अम्बिका खण्ड · अध्याय 100
किङ्कर-आदेशन
श्लोक 1 (skanda.8.100.1)
सनत्कुमार उवाच । तस्मिन्भये समापन्ने विनाशभयसूचकाः । हिरण्याक्षपुरे घोरा उत्पाता ह्यभवन् तदा
sanatkumāra uvāca | tasminbhaye samāpanne vināśabhayasūcakāḥ | hiraṇyākṣapure ghorā utpātā hyabhavan tadā
सनत्कुमार ने कहा - जब वह संकट निकट आ गया, तब विनाश के भय को सूचित करने वाले भयंकर उत्पात हिरण्याक्ष की नगरी में होने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.100.2)
अट्टालका विशीर्यन्ते देवताश्चाहसन्निव । शिवा नदन्ति दैत्यानां गृहेषु च सभासु च
aṭṭālakā viśīryante devatāścāhasanniva | śivā nadanti daityānāṁ gṛheṣu ca sabhāsu ca
अटारियाँ ढहने लगीं, देव-प्रतिमाएँ मानो हँसने लगीं; सियारिनें दैत्यों के घरों और सभाओं में बोलने लगीं।
श्लोक 3 (skanda.8.100.3)
अकस्माच्चाभवत्तत्र पौराणां भैरवो रवः । पादपाश्च विना वातं पतन्त्युन्मूलिता भुवि । भास्करश्च कबन्धाभो युद्धञ्चाप्यत्र दृश्यते
akasmāccābhavattatra paurāṇāṁ bhairavo ravaḥ | pādapāśca vinā vātaṁ patantyunmūlitā bhuvi | bhāskaraśca kabandhābho yuddhañcāpyatra dṛśyate
वहाँ नगरवासियों में अकस्मात् भयंकर कोलाहल मच गया; बिना वायु के ही वृक्ष जड़ से उखड़कर पृथ्वी पर गिरने लगे; सूर्य कबन्ध (धड़मात्र) के समान दिखने लगा, और आकाश में युद्ध का दृश्य भी दिखाई देने लगा।
श्लोक 4 (skanda.8.100.4)
सनत्कुमार उवाच । एतान्यन्यानि च तदा निमित्तानि महान्ति च । संलक्ष्य राजा दैत्यानामसुरानिदमब्रवीत्
sanatkumāra uvāca | etānyanyāni ca tadā nimittāni mahānti ca | saṁlakṣya rājā daityānāmasurānidamabravīt
सनत्कुमार ने कहा - इन तथा अन्य अनेक महान् उत्पातों को देखकर, दैत्यों के राजा ने असुरों से यह कहा -
श्लोक 5 (skanda.8.100.5)
निमित्तान्यभि लक्ष्यन्ते महान्त्यसुरपुङ्गवाः । नैव तान्यनिमित्तानि दृश्यते च भयं महत्
nimittānyabhi lakṣyante mahāntyasurapuṅgavāḥ | naiva tānyanimittāni dṛśyate ca bhayaṁ mahat
'हे असुरश्रेष्ठो! बड़े-बड़े उत्पात दिखाई दे रहे हैं; ये निष्कारण नहीं हैं, और महान् भय भी प्रतीत हो रहा है।'
श्लोक 6 (skanda.8.100.6)
हृतराज्याश्च देवेशा न ते स्थास्यन्ति निष्क्रियाः । नूनन्ते किञ्चिदाश्रित्य कुर्वन्ति समरं प्रति
hṛtarājyāśca deveśā na te sthāsyanti niṣkriyāḥ | nūnante kiñcidāśritya kurvanti samaraṁ prati
'देवगण, जिनका राज्य छिन गया है, वे निष्क्रिय नहीं बैठेंगे; निश्चय ही वे किसी न किसी का सहारा लेकर युद्ध की तैयारी कर रहे हैं।'
श्लोक 7 (skanda.8.100.7)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रह्लादोसुरसत्तमः । प्रणम्य पितरं सम्यगिदं वचनमब्रवीत्
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā prahlādosurasattamaḥ | praṇamya pitaraṁ samyagidaṁ vacanamabravīt
सनत्कुमार ने कहा - उनके इस वचन को सुनकर, असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद ने अपने पिता को प्रणाम कर भलीभाँति यह वचन कहा -
श्लोक 8 (skanda.8.100.8)
प्रह्लाद उवाच । सुतोहं तव दैत्येन्द्र पिता त्वं मम धर्मतः । न तवास्मद्विधैर्बुद्धिराधेया दैत्यसत्तम
prahlāda uvāca | sutohaṁ tava daityendra pitā tvaṁ mama dharmataḥ | na tavāsmadvidhairbuddhirādheyā daityasattama
प्रह्लाद ने कहा - हे दैत्येन्द्र! मैं तुम्हारा पुत्र हूँ, और धर्मतः तुम मेरे पिता हो; हे दैत्यसत्तम! हम जैसों को तुम्हें सलाह देना उचित नहीं है।
श्लोक 9 (skanda.8.100.9)
तथापि तु वयं प्रीत्या इच्छन्तो राज्यमक्षयम् । वक्ष्यामो बालभावेन तन्न संस्मर्त्तुमर्हसि
tathāpi tu vayaṁ prītyā icchanto rājyamakṣayam | vakṣyāmo bālabhāvena tanna saṁsmarttumarhasi
'फिर भी हम स्नेहवश तुम्हारे अक्षय राज्य की कामना करते हुए, बालसुलभ भाव से कुछ कहेंगे; तुम्हें उसे बुरा नहीं मानना चाहिए।'
श्लोक 10 (skanda.8.100.10)
अद्य रात्रौ मया स्वप्ने दृष्टोसौ नररूपवान् । वराहरूपं संगत्य भवन्तं निगृहीतवान् । न तथा तद्यथा स्याद्धि तथा त्वं सम्यगाचर
adya rātrau mayā svapne dṛṣṭosau nararūpavān | varāharūpaṁ saṁgatya bhavantaṁ nigṛhītavān | na tathā tadyathā syāddhi tathā tvaṁ samyagācara
'आज रात्रि में मैंने स्वप्न में एक मनुष्य-रूपधारी को देखा, जिसने वराह-रूप धारण कर आपको पकड़ लिया। ऐसा न हो, इसके लिए आप उचित आचरण करें।'
श्लोक 11 (skanda.8.100.11)
हिरण्याक्ष उवाच । एवमेतन्न सन्देहो भवान्यद्धर्मतस्तदा । दृष्टवाँस्तद्यथातत्त्वमेवमेतन्न संशयः
hiraṇyākṣa uvāca | evametanna sandeho bhavānyaddharmatastadā | dṛṣṭavā~stadyathātattvamevametanna saṁśayaḥ
हिरण्याक्ष ने कहा - ऐसा ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुमने धर्मपूर्वक उस स्वप्न को जैसा तत्त्वतः था, वैसा ही देखा है; इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 12 (skanda.8.100.12)
अहमद्य गतः स्वप्ने त्र्यम्बकस्य निवेशने । ततः स मामिदं प्राह भगवान् गोवृषध्वजः
ahamadya gataḥ svapne tryambakasya niveśane | tataḥ sa māmidaṁ prāha bhagavān govṛṣadhvajaḥ
'मैं भी आज स्वप्न में त्र्यम्बक (शिव) के निवास में गया था; वहाँ बैल-ध्वजधारी भगवान् ने मुझसे यह कहा -'
श्लोक 13 (skanda.8.100.13)
एतावद् भवतो दैत्य राज्यमिन्द्रत्वमेव च । यच्छेमां त्वं प्रियां पुत्र सहयक्षाय सुप्रभाम्
etāvad bhavato daitya rājyamindratvameva ca | yacchemāṁ tvaṁ priyāṁ putra sahayakṣāya suprabhām
'"हे दैत्य! इतना ही तुम्हारा राज्य और इन्द्रपद था; अब हे पुत्र! अपनी इस प्रिय, तेजस्वी [राज-श्री] को यक्ष के हवाले कर दो।"'
श्लोक 14 (skanda.8.100.14)
क्षिप्रमेतां प्रयच्छाद्य मुकुटं हारमेव च । केयूराङ्गदकं चैव खङ्गं रुचकमेव च
kṣiprametāṁ prayacchādya mukuṭaṁ hārameva ca | keyūrāṅgadakaṁ caiva khaṅgaṁ rucakameva ca
'"इसे शीघ्र सौंप दो - मुकुट, हार, केयूर, अंगद, खड्ग और रुचक (आभूषण) भी।"'
श्लोक 15 (skanda.8.100.15)
कटके शासनञ्चैव दुकूलञ्च तथोतरीम् । अनिच्छतो मे संगृह्य शक्रस्य प्रददौ तदा
kaṭake śāsanañcaiva dukūlañca tathotarīm | anicchato me saṁgṛhya śakrasya pradadau tadā
'"बाजूबन्द, राज-आज्ञापत्र, रेशमी वस्त्र और उत्तरीय भी।"' - मेरी अनिच्छा के बावजूद उन्होंने मुझसे ये सब छीनकर उसी समय शक्र को दे दिए।
श्लोक 16 (skanda.8.100.16)
ततो मां भगवानाह मत्समीपे त्वया सदा । कल्यं प्रभृति वस्तव्यं किन्ते राज्येन दैत्यप
tato māṁ bhagavānāha matsamīpe tvayā sadā | kalyaṁ prabhṛti vastavyaṁ kinte rājyena daityapa
फिर भगवान् ने मुझसे कहा - 'कल से तुम सदा मेरे समीप निवास करना; हे दैत्यप! तुम्हें अब राज्य से क्या प्रयोजन?'
श्लोक 17 (skanda.8.100.17)
यदेतद्धि मया दृष्टं न तन्मिथ्या भविष्यति । सर्वथा नास्ति दैत्यानां मयैकेन भवं त्विह
yadetaddhi mayā dṛṣṭaṁ na tanmithyā bhaviṣyati | sarvathā nāsti daityānāṁ mayaikena bhavaṁ tviha
जो मैंने यह देखा है, वह मिथ्या नहीं होगा; अब दैत्यों का यह [कल्याण] अकेले मेरे भरोसे सर्वथा सम्भव नहीं है।
श्लोक 18 (skanda.8.100.18)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दैत्याः सर्वे तदाब्रुवन् । मिथ्यैतत् स्वप्नगतयो मिथ्या राजन् प्रकीर्तिताः
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā daityāḥ sarve tadābruvan | mithyaitat svapnagatayo mithyā rājan prakīrtitāḥ
सनत्कुमार ने कहा - उनके इस वचन को सुनकर समस्त दैत्यों ने कहा - 'हे राजन्! यह मिथ्या है; स्वप्न-दर्शन तो सदा से मिथ्या ही कहे गए हैं।'
श्लोक 19 (skanda.8.100.19)
अन्धकः सहितोस्माभिर्योत्स्यते दैवतैः सह । योवध्यः सर्वभूतानां बलवानजितश्च ह
andhakaḥ sahitosmābhiryotsyate daivataiḥ saha | yovadhyaḥ sarvabhūtānāṁ balavānajitaśca ha
'अन्धक, जो समस्त प्राणियों के लिए अवध्य है, बलवान् और अपराजित है, वह हमारे साथ मिलकर देवताओं से युद्ध करेगा।'
श्लोक 20 (skanda.8.100.20)
तमाश्रित्य वयं सर्वे योत्स्यामो विज्वराः सुखम् । मा युध्यतु भवान्सार्धं सुरैः सुरबलार्दन
tamāśritya vayaṁ sarve yotsyāmo vijvarāḥ sukham | mā yudhyatu bhavānsārdhaṁ suraiḥ surabalārdana
'उसका सहारा लेकर हम सब निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक युद्ध करेंगे; हे सुरबल-मर्दन! आप देवताओं के साथ स्वयं युद्ध न करें।'
श्लोक 21 (skanda.8.100.21)
त्वयि प्राणाः स्थितास्सर्वे दैत्यानां दानवैस्सह । त्वयि जीवति जीवामस्त्वञ्चेन्नासि कुतो वयम् । त्यक्त्वा वाद्य पुरं सर्वे प्रविशाम महोदधिम्
tvayi prāṇāḥ sthitāssarve daityānāṁ dānavaissaha | tvayi jīvati jīvāmastvañcennāsi kuto vayam | tyaktvā vādya puraṁ sarve praviśāma mahodadhim
'हे राजन्! दैत्यों और दानवों के समस्त प्राण तुझ में ही टिके हैं; तेरे जीवित रहने पर हम जीते हैं, और यदि तू नहीं रहेगा तो हम कहाँ रहेंगे? अन्यथा आज हम सब नगर त्यागकर महासागर में प्रवेश कर जाएँ।'
श्लोक 22 (skanda.8.100.22)
सनत्कुमार उवाच । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा हिरण्याक्षो महासुरः । प्रहस्य तानिदं सम्यगुवाच वदतां वरः
sanatkumāra uvāca | teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā hiraṇyākṣo mahāsuraḥ | prahasya tānidaṁ samyaguvāca vadatāṁ varaḥ
सनत्कुमार ने कहा - उनके इस वचन को सुनकर महासुर हिरण्याक्ष, वक्ताओं में श्रेष्ठ, हँसकर भलीभाँति उनसे यह कहने लगा -
श्लोक 23 (skanda.8.100.23)
स्रष्टा यः सर्वभूतानां दाता हर्त्ता तथैव च । विहितं तेन यत् पूर्वं तत्कुर्यात् कोन्यथा पुनः
sraṣṭā yaḥ sarvabhūtānāṁ dātā harttā tathaiva ca | vihitaṁ tena yat pūrvaṁ tatkuryāt konyathā punaḥ
'जो समस्त प्राणियों का स्रष्टा, दाता और हर्ता है, उसने पहले जो विधान कर दिया है, उसे कौन दूसरा बदल सकता है?'
श्लोक 24 (skanda.8.100.24)
यदि मृत्युरवश्यं मे विहितस्तेन दानवाः । अयुध्यमानमासीनमेत्यासौ मा वधिष्यति
yadi mṛtyuravaśyaṁ me vihitastena dānavāḥ | ayudhyamānamāsīnametyāsau mā vadhiṣyati
'हे दानवो! यदि उसने अवश्य ही मेरी मृत्यु का विधान कर रखा है, तो वह बिना युद्ध किए बैठे हुए भी मुझे आकर मार डालेगी।'
श्लोक 25 (skanda.8.100.25)
वीक्षध्वं तन्मम स्थानं सर्व एवासुरोत्तमाः । यत्र तिष्ठन्तमभ्येत्य न मा मृत्युर्नयिष्यति
vīkṣadhvaṁ tanmama sthānaṁ sarva evāsurottamāḥ | yatra tiṣṭhantamabhyetya na mā mṛtyurnayiṣyati
'तुम सब, हे असुरश्रेष्ठो! मेरा वह स्थान देखो, जहाँ खड़े रहने पर मृत्यु आकर भी मुझे नहीं ले जा सकेगी।'
श्लोक 26 (skanda.8.100.26)
अथवा नैव मृत्युर्मे विहितस्तेन दानवाः । युध्यमानं यथा पूर्वं नैव मां स नयिष्यति
athavā naiva mṛtyurme vihitastena dānavāḥ | yudhyamānaṁ yathā pūrvaṁ naiva māṁ sa nayiṣyati
'अथवा, हे दानवो! यदि उसने मेरी मृत्यु का विधान ही नहीं किया है, तो पूर्व की भाँति युद्ध करते हुए भी वह मुझे कदापि नहीं ले जा सकेगी।'
श्लोक 27 (skanda.8.100.27)
मादृशः कथमेवैतत् कुर्यात् सद्भिर्विगर्हितम् । बाले मृत्युं समावेश्य ततश्चात्मान्तरेक्षणम्
mādṛśaḥ kathamevaitat kuryāt sadbhirvigarhitam | bāle mṛtyuṁ samāveśya tataścātmāntarekṣaṇam
'मुझ जैसा कोई सज्जनों द्वारा निन्दित इस कार्य को कैसे कर सकता है - एक बालक पर मृत्यु का भार डालकर स्वयं अपनी रक्षा में लग जाना?'
श्लोक 28 (skanda.8.100.28)
रणे रिपूणां कदनं कृत्वैकश्चाप्यनेकशः । पृष्ठं दद्यात् पुनस्तेषां मादृशो दानवेश्वराः
raṇe ripūṇāṁ kadanaṁ kṛtvaikaścāpyanekaśaḥ | pṛṣṭhaṁ dadyāt punasteṣāṁ mādṛśo dānaveśvarāḥ
'हे दानवेश्वरो! युद्ध में अकेले ही अनेक शत्रुओं का संहार करके, क्या मुझ जैसा कोई पुनः उनकी ओर पीठ दिखा सकता है?'
श्लोक 29 (skanda.8.100.29)
विप्रचित्तिरुवाच । देवा ह्यनेकशः सर्वे जिता नष्टाश्च सर्वशः । पुनश्चायान्ति न यथा तथा सर्वे यतामहे
vipracittiruvāca | devā hyanekaśaḥ sarve jitā naṣṭāśca sarvaśaḥ | punaścāyānti na yathā tathā sarve yatāmahe
विप्रचित्ति ने कहा - समस्त देवता अनेक बार जीते और सर्वथा नष्ट किए जा चुके हैं; अब हम सब ऐसा प्रयत्न करें कि वे पुनः न आ सकें।
श्लोक 30 (skanda.8.100.30)
हिरण्याक्ष उवाच । अमरं देवता ज्ञात्वा स्वमात्मानं सुदुर्लभम् । जीवन्तः सुचिरेणापि भूयो लप्स्यामहे वयम्
hiraṇyākṣa uvāca | amaraṁ devatā jñātvā svamātmānaṁ sudurlabham | jīvantaḥ sucireṇāpi bhūyo lapsyāmahe vayam
हिरण्याक्ष ने कहा - देवताओं को अमर जानकर, और अपने आपको अत्यन्त दुर्लभ जानकर, हम जीवित रहते हुए, चाहे बहुत समय बाद ही सही, इसे पुनः प्राप्त कर लेंगे।
श्लोक 31 (skanda.8.100.31)
राज्यमेव विजानन्तो विपलायन्ति नित्यशः । अस्माकममरत्वन्तु नैवास्त्यसुरसत्तमाः
rājyameva vijānanto vipalāyanti nityaśaḥ | asmākamamaratvantu naivāstyasurasattamāḥ
'वे तो केवल राज्य के लिए ही जानते हुए सदा भाग जाते हैं; परन्तु हे असुरश्रेष्ठो! हमारे लिए तो अमरत्व है ही नहीं।'
श्लोक 32 (skanda.8.100.32)
नष्टानामप्यतोस्माकं जीविताशा न विद्यते । तस्यामसत्यां पश्याम यत् प्राप्तं तद्धि नो वरम्
naṣṭānāmapyatosmākaṁ jīvitāśā na vidyate | tasyāmasatyāṁ paśyāma yat prāptaṁ taddhi no varam
'इसलिए, नष्ट हो जाने पर हमें जीवन की कोई आशा नहीं रहती। वह आशा न होने पर भी, जो कुछ हमें प्राप्त हो, वही हमारे लिए श्रेष्ठ है - ऐसा हम देखें।'
श्लोक 33 (skanda.8.100.33)
मा कृथा नाशने बुद्धिं युद्धे बुद्धिः स्थिता मम । सुयुद्धेन रणे प्राणा यान्तु मा क्लीबवद्धि नः
mā kṛthā nāśane buddhiṁ yuddhe buddhiḥ sthitā mama | suyuddhena raṇe prāṇā yāntu mā klībavaddhi naḥ
'विनाश (पलायन) में बुद्धि मत लगाओ; मेरी बुद्धि युद्ध में ही स्थिर है। हमारे प्राण युद्ध में भलीभाँति लड़कर ही जाएँ, कायरों की भाँति नहीं।'
श्लोक 34 (skanda.8.100.34)
सनत्कुमार उवाच । तेषामेवन्तु वदतां सभायां सुरविद्विषाम् । वेगश्वासाभिसंरब्धो दानवः प्रत्यदृश्यत
sanatkumāra uvāca | teṣāmevantu vadatāṁ sabhāyāṁ suravidviṣām | vegaśvāsābhisaṁrabdho dānavaḥ pratyadṛśyata
सनत्कुमार ने कहा - जब उन देव-द्वेषियों की सभा में यह वार्तालाप चल रहा था, तभी वेग से हाँफता हुआ, अत्यन्त व्याकुल एक दानव प्रकट हुआ,
श्लोक 35 (skanda.8.100.35)
सम्यक् सन्त्रासित इव मृगराजेन निर्जने । करीव सिंहपादेन गरुडेनेव पन्नगः
samyak santrāsita iva mṛgarājena nirjane | karīva siṁhapādena garuḍeneva pannagaḥ
मानो एकान्त में मृगराज (सिंह) से भयभीत हो गया हो, जैसे सिंह के पंजे से हाथी, और जैसे गरुड़ से सर्प भयभीत होता है।
श्लोक 36 (skanda.8.100.36)
तदा स बद्धमुष्टिश्च दिशः सर्वा विलोकयन् । वेगेन निःश्वसन् गत्वा द्वारि द्वाःस्थमभाषत
tadā sa baddhamuṣṭiśca diśaḥ sarvā vilokayan | vegena niḥśvasan gatvā dvāri dvāḥsthamabhāṣata
तब वह मुट्ठियाँ बाँधे, चारों दिशाओं को देखता हुआ, वेग से साँस लेते हुए, द्वार पर जाकर द्वारपाल से बोला -
श्लोक 37 (skanda.8.100.37)
दानव उवाच । आवेदय सभापाल राज्ञे प्राप्तोनलः स्वयम् । सागरारक्षिकः क्षिप्रमकालं शीघ्रमुच्यते
dānava uvāca | āvedaya sabhāpāla rājñe prāptonalaḥ svayam | sāgarārakṣikaḥ kṣipramakālaṁ śīghramucyate
दानव ने कहा - हे सभापाल! राजा से निवेदन करो कि सागर का रक्षक, वह तेजस्वी दूत, स्वयं आ पहुँचा है; शीघ्र करो, यह असामयिक और अत्यावश्यक है।
श्लोक 38 (skanda.8.100.38)
ततः प्रहस्य तं द्वाःस्थः सभापालोभिभाष्य तम् । उवाच मा भीर्भवतु कुतो भीस्ते महासुर
tataḥ prahasya taṁ dvāḥsthaḥ sabhāpālobhibhāṣya tam | uvāca mā bhīrbhavatu kuto bhīste mahāsura
तब द्वारपाल, सभापाल ने हँसकर उससे कहा - 'भयभीत मत हो, हे महासुर! तुम्हें भय किस बात का है?'
श्लोक 39 (skanda.8.100.39)
नेह सिंहोस्ति चोरो वा नान्यः श्वापद इत्यपि । न गावः पशवोन्ये वा भयं त्यज समाश्वस
neha siṁhosti coro vā nānyaḥ śvāpada ityapi | na gāvaḥ paśavonye vā bhayaṁ tyaja samāśvasa
'यहाँ न कोई सिंह है, न चोर, न कोई अन्य हिंसक पशु; न गौएँ हैं, न अन्य पशु भागे हुए हैं। भय त्याग दो और सम्भल जाओ।'
श्लोक 40 (skanda.8.100.40)
स तथा तेन संप्रोक्तो शान्तश्चासुरसत्तमः । क्रुद्धः शब्दं तदा चक्रे महान्तं नादयन् दिशः
sa tathā tena saṁprokto śāntaścāsurasattamaḥ | kruddhaḥ śabdaṁ tadā cakre mahāntaṁ nādayan diśaḥ
इस प्रकार उसके द्वारा शान्त किए जाने पर भी वह असुरश्रेष्ठ क्रुद्ध हो उठा, और उस समय दिशाओं को गुँजाता हुआ महान् शब्द किया।
श्लोक 41 (skanda.8.100.41)
तेभिगम्य तदा व्यास राजानं दानवेश्वरम् । ऊचुरेष किमप्यद्य दृष्टं कथयतेसुरः
tebhigamya tadā vyāsa rājānaṁ dānaveśvaram | ūcureṣa kimapyadya dṛṣṭaṁ kathayatesuraḥ
(इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूल में अप्राप्त है) - वे तब, हे व्यास! दानवेश्वर राजा के पास जाकर बोले - 'यह असुर आज जो कुछ भी देखा है, वह कह दे।'
श्लोक 42 (skanda.8.100.42)
स राजन् सम्यगाश्वास्य दैत्यमेनं महायशाः । दानवानां हितार्थाय पृच्छस्व दितिनन्दन
sa rājan samyagāśvāsya daityamenaṁ mahāyaśāḥ | dānavānāṁ hitārthāya pṛcchasva ditinandana
'हे राजन्! हे महायश! हे दिति-नन्दन! इस दैत्य को भलीभाँति आश्वस्त कर, दानवों के हित के लिए इससे पूछो।'
श्लोक 43 (skanda.8.100.43)
तेषां स राजा विप्रेन्द्र दानवानां महाबलः । श्रुत्वा तं दानवं व्यास इदं वचनमब्रवीत्
teṣāṁ sa rājā viprendra dānavānāṁ mahābalaḥ | śrutvā taṁ dānavaṁ vyāsa idaṁ vacanamabravīt
हे विप्रेन्द्र! उन दानवों का वह महाबली राजा, हे व्यास! उस दानव की बात सुनकर उससे यह वचन बोला -
श्लोक 44 (skanda.8.100.44)
भयं न शक्नुते दैत्य मत्समीपेभिवर्तितुम् । ब्रूहि सर्वं यथादृष्टं समाश्वस्य तथातथम्
bhayaṁ na śaknute daitya matsamīpebhivartitum | brūhi sarvaṁ yathādṛṣṭaṁ samāśvasya tathātatham
'हे दैत्य! मेरे समीप भय टिक नहीं सकता; सम्भलकर, जैसा देखा है वैसा ही, सब कुछ क्रमशः बताओ।'
श्लोक 45 (skanda.8.100.45)
सनत्कुमार उवाच । ततस्स दानवो व्यास राजानं विगतज्वरः । प्रणम्य प्राञ्जलिर्वाक्यमिदं सम्यगुवाच ह
sanatkumāra uvāca | tatassa dānavo vyāsa rājānaṁ vigatajvaraḥ | praṇamya prāñjalirvākyamidaṁ samyaguvāca ha
सनत्कुमार ने कहा - तब हे व्यास! उस दानव का व्याकुलता से मुक्त होकर, हाथ जोड़कर राजा को प्रणाम कर, यह वचन भलीभाँति कहा -
श्लोक 46 (skanda.8.100.46)
नित्यं जयतु नो राजा दानवानां सुखावहः । नश्यन्तु विद्विषः सर्वे येस्माकमहितावहाः
nityaṁ jayatu no rājā dānavānāṁ sukhāvahaḥ | naśyantu vidviṣaḥ sarve yesmākamahitāvahāḥ
'दानवों को सुख देने वाले हमारे राजा सदा विजयी हों! हमारा अहित करने वाले समस्त शत्रु नष्ट हों!'
श्लोक 47 (skanda.8.100.47)
अहं तवाज्ञया सर्वं विचरामि दिने दिने । सागरान्तं महाराज पुरुषैस्सह संगतः
ahaṁ tavājñayā sarvaṁ vicarāmi dine dine | sāgarāntaṁ mahārāja puruṣaissaha saṁgataḥ
'हे महाराज! मैं आपकी आज्ञा से अपने पुरुषों सहित प्रतिदिन सागर के तट तक विचरण करता रहता हूँ।'
श्लोक 48 (skanda.8.100.48)
सोद्य पश्याम्यहं तत्र वराहं दैत्यपुङ्गव । मेरुशृङ्गप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव पावकम्
sodya paśyāmyahaṁ tatra varāhaṁ daityapuṅgava | meruśṛṅgapratīkāśaṁ jvalantamiva pāvakam
'हे दैत्यपुंगव! आज मैंने वहाँ एक वराह को देखा, जो मेरु के शिखर के समान, अग्नि के समान प्रज्वलित था।'
श्लोक 49 (skanda.8.100.49)
तस्य गात्रेषु दृश्यन्ते सूक्ष्मरूपधराः स्थिताः । सर्वे सुरा महाराज ऋषयश्च तपोधनाः
tasya gātreṣu dṛśyante sūkṣmarūpadharāḥ sthitāḥ | sarve surā mahārāja ṛṣayaśca tapodhanāḥ
'हे महाराज! उसके अंगों में सूक्ष्म-रूपधारी होकर स्थित समस्त देवता और तपोधन ऋषि दिखाई देते हैं।'
श्लोक 50 (skanda.8.100.50)
महाबलस्त्वं राजेन्द्र देवानां भयदः सदा । त्वत्तोपि सुमहान् भीमस्तादृङ् नैवेह विद्यते
mahābalastvaṁ rājendra devānāṁ bhayadaḥ sadā | tvattopi sumahān bhīmastādṛṅ naiveha vidyate
'हे राजेन्द्र! तुम अत्यन्त बलशाली हो, सदा देवताओं को भयभीत करने वाले हो; परन्तु तुमसे भी अत्यन्त विशाल और भयंकर ऐसा प्राणी यहाँ पहले कभी नहीं था।'
श्लोक 51 (skanda.8.100.51)
न दृष्टो न श्रुतो वापि वपुषा दैत्यपुङ्गव । अहं तेनाहतो दृष्ट्या न्यपतं भूतले भृशम्
na dṛṣṭo na śruto vāpi vapuṣā daityapuṅgava | ahaṁ tenāhato dṛṣṭyā nyapataṁ bhūtale bhṛśam
'हे दैत्यपुंगव! ऐसा रूप न कभी देखा गया है, न सुना गया है। उसकी केवल दृष्टि से आहत होकर ही मैं भूमि पर गिर पड़ा।'
श्लोक 52 (skanda.8.100.52)
स्रस्तहाराम्बरो भीतः कुलिशेनेव ताडितः । ये ममानुचराश्चासन् दानवा भीमविक्रमाः
srastahārāmbaro bhītaḥ kuliśeneva tāḍitaḥ | ye mamānucarāścāsan dānavā bhīmavikramāḥ
मेरे हार और वस्त्र ढीले होकर गिर गए, मानो वज्र से आहत होकर भयभीत हो गया हूँ; और जो भयंकर पराक्रमी दानव मेरे अनुचर थे -
श्लोक 53 (skanda.8.100.53)
ते सर्वे तस्य वेगेन पतिता गतजीविताः । स एषोभ्येति राजेन्द्र तवैव नगरं प्रति
te sarve tasya vegena patitā gatajīvitāḥ | sa eṣobhyeti rājendra tavaiva nagaraṁ prati
- वे सब उसके वेग से गिरकर प्राणहीन हो गए। हे राजेन्द्र! वह अब तुम्हारी ही नगरी की ओर बढ़ रहा है,
श्लोक 54 (skanda.8.100.54)
चालयन् वसुधां सर्वां क्षोभयन् सागरांस्तथा । जलेचराँश्च दैत्येन्द्र जीवितैर्विप्रयोजयन्
cālayan vasudhāṁ sarvāṁ kṣobhayan sāgarāṁstathā | jalecarā~śca daityendra jīvitairviprayojayan
- सम्पूर्ण पृथ्वी को कँपाता, सागरों को क्षुब्ध करता, और हे दैत्येन्द्र! जल में रहने वाले जीवों को प्राणों से वंचित करता हुआ।'
श्लोक 55 (skanda.8.100.55)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रह्लादोसुरसत्तमः । उवाच दैत्यराजानमिदं वचनमर्थवत्
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā prahlādosurasattamaḥ | uvāca daityarājānamidaṁ vacanamarthavat
सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद ने दैत्यराज से यह अर्थपूर्ण वचन कहा -
श्लोक 56 (skanda.8.100.56)
प्रह्लाद उवाच । यादृशं तद्वराहस्य तस्य रूपं मया श्रुतम् । सर्वदेवमयं राजन् वराहोप्राकृतो मतः
prahlāda uvāca | yādṛśaṁ tadvarāhasya tasya rūpaṁ mayā śrutam | sarvadevamayaṁ rājan varāhoprākṛto mataḥ
प्रह्लाद ने कहा - हे राजन्! जैसा उस वराह का रूप मैंने सुना है, यह वराह सम्पूर्ण देवताओं से बना हुआ है, और कोई साधारण प्राणी नहीं माना जाना चाहिए।
श्लोक 57 (skanda.8.100.57)
तस्मात्त्वया विधातव्यं यथा नो न स मोहयेत् । विनिश्चित्य च दैत्येन्द्र मा चिरं तद्विधीयताम्
tasmāttvayā vidhātavyaṁ yathā no na sa mohayet | viniścitya ca daityendra mā ciraṁ tadvidhīyatām
'अतः तुम्हें ऐसा उपाय करना चाहिए कि वह हमें भ्रमित न कर सके; हे दैत्येन्द्र! भलीभाँति निश्चय करके इसमें विलम्ब न किया जाए।'
श्लोक 58 (skanda.8.100.58)
सुव्यक्तं ब्रह्मणा तस्य चक्रलाङ्गलधारिणः । सर्वदेवमयं रूपं वाराहमिदमीहितम्
suvyaktaṁ brahmaṇā tasya cakralāṅgaladhāriṇaḥ | sarvadevamayaṁ rūpaṁ vārāhamidamīhitam
'यह सम्पूर्ण देवताओं से बना यह वराह-रूप स्पष्टतः ब्रह्मा द्वारा, चक्र और हल धारण करने वाले उस [विष्णु] के लिए ही रचा गया है।'
श्लोक 59 (skanda.8.100.59)
भवानवध्यस्सर्वेषां देवानां दानवेश्वर । अशक्तैस्तैरियं माया सृष्टा वै न तदन्यथा
bhavānavadhyassarveṣāṁ devānāṁ dānaveśvara | aśaktaistairiyaṁ māyā sṛṣṭā vai na tadanyathā
'हे दानवेश्वर! आप समस्त देवताओं के लिए अवध्य हैं; इसीलिए असमर्थ होने के कारण उन्होंने यह माया रची है, इसमें और कुछ नहीं है।'
श्लोक 60 (skanda.8.100.60)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हिरण्याक्षः प्रतापवान् । उवाच दैत्यान्दनुजानिदं वचनमर्थवत्
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | uvāca daityāndanujānidaṁ vacanamarthavat
सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर प्रतापी हिरण्याक्ष ने दैत्यों और दानवों से यह अर्थपूर्ण वचन कहा -
श्लोक 61 (skanda.8.100.61)
हिरण्याक्ष उवाच । यद्येष भ्रातृहन्ता मे इहायाति दुरात्मवान् । पूर्णः स्यादद्य सुचिराद्यो मे हृदि मनोरथः
hiraṇyākṣa uvāca | yadyeṣa bhrātṛhantā me ihāyāti durātmavān | pūrṇaḥ syādadya sucirādyo me hṛdi manorathaḥ
हिरण्याक्ष ने कहा - यदि यह मेरे भाई का हन्ता, वह दुरात्मा, यहाँ आ रहा है, तो आज दीर्घकाल के बाद मेरे हृदय की वह अभिलाषा पूर्ण हो जाएगी।
श्लोक 62 (skanda.8.100.62)
अद्याहं तं दुरात्मानं भ्रातृहन्तारमाहवे । छित्त्वा छित्त्वा करिष्यामि बलिं पशुपतेः शुभम्
adyāhaṁ taṁ durātmānaṁ bhrātṛhantāramāhave | chittvā chittvā kariṣyāmi baliṁ paśupateḥ śubham
'आज मैं युद्ध में उस दुरात्मा भ्रातृ-हन्ता को बार-बार काटकर पशुपति को शुभ बलि के रूप में अर्पित करूँगा।'
श्लोक 63 (skanda.8.100.63)
अद्य तस्य विचित्राक्षं शिरः कायात् सकुण्डलम् । उत्कृत्य दैत्या दास्यामि रुद्राय परमात्मने
adya tasya vicitrākṣaṁ śiraḥ kāyāt sakuṇḍalam | utkṛtya daityā dāsyāmi rudrāya paramātmane
'हे दैत्यो! आज मैं उसके विचित्र नेत्रों वाले, कुण्डल-सहित शिर को उसके धड़ से काटकर परमात्मा रुद्र को अर्पित करूँगा।'
श्लोक 64 (skanda.8.100.64)
मया नासादितः पूर्वं तस्मिन्युद्धे स केशवः । अद्याहं तं समासाद्य नेष्यामि यमसादनम्
mayā nāsāditaḥ pūrvaṁ tasminyuddhe sa keśavaḥ | adyāhaṁ taṁ samāsādya neṣyāmi yamasādanam
'पहले मेरा उस केशव से युद्ध में सामना नहीं हुआ; आज मैं उसका सामना कर उसे यम के धाम पहुँचा दूँगा।'
श्लोक 65 (skanda.8.100.65)
अथ तस्मिन्हते सर्वे निराशा भयविह्वलाः । ममैवा कार्यतां गत्वा देवा यास्यन्ति दासताम्
atha tasminhate sarve nirāśā bhayavihvalāḥ | mamaivā kāryatāṁ gatvā devā yāsyanti dāsatām
'फिर उसके मारे जाने पर समस्त देवता निराश और भय से विह्वल होकर, केवल मेरी ही आज्ञा में रहकर, दासत्व को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 66 (skanda.8.100.66)
सनत्कुमार उवाच । ततः स दानवाञ्छूरान् दैत्याँश्च सुमहाबलान् । उवाच नाम्ना विख्यातान् किङ्करान्नाम दानवान्
sanatkumāra uvāca | tataḥ sa dānavāñchūrān daityā~śca sumahābalān | uvāca nāmnā vikhyātān kiṅkarānnāma dānavān
सनत्कुमार ने कहा - तब उसने उन शूरवीर दानवों और अत्यन्त बलशाली दैत्यों से, जो 'किंकर' नाम से प्रसिद्ध थे, यह कहा -
श्लोक 67 (skanda.8.100.67)
दश तानि सहस्राणि गच्छध्वं तं महाबलाः । जानीत कोयमित्येवं ततो यास्याम्यहं स्वयम्
daśa tāni sahasrāṇi gacchadhvaṁ taṁ mahābalāḥ | jānīta koyamityevaṁ tato yāsyāmyahaṁ svayam
'हे महाबलियो! तुम दस हजार [की संख्या में] उसके पास जाओ; यह पता लगाओ कि यह कौन है - इसके बाद मैं स्वयं जाऊँगा।'
श्लोक 68 (skanda.8.100.68)
ते तथोक्ता महामाया हृष्टाः सर्वे विनिर्गताः । बद्धगोधांगुलित्राणाः सन्नद्धास्तु पदातयः
te tathoktā mahāmāyā hṛṣṭāḥ sarve vinirgatāḥ | baddhagodhāṁgulitrāṇāḥ sannaddhāstu padātayaḥ
इस प्रकार आदेश पाकर, महान् मायाशक्ति से सम्पन्न वे सब हर्षित होकर निकल पड़े; अंगुलि-त्राण बाँधे हुए, सुसज्जित पैदल सैनिक चल पड़े।
श्लोक 69 (skanda.8.100.69)
ते हेमचित्राम्बरहारसूत्रा महाबला दानवदैत्यपुत्राः । विनादयन्तो बहुधातिकोपिता यथैव नागाः सविषा विनिर्ययुः
te hemacitrāmbarahārasūtrā mahābalā dānavadaityaputrāḥ | vinādayanto bahudhātikopitā yathaiva nāgāḥ saviṣā viniryayuḥ
स्वर्ण-जटित वस्त्रों और हार-मालाओं से सुसज्जित वे महाबली दानव-दैत्य-पुत्र, अत्यन्त कुपित होकर नाना प्रकार से गर्जना करते हुए, विषैले सर्पों के समान बाहर निकल पड़े।