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प्रभास खण्ड · अध्याय 477

गोदावरी-आदि तीर्थ-क्षेत्र-देव-महर्षियों की द्वारका-गमन उत्सव-यात्रा का वर्णन

अध्याय 476अध्याय-सूचीअध्याय 478

श्लोक 1 (skanda.7.477.1)

श्रीप्रह्लाद उवाच। तदा तेषां सुतीर्थानां क्षेत्राणामभवन्मुदः। गन्तुं द्वारवतीं पुण्यां सर्वेषामपि सर्वशः

śrīprahlāda uvāca| tadā teṣāṁ sutīrthānāṁ kṣetrāṇāmabhavanmudaḥ| gantuṁ dvāravatīṁ puṇyāṁ sarveṣāmapi sarvaśaḥ

श्री प्रह्लाद ने कहा — तब उन उत्तम तीर्थों तथा क्षेत्रों को, सभी को सर्वथा, पवित्र द्वारावती जाने का हर्ष हुआ।

श्लोक 2 (skanda.7.477.2)

द्वारकागमने दृष्ट्वा तथा नारदगौतमौ। महोत्सवो महांस्तत्र भविष्यति मनोहरः

dvārakāgamane dṛṣṭvā tathā nāradagautamau| mahotsavo mahāṁstatra bhaviṣyati manoharaḥ

द्वारका-गमन को देखकर तथा नारद और गौतम को भी — वहाँ एक महान्, मनोहर महोत्सव होगा —

श्लोक 3 (skanda.7.477.3)

तीर्थानां कृष्णयात्रायां गन्तव्यमित्यवोचतुः। अथ ते ह्यृषयो देवाः सर्वतीर्थसमन्विताः

tīrthānāṁ kṛṣṇayātrāyāṁ gantavyamityavocatuḥ| atha te hyṛṣayo devāḥ sarvatīrthasamanvitāḥ

यह सोचकर उन दोनों ने तीर्थों से कृष्ण की यात्रा पर चलने को कहा। तब वे ऋषि और देवता समस्त तीर्थों सहित —

श्लोक 4 (skanda.7.477.4)

गौतमीं तु पुरस्कृत्य ययुर्द्वारवतीं मुदा। तदा सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्रारण्यानि कृत्स्नशः। द्वारकागमनं चक्रुः सानन्दा ऋषयः सुराः

gautamīṁ tu puraskṛtya yayurdvāravatīṁ mudā| tadā sarvāṇi tīrthāni kṣetrāraṇyāni kṛtsnaśaḥ| dvārakāgamanaṁ cakruḥ sānandā ṛṣayaḥ surāḥ

गोदावरी को आगे कर हर्षपूर्वक द्वारावती की ओर चल पड़े। तब समस्त तीर्थ, क्षेत्र तथा वन, ऋषि और देवता आनन्दपूर्वक द्वारका की ओर चले।

श्लोक 5 (skanda.7.477.5)

श्रद्धया परया भक्त्या कृष्णदर्शनलालसाः। वीणानिनादतत्त्वज्ञं नारदं पथि तेऽब्रुवन्

śraddhayā parayā bhaktyā kṛṣṇadarśanalālasāḥ| vīṇāninādatattvajñaṁ nāradaṁ pathi te'bruvan

परम श्रद्धा और भक्ति से कृष्णदर्शन के लिए लालायित, उन्होंने मार्ग में वीणा-निनाद के तत्त्वज्ञ नारद से कहा —

श्लोक 6 (skanda.7.477.6)

ऋषय ऊचुः। राशयः पुण्यपुञ्जानां कृता वै तपसां तथा। यज्ञदानव्रतानां च तीर्थानां महतां भुवि

ṛṣaya ūcuḥ| rāśayaḥ puṇyapuñjānāṁ kṛtā vai tapasāṁ tathā| yajñadānavratānāṁ ca tīrthānāṁ mahatāṁ bhuvi

ऋषियों ने कहा — पुण्यों के समूह, तपस्याओं के समूह, यज्ञों, दानों, व्रतों तथा पृथ्वी पर स्थित महान् तीर्थों के समूह —

श्लोक 7 (skanda.7.477.7)

संप्राप्तस्तत्प्रसादोऽयं यद्द्रक्ष्यामः कुशस्थलीम्। पृच्छामहेऽधुना त्वां वै योगिनां परमं गुरुम्

saṁprāptastatprasādo'yaṁ yaddrakṣyāmaḥ kuśasthalīm| pṛcchāmahe'dhunā tvāṁ vai yogināṁ paramaṁ gurum

यह उन्हीं की कृपा से प्राप्त हुआ है कि हम कुशस्थली का दर्शन करेंगे। अब हम आपसे, जो योगियों के परम गुरु हैं, पूछते हैं —

श्लोक 8 (skanda.7.477.8)

द्वारकायास्तु यात्रायां को विधिः संप्रकीर्तितः। नियमः कोऽत्र कर्त्तव्यो वर्जनीयं च किं मुने

dvārakāyāstu yātrāyāṁ ko vidhiḥ saṁprakīrtitaḥ| niyamaḥ ko'tra karttavyo varjanīyaṁ ca kiṁ mune

हे मुने! द्वारका की यात्रा में कौन सी विधि कही गई है? यहाँ कौन सा नियम पालन करना चाहिए, और क्या वर्जित है?

श्लोक 9 (skanda.7.477.9)

श्रोतव्यं कीर्तितव्यं च स्मर्तव्यं किं च वै पथि। उत्सवाश्चात्र के प्रोक्ता द्वारकायाश्च तत्पथि

śrotavyaṁ kīrtitavyaṁ ca smartavyaṁ kiṁ ca vai pathi| utsavāścātra ke proktā dvārakāyāśca tatpathi

मार्ग में क्या सुनना चाहिए, क्या कीर्तन करना चाहिए, क्या स्मरण करना चाहिए? और द्वारका के इस मार्ग में कौन से उत्सव कहे गए हैं?

श्लोक 10 (skanda.7.477.10)

एकैकश्च महाभाग भक्तानन्दविवर्द्धनम्। एतत्सर्वं महाभाग कृपया संप्रकीर्त्यताम्

ekaikaśca mahābhāga bhaktānandavivarddhanam| etatsarvaṁ mahābhāga kṛpayā saṁprakīrtyatām

हे महाभाग! प्रत्येक भक्त के आनन्द को बढ़ाने वाला यह सब, हे महाभाग! कृपापूर्वक बताइए।

श्लोक 11 (skanda.7.477.11)

श्रीनारद उवाच। कृताभ्यंगस्तु पूर्वेद्युः संपूज्य श्रद्धया हरिम्। भोजयेद्वैष्णवान्विप्रान्स्वशक्त्या संप्रहर्षितः

śrīnārada uvāca| kṛtābhyaṁgastu pūrvedyuḥ saṁpūjya śraddhayā harim| bhojayedvaiṣṇavānviprānsvaśaktyā saṁpraharṣitaḥ

श्री नारद ने कहा — पहले दिन तेल-मर्दन कर, श्रद्धापूर्वक हरि का पूजन कर, प्रसन्नतापूर्वक अपनी शक्ति के अनुसार वैष्णव ब्राह्मणों को भोजन कराए।

श्लोक 12 (skanda.7.477.12)

अनुज्ञातो महाविष्णोः प्रसादमुपयुज्य वै। शयीत भुवि सुप्रीतो द्वारकां कृष्णमानसः

anujñāto mahāviṣṇoḥ prasādamupayujya vai| śayīta bhuvi suprīto dvārakāṁ kṛṣṇamānasaḥ

महाविष्णु की अनुज्ञा लेकर उनका प्रसाद ग्रहण कर, द्वारका और कृष्ण के ध्यान में मग्न होकर, प्रसन्नतापूर्वक भूमि पर शयन करे।

श्लोक 13 (skanda.7.477.13)

श्वोभूते तु शुचिः स्नातः संपूज्य जगदीश्वरम्। प्रदक्षिणं नमस्कृत्य महाविष्णोरनुज्ञया। पृष्ट्वा कुलवृद्धांश्च ब्राह्मणान्वैष्णवान्प्रियान्

śvobhūte tu śuciḥ snātaḥ saṁpūjya jagadīśvaram| pradakṣiṇaṁ namaskṛtya mahāviṣṇoranujñayā| pṛṣṭvā kulavṛddhāṁśca brāhmaṇānvaiṣṇavānpriyān

अगले दिन शुद्ध होकर स्नान कर, जगदीश्वर का पूजन कर, प्रदक्षिणा और नमस्कार कर, महाविष्णु की अनुमति से, कुल के वृद्धजनों, ब्राह्मणों तथा प्रिय वैष्णवों से पूछकर,

श्लोक 14 (skanda.7.477.14)

ततस्तु तदनुज्ञातो गीतवादित्रसंस्तवैः। यात्रारंभं प्रकुर्वीत द्वारकायां प्रहर्षितः

tatastu tadanujñāto gītavāditrasaṁstavaiḥ| yātrāraṁbhaṁ prakurvīta dvārakāyāṁ praharṣitaḥ

फिर उनकी अनुमति पाकर, गीत, वाद्य और स्तोत्रों के साथ, प्रसन्नतापूर्वक द्वारका की यात्रा का आरंभ करे।

श्लोक 15 (skanda.7.477.15)

द्वारकां गच्छमानस्तु शान्तो दांतः शुचिः सदा। ब्रह्मचर्यमधः शय्यां कुर्वीत नियतेन्द्रियः

dvārakāṁ gacchamānastu śānto dāntaḥ śuciḥ sadā| brahmacaryamadhaḥ śayyāṁ kurvīta niyatendriyaḥ

द्वारका जाते हुए सदा शान्त, इन्द्रियदमन में युक्त, शुद्ध होकर, इन्द्रियों को नियंत्रित रखते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करे और भूमि पर शयन करे।

श्लोक 16 (skanda.7.477.16)

सहस्रनामपठनं पुराणपठनं तथा। कर्त्तव्यं सकृपं चित्तं सतां शुश्रूषणं तथा

sahasranāmapaṭhanaṁ purāṇapaṭhanaṁ tathā| karttavyaṁ sakṛpaṁ cittaṁ satāṁ śuśrūṣaṇaṁ tathā

सहस्रनाम का पाठ तथा पुराण का पाठ करना चाहिए; चित्त को दयायुक्त रखना चाहिए, तथा सज्जनों की सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.7.477.17)

अन्नदानादिकं सर्वं विभवे सति मानवः। अपि स्वल्पं स्वशक्त्या वै कृतं कोटिगुणं भवेत्

annadānādikaṁ sarvaṁ vibhave sati mānavaḥ| api svalpaṁ svaśaktyā vai kṛtaṁ koṭiguṇaṁ bhavet

यदि साधन हों तो मनुष्य को अन्नदान आदि सब करना चाहिए; यथाशक्ति अल्प भी किया गया दान करोड़ों गुना हो जाता है।

श्लोक 18 (skanda.7.477.18)

पथि कृष्णस्य यो भक्त्या ग्रासमेकं प्रयच्छति। द्वीपांता तेन दत्ता भूः पुण्यस्यान्तो न विद्यते

pathi kṛṣṇasya yo bhaktyā grāsamekaṁ prayacchati| dvīpāṁtā tena dattā bhūḥ puṇyasyāṁto na vidyate

मार्ग में जो कृष्ण के लिए भक्तिपूर्वक एक ग्रास भी देता है, उसने मानो सारे द्वीप की पृथ्वी दान कर दी; उसके पुण्य का कोई अन्त नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.7.477.19)

किं पुनर्द्वारकाक्षेत्रे कृष्णस्य च समीपतः। कलावेकेकसिक्थे च राजसूयायुतं फलम्

kiṁ punardvārakākṣetre kṛṣṇasya ca samīpataḥ| kalāvekekasikthe ca rājasūyāyutaṁ phalam

फिर द्वारका क्षेत्र में कृष्ण के समीप देने की तो बात ही क्या! कलियुग में प्रत्येक कण पर दस हजार राजसूय यज्ञों का फल मिलता है।

श्लोक 20 (skanda.7.477.20)

गयाश्राद्धसहस्राणि कृतानि शतसंख्यया। अन्नदानं कृतं यैस्तु द्वारकापथि मानवैः

gayāśrāddhasahasrāṇi kṛtāni śatasaṁkhyayā| annadānaṁ kṛtaṁ yaistu dvārakāpathi mānavaiḥ

जिन मनुष्यों ने द्वारका के मार्ग में अन्नदान किया, उन्होंने मानो गया में सैकड़ों-हजारों श्राद्ध किए हों।

श्लोक 21 (skanda.7.477.21)

औषधं चान्नपानीयं पादुके कंबलं तथा। वासांस्युपानहौ चैव वित्तं च विभवे सति। वर्जयेत्संकरं विद्वान्यूथालापांस्तथैव च

auṣadhaṁ cānnapānīyaṁ pāduke kaṁbalaṁ tathā| vāsāṁsyupānahau caiva vittaṁ ca vibhave sati| varjayetsaṁkaraṁ vidvānyūthālāpāṁstathaiva ca

औषध, अन्न, जल, खड़ाऊँ, कंबल, वस्त्र, जूते तथा धन — यदि साधन हों तो देना चाहिए। विद्वान् व्यक्ति को वर्णसंकर आचरण तथा भीड़ में अनावश्यक वार्तालाप का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 22 (skanda.7.477.22)

परनिन्दां च पैशुन्यं परस्य परिवञ्चनम्। परान्नं परपाकं च सति वित्ते त्यजेद्बुधः

paranindāṁ ca paiśunyaṁ parasya parivañcanam| parānnaṁ parapākaṁ ca sati vitte tyajedbudhaḥ

परनिन्दा, चुगली, दूसरे को ठगना, दूसरे का अन्न तथा दूसरे द्वारा पकाया भोजन — यदि धन हो तो बुद्धिमान् को इन सबका त्याग करना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.7.477.23)

न दोषो हीनवित्तस्य तावन्मात्रपरिग्रहे। श्रोतव्या सत्कथा विष्णोर्नामसंकीर्त्तनामृतम्

na doṣo hīnavittasya tāvanmātraparigrahe| śrotavyā satkathā viṣṇornāmasaṁkīrttanāmṛtam

जिसके पास धन नहीं है, उसके लिए उतने मात्र आवश्यक ग्रहण करने में दोष नहीं है। विष्णु की उत्तम कथा तथा नाम-संकीर्तन रूपी अमृत सुनना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.7.477.24)

द्वारकापथिगच्छद्भिरन्योन्यं भक्तिवर्द्धनम्। जप्तव्यं वैदिकं जाप्यं स्तोत्रमागमिकं तथा

dvārakāpathigacchadbhiranyonyaṁ bhaktivarddhanam| japtavyaṁ vaidikaṁ jāpyaṁ stotramāgamikaṁ tathā

द्वारका के मार्ग पर चलने वालों को आपस में भक्ति बढ़ाने वाला जप करना चाहिए, वैदिक जाप्य तथा आगमोक्त स्तोत्रों का भी जप करना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.7.477.25)

यात्रायां यत्फलं प्रोक्तं श्रीकृष्णस्य च वै कलौ। न शक्यते मया वक्तुं वदनैर्युगसंख्यया

yātrāyāṁ yatphalaṁ proktaṁ śrīkṛṣṇasya ca vai kalau| na śakyate mayā vaktuṁ vadanairyugasaṁkhyayā

कलियुग में श्रीकृष्ण की यात्रा का जो फल कहा गया है, उसे मैं युगों की संख्या जितने मुखों से भी नहीं कह सकता।

श्लोक 26 (skanda.7.477.26)

इत्येतत्कथितं सर्वं यत्पृष्टं तु द्विजोत्तमाः। यतध्वं तत्प्रयत्नेन विष्णुप्राप्तौ च सत्वरम्

ityetatkathitaṁ sarvaṁ yatpṛṣṭaṁ tu dvijottamāḥ| yatadhvaṁ tatprayatnena viṣṇuprāptau ca satvaram

हे द्विजोत्तमो! जो पूछा गया, वह सब बता दिया। अब प्रयत्नपूर्वक शीघ्र विष्णु की प्राप्ति के लिए यत्न करो।

श्लोक 27 (skanda.7.477.27)

श्रीप्रह्लाद उवाच। एवं ते नारदेनोक्ता मुनयो हृष्टमानसाः। चक्रुस्ते सहिताः सर्वे कृष्णदेवस्य तत्पथि

śrīprahlāda uvāca| evaṁ te nāradenoktā munayo hṛṣṭamānasāḥ| cakruste sahitāḥ sarve kṛṣṇadevasya tatpathi

श्री प्रह्लाद ने कहा — इस प्रकार नारद द्वारा कहे जाने पर वे मुनि प्रसन्नचित्त हुए, और सब मिलकर कृष्णदेव के उस मार्ग पर वैसा ही करने लगे।

श्लोक 28 (skanda.7.477.28)

केचिच्छृण्वन्ति ता विष्णोः सत्कथा लोकविश्रुताः। यासां संश्रवणादेव भगवान्विशते हृदि

kecicchṛṇvanti tā viṣṇoḥ satkathā lokaviśrutāḥ| yāsāṁ saṁśravaṇādeva bhagavānviśate hṛdi

कुछ लोग विष्णु की उन लोकविख्यात उत्तम कथाओं को सुनते हैं, जिनके सुनने मात्र से भगवान् हृदय में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 29 (skanda.7.477.29)

कीर्त्यमानानि नामानि महापुण्यप्रदानि वै। पावनानि सदा लोके कलौ विप्रा विशेषतः

kīrtyamānāni nāmāni mahāpuṇyapradāni vai| pāvanāni sadā loke kalau viprā viśeṣataḥ

हे विप्रो! उनके कीर्तित किए जाते हुए नाम महापुण्यदायक हैं, संसार में सदा पवित्र करने वाले हैं, विशेष रूप से कलियुग में।

श्लोक 30 (skanda.7.477.30)

पुराणसंहिता दिव्या मुनिभिः परिकीर्तिताः। प्रकाशयंति या विष्णोर्महिमानं सुमंगलम्

purāṇasaṁhitā divyā munibhiḥ parikīrtitāḥ| prakāśayaṁti yā viṣṇormahimānaṁ sumaṁgalam

मुनियों द्वारा कही गई दिव्य पुराणसंहिताएँ, जो विष्णु के सुमंगल महिमा को प्रकट करती हैं —

श्लोक 31 (skanda.7.477.31)

सद्गुणाः कर्मवीर्य्याणि कृतानि विष्णुना पुरा। लीलावताररूपैस्तु शृण्वन्ति परया मुदा

sadguṇāḥ karmavīryāṇi kṛtāni viṣṇunā purā| līlāvatārarūpaistu śṛṇvaṁti parayā mudā

पूर्वकाल में विष्णु द्वारा लीला-अवतार रूपों में किए गए सद्गुणों तथा कर्म-पराक्रमों को वे परम आनन्द से सुनते हैं।

श्लोक 32 (skanda.7.477.32)

अपरे वासुदेवस्य चरितानि सुमंगलाः। वदंति परया भक्त्या सानन्दाः साश्रुलोचनाः

apare vāsudevasya caritāni sumaṁgalāḥ| vadaṁti parayā bhaktyā sānandāḥ sāśrulocanāḥ

कुछ अन्य लोग परम भक्ति से, आनन्दित होकर, आँखों में आँसू भरे हुए, वासुदेव के सुमंगल चरित्रों का वर्णन करते हैं।

श्लोक 33 (skanda.7.477.33)

अन्ये स्मरंति देवेशमनादिनिधनं विभुम्। केचिज्जपंति मुनयः स्तोत्राणि परया मुदा

anye smaraṁti deveśamanādinidhanaṁ vibhum| kecijjapaṁti munayaḥ stotrāṇi parayā mudā

अन्य लोग अनादि-अनन्त प्रभु देवेश्वर का स्मरण करते हैं; कुछ मुनि परम आनन्द से स्तोत्रों का जप करते हैं।

श्लोक 34 (skanda.7.477.34)

केचित्तु शतनामानि जपन्ति मुनयः पथि। अन्ये सहस्रनामानि लक्षनाम तथाऽपरे

kecittu śatanāmāni japanti munayaḥ pathi| anye sahasranāmāni lakṣanāma tathā'pare

मार्ग में कुछ मुनि सौ नामों का जप करते हैं, अन्य सहस्र नामों का, तथा कुछ और लाख नामों का जप करते हैं।

श्लोक 35 (skanda.7.477.35)

केचिल्लौकिकगीतानि हरिनामानि हर्षिताः। उत्सवैश्च व्रजंत्यन्ये पताकादिविभूषिताः

kecillaukikagītāni harināmāni harṣitāḥ| utsavaiśca vrajaṁtyanye patākādivibhūṣitāḥ

कुछ प्रसन्न होकर लौकिक गीत और हरि के नाम गाते हैं; कुछ अन्य पताका आदि से सुसज्जित होकर उत्सवपूर्वक चलते हैं।

श्लोक 36 (skanda.7.477.36)

गीतवादित्रघोषेण करतालस्वनेन च। नास्ति धन्यतमस्तस्मात्त्रिषु लोकेषु कश्चन

gītavāditraghoṣeṇa karatālasvanena ca| nāsti dhanyatamastasmāttriṣu lokeṣu kaścana

गीत, वाद्य की ध्वनि तथा करताल की झंकार के साथ — तीनों लोकों में उससे बढ़कर कोई धन्य नहीं है,

श्लोक 37 (skanda.7.477.37)

दर्शनं यस्य संजातं वैष्णवानामनुत्तमम्। तथैव जाह्नवी पुण्या यमुना च सरस्वती

darśanaṁ yasya saṁjātaṁ vaiṣṇavānāmanuttamam| tathaiva jāhnavī puṇyā yamunā ca sarasvatī

जिसे वैष्णवों के इस सर्वोत्तम दर्शन की प्राप्ति हुई। इसी प्रकार पुण्यमयी गंगा, यमुना तथा सरस्वती —

श्लोक 38 (skanda.7.477.38)

रेवाद्याः सरितः सर्वाः प्रचक्रुर्गीतनर्त्तनम्। प्रयागादीनि तीर्थानि सागराः पर्वतोत्तमाः

revādyāḥ saritaḥ sarvāḥ pracakrurgītanarttanam| prayāgādīni tīrthāni sāgarāḥ parvatottamāḥ

नर्मदा आदि समस्त नदियाँ गीत और नृत्य करने लगीं। प्रयाग आदि तीर्थ, सागर तथा श्रेष्ठ पर्वत —

श्लोक 39 (skanda.7.477.39)

वाराणसी कुरुक्षेत्रं पुण्यान्यन्यानि कृत्स्नशः। त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि क्षेत्राणि देवनायकाः। चक्रुर्गीतं च नृत्यं च द्वारकायाश्च सत्पथि

vārāṇasī kurukṣetraṁ puṇyānyanyāni kṛtsnaśaḥ| trailokye yāni tīrthāni kṣetrāṇi devanāyakāḥ| cakrurgītaṁ ca nṛtyaṁ ca dvārakāyāśca satpathi

वाराणसी, कुरुक्षेत्र तथा अन्य समस्त पुण्यमय स्थान — त्रिभुवन में जो भी तीर्थ, क्षेत्र और देवनायक हैं, वे सब द्वारका के उस पवित्र मार्ग में गीत और नृत्य करने लगे।

श्लोक 40 (skanda.7.477.40)

एकैकस्मिन्पदे दत्ते द्वारकापथि गच्छताम्। पुण्यं क्रतुसहस्राणां तत्पादरजसंख्यया

ekaikasminpade datte dvārakāpathi gacchatām| puṇyaṁ kratusahasrāṇāṁ tatpādarajasaṁkhyayā

द्वारका के मार्ग पर चलने वालों के प्रत्येक पग रखने पर, उनके चरणों की धूलि के कणों की संख्या के बराबर हजारों यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 41 (skanda.7.477.41)

अथ ते मुनयः सर्वे तीर्थक्षेत्रादिसंयुताः। श्रीमत्कृष्णालयं दूराद्ददृशुर्नारदादयः

atha te munayaḥ sarve tīrthakṣetrādisaṁyutāḥ| śrīmatkṛṣṇālayaṁ dūrāddadṛśurnāradādayaḥ

तब वे समस्त मुनि, तीर्थों तथा क्षेत्रों आदि सहित, नारद आदि ने दूर से ही श्रीमान् कृष्ण के मंदिर का दर्शन किया।

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