अम्बिका खण्ड · अध्याय 101
किङ्कर-युद्ध
श्लोक 1 (skanda.8.101.1)
सनत्कुमार उवाच । तेभिनिर्गत्य वेगेन दंशिता दैत्यदानवाः । वराहं प्रति संजग्मुर्मृगाः सिंहमिवातुराः
sanatkumāra uvāca | tebhinirgatya vegena daṁśitā daityadānavāḥ | varāhaṁ prati saṁjagmurmṛgāḥ siṁhamivāturāḥ
सनत्कुमार ने कहा - वे कवचबद्ध दैत्य-दानव वेग से निकलकर, व्याकुल मृगों के समान सिंह की ओर, उसी प्रकार वराह की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 2 (skanda.8.101.2)
ते वराहदृशा तेन नीयमानासुरेश्वराः । आभान्ति व्यास सन्नद्धाः प्रोक्षिताः पशवो यथा
te varāhadṛśā tena nīyamānāsureśvarāḥ | ābhānti vyāsa sannaddhāḥ prokṣitāḥ paśavo yathā
हे व्यास! उस वराह की केवल दृष्टि से ही खींचे जाते हुए वे असुरेश्वर, मानो यज्ञ के लिए प्रोक्षित सुसज्जित पशुओं के समान दिखाई देने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.101.3)
तान्निहत्य कृतान्तेन मृत्युना चावपाशितान् । निनाय स तदा दैत्यान् पशूनिव यथा नरः
tānnihatya kṛtāntena mṛtyunā cāvapāśitān | nināya sa tadā daityān paśūniva yathā naraḥ
कृतान्त (यम) के समान उन्हें आहत कर और मृत्यु के पाश में बाँधकर, उसने उन दैत्यों को उसी प्रकार ले चलना आरम्भ किया, जैसे मनुष्य पशुओं को हाँकता है।
श्लोक 4 (skanda.8.101.4)
गत्वा ते योजनान्यष्टौ उत्तीर्णं सागराम्भसः । वराहं ददृशुः सर्वे सिंहं क्षुद्रमृगा इव
gatvā te yojanānyaṣṭau uttīrṇaṁ sāgarāmbhasaḥ | varāhaṁ dadṛśuḥ sarve siṁhaṁ kṣudramṛgā iva
आठ योजन जाकर, सागर के जल को पार कर चुके उस वराह को उन सबने उसी प्रकार देखा, जैसे छोटे मृग सिंह को देखते हैं।
श्लोक 5 (skanda.8.101.5)
ते मुहूर्तं निरीक्ष्यैव परिबभ्रुस्समन्ततः । विस्फारयन्तश्चापानि संक्रुद्धा दैत्यदानवाः
te muhūrtaṁ nirīkṣyaiva paribabhrussamantataḥ | visphārayantaścāpāni saṁkruddhā daityadānavāḥ
क्षणभर उसे देखकर ही वे कुपित दैत्य-दानव अपने धनुषों की टंकार करते हुए चारों ओर घूमने लगे।
श्लोक 6 (skanda.8.101.6)
तानापतत एवाथ निरीक्ष्य स समन्ततः । वराहेन्द्रस्तदा दैत्यान् प्राहेदं सुमहाबलः
tānāpatata evātha nirīkṣya sa samantataḥ | varāhendrastadā daityān prāhedaṁ sumahābalaḥ
तब उन्हें सब ओर से आक्रमण करते हुए देखकर, उस अत्यन्त बलशाली वराहेन्द्र ने उन दैत्यों से यह कहा -
श्लोक 7 (skanda.8.101.7)
वराह उवाच । किं मा यूयं दितेः पुत्रा अभिद्रवथ सर्वशः । दूषयामि न वः किञ्चिदसुहृन्न च वो ह्यहम्
varāha uvāca | kiṁ mā yūyaṁ diteḥ putrā abhidravatha sarvaśaḥ | dūṣayāmi na vaḥ kiñcidasuhṛnna ca vo hyaham
वराह ने कहा - हे दिति-पुत्रो! तुम सब मुझ पर सब ओर से क्यों आक्रमण कर रहे हो? मैं तुम्हारा कुछ भी अहित नहीं करता, और न ही मैं तुम्हारा शत्रु हूँ।
श्लोक 8 (skanda.8.101.8)
अथैवंवादिनं दैत्या वराहं तं सुविस्मिताः । पप्रच्छुः परिवार्यैव सर्वे दितिसुतास्तदा
athaivaṁvādinaṁ daityā varāhaṁ taṁ suvismitāḥ | papracchuḥ parivāryaiva sarve ditisutāstadā
इस प्रकार बोलते हुए उस वराह से अत्यन्त विस्मित होकर, उन सभी दिति-पुत्रों ने उसे घेरकर तब यह पूछा -
श्लोक 9 (skanda.8.101.9)
कस्त्वं वराहरूपीह तीर्त्वा सागरमूर्जिम् । इहागतः किमर्थं वा क्व वा गन्तव्यमित्युत
kastvaṁ varāharūpīha tīrtvā sāgaramūrjim | ihāgataḥ kimarthaṁ vā kva vā gantavyamityuta
'तुम कौन हो, जो इस विशाल सागर को पार कर वराह-रूप में यहाँ आए हो? किस उद्देश्य से यहाँ आए हो, और कहाँ जाना है?'
श्लोक 10 (skanda.8.101.10)
तेषान्तद्वचनं श्रुत्वा वराहोसौ महामनाः । उवाच दानवान्सर्वान् तदा जलदनिस्वनः
teṣāntadvacanaṁ śrutvā varāhosau mahāmanāḥ | uvāca dānavānsarvān tadā jaladanisvanaḥ
उनके इस वचन को सुनकर, मेघ के समान गम्भीर स्वर वाला वह महामना वराह तब समस्त दानवों से बोला -
श्लोक 11 (skanda.8.101.11)
वराहोहं यथा दैत्यास्तादृग्रूपं च पश्यत । प्रचारार्थमिमं देशमागतोस्मि न संशयः
varāhohaṁ yathā daityāstādṛgrūpaṁ ca paśyata | pracārārthamimaṁ deśamāgatosmi na saṁśayaḥ
'हे दैत्यो! मैं एक वराह ही हूँ, जैसा तुम इस रूप को देख रहे हो; मैं निःसन्देह चरने के लिए ही इस देश में आया हूँ।'
श्लोक 12 (skanda.8.101.12)
हृतभार्योहमन्येन विमना दैत्यपुङ्गवाः । पर्यटँस्तस्य दुष्टस्य चिन्तयामि परिग्रहम्
hṛtabhāryohamanyena vimanā daityapuṅgavāḥ | paryaṭa~stasya duṣṭasya cintayāmi parigraham
'हे दैत्यपुंगवो! किसी अन्य ने मेरी संगिनी का हरण कर लिया है, इससे मैं उदास होकर घूम रहा हूँ, और उस दुष्ट को पकड़ने का उपाय सोच रहा हूँ।'
श्लोक 13 (skanda.8.101.13)
दानवा ऊचुः । नायं प्रचारो युष्माकं दैत्यानामयमालयः । अनादृत्य कथं दैत्यानिमं देशमुपागतः
dānavā ūcuḥ | nāyaṁ pracāro yuṣmākaṁ daityānāmayamālayaḥ | anādṛtya kathaṁ daityānimaṁ deśamupāgataḥ
दानवों ने कहा - यह तुम्हारा चरागाह नहीं है, यह तो दैत्यों का निवास-स्थान है; दैत्यों की अवहेलना कर तुम इस देश में कैसे आ गए?
श्लोक 14 (skanda.8.101.14)
वयं त्वाद्य वधिष्यामः सर्वे मृगकुलाधम । हत्वा च त्वां हि नेष्यामः सर्वे दैत्येश्वरं प्रति
vayaṁ tvādya vadhiṣyāmaḥ sarve mṛgakulādhama | hatvā ca tvāṁ hi neṣyāmaḥ sarve daityeśvaraṁ prati
'हे मृगकुल में अधम! आज हम सब मिलकर तुझे मार डालेंगे; और तुझे मारकर हम सब दैत्येश्वर के पास ले चलेंगे।'
श्लोक 15 (skanda.8.101.15)
ततस्ते दानवास्सर्वे तमायुधवरैर्भृशम् । निजघ्नुः पर्वतं यद्वत् मेघा वृष्ट्या समुद्धताः
tataste dānavāssarve tamāyudhavarairbhṛśam | nijaghnuḥ parvataṁ yadvat meghā vṛṣṭyā samuddhatāḥ
तब उन सभी दानवों ने अपने श्रेष्ठ आयुधों से उस पर घोर प्रहार किया, जैसे उमड़े हुए मेघ वर्षा से किसी पर्वत पर प्रहार करते हैं।
श्लोक 16 (skanda.8.101.16)
बलवान्सोपि देवात्मा वराहः सुमहाबलः । वध्यमानोपि तान्दैत्यानिदं वचनमब्रवीत्
balavānsopi devātmā varāhaḥ sumahābalaḥ | vadhyamānopi tāndaityānidaṁ vacanamabravīt
वह देवात्मा, बलवान् और अत्यन्त महाबली वराह भी, इस प्रकार आहत होते हुए भी, उन दैत्यों से यह वचन बोला -
श्लोक 17 (skanda.8.101.17)
नह्यत्र भवतां किञ्चिदल्पमप्यसुरोत्तमाः । अपराधं चकाराहं न करिष्ये करोमि वा
nahyatra bhavatāṁ kiñcidalpamapyasurottamāḥ | aparādhaṁ cakārāhaṁ na kariṣye karomi vā
'हे असुरश्रेष्ठो! यहाँ मैंने तुम्हारा कुछ भी, अत्यल्प भी, अपराध नहीं किया है; न करूँगा और न कर रहा हूँ।'
श्लोक 18 (skanda.8.101.18)
किमर्थं मा शितैः शस्त्रैर्घ्नत सर्वे यथा परम् । न हि वो वैरमस्तीह न च कार्यं मया हि वः
kimarthaṁ mā śitaiḥ śastrairghnata sarve yathā param | na hi vo vairamastīha na ca kāryaṁ mayā hi vaḥ
'तुम सब मुझे तीक्ष्ण शस्त्रों से किसी शत्रु के समान क्यों मार रहे हो? न तो तुम्हारा मुझसे कोई वैर है, न मुझसे तुम्हारा कोई प्रयोजन है।'
श्लोक 19 (skanda.8.101.19)
अथ मांसेन कृत्यं वस्ततो मां घ्नत दानवाः । यथा प्राणं शितैः शस्त्रैर्युष्मत्तो न च मे भयम्
atha māṁsena kṛtyaṁ vastato māṁ ghnata dānavāḥ | yathā prāṇaṁ śitaiḥ śastrairyuṣmatto na ca me bhayam
'यदि मेरे मांस से तुम्हारा कोई प्रयोजन है, तो हे दानवो! तीक्ष्ण शस्त्रों से मेरे प्राणों तक मुझे मार डालो; तुमसे मुझे कोई भय नहीं है।'
श्लोक 20 (skanda.8.101.20)
एतौ करौ प्रसार्याहं संस्थितो दितिनन्दनाः । यदा भवन्तः स्थास्यन्ति तदा हन्तास्मि वस्सकृत्
etau karau prasāryāhaṁ saṁsthito ditinandanāḥ | yadā bhavantaḥ sthāsyanti tadā hantāsmi vassakṛt
'हे दिति-नन्दनो! मैं ये दोनों हाथ फैलाए यहीं खड़ा हूँ; जब तुम सब [थककर] रुक जाओगे, तब मैं तुम सबको एक साथ मार डालूँगा।'
श्लोक 21 (skanda.8.101.21)
अद्य वेत्स्यथ दैतेया मृगाणामिह यद्बलम् । मत्ता यूयं सुरान् जित्वा तं मदं नाशयामि वः
adya vetsyatha daiteyā mṛgāṇāmiha yadbalam | mattā yūyaṁ surān jitvā taṁ madaṁ nāśayāmi vaḥ
'हे दैत्यो! आज तुम जानोगे कि मृगों में भी कैसा बल होता है; देवताओं को जीतकर उन्मत्त हुए तुम्हारे उस मद को मैं आज नष्ट कर दूँगा।'
श्लोक 22 (skanda.8.101.22)
सनत्कुमार उवाच । ततः स भगवान् व्यास शक्रध्वजनिभौ करौ । प्रसार्य तस्थावुद्यंचौ भगवानिव शंकरः
sanatkumāra uvāca | tataḥ sa bhagavān vyāsa śakradhvajanibhau karau | prasārya tasthāvudyaṁcau bhagavāniva śaṁkaraḥ
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब उस भगवान् ने इन्द्र-ध्वज के समान अपनी दोनों भुजाएँ फैलाकर, उन्हें ऊपर उठाए हुए ही खड़ा रहा, मानो साक्षात् भगवान् शंकर हों।
श्लोक 23 (skanda.8.101.23)
तेपि तद्वचनं श्रुत्वा दानवाः क्रोधमूर्छिताः । निजघ्नुर्भृशमायस्ता नानाशस्त्रास्त्रपाणयः
tepi tadvacanaṁ śrutvā dānavāḥ krodhamūrchitāḥ | nijaghnurbhṛśamāyastā nānāśastrāstrapāṇayaḥ
उनका यह वचन सुनकर भी वे दानव क्रोध से अचेत हो उठे, और नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र हाथों में लिए, पूरे बल से उस पर घोर प्रहार करने लगे -
श्लोक 24 (skanda.8.101.24)
मेघैरिव महावायुर्गरुत्मान् भुजगैरिव । मृगैरिव यथा व्याघ्रः शशैरिव यथा हरिः
meghairiva mahāvāyurgarutmān bhujagairiva | mṛgairiva yathā vyāghraḥ śaśairiva yathā hariḥ
- जैसे मेघों के द्वारा महावायु, सर्पों के द्वारा गरुड़, मृगों के द्वारा व्याघ्र, और खरगोशों के द्वारा सिंह [घिर जाते हैं],
श्लोक 25 (skanda.8.101.25)
हविषेवानलो दीप्तो गजो गोमायुभिर्यथा । तथा स भगवान् व्यास वराहो नन्दिवर्द्धनः
haviṣevānalo dīpto gajo gomāyubhiryathā | tathā sa bhagavān vyāsa varāho nandivarddhanaḥ
- जैसे प्रज्वलित अग्नि को हवि से और हाथी को सियारों से घेरा जाता है, हे व्यास! उसी प्रकार वह भगवान् वराह नन्दिवर्धन [घिर गया]।
श्लोक 26 (skanda.8.101.26)
तैरर्द्यमानोगणयन् तस्थावचलसन्निभः । स यदा तैः शरैश्चैव गदामुशलपट्टिशैः
tairardyamānogaṇayan tasthāvacalasannibhaḥ | sa yadā taiḥ śaraiścaiva gadāmuśalapaṭṭiśaiḥ
उनके द्वारा पीड़ित होते हुए भी, उनकी परवाह न करते हुए, वह पर्वत के समान अटल खड़ा रहा; और जब वे बाणों, गदाओं, मूसलों और पट्टिशों से -
श्लोक 27 (skanda.8.101.27)
भिन्दिपालैर्भुशुण्डीभिः करवालैरयोमुखैः । एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्वध्यमानो मृगेश्वरः । अदृश्यो विबभौ सर्वे तदा ते हर्षिता भृशम्
bhindipālairbhuśuṇḍībhiḥ karavālairayomukhaiḥ | etaiścānyaiśca bahubhirvadhyamāno mṛgeśvaraḥ | adṛśyo vibabhau sarve tadā te harṣitā bhṛśam
- भिन्दिपालों, भुशुण्डियों, लौह-मुख तलवारों और इन तथा अन्य अनेक शस्त्रों से आहत किया गया, तब वह मृगेश्वर सर्वथा अदृश्य-सा प्रतीत होने लगा, और वे सब अत्यन्त हर्षित हुए।
श्लोक 28 (skanda.8.101.28)
सनत्कुमार उवाच । तेषां निनदतां व्यास वराहो नन्दिवर्धनः । शस्त्रकूटाद विनिष्क्रम्य शिरांसि समपोथयत्
sanatkumāra uvāca | teṣāṁ ninadatāṁ vyāsa varāho nandivardhanaḥ | śastrakūṭāda viniṣkramya śirāṁsi samapothayat
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! जब वे इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, तभी नन्दिवर्धन वराह उस शस्त्रों के ढेर से बाहर निकलकर उनके शिरों को कुचलने लगा।
श्लोक 29 (skanda.8.101.29)
कराभ्यां चरणाभ्याञ्च दंष्ट्राभिश्च व्यदारयत् । तन्मुक्तैरायुधैश्चैव चिच्छेदान्यान् ररास च
karābhyāṁ caraṇābhyāñca daṁṣṭrābhiśca vyadārayat | tanmuktairāyudhaiścaiva cicchedānyān rarāsa ca
अपने दोनों हाथों, पैरों और दाढ़ों से उसने उन्हें चीर डाला; और उन्हीं के द्वारा त्यागे गए आयुधों से ही उसने औरों को काट डाला, और गर्जना की।
श्लोक 30 (skanda.8.101.30)
ते सर्वे करचरणैर्विमुक्तशस्त्रैर्दंष्ट्राभिर्मखमुखदारितास्तथैव । संक्षीणा बहुभिरिवोपभुज्यमाना द्रव्याणामिव निचयाः सदा महान्तः
te sarve karacaraṇairvimuktaśastrairdaṁṣṭrābhirmakhamukhadāritāstathaiva | saṁkṣīṇā bahubhirivopabhujyamānā dravyāṇāmiva nicayāḥ sadā mahāntaḥ
वे सब उसके हाथों, पैरों, उन्हीं के छूटे हुए शस्त्रों और दाढ़ों से इस प्रकार चिर-विदीर्ण हो गए, मानो अनेकों के द्वारा उपभोग में लाए जाते हुए महान् और सदा प्रचुर द्रव्यों के ढेर घटते जा रहे हों।