अम्बिका खण्ड · अध्याय 104
विप्रचित्ति-पातन
श्लोक 1 (skanda.8.104.1)
सनत्कुमार उवाच । अथ ते तं मृगं व्यास दानवा भीमगर्जनाः । आयुधैः समभिक्रुद्धाः संततक्षुस्तदा भृशम्
sanatkumāra uvāca | atha te taṁ mṛgaṁ vyāsa dānavā bhīmagarjanāḥ | āyudhaiḥ samabhikruddhāḥ saṁtatakṣustadā bhṛśam
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब भयंकर गर्जना करने वाले वे दानव अत्यन्त क्रुद्ध होकर, अपने आयुधों से उस मृग पर घोर प्रहार करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.104.2)
ते मृगा इव शार्दूलं सिंहपोतं गजा इव । आजघ्नुर्दानवाः क्रुद्धा वराहं शस्त्रवृष्टिभिः
te mṛgā iva śārdūlaṁ siṁhapotaṁ gajā iva | ājaghnurdānavāḥ kruddhā varāhaṁ śastravṛṣṭibhiḥ
जैसे मृग व्याघ्र पर और हाथी सिंह-शावक पर टूट पड़ें, वैसे ही उन क्रुद्ध दानवों ने शस्त्र-वर्षा से वराह पर प्रहार किया।
श्लोक 3 (skanda.8.104.3)
स चापि मृगशार्दूल उपविश्य महोदधिम् । अपोपिबत् समाविश्य वह्निवद्वडवामुखम्
sa cāpi mṛgaśārdūla upaviśya mahodadhim | apopibat samāviśya vahnivadvaḍavāmukham
वह मृगों में श्रेष्ठ भी महासागर पर बैठकर, वडवाग्नि के समान उसमें प्रवेश कर, उसके जल को पीने लगा।
श्लोक 4 (skanda.8.104.4)
तथेरितानि तैर्दैत्यैरायुधानि सहस्रशः । व्यादाय सुमहद्वक्त्रं जग्रास च ररास च
tatheritāni tairdaityairāyudhāni sahasraśaḥ | vyādāya sumahadvaktraṁ jagrāsa ca rarāsa ca
और उन दैत्यों द्वारा हजारों की संख्या में फेंके गए आयुधों को भी अपना विशाल मुख फैलाकर निगल गया, और गर्जना की।
श्लोक 5 (skanda.8.104.5)
ग्रसित्वा तानि सर्वाणि शस्त्राणि स महाबलः । दानवान्प्रति संचक्रे वेगं सिन्धुरिवापरः
grasitvā tāni sarvāṇi śastrāṇi sa mahābalaḥ | dānavānprati saṁcakre vegaṁ sindhurivāparaḥ
उन समस्त शस्त्रों को निगलकर उस महाबली ने दानवों की ओर उसी वेग से आक्रमण किया, जैसे कोई दूसरा समुद्र उमड़ पड़ता है।
श्लोक 6 (skanda.8.104.6)
गजान्प्रति यथा सिंहः सिंहान् शरभराडिव । गरुत्मान् भुजगान् यद्वच्छार्दूलश्च मृगानिव
gajānprati yathā siṁhaḥ siṁhān śarabharāḍiva | garutmān bhujagān yadvacchārdūlaśca mṛgāniva
जैसे हाथियों पर सिंह, सिंहों पर शरभराज, सर्पों पर गरुड़, और मृगों पर व्याघ्र [आक्रमण करता है],
श्लोक 7 (skanda.8.104.7)
मेघवृन्दं यथा वायुः कपोतानिव पक्षिराट् । तथा स भगवान् व्यास दानवान्प्रति लोकपः
meghavṛndaṁ yathā vāyuḥ kapotāniva pakṣirāṭ | tathā sa bhagavān vyāsa dānavānprati lokapaḥ
जैसे वायु मेघ-समूह पर और पक्षिराज कबूतरों पर टूट पड़ता है, हे व्यास! उसी प्रकार उस भगवान् लोकपाल ने दानवों पर आक्रमण किया।
श्लोक 8 (skanda.8.104.8)
वेगं चक्रे यथा क्षिप्रमिन्द्रियं प्रति वै मनः । आसाद्य च स तान्दैत्यान् महाजलदनिःस्वनः
vegaṁ cakre yathā kṣipramindriyaṁ prati vai manaḥ | āsādya ca sa tāndaityān mahājaladaniḥsvanaḥ
उसने अपना वेग उतनी ही तीव्रता से किया जितनी तीव्रता से मन इन्द्रियों की ओर दौड़ता है; और मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले उसने उन दैत्यों के पास पहुँचकर -
श्लोक 9 (skanda.8.104.9)
सर्वान् विद्रावयामास रुद्रः पशुगणानिव । कांश्चित् पद्भ्यां सुसंक्रुद्धो हस्ताभ्यामपरानिति
sarvān vidrāvayāmāsa rudraḥ paśugaṇāniva | kāṁścit padbhyāṁ susaṁkruddho hastābhyāmaparāniti
(इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूल में अप्राप्त है) - जैसे रुद्र पशुओं के झुण्ड को भगा देते हैं, वैसे ही उसने उन सबको भगा दिया; अत्यन्त क्रुद्ध होकर किन्हीं को पैरों से, किन्हीं को हाथों से,
श्लोक 10 (skanda.8.104.10)
दंष्ट्राभिश्चापरांस्तत्र स प्रैषीद्यमसादनम् । तुण्डेन शम्बरं भूमौ कालशम्बरमेव च
daṁṣṭrābhiścāparāṁstatra sa praiṣīdyamasādanam | tuṇḍena śambaraṁ bhūmau kālaśambarameva ca
और अन्य कितनों को अपनी दाढ़ों से, उसने उन्हें यम के धाम भेज दिया; अपने थूथन से उसने शम्बर को और कालशम्बर को भी भूमि पर गिरा दिया,
श्लोक 11 (skanda.8.104.11)
नरकं पादघातेन हयग्रीवं च मुष्टिना । उरसा नमुचिं चापि महामायं च सत्वरः
narakaṁ pādaghātena hayagrīvaṁ ca muṣṭinā | urasā namuciṁ cāpi mahāmāyaṁ ca satvaraḥ
पैर की चोट से नरक को, और मुट्ठी से हयग्रीव को; और वेगपूर्वक छाती से नमुचि और महामाय को भी [गिरा दिया],
श्लोक 12 (skanda.8.104.12)
आहत्याहत्य संक्रुद्धः पातयामास देवपः । तांस्तथा द्रावयानञ्च गर्जमानञ्च सिंहवत्
āhatyāhatya saṁkruddhaḥ pātayāmāsa devapaḥ | tāṁstathā drāvayānañca garjamānañca siṁhavat
बार-बार प्रहार करते हुए, क्रुद्ध होकर उस देवरक्षक ने उन्हें गिरा दिया, इस प्रकार उन्हें भगाते हुए और सिंह के समान गर्जना करते हुए।
श्लोक 13 (skanda.8.104.13)
विप्रचितिर्वराहं तं मुष्टिनोरस्यताडयत् । विप्रचित्तिं जघानोग्रं पार्श्वदेशे स मुष्टिना
vipracitirvarāhaṁ taṁ muṣṭinorasyatāḍayat | vipracittiṁ jaghānograṁ pārśvadeśe sa muṣṭinā
विप्रचित्ति ने उस वराह की छाती पर मुट्ठी से प्रहार किया; उस भयंकर वराह ने भी विप्रचित्ति की कोख पर मुट्ठी से प्रहार किया।
श्लोक 14 (skanda.8.104.14)
स आहतो वराहेण वराहं क्रोधमूर्छितः । पुनर्जघान खङ्गेन वक्षस्येनं विनादयन्
sa āhato varāheṇa varāhaṁ krodhamūrchitaḥ | punarjaghāna khaṅgena vakṣasyenaṁ vinādayan
वराह से आहत होकर वह क्रोध से अचेत हो उठा, और गर्जना करते हुए फिर खड्ग से उस वराह की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 15 (skanda.8.104.15)
अमृष्यमाणस्तं घातं वराहः सुमहाबलः । मुष्टिना मूर्ध्नि तं दैत्यं वज्राभेन व्यताडयत्
amṛṣyamāṇastaṁ ghātaṁ varāhaḥ sumahābalaḥ | muṣṭinā mūrdhni taṁ daityaṁ vajrābhena vyatāḍayat
उस प्रहार को सहन न करते हुए, अत्यन्त बलशाली वराह ने वज्र के समान अपनी मुट्ठी से उस दैत्य के सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 16 (skanda.8.104.16)
स दैत्यस्तेन घातेन भ्रमित्वा चक्रवत्तदा । पपात भूमौ वेगेन वाताहत इव द्रुमः
sa daityastena ghātena bhramitvā cakravattadā | papāta bhūmau vegena vātāhata iva drumaḥ
उस प्रहार से वह दैत्य चक्र के समान घूमकर उसी क्षण वायु से आहत वृक्ष के समान वेगपूर्वक भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 17 (skanda.8.104.17)
पतितं तं तदाभ्येत्य विप्रचित्तिं प्रजेश्वरः । जग्राह पद्भ्यां देवेशो द्रावमाणं दितेः सुतम्
patitaṁ taṁ tadābhyetya vipracittiṁ prajeśvaraḥ | jagrāha padbhyāṁ deveśo drāvamāṇaṁ diteḥ sutam
फिर उस प्रजेश्वर देवेश ने गिरे हुए विप्रचित्ति के पास जाकर, भागने का प्रयत्न करते उस दिति-पुत्र को पैरों से पकड़ लिया।
श्लोक 18 (skanda.8.104.18)
भ्रामयित्वा ततश्चैनं नदित्वा चासकृद्बली । पुरं प्रति विचिक्षेप महात्मा नन्दिवर्धनः
bhrāmayitvā tataścainaṁ naditvā cāsakṛdbalī | puraṁ prati vicikṣepa mahātmā nandivardhanaḥ
फिर उसे घुमाकर, बार-बार गर्जना करते हुए, उस बलशाली महात्मा नन्दिवर्धन ने उसे नगर की ओर फेंक दिया।
श्लोक 19 (skanda.8.104.19)
स क्षिप्तस्तेन विबभौ दानबाधिपतिर्बली । सबलाकतडिज्ज्वाल परिच्छिन्न इवाम्बुदः
sa kṣiptastena vibabhau dānabādhipatirbalī | sabalākataḍijjvāla paricchinna ivāmbudaḥ
उसके द्वारा फेंका गया वह बलशाली दानवाधिपति उसी प्रकार शोभित हुआ, जैसे बगुलों और बिजली की चमक से युक्त कोई खण्डित मेघ।
श्लोक 20 (skanda.8.104.20)
स्रस्तहाराम्बरधरश्च्युतमाल्यविभूषणः । पपातोपरि वेगेन हिरण्याक्षस्य वेश्मनि
srastahārāmbaradharaścyutamālyavibhūṣaṇaḥ | papātopari vegena hiraṇyākṣasya veśmani
उसके हार और वस्त्र ढीले पड़ गए, माला और आभूषण गिर पड़े, और वह वेगपूर्वक हिरण्याक्ष के महल के ऊपर आ गिरा।
श्लोक 21 (skanda.8.104.21)
सौधमट्टालकं तस्य विमानमिव संस्थितम् । चूर्णयानोपतद् व्यास पर्वतेन्द्रमिवाशनिः
saudhamaṭṭālakaṁ tasya vimānamiva saṁsthitam | cūrṇayānopatad vyāsa parvatendramivāśaniḥ
हे व्यास! विमान के समान खड़े उसके प्रासाद की अटारी को चूर्ण करते हुए वह इस प्रकार गिरा, जैसे वज्र किसी पर्वतराज पर गिरता है।
श्लोक 22 (skanda.8.104.22)
महता तस्य शब्देन हिरण्याक्षः स्वयं तदा । वेगेनागत्य ददृशे दानवेन्द्रं दितेः सुतः
mahatā tasya śabdena hiraṇyākṣaḥ svayaṁ tadā | vegenāgatya dadṛśe dānavendraṁ diteḥ sutaḥ
उसके गिरने के महाशब्द को सुनकर दिति-पुत्र हिरण्याक्ष स्वयं वेगपूर्वक आया और उस दानवेन्द्र को देखा।
श्लोक 23 (skanda.8.104.23)
सोपि दानवशार्दूलो वराहेणावपीडितः । तेन चैव विघातेन मुहूर्त्तमभवज्जडः
sopi dānavaśārdūlo varāheṇāvapīḍitaḥ | tena caiva vighātena muhūrttamabhavajjaḍaḥ
वह दानवों में श्रेष्ठ भी वराह से इस प्रकार पीड़ित होकर, उसी आघात से क्षणभर के लिए जड़वत् हो गया था।
श्लोक 24 (skanda.8.104.24)
तं समाश्वासयद्राजा तदा शीतेन वारिणा । तालवृन्तैश्च बहुभिर्मणिभिश्च दितेः सुतः
taṁ samāśvāsayadrājā tadā śītena vāriṇā | tālavṛntaiśca bahubhirmaṇibhiśca diteḥ sutaḥ
उस दिति-पुत्र राजा ने उसे शीतल जल से, अनेक ताल-पंखों से और मणियों से सचेत किया।
श्लोक 25 (skanda.8.104.25)
समाश्वस्योत्थितञ्चैव उपविष्टं वरासने । राजा पप्रच्छ तं दैत्यं परं विस्मयमागतः
samāśvasyotthitañcaiva upaviṣṭaṁ varāsane | rājā papraccha taṁ daityaṁ paraṁ vismayamāgataḥ
सचेत होकर उठे हुए और श्रेष्ठ आसन पर बैठे हुए उस दैत्य से, अत्यन्त विस्मित हुए राजा ने पूछा -
श्लोक 26 (skanda.8.104.26)
हिरण्याक्ष उवाच । केनाद्य हिमवान् दैत्य पृथिवी वा ससागरा । महाबलेन सहसा तुलिता विश्वकर्मणा
hiraṇyākṣa uvāca | kenādya himavān daitya pṛthivī vā sasāgarā | mahābalena sahasā tulitā viśvakarmaṇā
हिरण्याक्ष ने कहा - हे दैत्य! आज किसने हिमालय को, अथवा सागर सहित पृथ्वी को, विश्वकर्मा के समान महाबली होकर, सहसा तराजू में तौल दिया?
श्लोक 27 (skanda.8.104.27)
केनाद्य मन्दरः स्रस्तो मृत्युः केन पराजितः । केन त्वं दानवेशान क्षिप्तः को बलवान्भुवि
kenādya mandaraḥ srasto mṛtyuḥ kena parājitaḥ | kena tvaṁ dānaveśāna kṣiptaḥ ko balavānbhuvi
'आज किसने मन्दराचल को हिला दिया? मृत्यु को किसने पराजित किया? हे दानवेश! किसने तुम्हें फेंक दिया? पृथ्वी पर वह बलवान् कौन है?'
श्लोक 28 (skanda.8.104.28)
पृथिव्यास्तुलनं यादृग् मन्दरस्य च चालनम् । मृत्योश्च मरण तादृक् तवेदं क्षपणं महत्
pṛthivyāstulanaṁ yādṛg mandarasya ca cālanam | mṛtyośca maraṇa tādṛk tavedaṁ kṣapaṇaṁ mahat
'पृथ्वी को तौलने और मन्दराचल को हिलाने के समान, और मृत्यु की मृत्यु के समान ही यह तुम्हारा महान् क्षय है।'
श्लोक 29 (skanda.8.104.29)
रुद्रेन्द्रमृत्युप्रतिमो लोकपालभयङ्करः । केन त्वं तुलितः संख्ये बलवानबलो यथा
rudrendramṛtyupratimo lokapālabhayaṅkaraḥ | kena tvaṁ tulitaḥ saṁkhye balavānabalo yathā
'रुद्र, इन्द्र और मृत्यु के समान, लोकपालों को भी भयभीत करने वाले तुम, बलवान् होकर भी निर्बल के समान इस संग्राम में किसके द्वारा तौले गए?'
श्लोक 30 (skanda.8.104.30)
कस्येदं बलमक्षय्यं केन बाह्वोर्बलं महत् । ख्यापितं त्रिषु लोकेषु दानवेश्वर कथ्यताम्
kasyedaṁ balamakṣayyaṁ kena bāhvorbalaṁ mahat | khyāpitaṁ triṣu lokeṣu dānaveśvara kathyatām
'यह अक्षय बल किसका है? किसने अपनी भुजाओं के महान् बल को त्रिलोक में प्रसिद्ध कर दिया है? हे दानवेश्वर! बताओ।'
श्लोक 31 (skanda.8.104.31)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दानवः स महाबलः । तमाह दीर्घं निःश्वस्य निरीक्ष्य च पुनः पुनः
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā dānavaḥ sa mahābalaḥ | tamāha dīrghaṁ niḥśvasya nirīkṣya ca punaḥ punaḥ
सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर वह महाबली दानव लम्बी साँस लेकर, बार-बार उसे देखकर बोला -
श्लोक 32 (skanda.8.104.32)
विप्रचित्तिरुवाच । अमानुषमिदं राजन्नतिदेवं तथापि च । अतिदैत्यञ्च दैत्येन्द्र न दृष्टं न श्रुतं क्वचित्
vipracittiruvāca | amānuṣamidaṁ rājannatidevaṁ tathāpi ca | atidaityañca daityendra na dṛṣṭaṁ na śrutaṁ kvacit
विप्रचित्ति ने कहा - हे राजन्! यह अमानुष है, फिर भी देवताओं से भी बढ़कर है; हे दैत्येन्द्र! यह दैत्यों से भी बढ़कर है - ऐसा कहीं न देखा गया है, न सुना गया है।
श्लोक 33 (skanda.8.104.33)
वराहस्य बलं यादृग् न च तादृक् क्वचित् क्वचित् । न हि तुल्यं प्रपश्यामि तस्य राजन्महात्मनः
varāhasya balaṁ yādṛg na ca tādṛk kvacit kvacit | na hi tulyaṁ prapaśyāmi tasya rājanmahātmanaḥ
'जैसा वराह का बल है, वैसा और कहीं भी नहीं है; हे राजन्! उस महात्मा के तुल्य मुझे कुछ भी दिखाई नहीं देता।'
श्लोक 34 (skanda.8.104.34)
अस्त्रैः शस्त्रैश्च बहुभिस्तक्ष्यमाणस्य संयुगे । नार्त्तिर्न दुःखं दैत्येन्द्र न च संज्ञा प्रहीयते
astraiḥ śastraiśca bahubhistakṣyamāṇasya saṁyuge | nārttirna duḥkhaṁ daityendra na ca saṁjñā prahīyate
'हे दैत्येन्द्र! युद्ध में अनेक अस्त्र-शस्त्रों से चीरे जाते हुए भी उसे न पीड़ा होती है, न दुःख, और न ही उसकी सुध-बुध जाती है।'
श्लोक 35 (skanda.8.104.35)
भवेत्तस्याभिदष्टस्य मशकेनाप्यनिर्वृतिः । न दैत्यदानवै राजन् निघ्नस्य भयमित्युत
bhavettasyābhidaṣṭasya maśakenāpyanirvṛtiḥ | na daityadānavai rājan nighnasya bhayamityuta
'मच्छर के काटने जितनी ही उसे [इन आघातों से] अशान्ति हो सकती है; हे राजन्! दैत्य-दानवों द्वारा आहत होने का उसे कोई भय नहीं है।'
श्लोक 36 (skanda.8.104.36)
यथा क्षुद्रमृगान् सिंहो मण्डूकानिव वोरगः । तथा स कलयामास सर्वान् दैत्येन्द्रदानवान्
yathā kṣudramṛgān siṁho maṇḍūkāniva voragaḥ | tathā sa kalayāmāsa sarvān daityendradānavān
जैसे सिंह छोटे मृगों को, या सर्प मेंढकों को [वश में कर लेता है], उसी प्रकार उसने समस्त दैत्येन्द्रों और दानवों को अपने वश में कर लिया।
श्लोक 37 (skanda.8.104.37)
न तं मृगमहं मन्ये न देवं नापि चासुरम् । कोप्यसौ दितिपुत्राणामनयः समुपस्थितः
na taṁ mṛgamahaṁ manye na devaṁ nāpi cāsuram | kopyasau ditiputrāṇāmanayaḥ samupasthitaḥ
'मैं उसे न मृग मानता हूँ, न देव, न असुर; वह दिति-पुत्रों के लिए साक्षात् उपस्थित हुआ कोई अनर्थ ही है।'
श्लोक 38 (skanda.8.104.38)
तेनास्मि मुष्टिना मूर्ध्नि ताडितो भूतलं गतः । गृहीत्वा सहसोत्क्षिप्तः पतितस्त्वद्गृहोपरि
tenāsmi muṣṭinā mūrdhni tāḍito bhūtalaṁ gataḥ | gṛhītvā sahasotkṣiptaḥ patitastvadgṛhopari
'उसने मुझे मुट्ठी से सिर पर मारा, मैं भूमि पर गिर पड़ा; फिर मुझे पकड़कर सहसा ऊपर उठाया, और मैं तुम्हारे ही महल के ऊपर आ गिरा।'
श्लोक 39 (skanda.8.104.39)
दानवानां सदैत्यानामितरेषाञ्च दानव । न जाने समवस्थानं मन्ये ते सर्वशो हताः
dānavānāṁ sadaityānāmitareṣāñca dānava | na jāne samavasthānaṁ manye te sarvaśo hatāḥ
'हे दानव! दैत्यों सहित दानवों तथा अन्य सभी की स्थिति क्या है, यह मुझे ज्ञात नहीं; मुझे लगता है कि वे सब मारे जा चुके हैं।'
श्लोक 40 (skanda.8.104.40)
अवध्यस्स महातेजा बलवान् दुर्बला वयम् । श्रुत्वैतद् दितिपुत्राणां हितं यत्तत्समाचर
avadhyassa mahātejā balavān durbalā vayam | śrutvaitad ditiputrāṇāṁ hitaṁ yattatsamācara
'वह महातेजस्वी, बलशाली अवध्य है, और हम दुर्बल हैं। यह सुनकर, दिति-पुत्रों का जो हित हो, वही करो।'
श्लोक 41 (skanda.8.104.41)
तस्याङ्गे मुनयः सर्वे दृश्यन्ते सह दैवतैः । कृत्या सेति मतं मेद्य तव हेतोर्विनिर्मिता
tasyāṅge munayaḥ sarve dṛśyante saha daivataiḥ | kṛtyā seti mataṁ medya tava hetorvinirmitā
'उसके अंगों में समस्त मुनि, देवताओं सहित, दिखाई देते हैं; आज मेरा यह मत है कि यह तुम्हारे ही विनाश के लिए रची गई कोई कृत्या (जादुई शक्ति) है।'
श्लोक 42 (skanda.8.104.42)
मनश्च तव दैत्येन्द्र युद्धाय कृतनिश्चयम् । विनिवर्तय तच्चैव दैत्यानां हितमाचर
manaśca tava daityendra yuddhāya kṛtaniścayam | vinivartaya taccaiva daityānāṁ hitamācara
'हे दैत्येन्द्र! तुम्हारा जो मन युद्ध के लिए निश्चय कर चुका है, उसे लौटा लो, और दैत्यों का हित ही करो।'
श्लोक 43 (skanda.8.104.43)
बलवान् सोबला दैत्या वयं मर्त्याः स चामरः । अजय्योसौ जिता दैत्या मा नो युद्धेन योजय
balavān sobalā daityā vayaṁ martyāḥ sa cāmaraḥ | ajayyosau jitā daityā mā no yuddhena yojaya
'वह बलवान् है, हम दैत्य निर्बल हैं; हम मर्त्य हैं, वह अमर है। वह अजेय है, हम दैत्य पहले ही पराजित हैं - हमें उसके साथ युद्ध में मत लगाओ।'
श्लोक 44 (skanda.8.104.44)
हित्वाश्मकं पुरं सर्वे समुद्रस्तम्भमाश्रिताः । तिष्ठाम राजन् मा युद्ध तेन साकं पुनः कृथाः
hitvāśmakaṁ puraṁ sarve samudrastambhamāśritāḥ | tiṣṭhāma rājan mā yuddha tena sākaṁ punaḥ kṛthāḥ
(इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूल में अप्राप्त है) - 'हम सब अश्मक नगर त्यागकर समुद्र-स्तम्भ का आश्रय लेकर वहीं रहें, हे राजन्! उसके साथ पुनः युद्ध मत करो।'
श्लोक 45 (skanda.8.104.45)
मावमंस्था मृगं दैत्य मृगोसाविति सर्वशः । नरसिंहोप्यभूत्पूर्वं मृगस्तद्विनिबृंहितः
māvamaṁsthā mṛgaṁ daitya mṛgosāviti sarvaśaḥ | narasiṁhopyabhūtpūrvaṁ mṛgastadvinibṛṁhitaḥ
'हे दैत्य! उसे यह सोचकर तनिक भी तुच्छ मत समझो कि 'वह तो मृग है'; पूर्वकाल में नृसिंह भी हुए थे, जो [ऐसे ही] मृग के विस्तारित रूप में थे।'
श्लोक 46 (skanda.8.104.46)
यावत्त्वं ध्रियसे दैत्य दानवानां सुखावहः । तावत्सर्वे सुरा जीवा भविष्यन्ति न संशयः
yāvattvaṁ dhriyase daitya dānavānāṁ sukhāvahaḥ | tāvatsarve surā jīvā bhaviṣyanti na saṁśayaḥ
(इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूल में अप्राप्त है) - 'हे दैत्य! जब तक तुम, दानवों को सुख देने वाले, जीवित रहोगे, तब तक समस्त देवता भी जीवित रहेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।'
श्लोक 47 (skanda.8.104.47)
मा रुशन्तु दितेः पुत्रा दनोश्चैव सुबालिशाः । अपयाम पुरादस्मादसुरेश्वर सर्वशः
mā ruśantu diteḥ putrā danoścaiva subāliśāḥ | apayāma purādasmādasureśvara sarvaśaḥ
'हे असुरेश्वर! दिति और दनु के भोले-भाले पुत्र और अधिक क्रुद्ध न हों - हम सब इस नगर से पूर्णतः चले जाएँ।'
श्लोक 48 (skanda.8.104.48)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हिरण्याक्षः प्रतापवान् । उवाच दानवेशानं भीतं तस्मान्महात्मनः
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | uvāca dānaveśānaṁ bhītaṁ tasmānmahātmanaḥ
सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर प्रतापी हिरण्याक्ष ने उस महात्मा से भयभीत हुए दानवेश्वर से कहा -
श्लोक 49 (skanda.8.104.49)
असंशयं महात्मासौ मृगो दानवसत्तम । येन मन्दरकल्पस्त्वं तुलितः सुमहाबलः
asaṁśayaṁ mahātmāsau mṛgo dānavasattama | yena mandarakalpastvaṁ tulitaḥ sumahābalaḥ
'हे दानवश्रेष्ठ! निःसन्देह वह मृग एक महात्मा ही है, जिसने मन्दराचल के समान अत्यन्त बलशाली तुम्हें भी [तराजू में] तौल दिया।'
श्लोक 50 (skanda.8.104.50)
अद्य वर्षसहस्राणि दिव्यान्यसुरपुंगव । चत्वारि भुञ्जतो राज्यं गतानि सुमहान्ति मे
adya varṣasahasrāṇi divyānyasurapuṁgava | catvāri bhuñjato rājyaṁ gatāni sumahānti me
'हे असुरपुंगव! आज मुझे राज्य भोगते हुए चार हजार महान् दिव्य वर्ष बीत गए हैं।'
श्लोक 51 (skanda.8.104.51)
पञ्चपञ्चा तु संप्राप्तन्तावद्देवाश्च नाशिताः । सबला बहुभिर्घोरैः संग्रामैरबला इव
pañcapañcā tu saṁprāptantāvaddevāśca nāśitāḥ | sabalā bahubhirghoraiḥ saṁgrāmairabalā iva
(इस पंक्ति का पाठ मूल में भी अनिश्चित है) - इतने और वर्ष बीतने पर भी देवगण, बलवान् होते हुए भी, अनेक घोर संग्रामों में निर्बलों के समान नष्ट हो गए।
श्लोक 52 (skanda.8.104.52)
सोहं तथा बलोपेतो भुक्त्वा राज्यमकण्टकम् । भीतः प्रविश्य सलिलं कथं स्थास्ये भुजङ्गवत्
sohaṁ tathā balopeto bhuktvā rājyamakaṇṭakam | bhītaḥ praviśya salilaṁ kathaṁ sthāsye bhujaṅgavat
'मैं, इस प्रकार बलसम्पन्न होकर निष्कण्टक राज्य भोगते हुए, भयभीत होकर जल में प्रवेश कर सर्प के समान कैसे रहूँ?'
श्लोक 53 (skanda.8.104.53)
मृगरूपी स विष्णुश्च वाराहं रूपमास्थितः । यदि स्यात्तच्च कृत्यं मे दानवेश्वर मा भयम्
mṛgarūpī sa viṣṇuśca vārāhaṁ rūpamāsthitaḥ | yadi syāttacca kṛtyaṁ me dānaveśvara mā bhayam
'हे दानवेश्वर! चाहे वह मृग-रूपधारी विष्णु ही क्यों न हो, वाराह-रूप में स्थित; और चाहे यह मेरे विरुद्ध रचित कृत्या ही क्यों न हो - भय मत करो।'
श्लोक 54 (skanda.8.104.54)
ममापि बलमक्षय्यं तस्माच्च बलवानहम् । यो मे भयात् परित्यज्य स्वं रूपं मृगतां गतः
mamāpi balamakṣayyaṁ tasmācca balavānaham | yo me bhayāt parityajya svaṁ rūpaṁ mṛgatāṁ gataḥ
'मेरा बल भी अक्षय है, और इसीलिए मैं उससे अधिक बलवान् हूँ, जिसने मेरे ही भय से अपना रूप त्यागकर मृग-रूप धारण कर लिया।'
श्लोक 55 (skanda.8.104.55)
यो हन्याद्धस्तिनं संख्ये सिंहं शरभमेव च । तस्य कास्था भवेद्दैत्य मृगे ह्यस्मिन्महाबल
yo hanyāddhastinaṁ saṁkhye siṁhaṁ śarabhameva ca | tasya kāsthā bhaveddaitya mṛge hyasminmahābala
'हे महाबल दैत्य! जो युद्ध में हाथी, सिंह और शरभ तक को मार सकता है, उसे इस मृग की क्या चिन्ता हो सकती है?'
श्लोक 56 (skanda.8.104.56)
मद्भयात् स वराहश्च सर्वदेवैरधिष्ठितः । मामाह्वयति दैत्येन्द्र जय एव ततो हि मे
madbhayāt sa varāhaśca sarvadevairadhiṣṭhitaḥ | māmāhvayati daityendra jaya eva tato hi me
'हे दैत्येन्द्र! समस्त देवताओं से अधिष्ठित वह वराह, मेरे ही भय से मुझे [युद्ध के लिए] बुला रहा है; इसलिए विजय तो मेरी ही निश्चित है।'
श्लोक 57 (skanda.8.104.57)
भवानेव हि मे दैत्य तेन दूतः । त्वरता मृत्युलोकन्तु गत्वा दानवपुंगव
bhavāneva hi me daitya tena dūtaḥ | tvaratā mṛtyulokantu gatvā dānavapuṁgava
'हे दैत्य! तुम ही उस घटना से मानो मेरे लिए उसके दूत बन गए हो' - (इस श्लोक का शेष भाग मूल में अप्राप्त है) - 'हे दानवपुंगव! शीघ्रता करते हुए मृत्युलोक की ओर जाना होगा।'
श्लोक 58 (skanda.8.104.58)
यदहं म्रातृहन्तारं दानवानां भयङ्करम् । अहत्वा न निवर्तिष्ये शपे सत्येन दानव
yadahaṁ mrātṛhantāraṁ dānavānāṁ bhayaṅkaram | ahatvā na nivartiṣye śape satyena dānava
'हे दानव! मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ - दानवों के लिए भयंकर उस मेरे भ्रातृ-हन्ता को बिना मारे मैं नहीं लौटूँगा।'
श्लोक 59 (skanda.8.104.59)
सनत्कुमार उवाच । सूतं ततः समादिश्य रथं सज्जमचीकरत् । समाश्वासयितुं पत्नीः स विवेश पुनर्गृहान्
sanatkumāra uvāca | sūtaṁ tataḥ samādiśya rathaṁ sajjamacīkarat | samāśvāsayituṁ patnīḥ sa viveśa punargṛhān
सनत्कुमार ने कहा - फिर सारथि को आज्ञा देकर उसने रथ सुसज्जित कराया; और अपनी पत्नियों को सान्त्वना देने के लिए वह पुनः अन्तःपुर में गया।
श्लोक 60 (skanda.8.104.60)
स तत्र ताभिः कृतमङ्गलस्तदा दितेः सुताँस्ताँश्च निरीक्ष्य सर्वशः । गृहाण सर्वं रणयोग्यमुज्ज्वलं महाबलः शत्रुनिवारणक्षमम्
sa tatra tābhiḥ kṛtamaṅgalastadā diteḥ sutā~stā~śca nirīkṣya sarvaśaḥ | gṛhāṇa sarvaṁ raṇayogyamujjvalaṁ mahābalaḥ śatrunivāraṇakṣamam
वहाँ उन पत्नियों द्वारा मंगल-कृत्य किए जाने पर, उस दिति-पुत्रों को सब ओर से देखकर, उस महाबली ने कहा - 'शत्रु का निवारण करने में समर्थ, तेजोमय समस्त युद्धोपयोगी सामग्री ग्रहण करो।'