अम्बिका खण्ड · अध्याय 98
वराह का वरुणालय-गमन
श्लोक 1 (skanda.8.98.1)
सनत्कुमार उवाच । अथ ते सुरशार्दूलास्तस्य रूपं प्रचक्रिरे । सप्तलोकमयं तस्य शरीरं चक्रुरीश्वराः
sanatkumāra uvāca | atha te suraśārdūlāstasya rūpaṁ pracakrire | saptalokamayaṁ tasya śarīraṁ cakrurīśvarāḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब उन देवश्रेष्ठों ने उस (वराह) का रूप रचना आरम्भ किया - (इस श्लोक की एक पंक्ति मूल में अप्राप्त है) - उन ईश्वरों ने उसके शरीर को सातों लोकों से युक्त बना दिया।
श्लोक 2 (skanda.8.98.2)
अस्थीनि पर्वताः सर्वे नद्यो नाड्यश्च तस्य तु । रुधिरं चाब्धयः सप्त कफपित्तानिला गुणाः
asthīni parvatāḥ sarve nadyo nāḍyaśca tasya tu | rudhiraṁ cābdhayaḥ sapta kaphapittānilā guṇāḥ
समस्त पर्वत उसकी हड्डियाँ बने, नदियाँ उसकी नाड़ियाँ बनीं; सातों समुद्र उसका रक्त बने, और कफ, पित्त, वायु उसके [शारीरिक] गुण बने।
श्लोक 3 (skanda.8.98.3)
पुरीषं चाप्योषधयो धर्मो रेतः कृतोस्य तु । मूत्रं तस्याभवन्मेघा वायवः सप्त कोष्ठगाः
purīṣaṁ cāpyoṣadhayo dharmo retaḥ kṛtosya tu | mūtraṁ tasyābhavanmeghā vāyavaḥ sapta koṣṭhagāḥ
औषधियाँ उसका मल बनीं, धर्म उसका वीर्य बनाया गया; बादल उसका मूत्र बने, और सातों वायुएँ उसके उदर में स्थित हुईं।
श्लोक 4 (skanda.8.98.4)
शिरस्तस्याभवन् साध्या रुद्रो मूर्धानमास्थितः । ललाटे तस्य धर्मोभूत् नासिका वायुरात्मवान्
śirastasyābhavan sādhyā rudro mūrdhānamāsthitaḥ | lalāṭe tasya dharmobhūt nāsikā vāyurātmavān
साध्यगण उसका शिर बने, रुद्र उसके मस्तक पर स्थित हुए; धर्म उसका ललाट बना, और आत्मवान् वायु उसकी नासिका बना।
श्लोक 5 (skanda.8.98.5)
सूर्याचन्द्रमसौ नेत्रे श्रोत्रे तस्य दिशोभवन् । भ्रुवोस्तस्याभवन् प्राणा अहोरात्रं च पक्ष्मणी
sūryācandramasau netre śrotre tasya diśobhavan | bhruvostasyābhavan prāṇā ahorātraṁ ca pakṣmaṇī
सूर्य और चन्द्रमा उसके नेत्र बने, दिशाएँ उसके कान बनीं; प्राण उसकी भौंहें बने, और दिन-रात उसकी पलकें बनीं।
श्लोक 6 (skanda.8.98.6)
आस्यं तस्याग्निरभवत् वडवा मुखसंस्थिता । ओष्ठेभूदन्तरिक्षं च दन्ताश्च भुजगाभवन्
āsyaṁ tasyāgnirabhavat vaḍavā mukhasaṁsthitā | oṣṭhebhūdantarikṣaṁ ca dantāśca bhujagābhavan
अग्नि उसका मुख बना, वडवाग्नि उस मुख में स्थित हुई; अन्तरिक्ष उसके ओठ बने, और सर्प उसके दाँत बने।
श्लोक 7 (skanda.8.98.7)
चत्वार्यस्त्राणि दंष्ट्राश्च कृतानि सुमहान्ति वै । अस्त्रं पाशुपतं पूर्वं द्वितीयं चक्रमेव च
catvāryastrāṇi daṁṣṭrāśca kṛtāni sumahānti vai | astraṁ pāśupataṁ pūrvaṁ dvitīyaṁ cakrameva ca
उसकी चार अत्यन्त विशाल दाढ़ें अस्त्रों से बनाई गईं - पहली पाशुपत अस्त्र, दूसरी सुदर्शन चक्र,
श्लोक 8 (skanda.8.98.8)
ब्रह्मदण्डं तृतीयञ्च चतुर्थं ब्रह्मणः शिरः । ग्रीवा तस्याभवत्सोमो रुद्रः स्कन्धे च संस्थितः
brahmadaṇḍaṁ tṛtīyañca caturthaṁ brahmaṇaḥ śiraḥ | grīvā tasyābhavatsomo rudraḥ skandhe ca saṁsthitaḥ
तीसरी ब्रह्मदण्ड, और चौथी ब्रह्मा का शिर। चन्द्रमा उसकी ग्रीवा बना, और रुद्र उसके कंधे पर स्थित हुए।
श्लोक 9 (skanda.8.98.9)
गण्डे चापि तथादित्या हस्तौ रुद्रैश्च निर्मितौ । अंगुल्यस्तस्य कीर्तिश्च लक्ष्मीः सिद्धिस्तथैव च
gaṇḍe cāpi tathādityā hastau rudraiśca nirmitau | aṁgulyastasya kīrtiśca lakṣmīḥ siddhistathaiva ca
आदित्यगण उसके कपोल बने, उसके दोनों हाथ रुद्रों द्वारा निर्मित हुए; कीर्ति, लक्ष्मी और सिद्धि उसकी अंगुलियाँ बनीं।
श्लोक 10 (skanda.8.98.10)
प्रवृत्तिश्च नखाश्चास्त्राणि सर्वशः । यमदण्डः कालदण्डो मृत्युदण्डस्तथैव च
pravṛttiśca nakhāścāstrāṇi sarvaśaḥ | yamadaṇḍaḥ kāladaṇḍo mṛtyudaṇḍastathaiva ca
(इस पंक्ति का आरम्भिक अंश मूल में अप्राप्त है) और प्रवृत्ति - उसके नाखून सब प्रकार के अस्त्र बने - यमदण्ड, कालदण्ड और मृत्युदण्ड भी।
श्लोक 11 (skanda.8.98.11)
रुद्रदण्डश्च चत्वारो बाहुपादाः कृताः प्रभोः । साध्या देवा उरस्तस्य हृदयं सोम इत्यपि
rudradaṇḍaśca catvāro bāhupādāḥ kṛtāḥ prabhoḥ | sādhyā devā urastasya hṛdayaṁ soma ityapi
और रुद्रदण्ड - ये चारों उस प्रभु की भुजाएँ और पैर बनाए गए। साध्यदेव उसकी छाती बने, और चन्द्रमा भी उसका हृदय बना।
श्लोक 12 (skanda.8.98.12)
उदरं तस्य भूतानि महान्ति ऋषिसत्तम । नाभिस्तस्याभवन्माता अदितिर्ब्रह्मसत्तम
udaraṁ tasya bhūtāni mahānti ṛṣisattama | nābhistasyābhavanmātā aditirbrahmasattama
हे ऋषिसत्तम! महाभूत उसका उदर बने; हे ब्रह्मसत्तम! उसकी माता अदिति उसकी नाभि बनीं।
श्लोक 13 (skanda.8.98.13)
शिश्नं प्रजापतिस्तस्य मित्रोपानेभवत् स्थितः । वसवस्तस्य पार्श्वेषु तथा धर्मश्च पृष्ठतः
śiśnaṁ prajāpatistasya mitropānebhavat sthitaḥ | vasavastasya pārśveṣu tathā dharmaśca pṛṣṭhataḥ
प्रजापति उसका जननेन्द्रिय बना, और मित्र उसके निकट स्थित हुए; वसुगण उसके पार्श्वों में और धर्म उसकी पीठ में स्थित हुए।
श्लोक 14 (skanda.8.98.14)
मृत्युः कालो यमश्चैव हस्तपादतलाश्रिताः । अश्विनौ तस्य लाङ्गूलं पितरः सन्धिषु स्थिताः
mṛtyuḥ kālo yamaścaiva hastapādatalāśritāḥ | aśvinau tasya lāṅgūlaṁ pitaraḥ sandhiṣu sthitāḥ
मृत्यु, काल और यम उसकी हथेलियों और तलवों में स्थित हुए; दोनों अश्विनीकुमार उसकी पूँछ बने, और पितृगण उसके सन्धिस्थानों में स्थित हुए।
श्लोक 15 (skanda.8.98.15)
नियतिः कालपाशश्च कृतान्तकलहावपि । व्याधयश्चापि ये केचिद् दृष्टिं तस्य समाश्रिताः
niyatiḥ kālapāśaśca kṛtāntakalahāvapi | vyādhayaścāpi ye kecid dṛṣṭiṁ tasya samāśritāḥ
नियति, काल-पाश, कृतान्त और कलह भी, तथा जो कोई भी रोग थे, वे सब उसकी दृष्टि में आश्रित हो गए।
श्लोक 16 (skanda.8.98.16)
यक्षाश्च राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगैः सहः । सर्वे त्वचं समाश्रित्य संहताः समवस्थिताः
yakṣāśca rākṣasāścaiva gandharvāḥ pannagaiḥ sahaḥ | sarve tvacaṁ samāśritya saṁhatāḥ samavasthitāḥ
यक्ष, राक्षस, गन्धर्व और सर्प - ये सब उसकी त्वचा में आश्रय लेकर एकत्र होकर स्थित हुए।
श्लोक 17 (skanda.8.98.17)
तथा सर्वाणि छन्दांसि वेदा इष्टय एव च । रोमकूपेषु सर्वाणि तानि तस्थुः पृथक् पृथक्
tathā sarvāṇi chandāṁsi vedā iṣṭaya eva ca | romakūpeṣu sarvāṇi tāni tasthuḥ pṛthak pṛthak
इसी प्रकार सभी छन्द, वेद और यज्ञ भी उसके रोम-कूपों में अलग-अलग स्थित हो गए।
श्लोक 18 (skanda.8.98.18)
दानानि नियमाश्चैव यमाः सर्वाश्च मातरः । स्थानाभिमानिनो देवाः पशवः पक्षिणश्च ह
dānāni niyamāścaiva yamāḥ sarvāśca mātaraḥ | sthānābhimānino devāḥ paśavaḥ pakṣiṇaśca ha
दान, नियम, यम, तथा समस्त मातृगण, विभिन्न स्थानों के अभिमानी देवता, पशु और पक्षी -
श्लोक 19 (skanda.8.98.19)
सर्वे रोमाणि तस्यासन् वराहस्य महात्मनः । अङ्गुल्यस्तस्य पादाभ्यां विश्वेदेवाभवँस्तथा
sarve romāṇi tasyāsan varāhasya mahātmanaḥ | aṅgulyastasya pādābhyāṁ viśvedevābhava~stathā
- ये सब उस महात्मा वराह के रोम बने; और विश्वेदेवगण उसके दोनों पैरों की अंगुलियाँ बने।
श्लोक 20 (skanda.8.98.20)
भृगवोंगिरसश्चैव देवास्तस्याभवंस्तदा । रोमान्तरेषु ऋषयः सर्वेष्वङ्गेषु संस्थिताः
bhṛgavoṁgirasaścaiva devāstasyābhavaṁstadā | romāntareṣu ṛṣayaḥ sarveṣvaṅgeṣu saṁsthitāḥ
भृगु और अंगिरा वंश के देवता भी तब उसके अंग बने, और ऋषिगण उसके सभी अंगों में रोम-रोम के बीच स्थित हो गए।
श्लोक 21 (skanda.8.98.21)
एवं समभवद् व्यास वराहो नन्दिवर्धनः । स भाति तेन रूपेण द्यां भुवञ्चापि संस्पृशन्
evaṁ samabhavad vyāsa varāho nandivardhanaḥ | sa bhāti tena rūpeṇa dyāṁ bhuvañcāpi saṁspṛśan
हे व्यास! इस प्रकार आनन्दवर्धक वराह प्रकट हुआ; वह उस रूप से स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को स्पर्श करता हुआ शोभित हुआ।
श्लोक 22 (skanda.8.98.22)
पुरा स्वयंभूर्भगवानुद्धरिष्यन् महीमिमाम् । स रेजे तेन रूपेण दीप्तिमान् मधुसूदनः
purā svayaṁbhūrbhagavānuddhariṣyan mahīmimām | sa reje tena rūpeṇa dīptimān madhusūdanaḥ
पूर्वकाल में, इस पृथ्वी का उद्धार करने के लिए उद्यत, भगवान् स्वयम्भू मधुसूदन उस रूप में तेजस्वी होकर शोभित हुए।
श्लोक 23 (skanda.8.98.23)
निशायां संप्रदीप्तो हि हिमवानिव पर्वतः । ततस्तमृषयस्सर्वे तपसा महता तदा
niśāyāṁ saṁpradīpto hi himavāniva parvataḥ | tatastamṛṣayassarve tapasā mahatā tadā
वे रात्रि में जलते हुए हिमालय पर्वत के समान प्रज्वलित हो उठे। तब समस्त ऋषिगण अपने महान् तप के द्वारा -
श्लोक 24 (skanda.8.98.24)
स्वेन स्वेनाभिसंप्राप्य तेजस्तस्याभ्यदीपयन् । स विष्णुस्तेजसा तेषामृषीणां परमौजसाम्
svena svenābhisaṁprāpya tejastasyābhyadīpayan | sa viṣṇustejasā teṣāmṛṣīṇāṁ paramaujasām
- अपने-अपने तेज को अर्पित कर उसके तेज को और भी प्रज्वलित करने लगे। और उन परम तेजस्वी ऋषियों के तेज से वह विष्णु -
श्लोक 25 (skanda.8.98.25)
संप्रजज्वाल कालान्ते युगान्ताग्निरिवापरः । नादं कृत्वा च सुमहच्चालयानो महीतलम्
saṁprajajvāla kālānte yugāntāgnirivāparaḥ | nādaṁ kṛtvā ca sumahaccālayāno mahītalam
- प्रलयकाल की अग्नि के समान भड़क उठे, और अत्यन्त महान् गर्जना करते हुए, पृथ्वीतल को कँपाते हुए -
श्लोक 26 (skanda.8.98.26)
उवाच तान् ऋषीन्सर्वान् हन्मि दैत्यं सुरद्विषम् । हत्वा तं दैत्यराजं वै सिंहं शरभराडिव
uvāca tān ṛṣīnsarvān hanmi daityaṁ suradviṣam | hatvā taṁ daityarājaṁ vai siṁhaṁ śarabharāḍiva
- उन्होंने समस्त ऋषियों से कहा - 'मैं देवताओं के शत्रु उस दैत्य का वध करूँगा; जैसे शरभराज सिंह का वध करता है, वैसे ही उस दैत्यराज का वध करके -'
श्लोक 27 (skanda.8.98.27)
मोचयिष्ये महीं विग्नां प्रविश्याद्य रसातलम् । स्वस्थाने स्थापयित्वा च दत्वा राज्यं दिवौकसाम् जपध्वं विजयायाद्य शिवाय च तपोधनाः
mocayiṣye mahīṁ vignāṁ praviśyādya rasātalam | svasthāne sthāpayitvā ca datvā rājyaṁ divaukasām japadhvaṁ vijayāyādya śivāya ca tapodhanāḥ
'- मैं आज रसातल में प्रवेश कर संकटग्रस्त पृथ्वी को मुक्त करूँगा; और देवताओं को उनके-उनके स्थान पर स्थापित कर, उन्हें राज्य लौटाकर - हे तपोधनो! आज विजय और मंगल के लिए जप करो।'
श्लोक 28 (skanda.8.98.28)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः । उवाच बलमाधत्स्व दैत्योसौ सुमहाबलः
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā brahmā lokapitāmahaḥ | uvāca balamādhatsva daityosau sumahābalaḥ
सनत्कुमार ने कहा - उनके इस वचन को सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा ने कहा - 'बल धारण करो, वह दैत्य अत्यन्त बलशाली है।'
श्लोक 29 (skanda.8.98.29)
आस्थाय यत्नं सुमहदप्रमत्तः सुरेश्वर । जहि तं दैत्यराजं वै कृच्छ्रमेतन्मतं मम
āsthāya yatnaṁ sumahadapramattaḥ sureśvara | jahi taṁ daityarājaṁ vai kṛcchrametanmataṁ mama
'हे सुरेश्वर! सावधान होकर अत्यन्त बड़ा प्रयत्न करते हुए, उस दैत्यराज का वध करो - यह कठिन कार्य है, ऐसा मेरा मत है।'
श्लोक 30 (skanda.8.98.30)
न तस्य सदृशो दैत्यो हिरण्यकशिपुः पुरा । महाबलोयं दैत्येन्द्रस्तपोयोगसमन्वितः
na tasya sadṛśo daityo hiraṇyakaśipuḥ purā | mahābaloyaṁ daityendrastapoyogasamanvitaḥ
'उसके समान कोई दैत्य नहीं, यहाँ तक कि पूर्वकाल का हिरण्यकशिपु भी नहीं; यह दैत्येन्द्र अत्यन्त बलशाली और तप-योग से युक्त है।'
श्लोक 31 (skanda.8.98.31)
ततो देवस्तदा व्यास भगवान् गोवृषध्वजः । सुरैः सब्रह्मकैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः
tato devastadā vyāsa bhagavān govṛṣadhvajaḥ | suraiḥ sabrahmakaistatra ṛṣibhiśca tapodhanaiḥ
हे व्यास! तब वहाँ ब्रह्मा सहित देवताओं और तपोधन ऋषियों ने बैल के ध्वज वाले भगवान् शिव से -
श्लोक 32 (skanda.8.98.32)
उक्तः प्रणम्य देवेशो विष्णुमाप्यायय प्रभो । तेजसा स्वेन सर्वेश यथा हन्यात् सुरद्विषम्
uktaḥ praṇamya deveśo viṣṇumāpyāyaya prabho | tejasā svena sarveśa yathā hanyāt suradviṣam
- प्रणाम कर कहा - 'हे प्रभो देवेश! हे सर्वेश! विष्णु को अपने तेज से इस प्रकार सम्पन्न कीजिए कि वे देवताओं के शत्रु का वध कर सकें।'
श्लोक 33 (skanda.8.98.33)
भगवानुवाच । तस्मिन् काले सुरेशाभाः सर्वे तेजोमयं हरिम् । प्रवेक्ष्यन्ति ततो दैत्यं क्षिप्रमेव निहंस्यति
bhagavānuvāca | tasmin kāle sureśābhāḥ sarve tejomayaṁ harim | pravekṣyanti tato daityaṁ kṣiprameva nihaṁsyati
भगवान् (शिव) ने कहा - 'उस समय देवेश्वरों के समान तेजस्वी तुम सब उस तेजोमय हरि में प्रवेश करोगे; तब वे शीघ्र ही उस दैत्य का वध कर देंगे।'
श्लोक 34 (skanda.8.98.34)
सनत्कुमार उवाच । ततो ब्रह्मा स्वयं तस्य रक्षां चक्रे महात्मनः । यथावत्तां निबोधाद्य वदतो मे शुचिव्रत
sanatkumāra uvāca | tato brahmā svayaṁ tasya rakṣāṁ cakre mahātmanaḥ | yathāvattāṁ nibodhādya vadato me śucivrata
सनत्कुमार ने कहा - तब ब्रह्मा ने स्वयं उस महात्मा की रक्षा (कवच) की रचना की; हे शुचिव्रत! उसे यथावत् सुनो, जैसा मैं कहता हूँ।
श्लोक 35 (skanda.8.98.35)
ब्रह्मोवाच । रक्षन्तु त्वां विधाता च धाता च ऋषिसत्तम । रुद्रः स्रष्टा च सर्वेषां कर्माणि तव युध्यतः
brahmovāca | rakṣantu tvāṁ vidhātā ca dhātā ca ṛṣisattama | rudraḥ sraṣṭā ca sarveṣāṁ karmāṇi tava yudhyataḥ
ब्रह्मा ने कहा - हे ऋषिसत्तम! विधाता और धाता तुम्हारी रक्षा करें; और समस्त प्राणियों के स्रष्टा रुद्र युद्ध करते समय तुम्हारे कर्मों की रक्षा करें।
श्लोक 36 (skanda.8.98.36)
कपाली तालकेतुश्च गन्धाधिपतिरेव च । रसस्याधिपतिश्चैव सूक्ष्मरूपश्च रक्षतु
kapālī tālaketuśca gandhādhipatireva ca | rasasyādhipatiścaiva sūkṣmarūpaśca rakṣatu
कपाली, तालकेतु, गन्ध के अधिपति, और रस के अधिपति, तथा सूक्ष्म-रूपधारी - ये तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 37 (skanda.8.98.37)
स्पर्शवेत्ता च यः सूक्ष्मो नादवाँश्च महामनाः । इन्द्रियाधिपतिश्चैव नीललोहित एव च
sparśavettā ca yaḥ sūkṣmo nādavā~śca mahāmanāḥ | indriyādhipatiścaiva nīlalohita eva ca
जो सूक्ष्म स्पर्श का ज्ञाता है, जो शब्दयुक्त महामना है, इन्द्रियों का अधिपति, और नीललोहित (रुद्र) भी - ये तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 38 (skanda.8.98.38)
रक्षतु त्वां महायोगी बीजाधिपतिरेव च । बीजाधिष्ठानमालश्च चेतनापतिरेव च
rakṣatu tvāṁ mahāyogī bījādhipatireva ca | bījādhiṣṭhānamālaśca cetanāpatireva ca
महायोगी तुम्हारी रक्षा करें, और बीज का अधिपति भी; बीज के आश्रय-स्थान की माला और चेतना का अधिपति भी तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 39 (skanda.8.98.39)
प्रवृत्तेश्च निवृत्तेश्च कालवेत्ता च यः प्रभुः । धर्माधर्मगतिश्चैव कर्तॄणां फलदः प्रभुः
pravṛtteśca nivṛtteśca kālavettā ca yaḥ prabhuḥ | dharmādharmagatiścaiva kartṝṇāṁ phaladaḥ prabhuḥ
जो प्रभु प्रवृत्ति और निवृत्ति के काल का ज्ञाता है, जो धर्म और अधर्म की गति है, और कर्ता जनों को फल देने वाला प्रभु है - वह तुम्हारी रक्षा करे।
श्लोक 40 (skanda.8.98.40)
गुणानां वृत्तिदो यश्च अनपेक्षश्च कर्मसु । नियमस्य च यः कर्ता कर्मवेत्ता च कर्मणाम्
guṇānāṁ vṛttido yaśca anapekṣaśca karmasu | niyamasya ca yaḥ kartā karmavettā ca karmaṇām
जो गुणों को वृत्ति देने वाला है, जो कर्मों में अनपेक्ष है, जो नियम का कर्ता है, और सब कर्मों का ज्ञाता है -
श्लोक 41 (skanda.8.98.41)
विना च करणैर्यश्च करणार्थं प्रवर्तते । सर्वज्ञः सर्वगो यश्च अधिष्ठाता च यः स्वयम्
vinā ca karaṇairyaśca karaṇārthaṁ pravartate | sarvajñaḥ sarvago yaśca adhiṣṭhātā ca yaḥ svayam
- और जो बिना इन्द्रियों के भी इन्द्रियों के प्रयोजन हेतु प्रवृत्त होता है, जो सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी है, और जो स्वयं ही सबका अधिष्ठाता है -
श्लोक 42 (skanda.8.98.42)
येन नाधिष्ठितं किञ्चित् कथञ्चिन्नापि विद्यते । सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोक्षिशिरोमुखः । सर्वतः श्रुतिमाँश्चैव सर्वतोगतिरव्ययः
yena nādhiṣṭhitaṁ kiñcit kathañcinnāpi vidyate | sarvataḥ pāṇipādāntaḥ sarvatokṣiśiromukhaḥ | sarvataḥ śrutimā~ścaiva sarvatogatiravyayaḥ
- जिसके द्वारा शासित न हो, ऐसा कुछ भी कहीं नहीं है; जिसके हाथ-पैर सब ओर हैं, जिसकी आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, जिसके कान सब ओर हैं, और जिसकी अविनाशी गति सब ओर है -
श्लोक 43 (skanda.8.98.43)
ऐश्वर्यमक्षयं यस्य सहस्राकृतयस्तथा । यः स्रष्टा सर्वभूतानां तत्वानाञ्च महायशाः
aiśvaryamakṣayaṁ yasya sahasrākṛtayastathā | yaḥ sraṣṭā sarvabhūtānāṁ tatvānāñca mahāyaśāḥ
- जिसका ऐश्वर्य अक्षय है, जिसके सहस्रों रूप हैं, जो समस्त भूतों और तत्त्वों का स्रष्टा है, वह महायशस्वी -
श्लोक 44 (skanda.8.98.44)
संसारस्यास्य यः कर्ता तथैव च निवर्तकः । यं सांख्या नाभिजानन्ति योगिनो विदितागमाः
saṁsārasyāsya yaḥ kartā tathaiva ca nivartakaḥ | yaṁ sāṁkhyā nābhijānanti yogino viditāgamāḥ
- जो इस संसार का कर्ता है और उसी प्रकार उसका निवर्तक भी है, जिसे सांख्यज्ञ भी पूर्णतः नहीं जानते, और न ही आगम-ज्ञाता योगी -
श्लोक 45 (skanda.8.98.45)
तुष्टयो ज्ञातयो नित्यं मायया मोहयन् प्रजाः । ओतप्रोतानि चैतस्मिन् तत्त्वानि सुमहात्मनि
tuṣṭayo jñātayo nityaṁ māyayā mohayan prajāḥ | otaprotāni caitasmin tattvāni sumahātmani
- जिसकी तुष्टियाँ और ज्ञान-शक्तियाँ माया के द्वारा सदा प्राणियों को मोहित करती रहती हैं, और जिस महात्मा में सभी तत्त्व ताने-बाने की भाँति ओत-प्रोत हैं -
श्लोक 46 (skanda.8.98.46)
पुरुषादीनि सर्वाणि यो व्याप्तश्च न केनचित् । यमज्ञात्वा न मोक्षोस्ति येन बद्धमिदं जगत्
puruṣādīni sarvāṇi yo vyāptaśca na kenacit | yamajñātvā na mokṣosti yena baddhamidaṁ jagat
- जो पुरुष आदि समस्त तत्त्वों में व्याप्त है, परन्तु किसी के द्वारा व्याप्त नहीं है; जिसे बिना जाने मोक्ष सम्भव नहीं, और जिसके द्वारा यह जगत् बँधा हुआ है -
श्लोक 47 (skanda.8.98.47)
येनाहं सर्वलोकानां कृतः पूर्वं प्रजापतिः । त्वं यज्ञश्चैव विष्णुश्च येन सृष्टाः पुरातन
yenāhaṁ sarvalokānāṁ kṛtaḥ pūrvaṁ prajāpatiḥ | tvaṁ yajñaścaiva viṣṇuśca yena sṛṣṭāḥ purātana
- जिसके द्वारा मैं पहले सम्पूर्ण लोकों का प्रजापति बनाया गया, और हे प्राचीन! जिसके द्वारा तुम, यज्ञ और विष्णु भी उत्पन्न किए गए -
श्लोक 48 (skanda.8.98.48)
स ते बलञ्च सुमहदूर्ज्जं तेजश्च यच्छतु । अकामलब्धां सर्वत्र स्मृतिं चास्त्रे महामनाः
sa te balañca sumahadūrjjaṁ tejaśca yacchatu | akāmalabdhāṁ sarvatra smṛtiṁ cāstre mahāmanāḥ
- वह [महेश्वर] तुम्हें अत्यन्त महान् बल, ऊर्जा और तेज प्रदान करे, हे महामने! और सर्वत्र, बिना इच्छा किए ही, अस्त्रों की स्मृति प्रदान करे।
श्लोक 49 (skanda.8.98.49)
रक्षां च सर्वगो देवो युध्यतस्ते प्रयच्छतु । कृतरक्षो मया सम्यग्गच्छ दैत्यं विनाशय
rakṣāṁ ca sarvago devo yudhyataste prayacchatu | kṛtarakṣo mayā samyaggaccha daityaṁ vināśaya
और वह सर्वव्यापी देव युद्ध करते समय तुम्हारी रक्षा करे। इस प्रकार मेरे द्वारा भलीभाँति सुरक्षित होकर जाओ, और दैत्य का विनाश करो।
श्लोक 50 (skanda.8.98.50)
सनत्कुमार उवाच । ततस्तं स्तुतिभिर्विप्रास्तस्य रोमान्तरस्थिताः । अस्तुवन् वाग्भिरिष्टाभिर्देवाश्च बहुमानतः
sanatkumāra uvāca | tatastaṁ stutibhirviprāstasya romāntarasthitāḥ | astuvan vāgbhiriṣṭābhirdevāśca bahumānataḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब उसके रोम-रोम में स्थित ब्राह्मणों ने स्तुतियों से, और देवताओं ने भी प्रिय वचनों से, अत्यन्त आदरपूर्वक उसकी स्तुति की।
श्लोक 51 (skanda.8.98.51)
सर्वाणि च जयेत्यूचुर्भूतानि विविधानि च । अनाहतास्ततो व्योम्नि देवदुन्दुभयः शुभाः
sarvāṇi ca jayetyūcurbhūtāni vividhāni ca | anāhatāstato vyomni devadundubhayaḥ śubhāḥ
समस्त विविध प्राणी भी 'जय हो' कहकर पुकार उठे; तब आकाश में बिना बजाए ही शुभ देव-दुन्दुभियाँ बज उठीं,
श्लोक 52 (skanda.8.98.52)
विनेदुस्तत्र दिव्याश्च वराहो यत्र सोभवत् । सुरभीणाञ्च पुष्पाणां वराहोपरि सर्वतः । वृष्टयः पेतुरत्यर्थं देवानां हर्षवर्धनाः
vinedustatra divyāśca varāho yatra sobhavat | surabhīṇāñca puṣpāṇāṁ varāhopari sarvataḥ | vṛṣṭayaḥ peturatyarthaṁ devānāṁ harṣavardhanāḥ
उस दिव्य स्थान पर, जहाँ वह वराह प्रकट हुआ था। और उस वराह के ऊपर सब ओर से सुगन्धित पुष्पों की अत्यधिक वर्षा हुई, जिसने देवताओं के हर्ष को बढ़ा दिया।
श्लोक 53 (skanda.8.98.53)
ततः सिद्धिरिति प्रोच्य कृत्वा रुद्राय वै नमः । जपञ्जयावहं रुद्रं स ययौ वरुणालयम्
tataḥ siddhiriti procya kṛtvā rudrāya vai namaḥ | japañjayāvahaṁ rudraṁ sa yayau varuṇālayam
फिर 'सिद्धि हो' ऐसा उद्घोष कर, रुद्र को नमस्कार कर, विजय लाने वाले रुद्र-मन्त्र का जप करते हुए वह वरुण के धाम की ओर चल पड़ा।
श्लोक 54 (skanda.8.98.54)
स सेव्यमानो मुनिभिस्तपोधनैस्तथा शकुन्तैर्बहुभिर्जयावहैः । मृगैश्च दिव्यैर्बहुभिः प्रदक्षिणैर्जयाय देवः प्रययौ महार्णवम्
sa sevyamāno munibhistapodhanaistathā śakuntairbahubhirjayāvahaiḥ | mṛgaiśca divyairbahubhiḥ pradakṣiṇairjayāya devaḥ prayayau mahārṇavam
तपोधन मुनियों द्वारा सेवित होते हुए, विजय के शकुन दर्शाने वाले अनेक पक्षियों तथा दाहिनी ओर से प्रदक्षिणा करने वाले अनेक दिव्य मृगों से घिरे हुए, वह देव विजय के लिए महासागर की ओर चल पड़े।