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प्रभास खण्ड · अध्याय 475

द्वादशी जागरण माहात्म्य वर्णन (आगे)

अध्याय 474अध्याय-सूचीअध्याय 476

श्लोक 1 (skanda.7.475.1)

मार्कण्डेय उवाच। कृत्वा जागरणं विष्णोर्यथान्यायं नरेश्वर। पितॄन्यच्छति पुण्यं च ततः किं कुरुते यमः

mārkaṇḍeya uvāca| kṛtvā jāgaraṇaṁ viṣṇoryathānyāyaṁ nareśvara| pitṝnyacchati puṇyaṁ ca tataḥ kiṁ kurute yamaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — हे नरेश्वर! विधिवत् विष्णु का जागरण कर जो पितरों को पुण्य अर्पित करता है, फिर यम उसका क्या करेगा?

श्लोक 2 (skanda.7.475.2)

भुक्तो वा यदि वाऽभुक्तः स्वच्छो वाऽस्वच्छ एव वा। विमुक्तिः कथिता तत्र हरिजागरणान्नृणाम्

bhukto vā yadi vā'bhuktaḥ svaccho vā'svaccha eva vā| vimuktiḥ kathitā tatra harijāgaraṇānnṛṇām

चाहे भोजन किया हो या न किया हो, चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध — हरि के जागरण से मनुष्यों की मुक्ति कही गई है।

श्लोक 3 (skanda.7.475.3)

अस्नातो वा नरः स्नातो जागरे समुपस्थिते। सर्वतीर्थाप्लुतो ज्ञेयस्तं दृष्ट्वा दिवमाव्रजेत्

asnāto vā naraḥ snāto jāgare samupasthite| sarvatīrthāpluto jñeyastaṁ dṛṣṭvā divamāvrajet

जागरण के उपस्थित होने पर मनुष्य चाहे स्नात हो या अस्नात, वह समस्त तीर्थों में स्नात हुआ माना जाना चाहिए; उसे देखकर स्वर्ग को जाना चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.7.475.4)

श्वपचा जागरं कृत्वा पदं निर्वाणमागताः। किं पुनर्वर्णसंभूताः सदाचारपरास्तथा

śvapacā jāgaraṁ kṛtvā padaṁ nirvāṇamāgatāḥ| kiṁ punarvarṇasaṁbhūtāḥ sadācāraparāstathā

चाण्डालों ने भी जागरण कर निर्वाणपद को प्राप्त किया है, फिर सदाचार में निरत वर्णोत्पन्न लोगों की तो बात ही क्या!

श्लोक 5 (skanda.7.475.5)

युवतीनादमाकर्ण्य यथा निद्रा न जायते। जागरे चैवमेव स्यात्तत्कथानां च कीर्तने

yuvatīnādamākarṇya yathā nidrā na jāyate| jāgare caivameva syāttatkathānāṁ ca kīrtane

जैसे युवतियों के स्वर के सुनने से निद्रा नहीं आती, वैसे ही जागरण में तथा उनकी कथाओं के कीर्तन में भी निद्रा नहीं आनी चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.7.475.6)

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः। उत्कल्लनं मनःपापं शोधयेद्विष्णु जागरः

brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaṁganāgamaḥ| utkallanaṁ manaḥpāpaṁ śodhayedviṣṇu jāgaraḥ

ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरुपत्नी-गमन तथा मन में उत्पन्न होने वाला पाप — इन सबको विष्णु का जागरण शुद्ध कर देता है।

श्लोक 7 (skanda.7.475.7)

विमुक्तिः कामुकस्योक्ता किं पुनर्वीक्षतां हरिम्

vimuktiḥ kāmukasyoktā kiṁ punarvīkṣatāṁ harim

काम-वासना से युक्त व्यक्ति की भी मुक्ति कही गई है, फिर जो हरि का दर्शन करते हैं, उनकी तो बात ही क्या!

श्लोक 8 (skanda.7.475.8)

वाचिकं मानसं पापं करणैर्यदुपार्जितम्। अन्यैर्निमिषमात्रेण व्यपोहति न संशयः

vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karaṇairyadupārjitam| anyairnimiṣamātreṇa vyapohati na saṁśayaḥ

वाणी, मन तथा अन्य इन्द्रियों से अर्जित पाप को यह जागरण निमेषमात्र में दूर कर देता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 9 (skanda.7.475.9)

गोष्ठ्यां समागता ये तु तेषां पापं कुतः स्मृतम्। मातृपूजा गयाश्राद्धं सुतीर्थगमनं तथा। जागरस्य नृणां राजन्समानि कवयो विदुः

goṣṭhyāṁ samāgatā ye tu teṣāṁ pāpaṁ kutaḥ smṛtam| mātṛpūjā gayāśrāddhaṁ sutīrthagamanaṁ tathā| jāgarasya nṛṇāṁ rājansamāni kavayo viduḥ

जो सभा में एकत्रित होते हैं, उनका पाप कहाँ माना गया है? हे राजन्! कवियों ने माता की पूजा, गया-श्राद्ध तथा उत्तम तीर्थ-यात्रा को मनुष्यों के जागरण के समान ही जाना है।

श्लोक 10 (skanda.7.475.10)

जननीपूजनं भूप ह्यश्वमेधायुतैः समम्। पूर्णं वर्षशतं भूप कुशाग्रेणोद्धृतं जलम्

jananīpūjanaṁ bhūpa hyaśvamedhāyutaiḥ samam| pūrṇaṁ varṣaśataṁ bhūpa kuśāgreṇoddhṛtaṁ jalam

हे राजन्! माता की पूजा दस हजार अश्वमेध यज्ञों के समान है। हे राजन्! पूरे सौ वर्षों तक कुश के अग्रभाग से उठाया गया जल —

श्लोक 11 (skanda.7.475.11)

पिबन्पात्रे द्विजः सम्यक्तीर्थे पुष्करसंज्ञिते। जागरस्यैव चैतानि कलां नार्हंति षोडशीम्

pibanpātre dvijaḥ samyaktīrthe puṣkarasaṁjñite| jāgarasyaiva caitāni kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

पुष्कर नामक तीर्थ में पात्र में लेकर द्विज द्वारा उत्तम रूप से पिया गया — ये सब जागरण की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 12 (skanda.7.475.12)

कृत्वा कांचनसंपूर्णां वसुधां वसुधाधिप। दत्त्वा यत्फलमाप्नोति तत्फलं हरिजागरे

kṛtvā kāṁcanasaṁpūrṇāṁ vasudhāṁ vasudhādhipa| dattvā yatphalamāpnoti tatphalaṁ harijāgare

हे वसुधाधिप! पृथ्वी को सुवर्णमय बनाकर दान देने से जो फल मिलता है, वही फल हरि के जागरण से मिल जाता है।

श्लोक 13 (skanda.7.475.13)

निकृंतनं कर्मणश्च ह्यात्मना दुष्कृतं कृतम्। व्यपोहति न संदेहो येन जागरणं कृतम्

nikṛṁtanaṁ karmaṇaśca hyātmanā duṣkṛtaṁ kṛtam| vyapohati na saṁdeho yena jāgaraṇaṁ kṛtam

जिसने जागरण किया है, वह अपने द्वारा किए गए पापकर्मों के फल के बंधन को काट डालता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 14 (skanda.7.475.14)

संक्षेपतः प्रवक्ष्यामि पुनरेव महीपते। जागरे पद्मनाभस्य यत्फलं कवयो विदुः

saṁkṣepataḥ pravakṣyāmi punareva mahīpate| jāgare padmanābhasya yatphalaṁ kavayo viduḥ

हे महीपते! मैं पुनः संक्षेप में बताऊँगा, जो फल कवियों ने पद्मनाभ के जागरण का जाना है।

श्लोक 15 (skanda.7.475.15)

रवेर्बिंबमिदं भित्त्वा स योगी हरिजागरे। प्रयाति परमं स्थानं योगिगम्यं निरंजनम्। सांख्ययोगैः सुदुःखेन प्राप्यते यत्पदं हरेः

raverbiṁbamidaṁ bhittvā sa yogī harijāgare| prayāti paramaṁ sthānaṁ yogigamyaṁ niraṁjanam| sāṁkhyayogaiḥ suduḥkhena prāpyate yatpadaṁ hareḥ

हरि के जागरण से वह योगी इस सूर्यमंडल को भेदकर योगियों द्वारा प्राप्त होने वाले उस निरंजन परम स्थान को जाता है, जो पद सांख्य और योग द्वारा अत्यंत कठिनाई से प्राप्त होता है।

श्लोक 16 (skanda.7.475.16)

नद्यो नदा यथा यांति सागरे संस्थितिं क्रमात्। एवं जागरणात्सर्वे तत्पदे यांति संस्थितिम्

nadyo nadā yathā yāṁti sāgare saṁsthitiṁ kramāt| evaṁ jāgaraṇātsarve tatpade yāṁti saṁsthitim

जैसे नदियाँ और नद क्रमशः सागर में जाकर स्थिति पाते हैं, वैसे ही सब जागरण से उस पद में स्थिति को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.475.17)

मेरुमंदरमानानि कृत्वा पापानि वा नरः। हरिजागरणे तानि व्यपोहति न संशयः

merumaṁdaramānāni kṛtvā pāpāni vā naraḥ| harijāgaraṇe tāni vyapohati na saṁśayaḥ

मनुष्य ने चाहे मेरु और मन्दराचल के समान विशाल पाप ही क्यों न किए हों, हरि के जागरण में वे सब दूर हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 18 (skanda.7.475.18)

राज्यं स्वर्गं तथा मोक्षं यच्चान्यदीप्सितं नृणाम्। ददाति भगवान्कृष्णः स्वगीतैर्जागरे स्थितः

rājyaṁ svargaṁ tathā mokṣaṁ yaccānyadīpsitaṁ nṛṇām| dadāti bhagavānkṛṣṇaḥ svagītairjāgare sthitaḥ

जागरण में विराजमान भगवान् कृष्ण अपने गान से मनुष्यों को राज्य, स्वर्ग, मोक्ष तथा अन्य जो भी अभीष्ट हो, वह सब प्रदान करते हैं।

श्लोक 19 (skanda.7.475.19)

जागरेणैव पापानां श्वपचानां महीपते। तत्पदं कविभिः प्रोक्तं किं पुनस्तु द्विजन्मनाम्

jāgareṇaiva pāpānāṁ śvapacānāṁ mahīpate| tatpadaṁ kavibhiḥ proktaṁ kiṁ punastu dvijanmanām

हे महीपते! जागरण मात्र से पापी चाण्डालों को भी वह पद कवियों द्वारा कहा गया है, फिर द्विजों की तो बात ही क्या!

श्लोक 20 (skanda.7.475.20)

जपध्यानविहीनस्य गायकस्यापि भूपते। कर्मभ्रष्टस्य च प्रोक्तो मोक्षस्तु हरिजागरे

japadhyānavihīnasya gāyakasyāpi bhūpate| karmabhraṣṭasya ca prokto mokṣastu harijāgare

हे भूपते! जप-ध्यान से रहित, केवल गायक तथा कर्मभ्रष्ट व्यक्ति के लिए भी हरि के जागरण में मोक्ष कहा गया है।

श्लोक 21 (skanda.7.475.21)

तन्नास्ति त्रिषु लोकेषु पुण्यं पुण्यवतां नृणाम्। यत्तु साधयते भूप जागरे संव्यवस्थितः

tannāsti triṣu lokeṣu puṇyaṁ puṇyavatāṁ nṛṇām| yattu sādhayate bhūpa jāgare saṁvyavasthitaḥ

हे राजन्! तीनों लोकों में पुण्यवान् मनुष्यों का कोई भी पुण्य ऐसा नहीं है, जो जागरण में स्थित व्यक्ति प्राप्त नहीं कर लेता।

श्लोक 22 (skanda.7.475.22)

त्वया पुनरिदं कार्य्यं स्मर्त्तव्यो गरुडध्वजः। एकादश्यां न भोक्तव्यं कर्तव्यं जागरं सदा

tvayā punaridaṁ kāryaṁ smarttavyo garuḍadhvajaḥ| ekādaśyāṁ na bhoktavyaṁ kartavyaṁ jāgaraṁ sadā

तुम्हें यह अवश्य करना चाहिए — गरुड़ध्वज का सदा स्मरण करना चाहिए; एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए, सदा जागरण करना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.7.475.23)

जागरे वर्त्तमानस्य श्वपचस्य गतिर्भवेत्। किंपुनर्वर्णजातीनां वैष्णवानां महीपते

jāgare varttamānasya śvapacasya gatirbhavet| kiṁpunarvarṇajātīnāṁ vaiṣṇavānāṁ mahīpate

हे महीपते! जागरण में स्थित चाण्डाल को भी सद्गति प्राप्त होती है, फिर वर्णाश्रम में जन्मे वैष्णवों की तो बात ही क्या!

श्लोक 24 (skanda.7.475.24)

ये तु जागरणे निद्रां न यांति नृपपुंगव। न तेषां जननी याति खेदं गर्भावधारणात्

ye tu jāgaraṇe nidrāṁ na yāṁti nṛpapuṁgava| na teṣāṁ jananī yāti khedaṁ garbhāvadhāraṇāt

हे नृपपुंगव! जो जागरण में निद्रा को प्राप्त नहीं होते, उनकी जननी गर्भधारण के खेद को प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 25 (skanda.7.475.25)

तस्माज्जागरणं कार्य्यं मातुर्जठरवर्जिभिः। भीतेर्मोक्षपरैर्मर्त्यैः सुखचेष्टाबहिष्कृतैः

tasmājjāgaraṇaṁ kāryaṁ māturjaṭharavarjibhiḥ| bhītermokṣaparairmartyaiḥ sukhaceṣṭābahiṣkṛtaiḥ

अतः माता के गर्भ से मुक्त हुए, भय से मुक्ति चाहने वाले, तथा सुखकर चेष्टाओं से रहित मनुष्यों को जागरण अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.7.475.26)

यस्तु जागरणं रात्रौ कुर्याद्भक्तिसमन्वितः। निमिषेनिमिषे राजन्नश्वमेधफलं लभेत्

yastu jāgaraṇaṁ rātrau kuryādbhaktisamanvitaḥ| nimiṣenimiṣe rājannaśvamedhaphalaṁ labhet

हे राजन्! जो रात्रि में भक्तिपूर्वक जागरण करता है, वह प्रत्येक निमेष में अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (skanda.7.475.27)

शयनोत्थापनाभ्यां च समं पुण्यमुदाहृतम्। विशेषो नास्ति भूपाल विष्णुना कथितं पुरा

śayanotthāpanābhyāṁ ca samaṁ puṇyamudāhṛtam| viśeṣo nāsti bhūpāla viṣṇunā kathitaṁ purā

शयन कराने और जगाने दोनों से समान पुण्य कहा गया है; हे राजन्! इसमें कोई भेद नहीं है — यह पूर्वकाल में विष्णु ने ही कहा था।

श्लोक 28 (skanda.7.475.28)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः स्थिताः शूद्राश्च जागरे। पक्षिणः कृमिकीटाश्च ह्यनेके चैव जंतवः। ते गताः परमं स्थानं योगिगम्यं निरंजनम्

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ sthitāḥ śūdrāśca jāgare| pakṣiṇaḥ kṛmikīṭāśca hyaneke caiva jaṁtavaḥ| te gatāḥ paramaṁ sthānaṁ yogigamyaṁ niraṁjanam

जागरण में स्थित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पक्षी, कीड़े-मकोड़े तथा अनेक अन्य जीव — वे सब योगियों द्वारा प्राप्य निरंजन परम स्थान को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 29 (skanda.7.475.29)

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यासमानि च। कृष्णजागरणे तानि क्षयं यांति न संशयः

yāni kāni ca pāpāni brahmahatyāsamāni ca| kṛṣṇajāgaraṇe tāni kṣayaṁ yāṁti na saṁśayaḥ

ब्रह्महत्या के समान जो भी पाप हों, वे सब कृष्ण के जागरण में क्षीण हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 30 (skanda.7.475.30)

एकतः क्रतवः सर्वे सर्वतीर्थसमन्विताः। एकतो देवदेवस्य जागरः कृष्णवल्लभः। न समं ह्यधिकः प्रोक्तः कविभिः कृष्णजागरः

ekataḥ kratavaḥ sarve sarvatīrthasamanvitāḥ| ekato devadevasya jāgaraḥ kṛṣṇavallabhaḥ| na samaṁ hyadhikaḥ proktaḥ kavibhiḥ kṛṣṇajāgaraḥ

एक ओर समस्त तीर्थों सहित सब यज्ञ हैं, और एक ओर देवाधिदेव का, कृष्ण को प्रिय, जागरण है — कवियों ने कृष्ण-जागरण को समान नहीं, अपितु अधिक ही कहा है।

श्लोक 31 (skanda.7.475.31)

सूर्यशक्रादयो देवा ब्रह्मरुद्रादयो गणाः। नित्यमेव समायांति जागरे कृष्णवल्लभे

sūryaśakrādayo devā brahmarudrādayo gaṇāḥ| nityameva samāyāṁti jāgare kṛṣṇavallabhe

सूर्य, इन्द्र आदि देवता, ब्रह्मा-रुद्र आदि गण — ये सब नित्य ही कृष्ण को प्रिय उस जागरण में एकत्र होते हैं।

श्लोक 32 (skanda.7.475.32)

गंगा सरस्वती रेवा यमुना च शतह्रदा। चंद्रभागा वितस्ता च नद्यः सर्वाश्च तत्र वै

gaṁgā sarasvatī revā yamunā ca śatahradā| caṁdrabhāgā vitastā ca nadyaḥ sarvāśca tatra vai

गंगा, सरस्वती, नर्मदा, यमुना, शतद्रु, चन्द्रभागा, वितस्ता तथा अन्य समस्त नदियाँ वहाँ आती हैं।

श्लोक 33 (skanda.7.475.33)

सरांसि च ह्रदाश्चैव समुद्राः कृत्स्नशो नृप। एकादश्यां नृपश्रेष्ठ गच्छंति हरिजागरे

sarāṁsi ca hradāścaiva samudrāḥ kṛtsnaśo nṛpa| ekādaśyāṁ nṛpaśreṣṭha gacchaṁti harijāgare

हे नृपश्रेष्ठ! एकादशी को सरोवर, झीलें तथा सभी समुद्र पूर्ण रूप से हरि के जागरण में जाते हैं।

श्लोक 34 (skanda.7.475.34)

स्पृहणीयास्तु देवेभ्यो ये नराः कृष्णजागरे। नृत्यं गीतं प्रकुर्वंति वीणावाद्यं तथैव च

spṛhaṇīyāstu devebhyo ye narāḥ kṛṣṇajāgare| nṛtyaṁ gītaṁ prakurvaṁti vīṇāvādyaṁ tathaiva ca

जो मनुष्य कृष्ण के जागरण में नृत्य, गीत तथा वीणा-वादन करते हैं, वे देवताओं के लिए भी ईर्ष्या के पात्र हैं।

श्लोक 35 (skanda.7.475.35)

भक्त्या वाऽप्यथवाऽभक्त्या शुचिर्वाप्यथवाऽशुचिः। कृत्वा जागरणं विष्णोर्मुच्यते पापकोटिभिः

bhaktyā vā'pyathavā'bhaktyā śucirvāpyathavā'śuciḥ| kṛtvā jāgaraṇaṁ viṣṇormucyate pāpakoṭibhiḥ

भक्तिपूर्वक अथवा भक्तिरहित होकर, शुद्ध अथवा अशुद्ध होकर भी, विष्णु का जागरण कर मनुष्य करोड़ों पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 36 (skanda.7.475.36)

पादयोः पांसुकणिका यावत्तिष्ठंति भूतले। तावद्वर्षसहस्राणि जागरी वसते दिवि

pādayoḥ pāṁsukaṇikā yāvattiṣṭhaṁti bhūtale| tāvadvarṣasahasrāṇi jāgarī vasate divi

जितने धूलिकण उसके पैरों में भूतल पर लगे रहते हैं, उतने ही हजारों वर्षों तक जागरण करने वाला स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 37 (skanda.7.475.37)

तस्माद्गृहं प्रगन्तव्यं जागरे माधवस्य च। कलौ मलविनाशाय द्वादशद्वादशीषु च

tasmādgṛhaṁ pragantavyaṁ jāgare mādhavasya ca| kalau malavināśāya dvādaśadvādaśīṣu ca

अतः कलियुग में पाप के विनाश के लिए वर्ष की बारहों द्वादशियों में माधव के जागरण-गृह में जाना चाहिए।

श्लोक 38 (skanda.7.475.38)

सुबहून्यपि पापानि कृत्वा जागरणं हरेः। निर्द्दहेन्मेरुतुल्यानि युगकोटिशतान्यपि

subahūnyapi pāpāni kṛtvā jāgaraṇaṁ hareḥ| nirddahenmerutulyāni yugakoṭiśatānyapi

बहुत से पाप, यहाँ तक कि मेरु पर्वत के समान बड़े पाप, तथा करोड़ों युगों में संचित पाप भी हरि का जागरण करने से भस्म हो जाते हैं।

श्लोक 39 (skanda.7.475.39)

उन्मीलिनी महीपाल यैः कृता प्रीतिसंयुतैः। कलौ जागरणोपेता फलं वक्ष्यामि तच्छृणु

unmīlinī mahīpāla yaiḥ kṛtā prītisaṁyutaiḥ| kalau jāgaraṇopetā phalaṁ vakṣyāmi tacchṛṇu

हे महीपाल! जिन्होंने प्रीतिपूर्वक कलियुग में जागरण-सहित उन्मीलिनी व्रत किया, उसका फल मैं बताऊँगा, सुनो।

श्लोक 40 (skanda.7.475.40)

स्थितौ युगसहस्रं तु पादेनैकेन भूतले। काश्यां च जाह्नवीतीरे तत्फलं लभते नरः

sthitau yugasahasraṁ tu pādenaikena bhūtale| kāśyāṁ ca jāhnavītīre tatphalaṁ labhate naraḥ

हजार युगों तक काशी में गंगा-तट पर एक पैर पर खड़े रहने से जो फल मिलता है, वही फल मनुष्य को प्राप्त होता है।

श्लोक 41 (skanda.7.475.41)

भवेद्युगसहस्रं च विनाऽऽहारेण यत्फलम्। उन्मीलिनीं समासाद्य फलं जागरणे हरेः

bhavedyugasahasraṁ ca vinā'āhāreṇa yatphalam| unmīlinīṁ samāsādya phalaṁ jāgaraṇe hareḥ

हजार युगों तक भोजन के बिना रहने से जो फल होता है, वह फल उन्मीलिनी व्रत में हरि के जागरण से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 42 (skanda.7.475.42)

दुष्प्राप्यं वैष्णवं स्थानं मखकोटिशतैः कृतैः। हेलया प्राप्यते नूनं द्वादश्यां जागरे कृते

duṣprāpyaṁ vaiṣṇavaṁ sthānaṁ makhakoṭiśataiḥ kṛtaiḥ| helayā prāpyate nūnaṁ dvādaśyāṁ jāgare kṛte

करोड़ों यज्ञ करने पर भी दुर्लभ वैष्णव स्थान द्वादशी को जागरण करने से सहज ही प्राप्त हो जाता है, यह निश्चित है।

श्लोक 43 (skanda.7.475.43)

न कुर्वंति व्रतं विष्णोर्जागरेण समन्वितम्। परस्वं पारदार्यं च पापं तान्प्रति गच्छति

na kurvaṁti vrataṁ viṣṇorjāgareṇa samanvitam| parasvaṁ pāradāryaṁ ca pāpaṁ tānprati gacchati

जो जागरण-सहित विष्णु के व्रत को नहीं करते, परधन-हरण और परस्त्री-गमन का पाप उन्हीं की ओर जाता है।

श्लोक 44 (skanda.7.475.44)

एकेनैवोपवासेन भावहीनास्तु मानवाः। निर्द्दग्धाऽखिलपापास्ते प्रयांति स्वर्गकाननम्

ekenaivopavāsena bhāvahīnāstu mānavāḥ| nirddagdhā'khilapāpāste prayāṁti svargakānanam

भावरहित मनुष्य भी एक ही उपवास से अपने समस्त पापों को भस्म कर स्वर्गवन को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 45 (skanda.7.475.45)

यत्र भागवतं शास्त्रं यत्र जागरणं हरेः। शालिग्रामशिला यत्र तत्र गच्छेद्धरिः स्वयम्

yatra bhāgavataṁ śāstraṁ yatra jāgaraṇaṁ hareḥ| śāligrāmaśilā yatra tatra gacchaddhariḥ svayam

जहाँ भागवत शास्त्र है, जहाँ हरि का जागरण होता है, जहाँ शालिग्राम शिला है, वहाँ स्वयं हरि जाते हैं।

श्लोक 46 (skanda.7.475.46)

न पुर्य्यः पावनाः सप्त कलौ वेदवचो नहि। यादृशं वासरं विष्णोः पावनं जागरान्वितम्

na puryaḥ pāvanāḥ sapta kalau vedavaco nahi| yādṛśaṁ vāsaraṁ viṣṇoḥ pāvanaṁ jāgarānvitam

कलियुग में न सात पवित्र पुरियाँ, न वेदवचन — कोई भी विष्णु के जागरण-सहित पावन दिन के समान नहीं है।

श्लोक 47 (skanda.7.475.47)

संप्राप्ते वासरे विष्णोर्ये न कुर्वंति जागरम्। मज्जंति नरके घोरे नरानार्य्यो न संशयः

saṁprāpte vāsare viṣṇorye na kurvaṁti jāgaram| majjaṁti narake ghore narānāryo na saṁśayaḥ

विष्णु का दिन प्राप्त होने पर भी जो जागरण नहीं करते, वे स्त्री-पुरुष घोर नरक में डूबते हैं, इसमें संशय नहीं।

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