अम्बिका खण्ड · अध्याय 102
असुर-सन्देशन
श्लोक 1 (skanda.8.102.1)
सनत्कुमार उवाच । अथ तान्निहतान् सर्वान् वराहेणाभिवीक्ष्य तु । एकः कृच्छ्राद्विनिर्मुक्तो ह्यश्मकं पुरमाविशत्
sanatkumāra uvāca | atha tānnihatān sarvān varāheṇābhivīkṣya tu | ekaḥ kṛcchrādvinirmukto hyaśmakaṁ puramāviśat
सनत्कुमार ने कहा - वराह के द्वारा उन सबको मारा हुआ देखकर, केवल एक ही बड़ी कठिनाई से बचकर अश्मक नगरी में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 2 (skanda.8.102.2)
स गत्वा तत्सभाद्वारमिदं वचनमब्रवीत् । मुक्तकेशो रजोध्वस्तो रुधिरेणाभिसंप्लुतः
sa gatvā tatsabhādvāramidaṁ vacanamabravīt | muktakeśo rajodhvasto rudhireṇābhisaṁplutaḥ
वह उस सभा के द्वार पर पहुँचकर, बिखरे केशों, धूल से भरे और रक्त में लथपथ होकर यह बोला -
श्लोक 3 (skanda.8.102.3)
निवेदयत भो दैत्या दानवेन्द्राय धीमते । द्वाःस्थो न्यवेदयद्राज्ञे प्रेरितः सोद्यतायुधः
nivedayata bho daityā dānavendrāya dhīmate | dvāḥstho nyavedayadrājñe preritaḥ sodyatāyudhaḥ
'हे दैत्यो! यह बुद्धिमान् दानवेन्द्र से निवेदन करो।' द्वारपाल ने प्रेरित होकर, शस्त्र उठाए हुए ही राजा से यह निवेदन कर दिया।
श्लोक 4 (skanda.8.102.4)
ये ते गता मृगेन्द्रं तं द्रष्टुं ह्यसुरसत्तमाः । ते हतास्तेन विक्रम्य सर्व एव दितेः सुताः
ye te gatā mṛgendraṁ taṁ draṣṭuṁ hyasurasattamāḥ | te hatāstena vikramya sarva eva diteḥ sutāḥ
'जो श्रेष्ठ असुर उस मृगेन्द्र को देखने गए थे, वे सभी दिति-पुत्र उसके पराक्रम से मारे गए हैं।'
श्लोक 5 (skanda.8.102.5)
मा गाः प्रमादं दैत्येन्द्र मावमँस्था मृगेश्वरम् । मा च कालं प्रतीक्षध्वं मृगं तं मा विजानत । महानसौ न सन्देहो जेतुं शक्यो न दानवैः
mā gāḥ pramādaṁ daityendra māvama~sthā mṛgeśvaram | mā ca kālaṁ pratīkṣadhvaṁ mṛgaṁ taṁ mā vijānata | mahānasau na sandeho jetuṁ śakyo na dānavaiḥ
'हे दैत्येन्द्र! प्रमाद मत करो, उस मृगेश्वर का तिरस्कार मत करो; विलम्ब मत करो, और उसे साधारण मृग मत समझो। वह महान् है, इसमें कोई सन्देह नहीं; दानवों के द्वारा वह जीता नहीं जा सकता।'
श्लोक 6 (skanda.8.102.6)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हिरण्याक्षो महासुरः । स्वयमेवाभिसंक्रुद्ध उत्पपात तदासनात्
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā hiraṇyākṣo mahāsuraḥ | svayamevābhisaṁkruddha utpapāta tadāsanāt
सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर महासुर हिरण्याक्ष स्वयं ही अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने आसन से उछल पड़ा।
श्लोक 7 (skanda.8.102.7)
सेन्द्रकेतुरिवोत्तस्थौ पयोद इव चोन्नदन् । भृकुटीदूषितमुखः सधूमोग्निरिव ज्वलन्
sendraketurivottasthau payoda iva connadan | bhṛkuṭīdūṣitamukhaḥ sadhūmogniriva jvalan
वह इन्द्र-ध्वज के समान उठ खड़ा हुआ, मेघ के समान गरजता हुआ, भृकुटी से विकृत मुख वाला, धुएँ से युक्त अग्नि के समान प्रज्वलित होता हुआ।
श्लोक 8 (skanda.8.102.8)
अथोत्थितं ततो दैत्या विप्रचित्तिश्च दानवः । प्रणम्योचुस्तदा दैत्यमिदं श्लक्ष्णपदाक्षरम्
athotthitaṁ tato daityā vipracittiśca dānavaḥ | praṇamyocustadā daityamidaṁ ślakṣṇapadākṣaram
तब उसके उठने पर, दैत्यों और दानव विप्रचित्ति ने प्रणाम कर उस दैत्य से कोमल शब्दों में यह कहा -
श्लोक 9 (skanda.8.102.9)
त्वं राजा सर्वदैत्यानां भूतानां च जयावहः । तिष्ठत्स्वस्मासु नोद्यन्तुं स्वयमेव त्वमर्हसि
tvaṁ rājā sarvadaityānāṁ bhūtānāṁ ca jayāvahaḥ | tiṣṭhatsvasmāsu nodyantuṁ svayameva tvamarhasi
'तुम समस्त दैत्यों और प्राणियों के राजा, विजय लाने वाले हो; हम खड़े रहते हुए, तुम्हें स्वयं उठकर [युद्ध में] जाना उचित नहीं है।'
श्लोक 10 (skanda.8.102.10)
वयं तं सह देवैश्च ये च तस्याभिरक्षिणः । हत्वा मांसं महाराज छित्त्वा तस्यानयामहे
vayaṁ taṁ saha devaiśca ye ca tasyābhirakṣiṇaḥ | hatvā māṁsaṁ mahārāja chittvā tasyānayāmahe
'हे महाराज! हम उसे देवताओं सहित, और उसकी रक्षा करने वालों सहित मारकर, उसका मांस काटकर तुम्हारे पास ले आएँगे।'
श्लोक 11 (skanda.8.102.11)
आदित्यानां सरुद्राणां वसूनामश्विनोरपि । भृगूणां पितृभिः सार्धं तथैवाङ्गिरसामपि
ādityānāṁ sarudrāṇāṁ vasūnāmaśvinorapi | bhṛgūṇāṁ pitṛbhiḥ sārdhaṁ tathaivāṅgirasāmapi
'आदित्यों, रुद्रों सहित, वसुओं, दोनों अश्विनीकुमारों, भृगुओं के पितरों सहित, और उसी प्रकार अंगिराओं के भी -'
श्लोक 12 (skanda.8.102.12)
विश्वेदेवाश्च ये केचित्साध्या देवास्तथैव च । यक्षाणां राक्षसानाञ्च पिशाचानां सहोरगैः
viśvedevāśca ye kecitsādhyā devāstathaiva ca | yakṣāṇāṁ rākṣasānāñca piśācānāṁ sahoragaiḥ
'- और जो कोई विश्वेदेव हैं, साध्यगण भी, यक्षों, राक्षसों और सर्पों सहित पिशाचों के -'
श्लोक 13 (skanda.8.102.13)
गन्धर्वपक्षिणाञ्चैव मनुष्याणाञ्च दानव । उद्युक्तानां समृत्यूनां लोकपालैस्सहैव च
gandharvapakṣiṇāñcaiva manuṣyāṇāñca dānava | udyuktānāṁ samṛtyūnāṁ lokapālaissahaiva ca
'- हे दानव! गन्धर्वों, पक्षियों और मनुष्यों के, मृत्यु सहित युद्ध के लिए उद्यत हुए इन सबके, तथा लोकपालों के भी -'
श्लोक 14 (skanda.8.102.14)
शक्ता निवारणे दैत्या वधे चैव दुरात्मनाम् । निग्रहे च यथाकालं स्वयं मा त्वमितो गमः
śaktā nivāraṇe daityā vadhe caiva durātmanām | nigrahe ca yathākālaṁ svayaṁ mā tvamito gamaḥ
'- रोकने में, उन दुरात्माओं के वध में, तथा समय आने पर उनके दमन में हम दैत्य समर्थ हैं; तुम स्वयं यहाँ से मत जाओ।'
श्लोक 15 (skanda.8.102.15)
हतमस्माभिरुद्युक्तैः पश्याद्य दितिनन्दन । आज्ञापयति नो यत्र राजा स्वामी प्रजेश्वरः
hatamasmābhirudyuktaiḥ paśyādya ditinandana | ājñāpayati no yatra rājā svāmī prajeśvaraḥ
'हे दिति-नन्दन! आज हम उद्यत होकर उसे मारा हुआ देखो; हमारे राजा, स्वामी, प्रजेश्वर जो भी आज्ञा दें -'
श्लोक 16 (skanda.8.102.16)
तद्वयं शिरसा सर्वे करिष्याम न संशयः । यदशक्ता वयं कार्यं सर्वेप्यसुरपुंगव । कर्तुं तस्य भवान् कर्ता मा नः पश्य परानिव
tadvayaṁ śirasā sarve kariṣyāma na saṁśayaḥ | yadaśaktā vayaṁ kāryaṁ sarvepyasurapuṁgava | kartuṁ tasya bhavān kartā mā naḥ paśya parāniva
'- उसे हम सब सिर झुकाकर पूरा करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं। हे असुरपुंगव! यदि यह कार्य करने में हम सब असमर्थ रहें, तभी तुम इसके कर्ता बनना; हमें पराए के समान मत देखो।'
श्लोक 17 (skanda.8.102.17)
मृगार्थे दनुदैत्यानां स्वयं राजा महाबलः । निर्गतो नास्ति दैत्यानां वक्ष्यन्ति बलमित्युत
mṛgārthe danudaityānāṁ svayaṁ rājā mahābalaḥ | nirgato nāsti daityānāṁ vakṣyanti balamityuta
'यदि दनु-दैत्यों का महाबली राजा स्वयं एक मृग के लिए ही युद्ध में निकल पड़े, तो लोग कहेंगे कि दैत्यों में बल है ही नहीं।'
श्लोक 18 (skanda.8.102.18)
सनत्कुमार उवाच । ततः स राजा दैत्यानां सर्वानेव समादिशत् । काले जलधरानिन्द्रो यथा भिन्नाञ्जनत्विषः
sanatkumāra uvāca | tataḥ sa rājā daityānāṁ sarvāneva samādiśat | kāle jaladharānindro yathā bhinnāñjanatviṣaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब उस दैत्यराज ने उन सबको आज्ञा दी, जैसे इन्द्र ऋतु आने पर काजल के समान श्याम मेघों को आज्ञा देता है।
श्लोक 19 (skanda.8.102.19)
आज्ञां तस्य गृहीत्वैव तेपि दैत्या मुदान्विताः । सन्नह्यन्त महाकाया वाहनानि च भेजिरे
ājñāṁ tasya gṛhītvaiva tepi daityā mudānvitāḥ | sannahyanta mahākāyā vāhanāni ca bhejire
उसकी आज्ञा पाकर वे विशालकाय दैत्य भी हर्षित होकर सुसज्जित हुए और अपने-अपने वाहनों पर सवार हुए।
श्लोक 20 (skanda.8.102.20)
प्रह्लादश्चानुह्लादश्च शिनिर्बाष्कल एव च । जम्भः कुजम्भो वातापी इल्वलोथ विरोचनः
prahlādaścānuhlādaśca śinirbāṣkala eva ca | jambhaḥ kujambho vātāpī ilvalotha virocanaḥ
प्रह्लाद, अनुह्लाद, शिनि और बाष्कल; जम्भ, कुजम्भ, वातापि, इल्वल और विरोचन;
श्लोक 21 (skanda.8.102.21)
बलिर्बाणश्च वातश्च शंभुः कश्यप एव च । शम्बरश्च महाकायः कालशम्बर एव च
balirbāṇaśca vātaśca śaṁbhuḥ kaśyapa eva ca | śambaraśca mahākāyaḥ kālaśambara eva ca
बलि, बाण और वात; शम्भु और कश्यप; विशालकाय शम्बर और कालशम्बर;
श्लोक 22 (skanda.8.102.22)
प्रदीप्तश्चासिलोमा च शिलिताश्चैव दानवाः । शरभः शलभश्चैव धुन्धुर्मूकश्च दानवः
pradīptaścāsilomā ca śilitāścaiva dānavāḥ | śarabhaḥ śalabhaścaiva dhundhurmūkaśca dānavaḥ
प्रदीप्त, असिलोमा और दानव शिलित; शरभ, शलभ; धुन्धु और दानव मूक;
श्लोक 23 (skanda.8.102.23)
शतोदरश्च विख्यातस्तथैवान्यो ह्रदोदरः । तारश्च तारकश्चैव मयो कालश्च विश्रुतः
śatodaraśca vikhyātastathaivānyo hradodaraḥ | tāraśca tārakaścaiva mayo kālaśca viśrutaḥ
विख्यात शतोदर, और उसी प्रकार ह्रदोदर; तार और तारक; मय और विख्यात काल;
श्लोक 24 (skanda.8.102.24)
अजको नमुचिश्चैव व्यंसः कार्तस्वनः शुभः । इल्वको विल्वकश्चैव विपाकः पाक एव च
ajako namuciścaiva vyaṁsaḥ kārtasvanaḥ śubhaḥ | ilvako vilvakaścaiva vipākaḥ pāka eva ca
अजक और नमुचि; व्यंस और शुभ कार्तस्वन; इल्वक और विल्वक; विपाक और पाक;
श्लोक 25 (skanda.8.102.25)
हस्ती दुर्योधनश्चैव विप्रचित्तिश्च दानवः । हयग्रीवो मुरश्चैव नरकः कुण्ड एव च
hastī duryodhanaścaiva vipracittiśca dānavaḥ | hayagrīvo muraścaiva narakaḥ kuṇḍa eva ca
हस्ती और दुर्योधन; दानव विप्रचित्ति; हयग्रीव और मुर; नरक और कुण्ड;
श्लोक 26 (skanda.8.102.26)
शकुनिर्वृषपर्वा च शतकेतुर्महारवः । सरकश्चैव राहुश्च स्वर्भानुः काल एव च
śakunirvṛṣaparvā ca śataketurmahāravaḥ | sarakaścaiva rāhuśca svarbhānuḥ kāla eva ca
शकुनि और वृषपर्वा; शतकेतु और महारव; सरक और राहु; स्वर्भानु और काल;
श्लोक 27 (skanda.8.102.27)
विराधश्च कबन्धश्च दुन्दुभिः शतदुन्दुभिः । शाल्वो द्रुमश्च द्वावेतौ मयूरग्रीव एव च
virādhaśca kabandhaśca dundubhiḥ śatadundubhiḥ | śālvo drumaśca dvāvetau mayūragrīva eva ca
विराध और कबन्ध; दुन्दुभि और शतदुन्दुभि; शाल्व और द्रुम - ये दोनों; तथा मयूरग्रीव;
श्लोक 28 (skanda.8.102.28)
कालनेमी मेघनादो महावीर्यस्स चान्धकः । महिषानन्दशमकावाटिश्च बक एव च
kālanemī meghanādo mahāvīryassa cāndhakaḥ | mahiṣānandaśamakāvāṭiśca baka eva ca
कालनेमि, मेघनाद और अत्यन्त पराक्रमी अन्धक; महिष, आनन्द, शमक, वाटि और बक -
श्लोक 29 (skanda.8.102.29)
ततो दानवशार्दूला महामाया महाबलाः । सर्वे सर्वास्त्रविदुषो लब्धलक्षाश्च संयुगे
tato dānavaśārdūlā mahāmāyā mahābalāḥ | sarve sarvāstraviduṣo labdhalakṣāśca saṁyuge
- ये सब दानवों में श्रेष्ठ, महामायावी, महाबली, सम्पूर्ण अस्त्रों के ज्ञाता और युद्ध में लक्ष्य-साधन में निपुण थे।
श्लोक 30 (skanda.8.102.30)
रथैर्हयैर्गजैश्चैव तथैवान्ये पदातयः । जग्मुर्वराहं तं व्यास हन्तुं देवा इवासुरम्
rathairhayairgajaiścaiva tathaivānye padātayaḥ | jagmurvarāhaṁ taṁ vyāsa hantuṁ devā ivāsuram
रथों, घोड़ों और हाथियों से, और उसी प्रकार अन्य पैदल सैनिक, हे व्यास! उस वराह का वध करने चल पड़े, जैसे देवता किसी असुर का वध करने जाते हैं।
श्लोक 31 (skanda.8.102.31)
स चापि हि महातेजा वराहो नन्दिवर्धनः । स्तुयमानस्तथात्मस्थैर्मुनिभिर्भगवान् बली
sa cāpi hi mahātejā varāho nandivardhanaḥ | stuyamānastathātmasthairmunibhirbhagavān balī
और वह भगवान् बलशाली, महातेजस्वी वराह नन्दिवर्धन भी, अपने ही भीतर स्थित मुनियों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ -
श्लोक 32 (skanda.8.102.32)
हत्वा तान् किङ्करान्सर्वानश्मकं पुरमागमत् । गर्जमानो यथा मेघो युगान्ते वृष्टिसर्जनः
hatvā tān kiṅkarānsarvānaśmakaṁ puramāgamat | garjamāno yathā megho yugānte vṛṣṭisarjanaḥ
- उन सभी किंकरों का वध कर, प्रलयकाल में वर्षा करते हुए मेघ के समान गरजता हुआ, अश्मक नगरी में आया।
श्लोक 33 (skanda.8.102.33)
स गत्वा तत्तदा व्यास पुरं लोकमयः प्रभुः । अपसव्यं परावृत्य दक्षिणं द्वारमागमत्
sa gatvā tattadā vyāsa puraṁ lokamayaḥ prabhuḥ | apasavyaṁ parāvṛtya dakṣiṇaṁ dvāramāgamat
हे व्यास! सम्पूर्ण लोकों से बना हुआ वह प्रभु उस नगरी में पहुँचकर, बाईं ओर से मुड़कर दक्षिण द्वार पर पहुँचा।
श्लोक 34 (skanda.8.102.34)
दक्षिणद्वारिभिस्तत्र दानवैर्बहुभिर्भृशम् । कृतो हलाहलाशब्दो नगरं येन कोपितम्
dakṣiṇadvāribhistatra dānavairbahubhirbhṛśam | kṛto halāhalāśabdo nagaraṁ yena kopitam
वहाँ दक्षिण द्वार के अनेक दानव रक्षकों ने घोर 'हलाहल' शब्द किया, जिससे सारा नगर क्षुब्ध हो उठा।
श्लोक 35 (skanda.8.102.35)
यो हि भित्वा शतघ्नीश्च कवाटं कूटमुद्गरान् । कालचक्राणि यन्त्राणि सोवाचूर्णयदव्ययः
yo hi bhitvā śataghnīśca kavāṭaṁ kūṭamudgarān | kālacakrāṇi yantrāṇi sovācūrṇayadavyayaḥ
उस अविनाशी ने शतघ्नियों, द्वार-कपाटों, कूट-मुद्गरों, कालचक्रों और युद्ध-यन्त्रों को तोड़कर उन्हें चूर्ण-चूर्ण कर डाला।
श्लोक 36 (skanda.8.102.36)
अथाजग्मुर्भृशाविष्टास्ते दानवमहारथाः । शस्त्रवर्षेण चोग्रेण छादयन्तो मृगेश्वरम्
athājagmurbhṛśāviṣṭāste dānavamahārathāḥ | śastravarṣeṇa cogreṇa chādayanto mṛgeśvaram
तब वे दानव महारथी अत्यन्त कुपित होकर आगे बढ़े, और भयंकर शस्त्र-वर्षा से उस मृगेश्वर को ढँक दिया।
श्लोक 37 (skanda.8.102.37)
अथ तैस्तोमरैश्चक्रैर्भिन्दीपालैश्च ताडितः । द्वारं त्यक्त्वा विनिर्गम्य समां भूमिमुपाश्रितः
atha taistomaraiścakrairbhindīpālaiśca tāḍitaḥ | dvāraṁ tyaktvā vinirgamya samāṁ bhūmimupāśritaḥ
फिर उनके तोमरों, चक्रों और भिन्दिपालों से आहत होकर, वह द्वार त्यागकर बाहर निकला और समतल भूमि पर जा खड़ा हुआ।
श्लोक 38 (skanda.8.102.38)
तेपि तं भग्नमित्येव विजानन्तोसुरास्तदा । पृष्ठतोनुययुर्व्यास तक्षयन्तो वरायुधैः
tepi taṁ bhagnamityeva vijānantosurāstadā | pṛṣṭhatonuyayurvyāsa takṣayanto varāyudhaiḥ
हे व्यास! उसे भागा हुआ समझकर वे असुर भी तब उसके पीछे-पीछे दौड़े, और अपने श्रेष्ठ आयुधों से उसे काटने लगे।
श्लोक 39 (skanda.8.102.39)
स तक्ष्यमाणः शरवृष्टितोमरैर्महागदाभिर्मुशलैरयोमुखैः । तदाभिनिःसृत्य दितेः सुतानसावयोधयद्देवगणैरधिष्ठितः
sa takṣyamāṇaḥ śaravṛṣṭitomarairmahāgadābhirmuśalairayomukhaiḥ | tadābhiniḥsṛtya diteḥ sutānasāvayodhayaddevagaṇairadhiṣṭhitaḥ
बाणों की वर्षा, तोमरों, विशाल गदाओं और लौह-मुख मूसलों से चीरा जाता हुआ भी वह देवगणों से अधिष्ठित प्रभु उस समय आगे बढ़कर दिति-पुत्रों से युद्ध करने लगा।