अम्बिका खण्ड · अध्याय 94
हिरण्याक्ष-दिग्विजय में यमलोकाभिगमन
श्लोक 1 (skanda.8.94.1)
सनत्कुमार उवाच । तमापतन्तं वेगेन गरुत्मन्तमिवाहवे । दृष्ट्वा वरुणपुत्रास्ते पित्रा सह विदुद्रुवुः
sanatkumāra uvāca | tamāpatantaṁ vegena garutmantamivāhave | dṛṣṭvā varuṇaputrāste pitrā saha vidudruvuḥ
सनत्कुमार ने कहा - युद्ध में गरुड़ के समान वेग से आक्रमण करते हुए उस हिरण्याक्ष को देखकर, वरुण-पुत्र अपने पिता सहित भाग खड़े हुए।
श्लोक 2 (skanda.8.94.2)
दैत्याश्चापि हि ते सर्वे प्राप्य तद्वरुणालयम् । व्यूढस्कन्धा व्यतिष्ठन्त व्यसृजंस्तत्पुरं प्रति
daityāścāpi hi te sarve prāpya tadvaruṇālayam | vyūḍhaskandhā vyatiṣṭhanta vyasṛjaṁstatpuraṁ prati
और वे सभी दैत्य भी उस वरुणालय में पहुँचकर, कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए और उस नगर की ओर आक्रमण करने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.94.3)
दूतं वातापिनं चैव राज्ञा प्रेषितमूर्जितम् । स गत्वा तां पुरीं रम्यां प्रविश्य च महासुरः
dūtaṁ vātāpinaṁ caiva rājñā preṣitamūrjitam | sa gatvā tāṁ purīṁ ramyāṁ praviśya ca mahāsuraḥ
राजा द्वारा भेजे गए बलशाली दूत वातापि ने वहाँ जाकर, उस सुन्दर नगरी में प्रवेश कर -
श्लोक 4 (skanda.8.94.4)
पौरैः सुपूजितो व्यास प्राहेदं तान् सुगर्वितः । राजा सर्वस्य लोकस्य दैत्यदानवनन्दनः
pauraiḥ supūjito vyāsa prāhedaṁ tān sugarvitaḥ | rājā sarvasya lokasya daityadānavanandanaḥ
- हे व्यास! नगरवासियों द्वारा सम्मानित होकर, अत्यन्त गर्व से उनसे यह कहा - 'समस्त लोक का राजा, दैत्य-दानवों को आनन्दित करने वाला -'
श्लोक 5 (skanda.8.94.5)
कश्यपस्य सुतः श्रीमान् हिरण्याक्षः प्रतापवान् । जित्वा सर्वान् सुरान् संख्ये आज्ञापयति वस्सदा
kaśyapasya sutaḥ śrīmān hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | jitvā sarvān surān saṁkhye ājñāpayati vassadā
- कश्यप का पुत्र, श्रीमान्, प्रतापी हिरण्याक्ष, युद्ध में समस्त देवताओं को जीतकर सदा तुम्हें यह आज्ञा देता है -
श्लोक 6 (skanda.8.94.6)
यूयं शृणुत सर्वे मे आज्ञां कुरुत चैव हि । आनयध्वं च रत्नानि परित्यजत देवताः
yūyaṁ śṛṇuta sarve me ājñāṁ kuruta caiva hi | ānayadhvaṁ ca ratnāni parityajata devatāḥ
'तुम सब मेरी बात सुनो और मेरी आज्ञा का पालन करो; अपने रत्न ले आओ और अपने देवताओं को त्याग दो।'
श्लोक 7 (skanda.8.94.7)
देवपक्षोऽत्र यः कश्चित् पुरे प्रतिवसत्युत । अभयं तस्य यच्छामि यातु देवानभीतवत्
devapakṣo'tra yaḥ kaścit pure prativasatyuta | abhayaṁ tasya yacchāmi yātu devānabhītavat
'यहाँ इस नगर में देवपक्ष का जो भी कोई निवास करता हो, मैं उसे अभय देता हूँ; वह निर्भय होकर देवताओं के पास चला जाए।'
श्लोक 8 (skanda.8.94.8)
नारदाद्याश्च ऋषयस्तं समासाद्य दैत्यकम् । ऊचुस्तमसुरं व्यास सान्त्वयुक्तमिदं तदा
nāradādyāśca ṛṣayastaṁ samāsādya daityakam | ūcustamasuraṁ vyāsa sāntvayuktamidaṁ tadā
हे व्यास! तब नारद आदि ऋषियों ने उस दैत्य (हिरण्याक्ष) के समीप जाकर उस असुर से यह सान्त्वनापूर्ण वचन कहा -
श्लोक 9 (skanda.8.94.9)
राजा भोजो विराट् सम्राट् भूपतिः क्षत्रियो नृपः । य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तन्नार्च्चयते बुधः
rājā bhojo virāṭ samrāṭ bhūpatiḥ kṣatriyo nṛpaḥ | ya ebhiḥ stūyate śabdaiḥ kastannārccayate budhaḥ
'जो 'राजा', 'भोज', 'विराट्', 'सम्राट्', 'भूपति', 'क्षत्रिय', 'नृप' - इन शब्दों से स्तुति किया जाता है, ऐसा कौन बुद्धिमान् है जो उसकी अर्चा न करे?'
श्लोक 10 (skanda.8.94.10)
स त्वं राजा च भोजश्च विराट् सम्राट् तथैव च । भूपतिः क्षत्रियश्चैव नृपः सर्वसहस्तथा
sa tvaṁ rājā ca bhojaśca virāṭ samrāṭ tathaiva ca | bhūpatiḥ kṣatriyaścaiva nṛpaḥ sarvasahastathā
'वही तुम राजा हो, भोज हो, विराट् और सम्राट् भी हो, भूपति और क्षत्रिय हो, और सब कुछ सहने वाले नृप भी हो।'
श्लोक 11 (skanda.8.94.11)
निर्जिताः सुमहावीर्यास्त्वया देवाः सवासवाः । कस्त्वया सदृशो लोके बाह्यैकं रुद्रमीश्वरम्
nirjitāḥ sumahāvīryāstvayā devāḥ savāsavāḥ | kastvayā sadṛśo loke bāhyaikaṁ rudramīśvaram
'तुमने अत्यन्त पराक्रमी देवताओं को इन्द्र सहित जीत लिया; एकमात्र ईश्वर रुद्र को छोड़कर संसार में तुम्हारे समान कौन है?'
श्लोक 12 (skanda.8.94.12)
त्वं पाता सर्वलोकानां हर्त्ता स्रष्टा तथैव च । कस्तवाज्ञां महाराज प्रतिहन्याद् दुरात्मवान्
tvaṁ pātā sarvalokānāṁ harttā sraṣṭā tathaiva ca | kastavājñāṁ mahārāja pratihanyād durātmavān
'तुम ही समस्त लोकों के पालक हो, संहारक और सृष्टिकर्ता भी हो; हे महाराज! ऐसा कौन दुष्ट-हृदय तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है?'
श्लोक 13 (skanda.8.94.13)
वयं च सर्वे दैत्येन्द्र वरमिच्छाम दानव । वरदस्त्वं हि भूतानामस्माकं वरदो भव
vayaṁ ca sarve daityendra varamicchāma dānava | varadastvaṁ hi bhūtānāmasmākaṁ varado bhava
'हे दैत्येन्द्र! हे दानव! हम सब एक वर चाहते हैं; तुम समस्त प्राणियों को वर देने वाले हो, अतः हमें भी वर दो।'
श्लोक 14 (skanda.8.94.14)
सनत्कुमार उवाच । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा वरदोस्मीति सोऽब्रवीत् । ऊचुस्ते दैत्यराजानं तदा वचनकोविदाः
sanatkumāra uvāca | teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā varadosmīti so'bravīt | ūcuste daityarājānaṁ tadā vacanakovidāḥ
सनत्कुमार ने कहा - उनके इस वचन को सुनकर उसने कहा - 'मैं वर देने वाला हूँ।' तब वाणी में निपुण उन ऋषियों ने दैत्यराज से यह कहा -
श्लोक 15 (skanda.8.94.15)
ऋषय ऊचुः । यदेतदुक्तं भवता नरकव्याधिमृत्युषु । न तथा तद् भवेद् दैत्य एष नो दीयतां वरः
ṛṣaya ūcuḥ | yadetaduktaṁ bhavatā narakavyādhimṛtyuṣu | na tathā tad bhaved daitya eṣa no dīyatāṁ varaḥ
ऋषियों ने कहा - नरक, रोग और मृत्यु के विषय में तुमने जो यह कहा है, हे दैत्य! वह वैसा न हो - यही वर हमें दिया जाए।
श्लोक 16 (skanda.8.94.16)
दैत्य उवाच । मम प्रतिज्ञा विप्रेन्द्राः पूर्वमेव तपोधनाः । लोकानां सुखमेधेयं राजा लोकस्य यद्यहम्
daitya uvāca | mama pratijñā viprendrāḥ pūrvameva tapodhanāḥ | lokānāṁ sukhamedheyaṁ rājā lokasya yadyaham
दैत्य ने कहा - हे विप्रेन्द्रो! हे तपोधनो! मेरी प्रतिज्ञा पहले से ही यह है कि यदि मैं लोक का राजा हूँ, तो लोकों का सुख बढ़े।
श्लोक 17 (skanda.8.94.17)
न तथा तत् करिष्यामि यद्यहं मुनिसत्तमाः । मिथ्याप्रतिज्ञः स्यां चाहमसत्यश्च दुरात्मवान्
na tathā tat kariṣyāmi yadyahaṁ munisattamāḥ | mithyāpratijñaḥ syāṁ cāhamasatyaśca durātmavān
'हे मुनिश्रेष्ठो! मैं वैसा नहीं करूँगा, अन्यथा मैं मिथ्या-प्रतिज्ञ, असत्यवादी और दुष्ट-हृदय कहलाऊँगा।'
श्लोक 18 (skanda.8.94.18)
तस्मादन्यद् भवन्तो मां वर याचन्तु सुप्रियम् । कर्तास्मि तं तथा सर्वं याचेऽहं शिरसा ह वः
tasmādanyad bhavanto māṁ vara yācantu supriyam | kartāsmi taṁ tathā sarvaṁ yāce'haṁ śirasā ha vaḥ
'अतः आप लोग मुझसे कोई और प्रिय वर माँगिए; मैं उसे पूर्णतः पूर्ण करूँगा - मैं सिर झुकाकर आप सबसे यह प्रार्थना करता हूँ।'
श्लोक 19 (skanda.8.94.19)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते । हिरण्याक्षमिदं व्यास पुनरेवाब्रुवन् विभुम्
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā ṛṣayaḥ sarva eva te | hiraṇyākṣamidaṁ vyāsa punarevābruvan vibhum
सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर वे समस्त ऋषि, हे व्यास! प्रभु हिरण्याक्ष से पुनः यह कहने लगे -
श्लोक 20 (skanda.8.94.20)
ऋषय ऊचुः । लोकधर्मप्रवृत्त्यर्थं ब्रह्मणा दैत्यपुंगव । कृतमेतत् पुरा सर्वं धर्मश्चापि प्रवर्तितः
ṛṣaya ūcuḥ | lokadharmapravṛttyarthaṁ brahmaṇā daityapuṁgava | kṛtametat purā sarvaṁ dharmaścāpi pravartitaḥ
ऋषियों ने कहा - हे दैत्यों में श्रेष्ठ! लोक-धर्म की प्रवृत्ति के लिए ब्रह्मा ने पहले यह सब कुछ किया था, और धर्म को भी प्रवर्तित किया था।
श्लोक 21 (skanda.8.94.21)
समीक्ष्य चैतल्लोकस्य धर्मश्चापि प्रवर्त्तितः । नाभूतस्तद् भवेद् दैत्य इति नो वरदो भव
samīkṣya caitallokasya dharmaścāpi pravarttitaḥ | nābhūtastad bhaved daitya iti no varado bhava
'लोक के हित का विचार करके ही धर्म को प्रवर्तित किया गया था; हे दैत्य! जो कभी नहीं हुआ, वह अब न हो - इसी वर के दाता तुम बनो।'
श्लोक 22 (skanda.8.94.22)
प्रतिज्ञा प्रभवेत् सा यल्लोकानां दुःखवर्जनम् । तच्च तस्मान्न नश्येत ब्रह्मणः कृतिरव्यया
pratijñā prabhavet sā yallokānāṁ duḥkhavarjanam | tacca tasmānna naśyeta brahmaṇaḥ kṛtiravyayā
'वही प्रतिज्ञा फलवती हो जो लोकों को दुःख से मुक्त करे; और उस कारण ब्रह्मा का वह अविनाशी कर्म नष्ट न हो।'
श्लोक 23 (skanda.8.94.23)
यावत्त्वं दैत्य लोकस्य राजा ह्यसि प्रभुश्च ह । एवं त्वयानृणत्वं च ब्रह्मणोऽद्य कृतं भवेत्
yāvattvaṁ daitya lokasya rājā hyasi prabhuśca ha | evaṁ tvayānṛṇatvaṁ ca brahmaṇo'dya kṛtaṁ bhavet
'हे दैत्य! जब तक तुम लोक के राजा और स्वामी हो, तब तक ऐसा करने से आज ब्रह्मा के प्रति तुम्हारा ऋण चुकाया हुआ माना जाएगा।'
श्लोक 24 (skanda.8.94.24)
तेषां स वचनं श्रुत्वा ऋषीन् निश्चित्य दैत्यराट् । ये द्रोहाः शक्रपक्षाश्च ममाज्ञाभङ्गकारिणः
teṣāṁ sa vacanaṁ śrutvā ṛṣīn niścitya daityarāṭ | ye drohāḥ śakrapakṣāśca mamājñābhaṅgakāriṇaḥ
उनके इस वचन को सुनकर, ऋषियों के प्रति निश्चय कर, दैत्यराज ने कहा - 'जो द्रोही हैं, शक्र के पक्ष के हैं और मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाले हैं -'
श्लोक 25 (skanda.8.94.25)
तेषामेव भवेन्मृत्युर्नरकेषु च यातनाः । एतदाह तदा राजा ते चाप्यूचुर्नराधिपम्
teṣāmeva bhavenmṛtyurnarakeṣu ca yātanāḥ | etadāha tadā rājā te cāpyūcurnarādhipam
'- उन्हीं के लिए मृत्यु और नरकों में यातनाएँ होंगी।' राजा ने उस समय ऐसा कहा, और उन्होंने भी उस नराधिप से यह कहा -
श्लोक 26 (skanda.8.94.26)
एवमस्त्विति तांश्चोक्त्वा यातनामोक्षमादिशत् । स मुक्त्वा नारकान् सर्वान् ददौ स्थानस्य रक्षणम्
evamastviti tāṁścoktvā yātanāmokṣamādiśat | sa muktvā nārakān sarvān dadau sthānasya rakṣaṇam
- 'ऐसा ही हो' यह कहकर उसने यातना से मुक्ति का आदेश दे दिया। सम्पूर्ण नारकियों को मुक्त कर उसने [उस पद की] रक्षा का भार सौंपा -
श्लोक 27 (skanda.8.94.27)
पितृराजानमनघ विप्रचित्तिं महाबलम् । ततोवघुष्य स जयं पूजयित्वा तु तान्द्विजान् । जगाम धनदावासं हिरण्याक्षो महाबलः
pitṛrājānamanagha vipracittiṁ mahābalam | tatovaghuṣya sa jayaṁ pūjayitvā tu tāndvijān | jagāma dhanadāvāsaṁ hiraṇyākṣo mahābalaḥ
- हे निष्पाप व्यास! महाबली विप्रचित्ति को पितृराज (यम-पद का स्वामी) बनाकर। फिर अपनी विजय की घोषणा कर और उन ब्राह्मणों का सम्मान कर, महाबली हिरण्याक्ष कुबेर के धाम की ओर चल पड़ा।
श्लोक 28 (skanda.8.94.28)
ते तां धनेशस्य पुरीं महाबला विनादयन्तोंन्धकपालितास्तदा । हिरण्यनेत्रं परिवार्य दानवास्तदाभिजग्मुर्जलदा इवाचलम्
te tāṁ dhaneśasya purīṁ mahābalā vinādayantoṁndhakapālitāstadā | hiraṇyanetraṁ parivārya dānavāstadābhijagmurjaladā ivācalam
उस समय अन्धक द्वारा रक्षित वे महाबली दानव, कुबेर की उस नगरी को गुँजाते हुए, हिरण्याक्ष को चारों ओर से घेरकर उसी प्रकार साथ चले जैसे मेघ किसी पर्वत को घेर लेते हैं।