अम्बिका खण्ड · अध्याय 97
हिरण्याक्ष-वधोपाय
श्लोक 1 (skanda.8.97.1)
सनत्कुमार उवाच । तथाभूतं जगद् दृष्ट्वा देवास्ते दुःखपीडिताः । वैराजं लोकमासाद्य भूयोऽपश्यन् पितामहम्
sanatkumāra uvāca | tathābhūtaṁ jagad dṛṣṭvā devāste duḥkhapīḍitāḥ | vairājaṁ lokamāsādya bhūyo'paśyan pitāmaham
सनत्कुमार ने कहा - उस जगत् को इस दशा में देखकर वे दुःखपीड़ित देवगण वैराज लोक में जाकर पुनः पितामह ब्रह्मा के दर्शन करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.97.2)
ते सर्वे समुपागम्य प्रणम्य च पुनः पुनः । ऊचुस्ते कर्म दैत्यस्य सर्वमेव सुदुःखिताः
te sarve samupāgamya praṇamya ca punaḥ punaḥ | ūcuste karma daityasya sarvameva suduḥkhitāḥ
वे सब पास जाकर बार-बार प्रणाम कर, अत्यन्त दुःखी होकर, उस दैत्य के सम्पूर्ण कृत्य का वर्णन करने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.97.3)
निवेद्य च पुनर्देवमूचुस्ते लोककारणम् । भगवन् हृतराज्याश्च दुर्बलाश्च तथा विभो
nivedya ca punardevamūcuste lokakāraṇam | bhagavan hṛtarājyāśca durbalāśca tathā vibho
यह सब निवेदन कर, उन्होंने पुनः उस लोक-कारण देव से कहा - 'हे भगवन्! हमारा राज्य छिन गया है और हे विभो! हम दुर्बल हो गए हैं।'
श्लोक 4 (skanda.8.97.4)
असमर्था वयं तस्य स्थातुं दैत्यस्य संयुगे । न च स्थानं प्रपश्यामो यत्र तिष्ठाम विज्वराः
asamarthā vayaṁ tasya sthātuṁ daityasya saṁyuge | na ca sthānaṁ prapaśyāmo yatra tiṣṭhāma vijvarāḥ
'हम उस दैत्य के सामने युद्ध में खड़े होने में असमर्थ हैं, और हमें कोई ऐसा स्थान नहीं दिखता जहाँ हम व्याकुलतारहित होकर रह सकें।'
श्लोक 5 (skanda.8.97.5)
सनत्कुमार उवाच । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भीतानां त्रिदिवौकसाम् । उवाच भगवान् ब्रह्मा सर्वानेव दिवौकसः
sanatkumāra uvāca | teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā bhītānāṁ tridivaukasām | uvāca bhagavān brahmā sarvāneva divaukasaḥ
सनत्कुमार ने कहा - उन भयभीत स्वर्गवासियों के इस वचन को सुनकर, भगवान् ब्रह्मा ने उन समस्त देवताओं से कहा -
श्लोक 6 (skanda.8.97.6)
न भेतव्यं सुरास्तस्य योगिनः सुमहात्मनः । समाप्तं तपसः सर्वं फलं दैत्यस्य तस्य तत्
na bhetavyaṁ surāstasya yoginaḥ sumahātmanaḥ | samāptaṁ tapasaḥ sarvaṁ phalaṁ daityasya tasya tat
'हे देवो! उस महान् योगी से भयभीत मत हो; उस दैत्य के तप का सम्पूर्ण फल अब समाप्त हो चुका है।'
श्लोक 7 (skanda.8.97.7)
कालस्तस्याभिसंप्राप्तो जीवितान्तकरः सुराः । तस्मात् सर्वे मया सार्धं यात विष्णुं प्रयाचत
kālastasyābhisaṁprāpto jīvitāntakaraḥ surāḥ | tasmāt sarve mayā sārdhaṁ yāta viṣṇuṁ prayācata
'हे देवो! उसके जीवन का अन्त करने वाला समय आ पहुँचा है; अतः तुम सब मेरे साथ चलो और विष्णु से प्रार्थना करो।'
श्लोक 8 (skanda.8.97.8)
भवन्तो निर्बला ह्यद्य अशक्तास्तस्य बाधने । विष्णुः शक्तः स तं दैत्यं जीविताच्च्यावयिष्यति
bhavanto nirbalā hyadya aśaktāstasya bādhane | viṣṇuḥ śaktaḥ sa taṁ daityaṁ jīvitāccyāvayiṣyati
'तुम आज दुर्बल हो, उसे पीड़ित करने में असमर्थ हो; विष्णु ही समर्थ हैं, वे ही उस दैत्य को जीवन से च्युत करेंगे।'
श्लोक 9 (skanda.8.97.9)
पूर्वं हि जाते तस्मिँस्तु वागुवाचाशरीरिणी । नायं वध्यो मनुष्यस्य न देवस्य कथञ्चन
pūrvaṁ hi jāte tasmi~stu vāguvācāśarīriṇī | nāyaṁ vadhyo manuṣyasya na devasya kathañcana
'पूर्वकाल में जब वह उत्पन्न हुआ था, तब एक अशरीरी वाणी ने कहा था - यह न किसी मनुष्य से मारा जाएगा, न किसी प्रकार किसी देवता से -'
श्लोक 10 (skanda.8.97.10)
नापि तिर्यक्षु जातस्य न भूमौ न च तेजसि । नाकाशे नापि लोकेषु महात्मायं भविष्यति
nāpi tiryakṣu jātasya na bhūmau na ca tejasi | nākāśe nāpi lokeṣu mahātmāyaṁ bhaviṣyati
'- न किसी पशु-योनि में जन्मे प्राणी से, न भूमि पर, न अग्नि में, न आकाश में, न किसी लोक में यह महात्मा मारा जाएगा।'
श्लोक 11 (skanda.8.97.11)
स एष देवा दैत्येशो महात्मा धार्मिकस्तदा । अवध्यः सर्वभूतानां वध्यो दुःखाद् भविष्यति
sa eṣa devā daityeśo mahātmā dhārmikastadā | avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ vadhyo duḥkhād bhaviṣyati
'हे देवो! वही यह दैत्येश्वर, महात्मा, धार्मिक होते हुए भी, समस्त प्राणियों के लिए अवध्य होकर भी, केवल अत्यन्त कठिनाई से ही वध्य होगा।'
श्लोक 12 (skanda.8.97.12)
वाराहं रूपमास्थाय न दैवं नापि मानुषम् । न च तिर्यक्षु तज्जातं नरवाराहमस्ति वै
vārāhaṁ rūpamāsthāya na daivaṁ nāpi mānuṣam | na ca tiryakṣu tajjātaṁ naravārāhamasti vai
'ऐसा एक नर-वाराह रूप है, जो न दैवी है, न मानुषी है, और न पशु-योनि में उत्पन्न है - उस वाराह-रूप को धारण करके ही (उसका वध सम्भव है)।'
श्लोक 13 (skanda.8.97.13)
पाताले च प्रविश्यैव नासौ भूर्नापि खं हि तत् । न तेजो नापि लोकोसौ सर्वतो मुक्तमेव तत्
pātāle ca praviśyaiva nāsau bhūrnāpi khaṁ hi tat | na tejo nāpi lokosau sarvato muktameva tat
'और पाताल में प्रवेश करके ही, जो न पृथ्वी है, न आकाश है, न अग्नि है, न कोई लोक है - वह सब प्रकार से [शपथ के बन्धन से] मुक्त ही है।'
श्लोक 14 (skanda.8.97.14)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते हृषिताः सर्वे प्रणम्य च पितामहम् । ऊचुर्गच्छाम देवेश कालोऽतिक्रमते हि नः
sanatkumāra uvāca | tataste hṛṣitāḥ sarve praṇamya ca pitāmaham | ūcurgacchāma deveśa kālo'tikramate hi naḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब वे सब प्रसन्न होकर, पितामह को प्रणाम कर बोले - 'हे देवेश! हम चलते हैं, हमारा समय बीता जा रहा है।'
श्लोक 15 (skanda.8.97.15)
ततस्ते सर्व एवैत्य श्वेतं पर्वतसत्तमम् । विष्णुं सहिष्णुं जिष्णुञ्च दानवायुतमर्दनम्
tataste sarva evaitya śvetaṁ parvatasattamam | viṣṇuṁ sahiṣṇuṁ jiṣṇuñca dānavāyutamardanam
तब वे सब श्वेत नामक श्रेष्ठ पर्वत पर जाकर, सहनशील, विजयशील और दानवों के समूह को कुचलने वाले विष्णु के पास पहुँचे,
श्लोक 16 (skanda.8.97.16)
अस्तुवन् वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य बहुमानतः । नमः सर्वरिपुघ्नाय दानवान्तकराय च
astuvan vāgbhiriṣṭābhiḥ praṇamya bahumānataḥ | namaḥ sarvaripughnāya dānavāntakarāya ca
और अत्यन्त आदर से प्रणाम कर, प्रिय वचनों से उनकी स्तुति करने लगे - 'समस्त शत्रुओं का नाश करने वाले, और दानवों का अन्त करने वाले को नमस्कार है;
श्लोक 17 (skanda.8.97.17)
नमो जिताय देवाय वैकुण्ठाय महात्मने । नमो निर्धूतरजमे नमः सत्याय चैव हि
namo jitāya devāya vaikuṇṭhāya mahātmane | namo nirdhūtarajame namaḥ satyāya caiva hi
विजयी देव को, महात्मा वैकुण्ठ को नमस्कार है; रजोगुण से रहित को नमस्कार है, और सत्यस्वरूप को भी नमस्कार है।'
श्लोक 18 (skanda.8.97.18)
नमः साध्याय देवाय नमो धाम्ने सुवेधसे । नमो यमाय देवाय जयाय च नमो नमः
namaḥ sādhyāya devāya namo dhāmne suvedhase | namo yamāya devāya jayāya ca namo namaḥ
'साध्य देव को नमस्कार है, तेजस्वरूप, सुविधाता को नमस्कार है; यम-रूपधारी देव को नमस्कार है, और विजय को बार-बार नमस्कार है।'
श्लोक 19 (skanda.8.97.19)
नमश्चादितिपुत्राय नरनारायणाय च । नमस्सुमतये चैव नमश्चैवास्तु विष्णवे
namaścāditiputrāya naranārāyaṇāya ca | namassumataye caiva namaścaivāstu viṣṇave
'अदिति-पुत्र को नमस्कार है, नर-नारायण को नमस्कार है; सुमति को नमस्कार है, और विष्णु को भी नमस्कार हो।'
श्लोक 20 (skanda.8.97.20)
नमो वामनरूपाय कृष्णद्वैपायनाय च । नमो रामाय रामाय दत्तात्रेयाय वै नमः
namo vāmanarūpāya kṛṣṇadvaipāyanāya ca | namo rāmāya rāmāya dattātreyāya vai namaḥ
'वामन-रूपधारी को नमस्कार है, कृष्ण-द्वैपायन को नमस्कार है; राम और राम दोनों को नमस्कार है, और दत्तात्रेय को भी नमस्कार है।'
श्लोक 21 (skanda.8.97.21)
नमस्ते नरसिंहाय धात्रे चैव नमो नमः । नमः साध्याय वेदाय चक्रिणे वै नमो नमः
namaste narasiṁhāya dhātre caiva namo namaḥ | namaḥ sādhyāya vedāya cakriṇe vai namo namaḥ
'नृसिंह-रूप आपको नमस्कार है, और विधाता को बार-बार नमस्कार है; साध्य वेद-स्वरूप को नमस्कार है, चक्रधारी को बार-बार नमस्कार है।'
श्लोक 22 (skanda.8.97.22)
नमः शकुनिहन्त्रे च नमो दामोदराय च । सलिले तप्यमानाय नागशय्याप्रियाय च
namaḥ śakunihantre ca namo dāmodarāya ca | salile tapyamānāya nāgaśayyāpriyāya ca
'शकुनि-नाशक को नमस्कार है, दामोदर को नमस्कार है; जल में तप करने वाले को, और शेष-शय्या पर प्रिय रहने वाले को नमस्कार है।'
श्लोक 23 (skanda.8.97.23)
नमः कपिलरूपाय महते पुरुषाय च । नमो जीमूतरूपाय महादेवप्रियाय च
namaḥ kapilarūpāya mahate puruṣāya ca | namo jīmūtarūpāya mahādevapriyāya ca
'कपिल-रूपधारी को, महान् पुरुष को नमस्कार है; मेघ-रूपधारी को, और महादेव के प्रिय को नमस्कार है।'
श्लोक 24 (skanda.8.97.24)
नमो रुद्रार्धरूपाय तथोमारूपिणे नमः । चक्रमुद्गरहस्ताय महेश्वरगणाय च
namo rudrārdharūpāya tathomārūpiṇe namaḥ | cakramudgarahastāya maheśvaragaṇāya ca
'रुद्र के अर्ध-रूपधारी को नमस्कार है, तथा उमा-रूपधारी को नमस्कार है; चक्र और गदा हाथ में धारण करने वाले को, और महेश्वर के गणों के साथ रहने वाले को नमस्कार है।'
श्लोक 25 (skanda.8.97.25)
शिपिविष्टाय च सदा नमः श्रीवत्सधारिणे । धुन्धुमाराय शूराय मधुकैटभघातिने
śipiviṣṭāya ca sadā namaḥ śrīvatsadhāriṇe | dhundhumārāya śūrāya madhukaiṭabhaghātine
'शिपिविष्ट को सदा नमस्कार है, श्रीवत्स-धारी को नमस्कार है; धुन्धु के मर्दक, शूरवीर, मधु-कैटभ के घातक को नमस्कार है।'
श्लोक 26 (skanda.8.97.26)
चतुर्भुजाय कृष्णाय रत्नकौस्तुभधारिणे । त्रिविक्रमवियत्स्थाय पीतवासः सुवाससे
caturbhujāya kṛṣṇāya ratnakaustubhadhāriṇe | trivikramaviyatsthāya pītavāsaḥ suvāsase
'चतुर्भुज, कृष्णवर्ण, रत्न-कौस्तुभ धारण करने वाले को नमस्कार है; त्रिविक्रम-रूप में आकाश में स्थित, पीत वस्त्र से सुसज्जित को नमस्कार है।'
श्लोक 27 (skanda.8.97.27)
नमः पुरुषघाताय गदाखड्गोग्रधारिणे । योगिने यजमानाय भृगुपत्नीप्रमाथिने
namaḥ puruṣaghātāya gadākhaḍgogradhāriṇe | yogine yajamānāya bhṛgupatnīpramāthine
'दुष्ट पुरुषों के संहारक को नमस्कार है, गदा-खड्ग के भयंकर धारक को नमस्कार है; योगी को, यज्ञकर्ता को, और भृगु-पत्नी का वध करने वाले को नमस्कार है।'
श्लोक 28 (skanda.8.97.28)
वृषरूपाय सततमादित्यानां वराय च । चेकितानाय दान्ताय शौरिणे वृष्णिबन्धवे
vṛṣarūpāya satatamādityānāṁ varāya ca | cekitānāya dāntāya śauriṇe vṛṣṇibandhave
'सदा वृष-रूपधारी को, आदित्यों में श्रेष्ठ को नमस्कार है; चेकितान को, जितेन्द्रिय को, शूर-वंशज को, वृष्णि-बान्धव को नमस्कार है।'
श्लोक 29 (skanda.8.97.29)
मुराश्वग्रीवनाशाय तथैवासुरसूदिने । नमस्ते शार्ङ्ग धनुषे सौभशाल्वविघातिने
murāśvagrīvanāśāya tathaivāsurasūdine | namaste śārṅga dhanuṣe saubhaśālvavighātine
'मुर और अश्वग्रीव के नाशक को, तथा असुरों के संहारक को नमस्कार है; शार्ङ्ग-धनुषधारी आपको, सौभ और शाल्व के विनाशक को नमस्कार है।'
श्लोक 30 (skanda.8.97.30)
नमस्ते पद्मनाभाय ब्रह्मदेहप्रवेशिने । नमो जयाय शर्वाय रुद्रदत्तवराय च
namaste padmanābhāya brahmadehapraveśine | namo jayāya śarvāya rudradattavarāya ca
'पद्मनाभ आपको नमस्कार है, ब्रह्मा के देह में प्रवेश करने वाले को नमस्कार है; विजय-स्वरूप को, शर्व-स्वरूप को, और रुद्र द्वारा वरदत्त को नमस्कार है।'
श्लोक 31 (skanda.8.97.31)
नमः सर्वेश्वरायैव नष्टधर्मप्रवर्तिने । पुरुषाय वरेण्याय नमस्ते शतबाहवे
namaḥ sarveśvarāyaiva naṣṭadharmapravartine | puruṣāya vareṇyāya namaste śatabāhave
'सबके ईश्वर को, नष्ट हुए धर्म को पुनः प्रवर्तित करने वाले को नमस्कार है; वरणीय पुरुष, शतबाहु आपको नमस्कार है।'
श्लोक 32 (skanda.8.97.32)
तव प्रसादात् कृच्छ्रं वै तराम पुरुषोत्तम । हृतराज्या वयं सर्वे न त्वं वेत्सि महाभुज । हिरण्याक्षेण वैकुण्ठ तं नाशय महाभुज
tava prasādāt kṛcchraṁ vai tarāma puruṣottama | hṛtarājyā vayaṁ sarve na tvaṁ vetsi mahābhuja | hiraṇyākṣeṇa vaikuṇṭha taṁ nāśaya mahābhuja
'हे पुरुषोत्तम! आपकी कृपा से ही हम इस संकट को पार करें। हम सबका राज्य छिन गया है, क्या यह आप नहीं जानते, हे महाभुज? हे वैकुण्ठ! हिरण्याक्ष के द्वारा यह हुआ है, उसे नष्ट कीजिए, हे महाभुज!'
श्लोक 33 (skanda.8.97.33)
सनत्कुमार उवाच । य इदं वैष्णवं स्तोत्रं भक्त्या परमया युतः । कीर्तयेत्सततं मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते
sanatkumāra uvāca | ya idaṁ vaiṣṇavaṁ stotraṁ bhaktyā paramayā yutaḥ | kīrtayetsatataṁ martyaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate
सनत्कुमार ने कहा - जो नश्वर मनुष्य परम भक्ति से युक्त होकर इस वैष्णव स्तोत्र का निरन्तर कीर्तन करता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 34 (skanda.8.97.34)
मृतश्च सर्वलोकेषु वर्षकोटिचतुर्दश । पूजितः सर्वदेवैश्च मोदते नात्र संशयः
mṛtaśca sarvalokeṣu varṣakoṭicaturdaśa | pūjitaḥ sarvadevaiśca modate nātra saṁśayaḥ
और मरने के बाद सम्पूर्ण देवताओं द्वारा पूजित होकर वह चौदह करोड़ वर्षों तक सब लोकों में आनन्दित रहता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 35 (skanda.8.97.35)
कीर्तयत्येव य इमं प्राणिभ्यो विप्रमुच्यते । स मृत्युलोकमप्राप्य चरते दुःखवर्जितः
kīrtayatyeva ya imaṁ prāṇibhyo vipramucyate | sa mṛtyulokamaprāpya carate duḥkhavarjitaḥ
जो केवल इसका कीर्तन ही करता है, वह [नाना] प्राणी-योनियों से मुक्त हो जाता है; वह मृत्युलोक को पुनः प्राप्त न कर, दुःखरहित होकर विचरण करता है।
श्लोक 36 (skanda.8.97.36)
उवाच सुरशार्दूलानिदं संपूजयन्सदा
uvāca suraśārdūlānidaṁ saṁpūjayansadā
(इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूल में अप्राप्त है) - सदा उनका सम्मान करते हुए विष्णु ने उन देवश्रेष्ठों से यह कहा -
श्लोक 37 (skanda.8.97.37)
इतः स दैत्यो दुर्बुद्धिर्देवान् द्वेष्टि सहायवान् । क्रियतां मर्त्यरूपं मे वाराहं मां विधार्यताम्
itaḥ sa daityo durbuddhirdevān dveṣṭi sahāyavān | kriyatāṁ martyarūpaṁ me vārāhaṁ māṁ vidhāryatām
'यह दुर्बुद्धि दैत्य अपने सहायकों सहित देवताओं से द्वेष करता है; मेरे लिए एक मर्त्य रूप बनाया जाए, मुझे वाराह-रूप धारण कराया जाए।'
श्लोक 38 (skanda.8.97.38)
महात्मा स च दैत्येन्द्रो बलवान् धार्मिकश्च ह । न च शक्यो मयैकेन हन्तुं सत्यं ब्रवीमि वः
mahātmā sa ca daityendro balavān dhārmikaśca ha | na ca śakyo mayaikena hantuṁ satyaṁ bravīmi vaḥ
'वह दैत्येन्द्र महात्मा, बलवान् और धार्मिक भी है; अकेले मेरे द्वारा उसका वध सम्भव नहीं है - यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।'
श्लोक 39 (skanda.8.97.39)
सर्वदेवमयं रूपं वाराहं नन्दिवर्धनम् । तत्समास्थाय हन्तास्मि दैत्येन्द्रं तं महाबलम्
sarvadevamayaṁ rūpaṁ vārāhaṁ nandivardhanam | tatsamāsthāya hantāsmi daityendraṁ taṁ mahābalam
'सम्पूर्ण देवताओं से बना हुआ, आनन्द बढ़ाने वाला वाराह-रूप धारण कर, मैं उस महाबली दैत्येन्द्र का वध करूँगा।'
श्लोक 40 (skanda.8.97.40)
तेन रूपेण सर्वेषामस्माकं देवसत्तमाः । ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नः प्रस्थाता यम इत्यपि
tena rūpeṇa sarveṣāmasmākaṁ devasattamāḥ | brahmā brahmatvamāpannaḥ prasthātā yama ityapi
'हे देवश्रेष्ठो! उस रूप में हम सबमें से ब्रह्मा 'ब्रह्मा' पद पर, और यम 'प्रस्थाता' पद पर आसीन होंगे।'
श्लोक 41 (skanda.8.97.41)
उद्गाता तत्र वरुणो हिरण्याक्षस्ततः पशुः । शमिताहं सुरश्रेष्ठा यशस्तस्य महाबलः
udgātā tatra varuṇo hiraṇyākṣastataḥ paśuḥ | śamitāhaṁ suraśreṣṭhā yaśastasya mahābalaḥ
'वरुण वहाँ उद्गाता होंगे, और हिरण्याक्ष पशु (यज्ञ-पशु) होगा; मैं स्वयं शमिता (वध करने वाला) बनूँगा, हे देवश्रेष्ठो! ऐसा उस महान् कर्म का यश होगा।'
श्लोक 42 (skanda.8.97.42)
अद्य पश्यन्तु भूतानि मम तस्यैव चोभयोः
adya paśyantu bhūtāni mama tasyaiva cobhayoḥ
'आज सभी प्राणी देखें, मेरे और उसके - दोनों के' (इस श्लोक की शेष पंक्ति मूल में अप्राप्त है) -
श्लोक 43 (skanda.8.97.43)
अरण्ये वासिताहेतोर्मत्तयोर्गजयोरिव । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा गर्जितं च महात्मनः
araṇye vāsitāhetormattayorgajayoriva | tasya tadvacanaṁ śrutvā garjitaṁ ca mahātmanaḥ
- मानो वन में मादा गजी के लिए दो मदमत्त गजराज गरज रहे हों। उस महात्मा के उस वचन और गर्जन को सुनकर -
श्लोक 44 (skanda.8.97.44)
हर्षोत्फुल्लेक्षणाः सर्वे निरीक्षन्तः परस्परम् । मेनिरे हत इत्येव दैत्येन्द्रं सुमहाबलम्
harṣotphullekṣaṇāḥ sarve nirīkṣantaḥ parasparam | menire hata ityeva daityendraṁ sumahābalam
- हर्ष से खिले हुए नेत्रों वाले वे सब देवता एक-दूसरे को देखते हुए, उस अत्यन्त बलशाली दैत्येन्द्र को मानो पहले से ही मरा हुआ समझने लगे।
श्लोक 45 (skanda.8.97.45)
तेषां तदुत्फुल्लकुशेशयप्रभं वक्रेक्षणं चारुतरावभासकम् । हतः स दैत्यो नरसिंहरूपिणा यथा पुरा तस्य गुरुर्महाबलः
teṣāṁ tadutphullakuśeśayaprabhaṁ vakrekṣaṇaṁ cārutarāvabhāsakam | hataḥ sa daityo narasiṁharūpiṇā yathā purā tasya gururmahābalaḥ
उन देवताओं के लिए, खिले हुए कमल के समान कान्तिमान्, तिरछी दृष्टि वाला, अत्यन्त सुन्दर आभा वाला वह मुख मानो यह दर्शा रहा था कि वह दैत्य वैसे ही मारा जाएगा जैसे पूर्वकाल में उसका महाबली गुरुजन (हिरण्यकशिपु) नृसिंह-रूपधारी के द्वारा मारा गया था।