अम्बिका खण्ड · अध्याय 96
ब्रह्मा का वचन
श्लोक 1 (skanda.8.96.1)
व्यास उवाच । तथा राजनि दैत्येन्द्रे त्रैलोक्याधिपतौ शुभे । धरण्याञ्चैव बद्धायां सुखितासु प्रजासु च
vyāsa uvāca | tathā rājani daityendre trailokyādhipatau śubhe | dharaṇyāñcaiva baddhāyāṁ sukhitāsu prajāsu ca
व्यास ने कहा - इस प्रकार जब वह शुभ दैत्येन्द्र त्रिलोक का अधिपति बनकर राज्य कर रहा था, पृथ्वी बँधी हुई थी, और प्रजाएँ सुखी थीं,
श्लोक 2 (skanda.8.96.2)
स्थानेभ्यश्च्याविता देवा ह्यप्रतिष्ठा महाबलाः । किमकुर्वत दुःखार्त्ता एतन्मे शंस सर्वशः
sthānebhyaścyāvitā devā hyapratiṣṭhā mahābalāḥ | kimakurvata duḥkhārttā etanme śaṁsa sarvaśaḥ
- तब अपने-अपने स्थानों से च्युत किए गए, आश्रयहीन हुए वे महाबली देवता दुःख से पीड़ित होकर क्या करते थे? यह मुझे पूर्णतः बताइए।
श्लोक 3 (skanda.8.96.3)
सनत्कुमार उवाच । शृणुष्व धर्म देवानामवस्था या बभूव ह । यदकुर्वत दुःखार्त्तास्तत्र सर्वे यथाक्रमम्
sanatkumāra uvāca | śṛṇuṣva dharma devānāmavasthā yā babhūva ha | yadakurvata duḥkhārttāstatra sarve yathākramam
सनत्कुमार ने कहा - हे धर्मज्ञ! सुनो, देवताओं की जैसी अवस्था हुई और दुःख से पीड़ित होकर उन्होंने वहाँ क्रमशः जो कुछ किया, वह बताता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.8.96.4)
हव्यवाहोग्निरभवद्देवानां भागवर्द्धनः । तं निरस्य तदा दैत्यो वह्निमन्यं चकार ह
havyavāhognirabhavaddevānāṁ bhāgavarddhanaḥ | taṁ nirasya tadā daityo vahnimanyaṁ cakāra ha
अग्नि हव्यवाहन के रूप में देवताओं के यज्ञ-भाग को बढ़ाने वाला था; उसे हटाकर उस दैत्य ने उस समय दूसरे को ही अग्नि बना दिया।
श्लोक 5 (skanda.8.96.5)
तस्मिन्कर्मणि विप्रेन्द्र मन्त्रास्तदनुगाभवन् । दैत्यदानवभागानां वक्तारः शुभसाधकाः
tasminkarmaṇi viprendra mantrāstadanugābhavan | daityadānavabhāgānāṁ vaktāraḥ śubhasādhakāḥ
हे विप्रेन्द्र! उस कर्म में मन्त्र भी उसी के अनुगामी हो गए, और दैत्य-दानवों के भाग को घोषित करने वाले शुभ साधक बन गए।
श्लोक 6 (skanda.8.96.6)
ततो यज्ञः स्वयं दैत्यानुपतस्थे महात्मनः । यज्ञे गते च दैत्येन्द्रान्देवाः सर्वे मृता इव
tato yajñaḥ svayaṁ daityānupatasthe mahātmanaḥ | yajñe gate ca daityendrāndevāḥ sarve mṛtā iva
फिर यज्ञ स्वयं ही उस महात्मा दैत्येन्द्र की सेवा में उपस्थित हो गया; और यज्ञ के दैत्येन्द्रों की ओर चले जाने पर समस्त देवता मानो मृतवत् हो गए।
श्लोक 7 (skanda.8.96.7)
अभवन्नष्टसंज्ञाश्च मन्दवीर्यपराक्रमाः । निःश्रीकाश्च निरुद्योगा निराक्रन्दा समुत्सुकाः
abhavannaṣṭasaṁjñāśca mandavīryaparākramāḥ | niḥśrīkāśca nirudyogā nirākrandā samutsukāḥ
वे बेसुध हो गए, उनका बल-पराक्रम क्षीण हो गया; वे कान्तिहीन, उद्यमहीन, आर्तनाद-रहित और व्याकुल हो गए।
श्लोक 8 (skanda.8.96.8)
मन्त्रदग्धा यथा सर्पा वज्रपिष्टा यथाचलाः । गरुत्मताभिसन्दष्टाः पन्नगा इव निर्विषाः
mantradagdhā yathā sarpā vajrapiṣṭā yathācalāḥ | garutmatābhisandaṣṭāḥ pannagā iva nirviṣāḥ
जैसे मन्त्रों से दग्ध सर्प, जैसे वज्र से चूर्ण किए गए पर्वत, और जैसे गरुड़ द्वारा डँसे गए विषरहित सर्प हो जाते हैं,
श्लोक 9 (skanda.8.96.9)
विहीना अद्भिर्यथा वृक्षा बान्धवैर्वापि योषितः । तथा ते दैवता व्यास हृतराज्या हृतश्रियः
vihīnā adbhiryathā vṛkṣā bāndhavairvāpi yoṣitaḥ | tathā te daivatā vyāsa hṛtarājyā hṛtaśriyaḥ
जैसे जल से रहित वृक्ष या बन्धुओं से रहित स्त्रियाँ हो जाती हैं, वैसे ही हे व्यास! वे देवगण अपना राज्य और अपनी श्री खोकर हो गए।
श्लोक 10 (skanda.8.96.10)
चिन्तयन्ति हृदा चैव शुष्यन्ति विलपन्ति च । अथ देवः स्वयम्भूस्तान् ज्ञात्वा देवाँस्तथाविधान्
cintayanti hṛdā caiva śuṣyanti vilapanti ca | atha devaḥ svayambhūstān jñātvā devā~stathāvidhān
वे हृदय से चिन्ता करते, सूखते और विलाप करते रहे। तब स्वयम्भू ब्रह्मा उन देवताओं को उस अवस्था में जानकर -
श्लोक 11 (skanda.8.96.11)
विमानेनार्कवर्णेन प्रोवाचेदं पितामहः । भो देवा नष्टसंज्ञा स्थ किमर्थं दुःखिता भृशम् । तपोयोगबलं वोद्य ददामि सुरपुङ्गवाः
vimānenārkavarṇena provācedaṁ pitāmahaḥ | bho devā naṣṭasaṁjñā stha kimarthaṁ duḥkhitā bhṛśam | tapoyogabalaṁ vodya dadāmi surapuṅgavāḥ
- सूर्य के समान कान्ति वाले विमान से आकर वहाँ पहुँचे और बोले - 'हे देवो! तुम बेसुध क्यों हो, इतने दुःखी क्यों हो? आज मैं तुम्हें तप और योग का बल देता हूँ, हे देवश्रेष्ठो!'
श्लोक 12 (skanda.8.96.12)
यूयं लोकस्य कर्तारो हर्तारश्चैव सर्वशः । न युक्तं भवतामेतत् क्लीबवत् स्थातुमद्य वै
yūyaṁ lokasya kartāro hartāraścaiva sarvaśaḥ | na yuktaṁ bhavatāmetat klībavat sthātumadya vai
'तुम ही सब प्रकार से लोक के रचयिता और संहारक हो; तुम्हारा आज इस प्रकार नपुंसक के समान बैठे रहना उचित नहीं है।'
श्लोक 13 (skanda.8.96.13)
स्वीयं योगं मदीयञ्च त्यक्त्वा दुःखं महाबलाः । प्रतिपद्यत मा शोके स्वयं देवाः प्रवर्तत
svīyaṁ yogaṁ madīyañca tyaktvā duḥkhaṁ mahābalāḥ | pratipadyata mā śoke svayaṁ devāḥ pravartata
'हे महाबलियो! शोक को त्यागकर अपने योग-बल तथा मेरे भी योग-बल को ग्रहण करो; शोक मत करो, हे देवो! स्वयं उद्यत होओ।'
श्लोक 14 (skanda.8.96.14)
न तमो भास्कराद्युक्तं न सोमादुष्णता यथा । नाग्नेर्यथा तुषारश्च नामृतं भुजगादपि
na tamo bhāskarādyuktaṁ na somāduṣṇatā yathā | nāgneryathā tuṣāraśca nāmṛtaṁ bhujagādapi
'जैसे सूर्य से अन्धकार, चन्द्रमा से उष्णता, अग्नि से हिम, और सर्प से अमृत की अपेक्षा उचित नहीं है,'
श्लोक 15 (skanda.8.96.15)
नासाधोः साधुभावश्च न कुलीनादशोभनम् । नाधर्मो नियमेभ्यश्च न वेदेभ्यश्च दुर्मतिः
nāsādhoḥ sādhubhāvaśca na kulīnādaśobhanam | nādharmo niyamebhyaśca na vedebhyaśca durmatiḥ
'जैसे दुष्ट से साधुता, कुलीन से अशोभनीयता, नियमों से अधर्म, और वेदों से दुर्बुद्धि उचित नहीं है,'
श्लोक 16 (skanda.8.96.16)
तथा न युक्तं युष्माकमिदं देवा महात्मनाम् । आपत्सु न विषीदन्ति ये केचित्तेजसा स्थिताः
tathā na yuktaṁ yuṣmākamidaṁ devā mahātmanām | āpatsu na viṣīdanti ye kecittejasā sthitāḥ
'वैसे ही हे देवो! तुम जैसे महात्माओं के लिए भी यह शोभा नहीं देता। जो लोग अपने तेज में स्थिर रहते हैं, वे विपत्तियों में विषाद नहीं करते।'
श्लोक 17 (skanda.8.96.17)
ते यूयमापदं प्राप्य न शोकं कर्तुमर्हथ । मा भवन्तोवसीदन्तु राज्यं भूयो भविष्यति
te yūyamāpadaṁ prāpya na śokaṁ kartumarhatha | mā bhavantovasīdantu rājyaṁ bhūyo bhaviṣyati
'ऐसे तुम भी विपत्ति में पड़कर शोक करने योग्य नहीं हो; तुम में से कोई विषाद न करे, राज्य फिर से तुम्हारा हो जाएगा।'
श्लोक 18 (skanda.8.96.18)
महायोगबलोपेतो हिरण्याक्षोद्य देवताः । अशक्यो हन्तुमल्पेन तेजसा दितिनन्दनः
mahāyogabalopeto hiraṇyākṣodya devatāḥ | aśakyo hantumalpena tejasā ditinandanaḥ
'हे देवो! आज हिरण्याक्ष महान् योगबल से युक्त है; वह दिति-पुत्र साधारण तेज से मारा नहीं जा सकता।'
श्लोक 19 (skanda.8.96.19)
प्रतीक्षन्तु भवन्तोस्य तपसः क्षयमव्ययाः । क्षीणे तपसि दैत्येन्द्रं युद्धे विष्णुर्वधिष्यति
pratīkṣantu bhavantosya tapasaḥ kṣayamavyayāḥ | kṣīṇe tapasi daityendraṁ yuddhe viṣṇurvadhiṣyati
'हे अविनाशियो! तुम उसके तप के क्षय होने की प्रतीक्षा करो; तप के क्षीण होने पर विष्णु उस दैत्येन्द्र को युद्ध में मार डालेंगे।'
श्लोक 20 (skanda.8.96.20)
सनत्कुमार उवाच । त एवं ब्रह्मणा प्रोक्ता लब्धयोगाः सुरेश्वराः । प्रणम्य सर्वभूतानां स्रष्टारमिदमब्रुवन्
sanatkumāra uvāca | ta evaṁ brahmaṇā proktā labdhayogāḥ sureśvarāḥ | praṇamya sarvabhūtānāṁ sraṣṭāramidamabruvan
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा कहे जाने पर, योग-बल प्राप्त कर वे देवेश्वर सम्पूर्ण भूतों के स्रष्टा को प्रणाम कर यह बोले -
श्लोक 21 (skanda.8.96.21)
हृतानि नो महायोगस्थानानि दितिनन्दनैः । क्व तिष्ठाम वयं ब्रूहि दिश नः स्थानमव्ययम्
hṛtāni no mahāyogasthānāni ditinandanaiḥ | kva tiṣṭhāma vayaṁ brūhi diśa naḥ sthānamavyayam
'हमारे महायोग-स्थान दिति-पुत्रों द्वारा छीन लिए गए हैं; अब हम कहाँ रहें, यह बताइए; हमें कोई अविनाशी स्थान दिखलाइए।'
श्लोक 22 (skanda.8.96.22)
ब्रह्मोवाच । हृतानि सर्वस्थानानि युष्माकं विदितञ्च मे । शृणुध्वं यत्र वस्तव्यं युष्माभिर्योगमायया
brahmovāca | hṛtāni sarvasthānāni yuṣmākaṁ viditañca me | śṛṇudhvaṁ yatra vastavyaṁ yuṣmābhiryogamāyayā
ब्रह्मा ने कहा - तुम्हारे सभी स्थान छीन लिए गए हैं, यह मुझे भी विदित है। सुनो, योगमाया के बल से तुम्हें कहाँ रहना है।
श्लोक 23 (skanda.8.96.23)
यूयं सर्वे शरीरेषु योगाद् विशत सत्तमाः । प्रजानां सर्वतो देवास्ततो वृत्तिमवाप्स्यथ
yūyaṁ sarve śarīreṣu yogād viśata sattamāḥ | prajānāṁ sarvato devāstato vṛttimavāpsyatha
'हे उत्तमो! तुम सब योग द्वारा प्रजाओं के शरीरों में सब ओर से प्रवेश करो, हे देवो! वहाँ से तुम्हें जीविका प्राप्त होगी।'
श्लोक 24 (skanda.8.96.24)
तेषामशितपीतैश्च संस्कारैश्च पृथग्विधैः । पृथिवी नागबद्धापि युष्मानाप्याययिष्यति
teṣāmaśitapītaiśca saṁskāraiśca pṛthagvidhaiḥ | pṛthivī nāgabaddhāpi yuṣmānāpyāyayiṣyati
'उनके खाने-पीने और नाना प्रकार के संस्कारों के द्वारा, नागों से बँधी हुई पृथ्वी भी तुम्हें तृप्त करती रहेगी।'
श्लोक 25 (skanda.8.96.25)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता देवेन देवाः सर्वे सवासवाः । तथा चक्रुर्यथोवाच ब्रह्मा लोकपितामहः
sanatkumāra uvāca | ta evamuktā devena devāḥ sarve savāsavāḥ | tathā cakruryathovāca brahmā lokapitāmahaḥ
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार उस देव द्वारा कहे जाने पर, वासव सहित समस्त देवताओं ने वैसा ही किया जैसा लोकपितामह ब्रह्मा ने कहा था।
श्लोक 26 (skanda.8.96.26)
तेवर्तयन्त सततं तत्रस्थाः सुरसत्तमाः । चतुर्युगमुपासन्तो लोकधातुर्मते स्थिताः
tevartayanta satataṁ tatrasthāḥ surasattamāḥ | caturyugamupāsanto lokadhāturmate sthitāḥ
वे सर्वश्रेष्ठ देवगण वहीं रहकर सतत अपनी जीविका चलाते रहे, और लोक-विधाता के मत में स्थित होकर चारों युगों तक उपासना करते रहे।
श्लोक 27 (skanda.8.96.27)
अथ योगाद् हिरण्याक्षः प्रजासु समवास्थितान् । सुरानपश्यद्योगात्मा चुक्रोध च स तान्प्रति
atha yogād hiraṇyākṣaḥ prajāsu samavāsthitān | surānapaśyadyogātmā cukrodha ca sa tānprati
फिर योग-सम्पन्न हिरण्याक्ष ने योग-दृष्टि से प्रजाओं में इस प्रकार बसे हुए देवताओं को देख लिया, और उन पर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा।
श्लोक 28 (skanda.8.96.28)
यस्मिन्यस्मिन्नपश्यच्च सुरं स समवस्थितम् । अवधीत्तं तमभ्येत्य तदा दानवसत्तमः
yasminyasminnapaśyacca suraṁ sa samavasthitam | avadhīttaṁ tamabhyetya tadā dānavasattamaḥ
जिस-जिस प्राणी में उस श्रेष्ठ दानव ने किसी देवता को इस प्रकार बसा हुआ देखा, उसके पास जाकर उसने तत्काल उसका वध कर दिया।
श्लोक 29 (skanda.8.96.29)
अहं प्रजाः सदोद्युक्तो रक्षामि सततं भयात् । ममैव ता दुराचारा विद्विषो वर्धयन्त्युत
ahaṁ prajāḥ sadodyukto rakṣāmi satataṁ bhayāt | mamaiva tā durācārā vidviṣo vardhayantyuta
'मैं सदा प्रयत्नशील रहकर निरन्तर प्रजाओं की भय से रक्षा करता हूँ; और ये दुराचारी मेरे ही शत्रुओं को पोषित करती हैं!'
श्लोक 30 (skanda.8.96.30)
कृतघ्नाः स्वामिघातिन्यो दुष्पूरा दुष्टचेतसः । मम शत्रूनिमा दुष्टा अन्नपानादिभिस्सदा
kṛtaghnāḥ svāmighātinyo duṣpūrā duṣṭacetasaḥ | mama śatrūnimā duṣṭā annapānādibhissadā
'कृतघ्न, अपने स्वामी की घातक, अतृप्त और दुष्ट-हृदय वाली ये प्रजाएँ सदा अन्न-पान आदि से मेरे शत्रुओं को -'
श्लोक 31 (skanda.8.96.31)
आप्याययन्ति दुर्वृत्ता दण्डार्हा मे ततस्तु ताः । यत्र तत्र गताः सर्वाः प्रजाः सर्वत्र सोवधीत्
āpyāyayanti durvṛttā daṇḍārhā me tatastu tāḥ | yatra tatra gatāḥ sarvāḥ prajāḥ sarvatra sovadhīt
'- ये दुराचारिणी प्रजाएँ तृप्त करती रहती हैं, अतः ये मेरे दण्ड की पात्र हैं' - (यहाँ मूल पाठ की एक पंक्ति अप्राप्त है) - इस प्रकार जहाँ-जहाँ भी वे प्रजाएँ गईं, सर्वत्र उसने उन सबका वध कर डाला।
श्लोक 32 (skanda.8.96.32)
पल्वलानि तडागानि नदीः प्रस्रवणानि च । सर्वाण्येव तदा योगादशोषयत दानवः
palvalāni taḍāgāni nadīḥ prasravaṇāni ca | sarvāṇyeva tadā yogādaśoṣayata dānavaḥ
तालाब, सरोवर, नदियाँ और झरने - इन सबको ही उस समय उस दानव ने अपने योगबल से सुखा डाला।
श्लोक 33 (skanda.8.96.33)
ओषध्योकृष्टपच्याश्च या ह्यासँस्तस्य सुव्रत । व्यनाशयत् स ताश्चापि वृक्षवल्लीरपोथयत्
oṣadhyokṛṣṭapacyāśca yā hyāsa~stasya suvrata | vyanāśayat sa tāścāpi vṛkṣavallīrapothayat
हे सुव्रत! जो औषधियाँ बिना जोते ही पकती थीं, उन्हें भी उसने नष्ट कर डाला, और वृक्षों तथा लताओं को भी रौंद डाला।
श्लोक 34 (skanda.8.96.34)
तन्नष्टवृक्षक्षुपवल्लिपल्लवं तृणौषधीप्रस्रवणोदकाशयम् । सरित्तडागावटशुष्कपल्वलं जगद् बभौ कच्छपपृष्ठसन्निभम् । प्रणष्टवर्णाश्रमधर्मसंयमं विनष्टघोषव्रजपक्षिमानुषम् । द्विपाश्वपत्यादिगणैर्विनादितं युगान्तकालाग्निमुदग्रवज्जगत्
tannaṣṭavṛkṣakṣupavallipallavaṁ tṛṇauṣadhīprasravaṇodakāśayam | sarittaḍāgāvaṭaśuṣkapalvalaṁ jagad babhau kacchapapṛṣṭhasannibham | praṇaṣṭavarṇāśramadharmasaṁyamaṁ vinaṣṭaghoṣavrajapakṣimānuṣam | dvipāśvapatyādigaṇairvināditaṁ yugāntakālāgnimudagravajjagat
उस समय वृक्ष, झाड़ी, लता और कोंपलें नष्ट हो जाने से, घास, औषधियाँ, झरने और जलाशय समाप्त हो जाने से, नदियाँ, सरोवर, कुएँ और तालाब सूख जाने से, वह जगत् कछुए की पीठ के समान (शुष्क और उजाड़) दिखाई देने लगा; वर्णाश्रम-धर्म और संयम नष्ट हो गया, गोपालक-बस्तियाँ, पक्षी और मनुष्य सब नष्ट हो गए; फिर भी हाथी, घोड़े आदि के समूहों से गूँजता हुआ वह जगत् मानो प्रलयकाल की भड़कती अग्नि के समान भयंकर दिखाई देने लगा।