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अम्बिका खण्ड · अध्याय 105

वराह-आप्यायन

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

श्लोक 1 (skanda.8.105.1)

सनत्कुमार उवाच । स धन्वी कवची भूत्वा बद्धगोधांगुलित्रवान् । बद्धपृष्ठेषुधी चैव शरी खङ्गी महाबलः

sanatkumāra uvāca | sa dhanvī kavacī bhūtvā baddhagodhāṅgulitravān | baddhapṛṣṭheṣudhī caiva śarī khaṅgī mahābalaḥ

सनत्कुमार ने कहा - धनुष धारण कर, कवच पहनकर, गोधा-अंगुलित्राण (चमड़े के हाथ-रक्षक) बाँधकर, पीठ पर दो तरकश बाँधे हुए, बाणों और खड्ग से युक्त वह महाबली -

श्लोक 2 (skanda.8.105.2)

हरिश्मश्रुश्चतुर्दंष्ट्रः शंकुकर्णो महाहनुः । आजानुबाहुर्दीर्घाक्षो न्यग्रोधपरिमण्डलः

hariśmaśruścaturdaṁṣṭraḥ śaṅkukarṇo mahāhanuḥ | ājānubāhurdīrghākṣo nyagrodhaparimaṇḍalaḥ

पिंगल दाढ़ी-मूँछोंवाला, चार दाढ़ोंवाला, नुकीले कानोंवाला, बड़ी हनुओंवाला, घुटनों तक लंबी भुजाओंवाला, बड़ी आँखोंवाला, वट वृक्ष के समान सर्वांगसुडौल -

श्लोक 3 (skanda.8.105.3)

हस्तयोः पद्मशंखौ च चक्रमत्स्यौ च पादयोः । दधानो जालहस्तश्च जालपादोल्पमेहनः

hastayoḥ padmaśaṅkhau ca cakramatsyau ca pādayoḥ | dadhāno jālahastaśca jālapādolpamehanaḥ

अपने दोनों हाथों में पद्म और शंख के तथा दोनों पैरों में चक्र और मत्स्य के चिह्न धारण किए हुए, जालयुक्त हाथ-पैरोंवाला, तथा गुप्त एवं लघु जननेन्द्रियवाला -

श्लोक 4 (skanda.8.105.4)

बालादित्यनिभाक्षश्च अञ्जनाचलसन्निभः । स निर्ययौ तदा व्यास भृकुटीभूषिताननः

bālādityanibhākṣaśca añjanācalasannibhaḥ | sa niryayau tadā vyāsa bhṛkuṭībhūṣitānanaḥ

उगते हुए सूर्य के समान नेत्रोंवाला, तथा अंजन-पर्वत के समान श्यामवर्ण - हे व्यास! वह तब भृकुटी से सुशोभित मुखवाला होकर बाहर निकला।

श्लोक 5 (skanda.8.105.5)

द्वार्यपश्यच्च सूतेन रथं समुपकल्पितम् । सहस्रनल्वमात्रञ्च हयैर्दिव्यैस्समन्वितम्

dvāryapaśyacca sūtena rathaṁ samupakalpitam | sahasranalvamātrañca hayairdivyaissamanvitam

द्वार पर उसने सारथि द्वारा सुसज्जित किया हुआ रथ देखा, जो एक सहस्र नल्व (एक मापविशेष) तक विस्तृत तथा दिव्य अश्वों से युक्त था।

श्लोक 6 (skanda.8.105.6)

सहस्रैर्दशभिर्व्यास सर्वोपकरणान्वितम् । खट्वाङ्गेन च संयुक्तं ध्वजेनादित्यवर्चसा

sahasrairdaśabhirvyāsa sarvopakaraṇānvitam | khaṭvāṅgena ca saṁyuktaṁ dhvajenādityavarcasā

हे व्यास! वह दसों सहस्रों की संख्या में समस्त युद्धोपकरणों से युक्त था, खट्वांग (गदाविशेष) से संयुक्त तथा सूर्य के समान तेजस्वी ध्वजा से सुशोभित था।

श्लोक 7 (skanda.8.105.7)

आरुरोह जयेत्युक्तो दानवैर्बहुभिस्तदा । दिवाकरो रथं यद्वद् भगवान् तेजसां पतिः

āruroha jayetyukto dānavairbahubhistadā | divākaro rathaṁ yadvad bhagavān tejasāṁ patiḥ

अनेक दानवों द्वारा 'विजय हो' कहकर पुकारे जाने पर वह उस पर आरूढ़ हुआ, जैसे तेजों के स्वामी भगवान् सूर्य अपने रथ पर आरूढ़ होते हैं।

श्लोक 8 (skanda.8.105.8)

विबभौ स तदारूढो रथं तं दितिनन्दनः । सौवर्णे भाजने यद्वदिन्द्रनीलं समर्पितम्

vibabhau sa tadārūḍho rathaṁ taṁ ditinandanaḥ | sauvarṇe bhājane yadvadindranīlaṁ samarpitam

उस रथ पर आरूढ़ हुआ दिति-पुत्र उस प्रकार सुशोभित हुआ, जैसे स्वर्ण-पात्र में इन्द्रनील मणि जड़ी गई हो।

श्लोक 9 (skanda.8.105.9)

किरीटस्त्वाबभौ तस्य शिरस्थः सुमहाद्युतिः । यथाञ्जनगिरेः शृङ्गे दावाग्निः समवस्थितः

kirīṭastvābabhau tasya śirasthaḥ sumahādyutiḥ | yathāñjanagireḥ śṛṅge dāvāgniḥ samavasthitaḥ

उसके सिर पर स्थित अत्यन्त तेजस्वी मुकुट उस प्रकार शोभित हुआ, जैसे अंजन-पर्वत के शिखर पर दावाग्नि स्थित हो।

श्लोक 10 (skanda.8.105.10)

सञ्चोदयच्च यन्तारं स दैत्यो गमनं प्रति । तस्य पार्श्वेभवद् व्यास विप्रचित्तिरवस्थितः

sañcodayacca yantāraṁ sa daityo gamanaṁ prati | tasya pārśvebhavad vyāsa vipracittiravasthitaḥ

उस दैत्य ने सारथि को प्रस्थान के लिए प्रेरित किया; और हे व्यास! उसके पार्श्व में विप्रचित्ति खड़ा था -

श्लोक 11 (skanda.8.105.11)

केतोरिव यथा व्योम्नि प्रतिकेतुरवस्थितः । शंखभेरीमृदङ्गैश्च मुरजैर्वेणुभिस्तथा

ketoriva yathā vyomni pratiketuravasthitaḥ | śaṅkhabherīmṛdaṅgaiśca murajairveṇubhistathā

जैसे आकाश में ध्वजा के पास प्रतिध्वजा स्थित हो, वैसे ही वह खड़ा था - तथा शंख, भेरी, मृदंग, मुरज और वेणुओं की ध्वनि के साथ -

श्लोक 12 (skanda.8.105.12)

वाद्यमानैर्ययौ राजा हिरण्याक्षोश्मकात्पुरात् । अग्रतः पृष्ठतश्चैव पार्श्वयोरुभयोरपि

vādyamānairyayau rājā hiraṇyākṣośmakātpurāt | agrataḥ pṛṣṭhataścaiva pārśvayorubhayorapi

उन वाद्यों के बजते हुए, राजा हिरण्याक्ष अश्मक नगर से आगे, पीछे तथा दोनों पार्श्वों में [सेना से घिरा] निकला।

श्लोक 13 (skanda.8.105.13)

जग्मुः सर्वेसुरा व्यास भास्करस्य यथा ग्रहाः । निर्गच्छमानश्च पुरात् शकुन्तान् भयशंसिनः

jagmuḥ sarvesurā vyāsa bhāskarasya yathā grahāḥ | nirgacchamānaśca purāt śakuntān bhayaśaṁsinaḥ

हे व्यास! समस्त असुर उस प्रकार चले, जैसे सूर्य के साथ ग्रह चलते हैं; तथा नगर से निकलते हुए उसने भय की सूचना देनेवाले पक्षी देखे -

श्लोक 14 (skanda.8.105.14)

अपश्यद् व्यास दैत्येन्द्रो न च तानकरोदधृदि । आच्छिनत् तस्य पन्थानं भुजङ्गः कृष्णदेहवान्

apaśyad vyāsa daityendro na ca tānakarodadhṛdi | ācchinat tasya panthānaṁ bhujaṅgaḥ kṛṣṇadehavān

हे व्यास! उस दैत्येन्द्र ने उन्हें देखा, परन्तु हृदय में उन्हें कुछ न माना; [तभी] एक काले शरीरवाला सर्प उसका मार्ग काट गया -

श्लोक 15 (skanda.8.105.15)

गृध्रश्च रक्तवक्त्रोस्य निलिल्ये ध्वजमूर्धनि । गृध्रश्चक्रायते चास्य रथस्योपरि गच्छतः

gṛdhraśca raktavaktrosya nililye dhvajamūrdhani | gṛdhraścakrāyate cāsya rathasyopari gacchataḥ

एक लाल मुखवाला गिद्ध उसकी ध्वजा के शिखर पर आ बैठा, तथा एक गिद्ध चलते हुए उसके रथ के ऊपर चक्र के समान मँडराने लगा -

श्लोक 16 (skanda.8.105.16)

ध्वजश्चाभज्यत महान् रथस्य सुमहाप्रभः । वामं चाङ्गं स्फुरत्यस्य शरीरस्य मुहुर्मुहुः

dhvajaścābhajyata mahān rathasya sumahāprabhaḥ | vāmaṁ cāṅgaṁ sphuratyasya śarīrasya muhurmuhuḥ

रथ की महान् एवं अत्यन्त तेजस्वी ध्वजा टूट गई, तथा उसके शरीर का बायाँ अंग बार-बार फड़कने लगा।

श्लोक 17 (skanda.8.105.17)

हेषन्ते न हया दीना हस्तिनो विमदाभवन् । एतान्यन्यानि च बहूनि दैत्यो मुनिसत्तम

heṣante na hayā dīnā hastino vimadābhavan | etānyanyāni ca bahūni daityo munisattama

दीन घोड़े हिनहिनाना बंद कर गए, हाथी मद-रहित हो गए - हे मुनिश्रेष्ठ! इन तथा और भी अनेक [अपशकुनों] को -

श्लोक 18 (skanda.8.105.18)

सोवैक्षत निमित्तानि भयदान्यात्मनोसकृत् । नातिदूरे स निर्गत्य नगरस्य मृगेश्वरम्

sovaikṣata nimittāni bhayadānyātmanosakṛt | nātidūre sa nirgatya nagarasya mṛgeśvaram

उस दैत्य ने बार-बार अपने लिए भयसूचक शकुनों के रूप में देखा; तथा नगर से न अधिक दूर जाकर उसने मृगेश्वर [वराह] को -

श्लोक 19 (skanda.8.105.19)

अपश्यद् दानवः संख्ये युध्यमानमभीतवत् । सोपि दैत्यवरः श्रीमान् क्रोधसंरक्तलोचनः

apaśyad dānavaḥ saṁkhye yudhyamānamabhītavat | sopi daityavaraḥ śrīmān krodhasaṁraktalocanaḥ

युद्ध में निर्भय होकर लड़ते हुए देखा; तब वह श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ भी क्रोध से लाल नेत्रोंवाला होकर -

श्लोक 20 (skanda.8.105.20)

विस्फारयन्महाचापं रथेनाभ्यपतद्बली । वराहोपि महाबाहुर्विद्राव्य दितिनन्दनान् । सुवर्णाक्षं प्रति रुषा वेगेनैवाभ्यधावत

visphārayanmahācāpaṁ rathenābhyapatadbalī | varāhopi mahābāhurvidrāvya ditinandanān | suvarṇākṣaṁ prati ruṣā vegenaivābhyadhāvata

अपने महान् धनुष को खींचता हुआ वह बलवान् रथ सहित उस पर टूट पड़ा; तथा महाबाहु वराह भी दिति के पुत्रों को तितर-बितर करके क्रोधपूर्वक वेग से सुवर्णाक्ष [हिरण्याक्ष] की ओर दौड़ा।

श्लोक 21 (skanda.8.105.21)

तस्यापतत एवाशु दानवः सुमहाबलः । सर्वसन्धिषु तीक्ष्णाग्रान्निचखान बहूञ्छरान्

tasyāpatata evāśu dānavaḥ sumahābalaḥ | sarvasandhiṣu tīkṣṇāgrānnicakhāna bahūñcharān

उस पर वेगपूर्वक झपटते हुए उस अत्यन्त बलवान् दानव ने उसके समस्त सन्धिस्थानों में तीक्ष्ण अग्रभागवाले अनेक बाण घुसा दिए।

श्लोक 22 (skanda.8.105.22)

सायकैस्तैर्विनिर्भिन्नः सर्वसन्धिषु सुव्रत । न चचाल मृगेन्द्रोसौ विष्टब्धः समतिष्ठत

sāyakaistairvinirbhinnaḥ sarvasandhiṣu suvrata | na cacāla mṛgendrosau viṣṭabdhaḥ samatiṣṭhata

हे सुव्रत! उन बाणों से समस्त सन्धिस्थानों में बिंधा हुआ भी वह मृगेन्द्र [वराह] विचलित नहीं हुआ, अपितु जड़वत् स्तब्ध खड़ा रहा।

श्लोक 23 (skanda.8.105.23)

तं स्तम्भितं तदा व्यास दृष्टवा देवा महाबलम् । विशल्यकरणैर्मन्त्रैर्विशल्यमभिचक्रिरे

taṁ stambhitaṁ tadā vyāsa dṛṣṭavā devā mahābalam | viśalyakaraṇairmantrairviśalyamabhicakrire

हे व्यास! उस महाबली को उस प्रकार स्तंभित देखकर देवताओं ने विशल्यकरण मन्त्रों द्वारा उसे शल्य-रहित कर दिया।

श्लोक 24 (skanda.8.105.24)

स विशल्यस्तदा देवैः कृतो मृगपतिर्महान् । पुनर्वेगं महत् कृत्वा जगाम दितिजं प्रति

sa viśalyastadā devaiḥ kṛto mṛgapatirmahān | punarvegaṁ mahat kṛtvā jagāma ditijaṁ prati

देवताओं द्वारा उस प्रकार शल्य-रहित किया गया वह महान् मृगपति पुनः महान् वेग धारण कर दितिपुत्र की ओर बढ़ा।

श्लोक 25 (skanda.8.105.25)

स वध्यमानो बहुभिश्शरैर्मृगपतिर्महान् । दैत्येन्द्ररथमासाद्य इयेष रथमव्ययः

sa vadhyamāno bahubhiśśarairmṛgapatirmahān | daityendrarathamāsādya iyeṣa rathamavyayaḥ

अनेक बाणों से बींधा जाता हुआ भी वह महान् अविनाशी मृगपति दैत्येन्द्र के रथ के पास पहुँचकर उसे [पकड़ने की] इच्छा करने लगा।

श्लोक 26 (skanda.8.105.26)

ग्रहीतुं नादयन् व्यास बहुधा विश्वरूपधृक् । यन्ता च मण्डलं कृत्वा भ्रामयामास तं रथम्

grahītuṁ nādayan vyāsa bahudhā viśvarūpadhṛk | yantā ca maṇḍalaṁ kṛtvā bhrāmayāmāsa taṁ ratham

हे व्यास! विश्वरूपधारी वह अनेक प्रकार से गर्जना करता हुआ उसे पकड़ने के लिए [दौड़ा]; और सारथि ने रथ को मंडलाकार घुमाकर भ्रमण करा दिया।

श्लोक 27 (skanda.8.105.27)

प्रसारितकरं दैत्यो मृगं तं सुमहाबलम् । बबन्धास्त्रेण नागानां स बद्धो न्यपतद् भुवि

prasāritakaraṁ daityo mṛgaṁ taṁ sumahābalam | babandhāstreṇa nāgānāṁ sa baddho nyapatad bhuvi

हाथ फैलाए हुए उस महाबली मृग को दैत्य ने नागपाश-अस्त्र से बाँध लिया; बँध जाने पर वह भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 28 (skanda.8.105.28)

पतितं तञ्च दैत्येन्द्रा विविधायुधपाणयः । विजघ्नुर्भृशमायस्ता बहुधा क्रोधमूर्छिताः

patitaṁ tañca daityendrā vividhāyudhapāṇayaḥ | vijaghnurbhṛśamāyastā bahudhā krodhamūrchitāḥ

इस प्रकार गिरे हुए उस पर विविध आयुध हाथों में लिए दैत्येन्द्रों ने क्रोध से मूर्च्छित होकर बार-बार अत्यन्त परिश्रमपूर्वक अनेक प्रकार से प्रहार किया।

श्लोक 29 (skanda.8.105.29)

तं बद्धं वध्यमानञ्च पतितं नन्दिवर्धनम् । गरुत्मान् भुजगेन्द्रेभ्यः क्षिप्रमेव व्यमोचयत्

taṁ baddhaṁ vadhyamānañca patitaṁ nandivardhanam | garutmān bhujagendrebhyaḥ kṣiprameva vyamocayat

इस प्रकार बँधे हुए, प्रहार सहते हुए तथा गिरे हुए उस नन्दिवर्धन [वराह] को गरुड़ ने तुरन्त ही सर्पों के बन्धन से मुक्त कर दिया।

श्लोक 30 (skanda.8.105.30)

मुक्तश्च स तदोत्पत्य द्रावयाणो दितेः सुतान् । हिरण्याक्षरथं तूर्णमभ्यधावन्महायशाः

muktaśca sa tadotpatya drāvayāṇo diteḥ sutān | hiraṇyākṣarathaṁ tūrṇamabhyadhāvanmahāyaśāḥ

मुक्त होते ही वह उछलकर, दिति के पुत्रों को भगाता हुआ, अत्यन्त यशस्वी वराह वेगपूर्वक हिरण्याक्ष के रथ की ओर दौड़ा।

श्लोक 31 (skanda.8.105.31)

तं धावन्तं पुनर्दैत्यः शरेणानतपर्वणा । विव्याध हृदये व्यास नर्दमानो यथाम्बुदः

taṁ dhāvantaṁ punardaityaḥ śareṇānataparvaṇā | vivyādha hṛdaye vyāsa nardamāno yathāmbudaḥ

हे व्यास! पुनः दौड़ते हुए उसे उस दैत्य ने बादल के समान गर्जन करते हुए एक सीधे पर्वोंवाले बाण से हृदय में बींध दिया।

श्लोक 32 (skanda.8.105.32)

मृगेश्वरश्च भिन्नोसौ हृदये मोहमास्थितः । पपात भूमौ निर्वृत्ते शक्रध्वज इवोत्सवे

mṛgeśvaraśca bhinnosau hṛdaye mohamāsthitaḥ | papāta bhūmau nirvṛtte śakradhvaja ivotsave

हृदय में बिंधा हुआ वह मृगेश्वर मूर्च्छित होकर, उत्सव समाप्त होने पर इन्द्रध्वज के समान, भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 33 (skanda.8.105.33)

ततो हाहा कृतं सर्वैः समेतैर्देवपुंगवैः । ऋषयस्तुष्टुवुश्चैनं भास्करश्चाप्रभोभवत्

tato hāhā kṛtaṁ sarvaiḥ sametairdevapuṁgavaiḥ | ṛṣayastuṣṭuvuścainaṁ bhāskaraścāprabhobhavat

तब समस्त देवश्रेष्ठों द्वारा हाहाकार किया गया; ऋषियों ने उसकी स्तुति की, और सूर्य भी निस्तेज हो गया।

श्लोक 34 (skanda.8.105.34)

अथ सोप्यायितस्तत्र ऋषिभिर्ब्रह्मवित्तमैः । प्रतिलभ्य तदा संज्ञामिदं वचनमब्रवीत्

atha sopyāyitastatra ṛṣibhirbrahmavittamaiḥ | pratilabhya tadā saṁjñāmidaṁ vacanamabravīt

तब ब्रह्मज्ञानी ऋषियों द्वारा वहाँ आप्यायित (स्वस्थ) किए जाने पर, चेतना पाकर उसने यह वचन कहा -

श्लोक 35 (skanda.8.105.35)

आप्याययध्वं मां क्षिप्रं मूढोहं सर्वशः सुराः । नाल्पवीर्येण शक्योयं दैत्यो योधयितुं रणे

āpyāyayadhvaṁ māṁ kṣipraṁ mūḍhohaṁ sarvaśaḥ surāḥ | nālpavīryeṇa śakyoyaṁ daityo yodhayituṁ raṇe

'हे देवगण! तुम सब मुझे शीघ्र आप्यायित करो - मैं सर्वथा मोहित हो गया था; अल्प बल से यह दैत्य युद्ध में जीता नहीं जा सकता।'

श्लोक 36 (skanda.8.105.36)

ततस्ते दैवतास्सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः । तपसा स्वेन तं देवं सर्व एवाभ्यपूरयन्

tataste daivatāssarve ṛṣayaśca tapodhanāḥ | tapasā svena taṁ devaṁ sarva evābhyapūrayan

तब वे समस्त देवता तथा तपोधन ऋषिगण सभी अपने-अपने तप से उस देव को पूर्णतः परिपूरित करने लगे।

श्लोक 37 (skanda.8.105.37)

तस्य त्वाप्यायमोनस्य ऋषिभिर्दैवतैश्च ह । बभौ रूपं युगान्ताग्निकालमृत्युसमप्रभम्

tasya tvāpyāyamonasya ṛṣibhirdaivataiśca ha | babhau rūpaṁ yugāntāgnikālamṛtyusamaprabham

ऋषियों तथा देवताओं द्वारा इस प्रकार आप्यायित किए जाते हुए उसका, युगान्त की अग्नि, काल और मृत्यु के समान तेजस्वी रूप प्रकट हुआ।

श्लोक 38 (skanda.8.105.38)

स दीप्यमानो विबभौ महात्मा देवैश्च सर्वैर्ऋषिभिः स्तुतश्च । दीप्तस्तदा भास्करसप्तकल्पो लोकान्दहिष्यन्निव देवदेवः

sa dīpyamāno vibabhau mahātmā devaiśca sarvairṛṣibhiḥ stutaśca | dīptastadā bhāskarasaptakalpo lokāndahiṣyanniva devadevaḥ

वह महात्मा प्रज्वलित होकर समस्त देवताओं और ऋषियों से स्तुत होकर सुशोभित हुआ; उस समय सात सूर्यों के समान देदीप्यमान वह देवदेव मानो लोकों को दग्ध कर देने के लिए उद्यत जान पड़ा।

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