प्रभास खण्ड · अध्याय 479
विष्णु-पार्षदों द्वारा वर्णित द्वारका-माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.479.1)
नारदस्त्वग्रतो गत्वा प्रणम्याथ हरिप्रियाम् । उवाच ललितां वाचं हर्षयन्द्वारकां पुरीम् ॥ १ ॥
nāradastvagrato gatvā praṇamyātha haripriyām | uvāca lalitāṁ vācaṁ harṣayandvārakāṁ purīm || 1 ||
नारद आगे जाकर, हरि की प्रिया द्वारका को प्रणाम करके, द्वारकापुरी को हर्षित करते हुए मधुर वाणी बोले।
श्लोक 2 (skanda.7.479.2)
श्रीनारद उवाच । पश्यपश्य महाभागे सर्वे प्राप्ताः सुशोभने । तीर्थक्षेत्राणि देवाश्च ऋषयश्चैव कृत्स्नशः ॥ २ ॥
śrīnārada uvāca | paśyapaśya mahābhāge sarve prāptāḥ suśobhane | tīrthakṣetrāṇi devāśca ṛṣayaścaiva kṛtsnaśaḥ || 2 ||
श्रीनारद ने कहा - हे महाभागे! हे सुशोभने! देखो, देखो, समस्त तीर्थ, क्षेत्र, देवगण और ऋषिगण सब यहाँ आ पहुँचे हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.479.3)
पश्येमं पुरतः प्राप्तं प्रयागं तीर्थकैः सह । द्वारके तव पादाब्जे लुण्ठंते श्रद्धयाद्भुतम् ॥ ३ ॥
paśyemaṁ purataḥ prāptaṁ prayāgaṁ tīrthakaiḥ saha | dvārake tava pādābje luṇṭhaṁte śraddhayādbhutam || 3 ||
हे द्वारके! देखो, यह प्रयाग अन्य तीर्थों के साथ तुम्हारे सामने आ पहुँचा है और श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरण-कमलों में अद्भुत रूप से लोट रहा है।
श्लोक 4 (skanda.7.479.4)
इदं तु पुष्करं तीर्थं नमति श्रद्धया शुभे । इयं तु गौतमी पुण्या सर्वतीर्थसमाश्रया ॥ ४ ॥
idaṁ tu puṣkaraṁ tīrthaṁ namati śraddhayā śubhe | iyaṁ tu gautamī puṇyā sarvatīrthasamāśrayā || 4 ||
हे शुभे! यह पुष्कर तीर्थ श्रद्धापूर्वक तुम्हें नमन कर रहा है, और समस्त तीर्थों का आश्रय यह पुण्यमयी गौतमी भी।
श्लोक 5 (skanda.7.479.5)
सिंहस्थे च गुरौ भद्रे संप्राप्ता सौभगं महत् । किन्तु दुर्जनसंसर्गाद्दग्धा पापाग्निना भृशम् ॥ ५ ॥
siṁhasthe ca gurau bhadre saṁprāptā saubhagaṁ mahat | kintu durjanasaṁsargāddagdhā pāpāgninā bhṛśam || 5 ||
हे भद्रे! बृहस्पति के सिंहराशि में होने पर इसने महान् सौभाग्य प्राप्त किया, किंतु दुर्जनों के संसर्ग से यह पाप-अग्नि द्वारा अत्यंत दग्ध हो गई थी।
श्लोक 6 (skanda.7.479.6)
तत्रोपायमभिज्ञाय ऋषीणां शृण्वतां तदा । श्रुत्वा कर्णे महच्छब्दं संप्राप्तेयं तवांतिकम् ॥ ६ ॥
tatropāyamabhijñāya ṛṣīṇāṁ śṛṇvatāṁ tadā | śrutvā karṇe mahacchabdaṁ saṁprāpteyaṁ tavāṁtikam || 6 ||
तब ऋषियों के सुनते हुए उस उपाय को जानकर, कानों से वह महान् शब्द सुनकर, यह तुम्हारे समीप आ पहुँची है।
श्लोक 7 (skanda.7.479.7)
नमस्करोति देवि त्वां द्वारके गौतमी शुभा । पश्यपश्य महापुण्या इयं भागीरथी शुभा ॥ ७ ॥
namaskaroti devi tvāṁ dvārake gautamī śubhā | paśyapaśya mahāpuṇyā iyaṁ bhāgīrathī śubhā || 7 ||
हे देवि द्वारके! यह शुभा गौतमी तुम्हें नमस्कार करती है। देखो, देखो, यह महापुण्यमयी शुभा भागीरथी भी।
श्लोक 8 (skanda.7.479.8)
नमस्करोति ते पादौ संहृष्टा च पुनःपुनः । पश्येमां नर्मदां रम्यां प्रणतां तव पादयोः ॥ ८ ॥
namaskaroti te pādau saṁhṛṣṭā ca punaḥpunaḥ | paśyemāṁ narmadāṁ ramyāṁ praṇatāṁ tava pādayoḥ || 8 ||
वह बार-बार अत्यंत हर्षित होकर तुम्हारे चरणों को नमस्कार करती है। देखो, यह रमणीय नर्मदा भी तुम्हारे चरणों में प्रणत है।
श्लोक 9 (skanda.7.479.9)
यमुना चन्द्रभागेयमियं प्राचीसरस्वती । सरयूर्गंडकी प्राप्ता गोमती पूर्ववाहिनी ॥ ९ ॥
yamunā candrabhāgeyamiyaṁ prācīsarasvatī | sarayūrgaṁḍakī prāptā gomatī pūrvavāhinī || 9 ||
यमुना, यह चंद्रभागा, यह प्राचीसरस्वती, सरयू, गंडकी तथा पूर्व की ओर बहने वाली गोमती भी यहाँ आ पहुँची हैं।
श्लोक 10 (skanda.7.479.10)
शोणः सिन्धुनदी चैता अन्याश्च सरितां वराः । कृष्णा भीमरथी पुण्या कावेर्य्याद्याः सरिद्वराः ॥ १० ॥
śoṇaḥ sindhunadī caitā anyāśca saritāṁ varāḥ | kṛṣṇā bhīmarathī puṇyā kāveryādyāḥ saridvarāḥ || 10 ||
शोण, सिंधु नदी और अन्य श्रेष्ठ नदियाँ, तथा कृष्णा, भीमरथी, पुण्यमयी कावेरी आदि उत्तम नदियाँ भी यहाँ उपस्थित हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.479.11)
सीताचक्षुर्नदी भद्रा नमंत्येताः पदांबुजम् । द्वारके ता महापुण्याः सप्तद्वीपोद्भवाः पराः ॥ ११ ॥
sītācakṣurnadī bhadrā namaṁtyetāḥ padāṁbujam | dvārake tā mahāpuṇyāḥ saptadvīpodbhavāḥ parāḥ || 11 ||
सीता, चक्षु और भद्रा नदियाँ तुम्हारे चरण-कमलों को नमन करती हैं। हे द्वारके! सातों द्वीपों में उत्पन्न वे परम पुण्यमयी नदियाँ यहाँ हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.479.12)
मन्दाकिनी महापुण्या भोगवत्यादिसंयुता । पश्याश्चर्यमिदं भद्रे वाराणसी विमुक्तिदा ॥ १२ ॥
maṁdākinī mahāpuṇyā bhogavatyādisaṁyutā | paśyāścaryamidaṁ bhadre vārāṇasī vimuktidā || 12 ||
अत्यंत पुण्यमयी मंदाकिनी भोगवती आदि नदियों के साथ यहाँ आई है। हे भद्रे! देखो यह आश्चर्य - मुक्तिदायिनी वाराणसी भी यहाँ उपस्थित है।
श्लोक 13 (skanda.7.479.13)
भक्त्या ते च पदांभोजं शिरस्याधाय वर्तते । कुरुक्षेत्रं महापुण्यं नमति त्वामहर्निशम् ॥ १३ ॥
bhaktyā te ca padāṁbhojaṁ śirasyādhāya vartate | kurukṣetraṁ mahāpuṇyaṁ namati tvāmaharniśam || 13 ||
वह भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरण-कमलों को अपने सिर पर धारण किए हुए है। महापुण्यमय कुरुक्षेत्र भी रात-दिन तुम्हें नमन करता है।
श्लोक 14 (skanda.7.479.14)
द्वारके मथुरां पश्य प्रणतां तव पादयोः । अयोध्याऽवंतिकामायास्ता नमंति पदांबुजम् ॥ १४ ॥
dvārake mathurāṁ paśya praṇatāṁ tava pādayoḥ | ayodhyā'vantikāmāyāstā namanti padāṁbujam || 14 ||
हे द्वारके! देखो, मथुरा तुम्हारे चरणों में प्रणत है। अयोध्या, अवंतिका और माया - ये सब तुम्हारे चरण-कमलों को नमन करती हैं।
श्लोक 15 (skanda.7.479.15)
कांची गया विशाला च विरजा लुठति क्षितौ । शालिग्रामं महाक्षेत्रं पतितं तव पादयोः । विराजते प्रभासं च क्षेत्रं च पुरुषोत्तमम् ॥ १५ ॥
kāñcī gayā viśālā ca virajā luṭhati kṣitau | śāligrāmaṁ mahākṣetraṁ patitaṁ tava pādayoḥ | virājate prabhāsaṁ ca kṣetraṁ ca puruṣottamam || 15 ||
काञ्ची, गया, विशाला और विरजा पृथ्वी पर लोट रही हैं। महाक्षेत्र शालिग्राम तुम्हारे चरणों में गिरा हुआ है। प्रभासक्षेत्र और पुरुषोत्तमक्षेत्र भी वहाँ सुशोभित हो रहे हैं।
श्लोक 16 (skanda.7.479.16)
भार्गवादीनि चान्यानि सर्वक्षेत्राणि सुन्दरि । द्वारके प्रणमंति त्वां भक्त्योत्थाय पुनःपुनः ॥ १६ ॥
bhārgavādīni cānyāni sarvakṣetrāṇi sundari | dvārake praṇamaṁti tvāṁ bhaktyotthāya punaḥpunaḥ || 16 ||
हे सुंदरि! भृगुक्षेत्र आदि अन्य समस्त क्षेत्र, हे द्वारके, भक्तिपूर्वक बार-बार उठकर तुम्हें प्रणाम करते हैं।
श्लोक 17 (skanda.7.479.17)
पश्येमान्सागरान्सप्त पतितस्तांब पादयोः । पश्यारण्यानि सर्वाणि नैमिषं प्रणतं पुरः ॥ १७ ॥
paśyemānsāgarānsapta patitastāṁba pādayoḥ | paśyāraṇyāni sarvāṇi naimiṣaṁ praṇataṁ puraḥ || 17 ||
हे माता! देखो, ये सातों समुद्र तुम्हारे चरणों में गिरे हुए हैं। देखो, समस्त वन तथा नैमिषारण्य भी तुम्हारे सामने प्रणत हैं।
श्लोक 18 (skanda.7.479.18)
धनुष्कं च दशारण्यं दंडकारण्यमर्बुदम् । नारायणाश्रमं पश्य द्वारके प्रणतं तथा ॥ १८ ॥
dhanuṣkaṁ ca daśāraṇyaṁ daṁḍakāraṇyamarbudam | nārāyaṇāśramaṁ paśya dvārake praṇataṁ tathā || 18 ||
धनुष्क, दशारण्य, दंडकारण्य, अर्बुद तथा नारायणाश्रम को देखो, हे द्वारके! ये सब भी प्रणत हैं।
श्लोक 19 (skanda.7.479.19)
अयं मेरुश्च कैलासो मन्दराद्याः सहस्रशः । हिमाद्रिर्विंध्यशैलश्च श्रीशैलाद्याः प्रहर्षिताः । एते ह्यृषिगणाः सर्वे नमंतिस्म पुनःपुनः ॥ १९ ॥
ayaṁ meruśca kailāso mandarādyāḥ sahasraśaḥ | himādrirviṁdhyaśailaśca śrīśailādyāḥ praharṣitāḥ | ete hyṛṣigaṇāḥ sarve namaṁtisma punaḥpunaḥ || 19 ||
यह मेरु, कैलास, सहस्रों मंदराचल आदि, हिमाद्रि, विंध्याचल तथा श्रीशैल आदि हर्षित पर्वत, और ये समस्त ऋषिगण भी बार-बार नमन करते हैं।
श्लोक 20 (skanda.7.479.20)
गंगाद्याः सागराः शैला नृत्यंति पुरतस्तव । ऋषिदेवगणाः सर्वे सर्वे गर्जंति नामभिः ॥ २० ॥
gaṁgādyāḥ sāgarāḥ śailā nṛtyaṁti puratastava | ṛṣidevagaṇāḥ sarve sarve garjaṁti nāmabhiḥ || 20 ||
गंगा आदि, समुद्र और पर्वत तुम्हारे सामने नृत्य करते हैं। समस्त ऋषिगण और देवगण नामों से गर्जना कर रहे हैं।
श्लोक 21 (skanda.7.479.21)
श्रीप्रह्लाद उवाच । इत्येवं वदतस्तस्य द्वारका हृष्टमानसा । नृत्यतो मुदितान्वीक्ष्य सर्वान्प्रेम्णाभिनंद्य च । उवाच ललिता वाचं गौतमीं स्पृश्य पाणिना ॥ २१ ॥
śrīprahlāda uvāca | ityevaṁ vadatastasya dvārakā hṛṣṭamānasā | nṛtyato muditānvīkṣya sarvānpremṇābhinaṁdya ca | uvāca lalitā vācaṁ gautamīṁ spṛśya pāṇinā || 21 ||
श्रीप्रह्लाद ने कहा - उसके इस प्रकार कहने पर, प्रसन्नचित्त द्वारका ने नाचते हुए सबको आनंदित देखकर तथा प्रेमपूर्वक सबका अभिनंदन करके, गौतमी को हाथ से स्पर्श कर मधुर वाणी में कहा।
श्लोक 22 (skanda.7.479.22)
भागीरथीप्रयागादीन्क्षेत्रादीनथ सर्वशः । द्वारका मधुरालापैः सर्वानानंदयत्तदा ॥ २२ ॥
bhāgīrathīprayāgādīnkṣetrādīnatha sarvaśaḥ | dvārakā madhurālāpaiḥ sarvānānandayattadā || 22 ||
भागीरथी, प्रयाग आदि सभी क्षेत्रों को द्वारका ने तब मधुर वचनों से सबको आनंदित किया।
श्लोक 23 (skanda.7.479.23)
अथाश्चर्यमभूत्तत्र सर्वानंदविवर्द्धनम् । अथ तावत्तदाऽऽकाशे गीतवाद्यजयस्वनाः ॥ २३ ॥
athāścaryamabhūttatra sarvānandavivardhanam | atha tāvattadākāśe gītavādyajayasvanāḥ || 23 ||
तब वहाँ सबके आनंद को बढ़ाने वाला एक आश्चर्य हुआ - आकाश में गीत, वाद्य तथा जय-जयकार के शब्द गूँजने लगे।
श्लोक 24 (skanda.7.479.24)
गर्जनानि सुपुण्यानि हरिशब्दैः पृथक्पृथक् । अपश्यन्वै तदा सर्वे ब्रह्माद्या देवनायकाः ॥ २४ ॥
garjanāni supuṇyāni hariśabdaiḥ pṛthakpṛthak | apaśyanvai tadā sarve brahmādyā devanāyakāḥ || 24 ||
पृथक्-पृथक् हरि के नामों के साथ अत्यंत पुण्यमय गर्जन होने लगे। तब सबने ब्रह्मा आदि देवताओं के अधिनायकों को देखा।
श्लोक 25 (skanda.7.479.25)
महेशः स्वगणैः सार्द्धं भवान्या समदृश्यत । इन्द्रस्तु त्रिदशैः सार्द्धं यक्षगन्धर्वकिन्नरैः ॥ २५ ॥
maheśaḥ svagaṇaiḥ sārddhaṁ bhavānyā samadṛśyata | indrastu tridaśaiḥ sārddhaṁ yakṣagandharvakinnaraiḥ || 25 ||
महेश अपने गणों के साथ भवानी सहित दिखाई दिए। इंद्र भी देवताओं, यक्षों, गंधर्वों और किन्नरों के साथ दिखाई दिए।
श्लोक 26 (skanda.7.479.26)
मरुद्भिर्लोकपालैश्चा नृत्यमानाः प्रहर्षिताः । सिद्धविद्याधराः सर्वे वस्वादित्याश्च सग्रहाः ॥ २६ ॥
marudbhirlokapālaiścā nṛtyamānāḥ praharṣitāḥ | siddhavidyādharāḥ sarve vasvādityāśca sagrahāḥ || 26 ||
मरुद्गणों और लोकपालों के साथ, हर्षित होकर नाचते हुए, समस्त सिद्ध, विद्याधर, वसु, आदित्य तथा ग्रहगण भी वहाँ थे।
श्लोक 27 (skanda.7.479.27)
भृग्वाद्याः सनकाद्याश्च नृत्यमानाः प्रहर्षिताः । ब्रह्माणं च नमस्कृत्य सप्तस्वर्गस्थिताः सुराः ॥ २७ ॥
bhṛgvādyāḥ sanakādyāśca nṛtyamānāḥ praharṣitāḥ | brahmāṇaṁ ca namaskṛtya saptasvargasthitāḥ surāḥ || 27 ||
भृगु आदि तथा सनक आदि मुनिगण हर्षित होकर नाचते हुए, तथा सातों स्वर्गों में स्थित देवता ब्रह्मा को नमस्कार करके,
श्लोक 28 (skanda.7.479.28)
ऊचुस्ते द्वारकां दृष्ट्वा ब्रह्मेशानादयस्तदा । हर्षविह्वलितात्मानो वीक्ष्याऽन्योन्यं च विस्मिताः ॥ २८ ॥
ūcuste dvārakāṁ dṛṣṭvā brahmeśānādayastadā | harṣavihvalitātmāno vīkṣyā'nyonyaṁ ca vismitāḥ || 28 ||
तब द्वारका को देखकर, हर्ष से विह्वल हुए ब्रह्मा-ईशान आदि, एक-दूसरे को देखकर विस्मित होकर बोले।
श्लोक 29 (skanda.7.479.29)
देवा ऊचुः । सेयं वै द्वारका देवी वहते यत्र गोमती । यत्राऽऽस्ते भगवान्कृष्णः सेयं पुण्या विराजते ॥ २९ ॥
devā ūcuḥ | seyaṁ vai dvārakā devī vahate yatra gomatī | yatrāste bhagavānkṛṣṇaḥ seyaṁ puṇyā virājate || 29 ||
देवताओं ने कहा - यह वही देवी द्वारका है, जहाँ गोमती बहती है, जहाँ भगवान् कृष्ण निवास करते हैं - वह यह पुण्यमयी सुशोभित हो रही है।
श्लोक 30 (skanda.7.479.30)
सर्वक्षेत्रोत्तमा या च सर्वतीर्थोत्तमोत्तमा । स्वर्गादप्यधिका भूमौ द्वारकेयं प्रकाशते ॥ ३० ॥
sarvakṣetrottamā yā ca sarvatīrthottamottamā | svargādapyadhikā bhūmau dvārakeyaṁ prakāśate || 30 ||
जो समस्त क्षेत्रों में सर्वोत्तम और समस्त तीर्थों में उत्तमोत्तम है, यह द्वारका स्वर्ग से भी अधिक पृथ्वी पर प्रकाशित हो रही है।
श्लोक 31 (skanda.7.479.31)
एतद्वै चक्रतीर्थं च यच्छिला चक्र चिह्निता । मुक्तिदा पापिनां लोके म्लेच्छदेशेऽपि पूजिता ॥ ३१ ॥
etadvai cakratīrthaṁ ca yacchilā cakra cihnitā | muktidā pāpināṁ loke mlecchadeśe'pi pūjitā || 31 ||
यह वही चक्रतीर्थ है, जिसकी शिला चक्र-चिह्नित है, जो संसार के पापियों को मुक्ति देने वाली है, और म्लेच्छ देश में भी पूजित है।
श्लोक 32 (skanda.7.479.32)
प्रह्लाद उवाच । ब्रह्मादीनागतान्दृष्ट्वा विस्मिता नारदादयः । क्षेत्राणि तीर्थमुख्यानि विस्मितानि सरिद्वराः । प्रणेमुर्युगपत्सर्वे सर्वाः सर्वाणि सर्वशः ॥ ३२ ॥
prahlāda uvāca | brahmādīnāgatāndṛṣṭvā vismitā nāradādayaḥ | kṣetrāṇi tīrthamukhyāni vismitāni saridvarāḥ | praṇemuryugapatsarve sarvāḥ sarvāṇi sarvaśaḥ || 32 ||
प्रह्लाद ने कहा - ब्रह्मा आदि के आगमन को देखकर नारद आदि विस्मित हुए, समस्त क्षेत्र, प्रमुख तीर्थ तथा श्रेष्ठ नदियाँ भी विस्मित हुईं। सभी ने एक साथ, सब ओर से, सबको प्रणाम किया।
श्लोक 33 (skanda.7.479.33)
ब्रह्मादीनां च तीर्थानां दृष्ट्वा यात्रां मनोहराम् । द्वारकां प्रति विप्रेन्द्रा विस्मिता द्वारकौकसः ॥ ३३ ॥
brahmādīnāṁ ca tīrthānāṁ dṛṣṭvā yātrāṁ manoharām | dvārakāṁ prati viprendrā vismitā dvārakaukasaḥ || 33 ||
हे विप्रेंद्रो! ब्रह्मा आदि तथा तीर्थों की मनोहर यात्रा को द्वारका की ओर देखकर, द्वारका के निवासी विस्मित हो गए।
श्लोक 34 (skanda.7.479.34)
दृष्ट्वा देवगणाः सर्वे द्वारकां प्रति मंदिरे । गीतवाद्यादि निर्घोषैर्नृत्यमानाः प्रहर्षिताः ॥ ३४ ॥
dṛṣṭvā devagaṇāḥ sarve dvārakāṁ prati mandire | gītavādyādi nirghoṣairnṛtyamānāḥ praharṣitāḥ || 34 ||
द्वारका के मंदिर की ओर देखकर समस्त देवगण, गीत-वाद्य आदि की ध्वनियों के साथ हर्षित होकर नाचने लगे।
श्लोक 35 (skanda.7.479.35)
वदन्तो जयशब्दांश्च सेयं कृष्णप्रियेति च । दृष्ट्वा ब्रह्ममहेशानौ द्वारकां प्रीतमानसौ ॥ ३५ ॥
vadanto jayaśabdāṁśca seyaṁ kṛṣṇapriyeti ca | dṛṣṭvā brahmeśānau dvārakāṁ prītamānasau || 35 ||
"यही कृष्ण की प्रिया है" - ऐसा जय-घोष करते हुए, द्वारका को देखकर ब्रह्मा और महेश प्रसन्नचित्त हुए।
श्लोक 36 (skanda.7.479.36)
त्यक्त्वा च वाहने श्रेष्ठे दण्डवत्पतितौ भुवि । ऊचतुश्च तदा देवौ द्वारकां प्रति हर्षितौ ॥ ३६ ॥
tyaktvā ca vāhane śreṣṭhe daṇḍavatpatitau bhuvi | ūcatuśca tadā devau dvārakāṁ prati harṣitau || 36 ||
अपने श्रेष्ठ वाहनों को छोड़कर दोनों देव पृथ्वी पर दंडवत् गिर पड़े, और तब हर्षित होकर द्वारका से बोले।
श्लोक 37 (skanda.7.479.37)
श्रेष्ठा त्वमम्ब सर्वेभ्योऽस्मदादिभ्योऽपि सर्वतः । यतस्त्वां न त्यजेत्साक्षाद्भगवान्विष्णुरव्ययः ॥ ३७ ॥
śreṣṭhā tvamamba sarvebhyo'smadādibhyo'pi sarvataḥ | yatastvāṁ na tyajetsākṣādbhagavānviṣṇuravyayaḥ || 37 ||
हे माता! तुम हम सबसे भी सब प्रकार से श्रेष्ठ हो, क्योंकि साक्षात् अविनाशी भगवान् विष्णु तुम्हें कभी नहीं त्यागते।
श्लोक 38 (skanda.7.479.38)
अतो दर्शय देवेशं कृष्णं कंसविनाशनम् । यद्दर्शनान्महासिद्धिः सर्वेषां च भविष्यति ॥ ३८ ॥
ato darśaya deveśaṁ kṛṣṇaṁ kaṁsavināśanam | yaddarśanānmahāsiddhiḥ sarveṣāṁ ca bhaviṣyati || 38 ||
अतः देवेश कृष्ण को, जो कंस के विनाशक हैं, हमें दिखलाओ, जिनके दर्शन से सबको महासिद्धि प्राप्त होगी।
श्लोक 39 (skanda.7.479.39)
प्रह्लाद उवाच । इत्युक्त्वा प्रययौ देवी तीर्थक्षेत्रादिसंयुता । ब्रह्मेशानौ पुरस्कृत्य हृष्टौ दृष्ट्वा महोत्सवान् ॥ ३९ ॥
prahlāda uvāca | ityuktvā prayayau devī tīrthakṣetrādisaṁyutā | brahmeśānau puraskṛtya hṛṣṭau dṛṣṭvā mahotsavān || 39 ||
प्रह्लाद ने कहा - यह कहकर वह देवी तीर्थों और क्षेत्रों सहित, ब्रह्मा और ईशान को आगे कर, महोत्सव देखकर हर्षित होते हुए, चल पड़ी।
श्लोक 40 (skanda.7.479.40)
गीतवाद्यपताकैश्च दिव्योपायनपाणिभिः । प्राप्योवाच ततो देवान्द्वारका हर्षविह्वला ॥ ४० ॥
gītavādyapatākaiśca divyopāyanapāṇibhiḥ | prāpyovāca tato devāndvārakā harṣavihvalā || 40 ||
गीत, वाद्य, पताकाओं तथा हाथों में दिव्य भेंट लिए हुए, द्वारका उन देवताओं के पास पहुँचकर हर्ष से विह्वल होकर बोली।
श्लोक 41 (skanda.7.479.41)
पश्यतां पश्यतां देवाः सोऽयं वै द्वारकेश्वरः । प्राप्य संदर्शनं यस्य मुक्तानां यत्फलं भवेत् । न विद्यते सहस्रेषु ब्रह्मांडेषु च यत्फलम् ॥ ४१ ॥
paśyatāṁ paśyatāṁ devāḥ so'yaṁ vai dvārakeśvaraḥ | prāpya saṁdarśanaṁ yasya muktānāṁ yatphalaṁ bhavet | na vidyate sahasreṣu brahmāṁḍeṣu ca yatphalam || 41 ||
हे देवगण! देखो, देखो, यही द्वारकेश्वर हैं, जिनके दर्शन प्राप्त करने से मुक्त पुरुषों को जो फल प्राप्त होता है, वह फल सहस्रों ब्रह्मांडों में भी अन्यत्र नहीं मिलता।
श्लोक 42 (skanda.7.479.42)
ततो देवगणाः सर्वे क्षेत्रतीर्थादिसंयुताः । पश्चिमाभिमुखं दृष्ट्वा कृष्णं क्लेशविनाशनम् । प्रणेमुर्युगपत्सर्वे प्रहृष्टाः समुपागताः ॥ ४२ ॥
tato devagaṇāḥ sarve kṣetratīrthādisaṁyutāḥ | paścimābhimukhaṁ dṛṣṭvā kṛṣṇaṁ kleśavināśanam | praṇemuryugapatsarve prahṛṣṭāḥ samupāgatāḥ || 42 ||
तब समस्त देवगण, क्षेत्रों और तीर्थों सहित, पश्चिमाभिमुख कृष्ण को, जो क्लेशों का नाश करने वाले हैं, देखकर, हर्षित होकर एक साथ पास आकर प्रणाम करने लगे।
श्लोक 43 (skanda.7.479.43)
गीतवाद्यप्रघोषैश्च नृत्यमानाः समंततः । जयशब्दं नमःशब्दं गर्जंतो हरिनामभिः ॥ ४३ ॥
gītavādyapraghoṣaiśca nṛtyamānāḥ samaṁtataḥ | jayaśabdaṁ namaḥśabdaṁ garjaṁto harināmabhiḥ || 43 ||
गीत-वाद्य की गूँज के साथ चारों ओर नाचते हुए, जय-शब्द, नमः-शब्द तथा हरिनामों से गर्जना करते हुए,
श्लोक 44 (skanda.7.479.44)
ब्रह्मा भवो भवानी च सेन्द्रा देवगणा भुवि । दृष्ट्वा कृष्णं प्रणेमुस्ते भक्त्योत्थाय पुनःपुनः ॥ ४४ ॥
brahmā bhavo bhavānī ca sendrā devagaṇā bhuvi | dṛṣṭvā kṛṣṇaṁ praṇemuste bhaktyotthāya punaḥpunaḥ || 44 ||
ब्रह्मा, शिव, भवानी तथा इंद्र सहित देवगण, पृथ्वी पर कृष्ण को देखकर, भक्तिपूर्वक बार-बार उठकर प्रणाम करने लगे।
श्लोक 45 (skanda.7.479.45)
प्रयागादीनि तीर्थानि गंगाद्याः सरितोऽमलाः । ऋषयो देवगंधर्वाः शुकाद्याः सनकादयः । वीक्ष्य वक्त्रं महाविष्णोः प्रणेमुश्च मुहुर्मुहुः ॥ ४५ ॥
prayāgādīni tīrthāni gaṅgādyāḥ sarito'malāḥ | ṛṣayo devagandharvāḥ śukādyāḥ sanakādayaḥ | vīkṣya vaktraṁ mahāviṣṇoḥ praṇemuśca muhurmuhuḥ || 45 ||
प्रयाग आदि तीर्थ, गंगा आदि निर्मल नदियाँ, ऋषिगण, देव-गंधर्व, शुक आदि तथा सनक आदि मुनि - महाविष्णु के मुख को देखकर बार-बार प्रणाम करने लगे।
श्लोक 46 (skanda.7.479.46)
कृष्णकृष्णेति कृष्णेति जय कृष्णेति वादिनः । स्नात्वा तु गोमतीनीरे तीरे चैव महोदधेः । कमलासनः संहृष्टः श्रीमत्कृष्णमपूजयत् ॥ ४६ ॥
kṛṣṇakṛṣṇeti kṛṣṇeti jaya kṛṣṇeti vādinaḥ | snātvā tu gomatīnīre tīre caiva mahodadheḥ | kamalāsanaḥ saṁhṛṣṭaḥ śrīmatkṛṣṇamapūjayat || 46 ||
"कृष्ण-कृष्ण, जय कृष्ण" - इस प्रकार कहते हुए, गोमती के जल में तथा महासागर के तट पर स्नान करके, अत्यंत हर्षित हुए कमलासन (ब्रह्मा) ने श्रीमान् कृष्ण की पूजा की।
श्लोक 47 (skanda.7.479.47)
स्वर्धेनुपयसा स्नाप्य दिव्यैश्चामृतपंचकैः । भवश्चाथ भवानी च पूजयामास भक्तितः ॥ ४७ ॥
svardhenupayasā snāpya divyaiścāmṛtapaṁcakaiḥ | bhavaścātha bhavānī ca pūjayāmāsa bhaktitaḥ || 47 ||
कामधेनु के दूध से स्नान कराकर तथा दिव्य पंचामृत से भी, शिव और भवानी ने भक्तिपूर्वक पूजा की।
श्लोक 48 (skanda.7.479.48)
इन्द्रो देवगणाः सर्वे योगिनः सनकादयः । ऋषयो नारदाद्याश्च गंगाद्याश्च सरिद्वराः ॥ ४८ ॥
indro devagaṇāḥ sarve yoginaḥ sanakādayaḥ | ṛṣayo nāradādyāśca gaṅgādyāśca saridvarāḥ || 48 ||
इंद्र, समस्त देवगण, सनक आदि योगी, नारद आदि ऋषि, तथा गंगा आदि श्रेष्ठ नदियों ने भी पूजा की।
श्लोक 49 (skanda.7.479.49)
अमूल्याभरणैर्भक्त्या महारत्नविनिर्मितैः । दिव्यैर्माल्यैरनेकैश्च नन्दनादिसमुद्भवैः ॥ ४९ ॥
amūlyābharaṇairbhaktyā mahāratnavinirmitaiḥ | divyairmālyairanekaiśca nandanādisamudbhavaiḥ || 49 ||
महारत्नों से निर्मित अमूल्य आभूषणों से, तथा नंदनवन आदि में उत्पन्न अनेक दिव्य मालाओं से, भक्तिपूर्वक पूजा की।
श्लोक 50 (skanda.7.479.50)
प्रियया श्रीतुलस्या वै श्रीमत्कृष्णमपूजयन् । धूपैर्नीराजनैर्दिव्यैः कर्पूरैश्च पृथक्पृथक् ॥ ५० ॥
priyayā śrītulasyā vai śrīmatkṛṣṇamapūjayan | dhūpairnīrājanairdivyaiḥ karpūraiśca pṛthakpṛthak || 50 ||
कृष्ण की प्रिय श्री तुलसी से, धूप से, दिव्य आरतियों से तथा कर्पूर से अलग-अलग श्रीमान् कृष्ण की पूजा की।
श्लोक 51 (skanda.7.479.51)
नैवेद्यैर्विविधैः पुष्पैर्दिव्यैः कर्पूरवासितैः । सकर्पूरैश्च तांबूलैः प्रियैश्चोपायनैस्तथा ॥ ५१ ॥
naivedyairvividhaiḥ puṣpairdivyaiḥ karpūravāsitaiḥ | sakarpūraiśca tāṁbūlaiḥ priyaiścopāyanaistathā || 51 ||
विविध नैवेद्यों से, कर्पूर से सुवासित दिव्य पुष्पों से, कर्पूरयुक्त तांबूल से तथा प्रिय भेंटों से भी पूजा की।
श्लोक 52 (skanda.7.479.52)
महामांगलिकैः सर्वैः सुदिव्यैर्मंगलाऽऽर्तिकैः । संपूज्यैवं महाविष्णुं कृष्णं क्लेशविनाशनम् । प्रहृष्टा ननृतुः सर्वे गीतवाद्यप्रहर्षिताः ॥ ५२ ॥
mahāmāṁgalikaiḥ sarvaiḥ sudivyairmaṁgalārtikaiḥ | saṁpūjyaivaṁ mahāviṣṇuṁ kṛṣṇaṁ kleśavināśanam | praharṣitā nanṛtuḥ sarve gītavādyapraharṣitāḥ || 52 ||
सभी महामांगलिक तथा दिव्य मंगल-आरतियों से, इस प्रकार महाविष्णु क्लेश-विनाशक कृष्ण की पूजा करके, सभी हर्षित होकर गीत-वाद्य से प्रसन्न होते हुए नाचने लगे।
श्लोक 53 (skanda.7.479.53)
पुरतः कृष्णदेवस्य ह्यप्सरोभिः समन्विताः । ब्रह्मा च ब्रह्मपुत्राश्च ततः सेन्द्रा मरुद्गणाः ॥ ५३ ॥
purataḥ kṛṣṇadevasya hyapsarobhiḥ samanvitāḥ | brahmā ca brahmaputrāśca tataḥ sendrā marudgaṇāḥ || 53 ||
भगवान् कृष्ण के सामने अप्सराओं सहित, ब्रह्मा, ब्रह्मपुत्र तथा इंद्र सहित मरुद्गण नाचने लगे।
श्लोक 54 (skanda.7.479.54)
ब्रह्मादीन्नृत्यतः प्रेक्ष्य भगवान्कमलेक्षणः । वारयामास हस्तेन प्रीतः प्राह सुरान्विभुः ॥ ५४ ॥
brahmādīnnṛtyataḥ prekṣya bhagavānkamalekṣaṇaḥ | vārayāmāsa hastena prītaḥ prāha surānvibhuḥ || 54 ||
ब्रह्मा आदि को नाचते हुए देखकर, कमल-नयन भगवान् ने हाथ से उन्हें रोका, और प्रसन्न होकर विभु ने देवताओं से कहा।
श्लोक 55 (skanda.7.479.55)
श्रीभगवानुवाच । भोभो ब्रह्मन्महेशान हे भवानि महेश्वरि । क्षेत्राणि सर्वतीर्थानि नारदः सनकादयः । प्रीतोऽहं भवता सम्यक्सर्वान्कामानवाप्स्यथ ॥ ५५ ॥
śrībhagavānuvāca | bhobho brahmanmaheśāna he bhavāni maheśvari | kṣetrāṇi sarvatīrthāni nāradaḥ sanakādayaḥ | prīto'haṁ bhavatā samyaksarvānkāmānavāpsyatha || 55 ||
श्रीभगवान् ने कहा - हे ब्रह्मन्! हे महेश! हे भवानी महेश्वरि! हे समस्त क्षेत्रों और तीर्थों! हे नारद! हे सनक आदि! मैं तुम सबसे भली प्रकार प्रसन्न हूँ, तुम सब अपनी समस्त कामनाएँ प्राप्त करोगे।
श्लोक 56 (skanda.7.479.56)
प्रह्लाद उवाच । तदाभिलषितान्ल्लब्ध्वा सर्वान्कामवरानथ । भक्त्या परमया श्रीमत्कृष्णं प्रोचुः प्रहर्षिताः ॥ ५६ ॥
prahlāda uvāca | tadābhilaṣitānllabdhvā sarvānkāmavarānatha | bhaktyā paramayā śrīmatkṛṣṇaṁ procuḥ praharṣitāḥ || 56 ||
प्रह्लाद ने कहा - तब अपनी अभीष्ट समस्त कामनाओं के वर प्राप्त कर, परम भक्तिपूर्वक हर्षित होकर उन्होंने श्रीमान् कृष्ण से कहा।
श्लोक 57 (skanda.7.479.57)
देवा ऊचुः । प्राप्तः कामवरोऽस्माभिः सर्वतः कृपया विभो । सप्रेमा त्वत्पदांभोजे भक्तिर्भव्याऽनपायिनी ॥ ५७ ॥
devā ūcuḥ | prāptaḥ kāmavaro'smābhiḥ sarvataḥ kṛpayā vibho | sapremā tvatpadāṁbhoje bhaktirbhavyā'napāyinī || 57 ||
देवताओं ने कहा - हे विभो! आपकी कृपा से हमने सर्वथा अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया है। अब आपके चरण-कमलों में हमारी प्रेमपूर्ण, कल्याणकारी और अविनाशी भक्ति बनी रहे।
श्लोक 58 (skanda.7.479.58)
प्रह्लाद उवाच । तथैव पूजयामासुः रुक्मिणीं कृष्णवल्लभाम् । अथ ब्रह्मेशानौ सर्वेषां शृण्वतामिदम् ॥ ५८ ॥
prahlāda uvāca | tathaiva pūjayāmāsuḥ rukmiṇīṁ kṛṣṇavallabhām | atha brahmeśānau sarveṣāṁ śṛṇvatāmidam || 58 ||
प्रह्लाद ने कहा - उसी प्रकार उन्होंने कृष्ण की प्रिया रुक्मिणी की भी पूजा की। तब ब्रह्मा और ईशान ने, सबके सुनते हुए, यह कहा।
श्लोक 59 (skanda.7.479.59)
श्रद्धया परया युक्तौ द्वारकां प्रत्यवोचतुः । त्वं देवि सर्वतीर्थानां क्षेत्राणामुत्तमोत्तमा ॥ ५९ ॥
śraddhayā parayā yuktau dvārakāṁ pratyavocatuḥ | tvaṁ devi sarvatīrthānāṁ kṣetrāṇāmuttamottamā || 59 ||
परम श्रद्धा से युक्त होकर उन दोनों ने द्वारका से कहा - हे देवि! तुम समस्त तीर्थों और क्षेत्रों में उत्तमोत्तम हो।
श्लोक 60 (skanda.7.479.60)
पर्वतानां यथा मेरुः सिन्धूनां सागरो यथा । प्राणो यथा शरीराणामिन्द्रियाणां तु वै मनः ॥ ६० ॥
parvatānāṁ yathā meruḥ sindhūnāṁ sāgaro yathā | prāṇo yathā śarīrāṇāmindriyāṇāṁ tu vai manaḥ || 60 ||
जैसे पर्वतों में मेरु, नदियों में समुद्र, शरीरों में प्राण तथा इंद्रियों में मन श्रेष्ठ है,
श्लोक 61 (skanda.7.479.61)
तेजस्विनां यथा वह्निस्तत्त्वानां चैत्त्य ईज्यते । यथा ग्रहर्क्षताराणां सोमो वै ज्योतिषां धुवम् । एषां प्रकाशपुंजानां यथा सूर्य्यः प्रकाशते ॥ ६१ ॥
tejasvināṁ yathā vahnistattvānāṁ caittya ījyate | yathā graharkṣatārāṇāṁ somo vai jyotiṣāṁ dhruvam | eṣāṁ prakāśapuṁjānāṁ yathā sūryaḥ prakāśate || 61 ||
जैसे तेजस्वी वस्तुओं में अग्नि, तत्त्वों में चैतन्य पूजित है, जैसे ग्रह-नक्षत्र-ताराओं में सोम स्थिर ज्योतियों में श्रेष्ठ है, और जैसे इन प्रकाश-पुंजों में सूर्य प्रकाशित होता है,
श्लोक 62 (skanda.7.479.62)
यथा नः सर्वदेवानां महाविष्णुरयं महान् । तथैव सर्वतीर्थानां पूज्येयं द्वारका शुभा ॥ ६२ ॥
yathā naḥ sarvadevānāṁ mahāviṣṇurayaṁ mahān | tathaiva sarvatīrthānāṁ pūjyeyaṁ dvārakā śubhā || 62 ||
जैसे हम सब देवताओं में यह महान् महाविष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही समस्त तीर्थों में यह शुभ द्वारका पूज्य है।
श्लोक 63 (skanda.7.479.63)
प्रह्लाद उवाच । इत्युक्त्वा सर्वदेवानां क्षेत्रादीनां च सत्तमाः । आधिपत्ये सुरेशानौ द्वारकामभिषेचतुः ॥ ६३ ॥
prahlāda uvāca | ityuktvā sarvadevānāṁ kṣetrādīnāṁ ca sattamāḥ | ādhipatye sureśānau dvārakāmabhiṣecatuḥ || 63 ||
प्रह्लाद ने कहा - ऐसा कहकर, समस्त देवताओं और क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ उन दोनों देवेशों ने द्वारका का आधिपत्य पद पर अभिषेक किया।
श्लोक 64 (skanda.7.479.64)
ब्रह्मेशानौ तथा देवाः प्रजेशा ऋषयोऽमलाः । तीर्थानां क्षेत्रराजानां महाराजत्वकारणम् ॥ ६४ ॥
brahmeśānau tathā devāḥ prajeśā ṛṣayo'malāḥ | tīrthānāṁ kṣetrarājānāṁ mahārājatvakāraṇam || 64 ||
ब्रह्मा और ईशान, देवगण, प्रजापतिगण तथा निर्मल ऋषिगण ने, तीर्थों और क्षेत्रराजों में उसके महाराजत्व का कारण बनाते हुए,
श्लोक 65 (skanda.7.479.65)
चक्रुर्महाभिषेकं तु द्वारकायाः प्रहर्षिताः । वादयन्तो विचित्राणि वादित्राणि महोत्सवे ॥ ६५ ॥
cakrurmahābhiṣekaṁ tu dvārakāyāḥ praharṣitāḥ | vādayanto vicitrāṇi vāditrāṇi mahotsave || 65 ||
हर्षित होकर द्वारका का महाभिषेक किया, और उस महोत्सव में विचित्र वाद्य बजाए।
श्लोक 66 (skanda.7.479.66)
दिव्यैः पञ्चामृतैस्तोयैः सर्वतीर्थसमुद्भवैः । पुण्यैश्चाकाशगंगाया दिग्गजानां करोद्धृतैः ॥ ६६ ॥
divyaiḥ pañcāmṛtaistoyaiḥ sarvatīrthasamudbhavaiḥ | puṇyaiścākāśagaṅgāyā diggajānāṁ karoddhṛtaiḥ || 66 ||
दिव्य पंचामृतों से, समस्त तीर्थों से उत्पन्न जलों से, तथा दिग्गजों की सूंडों से उठाए गए आकाशगंगा के पवित्र जल से अभिषेक किया।
श्लोक 67 (skanda.7.479.67)
अथ वासांसि दिव्यानि दत्त्वा चाऽऽचमनं तथा । चर्चितां चन्दनैर्दिव्यैर्दिव्याभरणभूषिताम् ॥ ६७ ॥
atha vāsāṁsi divyāni dattvā cācamanaṁ tathā | carcitāṁ candanairdivyairdivyābharaṇabhūṣitām || 67 ||
फिर दिव्य वस्त्र और आचमन अर्पित करके, दिव्य चंदन से अनुलेपित तथा दिव्य आभूषणों से विभूषित करके,
श्लोक 68 (skanda.7.479.68)
पूजां च चक्रिरे पुष्पैश्चंदनादिसमुद्भवैः । तदा जाता महादिव्या पुरुषाः पार्षदा हरेः ॥ ६८ ॥
pūjāṁ ca cakrire puṣpaiścaṁdanādisamudbhavaiḥ | tadā jātā mahādivyā puruṣāḥ pārṣadā hareḥ || 68 ||
तथा चंदन आदि से उत्पन्न पुष्पों से पूजा की। तभी हरि के महादिव्य पार्षद पुरुष वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 69 (skanda.7.479.69)
विष्वक्सेनसुनंदाद्या द्योतयन्तो दिशो दश । जयशब्दं नमःशब्दं वदंतः पुष्पवर्षिणः ॥ ६९ ॥
viṣvaksenasunaṁdādyā dyotayanto diśo daśa | jayaśabdaṁ namaḥśabdaṁ vadaṁtaḥ puṣpavarṣiṇaḥ || 69 ||
विष्वक्सेन, सुनंद आदि, दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, जय-शब्द और नमः-शब्द बोलते हुए, पुष्पों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 70 (skanda.7.479.70)
गीतवादित्रघोषेण नृत्यमानाः प्रहर्षिताः । किरीटकुण्डलैर्हारैर्वैजयंत्या विभूषिताः ॥ ७० ॥
gītavāditraghoṣeṇa nṛtyamānāḥ praharṣitāḥ | kirīṭakuṇḍalairhārairvaijayaṁtyā vibhūṣitāḥ || 70 ||
गीत-वाद्य की ध्वनि से नाचते हुए हर्षित, मुकुट, कुंडल, हार तथा वैजयंती माला से विभूषित हरि के पार्षद,
श्लोक 71 (skanda.7.479.71)
श्यामाश्चतुर्भुजाः पीतवस्त्रमाल्यैर्विभूषिताः । स्वप्रभा दीप्यमानौ ते दृष्ट्वा ब्रह्ममहेश्वरौ ॥ ७१ ॥
śyāmāścaturbhujāḥ pītavastramālyairvibhūṣitāḥ | svaprabhā dīpyamānau te dṛṣṭvā brahmeśvarau || 71 ||
श्याम वर्ण, चतुर्भुज, पीत वस्त्र-माल्यों से विभूषित तथा अपनी प्रभा से देदीप्यमान वे पार्षद, ब्रह्मा और महेश्वर को देखकर,
श्लोक 72 (skanda.7.479.72)
नारदं सनकादींश्च महाभागवतानृषीन् । तेऽपि तानपि संहृष्टाः प्रहर्षागतसंभ्रमाः ॥ ७२ ॥
nāradaṁ sanakādīṁśca mahābhāgavatānṛṣīn | te'pi tānapi saṁhṛṣṭāḥ praharṣāgatasaṁbhramāḥ || 72 ||
तथा नारद, सनक आदि महान् भागवत ऋषियों को देखकर, वे भी अत्यंत हर्षित तथा हर्ष से उत्पन्न उत्सुकता से भर गए।
श्लोक 73 (skanda.7.479.73)
ववंदिरे ततोऽन्योऽन्यं हृष्टा आलिंगनादिभिः । ऋषयोऽन्ये च देवाश्च प्रणेमुर्विष्णुपार्षदान् ॥ ७३ ॥
avaṁdire tato'nyonyaṁ hṛṣṭā āliṁganādibhiḥ | ṛṣayo'nye ca devāśca praṇemurviṣṇupārṣadān || 73 ||
तब वे परस्पर हर्षित होकर आलिंगन आदि से एक-दूसरे को नमन करने लगे। अन्य ऋषिगण और देवगण भी विष्णु के पार्षदों को प्रणाम करने लगे।
श्लोक 74 (skanda.7.479.74)
अथ ते समुपागम्य द्वारकां विष्णुपार्षदाः । नत्वाऽथ द्वारकानाथं द्वारकां वै तथैव च ॥ ७४ ॥
atha te samupāgamya dvārakāṁ viṣṇupārṣadāḥ | natvātha dvārakānāthaṁ dvārakāṁ vai tathaiva ca || 74 ||
फिर वे विष्णु के पार्षद द्वारका के पास आकर, द्वारकानाथ को और उसी प्रकार द्वारका को भी नमन करके,
श्लोक 75 (skanda.7.479.75)
संपूज्य श्रद्धया भक्त्या निःश्रेयसवनोद्भवैः । कुसुमैर्विविधैर्दिव्यैस्तुलस्या तद्वनोत्थया ॥ ७५ ॥
saṁpūjya śraddhayā bhaktyā niḥśreyasavanodbhavaiḥ | kusumairvividhairdivyaistulasyā tadvanotthayā || 75 ||
श्रद्धा और भक्ति से, निःश्रेयसवन में उत्पन्न विविध दिव्य पुष्पों से तथा उसी वन से उत्पन्न तुलसी से पूजा करके,
श्लोक 76 (skanda.7.479.76)
तदुत्पन्नैः फलैर्दिव्यैर्धूपैर्नीराजनैः प्रभुम् । विविधैश्चान्नतांबूलैर्दत्त्वा कृष्णमतोषयन् ॥ ७६ ॥
tadutpannaiḥ phalairdivyairdhūpairnīrājanaiḥ prabhum | vividhaiścānnatāṁbūlairdattvā kṛṣṇamatoṣayan || 76 ||
उसी वन में उत्पन्न दिव्य फलों से, धूप से, आरती से, तथा विविध अन्न और तांबूल अर्पित कर, उन्होंने प्रभु कृष्ण को संतुष्ट किया।
श्लोक 77 (skanda.7.479.77)
क्षेत्रतीर्थादिराजानां महाराजस्त्वमीश्वरि । इति सर्वे वदन्तस्तु द्वारकां च ववंदिरे ॥ ७७ ॥
kṣetratīrthādirājānāṁ mahārājastvamīśvari | iti sarve vadantastu dvārakāṁ ca avaṁdire || 77 ||
"हे ईश्वरि! तुम क्षेत्रों और तीर्थों के राजाओं में महाराज हो" - ऐसा कहते हुए सबने द्वारका की वंदना की।
श्लोक 78 (skanda.7.479.78)
एतस्मिन्नंतरे विप्रा देवदुन्दुभिनिस्वनाः । अश्रूयंत महाशब्दा अभवन्पुष्पवृष्टयः ॥ ७८ ॥
etasminnaṁtare viprā devadundubhinisvanāḥ | aśrūyaṁta mahāśabdā abhavanpuṣpavṛṣṭayaḥ || 78 ||
हे विप्रो! इसी बीच देव-दुंदुभियों के स्वर सुनाई देने लगे, महाध्वनियाँ गूँजने लगीं, और पुष्पों की वर्षा होने लगी।
श्लोक 79 (skanda.7.479.79)
अथाऽऽसीन्महदाश्चर्य्यं शृण्वन्तु ऋषिसत्तमाः । कुरुक्षेत्रं प्रयागं च सव्यदक्षिणपार्श्वयोः ॥ ७९ ॥
athāsīnmahadāścaryaṁ śṛṇvantu ṛṣisattamāḥ | kurukṣetraṁ prayāgaṁ ca savyadakṣiṇapārśvayoḥ || 79 ||
तब एक महान् आश्चर्य हुआ, हे श्रेष्ठ ऋषियो! सुनो - कुरुक्षेत्र और प्रयाग, बाएँ और दाएँ पार्श्व में,
श्लोक 80 (skanda.7.479.80)
स्थित्वा जगृहतुर्द्दिव्ये श्वेतच्छत्रे मनोहरे । द्वारकायस्तथा शुभ्रे चामरव्यजने शुभे ॥ ८० ॥
sthitvā jagṛhaturdivye śvetacchatre manohare | dvārakāyastathā śubhre cāmaravyajane śubhe || 80 ||
वहाँ खड़े होकर द्वारका के मनोहर दिव्य श्वेत छत्र और शुभ्र, शुभ चामर-व्यजन को धारण करने लगे।
श्लोक 81 (skanda.7.479.81)
अयोध्या मथुरा माया वाराणसी जयस्वनैः । स्तुवंत्यन्यास्तथान्यानि सर्वक्षेत्राणि सर्वशः ॥ ८१ ॥
ayodhyā mathurā māyā vārāṇasī jayasvanaiḥ | stuvantyanyāstathānyāni sarvakṣetrāṇi sarvaśaḥ || 81 ||
अयोध्या, मथुरा, माया, वाराणसी तथा अन्य समस्त क्षेत्र, जय-घोषों के साथ सब ओर से स्तुति करने लगे।
श्लोक 82 (skanda.7.479.82)
तीर्थानि सरितः सर्वा द्वारकाया मुखांबुजम् । पश्यतः परमानंदं लेभिरे देवमानवाः ॥ ८२ ॥
tīrthāni saritaḥ sarvā dvārakāyā mukhāṁbujam | paśyataḥ paramānaṁdaṁ lebhire devamānavāḥ || 82 ||
समस्त तीर्थ और नदियाँ द्वारका के मुख-कमल को देखते हुए आनंदित हुईं, और देव-मानव सबने परम आनंद प्राप्त किया।
श्लोक 83 (skanda.7.479.83)
आहुश्च पार्षदा विष्णोर्धन्यान्येतानि सर्वशः । दृष्ट्वा तु द्वारकां पुण्यां सर्वलोकैकमण्डनाम् ॥ ८३ ॥
āhuśca pārṣadā viṣṇordhanyānyetāni sarvaśaḥ | dṛṣṭvā tu dvārakāṁ puṇyāṁ sarvalokaikamaṇḍanām || 83 ||
विष्णु के पार्षदों ने कहा - ये सब सर्वथा धन्य हैं, जिन्होंने समस्त लोकों की एकमात्र शोभा, इस पुण्यमयी द्वारका को देखा है।
श्लोक 84 (skanda.7.479.84)
वेदयज्ञतपोजाप्यैः सम्यगाराधितो हरिः । प्रसीदेद्यस्य तस्य स्याद्द्वारकागमने मतिः ॥ ८४ ॥
vedayajñatapojāpyaiḥ samyagārādhito hariḥ | prasīdedyasya tasya syāddvārakāgamane matiḥ || 84 ||
वेद, यज्ञ, तप और जप से जिस व्यक्ति पर हरि भली प्रकार आराधित होकर प्रसन्न होते हैं, उसी को द्वारका जाने की बुद्धि प्राप्त होती है।