प्रभास खण्ड · अध्याय 99
दण्डपाणिचक्रधरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.99.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि यत्र चक्रधरः स्थितः। दंडपाणिश्च देवेशि यत्रैकस्थानसंस्थितः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi yatra cakradharaḥ sthitaḥ| daṇḍapāṇiśca deveśi yatraikasthānasaṁsthitaḥ
ईश्वर ने कहा—तत्पश्चात्, हे महादेवि, जहाँ चक्रधर स्थित हैं वहाँ जाना चाहिए; तथा, हे देवेशि, दंडपाणि भी जहाँ एक ही स्थान में स्थित हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.99.2)
चंद्रेशात्पूर्वदिग्भागे सोमेशादुत्तरे स्थितः। धनुषां पंचसंस्थाने गंधर्वेशात्समीपतः
candreśātpūrvadigbhāge someśāduttare sthitaḥ| dhanuṣāṁ pañcasaṁsthāne gandharveśātsamīpataḥ
चंद्रेश से पूर्व दिशा में, सोमेश से उत्तर में, पाँच धनुष की दूरी पर, गंधर्वेश के समीप स्थित है।
श्लोक 3 (skanda.7.99.3)
उमाया नैर्ऋते भागे ब्रह्मदेवर्षिसंस्थितः। तस्योत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि सर्वपातकनाशिनीम्
umāyā nairṛte bhāge brahmadevarṣisaṁsthitaḥ| tasyotpattiṁ pravakṣyāmi sarvapātakanāśinīm
उमा से नैर्ऋत्य दिशा में, ब्रह्मा और देवर्षियों द्वारा स्थापित; मैं उनकी उत्पत्ति बताता हूँ, जो सर्वपातकनाशिनी है।
श्लोक 4 (skanda.7.99.4)
पौंड्रको वासुदेवस्तु वाराणस्यां पुराऽभवत्। तेन श्रुतं पुराणं तु पठ्यमानं द्विजातिभिः
pauṇḍrako vāsudevastu vārāṇasyāṁ purā'bhavat| tena śrutaṁ purāṇaṁ tu paṭhyamānaṁ dvijātibhiḥ
पूर्वकाल में वाराणसी में पौंड्रक नामक एक वासुदेव था; उसने द्विजों द्वारा पढ़े जाते पुराण को सुना था।
श्लोक 5 (skanda.7.99.5)
कल्पादौ द्वापरांते तु क्षत्रियाणां निवेशने। अवतारं महाबाहुवासुदेवः करिष्यति
kalpādau dvāparānte tu kṣatriyāṇāṁ niveśane| avatāraṁ mahābāhuvāsudevaḥ kariṣyati
'कल्प के आरंभ में, द्वापर के अंत में, क्षत्रियों के कुल में, महाबाहु वासुदेव अवतार लेंगे।'
श्लोक 6 (skanda.7.99.6)
स तु मूढमतिर्मेने अहं विष्णुरिति प्रिये। चिह्नानि धारयामास चक्रादीनि वरानने
sa tu mūḍhamatirmene ahaṁ viṣṇuriti priye| cihnāni dhārayāmāsa cakrādīni varānane
किंतु वह मूढ़मति यह मान बैठा, 'मैं ही विष्णु हूँ,' हे प्रिये; उसने चक्र आदि चिह्न धारण किए, हे वरानने।
श्लोक 7 (skanda.7.99.7)
स दूतं प्रेषयामास द्वारकायां महोदरम्। स गत्वा प्राह विष्णुं वै चक्रादीनि परित्यज
sa dūtaṁ preṣayāmāsa dvārakāyāṁ mahodaram| sa gatvā prāha viṣṇuṁ vai cakrādīni parityaja
उसने महोदर नामक दूत को द्वारका भेजा; उसने जाकर विष्णु से कहा—'चक्र आदि चिह्नों का परित्याग करो।'
श्लोक 8 (skanda.7.99.8)
इत्याह पौंड्रको राजा नचेद्वधमवाप्स्यसि। ततश्च भगवान्विष्णुः प्राहास्य रुचिरं वचः
ityāha pauṇḍrako rājā nacedvadhamavāpsyasi| tataśca bhagavānviṣṇuḥ prāhāsya ruciraṁ vacaḥ
'ऐसा पौंड्रक राजा कहता है; अन्यथा तुम वध को प्राप्त होगे।' तब भगवान् विष्णु ने उससे यह मधुर वचन कहा।
श्लोक 9 (skanda.7.99.9)
वाच्यः स पौंड्रको राजा त्वया हंत वचो मम। गृहीतचक्र एवाहं काशीमागम्य ते पुरीम्
vācyaḥ sa pauṇḍrako rājā tvayā haṁta vaco mama| gṛhītacakra evāhaṁ kāśīmāgamya te purīm
'तुम उस पौंड्रक राजा से मेरा यह वचन कहना: मैं स्वयं चक्र धारण करके तुम्हारी काशीपुरी में आकर—'
श्लोक 10 (skanda.7.99.10)
संत्यक्ष्यामि ततश्चक्रं गदां चेमामसंशयम्। तद्ग्राह्यं भवता चक्रमन्यद्वा यत्तवेप्सितम्
saṁtyakṣyāmi tataścakraṁ gadāṁ cemāmasaṁśayam| tadgrāhyaṁ bhavatā cakramanyadvā yattavepsitam
'—तब मैं यह चक्र और यह गदा निःसंदेह त्याग दूँगा; वह चक्र अथवा जो कुछ भी तुम्हें अभीष्ट हो, तुम ग्रहण कर लेना।'
श्लोक 11 (skanda.7.99.11)
इत्युक्तेऽथ गते दूते संस्मृत्याऽभ्यागतं हरिः। गरुत्मन्तं समारुह्य त्वरितस्तत्पुरं ययौ
ityukte'tha gate dūte saṁsmṛtyā'bhyāgataṁ hariḥ| garutmantaṁ samāruhya tvaritastatpuraṁ yayau
यह कहे जाने पर, दूत के चले जाने पर, हरि ने पूर्व घटना का स्मरण करके गरुड़ पर सवार होकर शीघ्र उस नगरी की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 12 (skanda.7.99.12)
मित्रस्नेहात्ततस्तस्य काशिराजः सहानुगः। सर्वसैन्यपरीवारस्ततः पौंड्रमुपाययौ
mitrasnehāttatastasya kāśirājaḥ sahānugaḥ| sarvasainyaparīvārastataḥ pauṇḍramupāyayau
तब मित्रता के स्नेहवश काशिराज अपने अनुगामियों सहित, संपूर्ण सेना और परिवार के साथ पौंड्रक के पास गया।
श्लोक 13 (skanda.7.99.13)
ततो बलेन महता काशिराजबलेन च। पौंड्रको वासुदेवोऽसौ केशवाभिमुखो ययौ
tato balena mahatā kāśirājabalena ca| pauṇḍrako vāsudevo'sau keśavābhimukho yayau
तब उस विशाल सेना तथा काशिराज की सेना के साथ वह पौंड्रक वासुदेव केशव के सम्मुख आगे बढ़ा।
श्लोक 14 (skanda.7.99.14)
तं ददर्श हरिर्दूराद्दुर्वारे स्यंदने स्थितम्। चक्रहस्तं गदाशार्ङ्गसंयुतं गरुडध्वजम्
taṁ dadarśa harirdūrāddurvāre syandane sthitam| cakrahastaṁ gadāśārṅgasaṁyutaṁ garuḍadhvajam
हरि ने उसे दूर से ही देखा, जो दुर्वार रथ पर स्थित था, हाथ में चक्र लिए, गदा और शार्ङ्ग धनुष से युक्त, गरुड़ध्वज सहित।
श्लोक 15 (skanda.7.99.15)
तं दृष्ट्वा भावगंभीरं जहास गरुडध्वजः। उवाच पौंड्रकं मूढमात्मचिह्नोपलक्षितम्
taṁ dṛṣṭvā bhāvagaṁbhīraṁ jahāsa garuḍadhvajaḥ| uvāca pauṇḍrakaṁ mūḍhamātmacihnopalakṣitam
उसे गंभीर भाव से देखकर गरुड़ध्वज हँस पड़े, और अपने ही चिह्नों से चिह्नित उस मूढ़ पौंड्रक से बोले।
श्लोक 16 (skanda.7.99.16)
पौंड्रकोक्तं त्वया यत्तु दूतवक्त्रेण मां प्रति। समुत्सृजेति चिह्नानि तच्च सर्वं त्यजाम्यहम्
pauṇḍrakoktaṁ tvayā yattu dūtavaktreṇa māṁ prati| samutsṛjeti cihnāni tacca sarvaṁ tyajāmyaham
'हे पौंड्रक, दूत के मुख से मुझसे जो तुमने कहलवाया कि चिह्नों को त्याग दो, वह सब मैं अभी त्याग देता हूँ।'
श्लोक 17 (skanda.7.99.17)
चक्रमेतत्समुत्सृष्टं गदेयं च विसर्जिता। गरुत्मानेष ते गत्वा समारोहतु वै ध्वजम्
cakrametatsamutsṛṣṭaṁ gadeyaṁ ca visarjitā| garutmāneṣa te gatvā samārohatu vai dhvajam
'यह चक्र अभी छोड़ा जाता है और यह गदा त्यागी जाती है; यह गरुड़ भी तुम्हारे पास जाकर तुम्हारी ध्वजा पर आरूढ़ हो।'
श्लोक 18 (skanda.7.99.18)
इत्युच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ निपातितः। रथश्च गदया भग्नो गजाश्चाश्वाश्च चूर्णिताः
ityuccārya vimuktena cakreṇāsau nipātitaḥ| rathaśca gadayā bhagno gajāścāśvāśca cūrṇitāḥ
ऐसा कहकर, छोड़े गए चक्र से वह गिरा दिया गया; उसका रथ गदा से चूर-चूर हो गया, तथा उसके हाथी और घोड़े कुचल दिए गए।
श्लोक 19 (skanda.7.99.19)
ततो हाहाकृते लोके काशिनाथो महाबली। युयुधे वासुदेवेन मित्रदुःखेन दुःखितः
tato hāhākṛte loke kāśinātho mahābalī| yuyudhe vāsudevena mitraduḥkhena duḥkhitaḥ
तब लोगों की हाहाकार के बीच, मित्र के दुःख से दुःखी होकर, काशी का वह महाबली राजा वासुदेव से युद्ध करने लगा।
श्लोक 20 (skanda.7.99.20)
ततः शार्ङ्गविनिर्मुक्तैश्छित्त्वा तस्य शरैः शिरः। काशीपुर्यां स चिक्षेप कुर्वँल्लोकस्य विस्मयम्
tataḥ śārṅgavinirmuktaiśchittvā tasya śaraiḥ śiraḥ| kāśīpuryāṁ sa cikṣepa kurvalllokasya vismayam
तब शार्ङ्ग धनुष से छोड़े गए बाणों से उसका सिर काटकर, उन्होंने उसे काशीपुरी में फेंक दिया, जिससे संसार को विस्मय हुआ।
श्लोक 21 (skanda.7.99.21)
हत्वा तु पौंड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम्। पुनर्द्वारवतीं प्राप्तो मृगयाया गतो यथा
hatvā tu pauṇḍrakaṁ śauriḥ kāśirājaṁ ca sānugam| punardvāravatīṁ prāpto mṛgayāyā gato yathā
पौंड्रक तथा उसके अनुगामियों सहित काशिराज को मारकर शौरि पुनः द्वारवती लौट आए, मानो किसी शिकार से लौटे हों।
श्लोक 22 (skanda.7.99.22)
ततः काशिपतेः पुत्रः पितुर्दुःखेन दुःखितः। शंकरं तोषयामास स च तस्मै वरं ददौ
tataḥ kāśipateḥ putraḥ pitur duḥkhena duḥkhitaḥ| śaṁkaraṁ toṣayāmāsa sa ca tasmai varaṁ dadau
तब काशिपति के पुत्र ने, पिता के दुःख से दुःखी होकर, शंकर को संतुष्ट किया; और उन्होंने उसे वरदान दिया।
श्लोक 23 (skanda.7.99.23)
स वव्रे भगवन्कृत्या पितुर्हंतुर्वधाय मे। समुत्तिष्ठतु कृष्णस्य त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर
sa vavre bhagavankṛtyā pituhantorvadhāya me| samuttiṣṭhatu kṛṣṇasya tvatprasādātsureśvara
उसने यह वर माँगा—'हे भगवन्, हे सुरेश्वर, मेरे पिता के हंता कृष्ण के वध के लिए आपकी कृपा से एक कृत्या उत्पन्न हो।'
श्लोक 24 (skanda.7.99.24)
एवं भविष्यतीत्युक्ते दक्षिणाग्नेस्तु मध्यतः। महाकृत्या समुत्तस्थौ प्रस्थिता द्वारकां प्रति
evaṁ bhaviṣyatītyukte dakṣiṇāgnestu madhyataḥ| mahākṛtyā samuttasthau prasthitā dvārakāṁ prati
'ऐसा ही होगा' यह कहे जाने पर, दक्षिणाग्नि के मध्य से एक महाकृत्या उत्पन्न हुई, जो द्वारका की ओर चल पड़ी।
श्लोक 25 (skanda.7.99.25)
ज्वालामालाकरालां तां यादवा भयविह्वलाः। दृष्ट्वा जनार्द्दनं सर्वे शरणार्थमुपागताः
jvālāmālākarālāṁ tāṁ yādavā bhayavihvalāḥ| dṛṣṭvā janārddanaṁ sarve śaraṇārthamupāgatāḥ
उस ज्वालामालाओं से भीषण कृत्या को देखकर, भयविह्वल यादवगण सभी शरण हेतु जनार्दन के पास गए।
श्लोक 26 (skanda.7.99.26)
ततः सुदर्शनं तस्या मुमोच गरुडध्वजः। वधाय सा ततो भग्ना चक्रतेजोऽभिपीडिता
tataḥ sudarśanaṁ tasyā mumoca garuḍadhvajaḥ| vadhāya sā tato bhagnā cakratejo'bhipīḍitā
तब गरुड़ध्वज ने उसके वध के लिए सुदर्शन चक्र छोड़ा; वह चक्र के तेज से पीड़ित होकर टूट गई।
श्लोक 27 (skanda.7.99.27)
कृत्यामनुजगामाशु विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम्। कृत्या वाराणसीं प्राप्ता तस्याश्चक्रं तु पृष्ठतः
kṛtyāmanujagāmāśu viṣṇoścakraṁ sudarśanam| kṛtyā vārāṇasīṁ prāptā tasyāścakraṁ tu pṛṣṭhataḥ
विष्णु का सुदर्शन चक्र तुरंत उस कृत्या का पीछा करने लगा; वह कृत्या वाराणसी पहुँची, और उसका चक्र उसके पीछे-पीछे था।
श्लोक 28 (skanda.7.99.28)
ततः सा भयसंत्रस्ता शंकरं शरणं गता। सोमनाथं जगन्नाथं नान्यः शक्तो हि रक्षितुम्
tataḥ sā bhayasaṁtrastā śaṁkaraṁ śaraṇaṁ gatā| somanāthaṁ jagannāthaṁ nānyaḥ śakto hi rakṣitum
तब भय से त्रस्त होकर वह जगन्नाथ सोमनाथ शंकर की शरण में गई; क्योंकि उनके सिवा कोई अन्य उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं था।
श्लोक 29 (skanda.7.99.29)
ततश्चक्रं वरैर्बाणैस्ताडयामास शंकरः। तच्च द्वारवतीं प्राप्तं शिवसायकमिश्रितम्
tataścakraṁ varairbāṇaistāḍayāmāsa śaṁkaraḥ| tacca dvāravatīṁ prāptaṁ śivasāyakamiśritam
तब शंकर ने उत्तम बाणों से उस चक्र को आहत किया; और वह शिव के बाणों से युक्त होकर द्वारवती पहुँचा।
श्लोक 30 (skanda.7.99.30)
तद्दृष्ट्वा शिवनामांकैस्ताडितं भगवान्हरिः। चक्रं शरैस्ततः कुद्धो गृहीत्वा च करेण तत्। जगाम तत्र यत्रास्ते सोमेशः कालभैरवः
taddṛṣṭvā śivanāmāṁkaistāḍitaṁ bhagavānhariḥ| cakraṁ śaraistataḥ kuddho gṛhītvā ca kareṇa tat| jagāma tatra yatrāste someśaḥ kālabhairavaḥ
शिव के नामांकित चिह्नों से आहत उस चक्र को देखकर, भगवान् हरि उस चक्र के बाणों से आहत होने पर क्रुद्ध हुए, और उसे हाथ में लेकर वहाँ गए जहाँ सोमेश कालभैरव विराजमान हैं।
श्लोक 31 (skanda.7.99.31)
स गत्वा रोष ताम्राक्षश्चक्रोद्यतकरः स्थितः। कृत्यां हंतुं मतिं चक्रे कालभैरवनिर्मिताम्
sa gatvā roṣa tāmrākṣaścakrodyatakaraḥ sthitaḥ| kṛtyāṁ haṁtuṁ matiṁ cakre kālabhairavanirmitām
वहाँ जाकर, क्रोधित, ताम्रनेत्र, चक्र को उठाए हुए हाथ से स्थित होकर, उन्होंने कालभैरव द्वारा निर्मित कृत्या को नष्ट करने का विचार किया।
श्लोक 32 (skanda.7.99.32)
दृष्टो देवैस्ततः सर्वैदंडपाणिगणेन च। देवानां प्रेक्षतां तत्र दण्डपाणिर्महागणः। चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा विष्णुं प्राहाब्जलोचनम्
dṛṣṭo devaistataḥ sarvairdaṇḍapāṇigaṇena ca| devānāṁ prekṣatāṁ tatra daṇḍapāṇirmahāgaṇaḥ| cakrodyatakaraṁ dṛṣṭvā viṣṇuṁ prāhābjalocanam
तब सभी देवों तथा दंडपाणि गण द्वारा देखे जाने पर, वहाँ देवताओं के देखते-देखते, महागण दंडपाणि ने चक्र उठाए हुए हाथ वाले कमललोचन विष्णु को देखकर उनसे कहा।
श्लोक 33 (skanda.7.99.33)
दंडपाणिरुवाच। मा क्रोधं कुरु देवेश कृत्यां प्रति जगत्प्रभो
daṇḍapāṇiruvāca| mā krodhaṁ kuru deveśa kṛtyāṁ prati jagatprabho
दंडपाणि ने कहा—हे देवेश, हे जगत्प्रभो, कृत्या के प्रति क्रोध मत करो।
श्लोक 34 (skanda.7.99.34)
अमोघं युधि ते चक्रं कृत्या चापि च शांकरी। एवं चक्र विनिर्मुक्ते भवेत्कोधो हरे यदि। भविष्यति महद्दुःखं लोकानां संक्षयो हि वा
amoghaṁ yudhi te cakraṁ kṛtyā cāpi ca śāṁkarī| evaṁ cakra vinirmukte bhavetkrodho hare yadi| bhaviṣyati mahadduḥkhaṁ lokānāṁ saṁkṣayo hi vā
'युद्ध में तुम्हारा चक्र अमोघ है, तथा शांकरी कृत्या भी अमोघ है; इस प्रकार चक्र के छूटने पर यदि हरि को क्रोध हो, तो लोकों का महान दुःख अथवा संहार ही हो जाएगा।'
श्लोक 35 (skanda.7.99.35)
न मोक्तव्यमतश्चक्र शृणु भूयो वचश्च नः। अत्र स्थाने नियुक्तोऽहं शंकरेण पुरा हरे
na moktavyamataścakra śṛṇu bhūyo vacaśca naḥ| atra sthāne niyukto'haṁ śaṁkareṇa purā hare
'अतः यह चक्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए; हमारा वचन पुनः सुनो। हे हरे, मैं इस स्थान में पूर्वकाल में शंकर द्वारा नियुक्त किया गया हूँ,'
श्लोक 36 (skanda.7.99.36)
पापिनां रक्षणार्थं वै विघ्नार्थं दुष्टचेतसाम्। तस्मात्त्वं मम सांनिध्ये तिष्ठ चक्रधरो हरे
pāpināṁ rakṣaṇārthaṁ vai vighnārthaṁ duṣṭacetasām| tasmāttvaṁ mama sāṁnidhye tiṣṭha cakradharo hare
'—पापियों की रक्षा हेतु तथा दुष्टचित्तों के विघ्न हेतु। अतः हे हरे, तुम मेरे समीप चक्रधर के रूप में स्थित रहो।'
श्लोक 37 (skanda.7.99.37)
अत्र चक्रधरं देवं पूजयिष्यंति मानवाः। धूपमाल्योपहारैश्च नैवेद्यैर्विविधैरपि
atra cakradharaṁ devaṁ pūjayiṣyaṁti mānavāḥ| dhūpamālyopahāraiśca naivedyairvividhairapi
'यहाँ मनुष्य तुम्हें चक्रधर देव के रूप में धूप, माला, उपहार तथा विविध नैवेद्यों से पूजेंगे।'
श्लोक 38 (skanda.7.99.38)
विष्णुरुवाच। एष एव निवृत्तोहं तव वाक्यांकुशेन वै। अत्र चक्रोद्यतकरः स्थास्ये तव समीपतः
viṣṇuruvāca| eṣa eva nivṛtto'haṁ tava vākyāṁkuśena vai| atra cakrodyatakaraḥ sthāsye tava samīpataḥ
विष्णु ने कहा—'तुम्हारे वचनरूपी अंकुश से मैं अभी निवृत्त हुआ; यहाँ चक्र उठाए हुए हाथ से तुम्हारे समीप स्थित रहूँगा।'
श्लोक 39 (skanda.7.99.39)
एवं हि स्थितोदेवस्तत्र चक्रधरः प्रिये। दंडपाणिश्च भगवान्मम रूपी गणेश्वरः
evaṁ hi sthito devastatra cakradharaḥ priye| daṇḍapāṇiśca bhagavānmama rūpī gaṇeśvaraḥ
इस प्रकार वहाँ चक्रधर देव स्थित हैं, हे प्रिये; तथा भगवान् दंडपाणि, मेरे ही रूप, गणेश्वर,
श्लोक 40 (skanda.7.99.40)
यस्तौ पूजयते भक्त्या दंडपाणिहरी क्रमात्। स पाप कंचुकैर्मुक्तो गच्छेच्छिवपुरं नरः
yastau pūjayate bhaktyā daṇḍapāṇiharī kramāt| sa pāpa kaṁcukairmukto gacchecchivapuraṁ naraḥ
—जो कोई इन दोनों, दंडपाणि और हरि, की क्रमशः भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह मनुष्य पापरूपी कंचुक से मुक्त होकर शिवपुर को प्राप्त होता है।
श्लोक 41 (skanda.7.99.41)
माघे मासि चतुर्द्दश्यां कृष्णाष्टम्यां विशेषतः। गंधधूपोपहारैर्यः पूजयेद्दण्डनायकम्। तस्य क्षेत्रे निवसतो न विघ्नं जायते क्वचित्
māghe māsi caturddaśyāṁ kṛṣṇāṣṭamyāṁ viśeṣataḥ| gandhadhūpopahārairyaḥ pūjayeddaṇḍanāyakam| tasya kṣetre nivasato na vighnaṁ jāyate kvacit
जो विशेष रूप से माघ मास की चतुर्दशी तथा कृष्णाष्टमी को गंध, धूप और उपहारों से दंडनायक की पूजा करता है, उस क्षेत्र में निवास करने वाले को कभी कोई विघ्न नहीं होता।
श्लोक 42 (skanda.7.99.42)
एकादश्यां जिताहारो योऽर्चयेच्चक्रपाणिनम्। स मुक्तः पातकैः सर्वैर्याति विष्णोः सलोकताम्
ekādaśyāṁ jitāhāro yo'rcayeccakrapāṇinam| sa muktaḥ pātakaiḥ sarvairyāti viṣṇoḥ salokatām
जो एकादशी को संयमित आहार से चक्रपाणि की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के सलोक्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 43 (skanda.7.99.43)
इति संक्षेपतः प्रोक्तं माहात्म्यं चक्रपाणिनः। दण्डपाणिगणस्यापि श्रुतं पापौघनाशनम्
iti saṁkṣepataḥ proktaṁ māhātmyaṁ cakrapāṇinaḥ| daṇḍapāṇigaṇasyāpi śrutaṁ pāpaughanāśanam
इस प्रकार संक्षेप में चक्रपाणि का तथा दंडपाणि गण का भी यह माहात्म्य कहा गया, जो पापसमूह का नाशक है।