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अम्बिका खण्ड · अध्याय 99

वराह का सागर-प्रवेश

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

श्लोक 1 (skanda.8.99.1)

सनत्कुमार उवाच । स संप्रयातो धर्मात्मा नर्दमानो यथा घनः । सर्वलोकमयो देवो वराहो नन्दिवर्धनः

sanatkumāra uvāca | sa saṁprayāto dharmātmā nardamāno yathā ghanaḥ | sarvalokamayo devo varāho nandivardhanaḥ

सनत्कुमार ने कहा - वह धर्मात्मा, सम्पूर्ण लोकों से बना हुआ देव, आनन्दवर्धक वराह मेघ के समान गर्जन करते हुए चल पड़ा।

श्लोक 2 (skanda.8.99.2)

अपश्यत् सागरञ्चैव संप्राप्यातिबलस्तदा । नर्दमानं यथा मेघं लीयमानं मृगेन्द्रवत्

apaśyat sāgarañcaiva saṁprāpyātibalastadā | nardamānaṁ yathā meghaṁ līyamānaṁ mṛgendravat

उस अत्यन्त बलशाली ने वहाँ पहुँचकर समुद्र को देखा, जो कभी मेघ के समान गरजता था, कभी सिंह के समान दुबककर बैठ जाता था।

श्लोक 3 (skanda.8.99.3)

नर्तकीमिव नृत्यन्तं वल्गन्तं चैव योधवत् । मण्डलैर्बहुभिश्चित्रैश्चरन्तं वसुधां तथा

nartakīmiva nṛtyantaṁ valgantaṁ caiva yodhavat | maṇḍalairbahubhiścitraiścarantaṁ vasudhāṁ tathā

वह नर्तकी के समान नाचता, योद्धा के समान उछलता, और अनेक विचित्र मण्डलों में पृथ्वी पर घूमता हुआ प्रतीत होता था -

श्लोक 4 (skanda.8.99.4)

नियुद्धकुशलं यद्वद् गदायुद्धविशारदम् । तदा तद्बहुधा चित्रमपश्यन्नन्दिवर्धनः

niyuddhakuśalaṁ yadvad gadāyuddhaviśāradam | tadā tadbahudhā citramapaśyannandivardhanaḥ

- मानो कुश्ती में निपुण और गदा-युद्ध में प्रवीण हो। इस प्रकार नन्दिवर्धन ने उस समय उस विचित्र दृश्य को अनेक रूपों में देखा।

श्लोक 5 (skanda.8.99.5)

स तमर्घेण देवेशं सर्वलोकमयं विभुम् । पूजयामास देवाँश्च ऋषयो ये च संगताः

sa tamargheṇa deveśaṁ sarvalokamayaṁ vibhum | pūjayāmāsa devā~śca ṛṣayo ye ca saṁgatāḥ

उस सर्वलोकमय, सर्वव्यापी देवेश को उन देवताओं और वहाँ एकत्र हुए ऋषियों ने अर्घ्य से पूजित किया।

श्लोक 6 (skanda.8.99.6)

स जयाय प्रगृह्यैनमनुमान्य महोदधिम् । निवर्त्य सर्वभूतानि प्रविवेश महार्णवम्

sa jayāya pragṛhyainamanumānya mahodadhim | nivartya sarvabhūtāni praviveśa mahārṇavam

विजय के लिए उसने उस महासागर का सम्मान कर उसे अपनी ओर आकृष्ट किया, फिर सभी प्राणियों को लौटाकर वह महासागर में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 7 (skanda.8.99.7)

विगाहमानः सक्रीडमर्णवं विबभौ विभुः । सरः सुमहदासाद्य यथा मत्तो महागजः

vigāhamānaḥ sakrīḍamarṇavaṁ vibabhau vibhuḥ | saraḥ sumahadāsādya yathā matto mahāgajaḥ

क्रीड़ा करते हुए सागर में डुबकी लगाते वह प्रभु वैसे ही शोभित हुए, जैसे कोई मदमत्त गजराज विशाल सरोवर में पहुँचकर शोभित होता है।

श्लोक 8 (skanda.8.99.8)

संप्रविश्य सुदूरञ्च सोदृश्यः समपद्यत । भूमिलेखावृतः सूर्यो यथा संपूर्णमण्डलः

saṁpraviśya sudūrañca sodṛśyaḥ samapadyata | bhūmilekhāvṛtaḥ sūryo yathā saṁpūrṇamaṇḍalaḥ

बहुत दूर तक प्रवेश करके वह अदृश्य हो गया, जैसे क्षितिज-रेखा से ढका हुआ पूर्ण मण्डल वाला सूर्य अदृश्य हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.8.99.9)

ततोन्तर्जलमाविश्य क्षोभयाणो महार्णवम् । जलचन्द्रकवद् व्यास अदृश्यत स लोकपैः

tatontarjalamāviśya kṣobhayāṇo mahārṇavam | jalacandrakavad vyāsa adṛśyata sa lokapaiḥ

फिर जल के भीतर प्रवेश कर, महासागर को क्षुब्ध करते हुए, हे व्यास! वह लोकपालों के लिए जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के समान अदृश्य हो गया।

श्लोक 10 (skanda.8.99.10)

तिमिन्तिमिङ्गिलञ्चैव तिमिङ्गलगिलानपि । तथैव तद्गिलानन्यान् गर्दभान् हस्तिनो ह्यपि

timintimiṅgilañcaiva timiṅgalagilānapi | tathaiva tadgilānanyān gardabhān hastino hyapi

उसने तिमि, तिमिंगिल और तिमिंगल-भक्षी जीवों को, और उन्हें भी निगलने वाले अन्य जीवों को, गधों और हाथियों को भी [अपने चारों ओर पाया],

श्लोक 11 (skanda.8.99.11)

मकराँश्चैव शंखाँश्च तथैवाश्वमुखानपि । तथा वै पक्षिसंकाशान् मानुषानपि चापरान्

makarā~ścaiva śaṁkhā~śca tathaivāśvamukhānapi | tathā vai pakṣisaṁkāśān mānuṣānapi cāparān

मगरमच्छों और शंखों को, तथा अश्वमुख प्राणियों को, और पक्षियों जैसे तथा मनुष्यों जैसे अन्य प्राणियों को भी,

श्लोक 12 (skanda.8.99.12)

रथचक्रप्रकाराँश्च सिंहव्याघ्रमुखानपि । शरभर्क्षविडालास्यान् मत्स्यान्बहुविधाँस्तथा

rathacakraprakārā~śca siṁhavyāghramukhānapi | śarabharkṣaviḍālāsyān matsyānbahuvidhā~stathā

और रथ-चक्र के आकार वाले, सिंह-व्याघ्र मुख वाले, तथा शरभ, भालू और बिल्ली के मुख वाले नाना प्रकार के मत्स्यों को भी [देखा],

श्लोक 13 (skanda.8.99.13)

भ्रामयन्सुमहातेजा जगाम सुमहाबलः । कुतूहलात्तमाविश्य केचिदाघ्राय चैव हि

bhrāmayansumahātejā jagāma sumahābalaḥ | kutūhalāttamāviśya kecidāghrāya caiva hi

उन सबको घुमाता हुआ वह महातेजस्वी, महाबली आगे बढ़ता गया; कौतूहलवश कुछ प्राणी उसके पास आकर उसे सूँघने लगे,

श्लोक 14 (skanda.8.99.14)

दशन्ति मत्स्या दीप्तास्याः शतशोथ सहस्रशः । स प्रदक्षिणमावृत्य दिव्यं हयशिरः शुभम्

daśanti matsyā dīptāsyāḥ śataśotha sahasraśaḥ | sa pradakṣiṇamāvṛtya divyaṁ hayaśiraḥ śubham

और जलते हुए मुख वाली मछलियाँ सैकड़ों-हजारों की संख्या में उसे काटने लगीं। वह प्रदक्षिणा करता हुआ उस दिव्य, शुभ हयशिरा के पास पहुँचा,

श्लोक 15 (skanda.8.99.15)

क्षणान्मैनाकमध्येन गत्वा भोगवतीमपि । वरुणस्य पुरीं गत्वा पयोनाथस्य धीमतः

kṣaṇānmainākamadhyena gatvā bhogavatīmapi | varuṇasya purīṁ gatvā payonāthasya dhīmataḥ

और एक क्षण में मैनाक पर्वत के मध्य से होकर भोगवती नगरी को भी पार करता हुआ, बुद्धिमान् जलपति वरुण की नगरी में पहुँचा।

श्लोक 16 (skanda.8.99.16)

पर्जन्यं दिग्गजं प्राप्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । सुरभीपुरमासाद्य गा दृष्ट्वा चैव सुप्रभाः

parjanyaṁ diggajaṁ prāpya kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | surabhīpuramāsādya gā dṛṣṭvā caiva suprabhāḥ

दिशा-गज पर्जन्य के पास पहुँचकर, उसकी प्रदक्षिणा कर, वह सुरभीपुर पहुँचा और वहाँ अत्यन्त तेजस्वी गौओं को देखा,

श्लोक 17 (skanda.8.99.17)

याः क्षरन्ति सदा व्यास सुधाममृतमेव च । क्षीरोदं तत्सरो दिव्यं फेनपा यत्र ते द्विजाः

yāḥ kṣaranti sadā vyāsa sudhāmamṛtameva ca | kṣīrodaṁ tatsaro divyaṁ phenapā yatra te dvijāḥ

हे व्यास! जो सदा सुधा और अमृत झराती रहती हैं - वह दिव्य क्षीरसागर सरोवर, जहाँ 'फेनप' नामक द्विजगण निवास करते हैं।

श्लोक 18 (skanda.8.99.18)

तस्मिन् सरसि तत् पीत्वा यशोमृतसमप्रभम् । पूजितः फेनपैः सम्यक् तां रात्रिं तत्र सोवसत्

tasmin sarasi tat pītvā yaśomṛtasamaprabham | pūjitaḥ phenapaiḥ samyak tāṁ rātriṁ tatra sovasat

उस सरोवर में कीर्तिमय अमृत के समान कान्तिमान् उस [जल] को पीकर, फेनपों द्वारा भलीभाँति पूजित होकर, वह उस रात्रि वहीं रहा।

श्लोक 19 (skanda.8.99.19)

उषित्वा तत्र सोगच्छत् कङ्कस्य पुरमव्ययम् । वासुकेश्च पुरं प्राप्य तक्षकस्य च धीमतः

uṣitvā tatra sogacchat kaṅkasya puramavyayam | vāsukeśca puraṁ prāpya takṣakasya ca dhīmataḥ

वहाँ रात्रि बिताकर वह कंक की अविनाशी नगरी को गया, और वासुकि तथा बुद्धिमान् तक्षक की नगरी में पहुँचा,

श्लोक 20 (skanda.8.99.20)

तत्र शेषस्य देवेशो विन्दतामरतामिति । रम्यां मनोज्ञां दिव्याञ्च स्वर्गादपि च तां वराम्

tatra śeṣasya deveśo vindatāmaratāmiti | ramyāṁ manojñāṁ divyāñca svargādapi ca tāṁ varām

वहाँ शेष की भी - उस देवेश ने उस नगरी को रमणीय, मनोहर, दिव्य और स्वर्ग से भी श्रेष्ठ, मानो अमरत्व को प्राप्त हुई-सी देखा।

श्लोक 21 (skanda.8.99.21)

श्रुत्वानन्तश्च तं राजा अर्घेण समपूजयत् । प्रणम्य बहुमानाच्च उपामन्त्रयदव्ययः

śrutvānantaśca taṁ rājā argheṇa samapūjayat | praṇamya bahumānācca upāmantrayadavyayaḥ

उसके आगमन को सुनकर सर्प-राज अनन्त (शेष) ने उसे अर्घ्य से पूजित किया, और अत्यन्त आदर से प्रणाम कर उस अविनाशी ने उसका स्वागत-सम्भाषण किया।

श्लोक 22 (skanda.8.99.22)

तं पूजयानं मधुहा प्रीत्या परमया युतः । उवाच लोककार्यस्य न विघ्नं कर्तुमर्हसि

taṁ pūjayānaṁ madhuhā prītyā paramayā yutaḥ | uvāca lokakāryasya na vighnaṁ kartumarhasi

उस पूजा करते हुए शेष से मधुसूदन ने अत्यन्त स्नेह से युक्त होकर कहा - 'तुम्हें लोक के इस कार्य में विघ्न नहीं डालना चाहिए।'

श्लोक 23 (skanda.8.99.23)

महत्कार्यमिदं देव कर्तव्यं त्रिदिवौकसाम् । भूयो वयं त्वया सार्धं करिष्याम यदीच्छसि । मा च कालोयमुद्युक्तो दैत्यस्य न भवेदिति

mahatkāryamidaṁ deva kartavyaṁ tridivaukasām | bhūyo vayaṁ tvayā sārdhaṁ kariṣyāma yadīcchasi | mā ca kāloyamudyukto daityasya na bhavediti

'हे देव! यह त्रिलोकवासियों के हित के लिए किया जाने वाला महान् कार्य है; यदि तुम चाहो तो हम फिर तुम्हारे साथ [समय बिताएँगे], परन्तु ऐसा न हो कि यह उद्यत क्षण दैत्य के [वध] के बिना ही व्यर्थ चला जाए।'

श्लोक 24 (skanda.8.99.24)

सनत्कुमार उवाच । ततो विसृज्य तं नागं रसातलमुपागमत् । तत्र सागरपो दैत्यः सुप्रभोन्तर्जलेचरः

sanatkumāra uvāca | tato visṛjya taṁ nāgaṁ rasātalamupāgamat | tatra sāgarapo daityaḥ suprabhontarjalecaraḥ

सनत्कुमार ने कहा - फिर उस नाग को विदा देकर वह रसातल में पहुँचा; वहाँ जल के भीतर विचरण करने वाला, तेजस्वी, सागर-रक्षक दैत्य -

श्लोक 25 (skanda.8.99.25)

अपश्यत्तं तदायान्तं हिरण्याक्षपुरं प्रति । गात्रेषु देवान्सूक्ष्माँश्च वराहस्यान्ववैक्षत

apaśyattaṁ tadāyāntaṁ hiraṇyākṣapuraṁ prati | gātreṣu devānsūkṣmā~śca varāhasyānvavaikṣata

- उसने उसे हिरण्याक्ष की नगरी की ओर आते देखा, और वराह के अंगों में स्थित सूक्ष्म देवताओं को भी देख लिया।

श्लोक 26 (skanda.8.99.26)

तस्मिन्तच्चास्य रूपेण भयान्नैनमुपागमत् । तेजसा चापि विष्टब्धो दुरात्मा तस्य सोसुरः

tasmintaccāsya rūpeṇa bhayānnainamupāgamat | tejasā cāpi viṣṭabdho durātmā tasya sosuraḥ

उसके उस रूप के भय से, और उसके तेज से भी अभिभूत होकर, वह दुरात्मा असुर उसके निकट नहीं आया।

श्लोक 27 (skanda.8.99.27)

आवेदयिष्यन्तस्मै हि हिरण्याक्षाय सत्वरम् । चक्रे वेगं प्रतिपुरं वराहस्य तदाग्रतः

āvedayiṣyantasmai hi hiraṇyākṣāya satvaram | cakre vegaṁ pratipuraṁ varāhasya tadāgrataḥ

उस समाचार को तुरन्त हिरण्याक्ष के पास पहुँचाने के लिए, वराह से आगे निकलकर वह नगरी की ओर वेग से दौड़ा।

श्लोक 28 (skanda.8.99.28)

स यातुकामो दितिजाधिराजं वराहरूपं तमनन्तमन्तकम् । जगाम दैत्याय स जीवितान्तं यथानिलः प्रद्युतदानमाल्यवान्

sa yātukāmo ditijādhirājaṁ varāharūpaṁ tamanantamantakam | jagāma daityāya sa jīvitāntaṁ yathānilaḥ pradyutadānamālyavān

उधर उस असीम, अन्तकारी वराह-रूपधारी देव ने, दिति-पुत्रों के अधिराज के पास जाने की इच्छा से, उसके जीवन का अन्त करने के लिए उसी प्रकार प्रस्थान किया, जैसे वायु मदजल बहाते और मालाधारी हाथी की ओर वेग से बढ़ती है।

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