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अम्बिका खण्ड · अध्याय 95

हिरण्याक्ष-राज्य-वर्णन

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

श्लोक 1 (skanda.8.95.1)

सनत्कुमार उवाच । तथा लङ्कां समासाद्य धनेशस्य पुरीं शुभाम् । अदूरे तस्थुरुद्धूताः सन्नद्धकवचायुधाः

sanatkumāra uvāca | tathā laṅkāṁ samāsādya dhaneśasya purīṁ śubhām | adūre tasthuruddhūtāḥ sannaddhakavacāyudhāḥ

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार कुबेर की सुन्दर नगरी लंका में पहुँचकर, कवच और आयुधों से सुसज्जित, उद्विग्न दानव उससे कुछ ही दूर खड़े हो गए।

श्लोक 2 (skanda.8.95.2)

अवस्थिताँस्तथा दृष्ट्वा दानवान् बलदर्पितान् । लङ्कानिवासिनः सर्वे निधिपालास्तथैव च

avasthitā~stathā dṛṣṭvā dānavān baladarpitān | laṅkānivāsinaḥ sarve nidhipālāstathaiva ca

बल से गर्वित उन दानवों को इस प्रकार खड़े देखकर, लंका के समस्त निवासी और उसी प्रकार निधियों के रक्षक -

श्लोक 3 (skanda.8.95.3)

निधयः शंखपद्माद्या ऋषयश्च तपोधनाः । अर्घं रत्नानि चादाय दानवाय न्यवेदयन्

nidhayaḥ śaṁkhapadmādyā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | arghaṁ ratnāni cādāya dānavāya nyavedayan

- शंख, पद्म आदि निधियाँ, तथा तपोधन ऋषिगण, अर्घ्य और रत्न लेकर उस दानव (हिरण्याक्ष) के समक्ष अर्पित करने लगे।

श्लोक 4 (skanda.8.95.4)

ऊचुश्च तव दैत्येन्द्र वयं वश्या न संशयः । किङ्कराश्च प्रशाध्यस्मान् यथावद्दानवेश्वर

ūcuśca tava daityendra vayaṁ vaśyā na saṁśayaḥ | kiṅkarāśca praśādhyasmān yathāvaddānaveśvara

और उन्होंने कहा - 'हे दैत्येन्द्र! हम निःसंदेह तुम्हारे वश में हैं; हम तुम्हारे सेवक हैं, हे दानवेश्वर! हमें यथोचित रूप से शासित करो।'

श्लोक 5 (skanda.8.95.5)

हिरण्याक्ष उवाच । मा भीर्भवतु वो यक्षा मम यूयं न संशयः । अयं राजा हि वः श्रेष्ठो हिरण्यकशिपोः सुतः

hiraṇyākṣa uvāca | mā bhīrbhavatu vo yakṣā mama yūyaṁ na saṁśayaḥ | ayaṁ rājā hi vaḥ śreṣṭho hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ

हिरण्याक्ष ने कहा - हे यक्षो! भयभीत मत हो, तुम निःसंदेह मेरे ही हो। यह हिरण्यकशिपु का पुत्र तुम्हारा श्रेष्ठ राजा होगा -

श्लोक 6 (skanda.8.95.6)

प्रह्लादो देवसंघानां सर्वेषां विप्रबाधनः । ततस्तं तत्र संस्थाप्य धनेशं दैत्यपुङ्गवम्

prahlādo devasaṁghānāṁ sarveṣāṁ viprabādhanaḥ | tatastaṁ tatra saṁsthāpya dhaneśaṁ daityapuṅgavam

- प्रह्लाद, जो समस्त देवगणों को पीड़ित करने वाला है।' तब उस दैत्यश्रेष्ठ ने उसे वहाँ कुबेर के पद पर स्थापित कर,

श्लोक 7 (skanda.8.95.7)

अन्येषां देवसंघानां स्थानान्यापूरयत्पुनः । संस्थाप्य सर्वस्थानेषु स्थानिनो दानवेश्वरान्

anyeṣāṁ devasaṁghānāṁ sthānānyāpūrayatpunaḥ | saṁsthāpya sarvasthāneṣu sthānino dānaveśvarān

- अन्य देवगणों के पदों को भी पुनः भर दिया, तथा उन सभी पदों पर दानवेश्वरों को अधिकारी बनाकर स्थापित कर दिया।

श्लोक 8 (skanda.8.95.8)

अन्धकं त्वमरावत्यामिन्द्रत्वेनाभ्यषेचयत् । भूर्लोकं चाखिलं दैत्यः स्वयमेवान्वशासत

andhakaṁ tvamarāvatyāmindratvenābhyaṣecayat | bhūrlokaṁ cākhilaṁ daityaḥ svayamevānvaśāsata

अन्धक को अमरावती में इन्द्र-पद पर अभिषिक्त किया, और सम्पूर्ण भूलोक पर दैत्य हिरण्याक्ष स्वयं शासन करने लगा।

श्लोक 9 (skanda.8.95.9)

भूयश्च धनुरादाय सशरं सूर्यसन्निभः । दैत्येन्द्रो मेदिनीं प्राह ममात्मानं विदर्शय

bhūyaśca dhanurādāya saśaraṁ sūryasannibhaḥ | daityendro medinīṁ prāha mamātmānaṁ vidarśaya

फिर धनुष-बाण उठाकर सूर्य के समान तेजस्वी उस दैत्येन्द्र ने पृथ्वी से कहा - 'मुझे अपना स्वरूप दिखा!'

श्लोक 10 (skanda.8.95.10)

सा भीता तस्य दैत्यस्य वेपमाना कृताञ्जलिः । जयेत्युक्त्वाग्रतस्तस्थौ विष्णोर्लक्ष्मीरिवापरा

sā bhītā tasya daityasya vepamānā kṛtāñjaliḥ | jayetyuktvāgratastasthau viṣṇorlakṣmīrivāparā

उस दैत्य से भयभीत, काँपती हुई, हाथ जोड़े हुए वह पृथ्वी 'जय हो' कहकर उसके सामने खड़ी हो गई, मानो विष्णु के आगे स्वयं लक्ष्मी हों।

श्लोक 11 (skanda.8.95.11)

तां मृगीमिव शार्दूलो भुजङ्गीमिव पक्षिराट् । शार्दूलीं सिंह इव च सिंहीं शरभराडिव

tāṁ mṛgīmiva śārdūlo bhujaṅgīmiva pakṣirāṭ | śārdūlīṁ siṁha iva ca siṁhīṁ śarabharāḍiva

जैसे व्याघ्र मृगी को, पक्षिराज सर्पिणी को, सिंह व्याघ्रिणी को और शरभराज सिंहिनी को पकड़ता है,

श्लोक 12 (skanda.8.95.12)

हंसीं काक इव क्षुद्रो मयूरी मद्गुराडिव । तथा तां स दितेः पुत्रो जग्राह रुषिताननः । उवाच चैव संरब्धस्तां देवीं भयविह्वलाम्

haṁsīṁ kāka iva kṣudro mayūrī madgurāḍiva | tathā tāṁ sa diteḥ putro jagrāha ruṣitānanaḥ | uvāca caiva saṁrabdhastāṁ devīṁ bhayavihvalām

जैसे तुच्छ कौआ हंसिनी को और मद्गु-पक्षी मयूरी को पकड़ता है, उसी प्रकार उस दिति-पुत्र ने क्रोध से विकृत मुख कर उस पृथ्वी को पकड़ लिया, और अत्यन्त क्रोध में भरकर भय से विह्वल उस देवी से कहा -

श्लोक 13 (skanda.8.95.13)

तवाहं वसुधे भर्त्ता ब्रह्मणा प्रकृतः शुभे । मान्यं पतिं त्वमिच्छेथा रक्षिष्येहं ततो हि ते

tavāhaṁ vasudhe bharttā brahmaṇā prakṛtaḥ śubhe | mānyaṁ patiṁ tvamicchethā rakṣiṣyehaṁ tato hi te

'हे शुभे वसुधे! ब्रह्मा द्वारा मैं तुम्हारा पति नियुक्त किया गया हूँ; तुम एक आदरणीय पति की इच्छा करो, तो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।'

श्लोक 14 (skanda.8.95.14)

सनत्कुमार उवाच । ततो रसातलं गत्वा स्वपुरस्य समीपतः । बबद्ध नागपाशैस्तां दुष्टामिव यथाङ्गनाम्

sanatkumāra uvāca | tato rasātalaṁ gatvā svapurasya samīpataḥ | babaddha nāgapāśaistāṁ duṣṭāmiva yathāṅganām

सनत्कुमार ने कहा - फिर रसातल में अपने नगर के समीप जाकर उसने पृथ्वी को नाग-पाशों से उसी प्रकार बाँध दिया जैसे किसी कुलटा स्त्री को बाँधा जाता है।

श्लोक 15 (skanda.8.95.15)

ततोचलेन दैत्येन्द्रः शंखेन सुमहाबलः । आर्त्तां रुरोध दुष्टश्च कन्दरामिव वीर्यवान्

tatocalena daityendraḥ śaṁkhena sumahābalaḥ | ārttāṁ rurodha duṣṭaśca kandarāmiva vīryavān

फिर उस अत्यन्त बलशाली, दुष्ट, पराक्रमी दैत्येन्द्र ने संकट में पड़ी उस पृथ्वी को शंख नामक अचल (पर्वत) से उसी प्रकार अवरुद्ध कर दिया, जैसे किसी गुहा को अवरुद्ध किया जाता है।

श्लोक 16 (skanda.8.95.16)

ततोऽस्या रक्षणे नित्यमुद्युक्तान् रक्षिणो दधौ । किङ्करान्नाम दैत्येन्द्रान् सहस्राणि चतुर्दश

tato'syā rakṣaṇe nityamudyuktān rakṣiṇo dadhau | kiṅkarānnāma daityendrān sahasrāṇi caturdaśa

फिर उसने उसकी रक्षा में सदा तत्पर रहने वाले, किंकर नामक चौदह हजार दैत्येन्द्रों को रक्षक नियुक्त किया।

श्लोक 17 (skanda.8.95.17)

स तथा तद्विधायैव दैत्येन्द्रस्तुष्टिमान् बभौ । कृषीबल इव क्षेत्रं सुनिष्पन्नं समीक्ष्य च

sa tathā tadvidhāyaiva daityendrastuṣṭimān babhau | kṛṣībala iva kṣetraṁ suniṣpannaṁ samīkṣya ca

इस प्रकार यह सब कर लेने के बाद वह दैत्येन्द्र सन्तोष से उसी प्रकार शोभित हुआ, जैसे किसान अपने भलीभाँति पके खेत को देखकर प्रसन्न होता है।

श्लोक 18 (skanda.8.95.18)

कृतकृत्योऽहमित्येव बुद्धिं चक्रे स पार्थिवः । संयुज्य स्वसुतं ज्येष्ठं दारैः साधुरिवात्मवान्

kṛtakṛtyo'hamityeva buddhiṁ cakre sa pārthivaḥ | saṁyujya svasutaṁ jyeṣṭhaṁ dāraiḥ sādhurivātmavān

'मैं कृतकृत्य हो गया हूँ' ऐसा सोचकर उस राजा ने, अपने ज्येष्ठ पुत्र का विवाह करा कर, किसी साधु आत्मसंयमी पुरुष की भाँति सन्तोष का अनुभव किया।

श्लोक 19 (skanda.8.95.19)

अन्तरं न च तस्यान्यः कश्चित्प्राप्नोति सुव्रत । स्वसहायस्य विप्रस्य यथा दम्भेन वर्ततः

antaraṁ na ca tasyānyaḥ kaścitprāpnoti suvrata | svasahāyasya viprasya yathā dambhena vartataḥ

हे सुव्रत! जैसे अपने ही बल से युक्त, बिना छल के आचरण करने वाले ब्राह्मण में कोई दोष नहीं पा सकता, वैसे ही उसमें भी कोई अन्य दुर्बलता नहीं पाता था।

श्लोक 20 (skanda.8.95.20)

यजध्वं दानवास्सर्वे विप्रान्पूजयतेति च । देवञ्च शूलिनं सर्वे नमस्यत पुनः पुनः

yajadhvaṁ dānavāssarve viprānpūjayateti ca | devañca śūlinaṁ sarve namasyata punaḥ punaḥ

'हे दानवो! तुम सब यज्ञ करो और ब्राह्मणों का सम्मान करो; और शूलधारी देव (शिव) को बार-बार नमस्कार करो।'

श्लोक 21 (skanda.8.95.21)

धर्ममेव निषेवध्वमिति सोऽज्ञापयत्तदा । न तस्याधार्मिकः कश्चिद् दैत्यो वा दानवोऽपि वा

dharmameva niṣevadhvamiti so'jñāpayattadā | na tasyādhārmikaḥ kaścid daityo vā dānavo'pi vā

'तुम केवल धर्म का ही सेवन करो' - ऐसी आज्ञा उसने उस समय दी; और उसके राज्य में कोई भी दैत्य या दानव अधार्मिक न रहा।

श्लोक 22 (skanda.8.95.22)

न राज्येऽभवद् दुराचारस्तस्मिन् राज्यं प्रशासति । स्वयमेव स वायुश्च चन्द्रश्च सूर्य एव च

na rājye'bhavad durācārastasmin rājyaṁ praśāsati | svayameva sa vāyuśca candraśca sūrya eva ca

उस राज्य में, जब वह राज्य करता था, कोई दुराचार नहीं था; स्वयं वायु, चन्द्रमा और सूर्य भी -

श्लोक 23 (skanda.8.95.23)

अभवद् व्यास लोकेषु तपोबलसमन्वितः । ओषध्यः स्वयमुद्भूतास्तस्मिन् राजनि शासति

abhavad vyāsa lokeṣu tapobalasamanvitaḥ | oṣadhyaḥ svayamudbhūtāstasmin rājani śāsati

- हे व्यास! उन सब लोकों में तपोबल से सम्पन्न हो गए; और जब वह राजा शासन कर रहा था, तब औषधियाँ भी अपने आप उग आती थीं।

श्लोक 24 (skanda.8.95.24)

विना कृष्टिं संभवन्ति सर्वलोकस्य साधिकाः । स एव तास्समादाय क्षरं नयति दैत्यराट्

vinā kṛṣṭiṁ saṁbhavanti sarvalokasya sādhikāḥ | sa eva tāssamādāya kṣaraṁ nayati daityarāṭ

वे बिना जोते-बोए ही उत्पन्न होकर सम्पूर्ण जगत् के लिए पर्याप्त हो जाती थीं, और वह दैत्यराज स्वयं उन्हें एकत्र कर सबमें बाँट देता था।

श्लोक 25 (skanda.8.95.25)

स एवामर्दयच्चापि निनाय च पुनर्गृहान् । स एव दण्डिकोऽभूच्च दण्डश्चैव स एव हि

sa evāmardayaccāpi nināya ca punargṛhān | sa eva daṇḍiko'bhūcca daṇḍaścaiva sa eva hi

वही उन्हें एकत्र करता और घरों तक पहुँचाता; वही दण्ड देने वाला था और वही स्वयं दण्ड भी था।

श्लोक 26 (skanda.8.95.26)

स एव योगात् सर्वत्र चौराद् रक्षति नित्यदा । न तस्य व्याधितः कश्चिन्म्रियते वापि कश्चन

sa eva yogāt sarvatra caurād rakṣati nityadā | na tasya vyādhitaḥ kaścinmriyate vāpi kaścana

वही अपने योगबल से सर्वत्र सदा चोरों से रक्षा करता था; उसके राज्य में न कोई रोगी होता था, न कोई मरता था।

श्लोक 27 (skanda.8.95.27)

परदारप्रसक्तो वा पिशुनो वापि कर्हिचि तु । हिंसका न च तस्यासन्न चाप्यधार्मिकाः क्वचित्

paradāraprasakto vā piśuno vāpi karhici tu | hiṁsakā na ca tasyāsanna cāpyadhārmikāḥ kvacit

उसके राज्य में न कभी कोई परस्त्री में आसक्त होता था, न कोई चुगलखोर; न ही कोई हिंसक और न ही कहीं कोई अधार्मिक था।

श्लोक 28 (skanda.8.95.28)

पल्वलानि तडागानि सरित्प्रस्रवणानि च । विना वृष्ट्या भवन्त्येते सर्वत्रैव च सुस्थितम्

palvalāni taḍāgāni saritprasravaṇāni ca | vinā vṛṣṭyā bhavantyete sarvatraiva ca susthitam

तालाब, सरोवर, नदियाँ और झरने, बिना वर्षा के भी सर्वत्र भरे-पूरे और सुस्थिर बने रहते थे।

श्लोक 29 (skanda.8.95.29)

न सन्ति तस्य रक्षांसि न पिशाचाश्च हिंस्रिणः । ईतयश्च न सन्त्यस्य न द्वन्द्वानि च कानिचित्

na santi tasya rakṣāṁsi na piśācāśca hiṁsriṇaḥ | ītayaśca na santyasya na dvandvāni ca kānicit

उसके राज्य में न राक्षस थे, न हिंसक पिशाच; न फसल की आपदाएँ थीं, न सुख-दुःख जैसे द्वन्द्व।

श्लोक 30 (skanda.8.95.30)

न जुह्वते तदा वह्निं विप्रास्तस्मिँस्तु राजनि । नाधीयते यजन्ते वा एकवर्णमभूत्तदा

na juhvate tadā vahniṁ viprāstasmi~stu rājani | nādhīyate yajante vā ekavarṇamabhūttadā

फिर भी उस राजा के राज्य में ब्राह्मण अग्नि में हवन नहीं करते थे, न वेदाध्ययन करते थे, न यज्ञ करते थे - उस समय सब एक ही वर्ण के हो गए थे।

श्लोक 31 (skanda.8.95.31)

भृगवो येऽभवन् विप्रा दानवानां मुदावहाः । अधीयते यजन्ते च एवं तु व्यास सर्वशः

bhṛgavo ye'bhavan viprā dānavānāṁ mudāvahāḥ | adhīyate yajante ca evaṁ tu vyāsa sarvaśaḥ

केवल जो भृगुवंशी ब्राह्मण दानवों के लिए आनन्ददायक थे, वे ही वेदाध्ययन और यज्ञ करते थे - हे व्यास! सब प्रकार से यही स्थिति थी।

श्लोक 32 (skanda.8.95.32)

हृष्टपुष्टमभूत् सर्वं व्याधिदुःखविवर्जितम् । वर्णाश्रमपरित्यक्तं सर्वलोकसमं जगत्

hṛṣṭapuṣṭamabhūt sarvaṁ vyādhiduḥkhavivarjitam | varṇāśramaparityaktaṁ sarvalokasamaṁ jagat

सब कुछ हृष्ट-पुष्ट और रोग-दुःख से रहित हो गया; वर्णाश्रम-भेद को त्यागकर सारा जगत् सबके लिए समान हो गया।

श्लोक 33 (skanda.8.95.33)

तन्नृत्यगीतोत्सवनित्ययुक्तं सुखप्रसुप्तं रतिकार्ययुक्तम् । जगद् बभौ राजनि दैत्यदेवे हिरण्यनेत्रे दितिनन्दनेति

tannṛtyagītotsavanityayuktaṁ sukhaprasuptaṁ ratikāryayuktam | jagad babhau rājani daityadeve hiraṇyanetre ditinandaneti

उस समय वह जगत् नित्य नृत्य, गीत और उत्सवों में लीन, सुखपूर्वक निद्रामग्न और रतिकर्म में रत रहते हुए, दिति-नन्दन दैत्यदेव हिरण्याक्ष के शासन में शोभायमान हुआ।

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