के वश में हूँ।
श्लोक 3 (skanda.7.466.3)
तस्मात्प्रार्थय विप्रेन्द्र दैत्यं वैरोचनिं बलिम्। अस्यादेशात्करिष्यामि यदभीष्टं तवाधुना
tasmātprārthaya viprendra daityaṁ vairocaniṁ balim| asyādeśātkariṣyāmi yadabhīṣṭaṁ tavādhunā
अतः, हे विप्रेन्द्र! विरोचन-पुत्र दैत्य बलि से प्रार्थना करो; उसकी आज्ञा से ही मैं अभी तुम्हारी अभीष्ट पूर्ति करूँगा।
श्लोक 4 (skanda.7.466.4)
तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रो बलिं प्रोवाच सत्वरम्। यज्वनां त्वं वरिष्ठश्च दातॄणां त्वं मतोऽधिकः
tacchrutvā vacanaṁ vipro baliṁ provāca satvaram| yajvanāṁ tvaṁ variṣṭhaśca dātṝṇāṁ tvaṁ mato'dhikaḥ
यह वचन सुनकर उस ब्राह्मण ने तुरन्त बलि से कहा — आप यज्ञकर्ताओं में श्रेष्ठ हैं तथा दानियों में सबसे बढ़कर माने जाते हैं।
श्लोक 5 (skanda.7.466.5)
पारावारः कृपायाश्च दयां कुरु ममोपरि। प्रेषयस्व महाभाग देवं दैत्यविनिग्रहे
pārāvāraḥ kṛpāyāśca dayāṁ kuru mamopari| preṣayasva mahābhāga devaṁ daityavinigrahe
आप कृपा के महासागर हैं, मुझ पर दया कीजिए। हे महाभाग! दैत्यों के दमन के लिए भगवान् को भेजिए।
श्लोक 6 (skanda.7.466.6)
संपूर्णनियमः स्नातस्त्वत्प्रसादाद्भवाम्यहम्। तच्छ्रुत्वा वचनं दैत्यो नातिहृष्टमनास्तदा। दुर्वाससमुवाचेदं नैतदेवं भविष्यति
saṁpūrṇaniyamaḥ snātastvatprasādādbhavāmyaham| tacchrutvā vacanaṁ daityo nātihṛṣṭamanāstadā| durvāsasamuvācedaṁ naitadevaṁ bhaviṣyati
आपकी कृपा से ही मैं स्नान कर पूर्ण व्रत वाला बनूँगा। यह वचन सुनकर वह दैत्य उस समय अधिक प्रसन्न मन वाला नहीं हुआ, और दुर्वासा से बोला — ऐसा नहीं होगा।
श्लोक 7 (skanda.7.466.7)
अन्यत्प्रार्थय विप्रेन्द्र यत्ते मनसि वर्त्तते। तद्दास्यामि न सन्देहो यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
anyatprārthaya viprendra yatte manasi varttate| taddāsyāmi na saṁdeho yadyapi syātsudurlabham
हे विप्रेन्द्र! जो भी आपके मन में है, उसके अतिरिक्त कुछ और माँगिए; वह मैं दूँगा, इसमें संदेह नहीं, भले ही वह अत्यंत दुर्लभ हो।
श्लोक 8 (skanda.7.466.8)
आत्मानमपि दास्यामि नाहं त्यक्ष्ये हरिं द्विज। बहुभिः सुकृतैः प्राप्तं कथं त्यक्ष्यामि केशवम्
ātmānamapi dāsyāmi nāhaṁ tyakṣye hariṁ dvija| bahubhiḥ sukṛtaiḥ prāptaṁ kathaṁ tyakṣyāmi keśavam
मैं अपने आपको भी दे दूँगा, परन्तु, हे द्विज! मैं हरि को नहीं त्यागूँगा। अनेक पुण्यों से प्राप्त केशव को मैं कैसे छोड़ दूँ?
श्लोक 9 (skanda.7.466.9)
दुर्वासा उवाच। नातिलुब्धं हि मां विद्धि किमन्यत्प्रार्थयाम्यहम्। रक्ष मे जीवितं दैत्य प्रेषयस्व जनार्द्दनम्
durvāsā uvāca| nātilubdhaṁ hi māṁ viddhi kimanyatprārthayāmyaham| rakṣa me jīvitaṁ daitya preṣayasva janārddanam
दुर्वासा ने कहा — मुझे अधिक लोभी मत समझो, मैं और क्या माँगूँ? हे दैत्य! मेरे जीवन की रक्षा करो, जनार्दन को भेज दो।
श्लोक 10 (skanda.7.466.10)
बलिरुवाच। जानासि त्वं यथा विप्र हिरण्याक्षं निपातितम्। भूत्वा यज्ञवराहस्तु दधारोर्वीं बलाद्दिवि
balir uvāca| jānāsi tvaṁ yathā vipra hiraṇyākṣaṁ nipātitam| bhūtvā yajñavārāhastu dadhārorvīṁ balāddivi
बलि ने कहा — हे विप्र! आप जानते हैं कि किस प्रकार यज्ञवराह बनकर उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया और बलपूर्वक पृथ्वी को स्वर्ग में धारण किया।
श्लोक 11 (skanda.7.466.11)
यथा च दैत्यप्रवरमवध्यं दैत्यदानवैः। हतवान्हिरण्यकशिपुं नृसिंहः सर्वगः प्रभुः
yathā ca daityapravaramavadhyaṁ daityadānavaiḥ| hatavānhiraṇyakaśipuṁ nṛsiṁhaḥ sarvagaḥ prabhuḥ
और जिस प्रकार दैत्यों तथा दानवों द्वारा अवध्य उस श्रेष्ठ दैत्य हिरण्यकशिपु को सर्वव्यापी प्रभु नृसिंह ने मार डाला।
श्लोक 12 (skanda.7.466.12)
तथैव वृत्रं नमुचिं रक्षो लंकेश संज्ञकम्। जघान मायया विष्णुः सुरार्थं सुरसत्तमः
tathaiva vṛtraṁ namuciṁ rakṣo laṁkeśa saṁjñakam| jaghāna māyayā viṣṇuḥ surārthaṁ surasattamaḥ
इसी प्रकार वृत्र, नमुचि तथा लंकेश नामक राक्षस को भी विष्णु ने, देवताओं में श्रेष्ठ होकर, देवताओं के हित के लिए अपनी माया से मार डाला।
श्लोक 13 (skanda.7.466.13)
प्रथमं वामनो भूत्वा ह्ययाचत पदत्रयम्। पुनस्त्रिविक्रमो भूत्वा भुवनानि जहार मे
prathamaṁ vāmano bhūtvā hyayācata padatrayam| punastrivikramo bhūtvā bhuvanāni jahāra me
पहले वामन बनकर उन्होंने तीन पग भूमि माँगी, फिर त्रिविक्रम बनकर मेरे समस्त भुवनों को हर लिया।
श्लोक 14 (skanda.7.466.14)
मया पुण्यवशाद्विष्णुर्यदि प्राप्तः कथञ्चन। नाहं त्यक्ष्ये जगन्नाथं मायावामनकं प्रभुम्
mayā puṇyavaśādviṣṇuryadi prāptaḥ kathañcana| nāhaṁ tyakṣye jagannāthaṁ māyāvāmanakaṁ prabhum
यदि मुझे पुण्य के प्रभाव से किसी प्रकार विष्णु प्राप्त हुए हैं, तो मैं उस माया-वामन-रूपधारी जगन्नाथ प्रभु को नहीं त्यागूँगा।
श्लोक 15 (skanda.7.466.15)
दुर्वासा उवाच। नाहं भोक्ष्ये विना स्नानं गोमत्युदधिसंगमे। यदि न प्रेष्यसि हरिं ततस्त्यक्ष्ये कलेवरम्
durvāsā uvāca| nāhaṁ bhokṣye vinā snānaṁ gomatyudadhisaṁgame| yadi na preṣyasi hariṁ tatastyakṣye kalevaram
दुर्वासा ने कहा — मैं गोमती और सागर के संगम में स्नान किए बिना भोजन नहीं करूँगा। यदि आप हरि को नहीं भेजेंगे, तो मैं अपने शरीर का त्याग कर दूँगा।
श्लोक 16 (skanda.7.466.16)
बलिरुवाच। यद्भाव्यं तद्भवतु ते यज्जानासि तथा कुरु। ब्रह्मरुद्रेन्द्रनमितं नाहं त्यक्ष्ये पदद्वयम्
balir uvāca| yadbhāvyaṁ tadbhavatu te yajjānāsi tathā kuru| brahmarudrendranamitaṁ nāhaṁ tyakṣye padadvayam
बलि ने कहा — जो होना है, वही तुम्हारे साथ हो; जो तुम उचित समझो, वही करो। किंतु ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र द्वारा नमित उन दोनों चरणों को मैं नहीं त्यागूँगा।
श्लोक 17 (skanda.7.466.17)
तदा विवदमानौ तौ दृष्ट्वा स जगदीश्वरः। ब्रह्मण्यदेवः कृपया ब्राह्मणं तमुवाच ह
tadā vivadamānau tau dṛṣṭvā sa jagadīśvaraḥ| brahmaṇyadevaḥ kṛpayā brāhmaṇaṁ tamuvāca ha
तब उन दोनों को विवाद करते देखकर उस जगदीश्वर, ब्राह्मणों के हितकारी देव ने कृपापूर्वक उस ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 18 (skanda.7.466.18)
स्वस्थो भव द्विजश्रेष्ठ स्नापयिष्ये न संशयः। हत्वा दैत्यगणान्सर्वान्गोमत्युदधिसंगमे
svastho bhava dvijaśreṣṭha snāpayiṣye na saṁśayaḥ| hatvā daityagaṇānsarvāngomatyudadhisaṁgame
हे द्विजश्रेष्ठ! स्वस्थ रहो, मैं तुम्हें अवश्य स्नान कराऊँगा — गोमती और सागर के संगम में समस्त दैत्यों को मारकर।
श्लोक 19 (skanda.7.466.19)
प्रह्लाद उवाच। श्रुत्वा भगवतो वाक्यं ब्राह्मणं प्रति दैत्यराट्। दृढं जग्राह चरणौ पतित्वा पादयोस्तदा
prahlāda uvāca| śrutvā bhagavato vākyaṁ brāhmaṇaṁ prati daityarāṭ| dṛḍhaṁ jagrāha caraṇau patitvā pādayostadā
प्रह्लाद जी ने कहा — ब्राह्मण के प्रति कहे गए भगवान् के इस वचन को सुनकर दैत्यराज ने उनके चरणों में गिरकर उन्हें दृढ़ता से पकड़ लिया।
श्लोक 20 (skanda.7.466.20)
ततः समृद्धिमगमत्पादौ दत्त्वा बलेः प्रभुः। शंखचक्रगदापाणिर्विष्णुर्दुर्वाससाऽन्वितः
tataḥ samṛddhimagamatpādau dattvā baleḥ prabhuḥ| śaṅkhacakragadāpāṇirviṣṇurdurvāsasā'nvitaḥ
तब बलि को अपने चरण देकर प्रभु समृद्धि को प्राप्त हुए; शंख, चक्र, गदा हाथों में धारण किए विष्णु दुर्वासा के साथ चले।
श्लोक 21 (skanda.7.466.21)
प्रस्थितौ तौ तदा दृष्ट्वा दुर्वाससजनार्द्दनौ। अनन्तः पुरुषो ऽगच्छन्मुशली च हलायुधः
prasthitau tau tadā dṛṣṭvā durvāsasajanārddanau| anantaḥ puruṣo'gacchanmuśalī ca halāyudhaḥ
दुर्वासा और जनार्दन को इस प्रकार प्रस्थान करते देखकर, अनन्त पुरुष तथा मुशल और हल धारण करने वाले बलराम भी चल पड़े।
श्लोक 22 (skanda.7.466.22)
मुशली चाग्रतोऽगच्छत्ततो विष्णुस्त्रिविक्रमः। तयोरन्वगमद्विप्रा दुर्वासा भूतलाद्बहिः
muśalī cāgrato'gacchattato viṣṇustrivikramaḥ| tayoranvagamadviprā durvāsā bhūtalādbahiḥ
मुशलधारी बलराम आगे-आगे चले, फिर त्रिविक्रम विष्णु; हे विप्रो! दुर्वासा उन दोनों के पीछे भूतल से बाहर चले।
श्लोक 23 (skanda.7.466.23)
भित्त्वा रसातलं सर्वे समुत्तस्थुस्त्वरान्विताः। आविर्बभूवुस्तत्रैव गोमत्युदधिसंगमे
bhittvā rasātalaṁ sarve samuttasthustvarānvitāḥ| āvirbabhūvustatraiva gomatyudadhisaṁgame
सब लोग रसातल को भेदकर शीघ्रता से ऊपर उठे और उसी गोमती-सागर संगम पर प्रकट हुए।
श्लोक 24 (skanda.7.466.24)
सन्नद्धौ दृढधन्वानौ संकर्षणजनार्दनौ। ऊचतुस्तौ तदा विप्रं कुरु स्नानं यदृच्छया
sannaddhau dṛḍhadhanvānau saṁkarṣaṇajanārdanau| ūcatustau tadā vipraṁ kuru snānaṁ yadṛcchayā
सुसज्जित तथा दृढ़ धनुष धारण किए संकर्षण और जनार्दन ने तब उस ब्राह्मण से कहा — अब निःशंक होकर स्नान करो।
श्लोक 25 (skanda.7.466.25)
तयोस्तु वचनं श्रुत्वा स्नानं चक्रे त्वरान्वितः। स्नात्वा चावश्यकं कर्म कर्तुमारभत द्विजः
tayostu vacanaṁ śrutvā snānaṁ cakre tvarānvitaḥ| snātvā cāvaśyakaṁ karma kartumārabhata dvijaḥ
उन दोनों के वचन सुनकर उसने शीघ्रता से स्नान किया। स्नान के पश्चात् उस ब्राह्मण ने अपने नित्यकर्म का आरंभ किया।