प्रभास खण्ड · अध्याय 468
गोमती-तीरस्थ क्षेत्र में भगवत्पूजा माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.468.1)
श्रीप्रह्लाद उवाच। शिवलिङ्गमलंघ्यं हि बुद्धिपूर्वं हतो ह्यहम्। उवाच कृष्णं दनुजश्छलितोऽहं त्वयाऽनघ
śrīprahlāda uvāca| śivaliṅgamalaṅghyaṁ hi buddhipūrvaṁ hato hyaham| uvāca kṛṣṇaṁ danujaśchalito'haṁ tvayā'nagha
श्री प्रह्लाद जी ने कहा — शिवलिंग तो अलंघ्य ही है, अतः मुझे जानबूझकर बुद्धिपूर्वक मारा गया है। वह दनुज कृष्ण से बोला — हे अनघ! तुमने मुझे छल से जीता है।
श्लोक 2 (skanda.7.468.2)
श्रीविष्णुरुवाच। परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य शौर्येण शिवसंश्रयात्। वरं वरय भद्रं ते यदिच्छसि महामते
śrīviṣṇuruvāca| parituṣṭo'smi te daitya śauryeṇa śivasaṁśrayāt| varaṁ varaya bhadraṁ te yadicchasi mahāmate
श्री विष्णु ने कहा — हे दैत्य! तुम्हारे शौर्य से तथा शिव की शरण लेने से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। हे महामते! तुम्हारा कल्याण हो; जो चाहते हो, वर माँग लो।
श्लोक 3 (skanda.7.468.3)
कुश उवाच। यथा पूज्यो महादेवो मम त्वं च तथा हरे। एक एव द्विधामूर्तिस्तस्मात्त्वां वरयाम्यहम्
kuśa uvāca| yathā pūjyo mahādevo mama tvaṁ ca tathā hare| eka eva dvidhāmūrtistasmāttvāṁ varayāmyaham
कुश ने कहा — जैसे महादेव मेरे लिए पूज्य हैं, वैसे ही तुम भी हो, हे हरि! तुम दोनों एक ही मूर्ति के दो रूप हो, इसलिए मैं तुम्हीं को वर के रूप में माँगता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.7.468.4)
शिवलिंगं त्वया नाथ स्थापितं यन्ममोपरि। मम नाम्ना भवतु च कुशेश्वर इति स्मृतम्
śivaliṅgaṁ tvayā nātha sthāpitaṁ yanmamopari| mama nāmnā bhavatu ca kuśeśvara iti smṛtam
हे नाथ! जो शिवलिंग तुमने मेरे ऊपर स्थापित किया है, वह मेरे नाम से 'कुशेश्वर' के नाम से विख्यात हो।
श्लोक 5 (skanda.7.468.5)
अनुग्राह्यो यद्यहं ते मम कीर्तिर्भवत्वियम्। एवं भविष्यतीत्युक्तस्तत्रैवावस्थितोऽसुरः
anugrāhyo yadyahaṁ te mama kīrtirbhavatviyam| evaṁ bhaviṣyatītyuktastatraivāvasthito'suraḥ
यदि मैं तुम्हारी कृपा का पात्र हूँ, तो मेरी यह कीर्ति स्थापित हो। 'ऐसा ही होगा' — यह कहे जाने पर वह असुर वहीं स्थित हो गया।
श्लोक 6 (skanda.7.468.6)
ततोऽन्यदानवान्सर्वान्प्रेषयामास माधवः। रसातलगताः केचित्केचिद्विष्णुं समागताः
tato'nyadānavānsarvānpreṣayāmāsa mādhavaḥ| rasātalagatāḥ kecitkecidviṣṇuṁ samāgatāḥ
तब माधव ने अन्य समस्त दानवों को भेज दिया। उनमें से कुछ रसातल में चले गए और कुछ विष्णु की शरण में आ गए।
श्लोक 7 (skanda.7.468.7)
अनंतः संस्थितस्तत्र विष्णुश्च तदनंतरम्। ज्ञात्वा विमुक्तिदं तीर्थं दुर्वासा मुनिपुंगवः
anaṁtaḥ saṁsthitastatra viṣṇuśca tadanaṁtaram| jñātvā vimuktidaṁ tīrthaṁ durvāsā munipuṁgavaḥ
अनन्त वहीं स्थित हो गए और उसके पश्चात् विष्णु भी। इस तीर्थ को मुक्तिदायक जानकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा भी वहीं ठहर गए।
श्लोक 8 (skanda.7.468.8)
गोमत्यां चक्रतीर्थे च भगवांश्च त्रिविक्रमः। तेन तन्मुक्तिदं मत्वा दुर्वासास्तत्र संस्थितः
gomatyāṁ cakratīrthe ca bhagavāṁśca trivikramaḥ| tena tanmuktidaṁ matvā durvāsāstatra saṁsthitaḥ
गोमती के चक्रतीर्थ में भगवान् त्रिविक्रम भी विराजमान हुए। इसे मुक्तिदायक मानकर दुर्वासा वहीं स्थित हो गए।
श्लोक 9 (skanda.7.468.9)
एवं त्रिविक्रमः स्वामी तदाप्रभृति संस्थितः। कलौ पुनः कलान्यासात्कृष्णत्वमगमत्प्रभुः
evaṁ trivikramaḥ svāmī tadāprabhṛti saṁsthitaḥ| kalau punaḥ kalānyāsātkṛṣṇatvamagamatprabhuḥ
इस प्रकार स्वामी त्रिविक्रम तभी से वहाँ स्थित हैं। कलियुग में पुनः कलाओं के न्यास से प्रभु ने कृष्णत्व को प्राप्त किया।
श्लोक 10 (skanda.7.468.10)
प्रह्लाद उवाच। पूजाविधिं हरेर्विप्राः शृणुध्वं सुसमाहिताः। विशेषात्फलदः प्रोक्तः पूजितो मधुमाधवे
prahlāda uvāca| pūjāvidhiṁ harerviprāḥ śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ| viśeṣātphaladaḥ proktaḥ pūjito madhumādhave
प्रह्लाद जी ने कहा — हे विप्रो! एकाग्रचित्त होकर हरि की पूजाविधि सुनिए। मधुमाधव में पूजित होने पर वे विशेष रूप से फलदायी कहे गए हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.468.11)
मधुसूदनीं नरो यस्तु द्वारवत्यां करोति च। पूजयेत्कृष्णदेवं च स्नापयित्वा विलिप्य च
madhusūdanīṁ naro yastu dvāravatyāṁ karoti ca| pūjayetkṛṣṇadevaṁ ca snāpayitvā vilipya ca
जो मनुष्य द्वारावती में मधुसूदनी (पूजा) करता है, उसे स्नान कराकर और अनुलेपन कर कृष्णदेव का पूजन करना चाहिए,
श्लोक 12 (skanda.7.468.12)
गन्धैश्च वाससाऽऽच्छाद्य धूपैर्दीपैरनेकधा। नैवेद्यैर्भूषणैश्चैव तांबूलेन फलेन च
gaṁdhaiśca vāsasā'ācchādya dhūpairdīpairanekadhā| naivedyairbhūṣaṇaiścaiva tāṁbūlena phalena ca
गन्ध से, वस्त्र से आच्छादित कर, अनेक प्रकार के धूप-दीप से, नैवेद्य, आभूषण, ताम्बूल तथा फल से,
श्लोक 13 (skanda.7.468.13)
आरार्तिकेन संपूज्य दण्डवत्प्रणिपत्य च। घृतेन दीपकं दत्त्वा रात्रौ जागरणं तथा। कुर्य्याच्च गीतवादित्रैस्तथा पुस्तकवाचकैः
āratrikena saṁpūjya daṇḍavatpraṇipatya ca| ghṛtena dīpakaṁ dattvā rātrau jāgaraṇaṁ tathā| kuryācca gītavāditraistathā pustakavācakaiḥ
आरती से पूजन कर, दण्डवत् प्रणाम कर, घृत का दीपक जलाकर, रात्रि में गीत-वाद्य तथा पुस्तक-पाठकों के साथ जागरण भी करे।
श्लोक 14 (skanda.7.468.14)
कृत्वा चैवं विधिं भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात्
kṛtvā caivaṁ vidhiṁ bhaktyā sarvānkāmānavāpnuyāt
इस विधि को भक्तिपूर्वक करने से मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 15 (skanda.7.468.15)
तथा नभसि सम्पूज्य पवित्रारोपणेन च। पितॄणां चाक्षया तृप्तिः सफलाः स्युर्मनोरथाः
tathā nabhasi sampūjya pavitrāropaṇena ca| pitṝṇāṁ cākṣayā tṛptiḥ saphalāḥ syurmanorathāḥ
इसी प्रकार भाद्रपद मास में पवित्रारोहण के साथ पूजा करने से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है और मनोरथ सफल होते हैं।
श्लोक 16 (skanda.7.468.16)
प्रबोधवासरे प्राप्ते कार्तिके द्विज सत्तमाः। संपूज्य कृष्णं देवेशं परां गतिमवाप्नुयात्
prabodhavāsare prāpte kārtike dvija sattamāḥ| saṁpūjya kṛṣṇaṁ deveśaṁ parāṁ gatimavāpnuyāt
हे द्विजसत्तमो! कार्तिक मास में प्रबोधिनी एकादशी के दिन देवेश्वर कृष्ण का पूजन कर मनुष्य परम गति को प्राप्त करता है।
श्लोक 17 (skanda.7.468.17)
तथा नभस्ये संपूज्य पवित्रारोपणेन च। सर्वान्कामानवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति
tathā nabhasye saṁpūjya pavitrāropaṇena ca| sarvānkāmānavāpnoti viṣṇulokaṁ ca gacchati
इसी प्रकार श्रावण मास में पवित्रारोहण के साथ पूजा करने से मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 18 (skanda.7.468.18)
युगादिषु च संपूज्य ह्ययने दक्षिणोत्तरे। आषाढज्येष्ठमाघेषु पौषादिद्वादशीषु च
yugādiṣu ca saṁpūjya hyayane dakṣiṇottare| āṣāḍhajyeṣṭhamāgheṣu pauṣādidvādaśīṣu ca
युगादि तिथियों में, दक्षिणायन और उत्तरायण के आरम्भ में, तथा आषाढ़, ज्येष्ठ, माघ एवं पौष आदि की द्वादशियों में पूजा करने से,
श्लोक 19 (skanda.7.468.19)
कलौ कृष्णं पूजयित्वा गोमत्युदधिसंगमे। विमलं लोकमाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति
kalau kṛṣṇaṁ pūjayitvā gomatyudadhisaṁgame| vimalaṁ lokamāpnoti yatra gatvā na śocati
कलियुग में गोमती-सागर संगम में कृष्ण का पूजन कर मनुष्य निर्मल लोक को प्राप्त करता है, जहाँ जाकर वह शोक नहीं करता।