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प्रभास खण्ड · अध्याय 481

द्वारका-पथिक के दर्शन मात्र से पाप-वज्रलेप के नाश का वर्णन (दिलीप कथा)

अध्याय 480अध्याय-सूचीअध्याय 482

श्लोक 1 (skanda.7.481.1)

श्रीप्रह्लाद उवाच । एवमद्भुतमाहात्म्यं द्वारकायां मुनीश्वराः । सर्वेषां क्षेत्रतीर्थानां महापापविदारकम् ॥ १ ॥

śrīprahlāda uvāca | evamadbhutamāhātmyaṁ dvārakāyāṁ munīśvarāḥ | sarveṣāṁ kṣetratīrthānāṁ mahāpāpavidārakam || 1 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - हे मुनीश्वरो! इस प्रकार द्वारका का यह अद्भुत माहात्म्य समस्त क्षेत्रों और तीर्थों के महापापों का विदारक है।

श्लोक 2 (skanda.7.481.2)

वर्णानामाश्रमाणां च पतितानां विशेषतः । महापापहरं प्रोक्तं महापुण्यविवर्द्धनम् ॥ २ ॥

varṇānāmāśramāṇāṁ ca patitānāṁ viśeṣataḥ | mahāpāpaharaṁ proktaṁ mahāpuṇyavivardhanam || 2 ||

यह वर्णों, आश्रमों तथा विशेष रूप से पतितों के महापापों का हरण करने वाला और महापुण्य को बढ़ाने वाला कहा गया है।

श्लोक 3 (skanda.7.481.3)

अत्युग्रपापराशीनां दाहस्थानं यथा स्मृतम् । द्वारकागमनं विप्राः किं पुनर्द्वारकास्थितिः ॥ ३ ॥

atyugrapāparāśīnāṁ dāhasthānaṁ yathā smṛtam | dvārakāgamanaṁ viprāḥ kiṁ punardvārakāsthitiḥ || 3 ||

जैसा वर्णित है, यह अत्यंत उग्र पापराशियों के जलाने का स्थान है - हे विप्रो! यह फल तो केवल द्वारका में जाने मात्र से है, फिर द्वारका में निवास का तो कहना ही क्या!

श्लोक 4 (skanda.7.481.4)

विशेषेण तु विप्रेन्द्राः कन्याराशिस्थिते गुरौ । ब्रह्मादयोपि दृश्यंते यत्र तीर्थैश्च संयुताः ॥ ४ ॥

viśeṣeṇa tu viprendrāḥ kanyārāśisthite gurau | brahmādayo'pi dṛśyaṁte yatra tīrthaiśca saṁyutāḥ || 4 ||

हे विप्रेंद्रो! विशेष रूप से जब बृहस्पति कन्या राशि में स्थित होते हैं, तब वहाँ ब्रह्मा आदि भी तीर्थों सहित दिखाई देते हैं।

श्लोक 5 (skanda.7.481.5)

प्रतिवर्षं प्रकुर्वंति द्वारकागमनं नराः । तेषां पादरजः स्पृष्ट्वा दिवं यांति च पापिनः ॥ ५ ॥

prativarṣaṁ prakurvaṁti dvārakāgamanaṁ narāḥ | teṣāṁ pādarajaḥ spṛṣṭvā divaṁ yāṁti ca pāpinaḥ || 5 ||

जो मनुष्य प्रतिवर्ष द्वारका-यात्रा करते हैं, उनके चरण-रज का स्पर्श करके पापी भी स्वर्ग को चले जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.481.6)

गोमती नीरपूतानां कृष्णवक्त्रावलोकिनाम् । दर्शनात्पातकं तेषां याति जन्मशतार्जितम् ॥ ६ ॥

gomatī nīrapūtānāṁ kṛṣṇavaktrāvalokinām | darśanātpātakaṁ teṣāṁ yāti janmaśatārjitam || 6 ||

गोमती के जल से पवित्र हुए तथा कृष्ण के मुख का अवलोकन करने वालों के - दर्शन मात्र से सौ जन्मों में अर्जित पातक भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.7.481.7)

इतिहासेन पूर्वोक्तं श्रूयतां मुनिपुङ्गवाः । दिलीपवसिष्ठ संवादे परमाश्चर्य्यवर्द्धनम् ॥ ७ ॥

itihāsena pūrvoktaṁ śrūyatāṁ munipuṁgavāḥ | dilīpavasiṣṭha saṁvāde paramāścaryavardhanam || 7 ||

हे मुनिपुंगवो! इस विषय में पहले कहा गया एक इतिहास सुनो, जो दिलीप-वसिष्ठ संवाद में परम आश्चर्य को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 8 (skanda.7.481.8)

काश्यां तु वज्रलेपो हि क्षेत्र एकत्र नश्यति । यातुर्दर्शनतः श्रुत्वा दिलीपो वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥

kāśyāṁ tu vajralepo hi kṣetra ekatra naśyati | yāturdarśanataḥ śrutvā dilīpo vākyamabravīt || 8 ||

काशी में उत्पन्न वज्रलेप एक ही क्षेत्र के दर्शन से नष्ट हो जाता है - यात्री के दर्शन की यह बात सुनकर दिलीप ने वचन कहा।

श्लोक 9 (skanda.7.481.9)

दिलीप उवाच । वज्रलेपश्च काश्यां तु घोरो यत्र विनश्यति । कृत्स्नशोऽथ महापुण्यं प्राप्यं यत्र तदस्ति किम् ॥ ९ ॥

dilīpa uvāca | vajralepaśca kāśyāṁ tu ghoro yatra vinaśyati | kṛtsnaśo'tha mahāpuṇyaṁ prāpyaṁ yatra tadasti kim || 9 ||

दिलीप ने कहा - काशी में उत्पन्न वह घोर वज्रलेप जिस स्थान पर सर्वथा नष्ट हो जाता है, तथा जहाँ महापुण्य प्राप्त होता है - वह स्थान कौन-सा है?

श्लोक 10 (skanda.7.481.10)

न प्ररोहंति पापानि यस्मिन्क्षेत्रे द्विजोत्तम । तत्क्षेत्रं कथ्यतां पुण्यं यत्र पापं प्रणश्यति ॥ १० ॥

na prarohaṁti pāpāni yasminkṣetre dvijottama | tatkṣetraṁ kathyatāṁ puṇyaṁ yatra pāpaṁ praṇaśyati || 10 ||

हे द्विजोत्तम! जिस क्षेत्र में पाप अंकुरित नहीं होते, वह पुण्य क्षेत्र बतलाइए, जहाँ पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 11 (skanda.7.481.11)

वसिष्ठ उवाच । आसीत्काश्यां पुरा कश्चित्त्रिदण्डी मोक्षधर्मवित् । जपन्दशाश्वमेधे तु गायत्रीं च समाहितः ॥ ११ ॥

vasiṣṭha uvāca | āsītkāśyāṁ purā kaścittridaṇḍī mokṣadharmavit | japandaśāśvamedhe tu gāyatrīṁ ca samāhitaḥ || 11 ||

वसिष्ठ ने कहा - पूर्वकाल में काशी में कोई त्रिदंडी संन्यासी था, जो मोक्षधर्म का ज्ञाता था, तथा दशाश्वमेध घाट पर एकाग्रचित्त होकर गायत्री का जप करता था।

श्लोक 12 (skanda.7.481.12)

तत्र काचित्समायाता युवती गजगामिनी । तीरे संस्थाप्य वासांसि गंगायाः श्रमशान्तये । प्रविष्टा च जले नग्ना जलक्रीडां चकार ह ॥ १२ ॥

tatra kācitsamāyātā yuvatī gajagāminī | tīre saṁsthāpya vāsāṁsi gaṁgāyāḥ śramaśāṁtaye | praviṣṭā ca jale nagnā jalakrīḍāṁ cakāra ha || 12 ||

वहाँ कोई गजगामिनी युवती आई, जो थकान मिटाने के लिए गंगा के तट पर अपने वस्त्र रखकर, नग्न होकर जल में प्रविष्ट हुई और जलक्रीड़ा करने लगी।

श्लोक 13 (skanda.7.481.13)

नग्नां तां क्रीडतीं वीक्ष्य यतिर्मदनपूरितः । दैवाग्निभ्रंशितो मार्गात्सहसा च विमोहितः ॥ १३ ॥

nagnāṁ tāṁ krīḍatīṁ vīkṣya yatirmadanapūritaḥ | daivāgnibhraṁśito mārgātsahasā ca vimohitaḥ || 13 ||

उस नग्न क्रीड़ा करती हुई को देखकर वह संन्यासी काम से भर गया, दैव-दुर्योग से मार्ग से च्युत होकर सहसा मोहित हो गया।

श्लोक 14 (skanda.7.481.14)

मनसा कामयामास साऽपि तं तरुणं यतिम् । तयोश्च संगतिस्तत्र संजाता पापकर्मणोः ॥ १४ ॥

manasā kāmayāmāsa sā'pi taṁ taruṇaṁ yatim | tayośca saṁgatistatra saṁjātā pāpakarmaṇoḥ || 14 ||

वह भी मन में उस युवा संन्यासी को चाहने लगी। उन दोनों पापकर्मियों का वहाँ संगम हो गया।

श्लोक 15 (skanda.7.481.15)

तया विमोहितः सद्यस्तामेवानुससार सः । तत्प्रीत्यै चार्जयामास धनमन्यायतस्तदा ॥ १५ ॥

tayā vimohitaḥ sadyastāmevānusasāra saḥ | tatprītyai cārjayāmāsa dhanamanyāyatastadā || 15 ||

उसके द्वारा मोहित होकर वह तुरंत उसी का अनुसरण करने लगा, और उसे प्रसन्न करने के लिए अन्याय से धन अर्जित करने लगा।

श्लोक 16 (skanda.7.481.16)

वाराणस्यां हि न त्यक्तश्चंडालस्य प्रतिग्रहः । स्नानहीनः सदा पापी रात्रौ चौर्य्येण वर्त्तते ॥ १६ ॥

vārāṇasyāṁ hi na tyaktaścaṁḍālasya pratigrahaḥ | snānahīnaḥ sadā pāpī rātrau cauryeṇa varttate || 16 ||

वाराणसी में उसने चंडाल का दिया हुआ भी नहीं छोड़ा। स्नान से रहित वह सदा पापी रात में चोरी से जीवन-यापन करने लगा।

श्लोक 17 (skanda.7.481.17)

कस्मिंश्चित्समये पापी मांसार्थी तु वनं गतः । ददर्श प्रमदां तत्र मातंगीं मदिरेक्षणाम् ॥ १७ ॥

kasmiṁścitsamaye pāpī māṁsārthī tu vanaṁ gataḥ | dadarśa pramadāṁ tatra mātaṁgīṁ madirekṣaṇām || 17 ||

किसी समय वह पापी मांस की इच्छा से वन में गया, वहाँ उसने मादक नेत्रों वाली एक चांडाल स्त्री को देखा।

श्लोक 18 (skanda.7.481.18)

तस्याः प्रथमतारुण्यं दृष्ट्वा गर्वेण पाप्मना । वनेऽथ निर्जने तत्र मातंगीसंगमेयिवान् ॥ १८ ॥

tasyāḥ prathamataruṇyaṁ dṛṣṭvā garveṇa pāpmanā | vane'tha nirjane tatra mātaṁgīsaṁgameyivān || 18 ||

उसके प्रथम यौवन को देखकर, अहंकार और पाप-भाव से, उस निर्जन वन में उसने उस चांडाल स्त्री के साथ संगम किया।

श्लोक 19 (skanda.7.481.19)

तया सहान्नपानादि कृतवान्पापमोहितः । अश्नाति सुरया पंकं गोमांसं पापलंपटः ॥ १९ ॥

tayā sahānnapānādi kṛtavānpāpamohitaḥ | aśnāti surayā paṁkaṁ gomāṁsaṁ pāpalaṁpaṭaḥ || 19 ||

पाप से मोहित होकर उसने उसके साथ अन्न-पान आदि किया। वह पाप में आसक्त होकर सुरा के साथ अभक्ष्य पदार्थ और गोमांस खाने लगा।

श्लोक 20 (skanda.7.481.20)

तद्गृहे निधनं प्राप्तः पापात्मा सर्वभक्षकः । वाराणसीप्रभावेन न प्राप्तो नरकं तदा ॥ २० ॥

tadgṛhe nidhanaṁ prāptaḥ pāpātmā sarvabhakṣakaḥ | vārāṇasīprabhāvena na prāpto narakaṁ tadā || 20 ||

उस पापात्मा सर्वभक्षक ने उसी के घर में मृत्यु पाई। किंतु वाराणसी के प्रभाव से वह उस समय नरक को प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 21 (skanda.7.481.21)

किं तु तत्र कृतं पापं वज्रलेपं सुदारुणम् । शूद्रीसंपर्क पापेन जातोऽसौ क्रूरयोनिषु ॥ २१ ॥

kiṁ tu tatra kṛtaṁ pāpaṁ vajralepaṁ sudāruṇam | śūdrīsaṁparka pāpena jāto'sau krūrayoniṣu || 21 ||

किंतु वहाँ किया गया पाप, अत्यंत भयंकर वज्रलेप बन गया। शूद्रा-संपर्क के पाप से वह क्रूर योनियों में उत्पन्न हुआ।

श्लोक 22 (skanda.7.481.22)

वृको व्याघ्रोरगः श्वानः शृगालः सूकरोऽभवत् । दुरंतां यातनां प्राप्तः शमलेशं न विन्दति ॥ २२ ॥

vṛko vyāghrorgaḥ śvānaḥ śṛgālaḥ sūkaro'bhavat | duraṁtāṁ yātanāṁ prāptaḥ śamaleśaṁ na vindati || 22 ||

वह भेड़िया, बाघ, सर्प, कुत्ता, सियार तथा सूअर बना। भयंकर यातना पाकर भी उसके पाप का लेश भी क्षीण नहीं हुआ।

श्लोक 23 (skanda.7.481.23)

एवं जन्मसहस्रैस्तु न तस्य पापकर्मणः । मातंग्या संगजं पापं व्यनश्यत युगायुतैः ॥ २३ ॥

evaṁ janmasahasraistu na tasya pāpakarmaṇaḥ | mātaṁgyā saṁgajaṁ pāpaṁ vyanaśyata yugāyutaiḥ || 23 ||

इस प्रकार सहस्रों जन्मों में भी उस पापकर्मा का, चांडाली के संगम से उत्पन्न पाप, दस हजार युगों में भी नष्ट नहीं हुआ।

श्लोक 24 (skanda.7.481.24)

ततोऽसौ सप्तमे जातः शशकश्चैव जन्मनि । ततोऽसौ राक्षसो जातः पापात्मा सर्वभक्षकः ॥ २४ ॥

tato'sau saptame jātaḥ śaśakaścaiva janmani | tato'sau rākṣaso jātaḥ pāpātmā sarvabhakṣakaḥ || 24 ||

फिर वह सातवें जन्म में खरगोश बना। तत्पश्चात् वह पापात्मा सर्वभक्षक राक्षस बना।

श्लोक 25 (skanda.7.481.25)

प्राणिनो भक्षयन्सर्वान्संप्राप्तो विंध्यपर्वते । अस्मादनन्तरं भाव्यं कृकलासत्वमद्भुतम् ॥ २५ ॥

prāṇino bhakṣayansarvānsaṁprāpto viṁdhyaparvate | asmādanaṁtaraṁ bhāvyaṁ kṛkalāsatvamadbhutam || 25 ||

वह समस्त प्राणियों को खाता हुआ विंध्य पर्वत पर पहुँचा। इसके बाद उसे अद्भुत गिरगिट-योनि प्राप्त होने वाली थी।

श्लोक 26 (skanda.7.481.26)

शूद्रीसंगजपापेन भाव्यं च कृमियोनिना । मातंगीसंगमे प्रोक्तं फलं ह्यतिजुगुप्सितम् ॥ २६ ॥

śūdrīsaṁgajapāpena bhāvyaṁ ca kṛmiyoninā | mātaṁgīsaṁgame proktaṁ phalaṁ hyatijugupsitam || 26 ||

शूद्रा-संगमजनित पाप के कारण उसे कृमि-योनि भी प्राप्त होनी थी - चांडाली-संगम का यह फल अत्यंत घृणित कहा गया है।

श्लोक 27 (skanda.7.481.27)

युगायुतं सहस्रैस्तु भोक्ष्यमाणं सुदारुणम् । अत्याश्चर्य्यमभूत्तत्र दिलीप श्रूयतां महत् ॥ २७ ॥

yugāyutaṁ sahasraistu bhokṣyamāṇaṁ sudāruṇam | atyāścaryamabhūttatra dilīpa śrūyatāṁ mahat || 27 ||

दस हजार युगों तक सहस्रों योनियों में उसे यह अत्यंत भयंकर फल भोगना था। हे दिलीप! तभी वहाँ एक महान् आश्चर्य हुआ, सुनो।

श्लोक 28 (skanda.7.481.28)

आलोकितं च विंध्याद्रौ सर्वेषां विस्मयास्पदम् । दृष्ट्वा द्वारावतीं कश्चित्कृष्णवक्त्रं सुशोभनम् ॥ २८ ॥

ālokitaṁ ca viṁdhyādrau sarveṣāṁ vismayāspadam | dṛṣṭvā dvārāvatīṁ kaścitkṛṣṇavaktraṁ suśobhanam || 28 ||

विंध्याचल पर सबके लिए विस्मय का स्थान वह घटना दिखाई दी - किसी यात्री ने श्रीद्वारवती और कृष्ण के सुंदर मुख को देखा था।

श्लोक 29 (skanda.7.481.29)

गोमतीनीरपूतस्तु विंध्यं प्राप्तः स पांथिकः । मात्रां कृष्णप्रसादस्य स्कन्धे कृत्वा प्रहर्षितः ॥ २९ ॥

gomatīnīrapūtastu viṁdhyaṁ prāptaḥ sa pāṁthikaḥ | mātrāṁ kṛṣṇaprasādasya skandhe kṛtvā praharṣitaḥ || 29 ||

गोमती के जल से पवित्र हुआ वह पथिक विंध्य पर्वत पर पहुँचा, कृष्ण के प्रसाद की मात्रा को कंधे पर धारण करके अत्यंत हर्षित था।

श्लोक 30 (skanda.7.481.30)

प्रयास्यन्स्वगृहं तत्र ददर्श पथि राक्षसम् । द्रुतं च क्रूरकर्माणं दृष्ट्वा भक्षितुमागतम् ॥ ३० ॥

prayāsyansvagṛhaṁ tatra dadarśa pathi rākṣasam | drutaṁ ca krūrakarmāṇaṁ dṛṣṭvā bhakṣitumāgatam || 30 ||

अपने घर की ओर जाते हुए उसने मार्ग में एक राक्षस को देखा, जो क्रूर कर्म वाला और उसे भक्षण करने के लिए तेजी से आया हुआ देखा गया।

श्लोक 31 (skanda.7.481.31)

तस्य दर्शनमात्रेण वज्रलेपः सुदारुणः । वाराणसीसमुद्भूतो भस्मसादभवत्क्षणात् ॥ ३१ ॥

tasya darśanamātreṇa vajralepaḥ sudāruṇaḥ | vārāṇasīsamudbhūto bhasmasādabhavatkṣaṇāt || 31 ||

उसके दर्शन मात्र से ही वाराणसी में उत्पन्न वह अत्यंत भयंकर वज्रलेप क्षणभर में भस्म हो गया।

श्लोक 32 (skanda.7.481.32)

जन्मकोटिशतेनापि यो न शक्यो व्यपोहितुम् । तत्पापपर्वतान्मुक्तः कृष्णपांथिकदर्शनात् ॥ ३२ ॥

janmakoṭiśatenāpi yo na śakyo vyapohitum | tatpāpaparvatānmuktaḥ kṛṣṇapāṁthikadarśanāt || 32 ||

जिसे सौ करोड़ जन्मों में भी दूर नहीं किया जा सकता था, उस पाप-पर्वत से वह कृष्ण के पथिक के दर्शन मात्र से मुक्त हो गया।

श्लोक 33 (skanda.7.481.33)

दग्धेऽथ क्रूरभावे तु घनमुक्तो यथा शशी । रेजे पुण्यप्रकाशेन कृष्णपांथिकदर्शनात् ॥ ३३ ॥

dagdhe'tha krūrabhāve tu ghanamukto yathā śaśī | reje puṇyaprakāśena kṛṣṇapāṁthikadarśanāt || 33 ||

उसका क्रूर स्वभाव भस्म हो जाने पर, जैसे बादलों से मुक्त चंद्रमा शोभित होता है, वह भी कृष्ण-पथिक के दर्शन से उत्पन्न पुण्य-प्रकाश से सुशोभित हो गया।

श्लोक 34 (skanda.7.481.34)

ततोऽभिमुखमभ्येत्य द्वारकापथिकं मुदा । ननाम श्रद्धया भूमौ तद्दर्शनमहोत्सवः ॥ ३४ ॥

tato'bhimukhamabhyetya dvārakāpathikaṁ mudā | nanāma śraddhayā bhūmau taddarśanamahotsavaḥ || 34 ||

तब वह प्रसन्नतापूर्वक द्वारका के पथिक के सम्मुख आया और श्रद्धापूर्वक पृथ्वी पर प्रणाम किया - उसके दर्शन का वह महोत्सव था।

श्लोक 35 (skanda.7.481.35)

नत्वाऽथ विस्मितः प्राह अहोऽद्य तव दर्शनात् । गतो घोरतमो भावः प्राप्ता संसिद्धिरुत्तमा ॥ ३५ ॥

natvā'tha vismitaḥ prāha aho'dya tava darśanāt | gato ghoratamo bhāvaḥ prāptā saṁsiddhiruttamā || 35 ||

नमन करके, विस्मित होकर उसने कहा - "आज तुम्हारे दर्शन से मेरा अत्यंत घोर भाव नष्ट हो गया और मुझे उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है।

श्लोक 36 (skanda.7.481.36)

कस्मात्त्वमागतो भद्र प्रभावः कीदृशस्तव । वज्रलेपस्तु काश्यां वै दग्धस्ते दर्शनादनु ॥ ३६ ॥

kasmāttvamāgato bhadra prabhāvaḥ kīdṛśastava | vajralepastu kāśyāṁ vai dagdhaste darśanādanu || 36 ||

हे भद्र! तुम कहाँ से आए हो, तुम्हारा प्रभाव कैसा है? काशी में उत्पन्न वज्रलेप तुम्हारे दर्शन के बाद ही जल गया।"

श्लोक 37 (skanda.7.481.37)

वसिष्ठ उवाच । इत्येवं राक्षसेनोक्तं श्रुत्वा कृष्णस्य पांथिकः । विस्मयं परमापन्नः प्राह तं हर्षमानसः ॥ ३७ ॥

vasiṣṭha uvāca | ityevaṁ rākṣasenoktaṁ śrutvā kṛṣṇasya pāṁthikaḥ | vismayaṁ paramāpannaḥ prāha taṁ harṣamānasaḥ || 37 ||

वसिष्ठ ने कहा - राक्षस द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सुनकर, कृष्ण का वह पथिक परम विस्मय को प्राप्त हुआ और हर्षित मन से उससे कहा।

श्लोक 38 (skanda.7.481.38)

पांथिक उवाच । श्रीमद्द्वारवतीं दृष्ट्वा ह्यागतोऽस्म्यत्र राक्षस । वज्रलेपहरोऽस्माकं प्रभावः कृष्णदर्शनात् ॥ ३८ ॥

pāṁthika uvāca | śrīmaddvāravatīṁ dṛṣṭvā hyāgato'smyatra rākṣasa | vajralepaharo'smākaṁ prabhāvaḥ kṛṣṇadarśanāt || 38 ||

पथिक ने कहा - हे राक्षस! मैं श्रीद्वारवती का दर्शन करके यहाँ आया हूँ। हमारा यह प्रभाव कृष्ण के दर्शन से ही वज्रलेप को हरने वाला है।

श्लोक 39 (skanda.7.481.39)

गोमत्यां यः सकृत्स्नात्वा पश्येत्कृष्णमुखांबुजम् । सर्वानुद्धरते पापादपि त्रैलोक्यदाहकात् ॥ ३९ ॥

gomatyāṁ yaḥ sakṛtsnātvā paśyetkṛṣṇamukhāṁbujam | sarvānuddharate pāpādapi trailokyadāhakāt || 39 ||

जो गोमती में एक बार भी स्नान कर कृष्ण के मुख-कमल का दर्शन करता है, वह त्रिलोक को जलाने वाले पाप से भी सर्वथा उद्धृत हो जाता है।

श्लोक 40 (skanda.7.481.40)

वसिष्ठ उवाच । इत्युक्तो राक्षसो हृष्टः शुद्धात्मा भक्तिसंयुतः । नत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा संप्राप्तो द्वारकां तदा ॥ ४० ॥

vasiṣṭha uvāca | ityukto rākṣaso hṛṣṭaḥ śuddhātmā bhaktisaṁyutaḥ | natvā pradakṣiṇaṁ kṛtvā saṁprāpto dvārakāṁ tadā || 40 ||

वसिष्ठ ने कहा - इस प्रकार कहे जाने पर वह राक्षस, हर्षित और शुद्धात्मा होकर, भक्तियुक्त होकर, नमन कर प्रदक्षिणा करके तब द्वारका को प्राप्त हुआ।

श्लोक 41 (skanda.7.481.41)

गोमत्यां स तनुं त्यक्त्वा प्राप्तोऽसौ वैष्णवं पदम् । स्तूयमानः सुरेशानैर्गंधर्वैः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ४१ ॥

gomatyāṁ sa tanuṁ tyaktvā prāpto'sau vaiṣṇavaṁ padam | stūyamānaḥ sureśānairgaṁdharvaiḥ puṣpavṛṣṭibhiḥ || 41 ||

गोमती में शरीर त्याग कर वह वैष्णव पद को प्राप्त हुआ, देवेशों और गंधर्वों द्वारा स्तुति किया गया तथा पुष्पवर्षा से सम्मानित हुआ।

श्लोक 42 (skanda.7.481.42)

इत्थं महाप्रभावो हि द्वारकायाः प्रकीर्त्तितः । न प्ररोहंति पापानि यस्याः पांथिकदर्शनात् । द्वारकायां तु किं वाच्यं न प्ररोहंति पातकम् ॥ ४२ ॥

itthaṁ mahāprabhāvo hi dvārakāyāḥ prakīrttitaḥ | na prarohaṁti pāpāni yasyāḥ pāṁthikadarśanāt | dvārakāyāṁ tu kiṁ vācyaṁ na prarohaṁti pātakam || 42 ||

इस प्रकार द्वारका का यह महाप्रभाव कीर्तित किया गया - जिसके पथिक के दर्शन मात्र से पाप अंकुरित नहीं होते, फिर द्वारका में तो पातक अंकुरित न हों, इसमें कहना ही क्या!

श्लोक 43 (skanda.7.481.43)

इत्येतत्कथितं राजन्यत्पृष्टोऽहं त्वयाऽनघ । सर्वक्षेत्रोत्तमं क्षेत्रं वज्रलेपविनाशनम् ॥ ४३ ॥

ityetatkathitaṁ rājanyatpṛṣṭo'haṁ tvayā'nagha | sarvakṣetrottamaṁ kṣetraṁ vajralepavināśanam || 43 ||

हे निष्पाप राजन्! इस प्रकार वह सब कहा गया, जो तुमने मुझसे पूछा था - वह समस्त क्षेत्रों में उत्तम, वज्रलेप का नाशक क्षेत्र द्वारका ही है।

श्लोक 44 (skanda.7.481.44)

श्रीप्रह्लाद उवाच । वसिष्ठेनोदितं श्रुत्वा दिलीपो हृष्टमानसः । द्वारकां क्षेत्रराजं तं ज्ञात्वा च विस्मयं ययौ ॥ ४४ ॥

śrīprahlāda uvāca | vasiṣṭhenoditaṁ śrutvā dilīpo hṛṣṭamānasaḥ | dvārakāṁ kṣetrarājaṁ taṁ jñātvā ca vismayaṁ yayau || 44 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - वसिष्ठ के इस कथन को सुनकर दिलीप हर्षित मन से, द्वारका को उस क्षेत्रराज के रूप में जानकर, विस्मय को प्राप्त हुआ।

श्लोक 45 (skanda.7.481.45)

ययौ द्वारवतीं हृष्टो देवदेवस्य सादरम् । कृष्णं दृष्ट्वा परां सिद्धिं संप्राप्तो देवमंदिरे ॥ ४५ ॥

yayau dvāravatīṁ hṛṣṭo devadevasya sādaram | kṛṣṇaṁ dṛṣṭvā parāṁ siddhiṁ saṁprāpto devamaṁdire || 45 ||

वह हर्षित होकर देवाधिदेव की उस द्वारवती को श्रद्धापूर्वक गया, और कृष्ण का दर्शन कर देवमंदिर में परम सिद्धि को प्राप्त हुआ।

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