प्रभास खण्ड · अध्याय 467
चक्रतीर्थ में कुश-विष्णु युद्ध तथा कुश राक्षस पर शिवलिंग स्थापन वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.467.1)
प्रह्लाद उवाच। ब्रह्मघोषध्वनिं श्रुत्वा दानवो दुर्मुखस्तदा। क्रोधसंरक्तनयनो दुर्वाससमथाब्रवीत्
prahlāda uvāca| brahmaghoṣadhvaniṁ śrutvā dānavo durmukhastadā| krodhasaṁraktanayano durvāsasamathābravīt
प्रह्लाद जी ने कहा — ब्रह्मघोष (वेदपाठ) की ध्वनि सुनकर दुर्मुख नामक दानव क्रोध से लाल नेत्र किए हुए दुर्वासा से बोला।
श्लोक 2 (skanda.7.467.2)
हन्यमानस्त्वमस्माभिर्यदि मुक्तोऽसि वै द्विज। कस्मात्पुनः समायातो मरणाय च दुष्टधीः
hanyamānastvamasmābhiryadi mukto'si vai dvija| kasmātpunaḥ samāyāto maraṇāya ca duṣṭadhīḥ
'हमारे द्वारा पीटे जाने पर भी यदि तुम मुक्त हो गए हो, हे द्विज, तो फिर मरने के लिए ही यहाँ क्यों आए हो, हे दुष्टबुद्धि?'
श्लोक 3 (skanda.7.467.3)
इत्युक्त्वा मुष्टिना हन्तुं प्राद्रवद्दानवाधमः। प्राह प्रधावमानं तं दुर्वासा मुनिसत्तमः
ityuktvā muṣṭinā hantuṁ prādravaddānavādhamaḥ| prāha pradhāvamānaṁ taṁ durvāsā munisattamaḥ
ऐसा कहकर वह नीच दानव मुक्के से मारने के लिए दौड़ा। उस दौड़ते हुए दानव से मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ने कहा —
श्लोक 4 (skanda.7.467.4)
स्पर्शं मा कुरु पापिष्ठ ब्राह्मणं मां कृताह्निकम्। तं दृष्ट्वा दानवं विष्णुर्ब्राह्मणं हन्तुमुद्यतम्
sparśaṁ mā kuru pāpiṣṭha brāhmaṇaṁ māṁ kṛtāhnikam| taṁ dṛṣṭvā dānavaṁ viṣṇurbrāhmaṇaṁ hantumudyatam
'हे पापिष्ठ! मुझ ब्राह्मण को, जिसने अपने नित्यकर्म पूर्ण कर लिए हैं, मत छूना।' उस ब्राह्मण को मारने के लिए उद्यत उस दानव को विष्णु ने देखा।
श्लोक 5 (skanda.7.467.5)
तस्य क्रुद्धो जगन्नाथो दुर्वाससः कृते तदा। चक्रेण क्षुरधारेण शिरश्चिच्छेद लीलया
tasya kruddho jagannātho durvāsasaḥ kṛte tadā| cakreṇa kṣuradhāreṇa śiraścicheda līlayā
तब दुर्वासा के लिए क्रोधित हुए जगन्नाथ ने क्षुरधार चक्र से उस दानव का सिर सहज ही काट डाला।
श्लोक 6 (skanda.7.467.6)
प्रह्लाद उवाच। दुर्मुखं निहतं दृष्ट्वा दानवो दुःसहस्तदा। आक्रोशदुच्चैर्दितिजाञ्छीघ्रमागम्यतामिति
prahlāda uvāca| durmukhaṁ nihataṁ dṛṣṭvā dānavo duḥsahastadā| ākrośaduccairditijāñchīghramāgamyatāmiti
प्रह्लाद जी ने कहा — दुर्मुख को मारा गया देखकर दुःसह नामक दानव ऊँचे स्वर में दैत्यों को पुकारने लगा — 'शीघ्र आओ!'
श्लोक 7 (skanda.7.467.7)
श्रुत्वा दैत्यगणाः सर्वे दुर्मुखं निहतं तदा। दुर्वाससं पुनस्तत्र परित्रातं च विष्णुना
śrutvā daityagaṇāḥ sarve durmukhaṁ nihataṁ tadā| durvāsasaṁ punastatra paritrātaṁ ca viṣṇunā
यह सुनकर समस्त दैत्यगण जान गए कि दुर्मुख मारा गया है, तथा दुर्वासा को पुनः वहाँ विष्णु द्वारा बचा लिया गया है।
श्लोक 8 (skanda.7.467.8)
कूर्मपृष्ठो गोलकश्च क्रोधनो वेददूषकः। यज्ञघ्नो यज्ञहंता च धर्मान्तकस्तपस्विहा
kūrmapṛṣṭho golakaśca krodhano vedadūṣakaḥ| yajñaghno yajñahaṁtā ca dharmāntakastapasvihā
कूर्मपृष्ठ, गोलक, क्रोधन, वेददूषक, यज्ञघ्न, यज्ञहन्ता, धर्मान्तक तथा तपस्विहा —
श्लोक 9 (skanda.7.467.9)
एते चान्ये च बहवो विविधायुधपाणयः। क्रोधसंरक्तनयनाः शपन्तो ब्राह्मणं तथा
ete cānye ca bahavo vividhāyudhapāṇayaḥ| krodhasaṁraktanayanāḥ śapaṁto brāhmaṇaṁ tathā
ये और अन्य अनेक दानव विविध शस्त्र हाथों में लिए, क्रोध से लाल नेत्र किए हुए उस ब्राह्मण को शाप देते हुए,
श्लोक 10 (skanda.7.467.10)
परिक्षिप्य तदात्रेयं विष्णुं संकर्षणं तथा। तोमरैर्भिन्दिपालैश्च मुशलैश्च भुशुंडिभिः
parikṣipya tadātreyaṁ viṣṇuṁ saṁkarṣaṇaṁ tathā| tomarairbhindipālaiśca muśalaiśca bhuśuṁḍibhiḥ
अत्रि-पुत्र दुर्वासा, विष्णु तथा संकर्षण को घेरकर, तोमर, भिंदिपाल, मुशल तथा भुशुण्डी नामक अस्त्रों से,
श्लोक 11 (skanda.7.467.11)
अस्त्रैर्नानाविधैश्चापि युयुधुः क्रोधमूर्छिताः। दानवैः संवृतो विष्णुः समन्ताद्घोरदर्शनैः
astrairnānāvidhaiścāpi yuyudhuḥ krodhamūrchitāḥ| dānavaiḥ saṁvṛto viṣṇuḥ samantādghoradarśanaiḥ
तथा विविध प्रकार के अन्य अस्त्रों से भी, क्रोध से बेसुध हुए वे युद्ध करने लगे। विष्णु चारों ओर से भयंकर दिखने वाले दानवों से घिर गए।
श्लोक 12 (skanda.7.467.12)
संकर्षणश्च शुशुभे चंद्रादित्यौ घनैरिव। गृहीत्वा धनुषी दिव्ये शीघ्रं संयोज्य चाशुगान्
saṁkarṣaṇaśca śuśubhe caṁdrādityau ghanairiva| gṛhītvā dhanuṣī divye śīghraṁ saṁyojya cāśugān
संकर्षण (बलराम) भी शोभित हो रहे थे, जैसे मेघों में चन्द्रमा और सूर्य। दोनों ने अपने दिव्य धनुष उठाकर शीघ्र ही उन पर बाण चढ़ाए,
श्लोक 13 (skanda.7.467.13)
तान्मार्गणगणैर्दैत्याञ्जघ्नतुस्ते महामृधे। ते हन्यमानाः समरे विष्णुना विद्रुता दिशः
tānmārgaṇagaṇairdaityāñjaghnatuste mahāmṛdhe| te hanyamānāḥ samare viṣṇunā vidrutā diśaḥ
और उन बाण-समूहों से उन्होंने महासंग्राम में दैत्यों को मार गिराया। विष्णु द्वारा मारे जाते हुए वे दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 14 (skanda.7.467.14)
दानवान्विद्रुतान्दृष्ट्वा विष्णुना निहतान्परान्। गोलकः कूर्मपृष्ठश्च मानं कृत्वा न्यवर्तताम्
dānavānvidrutāndṛṣṭvā viṣṇunā nihatānparān| golakaḥ kūrmapṛṣṭhaśca mānaṁ kṛtvā nyavartatām
अन्य दानवों को भागते तथा विष्णु द्वारा मारे जाते देखकर, गोलक और कूर्मपृष्ठ ने अपने अभिमान को सँभालते हुए मुड़कर मुकाबला किया।
श्लोक 15 (skanda.7.467.15)
संकर्षणं गोलकश्च ह्याजघान त्रिभिः शरैः। अनन्तं व्यथितं दृष्ट्वा गोलकः क्रोधमूर्छितः
saṁkarṣaṇaṁ golakaśca hyājaghāna tribhiḥ śaraiḥ| anantaṁ vyathitaṁ dṛṣṭvā golakaḥ krodhamūrchitaḥ
गोलक ने संकर्षण पर तीन बाणों से प्रहार किया। अनन्त (बलराम) को व्यथित देखकर गोलक क्रोध से उन्मत्त हो गया।
श्लोक 16 (skanda.7.467.16)
उत्पत्य तरसा मूर्ध्नि दुर्वाससमताडयत्। स मुष्टिघाताभिहतश्चुक्रोश पतितः क्षितौ
utpatya tarasā mūrdhni durvāsasamatāḍayat| sa muṣṭighātābhihataścukrośa patitaḥ kṣitau
वह वेगपूर्वक उछलकर दुर्वासा के सिर पर प्रहार करने लगा। मुक्के की चोट से आहत होकर वे चिल्ला उठे और भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 17 (skanda.7.467.17)
संकर्षणस्तु पतितं दृष्ट्वा मूर्ध्नि प्रताडितम्। दृष्ट्वा चुकोप भगवांस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्। संगृह्य मुशलं वीरो जघान समरे रिपुम्
saṁkarṣaṇastu patitaṁ dṛṣṭvā mūrdhni pratāḍitam| dṛṣṭvā cukopa bhagavāṁstiṣṭhatiṣṭheti cābravīt| saṁgṛhya muśalaṁ vīro jaghāna samare ripum
संकर्षण ने सिर पर आहत हुए और गिरे हुए दुर्वासा को देखा। यह देखकर भगवान् क्रोधित हो गए और बोले — 'ठहर, ठहर!' उस वीर ने मुशल उठाकर युद्ध में उस शत्रु का वध किया।
श्लोक 18 (skanda.7.467.18)
मुशलेनाहतो मूर्ध्नि गोलको विकलेन्द्रियः। संभिन्नमस्तकश्चैव पपात च ममार च
muśalenāhato mūrdhni golako vikalendriyaḥ| saṁbhinnamastakaścaiva papāta ca mamāra ca
मुशल से सिर पर आहत होकर गोलक की इन्द्रियाँ शिथिल हो गईं, उसका मस्तक फट गया, और वह गिरकर मर गया।
श्लोक 19 (skanda.7.467.19)
गोलकं पतितं दृष्ट्वा क्रन्दंतं ब्राह्मणं तथा। कूर्मपृष्ठं च भगवान्विष्णुर्हन्तुं मनो दधे। नाराचेन सुतीक्ष्णेन जघान हृदये रिपुम्
golakaṁ patitaṁ dṛṣṭvā kranaṁtaṁ brāhmaṇaṁ tathā| kūrmapṛṣṭhaṁ ca bhagavānviṣṇurhantuṁ mano dadhe| nārācena sutīkṣṇena jaghāna hṛdaye ripum
गोलक को गिरा हुआ तथा ब्राह्मण को रोते हुए देखकर, भगवान् विष्णु ने कूर्मपृष्ठ को मारने का मन बनाया, और अत्यंत तीक्ष्ण नाराच बाण से उस शत्रु के हृदय पर प्रहार किया।
श्लोक 20 (skanda.7.467.20)
स विष्णुबाणाभिहतस्त्यक्तशस्त्रः पलायितः। तस्मिन्प्रभिन्नेऽतिबले गते वै कूर्मपृष्ठके। अभज्यत बलं सर्वं विद्रुतं च दिशो दश
sa viṣṇubāṇābhihatastyaktaśastraḥ palāyitaḥ| tasminprabhinne'tibale gate vai kūrmapṛṣṭhake| abhajyata balaṁ sarvaṁ vidrutaṁ ca diśo daśa
विष्णु के बाण से आहत होकर वह शस्त्र त्यागकर भाग गया। जब वह अत्यंत बलवान् कूर्मपृष्ठ इस प्रकार आहत होकर चला गया, तब समस्त सेना छिन्न-भिन्न हो गई और दसों दिशाओं में भाग गई।
श्लोक 21 (skanda.7.467.21)
तत्प्रभग्नं बलं सर्वं निहतं गोलकं तथा। द्वारस्थः कथयामास दैत्यराज्ञे कुशाय सः
tatprabhagnaṁ balaṁ sarvaṁ nihataṁ golakaṁ tathā| dvārasthaḥ kathayāmāsa daityarājñe kuśāya saḥ
उस समस्त छिन्न-भिन्न सेना तथा गोलक के मारे जाने का समाचार द्वार पर खड़े उस व्यक्ति ने दैत्यराज कुश को सुनाया।
श्लोक 22 (skanda.7.467.22)
गोलकं निहतं श्रुत्वा दैत्यानन्यांश्च दैत्यराट्। योधानाज्ञापयामास सन्नद्धान्स्वबलस्य च
golakaṁ nihataṁ śrutvā daityānanyāṁśca daityarāṭ| yodhānājñāpayāmāsa sannaddhānsvabalasya ca
गोलक तथा अन्य दैत्यों के मारे जाने का समाचार सुनकर दैत्यराज ने अपनी सेना के सुसज्जित योद्धाओं को आज्ञा दी।
श्लोक 23 (skanda.7.467.23)
आज्ञां कुशस्य ते लब्ध्वा दैत्याः पंचजनादयः। युद्धायाभिमुखाः सर्वे रथैर्नागैश्च निर्ययुः
ājñāṁ kuśasya te labdhvā daityāḥ paṁcajanādayaḥ| yuddhāyābhimukhāḥ sarve rathairnāgaiśca niryayuḥ
कुश की आज्ञा पाकर पंचजन आदि दैत्य युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर रथों और हाथियों पर सवार होकर निकल पड़े।
श्लोक 24 (skanda.7.467.24)
अनीकं दशसाहस्रं कूर्मपृष्ठस्य निर्ययौ। अयुते द्वे रथानां तु नागानामयुतं तथा
anīkaṁ daśasāhasraṁ kūrmapṛṣṭhasya niryayau| ayute dve rathānāṁ tu nāgānāmayutaṁ tathā
कूर्मपृष्ठ की दस हजार सेना निकली, बीस हजार रथ तथा दस हजार हाथी भी निकले।
श्लोक 25 (skanda.7.467.25)
दशायुतानि चाश्वानामुष्ट्राणां च तथैव च। बकश्च निर्ययौ दैत्यो बहुसैन्यसमन्वितः
daśāyutāni cāśvānāmuṣṭrāṇāṁ ca tathaiva ca| bakaśca niryayau daityo bahusainyasamanvitaḥ
एक लाख घोड़े तथा उतने ही ऊँट भी निकले। बहुसंख्यक सेना सहित बक नामक दैत्य भी निकला।
श्लोक 26 (skanda.7.467.26)
तथा दीर्घनखो दैत्यः स्वेनानीकेन संवृतः। मंत्रिपुत्रो महामायो दैत्यराजकुशस्य वै। निर्ययौ विघसो दैत्यः प्रघसश्च महाबलः
tathā dīrghanakho daityaḥ svenānīkena saṁvṛtaḥ| maṁtriputro mahāmāyo daityarājakuśasya vai| niryayau vighaso daityaḥ praghasaśca mahābalaḥ
इसी प्रकार दीर्घनख दैत्य भी अपनी सेना से घिरा हुआ निकला। दैत्यराज कुश के मंत्रिपुत्र महामाया, विघस नामक दैत्य तथा महाबली प्रघस भी निकले।
श्लोक 27 (skanda.7.467.27)
ऊर्ध्वबाहुर्वक्रशिराः कञ्चुकश्च शिवोलुकैः। ब्रह्मघ्नो यज्ञहा दैत्यो राहुर्बर्बरकस्तथा
ūrdhvabāhurvakraśirāḥ kañcukaśca śivolukaiḥ| brahmaghno yajñahā daityo rāhurbarbarakastathā
ऊर्ध्वबाहु, वक्रशिरा, शिव-उलूकों (अशुभ उल्लुओं) सहित कंचुक, ब्रह्मघ्न, यज्ञहा नामक दैत्य, राहु तथा बर्बरक —
श्लोक 28 (skanda.7.467.28)
सुनामा वसुनामा च मंत्रिणौ बुद्धिसत्तमौ। सेनापतिश्चोग्रदंष्ट्रस्तस्य भ्राता महाहनुः
sunāmā vasunāmā ca maṁtriṇau buddhisattamau| senāpatiścogradaṁṣṭrastasya bhrātā mahāhanuḥ
बुद्धिमानों में श्रेष्ठ सुनामा और वसुनामा नामक दो मंत्री, तथा सेनापति उग्रदंष्ट्र और उसका भाई महाहनु —
श्लोक 29 (skanda.7.467.29)
एते चान्ये च बहवो दैत्याः क्रोधसमन्विताः। महता रथघोषेण निर्ययुर्युद्धकांक्षिणः
ete cānye ca bahavo daityāḥ krodhasamanvitāḥ| mahatā rathaghoṣeṇa niryayuryuddhakāṁkṣiṇaḥ
ये तथा अन्य अनेक क्रोध से भरे हुए दैत्य युद्ध की इच्छा से रथों की महाघोषणा के साथ निकल पड़े।
श्लोक 30 (skanda.7.467.30)
स्नात्वा शुक्लांबरधरः शुक्लमालाविभूषितः। कुशः शंभुं महादेवं भवानीपतिमव्ययम्। आर्चयामास भूतेशं परमेण समाधिना
snātvā śuklāṁbaradharaḥ śuklamālāvibhūṣitaḥ| kuśaḥ śaṁbhuṁ mahādevaṁ bhavānīpatimavyayam| ārcayāmāsa bhūteśaṁ parameṇa samādhinā
स्नान कर श्वेत वस्त्र और श्वेत माला धारण किए हुए कुश ने परम समाधि के साथ भवानीपति अव्यय महादेव शंभु, भूतेश्वर का पूजन किया।
श्लोक 31 (skanda.7.467.31)
पञ्चामृतेन संस्नाप्य तथा गन्धैर्विलिप्य च। अर्चयामास दैत्येन्द्रो ह्यनेककुसुमोत्करैः
pañcāmṛtena saṁsnāpya tathā gaṁdhairvilipya ca| arcayāmāsa daityendro hyanekakusumotkaraiḥ
पंचामृत से स्नान कराकर तथा गन्ध का लेपन कर, उस दैत्येन्द्र ने अनेक पुष्पों के समूहों से उनका पूजन किया।
श्लोक 32 (skanda.7.467.32)
गीतवादित्रशब्दैश्च तथा मंगलवाचकैः। पूजयित्वा महादेवं ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च
gītavāditraśabdaiśca tathā maṁgalavācakaiḥ| pūjayitvā mahādevaṁ brāhmaṇānsvasti vācya ca
गीत, वाद्य ध्वनियों तथा मंगल-वाणियों के साथ महादेव की पूजा कर, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया,
श्लोक 33 (skanda.7.467.33)
भूषयित्वा भूषणैश्च मणिवज्रविभूषणैः। मुकुटेनार्कवर्णेन ज्वलद्भास्कररोचिषा
bhūṣayitvā bhūṣaṇaiśca maṇivajravibhūṣaṇaiḥ| mukuṭenārkavarṇena jvaladbhāskararociṣā
मणि और हीरों के आभूषणों से अपने को सुसज्जित कर, तथा सूर्य के समान वर्ण वाले और भास्कर की भाँति चमकते मुकुट से,
श्लोक 34 (skanda.7.467.34)
भ्राजमानो दैत्यराजो हारेणाऽतीव शोभितः। संनह्य च महाबाहुः सारथिं समुदैक्षत
bhrājamāno daityarājo hāreṇā'tīva śobhitaḥ| saṁnahya ca mahābāhuḥ sārathiṁ samudaikṣata
वह देदीप्यमान दैत्यराज नेकलेस से अत्यंत सुशोभित होकर, कवच धारण कर, महाबाहु ने अपने सारथी को देखा।
श्लोक 35 (skanda.7.467.35)
सुनामानं वसुं चैव मंत्रिणौ वाक्यमब्रवीत्। कश्चायमसुरान्हंति किमर्थं ज्ञायतामिति
sunāmānaṁ vasuṁ caiva maṁtriṇau vākyamabravīt| kaścāyamasurānhaṁti kimarthaṁ jñāyatāmiti
उसने अपने दोनों मंत्रियों सुनामा और वसु से कहा — 'यह कौन है जो असुरों को मार रहा है? यह किसलिए, यह जानो।'
श्लोक 36 (skanda.7.467.36)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रुरुर्वचनमब्रवीत्। गतेऽह्नि ब्राह्मणः स्नातुं गोमत्याः संगमे किल
tasya tadvacanaṁ śrutvā rururvacanamabravīt| gate'hni brāhmaṇaḥ snātuṁ gomatyāḥ saṁgame kila
उसका यह वचन सुनकर रुरु ने कहा — 'बीते दिन एक ब्राह्मण गोमती के संगम पर स्नान करने आया था।'
श्लोक 37 (skanda.7.467.37)
आगतः प्रतिषिद्धः सन्दैत्यैस्तत्र महीपते। तेन विष्णुः समानीतः संकर्षणसमन्वितः
āgataḥ pratiṣiddhaḥ sandaityaistatra mahīpate| tena viṣṇuḥ samānītaḥ saṁkarṣaṇasamanvitaḥ
हे महीपते! वह आकर वहाँ दैत्यों द्वारा रोक दिया गया था। उसी ने संकर्षण सहित विष्णु को बुला लाया।
श्लोक 38 (skanda.7.467.38)
सोऽस्मान्हंति महाराज ब्रह्मण्यो जगदीश्वरः। तेन ते बहवो दैत्या हताः केचित्पलायिताः
so'smānhaṁti mahārāja brahmaṇyo jagadīśvaraḥ| tena te bahavo daityā hatāḥ kecitpalāyitāḥ
हे महाराज! वह ब्राह्मणों का हितकारी जगदीश्वर हमें मार रहा है। उसके द्वारा अनेक दैत्य मारे गए हैं और कुछ भाग गए हैं।
श्लोक 39 (skanda.7.467.39)
सुनामोवाच। स्नात्वा गच्छतु विप्रोऽसौ वासुदेवसमन्वितः। राजन्वृथा विग्रहेण किं कार्यं कथयस्व नः
sunāmovāca| snātvā gacchatu vipro'sau vāsudevasamanvitaḥ| rājanvṛthā vigraheṇa kiṁ kāryaṁ kathayasva naḥ
सुनामा ने कहा — उस ब्राह्मण को वासुदेव के साथ स्नान कर चले जाने दीजिए। हे राजन्! व्यर्थ युद्ध से क्या लाभ? हमें बताइए, इसमें क्या प्रयोजन है?
श्लोक 40 (skanda.7.467.40)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कुशः क्रोधसमन्वितः। कथं गोलकहंतारं न हनिष्यामि केशवम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā kuśaḥ krodhasamanvitaḥ| kathaṁ golakahaṁtāraṁ na haniṣyāmi keśavam
यह वचन सुनकर कुश क्रोध से भर गया — 'गोलक के हत्यारे केशव को मैं कैसे न मारूँ?'
श्लोक 41 (skanda.7.467.41)
एतावदुक्त्वा स क्रुद्धो ययौ दैत्यपतिस्तदा। ततो वादित्रशब्दैश्च भेरीशब्दैः समन्वितः
etāvaduktvā sa kruddho yayau daityapatistadā| tato vāditraśabdaiśca bherīśabdaiḥ samanvitaḥ
इतना कहकर वह क्रोधित दैत्यराज चल पड़ा, वाद्यों की ध्वनि तथा भेरियों की गर्जना के साथ।
श्लोक 42 (skanda.7.467.42)
ददर्श तत्र देवेशं सहस्रशिरसं प्रभुम्। तथा विष्णुं चक्रपाणिं दुर्वाससमकल्मषम्
dadarśa tatra deveśaṁ sahasraśirasaṁ prabhum| tathā viṣṇuṁ cakrapāṇiṁ durvāsasamakalmaṣam
उसने वहाँ सहस्रशिरस्क प्रभु देवेश (अनन्त), चक्रपाणि विष्णु तथा निष्पाप दुर्वासा को देखा।
श्लोक 43 (skanda.7.467.43)
ईश्वरांशं च तं दृष्ट्वा न हन्तव्योऽयमीश्वरः। विष्णुमुद्दिश्य तान्सर्वान्प्रेरयामास दानवान्
īśvarāṁśaṁ ca taṁ dṛṣṭvā na hantavyo'yamīśvaraḥ| viṣṇumuddiśya tānsarvānprerayāmāsa dānavān
उन्हें ईश्वर का अंश जानकर उसने सोचा — 'इस ईश्वर को नहीं मारना चाहिए' — और विष्णु को लक्ष्य कर उसने उन सब दानवों को भेज दिया।
श्लोक 44 (skanda.7.467.44)
नागैः पर्वतसंकाशै रथैर्जलदसन्निभैः। अश्वैर्महाजवैश्चैव परिवव्रुः समन्ततः
nāgaiḥ parvatasaṁkāśai rathairjaladasannibhaiḥ| aśvairmahājavaiścaiva parivavruḥ samaṁtataḥ
पर्वत-सदृश हाथियों, मेघ-सदृश रथों तथा अत्यंत वेगवान् घोड़ों से उन्होंने चारों ओर से उन्हें घेर लिया।
श्लोक 45 (skanda.7.467.45)
ततो युद्धं समभवद्देवयोर्दानवैः सह। आच्छादितौ तौ ददृशुर्दैत्यैर्देवगणास्तदा
tato yuddhaṁ samabhavaddevayordānavaiḥ saha| ācchāditau tau dadṛśurdaityairdevagaṇāstadā
तब उन दोनों देवों का दानवों के साथ युद्ध होने लगा। देवगणों ने देखा कि वे दोनों दैत्यों से पूरी तरह घिर गए हैं।
श्लोक 46 (skanda.7.467.46)
ततो गृहीत्वा मुशलं हलं च बलवान्हली। जघान दैत्यप्रवरान्कालानलयमोपमान्
tato gṛhītvā muśalaṁ halaṁ ca balavānhalī| jaghāna daityapravarānkālānalayamopamān
तब बलशाली हलधर (बलराम) ने मुशल और हल उठाकर काल, अग्नि और यम के समान भयंकर श्रेष्ठ दैत्यों का वध किया।
श्लोक 47 (skanda.7.467.47)
ते हन्यमाना दैतेया बलेन बलशालिना। सर्वतो विद्रुता भग्नाः कुशमेव ययुस्तदा
te hanyamānā daiteyā balena balaśālinā| sarvato vidrutā bhagnāḥ kuśameva yayustadā
बलशाली बल (बलराम) द्वारा मारे जाते हुए वे दैत्य सब ओर से भाग खड़े हुए और टूटकर कुश के पास ही चले गए।
श्लोक 48 (skanda.7.467.48)
बकश्च यज्ञकोपश्च ब्रह्मघ्नो वेददूषकः। महामखघ्नो जम्भश्च राहुर्वक्रशिरास्तथा
bakaśca yajñakopaśca brahmaghno vedadūṣakaḥ| mahāmakhaghno jaṁbhaśca rāhurvakraśirāstathā
बक, यज्ञकोप, ब्रह्मघ्न, वेददूषक, महामखघ्न, जम्भ, राहु तथा वक्रशिरा —
श्लोक 49 (skanda.7.467.49)
एते चान्ये च बहवः प्रवरा दानवोत्तमाः। क्रोधसंरक्तनयना बिभिदुस्ते जनार्द्दनम्
ete cānye ca bahavaḥ pravarā dānavottamāḥ| krodhasaṁraktanayanā bibhiduste janārddanam
ये तथा अन्य अनेक श्रेष्ठ दानव, क्रोध से लाल नेत्र किए हुए, जनार्दन पर टूट पड़े।
श्लोक 50 (skanda.7.467.50)
ततः क्रोधसमायुक्तौ संकर्षणजनार्दनौ। चक्रलांगलघातेन जघ्नतुर्दानवोत्तमान्
tataḥ krodhasamāyuktau saṁkarṣaṇajanārdanau| cakralāṁgalaghātena jaghnaturdānavottamān
तब क्रोध से भरे हुए संकर्षण और जनार्दन ने चक्र और हल के प्रहार से उन श्रेष्ठ दानवों का वध किया।
श्लोक 51 (skanda.7.467.51)
चक्रेण च शिरः कायाच्चिच्छेदाशु बकस्य वै। चूर्णयामास मुशली यज्ञहंतारमेव च
cakreṇa ca śiraḥ kāyāccicchedāśu bakasya vai| cūrṇayāmāsa muśalī yajñahaṁtāramevaca
चक्र से उन्होंने बक का सिर धड़ से तुरन्त काट दिया, और मुशलधारी ने यज्ञहन्ता को चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 52 (skanda.7.467.52)
राहुं जघान चक्रेण तथान्यान्मुशलेन च। ते हता हन्यमानाश्च भग्ना जग्मुर्दिशो दश
rāhuṁ jaghāna cakreṇa tathānyānmuśalena ca| te hatā hanyamānāśca bhagnā jagmurdiśo daśa
चक्र से राहु का तथा मुशल से अन्य दैत्यों का वध किया। मारे गए और घायल हुए वे टूटकर दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 53 (skanda.7.467.53)
कुशः स्वां वाहिनीं दृष्ट्वा विद्रुतां निहतां तथा। क्रोधसंरक्तनयनः प्राह याहीति सारथिम्
kuśaḥ svāṁ vāhinīṁ dṛṣṭvā vidrutāṁ nihatāṁ tathā| krodhasaṁraktanayanaḥ prāha yāhīti sārathim
अपनी सेना को इस प्रकार भागती और मारी जाती देखकर कुश ने क्रोध से लाल नेत्र किए हुए सारथी से कहा — 'चलो!'
श्लोक 54 (skanda.7.467.54)
स तयोरन्तिकं गत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः। उवाच कस्त्वं दैतेयान्मम हंसि गदाधर
sa tayorantikaṁ gatvā nāma viśrāvya cātmanaḥ| uvāca kastvaṁ daiteyānmama haṁsi gadādhara
वह उन दोनों के निकट जाकर अपना नाम बताते हुए बोला — 'तुम कौन हो, हे गदाधर, जो मेरे दैत्यों को मार रहे हो?'
श्लोक 55 (skanda.7.467.55)
श्रीवासुदेव उवाच। यस्माद्विमुक्तिदं पुण्यं गोमत्युदधिसंगमम्। रुद्धं दुरात्मभिः पापैस्तस्मात्ते निहता मया
śrīvāsudeva uvāca| yasmādvimuktidaṁ puṇyaṁ gomatyudadhisaṁgamam| ruddhaṁ durātmabhiḥ pāpaistasmātte nihatā mayā
श्री वासुदेव ने कहा — क्योंकि तुम दुष्ट पापियों ने गोमती-सागर के मुक्तिदायक पुण्य संगम को अवरुद्ध कर रखा है, इसीलिए मैंने तुम्हारे लोगों का वध किया है।
श्लोक 56 (skanda.7.467.56)
कुश उवाच। मां न जानासि चात्रस्थं कथं जीवन्प्रयास्यसि। युध्यस्व त्वं स्थिरो भूत्वा ततस्त्यक्ष्यसि जीवितम्
kuśa uvāca| māṁ na jānāsi cātrasthaṁ kathaṁ jīvanprayāsyasi| yudhyasva tvaṁ sthiro bhūtvā tatastyakṣyasi jīvitam
कुश ने कहा — तुम मुझे यहाँ का शासक नहीं जानते; जीवित रहकर कैसे जाओगे? स्थिर होकर युद्ध करो, फिर अपने प्राण त्याग दोगे।
श्लोक 57 (skanda.7.467.57)
इत्युक्त्वा पञ्चविंशत्या ताडयामास केशवम्। अनन्तं चाष्टभिर्बाणैर्हत्वाऽऽत्रेयं निरीक्ष्य तम्। ईश्वरांशं च तं दृष्ट्वा प्राह याहीति मा चिरम्
ityuktvā pañcaviṁśatyā tāḍayāmāsa keśavam| anantaṁ cāṣṭabhirbāṇairhatvā'ātreyaṁ nirīkṣya tam| īśvarāṁśaṁ ca taṁ dṛṣṭvā prāha yāhīti mā ciram
यह कहकर उसने पच्चीस बाणों से केशव पर प्रहार किया, और आठ बाणों से अनन्त को आहत कर, अत्रेय (दुर्वासा) की ओर देखा। उन्हें ईश्वर का अंश जानकर उसने कहा — 'शीघ्र चले जाओ, देर मत करो।'
श्लोक 58 (skanda.7.467.58)
स बाणैर्भिन्नसर्वांगः शार्ङ्गं हि धनुषां वरम्। विकृष्य घातयामास चतुर्भिश्चतुरो हयान्
sa bāṇairbhinnasarvāṁgaḥ śārṅgaṁ hi dhanuṣāṁ varam| vikṛṣya ghātayāmāsa caturbhiścaturo hayān
बाणों से सर्वांग बिंधे हुए उस कृष्ण ने धनुषों में श्रेष्ठ शार्ंग धनुष खींचकर चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 59 (skanda.7.467.59)
सारथेस्तु शिरः कायादर्द्धचंद्रेण पत्त्रिणा। चिच्छेद धनुरेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे
sārathestu śiraḥ kāyādarddhacaṁdreṇa pattriṇā| ciccheda dhanurekena dhvajamekena cicchide
अर्धचन्द्राकार बाण से उन्होंने सारथी का सिर धड़ से काट दिया, एक बाण से उसका धनुष तथा एक ही बाण से उसकी ध्वजा काट दी।
श्लोक 60 (skanda.7.467.60)
स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः। प्रगृह्य च महाखङ्गमुवाच वचनं तदा
sa cchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ| pragṛhya ca mahākhaṅgamuvāca vacanaṁ tadā
बिना धनुष, बिना रथ, बिना घोड़ों और बिना सारथी के वह विशाल खड्ग उठाकर तब यह वचन बोला —
श्लोक 61 (skanda.7.467.61)
यदि त्वां पातयिष्यामि कीर्तिर्मे ह्यतुला भवेत्। पातितोऽहं त्वया वीर यास्यामि परमां गतिम्
yadi tvāṁ pātayiṣyāmi kīrtirme hyatulā bhavet| pātito'haṁ tvayā vīra yāsyāmi paramāṁ gatim
यदि मैं तुम्हें गिरा दूँगा, तो मेरी अतुल कीर्ति होगी। और यदि तुम मुझे गिरा दोगे, हे वीर, तो मैं परम गति को प्राप्त करूँगा।
श्लोक 62 (skanda.7.467.62)
तिष्ठ तिष्ठ हरे स्थाने शरणं मे सदाशिवः। धावन्तमतिसंक्रुद्धं खङ्गहस्तं निरीक्ष्य तम्। चक्रेण शितधारेण शिरश्चिच्छेद लीलया
tiṣṭha tiṣṭha hare sthāne śaraṇaṁ me sadāśivaḥ| dhāvantamatisaṁkruddhaṁ khaṅgahastaṁ nirīkṣya tam| cakreṇa śitadhāreṇa śiraścicheda līlayā
'ठहर, ठहर, हे हरि, अपने स्थान पर! सदाशिव ही मेरी शरण हैं।' अत्यंत क्रोधित होकर खड्गधारी उसे दौड़ते हुए देखकर, उन्होंने तीक्ष्णधार चक्र से सहज ही उसका सिर काट दिया।
श्लोक 63 (skanda.7.467.63)
तं छिन्नशिरसं भूमौ पतितं वीक्ष्य दानवम्। अथोवाह रथेनाजौ दैत्यः खञ्जनकस्तथा
taṁ chinnaśirasaṁ bhūmau patitaṁ vīkṣya dānavam| athovāha rathenājau daityaḥ khañjanakastathā
उस सिरकटे दानव को भूमि पर गिरा देखकर, खंजनक नामक दैत्य रथ पर सवार होकर युद्धभूमि में आया।
श्लोक 64 (skanda.7.467.64)
अपयाते कुशे दैत्ये विष्णुः संकर्षणस्तदा। दुर्वाससा च सहितः संन्यवर्तत हर्षितः
apayāte kuśe daitye viṣṇuḥ saṁkarṣaṇastadā| durvāsasā ca sahitaḥ saṁnyavartata harṣitaḥ
जब दैत्य कुश (युद्ध छोड़कर) चला गया, तब विष्णु और संकर्षण दुर्वासा के साथ प्रसन्न होकर लौट आए।
श्लोक 65 (skanda.7.467.65)
शिवालये तु पतितं कुशं निक्षिप्य दानवः। स्नानगन्धार्चनैर्धूपैर्गीतवाद्यैरतोषयत्
śivālaye tu patitaṁ kuśaṁ nikṣipya dānavaḥ| snānagaṁdhārcanairdhūpairgītavādyairatoṣayat
उस दानव सेवक ने गिरे हुए कुश को शिवालय में रखकर, स्नान, गन्ध, पूजन, धूप और गीत-वाद्य से शिव को संतुष्ट किया।
श्लोक 66 (skanda.7.467.66)
अवाप जीवितं सद्यः प्रसादाच्छंकरस्य च। उत्थितः स तदा दैत्यो ब्रुवञ्छिवशिवेति च
avāpa jīvitaṁ sadyaḥ prasādācchaṁkarasya ca| utthitaḥ sa tadā daityo bruvañchivaśiveti ca
शंकर की कृपा से वह तुरन्त जीवित हो उठा। वह दैत्य तब उठकर 'शिव शिव' कहता हुआ बोला —
श्लोक 67 (skanda.7.467.67)
तं पुनर्जीवितं दृष्ट्वा दैत्यं दैत्यगणस्तदा। उवाच सुमना वाक्यं वर्धस्व सुचिरं विभो
taṁ punarjīvitaṁ dṛṣṭvā daityaṁ daityagaṇastadā| uvāca sumanā vākyaṁ vardhasva suciraṁ vibho
उस दैत्य को पुनः जीवित देखकर दैत्यगण ने सुमना से यह वचन कहा — 'हे विभो! चिरकाल तक जीवित रहो।'
श्लोक 68 (skanda.7.467.68)
स्नापयित्वा यदि पुनर्ब्राह्मणं विनिवर्त्तते। यथेष्टं गच्छतु तदा किं वृथा विग्रहेण ते
snāpayitvā yadi punarbrāhmaṇaṁ vinivarttate| yatheṣṭaṁ gacchatu tadā kiṁ vṛthā vigraheṇa te
यदि वह ब्राह्मण को स्नान कराकर फिर लौट जाए, तो उसे इच्छानुसार जाने दो — तुम्हारे व्यर्थ युद्ध से क्या लाभ?
श्लोक 69 (skanda.7.467.69)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कुशो वचनमब्रवीत्। गच्छ प्रेषय तौ शीघ्रं विप्रत्राणकरावुभौ
tasya tadvacanaṁ śrutvā kuśo vacanamabravīt| gaccha preṣaya tau śīghraṁ vipratrāṇakarāvubhau
यह वचन सुनकर कुश ने कहा — 'जाओ, उन दोनों ब्राह्मण-रक्षकों को शीघ्र भेज दो कि वे चले जाएँ।'
श्लोक 70 (skanda.7.467.70)
स च राज्ञा समादिष्टः सुमना मुनिसत्तमाः। उवाच विष्णुमानम्य नमस्कृत्य हलायुधम्
sa ca rājñā samādiṣṭaḥ sumanā munisattamāḥ| uvāca viṣṇumānamya namaskṛtya halāyudham
हे मुनिसत्तमो! राजा द्वारा आदेश पाकर सुमना ने विष्णु को प्रणाम कर तथा हलायुध को नमस्कार कर कहा —
श्लोक 71 (skanda.7.467.71)
कुशेन प्रेषितश्चास्मि समीपे ते जनार्दन। किं तवापकृतं नाथ येन दैत्याञ्जिघांससि
kuśena preṣitaścāsmi samīpe te janārdana| kiṁ tavāpakṛtaṁ nātha yena daityāñjighāṁsasi
हे जनार्दन! कुश द्वारा भेजा गया मैं आपके निकट आया हूँ। हे नाथ! आपका ऐसा क्या अपराध किया गया, जिससे आप दैत्यों को मारना चाहते हैं?
श्लोक 72 (skanda.7.467.72)
दुर्वाससं स्नापयित्वा गच्छ मुक्तोऽसि मानद। अमरत्वं महादेवात्प्राप्तं विद्धि कुशेन हि
durvāsasaṁ snāpayitvā gaccha mukto'si mānada| amaratvaṁ mahādevātprāptaṁ viddhi kuśena hi
दुर्वासा को स्नान करा कर आप जा सकते हैं, हे मानद, आप मुक्त हैं। जान लीजिए कि कुश ने महादेव से अमरत्व प्राप्त किया है।
श्लोक 73 (skanda.7.467.73)
श्रीविष्णुरुवाच। मुक्तितीर्थमिदं रुद्धं भवद्भिः पापकर्मभिः। तस्माद्धनिष्ये सर्वांश्च दानवान्नात्र संशयः
śrīviṣṇuruvāca| muktitīrthamidaṁ ruddhaṁ bhavadbhiḥ pāpakarmabhiḥ| tasmāddhaniṣye sarvāṁśca dānavānnātra saṁśayaḥ
श्री विष्णु ने कहा — तुम पापकर्मियों ने इस मुक्तितीर्थ को अवरुद्ध कर दिया है, इसलिए मैं समस्त दानवों का वध करूँगा, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 74 (skanda.7.467.74)
दुर्वाससश्च ये दर्भास्तिलाश्चैवाक्षतैः सह। पुनस्तानानयध्वं हि क्षिप्ता ये वरुणालये
durvāsasaśca ye darbhāstilāścaivākṣataiḥ saha| punastānānayadhvaṁ hi kṣiptā ye varuṇālaye
दुर्वासा के जो कुश, तिल तथा अक्षत तुमने वरुणालय में फेंक दिए थे, उन्हें फिर से वापस ले आओ।
श्लोक 75 (skanda.7.467.75)
सवाहनपरीवाराः सजातिकुलबान्धवाः। पुण्यतीर्थमिदं हित्वा प्रविशध्वं धरातले
savāhanaparīvārāḥ sajātikulabāndhavāḥ| puṇyatīrthamidaṁ hitvā praviśadhvaṁ dharātale
अपने वाहनों, परिवारजनों, जाति, कुल और बन्धुजनों सहित इस पवित्र तीर्थ को छोड़कर पृथ्वी के भीतर प्रवेश कर जाओ।
श्लोक 76 (skanda.7.467.76)
सुमनास्तद्वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः। युध्यध्वमिति तं चोक्त्वा नैतदेवं भविष्यति
sumanāstadvacaḥ śrutvā krodhasaṁraktalocanaḥ| yudhyadhvamiti taṁ coktvā naitadevaṁ bhaviṣyati
यह वचन सुनकर सुमना क्रोध से लाल नेत्र किए हुए बोला — 'युद्ध करो!' — और उससे कहा — 'ऐसा नहीं होगा।'
श्लोक 77 (skanda.7.467.77)
कुशाय कथयामास यदुक्तं शार्ङ्गधन्विना। क्रुद्धस्तद्वचनं श्रुत्वा मन्त्रिणा समुदीरितम्
kuśāya kathayāmāsa yaduktaṁ śārṅgadhanvinā| kruddhastadvacanaṁ śrutvā mantriṇā samudīritam
उसने कुश को शार्ंगधारी द्वारा कहे गए वचन को सुनाया। मंत्री द्वारा कहे गए उस वचन को सुनकर वह क्रोधित हुआ।
श्लोक 78 (skanda.7.467.78)
रथमारुह्य वेगेन ययौ योद्धुमरिन्दमः। संस्मृत्य मनसा देवं पिनाकिं वृषभध्वजम्
rathamāruhya vegena yayau yoddhumarindamaḥ| saṁsmṛtya manasā devaṁ pinākiṁ vṛṣabhadhvajam
रथ पर चढ़कर वह शत्रुदमनकारी वेग से युद्ध करने चला, मन में पिनाकधारी वृषभध्वज देव का स्मरण करते हुए।
श्लोक 79 (skanda.7.467.79)
ततः प्रववृते युद्धं सुमहल्लोमहर्षणम्। अन्येषां दानवानां च केशवस्य कुशस्य च
tataḥ pravavṛte yuddhaṁ sumahallomaharṣaṇam| anyeṣāṁ dānavānāṁ ca keśavasya kuśasya ca
तब अन्य दानवों तथा केशव और कुश के बीच एक अत्यंत भीषण, रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 80 (skanda.7.467.80)
यज्ञघ्नो गदया गुर्व्या संकर्षणमताडयत्। संकर्षणहतः शीर्ष्णि मुसलेन पपात ह
yajñaghno gadayā gurvyā saṁkarṣaṇamatāḍayat| saṁkarṣaṇahataḥ śīrṣṇi musalena papāta ha
यज्ञघ्न ने भारी गदा से संकर्षण पर प्रहार किया। संकर्षण द्वारा मुशल से सिर पर मारा गया वह गिर पड़ा।
श्लोक 81 (skanda.7.467.81)
कञ्चुकं च जघानाशु चक्रेण भगवान्हरिः। उल्मुकश्चाथ निहतो ब्रह्मघ्नश्च निपातितः
kañcukaṁ ca jaghānāśu cakreṇa bhagavānhariḥ| ulmukaścātha nihato brahmaghnaśca nipātitaḥ
भगवान् हरि ने चक्र से तुरन्त कंचुक का वध किया; उल्मुक भी मारा गया और ब्रह्मघ्न भी गिरा दिया गया।
श्लोक 82 (skanda.7.467.82)
एते चान्ये च बहवो घातिताः केशवेन हि। दानवान्पतितान्दृष्ट्वा कुशः परमकोपितः
ete cānye ca bahavo ghātitāḥ keśavena hi| dānavānpatitāndṛṣṭvā kuśaḥ paramakopitaḥ
ये और अन्य अनेक दानव केशव द्वारा मारे गए। अपने दानवों को गिरा हुआ देखकर कुश अत्यंत क्रोधित हो गया।
श्लोक 83 (skanda.7.467.83)
जघान युधि संरब्धः परमास्त्रेण केशवम्। भगवान्क्रोधसंयुक्तश्चक्रेण चाहरच्छिरः
jaghāna yudhi saṁrabdhaḥ paramāstreṇa keśavam| bhagavānkrodhasaṁyuktaścakreṇa cāharacchiraḥ
उग्र होकर उसने युद्ध में परम अस्त्र से केशव पर प्रहार किया। क्रोधयुक्त भगवान् ने चक्र से उसका सिर काट डाला।
श्लोक 84 (skanda.7.467.84)
तं छिन्नशिरसं भूमौ पातितं वीक्ष्य केशवः। चिच्छेद बाहू पादौ च खङ्गेन तिलशस्तथा
taṁ chinnaśirasaṁ bhūmau pātitaṁ vīkṣya keśavaḥ| ciccheda bāhū pādau ca khaṅgena tilaśastathā
उस सिरकटे और भूमि पर गिरे हुए कुश को देखकर, केशव ने खड्ग से उसकी दोनों भुजाओं और दोनों पैरों को भी तिल-तिल करके काट डाला।
श्लोक 85 (skanda.7.467.85)
खण्डशो घातितं दृष्ट्वा केशवेन कुशं तदा। संगृह्य ते पुनर्दैत्या निन्युः सर्वे शिवालयम्
khaṇḍaśo ghātitaṁ dṛṣṭvā keśavena kuśaṁ tadā| saṁgṛhya te punardaityā ninyuḥ sarve śivālayam
कुश को इस प्रकार केशव द्वारा टुकड़े-टुकड़े किया देखकर, वे दैत्य फिर से उसके शरीर को एकत्र कर शिवालय ले गए।
श्लोक 86 (skanda.7.467.86)
प्रसादाच्छूलिनः सद्यो जीवितं प्राप्य दानवः। उत्थितः सहसा क्रुद्धः क्व विष्णुरिति चाब्रवीत्
prasādācchūlinaḥ sadyo jīvitaṁ prāpya dānavaḥ| utthitaḥ sahasā kruddhaḥ kva viṣṇuriti cābravīt
त्रिशूलधारी शिव की कृपा से वह दानव तुरन्त जीवित हो उठा; अचानक उठकर क्रोधित होकर बोला — 'विष्णु कहाँ है?'
श्लोक 87 (skanda.7.467.87)
गदामुद्यम्य संक्रुद्धो योद्धुमागाज्जनार्द्दनम्। तमुद्यतगदं दृष्ट्वा निहतं जीवितं पुनः
gadāmudyamya saṁkruddho yoddhumāgājjanārddanam| tamudyatagadaṁ dṛṣṭvā nihataṁ jīvitaṁ punaḥ
गदा उठाकर वह क्रोधित होकर जनार्दन से युद्ध करने आया। गदा उठाए हुए, पूर्व में मारे जाकर पुनः जीवित हुए उस दैत्य को देखकर,
श्लोक 88 (skanda.7.467.88)
दुर्वाससमथोवाच किमिदं न म्रियेत यत्। मयाऽसकृच्छिरश्छिन्नं खण्डशस्तिलशः कृतम्
durvāsasamathovāca kimidaṁ na mriyeta yat| mayā'sakṛcchiraśchinnaṁ khaṇḍaśastilaśaḥ kṛtam
विष्णु ने दुर्वासा से कहा — 'यह क्या है कि यह मरता ही नहीं? मैंने तो बार-बार इसका सिर काटा, इसे टुकड़े-टुकड़े और तिल-तिल करके काट डाला।'
श्लोक 89 (skanda.7.467.89)
जीवत्ययं पुनः कस्मात्कारणं कथयस्व नः। इत्युक्तश्चिन्तयामास ध्यानेन ऋषिसत्तमः
jīvatyayaṁ punaḥ kasmātkāraṇaṁ kathayasva naḥ| ityuktaścintayāmāsa dhyānena ṛṣisattamaḥ
'यह फिर भी जीवित क्यों है? हमें इसका कारण बताओ।' ऐसा कहे जाने पर उस श्रेष्ठ ऋषि ने ध्यान से विचार किया।
श्लोक 90 (skanda.7.467.90)
ज्ञात्वा तत्कारणं सर्वमुवाच मधुसूदनम्। महादेवेन तुष्टेन कुशोऽयममरः कृतः
jñātvā tatkāraṇaṁ sarvamuvāca madhusūdanam| mahādevena tuṣṭena kuśo'yamamaraḥ kṛtaḥ
समस्त कारण जानकर उन्होंने मधुसूदन से कहा — 'महादेव के प्रसन्न होने पर इस कुश को अमर बना दिया गया है।'
श्लोक 91 (skanda.7.467.91)
खण्डशश्च कृतश्चापि न च प्राणैर्वियुज्यते। ततः स विस्मयाविष्टो हन्तव्योऽयं मया कथम्
khaṇḍaśaśca kṛtaścāpi na ca prāṇairviyujyate| tataḥ sa vismayāviṣṭo hantavyo'yaṁ mayā katham
'टुकड़े-टुकड़े किए जाने पर भी वह प्राणों से वियुक्त नहीं होता।' यह सुनकर वे विस्मित हो गए — 'इसे मैं कैसे मारूँ?'
श्लोक 92 (skanda.7.467.92)
उपायं च करिष्यामि येनायं न भवेदिति। ततः स जीवितं प्राप्य प्रसादाच्छंकरस्य च। चर्मखङ्गमथादाय तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्
upāyaṁ ca kariṣyāmi yenāyaṁ na bhavediti| tataḥ sa jīvitaṁ prāpya prasādācchaṁkarasya ca| carmakhaṅgamathādāya tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
'मैं ऐसा उपाय करूँगा कि यह फिर न रहे।' इसी बीच वह दैत्य शंकर की कृपा से जीवन पाकर, ढाल और खड्ग उठाकर बोला — 'ठहर, ठहर!'
श्लोक 93 (skanda.7.467.93)
तमायान्तं ततो दृष्ट्वा कुशं शिवपरिग्रहम्। जघान गदया गुर्व्या गदाहस्तं तदा कुशम्
tamāyāntaṁ tato dṛṣṭvā kuśaṁ śivaparigraham| jaghāna gadayā gurvyā gadāhastaṁ tadā kuśam
शिव के अनुग्रह से युक्त उस आते हुए कुश को देखकर, उन्होंने भारी गदा से उस गदाधारी कुश पर प्रहार किया।
श्लोक 94 (skanda.7.467.94)
स भिन्नमूर्धा न्यपतत्केशवेनाभिताडितः। भूमौ निपतितं वेगात्परिगृह्य कुशं हरिः
sa bhinnamūrdhā nyapatatkeśavenābhitāḍitaḥ| bhūmau nipatitaṁ vegātparigṛhya kuśaṁ hariḥ
केशव द्वारा आहत होकर वह सिर फूटकर गिर पड़ा। भूमि पर वेग से गिरे हुए कुश को हरि ने पकड़ लिया।
श्लोक 95 (skanda.7.467.95)
गर्ते निक्षिप्य तद्देहं पूरयामास वै पुनः। लिङ्गं संस्थापयामास तस्योपरि जनार्द्दनः
garte nikṣipya taddehaṁ pūrayāmāsa vai punaḥ| liṅgaṁ saṁsthāpayāmāsa tasyopari janārddanaḥ
उसके शरीर को एक गड्ढे में डालकर उसे फिर से भर दिया, और जनार्दन ने उसके ऊपर शिवलिंग की स्थापना कर दी।
श्लोक 96 (skanda.7.467.96)
स लब्धसंज्ञो दनुजः शिवलिङ्गमपश्यत। आत्मोपरिस्थितं तच्च तदा चिन्तापरोऽभवत्
sa labdhasaṁjño danujaḥ śivaliṅgamapaśyata| ātmoparisthitaṁ tacca tadā ciṁtāparo'bhavat
चेतना पाकर उस दानव ने अपने ऊपर स्थापित शिवलिंग को देखा, और तब वह चिन्तामग्न हो गया।