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अम्बिका खण्ड · अध्याय 92

अन्धकार में युद्ध

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

श्लोक 1 (skanda.8.92.1)

सनत्कुमार उवाच । नक्षत्राधिपतिं दृष्ट्वा भगवान् हव्यवाहनः । विद्रुतं दानवभयात् पदातिर्योद्धुमुद्यतः

sanatkumāra uvāca | nakṣatrādhipatiṁ dṛṣṭvā bhagavān havyavāhanaḥ | vidrutaṁ dānavabhayāt padātiryoddhumudyataḥ

सनत्कुमार ने कहा - नक्षत्राधिपति चन्द्रमा को दानवों के भय से भागा हुआ देखकर, भगवान् हव्यवाहन (अग्नि) पैदल ही युद्ध के लिए तत्पर हो गए।

श्लोक 2 (skanda.8.92.2)

स शरैर्दानवरथं ससूतं सहवाजिनम् । सध्वजं सपताकञ्च भस्मसायुज्यमानयत्

sa śarairdānavarathaṁ sasūtaṁ sahavājinam | sadhvajaṁ sapatākañca bhasmasāyujyamānayat

उसने बाणों से दानव के रथ को, सारथि, घोड़ों, ध्वजा और पताका सहित, भस्म कर डाला।

श्लोक 3 (skanda.8.92.3)

ततोस्य कार्मुकं दिव्यं शरेणानतपर्वणा । विज्यं चकार संक्रुद्धस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्

tatosya kārmukaṁ divyaṁ śareṇānataparvaṇā | vijyaṁ cakāra saṁkruddhastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

फिर क्रोध से भरकर उसने एक सीधे-पोर वाले बाण से उसके दिव्य धनुष को डोरीरहित कर दिया और कहा - 'ठहरो, ठहरो!'

श्लोक 4 (skanda.8.92.4)

अथान्धकश्च राहुश्च प्रह्लादो मय एव च । अन्ये च दानवश्रेष्ठाः कृशानुं पर्यवारयन्

athāndhakaśca rāhuśca prahlādo maya eva ca | anye ca dānavaśreṣṭhāḥ kṛśānuṁ paryavārayan

तब अन्धक, राहु, प्रह्लाद और मय, तथा अन्य श्रेष्ठ दानवों ने कृशानु (अग्नि) को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 5 (skanda.8.92.5)

सोऽवप्लुत्य तदा तेषां धनूंषि च रथाँस्तथा । ध्वजानि च विचित्राणि ददाह च ररास च

so'vaplutya tadā teṣāṁ dhanūṁṣi ca rathā~stathā | dhvajāni ca vicitrāṇi dadāha ca rarāsa ca

तब उन पर कूद पड़कर उसने उनके धनुषों, रथों और नाना प्रकार की ध्वजाओं को जला डाला और गर्जना की।

श्लोक 6 (skanda.8.92.6)

कवचानि विचित्राणि शिरांसि च वसूत्तमः । ददाह विकृताकारो नादयन् सर्वतोदिशः

kavacāni vicitrāṇi śirāṁsi ca vasūttamaḥ | dadāha vikṛtākāro nādayan sarvatodiśaḥ

उस वसुश्रेष्ठ ने विकराल रूप धारण कर, सब दिशाओं में गर्जना करते हुए, उनके नाना प्रकार के कवचों और सिरों को जला डाला।

श्लोक 7 (skanda.8.92.7)

हाहेति नदतां तत्र भगवान् हव्यवाहनः । जिह्वा दधद् बभौ व्यास गुहायां दीपवत् स्थितः

hāheti nadatāṁ tatra bhagavān havyavāhanaḥ | jihvā dadhad babhau vyāsa guhāyāṁ dīpavat sthitaḥ

हे व्यास! जब वे सब वहाँ 'हा-हा' चिल्ला रहे थे, तब भगवान् हव्यवाहन अपनी ज्वाला-जिह्वाओं को धारण किए हुए, गुहा में स्थित दीपक के समान शोभित हो रहे थे।

श्लोक 8 (skanda.8.92.8)

केषाञ्चित् प्रदहत् तानि दानवानां मुखानि सः । पङ्कजानीव फुल्लानि तिमिरारिर्महाप्रभः

keṣāñcit pradahat tāni dānavānāṁ mukhāni saḥ | paṅkajānīva phullāni timirārirmahāprabhaḥ

वह अन्धकार का महातेजस्वी शत्रु कुछ दानवों के उन मुखों को जलाता हुआ, मानो खिले हुए कमलों को जला रहा हो, ऐसा प्रतीत होता था।

श्लोक 9 (skanda.8.92.9)

केषाञ्चित्तु गजेन्द्राणां करान् काञ्चनभूषितान् । ददाह भगवान् वह्निर्दावाग्निर्भुजगानिव

keṣāñcittu gajendrāṇāṁ karān kāñcanabhūṣitān | dadāha bhagavān vahnirdāvāgnirbhujagāniva

और कुछ गजराजों की स्वर्ण-भूषित सूँडों को भगवान् अग्नि ने उसी प्रकार जला डाला जैसे दावाग्नि सर्पों को जलाती है।

श्लोक 10 (skanda.8.92.10)

शरान् शराशनाञ्चैव तथा खङ्गपरिच्छदान् । ददाह भगवान् वह्निर्हस्त्यश्वमपि सर्वशः

śarān śarāśanāñcaiva tathā khaṅgaparicchadān | dadāha bhagavān vahnirhastyaśvamapi sarvaśaḥ

बाणों, धनुषों तथा खड्गों के म्यानों को, और हाथियों-घोड़ों को भी सब ओर से भगवान् अग्नि ने जला डाला।

श्लोक 11 (skanda.8.92.11)

ते हन्यमाना दैत्येन्द्रा विशस्त्रा दुःखिता भृशम् । भ्रमन्ति वितनुत्राश्च तत्र तत्रैव

te hanyamānā daityendrā viśastrā duḥkhitā bhṛśam | bhramanti vitanutrāśca tatra tatraiva

इस प्रकार मारे जाते हुए वे दैत्येन्द्र, शस्त्रविहीन और कवचरहित होकर, अत्यन्त दुःखी हो इधर-उधर भटकने लगे - (यहाँ मूल पाठ का कुछ अंश अप्राप्त है)।

श्लोक 12 (skanda.8.92.12)

तेषां वह्निप्रदीप्तानां दह्यतां सुरविद्विषाम् । हिरण्याक्षः स्वयं राजा पर्जन्यः समपद्यत

teṣāṁ vahnipradīptānāṁ dahyatāṁ suravidviṣām | hiraṇyākṣaḥ svayaṁ rājā parjanyaḥ samapadyata

जब वे देवताओं के शत्रु अग्नि से प्रज्वलित होकर जल रहे थे, तब उनका राजा हिरण्याक्ष स्वयं वर्षा के मेघ (पर्जन्य) का रूप धारण कर बैठा।

श्लोक 13 (skanda.8.92.13)

स मेघभूतो दैत्येन्द्रस्तमग्निं वृष्टिभिस्तदा । प्रशामयत वेगेन संवर्त्तक इवाम्बुदः

sa meghabhūto daityendrastamagniṁ vṛṣṭibhistadā | praśāmayata vegena saṁvarttaka ivāmbudaḥ

उस मेघ-रूप दैत्येन्द्र ने उस अग्नि को वर्षा-धाराओं से उसी वेग से शान्त कर दिया, जैसे प्रलयकालीन मेघ करता है।

श्लोक 14 (skanda.8.92.14)

तं प्रशान्तं तदालक्ष्य विधुरं हव्यवाहनम् । विप्रचित्तिः शरैस्तीक्ष्णैर्ललाटे समवाकिरत्

taṁ praśāntaṁ tadālakṣya vidhuraṁ havyavāhanam | vipracittiḥ śaraistīkṣṇairlalāṭe samavākirat

उस शान्त हुए, व्याकुल हव्यवाहन को देखकर विप्रचित्ति ने उसके ललाट पर तीक्ष्ण बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 15 (skanda.8.92.15)

ततोऽस्य नदतो भूयो मयो दानवसत्तमः । मुखे शरान् महाघोरान्निचखान महासुरः

tato'sya nadato bhūyo mayo dānavasattamaḥ | mukhe śarān mahāghorānnicakhāna mahāsuraḥ

फिर जब वह पुनः गरज उठा, तब दानवश्रेष्ठ महासुर मय ने उसके मुख में अत्यन्त भयंकर बाण घोंप दिए।

श्लोक 16 (skanda.8.92.16)

तस्य तेन तदा व्यास मुखे भिन्नस्य दारुणः । उत्तस्थौ वायुवद् धूमः शरीरादञ्जनोपमः

tasya tena tadā vyāsa mukhe bhinnasya dāruṇaḥ | uttasthau vāyuvad dhūmaḥ śarīrādañjanopamaḥ

हे व्यास! उस समय उससे मुख में भयंकर रूप से बिंधे हुए उसके शरीर से काजल के समान काला धुआँ वायु के वेग से उठने लगा।

श्लोक 17 (skanda.8.92.17)

तेन धूमेन खञ्चैव दिवं भूश्चैव सर्वशः । पूरिता महता व्यास न प्राज्ञायत किंचन

tena dhūmena khañcaiva divaṁ bhūścaiva sarvaśaḥ | pūritā mahatā vyāsa na prājñāyata kiṁcana

हे व्यास! उस विशाल धुएँ से आकाश, स्वर्ग और पृथ्वी सब ओर से भर गए, और कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 18 (skanda.8.92.18)

तेन शब्देन संज्ञाभिर्नामविश्रावणैरपि । करस्पर्शैस्तदान्योन्यमनयद्यमसादनम्

tena śabdena saṁjñābhirnāmaviśrāvaṇairapi | karasparśaistadānyonyamanayadyamasādanam

उस अन्धकार में शब्द से, संकेतों से, नाम पुकारने से और हाथों के स्पर्श से ही वे एक-दूसरे को पहचानने का प्रयत्न करते और अनजाने में एक-दूसरे को यम के धाम पहुँचा देते थे।

श्लोक 19 (skanda.8.92.19)

न देवो ज्ञायते तत्र न दैत्यो दानवोऽपि वा । अजानन्तस्ततस्तत्र संस्थामेतां प्रचक्रिरे

na devo jñāyate tatra na daityo dānavo'pi vā | ajānantastatastatra saṁsthāmetāṁ pracakrire

वहाँ न देवता पहचाना जाता था, न दैत्य, न दानव; अतः एक-दूसरे को न पहचान पाने के कारण उन्होंने वहाँ यह व्यवस्था बना ली -

श्लोक 20 (skanda.8.92.20)

आटिं दैत्याः प्रकुर्वन्त बक इत्येव देवताः । बकं वदन्ति ये तत्र दैत्यास्तान् व्यघ्नँस्तदा

āṭiṁ daityāḥ prakurvanta baka ityeva devatāḥ | bakaṁ vadanti ye tatra daityāstān vyaghna~stadā

दैत्य 'आटि' शब्द बोलते थे और देवता केवल 'बक' शब्द; वहाँ जो कोई 'बक' कहता, दैत्य उसे तभी मार डालते थे।

श्लोक 21 (skanda.8.92.21)

आटिं ब्रुवाणश्च सुराः इत्येवं तद् व्यवर्तत । एवंभूतमभूद्युद्धं वर्षाणां तु सहस्रकम् । महद्भयं वै दैत्यानामन्धकारे सुरैः सह

āṭiṁ bruvāṇaśca surāḥ ityevaṁ tad vyavartata | evaṁbhūtamabhūdyuddhaṁ varṣāṇāṁ tu sahasrakam | mahadbhayaṁ vai daityānāmandhakāre suraiḥ saha

और जो देवता 'आटि' बोल बैठते, वे भी इसी प्रकार मारे जाते थे - इस प्रकार वह क्रम चलता रहा। इस तरह वह युद्ध पूरे एक सहस्र वर्षों तक चलता रहा, और उस अन्धकार में देवताओं के साथ दैत्यों को भी महान् भय व्याप्त हो गया।

श्लोक 22 (skanda.8.92.22)

तदन्धकारे सुमहाभयंकरं तदाभवद्युद्धमतीव दारुणम् । जगद्विनाशाय जगद्धितैषिणां सुरासुराणां रुधिरौघनिस्रवम्

tadandhakāre sumahābhayaṁkaraṁ tadābhavadyuddhamatīva dāruṇam | jagadvināśāya jagaddhitaiṣiṇāṁ surāsurāṇāṁ rudhiraughanisravam

उस अन्धकार में एक अत्यन्त भयंकर और घोर युद्ध हुआ, जिसमें जगत् का हित चाहने वाले देवताओं और असुरों का रक्त-प्रवाह ही मानो जगत् के विनाश के लिए बह चला।

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