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प्रभास खण्ड · अध्याय 482

द्वारका नाम के माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 481अध्याय-सूचीअध्याय 483

श्लोक 1 (skanda.7.482.1)

प्रह्लाद उवाच । अहो क्षेत्रस्य माहात्म्यं समंताद्दशयोजनम् । दिविष्ठा यत्र पश्यंति सर्वानेव चतुर्भुजान् ॥ १ ॥

prahlāda uvāca | aho kṣetrasya māhātmyaṁ samaṁtāddaśayojanam | diviṣṭhā yatra paśyaṁti sarvāneva caturbhujān || 1 ||

प्रह्लाद ने कहा - अहो! इस क्षेत्र का माहात्म्य - चारों ओर दस योजन तक, जहाँ स्वर्गवासी भी सबको चतुर्भुज रूप में देखते हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.482.2)

अहो क्षेत्रस्य माहात्म्यं दृष्ट्वा नित्यं चतुर्भुजान् । द्वारकावासिनः सर्वान्नमस्यंति दिवौकसः ॥ २ ॥

aho kṣetrasya māhātmyaṁ dṛṣṭvā nityaṁ caturbhujān | dvārakāvāsinaḥ sarvānnamasyaṁti divaukasaḥ || 2 ||

अहो! इस क्षेत्र का माहात्म्य - द्वारका के सभी निवासियों को नित्य चतुर्भुज रूप में देखकर स्वर्गवासी उन्हें नमस्कार करते हैं।

श्लोक 3 (skanda.7.482.3)

अहो क्षेत्रस्य माहात्म्यं सर्वशास्त्रेषु विश्रुतम् । अहो क्षेत्रस्य माहात्म्यं शृण्वंतु ऋषयोऽमलाः ॥ ३ ॥

aho kṣetrasya māhātmyaṁ sarvaśāstreṣu viśrutam | aho kṣetrasya māhātmyaṁ śṛṇvaṁtu ṛṣayo'malāḥ || 3 ||

अहो! इस क्षेत्र का माहात्म्य समस्त शास्त्रों में विख्यात है। अहो! इस क्षेत्र के माहात्म्य को निर्मल ऋषिगण सुनें।

श्लोक 4 (skanda.7.482.4)

मुक्तिं नेच्छंति यत्रस्थाः कृष्णसेवोत्सुकाः सदा । यत्रत्याश्चैव पाषाणा यत्र क्वापि विमुक्तिदाः ॥ ४ ॥

muktiṁ necchaṁti yatrasthāḥ kṛṣṇasevotsukāḥ sadā | yatratyāścaiva pāṣāṇā yatra kvāpi vimuktidāḥ || 4 ||

यहाँ रहने वाले, सदा कृष्ण की सेवा में उत्सुक रहने वाले, मुक्ति की इच्छा भी नहीं करते। यहाँ के पाषाण भी, यहाँ जहाँ कहीं भी हों, मुक्तिदायक हैं।

श्लोक 5 (skanda.7.482.5)

अपि कीट पतंगाद्याः पशवोऽथ सरीसृपाः । विमुक्ताः पापिनः सर्वे द्वारकायाः प्रसादतः । किं पुनर्मानवा नित्यं द्वारकायां वसंति ये ॥ ५ ॥

api kīṭa pataṁgādyāḥ paśavo'tha sarīsṛpāḥ | vimuktāḥ pāpinaḥ sarve dvārakāyāḥ prasādataḥ | kiṁ punarmānavā nityaṁ dvārakāyāṁ vasaṁti ye || 5 ||

यहाँ तक कि कीड़े-पतंगे, पशु और सरीसृप भी - सभी पापी - द्वारका की कृपा से मुक्त हो जाते हैं। फिर जो मनुष्य नित्य द्वारका में निवास करते हैं, उनके विषय में तो कहना ही क्या!

श्लोक 6 (skanda.7.482.6)

या गतिः सर्वजंतूनां द्वारकापुरवासिनाम् । सा गतिर्दुर्लभा नूनं मुनीनामूर्द्ध्वरेतसाम् ॥ ६ ॥

yā gatiḥ sarvajaṁtūnāṁ dvārakāpuravāsinām | sā gatirdurlabhā nūnaṁ munīnāmūrdhvaretasām || 6 ||

द्वारकापुरी के निवासी समस्त प्राणियों को जो गति प्राप्त होती है, वह गति निश्चय ही ऊर्ध्वरेता मुनियों के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 7 (skanda.7.482.7)

सर्वेषु क्षेत्रतीर्थेषु वसतां वर्षकोटिभिः । तत्फलं निमिषार्द्धेन द्वारकायां दिनेदिने ॥ ७ ॥

sarveṣu kṣetratīrtheṣu vasatāṁ varṣakoṭibhiḥ | tatphalaṁ nimiṣārddhena dvārakāyāṁ dinedine || 7 ||

समस्त क्षेत्रों और तीर्थों में करोड़ों वर्षों तक निवास करने से जो फल मिलता है, वह फल द्वारका में आधे निमिष (क्षणमात्र) में प्रतिदिन प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.7.482.8)

द्वारकायां स्थिताः सर्वे नरा नार्य्यश्चतुर्भुजाः । द्वारकावासिनः सर्वान्यः पश्येत्कलुषापहान् । सत्यंसत्यं द्विजश्रेष्ठाः कृष्णस्यातिप्रियो भवेत् ॥ ८ ॥

dvārakāyāṁ sthitāḥ sarve narā nāryaścaturbhujāḥ | dvārakāvāsinaḥ sarvānyaḥ paśyetkaluṣāpahān | satyaṁsatyaṁ dvijaśreṣṭhāḥ kṛṣṇasyātipriyo bhavet || 8 ||

द्वारका में स्थित समस्त नर-नारी चतुर्भुज हैं। जो सभी द्वारकावासियों को, जो पाप-नाशक हैं, देखता है - हे द्विजश्रेष्ठो! सत्य-सत्य, वह कृष्ण को अत्यंत प्रिय हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.7.482.9)

द्वारकावासिनो ये वै निंदंति पुरुषाधमाः । कृष्णस्नेहविहीनास्ते पतंति दुःखसागरे ॥ ९ ॥

dvārakāvāsino ye vai niṁdaṁti puruṣādhamāḥ | kṛṣṇasnehavihīnāste pataṁti duḥkhasāgare || 9 ||

जो निम्न मनुष्य द्वारकावासियों की निंदा करते हैं, वे कृष्ण के स्नेह से रहित होकर दुःख-सागर में गिरते हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.482.10)

जयंतेन भृशं त्रस्ताः शूलाग्रारोपिताश्चिरम् । कर्षितास्ताडितास्ते वै मूर्च्छिताः पुनरुत्थिताः ॥ १० ॥

jayaṁtena bhṛśaṁ trastāḥ śūlāgrāropitāściram | karṣitāstāḍitāste vai mūrcchitāḥ punarutthitāḥ || 10 ||

जयंत के द्वारा अत्यंत भयभीत होकर, वे चिरकाल तक भाले की नोक पर चढ़ाए जाते हैं, घसीटे जाते हैं, पीटे जाते हैं, मूर्च्छित होकर पुनः उठते हैं।

श्लोक 11 (skanda.7.482.11)

त्राहित्राहि जयंत त्वं वदंतो हि भयातुराः । स्मरंतः पूर्वपापं ते जयंतेन प्रताडिताः ॥ ११ ॥

trāhitrāhi jayaṁta tvaṁ vadaṁto hi bhayāturāḥ | smaraṁtaḥ pūrvapāpaṁ te jayaṁtena pratāḍitāḥ || 11 ||

"हे जयंत! त्राहि-त्राहि!" - ऐसा भय-आतुर होकर कहते हुए, वे अपने पूर्व पाप का स्मरण करते हुए जयंत द्वारा ताड़ित होते हैं।

श्लोक 12 (skanda.7.482.12)

जयंत उवाच । किं कृतं मंदभाग्यैर्वो यत्पापं च सुदारुणम् । सर्वं पुण्यफलं लब्ध्वा द्वारकावासमुत्तमम् ॥ १२ ॥

jayaṁta uvāca | kiṁ kṛtaṁ maṁdabhāgyairvo yatpāpaṁ ca sudāruṇam | sarvaṁ puṇyaphalaṁ labdhvā dvārakāvāsamuttamam || 12 ||

जयंत ने कहा - हे अभागो! तुमने ऐसा कौन-सा भयंकर पाप किया, जो द्वारका के उत्तम निवास रूपी समस्त पुण्यफल को प्राप्त करके भी निंदा जैसा कृत्य किया?

श्लोक 13 (skanda.7.482.13)

द्वारकावासिनां निंदा महापापाधिका ध्रुवम् । न निवर्तेत तत्पापं सा ज्ञेया परमेश्वरी ॥ १३ ॥

dvārakāvāsināṁ niṁdā mahāpāpādhikā dhruvam | na nivarteta tatpāpaṁ sā jñeyā parameśvarī || 13 ||

द्वारकावासियों की निंदा निश्चय ही महापाप से भी अधिक है। वह पाप निवृत्त नहीं होता - इसे परमेश्वरी की आज्ञा जानना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.7.482.14)

अतः कृष्णाज्ञया सर्वान्पापिनो दंडयाम्यहम् । वैष्णवानां च निंदायाः फलं भुक्त्वा सुदारुणम् ॥ १४ ॥

ataḥ kṛṣṇājñayā sarvānpāpino daṇḍayāmyaham | vaiṣṇavānāṁ ca niṁdāyāḥ phalaṁ bhuktvā sudāruṇam || 14 ||

अतः कृष्ण की आज्ञा से मैं इन सब पापियों को दंडित करता हूँ, ताकि वैष्णवों की निंदा का यह अत्यंत भयंकर फल वे भोग लें।

श्लोक 15 (skanda.7.482.15)

ततस्तु द्वारकायां च पुण्यं जन्म भविष्यति । कृष्णं प्रतोष्य संसिद्धिर्भविष्यति सुदुर्ल्लभा ॥ १५ ॥

tatastu dvārakāyāṁ ca puṇyaṁ janma bhaviṣyati | kṛṣṇaṁ pratoṣya saṁsiddhirbhaviṣyati sudurllabhā || 15 ||

उसके पश्चात् उन्हें द्वारका में ही पुण्य जन्म प्राप्त होगा, और कृष्ण को संतुष्ट करके उन्हें अत्यंत दुर्लभ सिद्धि प्राप्त होगी।

श्लोक 16 (skanda.7.482.16)

तस्मात्तद्भुज्यतां पापं जातं वैष्णवनिंदनात् । तत्रत्यानां प्रभुर्नैव यम ईष्टे महेश्वरः ॥ १६ ॥

tasmāttadbhujyatāṁ pāpaṁ jātaṁ vaiṣṇavaniṁdanāt | tatratyānāṁ prabhurnaiva yama īṣṭe maheśvaraḥ || 16 ||

अतः वह पाप, जो वैष्णव-निंदा से उत्पन्न हुआ है, अवश्य भोगा जाना चाहिए। वहाँ के निवासियों पर यम भी महेश्वर की तरह अधिकार नहीं रखता।

श्लोक 17 (skanda.7.482.17)

श्रीप्रह्लाद उवाच । तस्माद्द्वारवतीं गत्वा संसेव्यो देवनायकः ॥ १७ ॥

śrīprahlāda uvāca | tasmāddvāravatīṁ gatvā saṁsevyo devanāyakaḥ || 17 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - अतः द्वारवती जाकर देवनायक (कृष्ण) की सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 18 (skanda.7.482.18)

गोमतीतीरमाश्रित्य द्वारकायां प्रयच्छति । यत्तु किंचिद्धनं विप्राः श्रूयतां तत्फलोदयम् ॥ १८ ॥

gomatītīramāśritya dvārakāyāṁ prayacchati | yattu kiṁciddhanaṁ viprāḥ śrūyatāṁ tatphalodayam || 18 ||

गोमती के तट का आश्रय लेकर द्वारका में जो थोड़ा भी धन दान करता है - हे विप्रो! उसके फल के उदय को सुनो।

श्लोक 19 (skanda.7.482.19)

हेमभारसहस्रैस्तु रविवारे रविग्रहे । कुरुक्षेत्रे यदाप्नोति गजाश्वरथदानतः ॥ १९ ॥

hemabhārasahasraistu ravivāre ravigrahe | kurukṣetre yadāpnoti gajāśvarathadānataḥ || 19 ||

रविवार को सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में हजारों भार सुवर्ण, हाथी, घोड़े और रथों के दान से जो फल प्राप्त होता है,

श्लोक 20 (skanda.7.482.20)

सहस्रगुणितं तस्मात्सत्यंसत्यं मयोदितम् । हेममाषार्द्धमानेन द्वारकादानयोगतः ॥ २० ॥

sahasraguṇitaṁ tasmātsatyaṁsatyaṁ mayoditam | hemamāṣārddhamānena dvārakādānayogataḥ || 20 ||

सत्य-सत्य, मैंने कहा है कि उससे हजार गुना अधिक फल, द्वारका में आधे माषे भर सुवर्ण के दान से प्राप्त होता है।

श्लोक 21 (skanda.7.482.21)

पत्राणां चैव पुष्पाणां नैवेद्यसिक्थसंख्यया । कृष्णदेवस्य पूजायामनंतं भवति द्विजाः ॥ २१ ॥

patrāṇāṁ caiva puṣpāṇāṁ naivedyasikthasaṁkhyayā | kṛṣṇadevasya pūjāyāmanaṁtaṁ bhavati dvijāḥ || 21 ||

हे द्विजो! पत्तों, पुष्पों तथा नैवेद्य के कणों की संख्या के अनुसार, कृष्णदेव की पूजा में अनंत फल प्राप्त होता है।

श्लोक 22 (skanda.7.482.22)

अन्नदानं तु यः कुर्य्याद्द्वारकायां तु तत्फलम् । नैव शक्नोम्यहं वक्तुं ब्रह्मा शेषमहेश्वरौ ॥ २२ ॥

annadānaṁ tu yaḥ kuryāddvārakāyāṁ tu tatphalam | naiva śaknomyahaṁ vaktuṁ brahmā śeṣamaheśvarau || 22 ||

जो द्वारका में अन्नदान करता है, उसका फल मैं कहने में समर्थ नहीं हूँ, न ब्रह्मा, न शेष, और न महेश्वर ही कह सकते हैं।

श्लोक 23 (skanda.7.482.23)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वाऽप्यथ वाऽत्यजः । नारी वा द्वारकायां वै भक्त्या वासं करोति वै ॥ २३ ॥

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā'pyatha vā'ntyajaḥ | nārī vā dvārakāyāṁ vai bhaktyā vāsaṁ karoti vai || 23 ||

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अथवा अंत्यज, अथवा स्त्री - जो भी द्वारका में भक्तिपूर्वक निवास करता है,

श्लोक 24 (skanda.7.482.24)

कुलकोटिं समुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते । सत्यंसत्यं द्विजश्रेष्ठा नानृतं मम भाषितम् ॥ २४ ॥

kulakoṭiṁ samuddhṛtya viṣṇuloke mahīyate | satyaṁsatyaṁ dvijaśreṣṭhā nānṛtaṁ mama bhāṣitam || 24 ||

वह करोड़ों कुलों का उद्धार करके विष्णुलोक में पूजित होता है। हे द्विजश्रेष्ठो! सत्य-सत्य, मेरा यह कथन असत्य नहीं है।

श्लोक 25 (skanda.7.482.25)

द्वारकावासिनं दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा चैव विशेषतः । महापापविनिर्मुक्ताः स्वर्गलोके वसंति ते ॥ २५ ॥

dvārakāvāsinaṁ dṛṣṭvā spṛṣṭvā caiva viśeṣataḥ | mahāpāpavinirmuktāḥ svargaloke vasaṁti te || 25 ||

द्वारकावासी को देखकर और विशेष रूप से स्पर्श करके, वे महापाप से मुक्त होकर स्वर्गलोक में निवास करते हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.482.26)

पांसुवो द्वारकाया वै वायुना समुदीरिताः । पापिनां मुक्तिदाः प्रोक्ताः किं पुनर्द्वारका भुवि ॥ २६ ॥

pāṁsuvo dvārakāyā vai vāyunā samudīritāḥ | pāpināṁ muktidāḥ proktāḥ kiṁ punardvārakā bhuvi || 26 ||

द्वारका की धूल, वायु द्वारा उड़ाई जाकर भी, पापियों को मुक्ति देने वाली कही गई है। फिर द्वारका की भूमि के विषय में तो कहना ही क्या!

श्लोक 27 (skanda.7.482.27)

श्रीप्रह्लाद उवाच । श्रूयतां द्विजशार्दूला महामोहविनाशनम् । द्वारकायाश्च माहात्म्यं गोमतीकृष्णसन्निधौ ॥ २७ ॥

śrīprahlāda uvāca | śrūyatāṁ dvijaśārdūlā mahāmohavināśanam | dvārakāyāśca māhātmyaṁ gomatīkṛṣṇasannidhau || 27 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - हे द्विजशार्दूलो! महामोह का नाश करने वाला, गोमती और कृष्ण की समीपता में स्थित द्वारका का माहात्म्य सुनो।

श्लोक 28 (skanda.7.482.28)

कुशावर्त्तात्समारभ्य यावद्वै सागरावधि । यस्यां तिथौ समायाति सिंहे देवपुरोहितः ॥ २८ ॥

kuśāvarttātsamārabhya yāvadvai sāgarāvadhi | yasyāṁ tithau samāyāti siṁhe devapurohitaḥ || 28 ||

कुशावर्त से आरंभ कर समुद्र तक, जिस तिथि को देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं,

श्लोक 29 (skanda.7.482.29)

तस्यां हि गोमतीस्नानं द्विषङ्गोदावरीफलम् । अवगाहिता प्रयत्नेन सिंहांते गौतमी सकृत् ॥ २९ ॥

tasyāṁ hi gomatīsnānaṁ dviṣaṅgodāvarīphalam | avagāhitā prayatnena siṁhāṁte gautamī sakṛt || 29 ||

उस दिन गोमती में स्नान का फल गोदावरी के फल का दुगुना है। सिंहांत में प्रयत्नपूर्वक एक बार गौतमी में स्नान करना भी उतना ही फलदायी है।

श्लोक 30 (skanda.7.482.30)

गोदावर्य्यां भवेत्पुण्यं वसतो वर्षसंख्यया । तत्फलं समवाप्नोति गोमतीसेवनाद्द्विजाः ॥ ३० ॥

godāvaryāṁ bhavetpuṇyaṁ vasato varṣasaṁkhyayā | tatphalaṁ samavāpnoti gomatīsevanāddvijāḥ || 30 ||

हे द्विजो! गोदावरी में वर्षों तक निवास करने से जो पुण्य मिलता है, वह फल गोमती की सेवा से ही प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.7.482.31)

गोमत्यां श्रद्धया स्नानं पूर्णे सिंहस्थिते गुरौ । सहस्रगुणितं तत्स्याद्द्वारवत्यां दिनेदिने ॥ ३१ ॥

gomatyāṁ śraddhayā snānaṁ pūrṇe siṁhasthite gurau | sahasraguṇitaṁ tatsyāddvāravatyāṁ dinedine || 31 ||

जब बृहस्पति पूर्ण रूप से सिंह राशि में स्थित होते हैं, तब गोमती में श्रद्धापूर्वक स्नान का फल, द्वारवती में प्रतिदिन सहस्र गुना हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.7.482.32)

गच्छगच्छ महाभाग द्वारकामिति यो वदेत् । तस्यावलोकनादेव मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ३२ ॥

gacchagaccha mahābhāga dvārakāmiti yo vadet | tasyāvalokanādeva mucyate sarvapātakaiḥ || 32 ||

"हे महाभाग! जाओ, जाओ, द्वारका जाओ" - ऐसा जो कहता है, उसके दर्शन मात्र से ही मनुष्य समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 33 (skanda.7.482.33)

द्वारकेति च यो ब्रूयाद्द्वारकाभिमुखो नरः । कृपया कृष्णदेवस्य मुक्तिभागी भवेद्ध्रुवम् ॥ ३३ ॥

dvāraketi ca yo brūyāddvārakābhimukho naraḥ | kṛpayā kṛṣṇadevasya muktibhāgī bhaveddhruvam || 33 ||

जो मनुष्य द्वारका की ओर मुख करके "द्वारका" ऐसा कहता है, वह कृष्णदेव की कृपा से निश्चय ही मुक्ति का भागी बनता है।

श्लोक 34 (skanda.7.482.34)

द्वारकां गोमतीं पुण्यां रुक्मिणीं कृष्णमेव च । स्मरंति येऽन्वहं भक्त्या द्वारकाफलभागिनः ॥ ३४ ॥

dvārakāṁ gomatīṁ puṇyāṁ rukmiṇīṁ kṛṣṇameva ca | smaraṁti ye'nvahaṁ bhaktyā dvārakāphalabhāginaḥ || 34 ||

जो लोग प्रतिदिन भक्तिपूर्वक द्वारका, पुण्यमयी गोमती, रुक्मिणी और कृष्ण का स्मरण करते हैं, वे द्वारका के फल के भागी बनते हैं।

श्लोक 35 (skanda.7.482.35)

सहस्रयोजनस्थानां येषां स्यादिति मानसम् । द्वारवत्यां गमिष्यामो द्रक्ष्यामो द्वारकेश्वरम् ॥ ३५ ॥

sahasrayojanasthānāṁ yeṣāṁ syāditi mānasam | dvāravatyāṁ gamiṣyāmo drakṣyāmo dvārakeśvaram || 35 ||

जो सहस्र योजन दूर स्थित होकर भी मन में यह संकल्प करते हैं - "हम द्वारवती जाएँगे, द्वारकेश्वर के दर्शन करेंगे" -

श्लोक 36 (skanda.7.482.36)

सर्वपापैः प्रमुच्यंते धन्यास्ते लोकपावनाः । किं वाच्यं द्वारकायात्रां ये प्रकुर्वंति मानवाः । किं पुनर्द्वारकानाथं कृष्णं पश्यंति ये नराः ॥ ३६ ॥

sarvapāpaiḥ pramucyaṁte dhanyāste lokapāvanāḥ | kiṁ vācyaṁ dvārakāyātrāṁ ye prakurvaṁti mānavāḥ | kiṁ punardvārakānāthaṁ kṛṣṇaṁ paśyaṁti ye narāḥ || 36 ||

वे समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं, वे धन्य हैं, वे लोक को पवित्र करने वाले हैं। जो मनुष्य द्वारका की यात्रा करते हैं, उनके विषय में तो कहना ही क्या! फिर जो मनुष्य द्वारकानाथ कृष्ण का दर्शन करते हैं, उनके विषय में तो कहना ही क्या!

श्लोक 37 (skanda.7.482.37)

मित्रध्रुग्ब्रह्महा गोघ्नः परदारापहारकः । मातृहा पितृहा चैव ब्रह्मस्वापहरस्तथा ॥ ३७ ॥

mitradhrugbrahmahā goghnaḥ paradārāpahārakaḥ | mātṛhā pitṛhā caiva brahmasvāpaharastathā || 37 ||

मित्रद्रोही, ब्रह्महत्यारा, गोहत्यारा, परस्त्री-अपहारक, मातृहंता, पितृहंता तथा ब्रह्मस्व का अपहरण करने वाला,

श्लोक 38 (skanda.7.482.38)

एते चान्ये च पापिष्ठा महापापयुताश्च ये । सर्वपापैः प्रमुच्यंते कृष्णदेवस्य दर्शनात् ॥ ३८ ॥

ete cānye ca pāpiṣṭhā mahāpāpayutāśca ye | sarvapāpaiḥ pramucyaṁte kṛṣṇadevasya darśanāt || 38 ||

ये और अन्य जो भी अत्यंत पापी तथा महापापों से युक्त हैं, वे सब कृष्णदेव के दर्शन मात्र से समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 39 (skanda.7.482.39)

किं वेदैः श्रद्धया हीनैर्व्याख्यानैरपि कृत्स्नशः । हेमभारसहस्रैः किं कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ॥ ३९ ॥

kiṁ vedaiḥ śraddhayā hīnairvyākhyānairapi kṛtsnaśaḥ | hemabhārasahasraiḥ kiṁ kurukṣetre ravigrahe || 39 ||

श्रद्धारहित वेदों और समस्त व्याख्यानों से क्या लाभ? सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में हजारों भार सुवर्ण के दान से भी क्या लाभ?

श्लोक 40 (skanda.7.482.40)

गजाश्वरथदानैः किं किं मंदिरप्रतिष्ठया । तेषां पूजादिना सम्यगिष्टा पूर्तादिभिश्च किम् ॥ ४० ॥

gajāśvarathadānaiḥ kiṁ kiṁ maṁdirapratiṣṭhayā | teṣāṁ pūjādinā samyagiṣṭā pūrtādibhiśca kim || 40 ||

हाथी, घोड़े, रथ के दान से क्या लाभ? मंदिर-प्रतिष्ठा से क्या लाभ? उनकी विधिवत् पूजा आदि से तथा पूर्त-कर्मों आदि से क्या लाभ?

श्लोक 41 (skanda.7.482.41)

राजसूयाश्वमेधाद्यैः सर्वयज्ञैश्च किं भवेत् । सेवनैः क्षेत्रतीर्थानां तपोभिर्विविधैस्तु किम् ॥ ४१ ॥

rājasūyāśvamedhādyaiḥ sarvayajñaiśca kiṁ bhavet | sevanaiḥ kṣetratīrthānāṁ tapobhirvividhaistu kim || 41 ||

राजसूय, अश्वमेध आदि समस्त यज्ञों से क्या होगा? क्षेत्रों-तीर्थों की सेवा से तथा विविध तपों से क्या लाभ?

श्लोक 42 (skanda.7.482.42)

किं मोक्षसाधनैः क्लेशैर्ध्यानयोगसमाधिभिः । द्वारकेश्वरकृष्णस्य दर्शनं यस्य जायते ॥ ४२ ॥

kiṁ mokṣasādhanaiḥ kleśairdhyānayogasamādhibhiḥ | dvārakeśvarakṛṣṇasya darśanaṁ yasya jāyate || 42 ||

उस व्यक्ति के लिए मोक्ष के साधनों, क्लेशों, ध्यान, योग और समाधि से क्या लाभ, जिसे द्वारकेश्वर कृष्ण का दर्शन प्राप्त हो जाता है?

श्लोक 43 (skanda.7.482.43)

माहात्म्यं द्वारकायास्तु अथवा यः शृणोति च । विशेषेण तु वैशाख्यां जयंत्याश्चैव जागरे ॥ ४३ ॥

māhātmyaṁ dvārakāyāstu athavā yaḥ śṛṇoti ca | viśeṣeṇa tu vaiśākhyāṁ jayaṁtyāścaiva jāgare || 43 ||

अथवा जो द्वारका के माहात्म्य को सुनता है, विशेष रूप से वैशाख मास में, जयंती के जागरण में,

श्लोक 44 (skanda.7.482.44)

माघ्यां च फाल्गुने चैत्रे ज्येष्ठे चैव विशेषतः । अद्यापि द्वारका पुण्या कलावपि विशेषतः ॥ ४४ ॥

māghyāṁ ca phālgune caitre jyeṣṭhe caiva viśeṣataḥ | adyāpi dvārakā puṇyā kalāvapi viśeṣataḥ || 44 ||

तथा माघ, फाल्गुन, चैत्र और विशेष रूप से ज्येष्ठ मास में - आज भी, कलियुग में भी, द्वारका विशेष रूप से पुण्यमयी है।

श्लोक 45 (skanda.7.482.45)

यस्यां सत्रं प्रपां कृत्वा प्रासादं मंचमेव च । यतीनां शरणं कृत्वा तीरे मंडपमेव च ॥ ४५ ॥

yasyāṁ satraṁ prapāṁ kṛtvā prāsādaṁ maṁcameva ca | yatīnāṁ śaraṇaṁ kṛtvā tīre maṁḍapameva ca || 45 ||

जिसमें कोई सत्र (अन्नक्षेत्र), प्याऊ, प्रासाद और मंच बनवाकर, यतियों के लिए शरण-स्थान बनवाकर तथा तट पर मंडप बनवाकर,

श्लोक 46 (skanda.7.482.46)

वापीकूपतडागानां जीर्णोद्धारमथापि वा । मूर्तिं विष्णोः प्रतिष्ठाप्य दत्त्वा वा भोगसाधनम् ॥ ४६ ॥

vāpīkūpataḍāgānāṁ jīrṇoddhāramathāpi vā | mūrtiṁ viṣṇoḥ pratiṣṭhāpya dattvā vā bhogasādhanam || 46 ||

या बावड़ियों, कुओं, तालाबों का जीर्णोद्धार करके, या विष्णु की मूर्ति की स्थापना कर, या भोग-साधन अर्पित करके,

श्लोक 47 (skanda.7.482.47)

श्रूयतां तत्फलं विप्राः सर्वोत्कृष्टं वदाम्यहम् । संप्राप्य वांछितान्कामान्कृष्णानुग्रहभाजनम् ॥ ४७ ॥

śrūyatāṁ tatphalaṁ viprāḥ sarvotkṛṣṭaṁ vadāmyaham | saṁprāpya vāṁchitānkāmānkṛṣṇānugrahabhājanam || 47 ||

हे विप्रो! उसका फल सुनो, जो मैं सर्वोत्कृष्ट कहता हूँ - वह अपनी अभीष्ट समस्त कामनाओं को प्राप्त कर कृष्ण की कृपा का पात्र बनता है।

श्लोक 48 (skanda.7.482.48)

तेजोमयेषु लोकेषु भुक्त्वा भोगाननुक्रमात् । प्राप्नोति विष्णुलोकं वै नरो देवनमस्कृतम् ॥ ४८ ॥

tejomayeṣu lokeṣu bhuktvā bhogānanukramāt | prāpnoti viṣṇulokaṁ vai naro devanamaskṛtam || 48 ||

तेजोमय लोकों में क्रमशः भोगों को भोगकर, वह मनुष्य देवताओं द्वारा नमस्कृत विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 49 (skanda.7.482.49)

स्थापयेद्द्वारकायां वै मूर्तिं दारुशिलामयीम् । त्रैलोक्यं स्थापितं तेन विष्णोः सायुज्यतामियात् ॥ ४९ ॥

sthāpayeddvārakāyāṁ vai mūrtiṁ dāruśilāmayīm | trailokyaṁ sthāpitaṁ tena viṣṇoḥ sāyujyatāmiyāt || 49 ||

जो द्वारका में विष्णु की काष्ठ अथवा पाषाण की मूर्ति स्थापित करता है, उसके द्वारा मानो सम्पूर्ण त्रिलोक ही स्थापित हो जाता है, और वह विष्णु की सायुज्यता को प्राप्त करता है।

श्लोक 50 (skanda.7.482.50)

प्ररोहो नास्ति पापस्य पुण्यस्य वृद्धिरुत्तमा । द्वारकायां कथं जातं वैलक्षण्यमिदं प्रभो । क्षेत्रेभ्यः सर्वतीर्थेभ्य आश्चर्य्यं कथयंति ते ॥ ५० ॥

praroho nāsti pāpasya puṇyasya vṛddhiruttamā | dvārakāyāṁ kathaṁ jātaṁ vailakṣaṇyamidaṁ prabho | kṣetrebhyaḥ sarvatīrthebhya āścaryaṁ kathayaṁti te || 50 ||

यहाँ पाप का अंकुरण नहीं होता, तथा पुण्य की उत्तम वृद्धि होती है। हे प्रभो! द्वारका में यह विलक्षणता कैसे उत्पन्न हुई? समस्त क्षेत्रों और तीर्थों से बढ़कर यह आश्चर्य वे स्वयं कहते हैं।

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