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प्रभास खण्ड · अध्याय 484

द्वारका के चक्रांकित पाषाणों के माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 483अध्याय-सूचीअध्याय 485

श्लोक 1 (skanda.7.484.1)

श्रीप्रह्लाद उवाच । कृष्णकृष्णेति कृष्णेति श्वपचो जागरन्निशि । जपेदपि कलौ नित्यं कृष्णरूपी भवेद्धि सः ॥ १ ॥

śrīprahlāda uvāca | kṛṣṇakṛṣṇeti kṛṣṇeti śvapaco jāgaranniśi | japedapi kalau nityaṁ kṛṣṇarūpī bhaveddhi saḥ || 1 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - कलियुग में यदि एक चांडाल भी रात्रि में जागकर नित्य "कृष्ण-कृष्ण" ऐसा जप करे, तो वह कृष्णरूप हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.7.484.2)

कृष्णकृष्णेति कृष्णेति कलौ वदत्यहर्निशम् । नित्यं यज्ञायुतं पुण्यं तीर्थकोटिसमुद्भवम् ॥ २ ॥

kṛṣṇakṛṣṇeti kṛṣṇeti kalau vadatyaharniśam | nityaṁ yajñāyutaṁ puṇyaṁ tīrthakoṭisamudbhavam || 2 ||

जो कलियुग में दिन-रात "कृष्ण-कृष्ण, कृष्ण" ऐसा कहता है, उसे नित्य दस हजार यज्ञों का पुण्य तथा करोड़ों तीर्थों से उत्पन्न पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.7.484.3)

संपूर्णैकादशी भूत्वा द्वादश्यां वर्द्धते यदि । उन्मीलिनीति विख्याता तिथीनामुत्तमा तिथिः ॥ ३ ॥

saṁpūrṇaikādaśī bhūtvā dvādaśyāṁ varddhate yadi | unmīlinīti vikhyātā tithīnāmuttamā tithiḥ || 3 ||

यदि पूर्ण एकादशी होकर वह द्वादशी में भी बढ़ जाए, तो उसे "उन्मीलिनी" कहा जाता है - यह तिथियों में उत्तम तिथि मानी गई है।

श्लोक 4 (skanda.7.484.4)

वंजुलीवासरे ये वै रात्रौ कुर्वंति जागरम् । यज्ञायुतायुतं पुण्यं मुहूर्तार्द्धेन जायते ॥ ४ ॥

vaṁjulīvāsare ye vai rātrau kurvaṁti jāgaram | yajñāyutāyutaṁ puṇyaṁ muhūrtārddhena jāyate || 4 ||

वंजुली के दिन जो लोग रात्रि में जागरण करते हैं, उन्हें आधे मुहूर्त में ही दस हजार गुणा दस हजार यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (skanda.7.484.5)

संपूर्णा द्वादशी भूत्वा वर्द्धते चापरे दिने । त्रयोदश्यां मुनिश्रेष्ठा वंजुली दुर्ल्लभा कलौ ॥ ५ ॥

saṁpūrṇā dvādaśī bhūtvā varddhate cāpare dine | trayodaśyāṁ muniśreṣṭhā vaṁjulī durllabhā kalau || 5 ||

हे मुनिश्रेष्ठो! जब पूर्ण द्वादशी होकर अगले दिन त्रयोदशी में भी बढ़ जाती है, तो वह वंजुली तिथि कलियुग में दुर्लभ है।

श्लोक 6 (skanda.7.484.6)

उन्मीलिनीमनुप्राप्य ये प्रकुर्वंति जागरम् । निमिषार्द्धेन तत्पुण्यं गवां कोटिफलप्रदम् ॥ ६ ॥

unmīlinīmanuprāpya ye prakurvaṁti jāgaram | nimiṣārddhena tatpuṇyaṁ gavāṁ koṭiphalapradam || 6 ||

जो लोग उन्मीलिनी तिथि प्राप्त कर जागरण करते हैं, उन्हें आधे निमिष में ही करोड़ों गौओं के दान के समान फलदायी पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (skanda.7.484.7)

संपूर्णैकादशी भूत्वा प्रत्यहं वर्द्धते यदि । दर्शश्च पौर्णमासी च पक्षवृद्धिस्तथोच्यते ॥ ७ ॥

saṁpūrṇaikādaśī bhūtvā pratyahaṁ varddhate yadi | darśaśca paurṇamāsī ca pakṣavṛddhistathocyate || 7 ||

यदि पूर्ण एकादशी होकर वह प्रत्येक दिन बढ़ती जाए, दर्श (अमावस्या) और पूर्णिमा भी उसी प्रकार बढ़ें, तो उसे पक्षवृद्धि कहा जाता है।

श्लोक 8 (skanda.7.484.8)

पक्षवृद्धिकरीं प्राप्य ये प्रकुर्वंति जागरम् । निमिषार्द्धार्द्धमात्रेण गवां कोटिफलप्रदम् ॥ ८ ॥

pakṣavṛddhikarīṁ prāpya ye prakurvaṁti jāgaram | nimiṣārddhārddhamātreṇa gavāṁ koṭiphalapradam || 8 ||

जो लोग पक्षवृद्धिकारी तिथि को प्राप्त कर जागरण करते हैं, उन्हें आधे निमिष के भी आधे मात्र में करोड़ों गौओं के दान के समान फलदायी पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.7.484.9)

श्रीप्रह्लाद उवाच । चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । स याति परमं स्थानं दाहप्रलयवर्जितम् ॥ ९ ॥

śrīprahlāda uvāca | cakratīrthe naraḥ snātvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ | sa yāti paramaṁ sthānaṁ dāhapralayavarjitam || 9 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - चक्रतीर्थ में स्नान कर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, और वह दाह तथा प्रलय से रहित परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 10 (skanda.7.484.10)

चक्रं प्रक्षालितं यत्र कृष्णेन स्वयमेव हि । तेन वै चक्रतीर्थं हि पुण्यं च परमं हरेः । भवंति तत्र पाषाणाश्चक्रांका मुक्तिदायकाः ॥ १० ॥

cakraṁ prakṣālitaṁ yatra kṛṣṇena svayameva hi | tena vai cakratīrthaṁ hi puṇyaṁ ca paramaṁ hareḥ | bhavaṁti tatra pāṣāṇāścakrāṁkā muktidāyakāḥ || 10 ||

जहाँ कृष्ण ने स्वयं ही अपने चक्र को धोया था, इसीलिए वह चक्रतीर्थ हरि का परम पुण्य-स्थान है। वहाँ के पाषाण चक्र-चिह्नित होकर मुक्तिदायक होते हैं।

श्लोक 11 (skanda.7.484.11)

तत्रैव यदि लभ्यंते चक्रैर्द्वादशभिः सह । द्वादशात्मा स विज्ञेयो मोक्षदः परिकीर्तितः ॥ ११ ॥

tatraiva yadi labhyaṁte cakrairdvādaśabhiḥ saha | dvādaśātmā sa vijñeyo mokṣadaḥ parikīrtitaḥ || 11 ||

यदि वहाँ ही बारह चक्रों सहित कोई पाषाण प्राप्त हो, तो उसे द्वादशात्मा जानना चाहिए, जो मोक्षदायक कहा गया है।

श्लोक 12 (skanda.7.484.12)

एकचक्रेण पाषाणो द्वारवत्यां सुशोभनः । सुदर्शनाभिधेयोऽसौ मोक्षैकफलदायकः ॥ १२ ॥

ekacakreṇa pāṣāṇo dvāravatyāṁ suśobhanaḥ | sudarśanābhidheyo'sau mokṣaikaphaladāyakaḥ || 12 ||

द्वारवती में एक चक्र वाला सुशोभन पाषाण "सुदर्शन" नाम से जाना जाता है, जो केवल मोक्ष के फल को ही देने वाला है।

श्लोक 13 (skanda.7.484.13)

लक्ष्मीनारायणौ द्वौ तौ भुक्तिमुक्तिफलप्रदौ । त्रिभिश्चैवाच्युतं देवं सदेन्द्रपददायकम् ॥ १३ ॥

lakṣmīnārāyaṇau dvau tau bhuktimuktiphalapradau | tribhiścaivācyutaṁ devaṁ sadendrapadadāyakam || 13 ||

दो चक्रों वाला पाषाण लक्ष्मीनारायण रूप है, जो भोग और मोक्ष दोनों फल देने वाला है। तीन चक्रों वाला अच्युत देव रूप है, जो इंद्रपद सहित फल देने वाला है।

श्लोक 14 (skanda.7.484.14)

भूतिदो विघ्नहंता च चतुश्चक्रो जनार्द्दनः । पञ्चभिर्वासुदेवस्तु जन्ममृत्युभयापहः ॥ १४ ॥

bhūtido vighnahaṁtā ca catuścakro janārddanaḥ | pañcabhirvāsudevastu janmamṛtyubhayāpahaḥ || 14 ||

चार चक्रों वाला जनार्दन रूप है, जो ऐश्वर्य देने वाला तथा विघ्नों का नाश करने वाला है। पाँच चक्रों वाला वासुदेव रूप है, जो जन्म-मृत्यु के भय को दूर करता है।

श्लोक 15 (skanda.7.484.15)

प्रद्युम्नः षड्भिरेवासौ लक्ष्मीं कांतिं ददाति च । सप्तभिर्बलदेवस्तु गोत्रकीर्तिविवर्द्धनः ॥ १५ ॥

pradyumnaḥ ṣaḍbhirevāsau lakṣmīṁ kāṁtiṁ dadāti ca | saptabhirbaladevastu gotrakīrtivivarddhanaḥ || 15 ||

छह चक्रों वाला प्रद्युम्न रूप है, जो लक्ष्मी और कांति प्रदान करता है। सात चक्रों वाला बलदेव रूप है, जो कुल और कीर्ति को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 16 (skanda.7.484.16)

वांछितं चाष्टभिर्भक्त्या ददाति पुरुषोत्तमः । सर्वं दद्यान्नवव्यूहो दुर्ल्लभो यः सुरोत्तमैः ॥ १६ ॥

vāṁchitaṁ cāṣṭabhirbhaktyā dadāti puruṣottamaḥ | sarvaṁ dadyānnavavyūho durllabho yaḥ surottamaiḥ || 16 ||

आठ चक्रों वाला पुरुषोत्तम रूप है, जो भक्ति से अभीष्ट फल देता है। नौ व्यूह वाला पाषाण, जो श्रेष्ठ देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, सब कुछ देने वाला है।

श्लोक 17 (skanda.7.484.17)

राज्यप्रदो दशभिस्तु दशावतार एव च । एकादशभिरैश्वर्य्यमनिरुद्धः प्रयच्छति ॥ १७ ॥

rājyaprado daśabhistu daśāvatāra eva ca | ekādaśabhiraiśvaryamaniruddhaḥ prayacchati || 17 ||

दस चक्रों वाला दशावतार रूप है, जो राज्य प्रदान करता है। ग्यारह चक्रों वाला अनिरुद्ध रूप है, जो ऐश्वर्य देता है।

श्लोक 18 (skanda.7.484.18)

निर्वाणं द्वादशात्मा तु चक्रैर्द्वादशभिः स्मृतम् । अत ऊर्ध्वमनंतोऽसौ सौख्यमोक्षप्रदायकः ॥ १८ ॥

nirvāṇaṁ dvādaśātmā tu cakrairdvādaśabhiḥ smṛtam | ata ūrdhvamanaṁto'sau saukhyamokṣapradāyakaḥ || 18 ||

बारह चक्रों वाला द्वादशात्मा रूप निर्वाण-दायक माना गया है। इससे ऊपर वह अनंत रूप है, जो सुख और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला है।

श्लोक 19 (skanda.7.484.19)

ये केचित्तत्र पाषाणाः कृष्णचक्रेण मुद्रिताः । तेषां स्पर्शनमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १९ ॥

ye kecittatra pāṣāṇāḥ kṛṣṇacakreṇa mudritāḥ | teṣāṁ sparśanamātreṇa mucyate sarvakilbiṣaiḥ || 19 ||

वहाँ जो भी पाषाण कृष्ण के चक्र से अंकित हैं, उनके स्पर्श मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 20 (skanda.7.484.20)

ब्रह्महत्यादिकं पापं मनोवाक्कायकर्मजम् । तत्सर्वं विलयं याति चक्रांकितप्रपूजनात् ॥ २० ॥

brahmahatyādikaṁ pāpaṁ manovākkāyakarmajam | tatsarvaṁ vilayaṁ yāti cakrāṁkitaprapūjanāt || 20 ||

ब्रह्महत्या आदि पाप, तथा मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न कर्मजनित पाप - ये सब चक्रांकित पाषाण की पूजा से विलीन हो जाते हैं।

श्लोक 21 (skanda.7.484.21)

म्लेच्छदेशे शुभे वाऽपि चक्रांको यत्र तिष्ठति । योजनानि दश द्वे च मम क्षेत्रं च सुन्दरि ॥ २१ ॥

mlecchadeśe śubhe vā'pi cakrāṁko yatra tiṣṭhati | yojanāni daśa dve ca mama kṣetraṁ ca sundari || 21 ||

चाहे म्लेच्छ देश में हो या शुभ देश में, जहाँ भी चक्रांक चिह्न स्थित है, हे सुंदरि! वहाँ बारह योजन तक मेरा क्षेत्र है।

श्लोक 22 (skanda.7.484.22)

मृत्युकाले च संप्राप्ते हृदये यस्तु धारयेत् । चक्राकं पापदलनं स याति परमां गतिम् ॥ २२ ॥

mṛtyukāle ca saṁprāpte hṛdaye yastu dhārayet | cakrākaṁ pāpadalanaṁ sa yāti paramāṁ gatim || 22 ||

मृत्यु का समय आने पर जो व्यक्ति हृदय में पाप-नाशक चक्राकार चिह्न को धारण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (skanda.7.484.23)

गोमतीसंगमे स्नात्वा भृगुतीर्थे तथैव च । न मातुर्वसते कुक्षौ यद्यपि स्यात्स पातकी ॥ २३ ॥

gomatīsaṁgame snātvā bhṛgutīrthe tathaiva ca | na māturvasate kukṣau yadyapi syātsa pātakī || 23 ||

गोमती के संगम में तथा भृगुतीर्थ में स्नान कर, चाहे कोई कितना ही बड़ा पापी क्यों न हो, वह पुनः माता के गर्भ में निवास नहीं करता।

श्लोक 24 (skanda.7.484.24)

तामसं राजसं वापि यत्कृतं विष्णुपूजनम् । तत्सात्त्विकत्वमभ्येति निम्नगांभो यथार्णवे ॥ २४ ॥

tāmasaṁ rājasaṁ vāpi yatkṛtaṁ viṣṇupūjanam | tatsāttvikatvamabhyeti nimnagāṁbho yathārṇave || 24 ||

तामसिक अथवा राजसिक भाव से किया गया विष्णु-पूजन भी वहाँ सात्त्विकता को प्राप्त हो जाता है, जैसे नीची भूमि का जल समुद्र में मिलकर उसी में लीन हो जाता है।

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