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प्रभास खण्ड · अध्याय 476

गौतमी-तीरस्थ तीर्थों का दिव्यवाणी से द्वारका-प्रभाव श्रवण तथा द्वारकागमन-उत्सुकता एवं गोमती वर्णन

अध्याय 475अध्याय-सूचीअध्याय 477

श्लोक 1 (skanda.7.476.1)

प्रह्लाद उवाच। अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत्। द्वारकायाः परं पुण्यं माहात्म्यं ह्युत्तमोत्तमम्

prahlāda uvāca| athānyacca pravakṣyāmi guhyādguhyataraṁ mahat| dvārakāyāḥ paraṁ puṇyaṁ māhātmyaṁ hyuttamottamam

प्रह्लाद ने कहा — अब मैं गुह्य से भी अधिक गुह्य एक अन्य महान् तत्त्व बताऊँगा — द्वारका का परम पुण्यमय, उत्तमोत्तम माहात्म्य।

श्लोक 2 (skanda.7.476.2)

इतिहासं पुरावृत्तं वर्णयिष्ये मनोहरम्। तीर्थक्षेत्रादिदेवानामृषीणां संशयापहम्

itihāsaṁ purāvṛttaṁ varṇayiṣye manoharam| tīrthakṣetrādidevānāmṛṣīṇāṁ saṁśayāpaham

मैं एक प्राचीन, मनोहर इतिहास का वर्णन करूँगा, जो तीर्थ-क्षेत्रों, देवताओं तथा ऋषियों के संशय को दूर करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.7.476.3)

सौभाम्यमतुलं दृष्ट्वा सिंहराशिगते गुरौ। गोदावर्य्यां द्विजश्रेष्ठा नारदो भगवत्प्रियः

saubhāmyamatulaṁ dṛṣṭvā siṁharāśigate gurau| godāvaryāṁ dvijaśreṣṭhā nārado bhagavatpriyaḥ

हे द्विजश्रेष्ठो! बृहस्पति के सिंह राशि में जाने पर, अनुपम सौभाग्य को देखकर, भगवत्प्रिय नारद गोदावरी में आए।

श्लोक 4 (skanda.7.476.4)

गौतमस्याऽभितो दृष्ट्वा त्रैलोक्यसंभवानि वै। तीर्थानि सरितः सर्वा विस्मयं परमं गतः

gautamasyā'bhito dṛṣṭvā trailokyasaṁbhavāni vai| tīrthāni saritaḥ sarvā vismayaṁ paramaṁ gataḥ

गौतम ऋषि के आश्रम के चारों ओर त्रिभुवन से आए हुए तीर्थों तथा समस्त नदियों को देखकर वे परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 5 (skanda.7.476.5)

तत्र काशी कुरुक्षेत्रमयोध्या मथुरापुरी। माया कांची ह्यवंती च अरण्यान्याश्रमैः सह

tatra kāśī kurukṣetramayodhyā mathurāpurī| māyā kāṁcī hyavaṁtī ca araṇyānyāśramaiḥ saha

वहाँ काशी, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, मथुरापुरी, माया, काञ्ची, अवन्ती तथा आश्रमों सहित वन —

श्लोक 6 (skanda.7.476.6)

हरिक्षेत्रं गया मिश्रक्षेत्रं च पुरुषोत्तमम्। प्रभासादीनि पुण्यानि मुक्तिक्षेत्राण्यशेषतः

harikṣetraṁ gayā miśrakṣetraṁ ca puruṣottamam| prabhāsādīni puṇyāni muktikṣetrāṇyaśeṣataḥ

हरिक्षेत्र, गया, मिश्रक्षेत्र, पुरुषोत्तम-क्षेत्र, प्रभास आदि समस्त पुण्यमय मुक्तिक्षेत्र —

श्लोक 7 (skanda.7.476.7)

जाह्नवी यमुना रेवा तत्र पुण्या सरस्वती। सरयूर्गंडकी तापी पयोष्णी सरितां वरा

jāhnavī yamunā revā tatra puṇyā sarasvatī| sarayūrgaṁḍakī tāpī payoṣṇī saritāṁ varā

गंगा, यमुना, नर्मदा, पुण्यमयी सरस्वती, सरयू, गण्डकी, तापी, तथा नदियों में श्रेष्ठ पयोष्णी —

श्लोक 8 (skanda.7.476.8)

कृष्णा भीमरथी पुण्या कावेर्य्याद्याः सरिद्वराः। स्वर्गे मर्त्ये च पाताले वर्त्तमानाः सतीर्थकाः

kṛṣṇā bhīmarathī puṇyā kāveryādyāḥ saridvarāḥ| svarge martye ca pātāle varttamānāḥ satīrthakāḥ

कृष्णा, पुण्यमयी भीमरथी, कावेरी आदि श्रेष्ठ नदियाँ — स्वर्ग, मृत्युलोक तथा पाताल में विद्यमान समस्त तीर्थों सहित —

श्लोक 9 (skanda.7.476.9)

स्थिता गोदावरीतीरे सिंहराशिं गते गुरौ। तथा च पुष्करादीनि सप्तसिंधुसरांसि च

sthitā godāvarītīre siṁharāśiṁ gate gurau| tathā ca puṣkarādīni saptasiṁdhusarāṁsi ca

बृहस्पति के सिंह राशि में जाने पर गोदावरी के तट पर स्थित हुईं, तथा पुष्कर आदि सातों सिन्धुओं और सरोवरों सहित —

श्लोक 10 (skanda.7.476.10)

मेर्वादिपर्वताः पुण्या दर्शनात्पापनाशनाः। तीर्थराज प्रयागश्च सर्वतीर्थसमन्वितः

mervādiparvatāḥ puṇyā darśanātpāpanāśanāḥ| tīrtharāja prayāgaśca sarvatīrthasamanvitaḥ

मेरु आदि पुण्यमय पर्वत, जो दर्शनमात्र से पाप नष्ट करते हैं, तथा समस्त तीर्थों सहित तीर्थराज प्रयाग —

श्लोक 11 (skanda.7.476.11)

वेदोपवेदाः शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः। सिद्धा मुनिगणाः सर्वे देवर्षिपितृदेवताः

vedopavedāḥ śāstrāṇi purāṇāni ca sarvaśaḥ| siddhā munigaṇāḥ sarve devarṣipitṛdevatāḥ

वेद, उपवेद, शास्त्र तथा पुराण पूर्ण रूप से, सिद्ध, मुनिगण, देवर्षि, पितर तथा देवता — सब —

श्लोक 12 (skanda.7.476.12)

चंद्रादित्यौ सुरगणाः सिंहस्थे च बृहस्पतौ। स्थिता गोदावरीतीरे वर्षमेकं प्रहर्षिताः

caṁdrādityau suragaṇāḥ siṁhasthe ca bṛhaspatau| sthitā godāvarītīre varṣamekaṁ praharṣitāḥ

चन्द्र, सूर्य तथा देवगण — बृहस्पति के सिंहस्थ होने पर एक वर्ष तक अत्यंत हर्षित होकर गोदावरी के तट पर रहे।

श्लोक 13 (skanda.7.476.13)

यानि कानि च पुण्यानि तीर्थक्षेत्राणि संति वै। त्रैलोक्ये तानि सर्वाणि गौतम्यां वीक्ष्य विस्मिताः

yāni kāni ca puṇyāni tīrthakṣetrāṇi saṁti vai| trailokye tāni sarvāṇi gautamyāṁ vīkṣya vismitāḥ

त्रिभुवन में जितने भी पुण्यमय तीर्थ-क्षेत्र हैं, उन सबको गोदावरी में देखकर नारद विस्मित हो गए।

श्लोक 14 (skanda.7.476.14)

देवर्षिर्नारदस्तत्र मुनिभिर्मुदितोऽवसत्। सिंहस्यांते च सर्वाणि स्वस्थानगमनाय वै

devarṣirnāradastatra munibhirmudito'vasat| siṁhasyāṁte ca sarvāṇi svasthānagamanāya vai

देवर्षि नारद वहाँ मुनियों के साथ प्रसन्न होकर रहे। सिंहस्थ काल की समाप्ति पर सब अपने-अपने स्थान को लौटने के लिए —

श्लोक 15 (skanda.7.476.15)

आमन्त्र्य गौतमीं देवीं स्थितानि पुरतस्ततः। सर्वेषां शृण्वतां विप्रा गौतमी खिन्नमानसा। तप्ता दुर्जनसंसर्गान्नारदं दुःखिताऽब्रवीत्

āmantrya gautamīṁ devīṁ sthitāni purataststataḥ| sarveṣāṁ śṛṇvatāṁ viprā gautamī khinnamānasā| taptā durjanasaṁsargānnāradaṁ duḥkhitā'bravīt

देवी गौतमी से विदा लेकर उसके सामने खड़े हुए। हे विप्रो! सबके सुनते हुए, दुष्टों के संसर्ग से संतप्त, खिन्नमना गौतमी दुःखी होकर नारद से बोली —

श्लोक 16 (skanda.7.476.16)

गौतम्युवाच। पश्यैतानि सुतीर्थानि गंगाद्याः सरितोऽमलाः। सागरा गिरयः पुण्या गयात्रितयमेव च

gautamyuvāca| paśyaitāni sutīrthāni gaṁgādyāḥ sarito'malāḥ| sāgarā girayaḥ puṇyā gayātritayameva ca

गौतमी ने कहा — देखो, ये उत्तम तीर्थ हैं, गंगा आदि निर्मल नदियाँ, सागर, पुण्यमय पर्वत, तथा तीनों गयाएँ भी —

श्लोक 17 (skanda.7.476.17)

क्षेत्राणि मोक्षदान्यंग त्रैलोक्यजानि नारद। देवाश्च पितरः सिद्धा ऋषयो मानवादयः

kṣetrāṇi mokṣadānyaṁga trailokyajāni nārada| devāśca pitaraḥ siddhā ṛṣayo mānavādayaḥ

हे नारद! ये त्रिभुवन में उत्पन्न मोक्षदायक क्षेत्र हैं, तथा देवता, पितर, सिद्ध, ऋषि, मनुष्य आदि —

श्लोक 18 (skanda.7.476.18)

तीर्थ राज प्रयागश्च सर्वतीर्थसमन्वितः। एतेषामेव सर्वेषां मत्संसर्गान्महामुने। विशुद्धानां प्रकाशेन राजते भुवनत्रयम्

tīrtha rāja prayāgaśca sarvatīrthasamanvitaḥ| eteṣāmeva sarveṣāṁ matsaṁsargānmahāmune| viśuddhānāṁ prakāśena rājate bhuvanatrayam

समस्त तीर्थों सहित तीर्थराज प्रयाग भी। हे महामुने! इन सबके ही, मेरे संसर्ग से विशुद्ध होकर, प्रकाश से त्रिभुवन सुशोभित होता है।

श्लोक 19 (skanda.7.476.19)

प्रयांति तानि सर्वाणि स्वंस्वं स्थानं प्रति प्रभो। अधुनाऽहं परिश्रांता दह्यमाना त्वहर्निशम्

prayāṁti tāni sarvāṇi svaṁsvaṁ sthānaṁ prati prabho| adhunā'haṁ pariśrāṁtā dahyamānā tvaharniśam

हे प्रभो! वे सब अब अपने-अपने स्थान को लौट रहे हैं। किन्तु मैं अभी अत्यंत श्रान्त हूँ, रात-दिन जलती रहती हूँ —

श्लोक 20 (skanda.7.476.20)

दुर्जनानां सुसंपर्काद्भृशं पापात्मना प्रभो। सौभण्यमधुना प्राप्तं सत्संसर्गेण नारद

durjanānāṁ susaṁparkādbhṛśaṁ pāpātmanā prabho| saubhaṇyamadhunā prāptaṁ satsaṁsargeṇa nārada

हे प्रभो! अत्यंत पापात्मा दुर्जनों के संसर्ग से। हे नारद! सत्संग से अभी जो सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है,

श्लोक 21 (skanda.7.476.21)

प्रयांत्येतानि सर्वाणि स्वस्थानं मुदितानि च

prayāṁtyetāni sarvāṇi svasthānaṁ muditāni ca

यह सब अब प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थान को लौट रहे हैं।

श्लोक 22 (skanda.7.476.22)

एतानि मत्प्रसादेन पुण्यानि कथितानि च। कथय श्रमशांत्यर्थं दुःखि ता किं करोम्यहम्

etāni matprasādena puṇyāni kathitāni ca| kathaya śramaśāṁtyarthaṁ duḥkhitā kiṁ karomyaham

मेरी कृपा से ये पुण्यमय हुए और कहे गए। मेरे श्रम-शांति के लिए कहिए, मैं दुःखी हूँ, मैं क्या करूँ?

श्लोक 23 (skanda.7.476.23)

प्रह्लाद उवाच। गोदावर्य्या वचः श्रुत्वा भगवान्नारदो द्विजाः। क्षणं ध्यात्वा तु दुःखार्त्तः प्राह संशयमानसः

prahlāda uvāca| godāvaryā vacaḥ śrutvā bhagavānnārado dvijāḥ| kṣaṇaṁ dhyātvā tu duḥkhārttaḥ prāha saṁśayamānasaḥ

प्रह्लाद ने कहा — हे द्विजो! गोदावरी के इस वचन को सुनकर भगवान् नारद क्षणभर ध्यान कर, दुःखार्त होकर संशययुक्त मन से बोले —

श्लोक 24 (skanda.7.476.24)

नारद उवाच। अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्गौतम्या व्यसनं महत्। पश्यन्त्वसंशयं देवास्तीर्थक्षेत्रसरिद्वराः

nārada uvāca| aho atyadbhutaṁ hyetadgautamyā vyasanaṁ mahat| paśyantvasaṁśayaṁ devāstīrthakṣetrasaridvarāḥ

नारद ने कहा — अहो! गौतमी की यह अत्यंत विचित्र विपदा है। हे देवगणो, तीर्थ-क्षेत्रो, श्रेष्ठ नदियो! तुम सब निःसंदेह इसे देखो —

श्लोक 25 (skanda.7.476.25)

सत्पुण्यनिचयो यस्यां युष्माकं समभूद्ध्रुवम्। तस्याः पापाग्निशमनं कथं स्यादिति चिन्त्यताम्

satpuṇyanicayo yasyāṁ yuṣmākaṁ samabhūddhruvam| tasyāḥ pāpāgniśamanaṁ kathaṁ syāditi ciṁtyatām

जिसमें तुम सबका पवित्र पुण्यसमूह निश्चय ही संचित हुआ है, उसके पापाग्नि की शांति कैसे हो — इस पर विचार करो।

श्लोक 26 (skanda.7.476.26)

श्रीप्रह्लाद उवाच। तदा चिन्तयतां तेषां सर्वेषां भावितात्मनाम्। गौतमो भगवांस्तत्र समायातो मुनीश्वराः

śrīprahlāda uvāca| tadā ciṁtayatāṁ teṣāṁ sarveṣāṁ bhāvitātmanām| gautamo bhagavāṁstatra samāyāto munīśvarāḥ

श्री प्रह्लाद ने कहा — जब वे सब भावितात्मा विचार कर रहे थे, तभी वहाँ भगवान् गौतम मुनीश्वर आ पहुँचे।

श्लोक 27 (skanda.7.476.27)

दृष्ट्वा तमृषयो देवा यथोचितमपूजयन्। जाह्नवी यमुना पुण्या नर्मदा च सरस्वती

dṛṣṭvā tamṛṣayo devā yathocitamapūjayan| jāhnavī yamunā puṇyā narmadā ca sarasvatī

उन्हें देखकर ऋषियों और देवताओं ने यथोचित पूजन किया। गंगा, यमुना, पुण्यमयी नर्मदा तथा सरस्वती,

श्लोक 28 (skanda.7.476.28)

अन्याश्च सर्वाः सरितस्त्रैलोक्यमनुवर्तिताः। वाराणसी कुरुक्षेत्र प्रमुखान्याश्रमैः सह। युगपत्तानि सर्वाणि संपूज्य मुनिमबुवन्

anyāśca sarvāḥ saritastrailokyamanuvartitāḥ| vārāṇasī kurukṣetra pramukhānyāśramaiḥ saha| yugapattāni sarvāṇi saṁpūjya munimabuvan

तथा त्रिभुवन से आई हुई अन्य समस्त नदियाँ, वाराणसी, कुरुक्षेत्र आदि प्रमुख स्थान अपने आश्रमों सहित — इन सबने एक साथ उस मुनि का पूजन कर कहा —

श्लोक 29 (skanda.7.476.29)

त्वत्प्रसादेन वै त्राताः सम्यक्छुद्धा महामुने। यदानीता त्वया गंगा गौतमी भूतलं प्रति

tvatprasādena vai trātāḥ samyacchuddhā mahāmune| yadānītā tvayā gaṁgā gautamī bhūtalaṁ prati

हे महामुने! आपकी कृपा से ही हम रक्षित तथा सम्यक् शुद्ध हुए हैं, जब आपने गंगा को गौतमी रूप में पृथ्वी पर लाया।

श्लोक 30 (skanda.7.476.30)

कृतार्था मानवाः सर्वे सर्वपापविवर्जिताः। किंतु दुर्जनसंपर्कात्संतप्ता गौतमी भृशम्

kṛtārthā mānavāḥ sarve sarvapāpavivarjitāḥ| kiṁtu durjanasaṁparkātsaṁtaptā gautamī bhṛśam

समस्त मनुष्य कृतार्थ तथा सर्वपापरहित हुए हैं। किन्तु दुष्टों के संसर्ग से गौतमी अत्यंत संतप्त हैं।

श्लोक 31 (skanda.7.476.31)

कथं पापैर्विनिर्मुक्ता परमानन्दसंप्लुता। सुप्रभा जायते देवी तद्गौतम विचिन्त्यताम्

kathaṁ pāpairvinirmuktā paramānandasaṁplutā| suprabhā jāyate devī tadgautama viciṁtyatām

हे गौतम! यह विचार कीजिए कि किस प्रकार वह देवी पापों से मुक्त होकर, परमानन्द में निमग्न, सुन्दर प्रभावाली बन सके।

श्लोक 32 (skanda.7.476.32)

प्रह्लाद उवाच। एवमुक्तो मुनिस्तैस्तु चिन्ताकुलितमानसः। नारदस्य मुखं वीक्ष्य प्रहसन्गौतमोऽब्रवीत्

prahlāda uvāca| evamukto munistaistu ciṁtākulitamānasaḥ| nāradasya mukhaṁ vīkṣya prahasangautamo'bravīt

प्रह्लाद ने कहा — ऐसा कहे जाने पर वह मुनि चिन्ता से आकुल मन वाला होकर नारद के मुख को देखकर हँसते हुए बोला —

श्लोक 33 (skanda.7.476.33)

गौतम उवाच। सर्वेषां क्षेत्रतीर्थानां महाशुभविनाशिनी। गौतमीयं महाभागा अस्यास्तापः क्व शाम्यति

gautama uvāca| sarveṣāṁ kṣetratīrthānāṁ mahāśubhavināśinī| gautamīyaṁ mahābhāgā asyāstāpaḥ kva śāmyati

गौतम ने कहा — समस्त क्षेत्रों और तीर्थों के महाशुभ को नष्ट करने वाला यह संकट है; यह महाभागा गौतमी है — इसका ताप कहाँ शांत होगा?

श्लोक 34 (skanda.7.476.34)

नास्ति लोकत्रये तीर्थं स्नातुं सिंहगते गुरौ। यद्वै नायाति गौतम्यां क्षेत्रं चापि विशुद्धये। काशीप्रयागमुख्यानि राजंते यत्प्रसादतः

nāsti lokatraye tīrthaṁ snātuṁ siṁhagate gurau| yadvai nāyāti gautamyāṁ kṣetraṁ cāpi viśuddhaye| kāśīprayāgamukhyāni rājaṁte yatprasādataḥ

तीनों लोकों में ऐसा कोई तीर्थ या शुद्धिकारक क्षेत्र नहीं है, जो बृहस्पति के सिंहस्थ होने पर स्नान के लिए गौतमी में न आता हो, जिसकी कृपा से ही काशी, प्रयाग आदि प्रमुख तीर्थ भी सुशोभित होते हैं।

श्लोक 35 (skanda.7.476.35)

वदंतु मुनयः सर्वे क्षेत्रतीर्थसमाश्रिताः। शुद्धं विचार्यं यत्कार्य्यं मयाऽस्मिञ्जातसंकटे

vadaṁtu munayaḥ sarve kṣetratīrthasamāśritāḥ| śuddhaṁ vicāryaṁ yatkāryaṁ mayā'sminjātasaṁkaṭe

समस्त क्षेत्रों और तीर्थों में स्थित मुनिगण कहें — इस उत्पन्न संकट में मुझे शुद्धतापूर्वक विचार कर क्या करना चाहिए?

श्लोक 36 (skanda.7.476.36)

प्रह्लाद उवाच। इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे नोचुः किञ्चिद्विमोहिताः। तत्रोपायमविज्ञाय गौतमीं गौतमोऽब्रवीत्

prahlāda uvāca| ityuktvā munayaḥ sarve nocuḥ kiñcidvimohitāḥ| tatropāyamavijñāya gautamīṁ gautamo'bravīt

प्रह्लाद ने कहा — यह सुनकर समस्त मुनि मोहित होकर कुछ भी नहीं कह सके। उपाय को न जानकर गौतम ने गौतमी से कहा —

श्लोक 37 (skanda.7.476.37)

गौतम उवाच। आनीतासि मया देवि तपसाऽऽराध्य शंकरम्। वदिष्यति स चोपायमित्युक्त्वाऽचिन्तयत्तदा

gautama uvāca| ānītāsi mayā devi tapasā'ārādhya śaṁkaram| vadiṣyati sa copāyamityuktvā'ciṁtayattadā

गौतम ने कहा — हे देवि! मैंने तपस्या से शंकर की आराधना कर तुम्हें पृथ्वी पर लाया था; वे ही उपाय बताएँगे — ऐसा कहकर वे तब ध्यान करने लगे।

श्लोक 38 (skanda.7.476.38)

गौतमः श्रद्धया भक्त्या गंगामौलिमखंडधीः। तदाऽभून्महदाश्चर्यं शृण्वंतु ऋषयोऽमलाः

gautamaḥ śraddhayā bhaktyā gaṁgāmaulimakhaṁḍadhīḥ| tadā'bhūnmahadāścaryaṁ śṛṇvaṁtu ṛṣayo'malāḥ

श्रद्धा और भक्ति से अखण्ड बुद्धि वाले गौतम ने गंगामौलि का ध्यान किया। तब एक महान् आश्चर्य हुआ — निष्पाप ऋषिगण उसे सुनें।

श्लोक 39 (skanda.7.476.39)

ध्यायमाने महादेवे गौतमेन महात्मना। अकस्मादभवद्वाणी हर्षयन्ती जगत्त्रयम्

dhyāyamāne mahādeve gautamena mahātmanā| akasmādabhavadvāṇī harṣayaṁtī jagattrayam

महात्मा गौतम द्वारा महादेव का ध्यान किए जाने पर, अचानक एक वाणी उत्पन्न हुई, जो त्रिभुवन को हर्षित करने वाली थी।

श्लोक 40 (skanda.7.476.40)

नादयन्ती दिशः सर्वा आब्रह्मभुवनं द्विजाः। अरूपलक्षणाकारा विषादशमनी शुभा

nādayaṁtī diśaḥ sarvā ābrahmabhuvanaṁ dvijāḥ| arūpalakṣaṇākārā viṣādaśamanī śubhā

हे द्विजो! वह वाणी सभी दिशाओं को तथा ब्रह्मलोक तक को गुंजायमान करती हुई, अरूप और अलक्षण्य आकार वाली, विषाद को शांत करने वाली तथा शुभ थी।

श्लोक 41 (skanda.7.476.41)

दिव्यवाण्युवाच। अहो बत महाश्चर्य्यं सर्वेषां सुखदे शुभे। प्रसंगेऽत्र महाक्षेत्रे मग्ना दुःखार्णवे बुधाः

divyavāṇyuvāca| aho bata mahāścaryaṁ sarveṣāṁ sukhade śubhe| prasaṁge'tra mahākṣetre magnā duḥkhārṇave budhāḥ

दिव्यवाणी ने कहा — अहो! यह महान् आश्चर्य है कि सबको सुख देने वाले, शुभ, इस महाक्षेत्र के अवसर पर, बुद्धिमान लोग भी दुःखसागर में डूबे हुए हैं।

श्लोक 42 (skanda.7.476.42)

अहो हे गौतमाचार्य्य ऋषयो नारदादयः। शृण्वंतु तीर्थक्षेत्राणि कृपया संवदाम्यहम्

aho he gautamācārya ṛṣayo nāradādayaḥ| śṛṇvaṁtu tīrthakṣetrāṇi kṛpayā saṁvadāmyaham

हे आचार्य गौतम! हे नारद आदि ऋषियो! हे तीर्थो और क्षेत्रो! सुनो — मैं कृपापूर्वक कहती हूँ।

श्लोक 43 (skanda.7.476.43)

पश्चिमस्य समुद्रस्य तीरमाश्रित्य वर्तते। अस्माच्च दिशि वायव्यां द्वारकाक्षेत्रमुत्तमम्

paścimasya samudrasya tīramāśritya vartate| asmācca diśi vāyavyāṁ dvārakākṣetramuttamam

पश्चिम समुद्र के तट का आश्रय लेकर, तथा यहाँ से वायव्य दिशा में, उत्तम द्वारका क्षेत्र स्थित है।

श्लोक 44 (skanda.7.476.44)

यत्राऽऽस्ते गोमती पुण्या सागरेण समन्विता। पश्चिमाभिमुखो यत्र महाविष्णुः सदा स्थितः

yatrā'āste gomatī puṇyā sāgareṇa samanvitā| paścimābhimukho yatra mahāviṣṇuḥ sadā sthitaḥ

जहाँ सागर से युक्त पवित्र गोमती है, तथा जहाँ पश्चिमाभिमुख महाविष्णु सदा विराजमान हैं।

श्लोक 45 (skanda.7.476.45)

अनेकपापराशीनामुग्राणामपि सर्वदा। दाहस्थान समाख्यातमिन्धनानां यथाऽनलः

anekapāparāśīnāmugrāṇāmapi sarvadā| dāhasthāna samākhyātamindhanānāṁ yathā'nalaḥ

यह अनेक उग्र पापराशियों को भी सदा भस्म करने का स्थान कहा गया है, जैसे अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है।

श्लोक 46 (skanda.7.476.46)

देवविश्वद्रुहो यत्र दग्ध्वा पातकमद्भुतम्। लोकत्रयवधाज्जातं विराजतेऽर्कवत्सदा

devaviśvadruho yatra dagdhvā pātakamadbhutam| lokatrayavadhājjātaṁ virājate'rkavatsadā

जहाँ देवताओं और विश्व के द्रोहियों का अद्भुत पाप — जो तीनों लोकों के वध से उत्पन्न होता है — भस्म होकर, वह स्थान सदा सूर्य के समान विराजमान रहता है।

श्लोक 47 (skanda.7.476.47)

तद्गम्यतां महाभागा गोमतीमघदाहकाम्। गोदावरीं पुरस्कृत्य क्षेत्रतीर्थसमन्विताम्

tadgamyatāṁ mahābhāgā gomatīmaghadāhakām| godāvarīṁ puraskṛtya kṣetratīrthasamanvitām

अतः, हे महाभागा! सब क्षेत्र-तीर्थों सहित गोदावरी को आगे कर, पाप को भस्म करने वाली गोमती के पास जाना चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.7.476.48)

प्राप्य द्वारवतीं पुण्यां मत्प्रसादाद्द्विजोत्तमाः। प्रभावाद्द्वारकायाश्च सत्यमाविर्भविष्यति

prāpya dvāravatīṁ puṇyāṁ matprasādāddvijottamāḥ| prabhāvāddvārakāyāśca satyamāvirbhaviṣyati

हे द्विजोत्तमो! मेरी कृपा से पवित्र द्वारावती को प्राप्त कर, द्वारका के प्रभाव से सत्य ही प्रकट होगा।

श्लोक 49 (skanda.7.476.49)

प्रह्लाद उवाच। इत्युक्ते सति ते सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः। श्रुत्वा सर्वोत्तमं क्षेत्रं जगर्जुर्हरिनामभिः

prahlāda uvāca| ityukte sati te sarve harṣanirbharamānasāḥ| śrutvā sarvottamaṁ kṣetraṁ jagarjurharināmabhiḥ

प्रह्लाद ने कहा — यह कहे जाने पर वे सब हर्ष से भरे मन वाले होकर, उस सर्वोत्तम क्षेत्र को सुनकर, हरि के नामों से गरज उठे।

श्लोक 50 (skanda.7.476.50)

जितं भो जितमस्माभिर्धन्या धन्यतमा वयम्। दैवादपगतो मोहो ज्ञातं तीर्थोत्तमोत्तमम्

jitaṁ bho jitamasmābhirdhanyā dhanyatamā vayam| daivādapagato moho jñātaṁ tīrthottamottamam

'हम विजयी हुए, विजयी हुए! हम धन्य, धन्यतम हैं! दैव से हमारा मोह दूर हुआ, हमें सर्वोत्तम तीर्थ ज्ञात हुआ!'

श्लोक 51 (skanda.7.476.51)

तदा सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्रारण्याश्रमैः सह। वाराणसीप्रयागादि सरांसि सिन्धवो नगाः

tadā sarvāṇi tīrthāni kṣetrāraṇyāśramaiḥ saha| vārāṇasīprayāgādi sarāṁsi sindhavo nagāḥ

तब समस्त तीर्थ, क्षेत्र, अरण्य तथा आश्रमों सहित, वाराणसी-प्रयाग आदि, सरोवर, सिन्धु तथा पर्वत —

श्लोक 52 (skanda.7.476.52)

गया च देवखातानि पितरो देवमानवाः। श्रुत्वा प्रमुदिता वाचं प्रोचुर्जयजयेति च

gayā ca devakhātāni pitaro devamānavāḥ| śrutvā pramuditā vācaṁ procurjayajayeti ca

गया, देवखात, पितर, देवता तथा मनुष्य — इस वाणी को सुनकर प्रसन्न होकर 'जय-जय' कहने लगे।

श्लोक 53 (skanda.7.476.53)

अहो सर्वोत्तमं क्षेत्रं सर्वेषां नोऽघनाशनम्। राजानं तीर्थराजानं द्वारकां शिरसा नमः

aho sarvottamaṁ kṣetraṁ sarveṣāṁ no'ghanāśanam| rājānaṁ tīrtharājānaṁ dvārakāṁ śirasā namaḥ

'अहो! यह सर्वोत्तम क्षेत्र हमारे समस्त पापों का नाश करने वाला है! तीर्थराज द्वारका को हम सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं।'

श्लोक 54 (skanda.7.476.54)

श्रीप्रह्लाद उवाच। श्रुत्वा सर्वोत्तमं क्षेत्रं तीर्थं सर्वोत्तमोत्तमम्। देवोत्तमोत्तमं देवं श्रीकृष्णं क्लेशनाशनम्

śrīprahlāda uvāca| śrutvā sarvottamaṁ kṣetraṁ tīrthaṁ sarvottamottamam| devottamottamaṁ devaṁ śrīkṛṣṇaṁ kleśanāśanam

श्री प्रह्लाद ने कहा — उस सर्वोत्तम क्षेत्र, सर्वोत्तमोत्तम तीर्थ, देवोत्तमोत्तम देव, क्लेशनाशक श्रीकृष्ण को सुनकर,

श्लोक 55 (skanda.7.476.55)

उत्कण्ठा ह्यभवत्तेषां तीर्थादीनां ह्यनुत्तमा। प्रोचुरन्योन्यतो वाचं सर्वाणि युगपत्तदा

utkaṇṭhā hyabhavatteṣāṁ tīrthādīnāṁ hyanuttamā| procuranyonyato vācaṁ sarvāṇi yugapattadā

उन समस्त तीर्थों आदि को अत्यंत उत्कण्ठा हुई; तब वे सब एक साथ आपस में यह वचन बोलने लगे —

श्लोक 56 (skanda.7.476.56)

ऋषितीर्थदेवा ऊचुः। कदा द्रक्ष्यामहे पुण्यां द्वारकां कृष्णपालिताम्। श्रीकृष्णदेवमूर्तिं च कृष्णवक्त्रं सुशोभितम्

ṛṣitīrthadevā ūcuḥ| kadā drakṣyāmahe puṇyāṁ dvārakāṁ kṛṣṇapālitām| śrīkṛṣṇadevamūrtiṁ ca kṛṣṇavaktraṁ suśobhitam

ऋषि-तीर्थ-देवों ने कहा — हम कब कृष्ण द्वारा पालित पुण्यमयी द्वारका का, श्रीकृष्ण देव की मूर्ति का, तथा सुशोभित कृष्ण के मुख का दर्शन करेंगे?

श्लोक 57 (skanda.7.476.57)

कदा नु गोमतीस्नानमस्माकं तु भविष्यति। चक्रतीर्थे कदा स्नात्वा कृष्णदेवस्य मंदिरम्। द्रक्ष्यामः सुमहापुण्यं मुक्तिद्वारमपावृतम्

kadā nu gomatīsnānamasmākaṁ tu bhaviṣyati| cakratīrthe kadā snātvā kṛṣṇadevasya maṁdiram| drakṣyāmaḥ sumahāpuṇyaṁ muktidvāramapāvṛtam

हम कब गोमती में स्नान करेंगे? चक्रतीर्थ में स्नान कर हम कब कृष्ण देव के मंदिर का, उस महापुण्यमय, खुले हुए मुक्तिद्वार का दर्शन करेंगे?

श्लोक 58 (skanda.7.476.58)

दुर्ल्लभो द्वारकावासो दुर्ल्लभं कृष्णदर्शनम्। दुर्ल्लभं गोमती स्नानं रुक्मिणीदर्शनं द्विजाः

durlabho dvārakāvāso durlabhaṁ kṛṣṇadarśanam| durlabhaṁ gomatī snānaṁ rukmiṇīdarśanaṁ dvijāḥ

हे द्विजो! द्वारका में निवास दुर्लभ है, कृष्ण का दर्शन दुर्लभ है, गोमती में स्नान दुर्लभ है, तथा रुक्मिणी का दर्शन भी दुर्लभ है।

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