प्रभास खण्ड · अध्याय 483
द्वारका-दर्शन और गोमती-स्नान विधि के माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.483.1)
सूत उवाच । प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा स्थितस्तत्र सभास्थले । पप्रच्छात्युत्सुकमना बलिस्तत्क्षेत्रवैभवम् ॥ १ ॥
sūta uvāca | prahlādasya vacaḥ śrutvā sthitastatra sabhāsthale | papracchātyutsukamanā balistatkṣetravaibhavam || 1 ||
सूत ने कहा - उस सभास्थल में स्थित बलि ने प्रह्लाद के वचन सुनकर, अत्यंत उत्सुक मन से उस क्षेत्र के वैभव के विषय में पूछा।
श्लोक 2 (skanda.7.483.2)
प्रह्लादस्तद्वचः श्रुत्वा भक्तिभावपुरस्कृतम् । अभिनन्द्य च तं प्रेम्णा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ २ ॥
prahlādastadvacaḥ śrutvā bhaktibhāvapuraskṛtam | abhinandya ca taṁ premṇā pravaktumupacakrame || 2 ||
प्रह्लाद ने भक्ति-भाव से युक्त उसके वचन को सुनकर, प्रेमपूर्वक उसका अभिनंदन कर, कहना आरंभ किया।
श्लोक 3 (skanda.7.483.3)
प्रह्लाद उवाच । एकैकस्मिन्पदे दत्ते पुरीं द्वारवतीं प्रति । पुण्यं क्रतुसहस्राणां फलं भवति देहिनाम् ॥ ३ ॥
prahlāda uvāca | ekaikasminpade datte purīṁ dvāravatīṁ prati | puṇyaṁ kratusahasrāṇāṁ phalaṁ bhavati dehinām || 3 ||
प्रह्लाद ने कहा - द्वारवती पुरी की ओर एक-एक पग बढ़ाने पर ही, प्राणियों को सहस्रों यज्ञों के पुण्य का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (skanda.7.483.4)
येऽपीच्छंति मनोवृत्त्या गमनं द्वारकां प्रति । तेषां प्रलीयते पापं पूर्वजन्मायुतार्जितम् ॥ ४ ॥
ye'pīcchaṁti manovṛttyā gamanaṁ dvārakāṁ prati | teṣāṁ pralīyate pāpaṁ pūrvajanmāyutārjitam || 4 ||
जो लोग मन से भी द्वारका जाने की इच्छा करते हैं, उनका पूर्वजन्मों में दस हजार गुना अर्जित पाप भी विलीन हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.7.483.5)
अत्युग्राण्यपि पापानि तावत्तिष्ठंति विग्रहे । यावन्न गच्छते जंतुः कलौ द्वारवतीं प्रति ॥ ५ ॥
atyugrāṇyapi pāpāni tāvattiṣṭhaṁti vigrahe | yāvanna gacchate jaṁtuḥ kalau dvāravatīṁ prati || 5 ||
अत्यंत उग्र पाप भी तब तक शरीर में स्थित रहते हैं, जब तक कि कलियुग में प्राणी द्वारवती की ओर नहीं जाता।
श्लोक 6 (skanda.7.483.6)
लोभेनाऽप्युपरोधेन दंभेन कपटेन वा । चक्रतीर्थे तु यो गच्छेन्न पुनर्विशते भुवि ॥ ६ ॥
lobhenā'pyuparodhena daṁbhena kapaṭena vā | cakratīrthe tu yo gacchenna punarviśate bhuvi || 6 ||
चाहे लोभ से, विवशता से, दंभ से अथवा कपट से भी - जो चक्रतीर्थ में जाता है, वह पुनः पृथ्वी पर प्रवेश नहीं लेता।
श्लोक 7 (skanda.7.483.7)
हीनवर्णोऽपि पापात्मा मृतः कृष्णपुरीं प्रति । कलिकालकृतैर्दोषैरत्युग्रैरपि मानवः । भक्त्या कृष्णमुखं दृष्ट्वा न लिप्यति कदाचन ॥ ७ ॥
hīnavarṇo'pi pāpātmā mṛtaḥ kṛṣṇapurīṁ prati | kalikālakṛtairdoṣairatyugrairapi mānavaḥ | bhaktyā kṛṣṇamukhaṁ dṛṣṭvā na lipyati kadācana || 7 ||
निम्न वर्ण का भी पापात्मा, कृष्ण की पुरी की ओर मरने वाला, कलिकाल में किए गए अत्यंत उग्र दोषों से युक्त मनुष्य भी, भक्तिपूर्वक कृष्ण के मुख का दर्शन कर कभी लिप्त नहीं होता।
श्लोक 8 (skanda.7.483.8)
तावद्विराजते काशी ह्यवंती मथुरापुरी । यावन्न पश्यते जंतुः पुरीं कृष्णेन पालिताम् ॥ ८ ॥
tāvadvirājate kāśī hyavaṁtī mathurāpurī | yāvanna paśyate jaṁtuḥ purīṁ kṛṣṇena pālitām || 8 ||
काशी, अवंती और मथुरापुरी तभी तक शोभा पाती हैं, जब तक प्राणी कृष्ण द्वारा पालित उस पुरी को नहीं देखता।
श्लोक 9 (skanda.7.483.9)
येषां कृष्णालये प्राणा गता दानवनायक । न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ ९ ॥
yeṣāṁ kṛṣṇālaye prāṇā gatā dānavanāyaka | na teṣāṁ punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi || 9 ||
हे दानवनायक! जिनके प्राण कृष्ण के मंदिर में निकलते हैं, उनकी पुनरावृत्ति सौ करोड़ कल्पों में भी नहीं होती।
श्लोक 10 (skanda.7.483.10)
दुर्लभो द्वारकावासो दुर्लभं कृष्णदर्शनम् । दुर्लभं गोमतीस्नानं रुक्मिणीदर्शनं कलौ ॥ १० ॥
durlabho dvārakāvāso durlabhaṁ kṛṣṇadarśanam | durlabhaṁ gomatīsnānaṁ rukmiṇīdarśanaṁ kalau || 10 ||
द्वारका में निवास दुर्लभ है, कृष्ण का दर्शन दुर्लभ है, गोमती में स्नान दुर्लभ है, और कलियुग में रुक्मिणी का दर्शन दुर्लभ है।
श्लोक 11 (skanda.7.483.11)
नित्यं कृष्णपुरीं रम्यां ये स्मरंति गृहे स्थिताः । न तेषां पातकं किंचिद्देहमाश्रित्य तिष्ठति ॥ ११ ॥
nityaṁ kṛṣṇapurīṁ ramyāṁ ye smaraṁti gṛhe sthitāḥ | na teṣāṁ pātakaṁ kiṁciddehamāśritya tiṣṭhati || 11 ||
जो लोग घर में स्थित रहते हुए भी नित्य कृष्ण की रमणीय पुरी का स्मरण करते हैं, उनके शरीर में कोई भी पाप नहीं रहता।
श्लोक 12 (skanda.7.483.12)
केशवार्चा गृहे यस्य न तिष्ठति महीपते । तस्यान्नं न च भोक्तव्यमभक्ष्येण समं स्मृतम् ॥ १२ ॥
keśavārcā gṛhe yasya na tiṣṭhati mahīpate | tasyānnaṁ na ca bhoktavyamabhakṣyeṇa samaṁ smṛtam || 12 ||
हे महीपते! जिसके घर में केशव की अर्चा नहीं होती, उसका अन्न अभक्ष्य के समान माना गया है, वह ग्रहण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.7.483.13)
नोष्णत्वं द्विज राजे वै न शीतत्वं हुताशने । वैष्णवानां न पापत्वमेकादश्युपवासिनाम् ॥ १३ ॥
noṣṇatvaṁ dvija rāje vai na śītatvaṁ hutāśane | vaiṣṇavānāṁ na pāpatvamekādaśyupavāsinām || 13 ||
हे द्विज! जैसे चंद्रमा में उष्णता नहीं होती, अग्नि में शीतलता नहीं होती, वैसे ही एकादशी का उपवास करने वाले वैष्णवों में पापत्व नहीं होता।
श्लोक 14 (skanda.7.483.14)
नास्ति नास्ति महाभागाः कलिकालसमं युगम् । स्मरणात्कीर्त्तनाद्विष्णोः प्राप्यते परमव्ययम् ॥ १४ ॥
nāsti nāsti mahābhāgāḥ kalikālasamaṁ yugam | smaraṇātkīrttanādviṣṇoḥ prāpyate paramavyayam || 14 ||
हे महाभागो! कलिकाल के समान कोई युग नहीं है, नहीं है, जिसमें विष्णु के स्मरण और कीर्तन मात्र से परम अविनाशी पद प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.7.483.15)
सत्यभामापतिर्यत्र यत्र पुण्या च गोमती । नरा मुक्तिं प्रयास्यंति तत्र स्नात्वा कलौ युगे ॥ १५ ॥
satyabhāmāpatiryatra yatra puṇyā ca gomatī | narā muktiṁ prayāsyaṁti tatra snātvā kalau yuge || 15 ||
जहाँ सत्यभामा के पति कृष्ण हैं, और जहाँ पुण्यमयी गोमती है, वहाँ स्नान करके कलियुग में मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 16 (skanda.7.483.16)
माधवे शुक्लपक्षे तु त्रिस्पृशां द्वादशीं यदि । लभते द्वारकायां तु नास्ति धन्यतरस्ततः ॥ १६ ॥
mādhave śuklapakṣe tu trispṛśāṁ dvādaśīṁ yadi | labhate dvārakāyāṁ tu nāsti dhanyatarastataḥ || 16 ||
वैशाख के शुक्लपक्ष में यदि त्रिस्पृशा द्वादशी द्वारका में प्राप्त हो, तो उससे बढ़कर धन्य कुछ भी नहीं है।
श्लोक 17 (skanda.7.483.17)
त्रिस्पृशां द्वादशीं प्राप्य गत्वा कृष्णपुरीं नरः । यः करोति हरेर्भक्त्या सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ १७ ॥
trispṛśāṁ dvādaśīṁ prāpya gatvā kṛṣṇapurīṁ naraḥ | yaḥ karoti hareirbhaktyā so'śvamedhaphalaṁ labhet || 17 ||
त्रिस्पृशा द्वादशी को प्राप्त कर, कृष्णपुरी जाकर, जो मनुष्य भक्तिपूर्वक हरि का व्रत करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (skanda.7.483.18)
नंदायां तु जयायां वै भद्रा चैव भवेद्यदि । उपवासार्चने गीते दुर्ल्लभा कृष्णसन्निधौ ॥ १८ ॥
naṁdāyāṁ tu jayāyāṁ vai bhadrā caiva bhavedyadi | upavāsārcane gīte durllabhā kṛṣṇasannidhau || 18 ||
यदि नंदा या जया तिथि पर भद्रा भी हो, तो उपवास और अर्चन में यह गाई गई शुभ संयोग कृष्ण की समीपता में दुर्लभ है।
श्लोक 19 (skanda.7.483.19)
उदयैकादशी स्वल्पा अंते चैव त्रयोदशी । संपूर्णा द्वादशी मध्ये त्रिस्पृशा च हरेः प्रिया ॥ १९ ॥
udayaikādaśī svalpā aṁte caiva trayodaśī | saṁpūrṇā dvādaśī madhye trispṛśā ca hareḥ priyā || 19 ||
प्रारंभ में थोड़ी एकादशी हो, अंत में त्रयोदशी हो, तथा मध्य में द्वादशी पूर्ण रूप से हो - यह त्रिस्पृशा द्वादशी हरि को प्रिय है।
श्लोक 20 (skanda.7.483.20)
एकेन चोपवासेन उपवासाऽयुतं फलम् । जागरे शतसाहस्रं नृत्ये कोटिगुणं कलौ ॥ २० ॥
ekena copavāsena upavāsā'yutaṁ phalam | jāgare śatasāhasraṁ nṛtye koṭiguṇaṁ kalau || 20 ||
एक उपवास से दस हजार उपवासों का फल मिलता है, जागरण से एक लाख गुना तथा कलियुग में नृत्य से करोड़ गुना फल मिलता है।
श्लोक 21 (skanda.7.483.21)
तत्फलं लभते मर्त्त्यो द्वारकायां दिनेदिने । गृहेषु वसतामेतत्किं पुनः कृष्णसंनिधौ ॥ २१ ॥
tatphalaṁ labhate marttyo dvārakāyāṁ dinedine | gṛheṣu vasatāmetatkiṁ punaḥ kṛṣṇasannidhau || 21 ||
यह फल मनुष्य द्वारका में प्रतिदिन प्राप्त करता है, यह घर में वसने वालों को भी मिलता है - फिर कृष्ण की समीपता में तो कहना ही क्या!
श्लोक 22 (skanda.7.483.22)
वाङ्मनःकायजैर्दोषैर्हता ये पापबुद्धयः । द्वारवत्यां विमुच्यंते दृष्ट्वा कृष्णमुखं शुभम् ॥ २२ ॥
vāṅmanaḥkāyajairdoṣairhatā ye pāpabuddhayaḥ | dvāravatyāṁ vimucyaṁte dṛṣṭvā kṛṣṇamukhaṁ śubham || 22 ||
वाणी, मन और शरीर से उत्पन्न दोषों से जो पीड़ित हैं, वे पापबुद्धि लोग भी द्वारवती में कृष्ण के शुभ मुख का दर्शन कर मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 23 (skanda.7.483.23)
दैत्येश्वर नराः श्लाघ्या द्वारवत्यां गताश्च ये ॥ २३ ॥
daityeśvara narāḥ ślāghyā dvāravatyāṁ gatāśca ye || 23 ||
हे दैत्येश्वर! जो मनुष्य द्वारवती को गए हैं, वे प्रशंसनीय हैं।
श्लोक 24 (skanda.7.483.24)
दुर्ल्लभानीह तीर्थानि दुर्लभाः पर्वतोत्तमाः । दुर्ल्लभा वैष्णवा लोके द्वारकावसतिः कलौ ॥ २४ ॥
durllabhānīha tīrthāni durlabhāḥ parvatottamāḥ | durllabhā vaiṣṇavā loke dvārakāvasatiḥ kalau || 24 ||
यहाँ तीर्थ दुर्लभ हैं, श्रेष्ठ पर्वत दुर्लभ हैं, संसार में वैष्णव दुर्लभ हैं, और कलियुग में द्वारका-निवास दुर्लभ है।
श्लोक 25 (skanda.7.483.25)
गवां कोटिसहस्राणि रत्नकोटिशतानि च । दत्त्वा यत्फलमाप्नोति तत्फलं कृष्णसन्निधौ ॥ २५ ॥
gavāṁ koṭisahasrāṇi ratnakoṭiśatāni ca | dattvā yatphalamāpnoti tatphalaṁ kṛṣṇasannidhau || 25 ||
हजारों करोड़ गौओं और सैकड़ों करोड़ रत्नों का दान देकर जो फल प्राप्त होता है, वही फल कृष्ण की समीपता में प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.7.483.26)
यस्याः सीमां प्रविष्टस्य ब्रह्महत्यादिपातकम् । नश्यते दर्शनादेव तां पुरीं को न सेवते ॥ २६ ॥
yasyāḥ sīmāṁ praviṣṭasya brahmahatyādipātakam | naśyate darśanādeva tāṁ purīṁ ko na sevate || 26 ||
जिसकी सीमा में प्रवेश करते ही ब्रह्महत्या आदि पातक भी दर्शन मात्र से नष्ट हो जाते हैं, उस पुरी की सेवा कौन नहीं करेगा?
श्लोक 27 (skanda.7.483.27)
चक्रांकिता शिला यत्र गोमत्युदधिसंगमे । यच्छति पूजिता मोक्षं तां पुरीं को न सेवते ॥ २७ ॥
cakrāṁkitā śilā yatra gomatyudadhisaṁgame | yacchati pūjitā mokṣaṁ tāṁ purīṁ ko na sevate || 27 ||
जहाँ गोमती और समुद्र के संगम पर चक्रांकित शिला है, जो पूजित होकर मोक्ष प्रदान करती है, उस पुरी की सेवा कौन नहीं करेगा?
श्लोक 28 (skanda.7.483.28)
सिंहस्थे च गुरौ विप्रा गोदावर्य्यां तु यत्फलम् । तत्फलं स्नानमात्रेण गोमत्यां कृष्णसन्निधौ ॥ २८ ॥
siṁhasthe ca gurau viprā godāvaryāṁ tu yatphalam | tatphalaṁ snānamātreṇa gomatyāṁ kṛṣṇasannidhau || 28 ||
हे विप्रो! बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर गोदावरी में जो फल मिलता है, वही फल कृष्ण की समीपता में गोमती में केवल स्नान मात्र से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 29 (skanda.7.483.29)
द्वारकाऽवस्थितं तोयं षण्मासं पिबते नरः । तस्य चक्रांकितो देहो भवते नात्र संशयः ॥ २९ ॥
dvārakā'vasthitaṁ toyaṁ ṣaṇmāsaṁ pibate naraḥ | tasya cakrāṁkito deho bhavate nātra saṁśayaḥ || 29 ||
जो मनुष्य छह महीने तक द्वारका में स्थित जल पीता है, उसका शरीर चक्रांकित हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 30 (skanda.7.483.30)
मन्वन्तरसहस्राणि काशीवासेन यत्फलम् । तत्फलं द्वारकायां च वसतः पंचभिर्द्दिनैः ॥ ३० ॥
manvaṁtarasahasrāṇi kāśīvāsena yatphalam | tatphalaṁ dvārakāyāṁ ca vasataḥ paṁcabhirdinaiḥ || 30 ||
काशी में सहस्रों मन्वंतरों तक निवास करने से जो फल मिलता है, वह फल द्वारका में केवल पाँच दिनों तक निवास करने से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 31 (skanda.7.483.31)
तावन्मृतप्रजा नारी दुर्भगा दैत्यपुंगव । यावन्न पश्यते भक्त्या कलौ कृष्णप्रियां पुरीम् ॥ ३१ ॥
tāvanmṛtaprajā nārī durbhagā daityapuṁgava | yāvanna paśyate bhaktyā kalau kṛṣṇapriyāṁ purīm || 31 ||
हे दैत्यपुंगव! स्त्री तभी तक मृत-संतान वाली और दुर्भाग्यशालिनी रहती है, जब तक वह कलियुग में भक्तिपूर्वक कृष्ण की प्रिय पुरी को नहीं देखती।
श्लोक 32 (skanda.7.483.32)
रुक्मिणीं सत्यभामां च देवीं जांबवतीं तथा । मित्रविंदां च कालिंदीं भद्रां नाग्नजितीं तथा ॥ ३२ ॥
rukmiṇīṁ satyabhāmāṁ ca devīṁ jāṁbavatīṁ tathā | mitraviṁdāṁ ca kāliṁdīṁ bhadrāṁ nāgnajitīṁ tathā || 32 ||
रुक्मिणी, सत्यभामा, देवी जांबवती, मित्रविंदा, कालिंदी, भद्रा तथा नाग्नजिती,
श्लोक 33 (skanda.7.483.33)
संपूज्य लक्ष्मणां तत्र वैष्णवीः कृष्णवल्लभाः । एताः संपूज्य विधिवच्छ्रेष्ठपुत्रश्च लभ्यते ॥ ३३ ॥
saṁpūjya lakṣmaṇāṁ tatra vaiṣṇavīḥ kṛṣṇavallabhāḥ | etāḥ saṁpūjya vidhivacchreṣṭhaputraśca labhyate || 33 ||
तथा वहाँ लक्ष्मणा - इन वैष्णवी, कृष्ण की प्रिया देवियों की विधिवत् पूजा करके, श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त होता है।
श्लोक 34 (skanda.7.483.34)
तावद्भवभयं पुंसां गृहभंगश्च मूर्खता । यावन्न पश्यते भक्त्या कलौ कृष्णपुरीं नरः ॥ ३४ ॥
tāvadbhavabhayaṁ puṁsāṁ gṛhabhaṁgaśca mūrkhatā | yāvanna paśyate bhaktyā kalau kṛṣṇapurīṁ naraḥ || 34 ||
पुरुषों में संसार का भय, गृह का विनाश तथा मूर्खता तभी तक रहती है, जब तक वह कलियुग में भक्तिपूर्वक कृष्णपुरी को नहीं देखता।
श्लोक 35 (skanda.7.483.35)
न सर्वत्र महापुण्यं संगमे सरितांपतेः । जाह्नवीसंगमान्मुक्तिर्गोमतीनीरसंगमात् । संपर्के गोमतीनीरपूतोऽहं कृष्णसन्निधौ ॥ ३५ ॥
na sarvatra mahāpuṇyaṁ saṁgame saritāṁpateḥ | jāhnavīsaṁgamānmuktirgomatīnīrasaṁgamāt | saṁparke gomatīnīrapūto'haṁ kṛṣṇasannidhau || 35 ||
संगम में, समुद्र के तट पर, महापुण्य सर्वत्र नहीं होता। गंगा के संगम से मुक्ति मिलती है, गोमती के जल के संगम से भी। गोमती के जल के संपर्क से ही मैं कृष्ण की समीपता में पवित्र हुआ हूँ।
श्लोक 36 (skanda.7.483.36)
गोमतीनीरसंपृक्तं ये मां पश्यंति मानवाः । न तेषां पुनरावृत्तिरित्याह सरितांपतिः ॥ ३६ ॥
gomatīnīrasaṁpṛktaṁ ye māṁ paśyaṁti mānavāḥ | na teṣāṁ punarāvṛttirityāha saritāṁpatiḥ || 36 ||
"जो मनुष्य गोमती के जल से संयुक्त मुझे देखते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती" - ऐसा समुद्र (सरितांपति) ने कहा।
श्लोक 37 (skanda.7.483.37)
द्वारकां गच्छमानस्य विपत्तिश्च भवेद्यदि । न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ ३७ ॥
dvārakāṁ gacchamānasya vipattiśca bhavedyadi | na tasya punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi || 37 ||
यदि द्वारका जाते हुए मनुष्य की विपत्ति (मृत्यु) भी हो जाए, तो भी उसकी पुनरावृत्ति सौ करोड़ कल्पों में भी नहीं होती।