Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 91

युद्ध

अध्याय 90अध्याय-सूचीअध्याय 92

श्लोक 1 (skanda.8.91.1)

सनत्कुमार उवाच । तस्मिन्बले तथा तेन सोमेनाप्रतिमौजसा । हन्यमाने महामायः समाश्वस्य तदासुरः

sanatkumāra uvāca | tasminbale tathā tena somenāpratimaujasā | hanyamāne mahāmāyaḥ samāśvasya tadāsuraḥ

सनत्कुमार ने कहा - जब वह सेना उस अनुपम बलशाली सोम (चन्द्रमा) के द्वारा नष्ट की जा रही थी, तब वह महामायावी असुर हिरण्याक्ष सम्भलकर -

श्लोक 2 (skanda.8.91.2)

हिरण्याक्षो दितेः पुत्र इदमाह रुषान्वितः । गरुत्मतः सुतं वीरं रथयन्तारमाहवे

hiraṇyākṣo diteḥ putra idamāha ruṣānvitaḥ | garutmataḥ sutaṁ vīraṁ rathayantāramāhave

दिति-पुत्र हिरण्याक्ष ने क्रोध से भरकर युद्ध में गरुड़-पुत्र वीर सारथि से यह कहा -

श्लोक 3 (skanda.8.91.3)

खगेश्वर न ते लज्जा भवतीह रणार्णवे । यन्मां रथेन संग्रामात् त्वं हरस्यन्यतोद्य वै

khageśvara na te lajjā bhavatīha raṇārṇave | yanmāṁ rathena saṁgrāmāt tvaṁ harasyanyatodya vai

हे पक्षीश्वर! इस युद्ध-सागर में तुझे लज्जा नहीं आती कि आज तू रथ द्वारा मुझे युद्धभूमि से कहीं और ले जा रहा है?

श्लोक 4 (skanda.8.91.4)

किं वक्ष्यन्त्यसुराः सर्वे दैत्याश्चैव महाबलाः । राजास्माकं जितः संख्ये शत्रुभिः शत्रुतापनः

kiṁ vakṣyantyasurāḥ sarve daityāścaiva mahābalāḥ | rājāsmākaṁ jitaḥ saṁkhye śatrubhiḥ śatrutāpanaḥ

समस्त असुर और महाबली दैत्य क्या कहेंगे - 'शत्रुओं को संतप्त करने वाला हमारा राजा युद्ध में शत्रुओं से पराजित हो गया' -

श्लोक 5 (skanda.8.91.5)

जीवितैषी परित्यज्य बालानस्मान् दुरात्मवान् । रणादपगतः क्वापि धिङ् मामशुभकारिणम्

jīvitaiṣī parityajya bālānasmān durātmavān | raṇādapagataḥ kvāpi dhiṅ māmaśubhakāriṇam

'दुष्ट-हृदय वह अपने ही प्राणों की रक्षा चाहकर, अपने इन बालकों (प्रजाजनों) को त्यागकर, युद्ध से कहीं भाग गया' - धिक्कार है मुझ अशुभकारी को!

श्लोक 6 (skanda.8.91.6)

कश्यपस्य सुतो भूत्वा भ्राता दैत्यस्य संमतः । हिरण्यकशिपोर्दैत्यो महायोगबलान्वितः

kaśyapasya suto bhūtvā bhrātā daityasya saṁmataḥ | hiraṇyakaśipordaityo mahāyogabalānvitaḥ

'कश्यप का पुत्र होकर, दैत्य हिरण्यकशिपु का सम्मानित भ्राता होकर, महायोगबल से युक्त होकर भी -'

श्लोक 7 (skanda.8.91.7)

अग्रतः सर्वदैत्यानां दानवानां तथैव च । राजा स्वामी च शूरश्च निर्जितः शत्रुभिः कथम्

agrataḥ sarvadaityānāṁ dānavānāṁ tathaiva ca | rājā svāmī ca śūraśca nirjitaḥ śatrubhiḥ katham

'-सम्पूर्ण दैत्यों और दानवों में अग्रणी, उनका राजा, स्वामी और शूरवीर होकर भी वह शत्रुओं से कैसे पराजित हो गया?'

श्लोक 8 (skanda.8.91.8)

अथवा देवपक्षस्य त्वं पुत्रो वै गरुत्मतः । तमेव पक्षं भजसे न मां त्वं परिरक्षसे

athavā devapakṣasya tvaṁ putro vai garutmataḥ | tameva pakṣaṁ bhajase na māṁ tvaṁ parirakṣase

अथवा तू तो देवपक्ष के गरुड़ का ही पुत्र है, उसी पक्ष का पक्षधर है, इसीलिए तू मेरी रक्षा नहीं करता!

श्लोक 9 (skanda.8.91.9)

नाहं तव न शक्तोद्य शिरः कायात् सकुण्डलम् । खङ्गेनानेन तीक्ष्णेन छेत्तुं खगकुलाधम

nāhaṁ tava na śaktodya śiraḥ kāyāt sakuṇḍalam | khaṅgenānena tīkṣṇena chettuṁ khagakulādhama

हे पक्षिकुल में अधम! ऐसा नहीं कि मैं आज इस तीक्ष्ण खड्ग से कुण्डल-सहित तेरे सिर को धड़ से काटने में असमर्थ हूँ।

श्लोक 10 (skanda.8.91.10)

मित्रं त्वं मम मन्दस्य पुरा बालसखेति च । अतः कृत्वाभिरक्षामि गच्छ मुक्तोऽसि दोषवान्

mitraṁ tvaṁ mama mandasya purā bālasakheti ca | ataḥ kṛtvābhirakṣāmi gaccha mukto'si doṣavān

किन्तु तू मेरा मित्र है और मेरी मूर्खता के दिनों का बाल-सखा भी है, अतः मैं तुझे बचा रहा हूँ - जा, अपराधी होते हुए भी तू मुक्त है।

श्लोक 11 (skanda.8.91.11)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रथयन्ता खगेश्वरः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा हिरण्याक्षं महासुरम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā rathayantā khageśvaraḥ | uvāca ślakṣṇayā vācā hiraṇyākṣaṁ mahāsuram

उसके इस वचन को सुनकर, पक्षिराज-पुत्र सारथि ने कोमल वाणी में महासुर हिरण्याक्ष से कहा -

श्लोक 12 (skanda.8.91.12)

मा क्रुधो दानवश्रेष्ठ नास्मि दैत्य तवाहितः । तदोपवाहितः क्षिप्रं रणाद् रक्षार्थमेव हि

mā krudho dānavaśreṣṭha nāsmi daitya tavāhitaḥ | tadopavāhitaḥ kṣipraṁ raṇād rakṣārthameva hi

'हे दानवश्रेष्ठ! क्रोध मत करो, हे दैत्य! मैं तुम्हारा अहित करने वाला नहीं हूँ; मैंने तुम्हें रक्षा के लिए ही शीघ्र युद्ध से हटाया था।'

श्लोक 13 (skanda.8.91.13)

सूताः शास्त्रविदश्चैव ब्रुवते दानवेश्वर । दम्पती रथियन्तारौ परस्परमनुव्रतौ

sūtāḥ śāstravidaścaiva bruvate dānaveśvara | dampatī rathiyantārau parasparamanuvratau

'हे दानवेश्वर! सूत और शास्त्रज्ञ लोग कहते हैं कि रथी और सारथि परस्पर अनुरक्त दम्पती के समान होते हैं।'

श्लोक 14 (skanda.8.91.14)

रथिना शस्त्रघातेभ्यो रक्ष्यो यन्ता यथा प्रिया । तेन चैव रथो रक्ष्यो यथा भर्त्ता जयावहः

rathinā śastraghātebhyo rakṣyo yantā yathā priyā | tena caiva ratho rakṣyo yathā bharttā jayāvahaḥ

'जैसे प्रिया की रक्षा की जाती है, वैसे ही रथी द्वारा सारथि की शस्त्र-प्रहारों से रक्षा होनी चाहिए, और जैसे विजय लाने वाले पति की रक्षा होती है, वैसे ही उसी सारथि द्वारा रथ की रक्षा होनी चाहिए।'

श्लोक 15 (skanda.8.91.15)

स भवान् रिपुणा भिन्नो ह्यवबद्धश्च संयुगे । अशक्तः स्यादितीत्येवं मया क्षिप्रमपोहितः

sa bhavān ripuṇā bhinno hyavabaddhaśca saṁyuge | aśaktaḥ syāditītyevaṁ mayā kṣipramapohitaḥ

'सोचकर कि आप शत्रु से घायल और युद्ध में घिर जाने से असमर्थ हो जाएँगे, मैंने आपको शीघ्र ही वहाँ से हटा लिया।'

श्लोक 16 (skanda.8.91.16)

आश्वस्य बलमाधाय पुनर्युद्धेन दंशितः । रिपूञ्जेष्यसि संग्रामे त्वेवं त्वमपवाहितः

āśvasya balamādhāya punaryuddhena daṁśitaḥ | ripūñjeṣyasi saṁgrāme tvevaṁ tvamapavāhitaḥ

'सम्भलकर, बल संचित कर, पुनः युद्ध के लिए कवचबद्ध होकर तुम संग्राम में शत्रुओं को जीत सकोगे - इसी विचार से मैंने तुम्हें हटाया था।'

श्लोक 17 (skanda.8.91.17)

ये हि कालेपयान्ति स्म काले चायान्ति दंशिताः । तेषान्नासुलभो दैत्य जयो युद्धे महात्मनाम्

ye hi kālepayānti sma kāle cāyānti daṁśitāḥ | teṣānnāsulabho daitya jayo yuddhe mahātmanām

'हे दैत्य! जो महात्मा समय पर पीछे हटते हैं और समय पर कवचबद्ध होकर लौट आते हैं, उनके लिए युद्ध में विजय दुर्लभ नहीं होती।'

श्लोक 18 (skanda.8.91.18)

न चाहमहितः सत्यं हितकृत् तव नित्यदा । मा शङ्कां कुरु दैत्येन्द्र शपे सत्येन सर्वतः

na cāhamahitaḥ satyaṁ hitakṛt tava nityadā | mā śaṅkāṁ kuru daityendra śape satyena sarvataḥ

'मैं सचमुच तुम्हारा अहित करने वाला नहीं, सदा तुम्हारा हित करने वाला ही हूँ। हे दैत्येन्द्र! शंका मत करो, मैं सत्य की शपथ लेकर सब प्रकार से कहता हूँ।'

श्लोक 19 (skanda.8.91.19)

न चाप्यविदितं तेऽद्य कृतो यत् शपथः पुरा । तथैवामृतपश्चाहं न मृत्युर्मम विद्यते

na cāpyaviditaṁ te'dya kṛto yat śapathaḥ purā | tathaivāmṛtapaścāhaṁ na mṛtyurmama vidyate

'और यह भी तुम्हें अज्ञात नहीं कि पूर्व में जो शपथ ली गई थी, उसके अनुसार मैं भी अमृतपायी हूँ; मेरे लिए मृत्यु नहीं है।'

श्लोक 20 (skanda.8.91.20)

अहं गरुत्मतः पुत्रो देवान् हित्वासुरान् श्रितः । तवैव दैत्य स्नेहेन मा शङ्कां त्वं कृथा मयि

ahaṁ garutmataḥ putro devān hitvāsurān śritaḥ | tavaiva daitya snehena mā śaṅkāṁ tvaṁ kṛthā mayi

'मैं गरुड़ का पुत्र हूँ, फिर भी देवताओं को छोड़कर तुम्हारे ही स्नेहवश असुरों की शरण में आया हूँ, हे दैत्य! मुझ पर संदेह मत करो।'

श्लोक 21 (skanda.8.91.21)

एतद्बलं चन्द्रमसा वह्निना चोपपीडितम् । त्राहि क्षिप्रं महाबाहो न शोकं कर्तुमर्हसि

etadbalaṁ candramasā vahninā copapīḍitam | trāhi kṣipraṁ mahābāho na śokaṁ kartumarhasi

'यह सेना चन्द्रमा और अग्नि के द्वारा पीड़ित की जा रही है; हे महाबाहो! इसे शीघ्र बचाओ, शोक करना तुम्हें शोभा नहीं देता।'

श्लोक 22 (skanda.8.91.22)

मायामथ समास्थाय धनुषा वा बलेन वा । जहि शत्रून्महाराज मा रुषन्तु दितेः सुताः

māyāmatha samāsthāya dhanuṣā vā balena vā | jahi śatrūnmahārāja mā ruṣantu diteḥ sutāḥ

'अब माया का सहारा लेकर, अथवा धनुष से, अथवा बल से, हे महाराज! शत्रुओं का वध करो - दिति-पुत्र और क्रुद्ध न हों।'

श्लोक 23 (skanda.8.91.23)

सनत्कुमार उवाच । ततः स तं परिष्वज्य पक्षिराजं महासुरः । अभिदुद्राव वेगेन रथेनाम्बुदनादिना

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa taṁ pariṣvajya pakṣirājaṁ mahāsuraḥ | abhidudrāva vegena rathenāmbudanādinā

सनत्कुमार ने कहा - तब उस महासुर ने उस पक्षिराज-पुत्र को आलिंगन कर, मेघ के समान गर्जन करते रथ पर वेग से आक्रमण किया।

श्लोक 24 (skanda.8.91.24)

तस्यापतत एवाथ सवह्निश्चन्द्रमास्तथा । शरैराशीविषाकारैर्ध्वजं चिच्छिदतुर्युधि

tasyāpatata evātha savahniścandramāstathā | śarairāśīviṣākārairdhvajaṁ cicchidaturyudhi

उसके आक्रमण करते ही चन्द्रमा और अग्नि ने विषधर सर्पों के समान भयंकर बाणों से युद्ध में उसकी ध्वजा को काट डाला।

श्लोक 25 (skanda.8.91.25)

ततो ललाटे विद्ध्वैनं तौ देवौ शशिपावकौ । युगान्ताम्बुदवद् व्यास नादमुच्चैः प्रचक्रतुः

tato lalāṭe viddhvainaṁ tau devau śaśipāvakau | yugāntāmbudavad vyāsa nādamuccaiḥ pracakratuḥ

हे व्यास! तब उन दोनों देवों, चन्द्रमा और अग्नि ने उसे ललाट में बींधकर, प्रलयकालीन मेघों के समान उच्च स्वर से गर्जना की।

श्लोक 26 (skanda.8.91.26)

तयोस्तल्लाघवं दृष्ट्वा हिरण्याक्षः प्रतापवान् । आग्नेयेनास्त्रमुख्येन शिशिरं तद् व्यशातयत्

tayostallāghavaṁ dṛṣṭvā hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | āgneyenāstramukhyena śiśiraṁ tad vyaśātayat

उन दोनों की उस फुर्ती को देखकर प्रतापी हिरण्याक्ष ने आग्नेय अस्त्र से उस शीतलता (हिम-वर्षा) को नष्ट कर दिया।

श्लोक 27 (skanda.8.91.27)

तुषारवर्षणं दग्ध्वा ततोऽसौ मायया पुनः । संमोहयित्वा वेगेन राहुर्भूत्वाभिदुद्रुवे

tuṣāravarṣaṇaṁ dagdhvā tato'sau māyayā punaḥ | saṁmohayitvā vegena rāhurbhūtvābhidudruve

उस तुषार-वृष्टि को भस्म करके, फिर उसने माया से उन्हें मोहित कर, राहु का रूप धारण कर वेग से आक्रमण किया।

श्लोक 28 (skanda.8.91.28)

स राहुणा तदा तेन ग्रस्यमानः खगेश्वरः । रणं त्यक्त्वान्यतो यातस्ततो दैत्यो ननाद ह

sa rāhuṇā tadā tena grasyamānaḥ khageśvaraḥ | raṇaṁ tyaktvānyato yātastato daityo nanāda ha

उस राहु-रूप हिरण्याक्ष द्वारा ग्रसे जाते हुए आकाशेश्वर चन्द्रमा ने युद्ध छोड़कर अन्यत्र गमन किया, तब दैत्य गरज उठा।

श्लोक 29 (skanda.8.91.29)

दानवा ह्यपि ते सर्वे नष्टे तस्मिन् हिमाशये । समाश्वस्य पुनश्चक्रुर्युद्धं सुरगणैः सह । तेऽम्बुदाशनिसन्नादाः समुद्रसमनादिताः

dānavā hyapi te sarve naṣṭe tasmin himāśaye | samāśvasya punaścakruryuddhaṁ suragaṇaiḥ saha | te'mbudāśanisannādāḥ samudrasamanāditāḥ

उस शीतल-किरण (चन्द्रमा) के लुप्त हो जाने पर वे समस्त दानव भी सम्भलकर, मेघ और वज्र के समान गर्जते हुए तथा समुद्र के समान ध्वनि करते हुए, देवताओं के साथ पुनः युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (skanda.8.91.30)

दैत्यदानवमहारथाः प्रवरसादिन आश्वसन्तः । युद्धकांक्षिणो दंष्ट्रिण इव महागजा वनसमाश्रिताः

daityadānavamahārathāḥ pravarasādina āśvasantaḥ | yuddhakāṁkṣiṇo daṁṣṭriṇa iva mahāgajā vanasamāśritāḥ

दैत्यों और दानवों के महारथी तथा श्रेष्ठ अश्वारोही सम्भलकर - (मूल में यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित/अप्राप्त है) - युद्ध की कामना करने लगे, मानो वन का आश्रय लिए हुए दांतों वाले महागज हों।

अध्याय 90अध्याय-सूचीअध्याय 92