अम्बिका खण्ड · अध्याय 93
वरुणालय-गमन
श्लोक 1 (skanda.8.93.1)
सनत्कुमार उवाच । अथासौ तेन कालेन केतुरग्नेः समुत्थितः । वायुनाभिहतश्चैव अगच्छद् विलयं भृशम्
sanatkumāra uvāca | athāsau tena kālena keturagneḥ samutthitaḥ | vāyunābhihataścaiva agacchad vilayaṁ bhṛśam
सनत्कुमार ने कहा - तत्पश्चात् उस समय अग्नि से उठा हुआ वह धूम्र-ध्वज वायु से आहत होकर सर्वथा विलीन हो गया।
श्लोक 2 (skanda.8.93.2)
ततः समभवद् व्योम विमलं सर्वमेव हि । अपश्यन्त सुरास्सर्वे दैत्याश्चैव परस्परम्
tataḥ samabhavad vyoma vimalaṁ sarvameva hi | apaśyanta surāssarve daityāścaiva parasparam
तब सम्पूर्ण आकाश पूर्णतः निर्मल हो गया, और समस्त देवता तथा दैत्य एक-दूसरे को फिर से देखने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.93.3)
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पटहाडम्बरास्तथा । सुघोषका डिण्डिमाश्च भग्ना भेर्यश्च सर्वशः
tataḥ śaṁkhāśca bheryaśca paṭahāḍambarāstathā | sughoṣakā ḍiṇḍimāśca bhagnā bheryaśca sarvaśaḥ
तब शंख, भेरियाँ, पटह और आडम्बर, तथा मधुर घोष वाले डिण्डिम बज उठे, और सब ओर भेरियाँ भी टूटती रहीं।
श्लोक 4 (skanda.8.93.4)
बलद्वयेप्यवाद्यन्त शतशोथ सहस्रशः । अथ शक्रश्च देवेन्द्रो यमो वैश्रवणस्तथा
baladvayepyavādyanta śataśotha sahasraśaḥ | atha śakraśca devendro yamo vaiśravaṇastathā
दोनों सेनाओं में वे सैकड़ों और हजारों की संख्या में बज उठे। तब देवेन्द्र शक्र, यम और वैश्रवण (कुबेर) -
श्लोक 5 (skanda.8.93.5)
पूषा भगश्च द्वावेतौ अर्यमा मित्र एव च । जयन्तो मरुतश्चैव रुद्रादित्याश्च सर्वशः
pūṣā bhagaśca dvāvetau aryamā mitra eva ca | jayanto marutaścaiva rudrādityāśca sarvaśaḥ
- पूषा और भग ये दोनों, अर्यमा और मित्र, जयन्त, मरुद्गण, तथा समस्त रुद्र और आदित्य -
श्लोक 6 (skanda.8.93.6)
वेगेन सुमहावेगा ममृदुर्दानवं बलम् । तत्र चामीकराभासं प्रगृह्य बलवद्धनुः
vegena sumahāvegā mamṛdurdānavaṁ balam | tatra cāmīkarābhāsaṁ pragṛhya balavaddhanuḥ
- अत्यन्त वेगशाली होकर वेगपूर्वक दानव-सेना को कुचलने लगे; और वहाँ स्वर्ण के समान चमकता हुआ बलशाली धनुष उठाकर -
श्लोक 7 (skanda.8.93.7)
यमो दण्डेन दैत्येन्द्राननयद्यमसादनम् । स पञ्चभिः शरैर्विद्ध्वा हिरण्याक्षं महाबलम्
yamo daṇḍena daityendrānanayadyamasādanam | sa pañcabhiḥ śarairviddhvā hiraṇyākṣaṁ mahābalam
- यम ने अपने दण्ड से दैत्येन्द्रों को अपने ही धाम भेज दिया। उसने पाँच बाणों से महाबली हिरण्याक्ष को बींधकर -
श्लोक 8 (skanda.8.93.8)
अश्वाँश्चैकैकशः सर्वान् जहास च ननाद च । तस्य सर्वे तदायस्ता दैत्यदानवसत्तमाः
aśvā~ścaikaikaśaḥ sarvān jahāsa ca nanāda ca | tasya sarve tadāyastā daityadānavasattamāḥ
- उसके सभी घोड़ों को एक-एक करके मार गिराया, और हँसा तथा गरजा। तब उसके लिए प्रयत्नशील हुए सभी श्रेष्ठ दैत्य-दानव -
श्लोक 9 (skanda.8.93.9)
शरानाशीविषाकारान् व्यसृजन् विकृताशनान् । तान् स चिच्छेद समरे त्रिधैकैकं लघुक्रियः
śarānāśīviṣākārān vyasṛjan vikṛtāśanān | tān sa ciccheda samare tridhaikaikaṁ laghukriyaḥ
- सर्प के समान भयंकर विकृत-भोजी बाण चलाने लगे; परन्तु उस फुर्तीले यम ने युद्ध में उन सबको एक-एक कर तीन-तीन टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 10 (skanda.8.93.10)
पुनश्च विशिखैर्घोरैरर्दयत् प्रहसन्निव । ततोन्धकस्य यन्तारं रथञ्च सहवाजिभिः
punaśca viśikhairghorairardayat prahasanniva | tatondhakasya yantāraṁ rathañca sahavājibhiḥ
और मानो हँसते हुए फिर उसने उन्हें भयंकर बाणों से पीड़ित किया; फिर अन्धक के सारथि को, तथा उसके रथ को घोड़ों सहित -
श्लोक 11 (skanda.8.93.11)
किंकरेण महावीर्यो यमो निन्ये स्वकं पुरम् । ततोन्धको गदापाणिर्युगान्ताम्बुदवन्नदन्
kiṁkareṇa mahāvīryo yamo ninye svakaṁ puram | tatondhako gadāpāṇiryugāntāmbudavannadan
- महापराक्रमी यम ने अपने किंकर द्वारा अपने ही नगर भेज दिया। तब गदाधारी अन्धक, प्रलयकालीन मेघ के समान गरजते हुए -
श्लोक 12 (skanda.8.93.12)
अभ्यधावद्यमं तूर्णमतिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । तस्य वज्रेण देवेन्द्रो गदां हेमपरिष्कृताम्
abhyadhāvadyamaṁ tūrṇamatiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | tasya vajreṇa devendro gadāṁ hemapariṣkṛtām
- तुरन्त यम की ओर दौड़ा और बोला - 'ठहरो, ठहरो!' तब देवेन्द्र (इन्द्र) ने अपने वज्र से उसकी सोने से जड़ी गदा को -
श्लोक 13 (skanda.8.93.13)
बिभेद शतधा व्यास सापतद् भुव्यवस्थिता । तं विशस्त्रं विकवचं कृत्वा ते देवसत्तमाः
bibheda śatadhā vyāsa sāpatad bhuvyavasthitā | taṁ viśastraṁ vikavacaṁ kṛtvā te devasattamāḥ
- हे व्यास! सौ टुकड़ों में तोड़ डाला, और वह भूमि पर जा गिरी। इस प्रकार उसे शस्त्र और कवच से रहित कर, उन श्रेष्ठ देवताओं ने -
श्लोक 14 (skanda.8.93.14)
युगपच्छस्त्रवर्षेण ताडयामासुराहवे । यमो दण्डेन तं मूर्ध्नि शक्रो वज्रेण चाहनत्
yugapacchastravarṣeṇa tāḍayāmāsurāhave | yamo daṇḍena taṁ mūrdhni śakro vajreṇa cāhanat
- उस युद्ध में एक साथ शस्त्रों की वर्षा से उसे पीड़ित करने लगे। यम ने अपने दण्ड से और शक्र ने वज्र से उसके सिर पर प्रहार किया,
श्लोक 15 (skanda.8.93.15)
वित्तेशोऽशनिना चैव पाशेन वरुणस्तथा । अन्ये चान्यैस्तथा देवा ह्यमोघैरायुधोत्तमैः
vitteśo'śaninā caiva pāśena varuṇastathā | anye cānyaistathā devā hyamoghairāyudhottamaiḥ
कुबेर ने अशनि (वज्रास्त्र) से और वरुण ने पाश से, तथा अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने अमोघ श्रेष्ठ आयुधों से (उसे प्रहार किया)।
श्लोक 16 (skanda.8.93.16)
अभ्यधावन्नसंरब्धा हतस्त्वमिति वादिनः । न चैव तस्य दैत्यस्य दुःखं तत्राभवत्तदा
abhyadhāvannasaṁrabdhā hatastvamiti vādinaḥ | na caiva tasya daityasya duḥkhaṁ tatrābhavattadā
वे सब निर्भय होकर 'तू मारा गया' यह कहते हुए उस पर टूट पड़े; फिर भी उस दैत्य को उस समय तनिक भी कष्ट नहीं हुआ।
श्लोक 17 (skanda.8.93.17)
सोपि दैत्यस्ततोत्पत्य पुण्डस्यास्थाय पृष्ठतः । यमं मुष्टिप्रहारेण पुण्डाद् भूमावपातयत्
sopi daityastatotpatya puṇḍasyāsthāya pṛṣṭhataḥ | yamaṁ muṣṭiprahāreṇa puṇḍād bhūmāvapātayat
वह दैत्य भी वहाँ से उछलकर (यम के गजराज) पुण्ड की पीठ पर चढ़ गया, और मुष्टि-प्रहार से यम को पुण्ड की पीठ से भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 18 (skanda.8.93.18)
तथेन्द्रस्य गजं भूयो पुच्छे संगृह्य वेगवान् । भ्रामयित्वाक्षिपद् दूरे नष्टस्त्वमिति चाब्रवीत्
tathendrasya gajaṁ bhūyo pucche saṁgṛhya vegavān | bhrāmayitvākṣipad dūre naṣṭastvamiti cābravīt
फिर वेगवान् अन्धक ने इन्द्र के हाथी को भी पूँछ से पकड़कर घुमाया और दूर फेंक दिया, और कहा - 'अब तू नष्ट हो गया!'
श्लोक 19 (skanda.8.93.19)
ततो धनेशस्य पुनः शिविकां कामगामिनीम् । आक्षिप्य बहुधा दैत्यो व्यधमत् क्रोधमूर्छितः
tato dhaneśasya punaḥ śivikāṁ kāmagāminīm | ākṣipya bahudhā daityo vyadhamat krodhamūrchitaḥ
फिर उस दैत्य ने क्रोध से अचेत होकर कुबेर की इच्छानुसार चलने वाली शिविका को भी छीनकर टुकड़े-टुकड़े कर डाला।
श्लोक 20 (skanda.8.93.20)
ततो गजैर्गजान् निघ्नत् पदातीँश्च पदातिभिः । रथं रथेन च रणे हयाँश्च हयसादिभिः
tato gajairgajān nighnat padātī~śca padātibhiḥ | rathaṁ rathena ca raṇe hayā~śca hayasādibhiḥ
फिर उस युद्ध में हाथियों से हाथी, पैदलों से पैदल, रथ से रथ, और घोड़ों से घुड़सवार परस्पर मारने लगे।
श्लोक 21 (skanda.8.93.21)
पुनर्गजे महेन्द्रस्य हन्यमानोपि संयुगे । समुत्प्लुत्य तदा शक्रं गजस्कन्धान्न्यपातयत्
punargaje mahendrasya hanyamānopi saṁyuge | samutplutya tadā śakraṁ gajaskandhānnyapātayat
उस संग्राम में महेन्द्र के हाथी पर बार-बार प्रहार सहते हुए भी उसने उछलकर शक्र को गजराज के कंधे से नीचे गिरा दिया।
श्लोक 22 (skanda.8.93.22)
तस्य तत् कर्म संवीक्ष्य दानवेन्द्रस्य संयुगे । सर्वे देवा दिशः सर्वाः प्रनष्टा जीवितार्थिनः
tasya tat karma saṁvīkṣya dānavendrasya saṁyuge | sarve devā diśaḥ sarvāḥ pranaṣṭā jīvitārthinaḥ
उस दानवेन्द्र के इस पराक्रम को युद्ध में देखकर, अपने प्राणों की रक्षा चाहते हुए समस्त देवता सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 23 (skanda.8.93.23)
पूर्वेण भगवानिन्द्रः सहादित्यः सलोकपः । दक्षिणेन तथा रुद्रा वसवश्चाश्विनावपि
pūrveṇa bhagavānindraḥ sahādityaḥ salokapaḥ | dakṣiṇena tathā rudrā vasavaścāśvināvapi
पूर्व दिशा की ओर भगवान् इन्द्र आदित्यों और लोकपालों सहित भागे; दक्षिण दिशा की ओर रुद्रगण, वसुगण तथा दोनों अश्विनीकुमार भी भागे;
श्लोक 24 (skanda.8.93.24)
प्रतीचीं यक्षरक्षांसि पिशाचाः पन्नगैः सह । उत्तरेण तथान्ये च प्रपद्यन्त यथा मृगाः
pratīcīṁ yakṣarakṣāṁsi piśācāḥ pannagaiḥ saha | uttareṇa tathānye ca prapadyanta yathā mṛgāḥ
पश्चिम की ओर यक्ष, राक्षस और पिशाच सर्पों सहित भागे, और उत्तर की ओर शेष सब मृगों के समान भागने लगे।
श्लोक 25 (skanda.8.93.25)
तेषु भग्नेषु दैत्येन्द्राः पृष्ठतो विकृतायुधाः । अभ्यधावन्त गर्जन्तो भयं तेषां व्यदर्शयन्
teṣu bhagneṣu daityendrāḥ pṛṣṭhato vikṛtāyudhāḥ | abhyadhāvanta garjanto bhayaṁ teṣāṁ vyadarśayan
उनके इस प्रकार भाग जाने पर, विकराल आयुधों वाले दैत्येन्द्र गरजते हुए उनके पीछे दौड़े और उन्हें भयभीत करने लगे।
श्लोक 26 (skanda.8.93.26)
ततो मुहूर्त्तं ते गत्वा हिरण्याक्षेण वारिताः । निवृत्ताः समतिष्ठन्त सर्वेऽमर्षवशं गताः
tato muhūrttaṁ te gatvā hiraṇyākṣeṇa vāritāḥ | nivṛttāḥ samatiṣṭhanta sarve'marṣavaśaṁ gatāḥ
फिर वे कुछ ही देर पीछा करके, हिरण्याक्ष द्वारा रोके जाने पर, लौट आए और सब क्रोध के वश में स्थिर होकर खड़े हो गए।
श्लोक 27 (skanda.8.93.27)
अथोवाच ततः क्रुद्धान् हिरण्याक्षो हसन्निव । दैत्यदानवनाथाँस्तानिदं वचनकोविदः
athovāca tataḥ kruddhān hiraṇyākṣo hasanniva | daityadānavanāthā~stānidaṁ vacanakovidaḥ
तब वाणी में निपुण हिरण्याक्ष ने मानो हँसते हुए उन क्रुद्ध दैत्य-दानव स्वामियों से यह कहा -
श्लोक 28 (skanda.8.93.28)
किमेभिरबलैरद्य युष्माकं दैत्यदानवाः । अवबद्धैश्च रुद्धैश्च मृतसंज्ञैर्दुरात्मभिः
kimebhirabalairadya yuṣmākaṁ daityadānavāḥ | avabaddhaiśca ruddhaiśca mṛtasaṁjñairdurātmabhiḥ
'हे दैत्य-दानवो! इन शक्तिहीन, बँधे हुए, रोके हुए और मृततुल्य दुरात्माओं से आज तुम्हें क्या लेना-देना है?'
श्लोक 29 (skanda.8.93.29)
हतास्ते नात्र सन्देहो येषां राज्यमिदं धृतम् । नैषां जीवितमद्यास्ति मा त्वरध्वं सुबालिशाः
hatāste nātra sandeho yeṣāṁ rājyamidaṁ dhṛtam | naiṣāṁ jīvitamadyāsti mā tvaradhvaṁ subāliśāḥ
'जिनका यह राज्य हमने ले लिया है, वे मारे ही गए, इसमें कोई सन्देह नहीं; इनका जीवन अब शेष नहीं है। हे भोले! व्यर्थ शीघ्रता मत करो।'
श्लोक 30 (skanda.8.93.30)
अबलानपि संरब्धान्निराशान् जीवितैषिणः । अवद्ध्येति बलाच्चैव दुर्जयाश्च न संशयः
abalānapi saṁrabdhānnirāśān jīvitaiṣiṇaḥ | avaddhyeti balāccaiva durjayāśca na saṁśayaḥ
'शक्तिहीन होते हुए भी जो क्रोधित, निराश परन्तु फिर भी जीने की इच्छा रखने वाले होते हैं, उन्हें बलपूर्वक मारना उचित नहीं - निःसन्देह वे [उस अवस्था में] दुर्जेय हो जाते हैं।'
श्लोक 31 (skanda.8.93.31)
यदेतद्राज्यमित्याहुः प्राणा ह्येते महात्मनाम् । स तेषां हरति प्राणान् यस्तेषां राज्यमाहरेत्
yadetadrājyamityāhuḥ prāṇā hyete mahātmanām | sa teṣāṁ harati prāṇān yasteṣāṁ rājyamāharet
'जिसे यह राज्य कहते हैं, वह महात्माओं के प्राण ही है; जो उनके राज्य को छीन लेता है, वही मानो उनके प्राणों को हर लेता है।'
श्लोक 32 (skanda.8.93.32)
आपूरयाम स्थानानि देवानां दानवेश्वराः
āpūrayāma sthānāni devānāṁ dānaveśvarāḥ
'हे दानवेश्वरो! आओ, हम देवताओं के स्थानों को भर दें (अधिकृत कर लें)' - (इस श्लोक के आरम्भ का कुछ अंश मूल में अप्राप्त है)।
श्लोक 33 (skanda.8.93.33)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते सहिरण्याक्षाः प्राविशन्नमरावतीम् । रत्नानि जगृहुर्व्यास विजयं चावघोषयन्
sanatkumāra uvāca | tataste sahiraṇyākṣāḥ prāviśannamarāvatīm | ratnāni jagṛhurvyāsa vijayaṁ cāvaghoṣayan
सनत्कुमार ने कहा - तब हिरण्याक्ष के साथ वे सब अमरावती में प्रविष्ट हुए; हे व्यास! उन्होंने रत्नों को ले लिया और अपनी विजय की घोषणा की।
श्लोक 34 (skanda.8.93.34)
आरक्षमामनुस्तत्र चक्षुराप्तैश्च तेऽसुराः । आश्वासयन्त पौरांश्च तथा प्रकृतयश्च ह
ārakṣamāmanustatra cakṣurāptaiśca te'surāḥ | āśvāsayanta paurāṁśca tathā prakṛtayaśca ha
वहाँ उन असुरों ने अपने विश्वस्त पुरुषों द्वारा चौकसी बिठाई और नगरवासियों तथा प्रजाजनों को आश्वस्त किया।
श्लोक 35 (skanda.8.93.35)
तथार्घेण तथैवोपायनैर्वरैः । आशीर्भिश्चासुरश्रेष्ठं हिरण्याक्षं प्रणेमिरे
tathārgheṇa tathaivopāyanairvaraiḥ | āśīrbhiścāsuraśreṣṭhaṁ hiraṇyākṣaṁ praṇemire
और अर्घ्य से, तथा उत्तम उपहारों और आशीर्वचनों से उन्होंने असुरश्रेष्ठ हिरण्याक्ष को प्रणाम किया - (इस श्लोक के आरम्भ का कुछ अंश मूल में अप्राप्त है)।
श्लोक 36 (skanda.8.93.36)
तान् समाश्वास्य दैत्येन्द्रो ह्यध्यस्य च वरासनम् । कार्याणि कृत्वा सर्वेषामगच्छद् वरुणालयम्
tān samāśvāsya daityendro hyadhyasya ca varāsanam | kāryāṇi kṛtvā sarveṣāmagacchad varuṇālayam
उन्हें आश्वस्त कर तथा श्रेष्ठ आसन पर बैठकर, सबके कार्यों का निपटारा कर, दैत्येन्द्र हिरण्याक्ष वरुण के धाम को चल पड़ा।
श्लोक 37 (skanda.8.93.37)
ते सिंहनादैर्विविधैश्च वाद्यैः प्रवल्गनास्फोटितकूजितैश्च । महासुरा दानवराजसिंहं जग्मुस्समन्तात् परिवार्य सर्वे
te siṁhanādairvividhaiśca vādyaiḥ pravalganāsphoṭitakūjitaiśca | mahāsurā dānavarājasiṁhaṁ jagmussamantāt parivārya sarve
सिंहनाद करते हुए, नाना प्रकार के वाद्य बजाते हुए, उछलते-कूदते, तालियाँ बजाते और गर्जना करते हुए वे सभी महासुर उस दानवराज-सिंह हिरण्याक्ष को चारों ओर से घेरकर साथ चले।