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अम्बिका खण्ड · अध्याय 103

वराह-युद्ध

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (skanda.8.103.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ व्यास समां भूमिं संप्राप्तान्दानवर्षभान् । उवाच सर्वान् गम्भीरं मृगान्सिंह इवाजने

sanatkumāra uvāca | atha vyāsa samāṁ bhūmiṁ saṁprāptāndānavarṣabhān | uvāca sarvān gambhīraṁ mṛgānsiṁha ivājane

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब उसने समतल भूमि पर पहुँचे हुए उन दानव-श्रेष्ठों से गम्भीर स्वर में उसी प्रकार कहा, जैसे सिंह खुले मैदान में मृगों से कहता है।

श्लोक 2 (skanda.8.103.2)

भवन्तो दानवाः सर्वे दैत्याश्च सुमहाबलाः । मया मृगेण समरे युध्यतां तु पुनर्भृशम्

bhavanto dānavāḥ sarve daityāśca sumahābalāḥ | mayā mṛgeṇa samare yudhyatāṁ tu punarbhṛśam

'आप सब दानव और अत्यन्त बलशाली दैत्य, मुझ एक मृग के साथ युद्ध में पुनः पूरी शक्ति से लड़ें।'

श्लोक 3 (skanda.8.103.3)

न लज्जा समरेभ्येत्य युष्माकं दानवेश्वराः । अथवा न बलं वोस्ति मिथ्या देवा हि वो जिताः

na lajjā samarebhyetya yuṣmākaṁ dānaveśvarāḥ | athavā na balaṁ vosti mithyā devā hi vo jitāḥ

'हे दानवेश्वरो! क्या इस युद्ध में आकर तुम्हें लज्जा नहीं आती? अथवा तुम में बल ही नहीं है, और तुमने देवताओं को जीता है, यह मिथ्या है।'

श्लोक 4 (skanda.8.103.4)

बहवो बलवन्तश्च मृगश्चाहं वनेचरः । न मन्ये धर्मयुद्धे वो मतिर्दानवसत्तमाः

bahavo balavantaśca mṛgaścāhaṁ vanecaraḥ | na manye dharmayuddhe vo matirdānavasattamāḥ

'तुम बहुत हो और बलवान् भी, और मैं तो वनचारी मृग हूँ; हे दानवश्रेष्ठो! मुझे नहीं लगता कि तुम्हारा मन धर्मयुद्ध में है।'

श्लोक 5 (skanda.8.103.5)

न ममास्ति धनुः किञ्चिन्न शस्त्रं च तथाविधम् । सशस्त्रैर्बहुभिर्येन युद्धेयमसुरेश्वराः

na mamāsti dhanuḥ kiñcinna śastraṁ ca tathāvidham | saśastrairbahubhiryena yuddheyamasureśvarāḥ

'हे असुरेश्वरो! मेरे पास कोई धनुष नहीं है, न वैसा कोई शस्त्र है, जिससे मैं शस्त्रधारी तुम अनेकों से युद्ध कर सकूँ।'

श्लोक 6 (skanda.8.103.6)

ते यूयं यदि मन्यध्वं शस्त्राणि त्यजताधुना । मया चैकैकशः सर्वे युध्यध्वं न्यायमास्थिताः

te yūyaṁ yadi manyadhvaṁ śastrāṇi tyajatādhunā | mayā caikaikaśaḥ sarve yudhyadhvaṁ nyāyamāsthitāḥ

'यदि तुम्हें उचित लगे तो अभी अपने शस्त्र त्याग दो, और न्याय का पालन करते हुए तुम सब एक-एक कर मुझसे युद्ध करो।'

श्लोक 7 (skanda.8.103.7)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सोन्धको दानवेश्वरः । उवाच सर्वान्दैत्येन्द्रान् युगान्ताम्बुदवन्नदन्

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā sondhako dānaveśvaraḥ | uvāca sarvāndaityendrān yugāntāmbudavannadan

सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर दानवेश्वर अन्धक ने प्रलयकालीन मेघ के समान गरजते हुए समस्त दैत्येन्द्रों से कहा -

श्लोक 8 (skanda.8.103.8)

एवमेतद्यथाहायं मृगोसुरमहारथाः । सन्त्यजामाद्य शस्त्राणि योधामैकैकशस्तथा

evametadyathāhāyaṁ mṛgosuramahārathāḥ | santyajāmādya śastrāṇi yodhāmaikaikaśastathā

'हे असुर-महारथियो! जैसा यह मृग कह रहा है, वैसा ही हो; आज हम शस्त्र त्यागकर एक-एक कर युद्ध करेंगे।'

श्लोक 9 (skanda.8.103.9)

प्रह्लाद उवाच । अबुद्धिरेषा दैत्येन्द्रा यथाहायं मृगाधमः । समानानां समैस्सार्धमेतद्युद्धं प्रशस्यते

prahlāda uvāca | abuddhireṣā daityendrā yathāhāyaṁ mṛgādhamaḥ | samānānāṁ samaissārdhametadyuddhaṁ praśasyate

प्रह्लाद ने कहा - हे दैत्येन्द्रो! यह अज्ञानता है, जैसा इस अधम मृग ने कहा है। युद्ध तो समानों का समानों के साथ ही प्रशस्त माना जाता है।

श्लोक 10 (skanda.8.103.10)

न मृगाणाञ्च शस्त्राणि न बाहुबलमित्युत । वध्यन्ते च सदा शस्त्रैरेष धर्मः सतां मतः

na mṛgāṇāñca śastrāṇi na bāhubalamityuta | vadhyante ca sadā śastraireṣa dharmaḥ satāṁ mataḥ

'मृगों के पास न शस्त्र होते हैं, न भुजबल; वे सदा शस्त्रों से ही मारे जाते हैं - यही सज्जनों का मत, यही धर्म है।'

श्लोक 11 (skanda.8.103.11)

ते वयं कथमुत्मृज्य स्वधर्मं दानवेश्वराः । मृगधर्मं समास्थाय युध्येम पशवो यथा

te vayaṁ kathamutmṛjya svadharmaṁ dānaveśvarāḥ | mṛgadharmaṁ samāsthāya yudhyema paśavo yathā

'हे दानवेश्वरो! हम अपने धर्म को त्यागकर, मृग-धर्म का अवलम्बन कर, पशुओं के समान कैसे युद्ध कर सकते हैं?'

श्लोक 12 (skanda.8.103.12)

मृगाधमोयं दुर्वृत्त अवध्यो नास्मदादिभिः । मा विचारो वो मृगे भवतु सर्वशः

mṛgādhamoyaṁ durvṛtta avadhyo nāsmadādibhiḥ | mā vicāro vo mṛge bhavatu sarvaśaḥ

'यह दुष्ट-आचरण वाला अधम मृग हम जैसों के द्वारा वध्य नहीं है' - (इस पंक्ति का कुछ अंश मूल में अप्राप्त है) - 'इस मृग के विषय में तुम्हें अब कोई विचार नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 13 (skanda.8.103.13)

मायामास्थाय दुष्टात्मा कोप्ययं सुरपांसनः । अस्मान् वञ्चयितुं दैत्याः कांक्षते सुदुरात्मवान्

māyāmāsthāya duṣṭātmā kopyayaṁ surapāṁsanaḥ | asmān vañcayituṁ daityāḥ kāṁkṣate sudurātmavān

'हे दैत्यो! देवताओं का यह कलंक, दुष्ट आत्मा, अत्यन्त दुरात्मा, माया का सहारा लेकर हमें छलने की इच्छा रखता है।'

श्लोक 14 (skanda.8.103.14)

क्व च श्रुतं वा दृष्टं वा मृगाणामसुरेश्वराः । मनुष्यवद्बाहुयुद्धं पुरुषैस्सह संयुगे

kva ca śrutaṁ vā dṛṣṭaṁ vā mṛgāṇāmasureśvarāḥ | manuṣyavadbāhuyuddhaṁ puruṣaissaha saṁyuge

'हे असुरेश्वरो! भला कहाँ सुना या देखा गया है कि मृग मनुष्यों की भाँति पुरुषों के साथ युद्ध में भुजयुद्ध करें?'

श्लोक 15 (skanda.8.103.15)

एष विष्णुर्दुराचारो दुरात्मा दैत्यकण्टकः । अशक्तः स्वेन वीर्येण मायामास्थाय संस्थितः

eṣa viṣṇurdurācāro durātmā daityakaṇṭakaḥ | aśaktaḥ svena vīryeṇa māyāmāsthāya saṁsthitaḥ

'यह तो वही दुराचारी, दुरात्मा, दैत्यों का कंटक विष्णु है; अपने बल से असमर्थ होने के कारण माया का सहारा लेकर यहाँ खड़ा है।'

श्लोक 16 (skanda.8.103.16)

सनत्कुमार उवाच । ततस्तं बलवान् क्रुद्धो धनुषा सोसुरेश्वरः । शरैरवाकिरद् व्यास बहुभिर्विररास च

sanatkumāra uvāca | tatastaṁ balavān kruddho dhanuṣā sosureśvaraḥ | śarairavākirad vyāsa bahubhirvirarāsa ca

सनत्कुमार ने कहा - तब उस बलशाली असुरेश्वर ने क्रुद्ध होकर धनुष से, हे व्यास! उसे अनेक बाणों से ढँक दिया और गर्जना की।

श्लोक 17 (skanda.8.103.17)

अन्धको विप्रचित्तिश्च सर्वे ते दैत्यदानवाः । अवाकिरन् शरैस्तीक्ष्णैः शतशोथ सहस्रशः

andhako vipracittiśca sarve te daityadānavāḥ | avākiran śaraistīkṣṇaiḥ śataśotha sahasraśaḥ

अन्धक, विप्रचित्ति और वे समस्त दैत्य-दानव भी उसे तीक्ष्ण बाणों से सैकड़ों-हजारों की संख्या में ढँकने लगे।

श्लोक 18 (skanda.8.103.18)

अथ दैवः सुसंरब्धैर्विद्धस्तैर्दानवैर्भृशम् । शुशुभे भास्करकरैः संविद्धो हिमवानिव

atha daivaḥ susaṁrabdhairviddhastairdānavairbhṛśam | śuśubhe bhāskarakaraiḥ saṁviddho himavāniva

तब उन अत्यन्त कुपित दानवों के द्वारा घोर रूप से बींधा जाता हुआ वह देव, सूर्य-किरणों से आच्छादित हिमालय के समान शोभित हुआ।

श्लोक 19 (skanda.8.103.19)

स वेगं बलवत् कृत्वा विधुन्वानः शरान् शितान् । सलीलं प्रययौ देवः प्रह्लादं प्रति दानवम्

sa vegaṁ balavat kṛtvā vidhunvānaḥ śarān śitān | salīlaṁ prayayau devaḥ prahlādaṁ prati dānavam

अत्यन्त वेग धारण कर, तीक्ष्ण बाणों को झटकते हुए, वह देव सहजता से दानव प्रह्लाद की ओर बढ़ा।

श्लोक 20 (skanda.8.103.20)

स गत्वा तस्य सहसा सारथिं रथमेव च । दंष्ट्राभिश्च कराभ्याञ्च नामशेषं चकार ह

sa gatvā tasya sahasā sārathiṁ rathameva ca | daṁṣṭrābhiśca karābhyāñca nāmaśeṣaṁ cakāra ha

वहाँ पहुँचकर उसने सहसा अपने दाढ़ों और हाथों से उसके सारथि और रथ को नाममात्र शेष कर डाला।

श्लोक 21 (skanda.8.103.21)

ततो रथादवप्लुत्य हन्यमानोपि दानवैः । रथध्वजेन तं दैत्यं मूर्ध्नि देवोभिजघ्निवान्

tato rathādavaplutya hanyamānopi dānavaiḥ | rathadhvajena taṁ daityaṁ mūrdhni devobhijaghnivān

फिर रथ से कूदकर, दानवों द्वारा आहत होते हुए भी, उस देव ने रथ की ध्वजा-दण्ड से ही उस दैत्य के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 22 (skanda.8.103.22)

प्रह्लादोपि ततोत्पत्य गदया भीमरूपया । आजघानोरसि क्रुद्धं विघ्नो धर्मे यथा स्थितम्

prahlādopi tatotpatya gadayā bhīmarūpayā | ājaghānorasi kruddhaṁ vighno dharme yathā sthitam

प्रह्लाद ने भी उछलकर अपनी भयंकर गदा से, धर्म के मार्ग में खड़े विघ्न के समान, उस क्रुद्ध देव की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 23 (skanda.8.103.23)

स तेनाभिहतो देवो मुक्त्वा तस्य रथं तदा । तमेव देशमायातः पूर्वं यत्राभवत् स्थितः

sa tenābhihato devo muktvā tasya rathaṁ tadā | tameva deśamāyātaḥ pūrvaṁ yatrābhavat sthitaḥ

उससे आहत होकर वह देव उसका रथ छोड़कर उसी स्थान पर लौट आया, जहाँ वह पहले खड़ा था।

श्लोक 24 (skanda.8.103.24)

ततोन्धको विप्रचित्तिः शम्बरः कालशम्बरः । शरैराशीविषाकारैर्बिभिदुर्नन्दिवर्धनम्

tatondhako vipracittiḥ śambaraḥ kālaśambaraḥ | śarairāśīviṣākārairbibhidurnandivardhanam

फिर अन्धक, विप्रचित्ति, शम्बर और कालशम्बर ने सर्पों के समान भयंकर बाणों से नन्दिवर्धन को बींध डाला।

श्लोक 25 (skanda.8.103.25)

स विद्धस्तैस्तदा व्यास शरैः सन्नतपर्वभिः । भिद्यमानश्च बहुधा मण्डलानि चचार ह

sa viddhastaistadā vyāsa śaraiḥ sannataparvabhiḥ | bhidyamānaśca bahudhā maṇḍalāni cacāra ha

हे व्यास! उनके सीधे-पोर वाले बाणों से बींधा जाकर और अनेक स्थानों पर घायल होकर वह चक्राकार गति में घूमने लगा।

श्लोक 26 (skanda.8.103.26)

कदाचित् सिंहवच्चापि प्लवते नर्दतेपि च । शार्दूलवत् कदाचिच्च भूमावात्मानमाहवे

kadācit siṁhavaccāpi plavate nardatepi ca | śārdūlavat kadācicca bhūmāvātmānamāhave

कभी वह सिंह के समान उछलता और गरजता, और कभी उस युद्ध में व्याघ्र के समान भूमि पर स्वयं को झोंक देता।

श्लोक 27 (skanda.8.103.27)

वितत्य स महावीर्यस्तिष्ठते सायकान् सहन् । पादेन तत उत्थाय अवकीर्य वृषो यथा

vitatya sa mahāvīryastiṣṭhate sāyakān sahan | pādena tata utthāya avakīrya vṛṣo yathā

वह महापराक्रमी अपने अंगों को फैलाकर बाणों को सहते हुए खड़ा रहता, फिर पैरों से उठकर, बैल के समान भूमि को कुरेदता।

श्लोक 28 (skanda.8.103.28)

पक्षिवत्स तदाकाशे मण्डलानि मृगेश्वरः । भ्रमित्वा निश्चलस्तस्थौ वराहः पर्वतो यथा

pakṣivatsa tadākāśe maṇḍalāni mṛgeśvaraḥ | bhramitvā niścalastasthau varāhaḥ parvato yathā

उस समय वह मृगेश्वर पक्षी के समान आकाश में मण्डलाकार घूमकर, फिर पर्वत के समान निश्चल होकर खड़ा हो गया।

श्लोक 29 (skanda.8.103.29)

एवं बहुविधान् मार्गान् विचरित्वा महाबलः । वेगेनैव कराभ्यां स रथौ जग्राह नादयन्

evaṁ bahuvidhān mārgān vicaritvā mahābalaḥ | vegenaiva karābhyāṁ sa rathau jagrāha nādayan

इस प्रकार अनेक प्रकार की चालों से विचरण करके, उस महाबली ने वेगपूर्वक अपने दोनों हाथों से दो रथों को गर्जते हुए पकड़ लिया,

श्लोक 30 (skanda.8.103.30)

विप्रचित्तेश्च बलवानन्धकस्य च सुप्रभः । भ्रामयित्वा मुहूर्त्तं तौ सहाश्वैः सहसारथी

vipracitteśca balavānandhakasya ca suprabhaḥ | bhrāmayitvā muhūrttaṁ tau sahāśvaiḥ sahasārathī

- विप्रचित्ति और अन्धक के [रथों को], और उस बलशाली तेजस्वी ने उन दोनों को उनके घोड़ों और सारथियों सहित क्षणभर घुमाकर,

श्लोक 31 (skanda.8.103.31)

भूमावुत्क्षिप्य चिक्षेप बभञ्ज च पुनः पदा । रथास्थितौ च तौ दैत्यौ पुनर्मूर्धन्यताडयत्

bhūmāvutkṣipya cikṣepa babhañja ca punaḥ padā | rathāsthitau ca tau daityau punarmūrdhanyatāḍayat

उन्हें ऊपर उठाकर भूमि पर पटक दिया और पैर से पुनः तोड़ डाला; और रथों पर बैठे रहे उन दोनों दैत्यों के सिरों पर पुनः प्रहार किया।

श्लोक 32 (skanda.8.103.32)

तौ हतावतिसंक्रुद्धौ गदे चोद्यम्य वेगितौ । वराहं मूर्ध्नि युगपत्समाहत्य विनेदतुः

tau hatāvatisaṁkruddhau gade codyamya vegitau | varāhaṁ mūrdhni yugapatsamāhatya vinedatuḥ

इस प्रकार आहत होकर वे दोनों अत्यन्त क्रुद्ध हुए, और अपनी-अपनी गदाएँ वेगपूर्वक उठाकर, एक साथ वराह के सिर पर प्रहार कर गरज उठे।

श्लोक 33 (skanda.8.103.33)

ताभ्यां स बलवान् क्रुद्धो हस्ताभ्यां रक्तलोचनः । गदे जग्राह यत्ताभ्यां बलादेव मृगेश्वरः

tābhyāṁ sa balavān kruddho hastābhyāṁ raktalocanaḥ | gade jagrāha yattābhyāṁ balādeva mṛgeśvaraḥ

इससे क्रुद्ध हुए उस बलशाली, रक्त-नेत्र मृगेश्वर ने सावधान होकर बलपूर्वक ही अपने दोनों हाथों से उनकी दोनों गदाएँ छीन लीं।

श्लोक 34 (skanda.8.103.34)

ततोचरन्मण्डलानि विविधानि जनार्दनः । गदाविशारदः सम्यग् विचित्राणि बहून्यपि

tatocaranmaṇḍalāni vividhāni janārdanaḥ | gadāviśāradaḥ samyag vicitrāṇi bahūnyapi

फिर गदायुद्ध में निपुण जनार्दन नाना प्रकार के, अनेक विचित्र मण्डलों में भलीभाँति घूमने लगे,

श्लोक 35 (skanda.8.103.35)

आक्षिप्तमथ विक्षिप्तमवाक्षिप्तञ्च मण्डलम् । उत्क्षिप्तमथ विक्षिप्तं विसृष्टं धावितं तथा

ākṣiptamatha vikṣiptamavākṣiptañca maṇḍalam | utkṣiptamatha vikṣiptaṁ visṛṣṭaṁ dhāvitaṁ tathā

'आक्षिप्त', फिर 'विक्षिप्त' और 'अवाक्षिप्त' मण्डल; 'उत्क्षिप्त', फिर 'विक्षिप्त', 'विसृष्ट' और उसी प्रकार 'धावित' -

श्लोक 36 (skanda.8.103.36)

परावृत्तं निवृत्तं च अर्धचन्द्रमथापि च । विष्टब्धं चोद्यतञ्चैव हंसोद्भ्रमितमेव च

parāvṛttaṁ nivṛttaṁ ca ardhacandramathāpi ca | viṣṭabdhaṁ codyatañcaiva haṁsodbhramitameva ca

- 'परावृत्त', 'निवृत्त', तथा 'अर्धचन्द्र'; 'विष्टब्ध', 'उद्यत', और उसी प्रकार 'हंसोद्भ्रमित' [गदा-मण्डल] -

श्लोक 37 (skanda.8.103.37)

गदाविशारदः सम्यग् भ्रमित्वा मण्डलानि सः । गदामुपरि चिक्षेप सोन्धकस्य विनादयन्

gadāviśāradaḥ samyag bhramitvā maṇḍalāni saḥ | gadāmupari cikṣepa sondhakasya vinādayan

- इन सब मण्डलों में भलीभाँति घूमकर, गदायुद्ध में निपुण उस [देव] ने गर्जते हुए अन्धक के ऊपर अपनी गदा फेंकी।

श्लोक 38 (skanda.8.103.38)

अपरां विप्रचित्तेश्च बलवान्नन्दिवर्धनः । ते गदे तौ महावेगे दानवौ सुदुरासदौ

aparāṁ vipracitteśca balavānnandivardhanaḥ | te gade tau mahāvege dānavau sudurāsadau

और उस बलशाली नन्दिवर्धन ने दूसरी गदा विप्रचित्ति पर फेंकी; वे दोनों अत्यन्त वेगवती गदाएँ उन दोनों दुर्जेय दानवों पर पड़ीं।

श्लोक 39 (skanda.8.103.39)

वञ्चयित्वा रणे भूयो वराहं प्रति दानवौ । आधावितौ यथा देशमुत्पातौ वेगिताविव

vañcayitvā raṇe bhūyo varāhaṁ prati dānavau | ādhāvitau yathā deśamutpātau vegitāviva

किन्तु उस प्रहार से बचकर वे दोनों दानव युद्ध में फिर उस वराह की ओर उसी प्रकार दौड़ पड़े, जैसे दो वेगवान् उत्पात अपने लक्ष्य की ओर दौड़ते हैं।

श्लोक 40 (skanda.8.103.40)

तयोरापततोरेव वराहोसौ महाबलः । मुष्टिनान्धकमाहत्य विप्रचित्तिं पदावधीत्

tayorāpatatoreva varāhosau mahābalaḥ | muṣṭināndhakamāhatya vipracittiṁ padāvadhīt

उन दोनों के आक्रमण करते ही, उस महाबली वराह ने मुट्ठी से अन्धक पर प्रहार किया और पैर से विप्रचित्ति को मार गिराया।

श्लोक 41 (skanda.8.103.41)

अन्धकस्तस्य मुष्टिं तं विप्रचित्तिः पदञ्च ह । क्रुद्धौ जगृहतुर्दैत्यौ हतस्त्वमिति वादिनौ

andhakastasya muṣṭiṁ taṁ vipracittiḥ padañca ha | kruddhau jagṛhaturdaityau hatastvamiti vādinau

क्रुद्ध होकर अन्धक ने उसकी उस मुट्ठी को और विप्रचित्ति ने उसके पैर को पकड़ लिया, और दोनों दैत्य 'तू मारा गया' यह कहते हुए -

श्लोक 42 (skanda.8.103.42)

नादयानौ यथा काले कृष्णाविव बलाहकौ । स गृहीतस्तदा ताभ्यां महात्मा सुरसत्तमः

nādayānau yathā kāle kṛṣṇāviva balāhakau | sa gṛhītastadā tābhyāṁ mahātmā surasattamaḥ

- वर्षाकाल के दो काले मेघों के समान गरज उठे। तब उन दोनों के द्वारा पकड़े जाने पर वह महात्मा, देवताओं में श्रेष्ठ,

श्लोक 43 (skanda.8.103.43)

उत्पपात वियद् वेगात् पक्षिराडिव काश्यपः । वियत्स्थो विबभौ दैत्यावुद्वहन् स मृगेश्वरः

utpapāta viyad vegāt pakṣirāḍiva kāśyapaḥ | viyatstho vibabhau daityāvudvahan sa mṛgeśvaraḥ

काश्यप-पुत्र पक्षिराज (गरुड़) के समान वेग से आकाश में उड़ गया; आकाश में स्थित वह मृगेश्वर उन दोनों दैत्यों को धारण किए हुए शोभित हुआ।

श्लोक 44 (skanda.8.103.44)

गरुत्मानिव पक्षीशो भक्षार्थं गजकच्छपौ । विनद्य स तदाकाशे विधूय च करौ बली

garutmāniva pakṣīśo bhakṣārthaṁ gajakacchapau | vinadya sa tadākāśe vidhūya ca karau balī

जैसे पक्षीराज गरुड़ भक्षण के लिए हाथी और कछुए को उठाए ले जाता है, वैसे ही वह बलशाली आकाश में गर्जना कर, अपने दोनों हाथों को झटककर -

श्लोक 45 (skanda.8.103.45)

पादञ्चैवाभिचिक्षेप तौ दैत्यौ भुजगाविव । तौ क्षिप्तौ प्रेक्ष्य तु व्यास दानवौ युद्धदुर्मदौ

pādañcaivābhicikṣepa tau daityau bhujagāviva | tau kṣiptau prekṣya tu vyāsa dānavau yuddhadurmadau

- और अपने पैर को भी झटककर, उन दोनों दैत्यों को सर्पों के समान फेंक दिया। हे व्यास! युद्ध में मदमत्त उन दोनों दानवों को इस प्रकार फेंका गया देखकर -

श्लोक 46 (skanda.8.103.46)

अभियातौ महीं घोरावशनी खाच्च्युताविव । असावपि च देवेशो वराहो नन्दिवर्धनः । रथान्वै सर्वदैत्यानां चूर्णयामास वीर्यवान्

abhiyātau mahīṁ ghorāvaśanī khāccyutāviva | asāvapi ca deveśo varāho nandivardhanaḥ | rathānvai sarvadaityānāṁ cūrṇayāmāsa vīryavān

- वे दोनों आकाश से गिरे हुए भयंकर वज्रों के समान पृथ्वी पर आ गिरे। और उस वीर्यवान् देवेश्वर वराह नन्दिवर्धन ने समस्त दैत्यों के रथों को भी चूर्ण-चूर्ण कर डाला।

श्लोक 47 (skanda.8.103.47)

गृहीत्वा कूबरे कञ्चित् सोच्चिक्षेप महार्णवे । कञ्चित्पदा समाहत्य पांसुसायुज्यमानयत्

gṛhītvā kūbare kañcit soccikṣepa mahārṇave | kañcitpadā samāhatya pāṁsusāyujyamānayat

किसी को रथ के जुए से पकड़कर उसने महासागर में फेंक दिया, और किसी को पैर से मारकर धूल में मिला दिया।

श्लोक 48 (skanda.8.103.48)

कञ्चिद्रथं रथेनैव पदातिञ्च पदातिना । गजं गजेन चाहत्य स निन्ये यमसादनम्

kañcidrathaṁ rathenaiva padātiñca padātinā | gajaṁ gajena cāhatya sa ninye yamasādanam

किसी को रथ से ही रथ मरवाकर, किसी पैदल को पैदल से, और किसी हाथी को हाथी से टकराकर, उसने उन्हें यम के धाम पहुँचा दिया।

श्लोक 49 (skanda.8.103.49)

सनत्कुमार उवाच । तेपि विद्राविताः सर्वे लज्जां परमिकां गताः । दैत्यदानवशार्दूला विनिवृत्ता यथाबलाः

sanatkumāra uvāca | tepi vidrāvitāḥ sarve lajjāṁ paramikāṁ gatāḥ | daityadānavaśārdūlā vinivṛttā yathābalāḥ

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार भगाए गए वे समस्त दैत्य-दानव-श्रेष्ठ भी, अत्यन्त लज्जा से युक्त होकर, अपनी-अपनी शेष शक्ति के अनुसार पीछे लौट गए।

श्लोक 50 (skanda.8.103.50)

एकेन सर्वे विजितासुरेन्द्राः परस्परं वीक्ष्य मुखानि शूराः । व्रीडान्वितास्ते पुनरेव देवं वराह

ekena sarve vijitāsurendrāḥ parasparaṁ vīkṣya mukhāni śūrāḥ | vrīḍānvitāste punareva devaṁ varāha

उस एक ही के द्वारा पराजित हुए सब असुरेन्द्र वीर एक-दूसरे का मुख देखकर, लज्जा से भर उठे, और पुनः उस वराह देव की ओर [उन्मुख हुए] - (इस श्लोक का शेष भाग मूल में अप्राप्त है)।

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