प्रभास खण्ड · अध्याय 469
रुक्मिणी पूजन माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.469.1)
श्रीप्रह्लाद उवाच। शृणुध्वं द्विजशार्दूला यथावत्कथयामि वः। स्नापयित्वा जगन्नाथं तथा गंधैर्विलिप्य च। पूजयित्वा तुलस्या तु भूषयित्वा च भूषणैः
śrīprahlāda uvāca| śṛṇudhvaṁ dvijaśārdūlā yathāvatkathayāmi vaḥ| snāpayitvā jagannāthaṁ tathā gaṁdhairvilipya ca| pūjayitvā tulasyā tu bhūṣayitvā ca bhūṣaṇaiḥ
श्री प्रह्लाद जी ने कहा — हे द्विजशार्दूलो! सुनिए, मैं आपको यथावत् बताता हूँ। जगन्नाथ को स्नान कराकर तथा गन्ध का लेपन कर, तुलसी से पूजन कर तथा आभूषणों से विभूषित कर,
श्लोक 2 (skanda.7.469.2)
नैवेद्येन च सन्तर्प्य तथा नीराजनादिभिः। दुर्वाससं तथा पूज्य पुंडरीकाक्षमेव च
naivedyena ca saṁtarpya tathā nīrājanādibhiḥ| durvāsasaṁ tathā pūjya puṁḍarīkākṣameva ca
नैवेद्य से तृप्त कर तथा आरती आदि से पूजन कर, दुर्वासा तथा पुण्डरीकाक्ष का भी पूजन करे,
श्लोक 3 (skanda.7.469.3)
अनन्तं वैनतेयादीन्भक्त्या सम्पूज्य मानवः। दद्याद्दानं स्वशक्त्या च वित्तशाठ्यविवर्जितः
anantaṁ vainateyādīnbhaktyā sampūjya mānavaḥ| dadyāddānaṁ svaśaktyā ca vittaśāṭhyavivarjitaḥ
अनन्त, गरुड़ आदि का भक्तिपूर्वक पूजन कर मनुष्य धन के प्रति कपट त्यागकर अपनी शक्ति के अनुसार दान दे,
श्लोक 4 (skanda.7.469.4)
दीनान्धकृपणांस्तत्र तर्पयेच्च समाश्रितान्
dīnāndhakṛpaṇāṁstatra tarpayecca samāśritān
तथा वहाँ दीन, अंधे, दरिद्र तथा शरणागत जनों को तृप्त करे।
श्लोक 5 (skanda.7.469.5)
रुक्मिणीं च ततो गच्छेद्विदर्भतनयां नरः। उपहृत्योपहारांश्च बलिभिर्गंधदीपकैः
rukmiṇīṁ ca tato gacchedvidarbhatanayāṁ naraḥ| upahṛtyopahārāṁśca balibhirgaṁdhadīpakaiḥ
तत्पश्चात् मनुष्य विदर्भ-पुत्री रुक्मिणी के पास जाए, बलि, गन्ध, दीपक आदि उपहार अर्पित कर।
श्लोक 6 (skanda.7.469.6)
पीडयन्ति ग्रहास्तावद्व्याधयोऽभिभवन्ति च। भक्त्या न पश्यति नरो यावत्कृष्णप्रियां कलौ
pīḍayanti grahāstāvadvyādhayo'bhibhavanti ca| bhaktyā na paśyati naro yāvatkṛṣṇapriyāṁ kalau
जब तक मनुष्य कलियुग में भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया (रुक्मिणी) का दर्शन नहीं करता, तब तक ग्रह उसे पीड़ा देते रहते हैं और रोग उस पर हावी रहते हैं।
श्लोक 7 (skanda.7.469.7)
उपसर्गभयं तावद्दुःखं च भूतसंभवम्। भक्त्या न पश्यति नरो यावत्कृष्णप्रियां कलौ
upasargabhayaṁ tāvadduḥkhaṁ ca bhūtasaṁbhavam| bhaktyā na paśyati naro yāvatkṛṣṇapriyāṁ kalau
जब तक मनुष्य कलियुग में भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया का दर्शन नहीं करता, तब तक उपद्रवों का भय तथा भूत-प्रेत से उत्पन्न दुःख बना रहता है।
श्लोक 8 (skanda.7.469.8)
भवेद्दरिद्री दुःखी च तावद्वै परयाचकः। भक्त्या न पश्यति नरो यावत्कृष्णप्रियां कलौ
bhaveddaridrī duḥkhī ca tāvadvai parayācakaḥ| bhaktyā na paśyati naro yāvatkṛṣṇapriyāṁ kalau
जब तक मनुष्य कलियुग में भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया का दर्शन नहीं करता, तब तक वह दरिद्र, दुःखी तथा दूसरों के आगे याचक बना रहता है।
श्लोक 9 (skanda.7.469.9)
तावन्मृतप्रजा नारी दुर्भाग्या दुःखसंयुता। भक्त्या न पश्यति यदा नारी कृष्णप्रियां तथा
tāvanmṛtaprajā nārī durbhāgyā duḥkhasaṁyutā| bhaktyā na paśyati yadā nārī kṛṣṇapriyāṁ tathā
जब तक स्त्री भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया का दर्शन नहीं करती, तब तक उसकी संतान मृत होती रहती है और वह दुर्भाग्यशाली तथा दुःखयुक्त बनी रहती है।
श्लोक 10 (skanda.7.469.10)
तावच्छत्रुभयं पुंसां गृहभंगं च मूर्खता। भक्त्या न पश्यति नरो यावत्कृष्णप्रियां कलौ
tāvacchatrubhayaṁ puṁsāṁ gṛhabhaṁgaṁ ca mūrkhatā| bhaktyā na paśyati naro yāvatkṛṣṇapriyāṁ kalau
जब तक मनुष्य कलियुग में भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया का दर्शन नहीं करता, तब तक पुरुषों को शत्रुभय, गृहभंग तथा मूर्खता बनी रहती है।
श्लोक 11 (skanda.7.469.11)
सम्पूज्य कृष्णं विधिवद्रुक्मिणीं पूजयेत्ततः। स्नापयेद्दधिदुग्धाभ्यां मधुशर्करया तथा
sampūjya kṛṣṇaṁ vidhivadrukmiṇīṁ pūjayettataḥ| snāpayeddadhidugdhābhyāṁ madhuśarkarayā tathā
कृष्ण का विधिवत् पूजन कर, तत्पश्चात् रुक्मिणी का पूजन करे; उन्हें दही, दूध, मधु तथा शर्करा से स्नान कराए,
श्लोक 12 (skanda.7.469.12)
घृतेन विविधैर्गन्धैस्तथैवेक्षुरसेन च। तीर्थोदकेन संस्नाप्य सर्वान्कामानवाप्नुयात्
ghṛtena vividhairgaṁdhaistathaivekṣurasena ca| tīrthodakena saṁsnāpya sarvānkāmānavāpnuyāt
घृत से, विविध सुगंधित द्रव्यों से, तथा गन्ने के रस से भी; तीर्थ के जल से स्नान कराकर मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.7.469.13)
एवं यः स्नापयेद्देवीं रुक्मिणीं कृष्णवल्लभाम्। न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च
evaṁ yaḥ snāpayeddevīṁ rukmiṇīṁ kṛṣṇavallabhām| na tasya durlabhaṁ kiṁciiha loke paratra ca
जो इस प्रकार कृष्णप्रिया देवी रुक्मिणी को स्नान कराता है, इस लोक में तथा परलोक में उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।
श्लोक 14 (skanda.7.469.14)
श्रीखण्डकुंकुमेनैव तथा मृगमदेन च। विलेपयेदपुत्रस्तु स पुत्रं लभते ध्रुवम्
śrīkhaṇḍakuṁkumenaiva tathā mṛgamadena ca| vilepayedaputrastu sa putraṁ labhate dhruvam
चंदन, कुंकुम तथा कस्तूरी से जो पुत्रहीन उनका लेपन करता है, वह निश्चित रूप से पुत्र प्राप्त करता है।
श्लोक 15 (skanda.7.469.15)
सदा स भोगी भवति रूपवाञ्जनपूजितः। पूजयेन्मालतीपुष्पैः शतपत्रैः सुगन्धिभिः
sadā sa bhogī bhavati rūpavāñjanapūjitaḥ| pūjayenmālatīpuṣpaiḥ śatapatraiḥ sugaṁdhibhiḥ
वह सदा भोगी, रूपवान् तथा लोगों द्वारा पूजित होता है। मालती-पुष्पों, सुगन्धित शतपत्रों (कमलों) से पूजन करे,
श्लोक 16 (skanda.7.469.16)
करवीरैर्मल्लिकाभिश्च चम्पकैस्तु विशेषतः। कमलैर्वारिसंभूतैः केतकीभिश्च पाटलैः
karavīrairmallikābhiśca campakaistu viśeṣataḥ| kamalairvārisaṁbhūtaiḥ ketakībhiśca pāṭalaiḥ
कनेर, मल्लिका तथा विशेष रूप से चम्पा के फूलों से, जल में उत्पन्न कमलों से, केतकी तथा पाटल पुष्पों से,
श्लोक 17 (skanda.7.469.17)
धूपेनागुरुणा चैव पूजयेद्गुग्गुलेन च। वस्त्रैः सुकोमलैः शुभ्रैर्नानादेशसमुद्भवैः
dhūpenāguruṇā caiva pūjayedgugguleṇa ca| vastraiḥ sukomalaiḥ śubhrairnānādeśasamudbhavaiḥ
अगर तथा गुग्गुल की धूप से पूजन करे, तथा विभिन्न देशों में उत्पन्न अत्यंत कोमल और शुभ्र वस्त्रों से।
श्लोक 18 (skanda.7.469.18)
भक्त्या संछाद्य वैदर्भीं रुक्मिणीं कृष्णवल्लभाम्। भूषणैर्भूषयेद्देवीं मणिरत्नसमन्वितैः
bhaktyā saṁchādya vaidarbhīṁ rukmiṇīṁ kṛṣṇavallabhām| bhūṣaṇairbhūṣayeddevīṁ maṇiratnasamanvitaiḥ
भक्तिपूर्वक वैदर्भी कृष्णप्रिया रुक्मिणी को वस्त्रों से आच्छादित कर, मणि-रत्नों से युक्त आभूषणों से उस देवी को विभूषित करे।
श्लोक 19 (skanda.7.469.19)
तस्मिन्कुले नासुखः स्यान्नाधर्मो नाधनस्तथा। नापुत्रो न विकर्मस्थः कितवो नीचसेवकः
tasminkule nāsukhaḥ syānnādharmo nādhanastathā| nāputro na vikarmastha kitavo nīcasevakaḥ
उस कुल में न कोई दुःखी होता है, न अधर्मी, न निर्धन; न पुत्रहीन, न पापकर्मरत, न जुआरी, न किसी नीच का सेवक होता है।
श्लोक 20 (skanda.7.469.20)
यैः पूजिता जगन्माता रुक्मिणी मानवैः कलौ। नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्याद्यैर्देवी मे प्रीयतामिति। तांबूलं च सकर्पूरं भावेन विनिवेदयेत्
yaiḥ pūjitā jaganmātā rukmiṇī mānavaiḥ kalau| naivedyairbhakṣyabhojyādyairdevī me prīyatāmiti| tāṁbūlaṁ ca sakarpūraṁ bhāvena vinivedayet
जिन मनुष्यों ने कलियुग में जगन्माता रुक्मिणी को नैवेद्य, भक्ष्य-भोज्य आदि से — 'देवी मुझ पर प्रसन्न हों' यह कहकर — पूजित किया, वे भावपूर्वक कर्पूर-युक्त ताम्बूल निवेदित करें।
श्लोक 21 (skanda.7.469.21)
गृहीत्वा च फलं शुभ्रं ह्यक्षतैश्च समन्वितम्। मन्त्रेणानेन वै विप्रा ह्यर्घ्यं दद्याद्विधानतः
gṛhītvā ca phalaṁ śubhraṁ hyakṣataiśca samanvitam| mantreṇānena vai viprā hyarghyaṁ dadyādvidhānataḥ
श्वेत फल को अक्षत सहित हाथ में लेकर, हे विप्रो! इस मंत्र से विधिपूर्वक अर्घ्य दे —
श्लोक 22 (skanda.7.469.22)
कृष्णप्रिये नमस्तुभ्यं विदर्भाधिपनन्दिनि। सर्वकामप्रदे देवि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते
kṛṣṇapriye namastubhyaṁ vidarbhādhipanaṁdini| sarvakāmaprade devi gṛhāṇārghyaṁ namo'stu te
'हे कृष्णप्रिये! तुम्हें नमस्कार है, हे विदर्भाधिपनन्दिनि! हे सर्वकामप्रदा देवी! यह अर्घ्य ग्रहण करो, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 23 (skanda.7.469.23)
आरार्तिकं ततः कुर्याज्ज्वलन्तं भावनान्वितः। नीराजनं प्रकर्तव्यं कर्पूरेण विशेषतः
āratrikaṁ tataḥ kuryājjvalantaṁ bhāvanānvitaḥ| nīrājanaṁ prakartavyaṁ karpūreṇa viśeṣataḥ
तत्पश्चात् भावपूर्वक जलती हुई आरती करे; विशेष रूप से कर्पूर से नीराजन करना चाहिए।
श्लोक 24 (skanda.7.469.24)
शंखे कृत्वा तु पानीयं भ्रामयेद्भावसंयुतः। भ्रामयित्वा च शिरसा धारणीयं विशुद्धये
śaṅkhe kṛtvā tu pānīyaṁ bhrāmayedbhāvasaṁyutaḥ| bhrāmayitvā ca śirasā dhāraṇīyaṁ viśuddhaye
शंख में जल भरकर भावपूर्वक उसे घुमाए, और घुमाकर उसे शुद्धि के लिए सिर पर धारण करे।
श्लोक 25 (skanda.7.469.25)
दण्डवत्प्रणमेद्भूमौ नमः कृष्णप्रियेति च। विप्रपत्नीश्च विप्रांश्च पूजयेच्छक्तितो द्विजाः
daṇḍavatpraṇamedbhūmau namaḥ kṛṣṇapriyeti ca| viprapatnīśca viprāṁśca pūjayecchaktito dvijāḥ
'कृष्णप्रिये को नमस्कार है' — ऐसा कहते हुए भूमि पर दण्डवत् प्रणाम करे, तथा हे द्विजो! ब्राह्मण-पत्नियों और ब्राह्मणों को यथाशक्ति पूजित करे।
श्लोक 26 (skanda.7.469.26)
ग्रीवासूत्रकसिन्दूरैर्वासोभिः कञ्चुकैस्तथा। सुगन्धकुसुमैरर्च्य कुंकुमेन विलिप्य च
grīvāsūtrakasindūrairvāsobhiḥ kañcukaistathā| sugaṁdhakusumairarcya kuṁkumena vilipya ca
गले के हार, सिन्दूर, वस्त्र तथा चोली से, सुगन्धित पुष्पों से पूजन कर तथा कुंकुम का लेपन कर,
श्लोक 27 (skanda.7.469.27)
कौसुम्भकैः कज्जलेन तांबूलेन च तोषयेत्। भक्ष्यैर्भोज्यैर्मोदकैश्च इक्षुभिर्मधुसर्पिभिः
kausuṁbhakaiḥ kajjalena tāṁbūlena ca toṣayet| bhakṣyairbhojyairmodakaiśca ikṣubhirmadhusarpibhiḥ
कुसुम्भ रंगे वस्त्रों, काजल तथा ताम्बूल से संतुष्ट करे; भक्ष्य, भोज्य, मोदक, गन्ना, मधु तथा घी से भी,
श्लोक 28 (skanda.7.469.28)
प्रीतो भवति देवेशो रुक्मिण्या सह केशवः। विशेषतः फलानीह दातव्यानि द्विजोत्तमाः
prīto bhavati deveśo rukmiṇyā saha keśavaḥ| viśeṣataḥ phalānīha dātavyāni dvijottamāḥ
इससे रुक्मिणी सहित देवेश्वर केशव प्रसन्न होते हैं। हे द्विजोत्तमो! यहाँ विशेष रूप से फल अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 29 (skanda.7.469.29)
उन्मत्तकं ततो देवं द्वारपालं प्रपूजयेत्। स्नापयित्वा सुगन्धेन कुंकुमेन विलिप्य च
unmattakaṁ tato devaṁ dvārapālaṁ prapūjayet| snāpayitvā sugaṁdhena kuṁkumena vilipya ca
तत्पश्चात् द्वारपाल देव उन्मत्तक का पूजन करे, उसे सुगन्धित द्रव्य से स्नान कराकर तथा कुंकुम का लेपन कर,
श्लोक 30 (skanda.7.469.30)
धूपेन धूपयित्वा तु पुष्पाद्यैः संप्रपूजयेत्। नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यैश्च मांसेन सुरया तथा
dhūpena dhūpayitvā tu puṣpādyaiḥ saṁprapūjayet| naivedyairbhakṣyabhojyaiśca māṁsena surayā tathā
धूप से सुवासित कर, पुष्प आदि से पूजन करे, नैवेद्य, भक्ष्य-भोज्य, मांस तथा सुरा से भी,
श्लोक 31 (skanda.7.469.31)
प्रभूतबलिभिश्चैव पिष्टेन विविधेन च। योगिनीनां चतुःषष्टिं तस्मिन्पीठे प्रपूजयेत्
prabhūtabalibhiścaiva piṣṭena vividhena ca| yoginīnāṁ catuḥṣaṣṭiṁ tasminpīṭhe prapūjayet
प्रचुर बलि तथा विविध प्रकार के आटे के पकवानों से भी। उस पीठ में चौंसठ योगिनियों का पूजन करे।
श्लोक 32 (skanda.7.469.32)
अर्चयेद्धरसिद्धिं च क्षेत्रपालं च सर्वशः। विरूपस्वामिनीं तत्र तथा वै सप्तमातरः
arcayeddharasiddhiṁ ca kṣetrapālaṁ ca sarvaśaḥ| virūpasvāminīṁ tatra tathā vai saptamātaraḥ
हरसिद्धि तथा क्षेत्रपाल का सर्वथा पूजन करे, तथा वहाँ विरूपस्वामिनी और सप्तमातृकाओं का भी।
श्लोक 33 (skanda.7.469.33)
अष्टमूर्तीः कृष्णपत्नीः पीठे तस्मिन्प्रपूजयेत्। रुक्मिणीं सत्यभामां च शुभां जाम्बवतीं तथा
aṣṭamūrtīḥ kṛṣṇapatnīḥ pīṭhe tasminprapūjayet| rukmiṇīṁ satyabhāmāṁ ca śubhāṁ jāmbavatīṁ tathā
उस पीठ में कृष्ण की आठ पत्नियों की मूर्तियों का पूजन करे — रुक्मिणी, सत्यभामा, तथा शुभा जाम्बवती,
श्लोक 34 (skanda.7.469.34)
मित्रविन्दां च कालिन्दीं भद्रां नाग्नजितीं तथा। अष्टमीं लक्ष्मणां तत्र पूजयेत्कृष्णवल्लभाः
mitravindāṁ ca kālindīṁ bhadrāṁ nāgnajitīṁ tathā| aṣṭamīṁ lakṣmaṇāṁ tatra pūjayetkṛṣṇavallabhāḥ
मित्रविन्दा, कालिन्दी, भद्रा, नाग्नजिती तथा आठवीं लक्ष्मणा — इन कृष्णप्रियाओं का वहाँ पूजन करे।
श्लोक 35 (skanda.7.469.35)
एताः सम्पूज्य विधिवत्संतर्प्य दधिपायसैः। गीतवादित्रघोषेण दीपैर्जागरणेन च
etāḥ saṁpūjya vidhivatsaṁtarpya dadhipāyasaiḥ| gītavāditraghoṣeṇa dīpairjāgaraṇena ca
इन्हें विधिवत् पूजकर, दही और खीर से तृप्त कर, गीत-वाद्य की ध्वनि, दीप तथा जागरण के साथ —
श्लोक 36 (skanda.7.469.36)
पुत्रपौत्रसमायुक्तो धनधान्यसमन्वितः। सर्वान्कामानवाप्नोति तस्य विष्णुः प्रसीदति
putrapautrasamāyukto dhanadhānyasamanvitaḥ| sarvānkāmānavāpnoti tasya viṣṇuḥ prasīdati
वह पुत्र-पौत्रों से युक्त, धन-धान्य से संपन्न होकर समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है, और उस पर विष्णु प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 37 (skanda.7.469.37)
किं तस्य बहुदानैस्तु किं व्रतैर्नियमैस्तथा। येन दृष्टा जगन्माता रुक्मिणी कृष्णवल्लभा
kiṁ tasya bahudānaistu kiṁ vratairniyamaistathā| yena dṛṣṭā jaganmātā rukmiṇī kṛṣṇavallabhā
जिसने जगन्माता कृष्णप्रिया रुक्मिणी का दर्शन कर लिया, उसे अनेक दानों से क्या लाभ, व्रत और नियमों से भी क्या प्रयोजन?
श्लोक 38 (skanda.7.469.38)
किं यज्ञैर्बहुभिस्तस्य सम्पूर्णवरदक्षिणैः। येन दृष्टा जगन्माता रुक्मिणी कृष्णवल्लभा
kiṁ yajñairbahubhistasya sampūrṇavaradakṣiṇaiḥ| yena dṛṣṭā jaganmātā rukmiṇī kṛṣṇavallabhā
जिसने जगन्माता कृष्णप्रिया रुक्मिणी का दर्शन कर लिया, उसे संपूर्ण उत्तम दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञों से क्या लाभ?
श्लोक 39 (skanda.7.469.39)
तेन दत्तं हुतं तेन जप्तं तेन सनातनम्। येन दृष्टा जगन्माता रुक्मिणी कृष्णवल्लभा
tena dattaṁ hutaṁ tena japtaṁ tena sanātanam| yena dṛṣṭā jaganmātā rukmiṇī kṛṣṇavallabhā
जिसने जगन्माता कृष्णप्रिया रुक्मिणी का दर्शन कर लिया, उसी ने सब दान किया, उसी ने हवन किया, उसी ने सनातन का जप कर लिया।
श्लोक 40 (skanda.7.469.40)
हेलया तेन सम्प्राप्ताः सिद्धयोऽष्टौ न संशयः। गत्वा द्वारवतीं येन दृष्टा केशववल्लभा
helayā tena samprāptāḥ siddhayo'ṣṭau na saṁśayaḥ| gatvā dvāravatīṁ yena dṛṣṭā keśavavallabhā
जिसने द्वारावती में जाकर केशव की प्रिया का दर्शन किया, उसने सहज ही आठों सिद्धियों को प्राप्त कर लिया, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 41 (skanda.7.469.41)
सफलं जीवितं तस्य सफलाश्च मनोरथाः। कलौ कृष्णपुरीं गत्वा दृष्ट्वा माधववल्लभाम्
saphalaṁ jīvitaṁ tasya saphalāśca manorathāḥ| kalau kṛṣṇapurīṁ gatvā dṛṣṭvā mādhavavallabhām
जिसने कलियुग में कृष्णपुरी जाकर माधव की प्रिया का दर्शन किया, उसका जीवन सफल है और उसके सभी मनोरथ सफल हैं।
श्लोक 42 (skanda.7.469.42)
देवराज्येन किं तस्य तथा मुक्तिपदेन च। न दृष्टा चेज्जगन्माता रुक्मिणी कृष्णवल्लभा
devarājyena kiṁ tasya tathā muktipadena ca| na dṛṣṭā cejjaganmātā rukmiṇī kṛṣṇavallabhā
यदि उसने जगन्माता कृष्णप्रिया रुक्मिणी का दर्शन नहीं किया, तो उसे देवराज्य से क्या लाभ, मुक्तिपद से भी क्या प्रयोजन?
श्लोक 43 (skanda.7.469.43)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रुक्मिणी कृष्णवल्लभा। सदार्चनीया मनुजैर्द्रष्टव्या सर्वकामदा
tasmātsarvaprayatnena rukmiṇī kṛṣṇavallabhā| sadārcanīyā manujairdraṣṭavyā sarvakāmadā
अतः रुक्मिणी कृष्णप्रिया का, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, मनुष्यों द्वारा सदैव सर्वप्रयत्नपूर्वक अर्चन तथा दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 44 (skanda.7.469.44)
विशेषतः पूजनीया नवरात्रे सदाश्विने। नवम्यां तु नरैर्यैस्तु पूजिता हरिवल्लभा
viśeṣataḥ pūjanīyā navarātre sadāśvine| navamyāṁ tu narairyaistu pūjitā harivallabhā
आश्विन मास के नवरात्रि में विशेष रूप से पूजनीय हैं। जिन मनुष्यों ने नवमी के दिन हरिप्रिया का पूजन किया,
श्लोक 45 (skanda.7.469.45)
स्नानगन्धादिवस्त्रैस्तु प्रभूतबलिभिस्तथा। गीतवादित्रघोषेण दीपजागरणेन च। तोषिता भीष्मकसुता सर्वान्कामान्प्रयच्छति
snānagaṁdhādivastraistu prabhūtabalibhistathā| gītavāditraghoṣeṇa dīpajāgaraṇena ca| toṣitā bhīṣmakasutā sarvānkāmānprayacchati
स्नान, गन्ध, वस्त्र तथा प्रचुर बलियों से, गीत-वाद्य की ध्वनि, दीप और जागरण से — इस प्रकार संतुष्ट हुई भीष्मक-पुत्री रुक्मिणी उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं।
श्लोक 46 (skanda.7.469.46)
तथा दीपोत्सवदिने चतुर्दश्यां समाहितः। पूजयित्वा यथाशास्त्रमीप्सितं लभते फलम्
tathā dīpotsavadine caturdaśyāṁ samāhitaḥ| pūjayitvā yathāśāstramīpsitaṁ labhate phalam
इसी प्रकार दीपोत्सव के दिन चतुर्दशी को एकाग्रचित्त होकर शास्त्रविधि के अनुसार पूजन करने से मनुष्य अभीष्ट फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 47 (skanda.7.469.47)
माघमासे सिताष्टम्यां कन्दर्पजननी तु यैः। पूजिता गन्धपुष्पाद्यैरुपहारैरनेकशः। सफलं जीवितं तेषां सफलाश्च मनोरथाः
māghamāse sitāṣṭamyāṁ kandarpajananī tu yaiḥ| pūjitā gaṁdhapuṣpādyairupahārairanekaśaḥ| saphalaṁ jīvitaṁ teṣāṁ saphalāśca manorathāḥ
जिन्होंने माघ मास की शुक्ल अष्टमी को कामदेव की जननी रुक्मिणी का गन्ध, पुष्प आदि अनेक उपहारों से पूजन किया, उनका जीवन सफल है और उनके मनोरथ भी सफल हैं।
श्लोक 48 (skanda.7.469.48)
द्वादश्यां चैत्रमासे तु कृष्णेन सह रुक्मिणीम्। ये पश्यन्ति नरा देवीं रुक्मिणीं मधुमाधवे। कृष्णेन सह गच्छन्तीं धन्यास्ते मानवा भुवि
dvādaśyāṁ caitramāse tu kṛṣṇena saha rukmiṇīm| ye paśyaṁti narā devīṁ rukmiṇīṁ madhumādhave| kṛṣṇena saha gacchaṁtīṁ dhanyāste mānavā bhuvi
जो मनुष्य चैत्र मास की द्वादशी को मधुमाधव में कृष्ण के साथ जाती हुई देवी रुक्मिणी का दर्शन करते हैं, वे पृथ्वी पर धन्य हैं।
श्लोक 49 (skanda.7.469.49)
पुत्रपौत्रसमायुक्ता धनधान्यसमन्विताः। जीविते व्याधिनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्
putrapautrasamāyuktā dhanadhānyasamanvitāḥ| jīvite vyādhinirmuktāḥ padaṁ gacchantyanāmayam
वे पुत्र-पौत्रों से युक्त, धन-धान्य से संपन्न, जीवन में रोगों से मुक्त होकर, निरामय पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 50 (skanda.7.469.50)
ज्येष्ठाष्टम्यां नरैर्यैस्तु पूजिता कृष्णवल्लभा। तेषां मनोरथावाप्तिर्जायते नात्र संशयः
jyeṣṭhāṣṭamyāṁ narairyaistu pūjitā kṛṣṇavallabhā| teṣāṁ manorathāvāptirjāyate nātra saṁśayaḥ
जिन मनुष्यों ने ज्येष्ठ मास की अष्टमी को कृष्णप्रिया का पूजन किया, उनके मनोरथ की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 51 (skanda.7.469.51)
तथा भाद्रपदे मासि मातुः पूजा कृता तु यैः। सर्वपापविनिर्मुक्ता यान्ति विष्णुपदे नराः
tathā bhādrapade māsi mātuḥ pūjā kṛtā tu yaiḥ| sarvapāpavinirmuktā yānti viṣṇupade narāḥ
इसी प्रकार जिन्होंने भाद्रपद मास में माता की पूजा की, वे मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुपद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 52 (skanda.7.469.52)
कार्तिके मासि द्वादश्यां रुक्मिणीं कृष्णसंयुताम्। ये पश्यन्ति नरास्तेषां न भयं विद्यते क्वचित्
kārtike māsi dvādaśyāṁ rukmiṇīṁ kṛṣṇasaṁyutām| ye paśyaṁti narāsteṣāṁ na bhayaṁ vidyate kvacit
जो मनुष्य कार्तिक मास की द्वादशी को कृष्ण-सहित रुक्मिणी का दर्शन करते हैं, उन्हें कहीं भी भय नहीं रहता।
श्लोक 53 (skanda.7.469.53)
यस्त्वेकत्र स्थितां पश्येद्रुक्मिणीं कृष्णसंयुताम्। सफलं जीवितं तस्य ह्यक्षया पुत्रसंततिः। अक्षयं धनधान्यं च कदा नैव दरिद्रता
yastvekatra sthitāṁ paśyedrukmiṇīṁ kṛṣṇasaṁyutām| saphalaṁ jīvitaṁ tasya hyakṣayā putrasaṁtatiḥ| akṣayaṁ dhanadhānyaṁ ca kadā naiva daridratā
जो एक ही स्थान पर स्थित कृष्ण-सहित रुक्मिणी का दर्शन करता है, उसका जीवन सफल होता है, उसकी संतान अक्षय होती है, उसका धन-धान्य अक्षय रहता है, और उसे कभी भी दरिद्रता नहीं आती।
श्लोक 54 (skanda.7.469.54)
य एवं रुक्मिणीं पश्येत्पूजयेत्कृष्णवल्लभाम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति
ya evaṁ rukmiṇīṁ paśyetpūjayetkṛṣṇavallabhām| sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa gacchati
जो इस प्रकार कृष्णप्रिया रुक्मिणी का दर्शन और पूजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 55 (skanda.7.469.55)
यः स्नायात्सर्वतीर्थेषु दानं शक्त्या ददाति यः। तस्य पुण्यफलं चैव लोके यज्जायते द्विजाः। कथितं तदशेषेण कलौ कृष्णस्य संस्थितौ
yaḥ snāyātsarvatīrtheṣu dānaṁ śaktyā dadāti yaḥ| tasya puṇyaphalaṁ caiva loke yajjāyate dvijāḥ| kathitaṁ tadaśeṣeṇa kalau kṛṣṇasya saṁsthitau
हे द्विजो! जो सभी तीर्थों में स्नान करता है और अपनी शक्ति के अनुसार दान देता है, उसका जो पुण्यफल इस लोक में उत्पन्न होता है — वह सब कलियुग में कृष्ण की स्थिति (द्वारावती) में पूर्णतः प्राप्त हो जाता है, ऐसा कहा गया है।
श्लोक 56 (skanda.7.469.56)
द्वारावतीं विना विप्रा मुक्तिर्न प्राप्यते कलौ। पुराणसंहितामेतां कृतवान्बलिबन्धनः। ददौ स तु प्रसादेन पूर्वं मह्यं द्विजोत्तमाः
dvārāvatīṁ vinā viprā muktirna prāpyate kalau| purāṇasaṁhitāmetāṁ kṛtavānbalibandhanaḥ| dadau sa tu prasādena pūrvaṁ mahyaṁ dvijottamāḥ
हे विप्रो! कलियुग में द्वारावती के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती। इस पुराणसंहिता की रचना बलि के बन्धनकर्ता (विष्णु) ने की, और हे द्विजोत्तमो! उन्होंने ही पूर्वकाल में कृपापूर्वक इसे मुझे प्रदान किया।
श्लोक 57 (skanda.7.469.57)
इहार्थे च पुरा प्रोक्तमितिहासो द्विजोत्तमाः। प्रद्युम्नेन सुसंवादे मार्कण्डेन महात्मना
ihārthe ca purā proktamitihāso dvijottamāḥ| pradyumnena susaṁvāde mārkaṇḍena mahātmanā
हे द्विजोत्तमो! इस विषय में पूर्वकाल में प्रद्युम्न और महात्मा मार्कण्डेय के सुन्दर संवाद में भी यह इतिहास कहा गया था।