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अम्बिका खण्ड · अध्याय 106

त्रिशूलाक्षेपण

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

श्लोक 1 (skanda.8.106.1)

सनत्कुमार उवाच । स तथाप्यायितो व्यास बलवान्भास्करद्युतिः । चित्रं बहु च शीघ्रं च मण्डलानि परिभ्रमत्

sanatkumāra uvāca | sa tathāpyāyito vyāsa balavānbhāskaradyutiḥ | citraṁ bahu ca śīghraṁ ca maṇḍalāni paribhramat

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! इस प्रकार बल-सम्पन्न किए गए वे सूर्य के समान तेजस्वी बलवान् वराह अनेक विचित्र और वेगवान् मण्डलाकार गतियों में घूमने लगे।

श्लोक 2 (skanda.8.106.2)

प्लुतानि सिंहवत् कृत्वा अवलोकयते सकृत् । पृष्ठतश्चाग्रतश्चापि पुनर्गजवदाचरत्

plutāni siṁhavat kṛtvā avalokayate sakṛt | pṛṣṭhataścāgrataścāpi punargajavadācarat

वे सिंह के समान छलाँगें भरकर एक ही क्षण में चारों ओर देख लेते थे, और फिर पीछे तथा आगे भी हाथी के समान आचरण करते थे।

श्लोक 3 (skanda.8.106.3)

पुनर्व्यात्ताननो भूत्वा शस्त्राणि ग्रसते रिपोः । पुनर्वृक्षैः शिलाभिश्च दानवान् स न्यसूदयत्

punarvyāttānano bhūtvā śastrāṇi grasate ripoḥ | punarvṛkṣaiḥ śilābhiśca dānavān sa nyasūdayat

फिर मुख फैलाकर वे शत्रु के शस्त्रों को निगल जाते थे, और फिर वृक्षों तथा शिलाओं से दानवों का संहार करते थे।

श्लोक 4 (skanda.8.106.4)

पुनराकाशगो भूत्वा पक्षिराडिव सोभ्रमत् । पुनर्जहास संक्रुद्धो ह्यशनीपातसन्निभम्

punarākāśago bhūtvā pakṣirāḍiva sobhramat | punarjahāsa saṁkruddho hyaśanīpātasannibham

फिर आकाशगामी होकर वे पक्षिराज के समान घूमते थे, और फिर क्रुद्ध होकर वज्रपात के समान अट्टहास करते थे।

श्लोक 5 (skanda.8.106.5)

पुनश्च सूक्ष्ममात्मानं कृत्वा तस्थावथाग्रतः । एवन्तं वल्गमानञ्च नर्दमानञ्च दानवः

punaśca sūkṣmamātmānaṁ kṛtvā tasthāvathāgrataḥ | evantaṁ valgamānañca nardamānañca dānavaḥ

फिर अपने को सूक्ष्म रूप बनाकर वे शत्रु के सामने ही खड़े हो जाते थे। इस प्रकार उछलते और गरजते हुए उन्हें देखकर उस दानव हिरण्याक्ष ने -

श्लोक 6 (skanda.8.106.6)

उवाच भृकुटीवक्त्रो हिरण्याक्षोभिनादयन् । भो क्षुद्रमृग दुर्बुद्धे न त्वं मोक्षमवाप्स्यसि

uvāca bhṛkuṭīvaktro hiraṇyākṣobhinādayan | bho kṣudramṛga durbuddhe na tvaṁ mokṣamavāpsyasi

भौंहें चढ़ाए हुए मुखवाले उस हिरण्याक्ष ने गरजते हुए कहा - अरे तुच्छ बुद्धिवाले क्षुद्र मृग! तू मुक्ति नहीं पा सकेगा।

श्लोक 7 (skanda.8.106.7)

हत्वा त्वाहं प्रदास्यामि रुद्राय बलिमोजसा । त्वया हतश्छद्मना मे भ्राता ज्येष्ठो दुरात्मना । तस्याद्य कर्मणः प्राप्तं फलं दुष्टात्मनस्तव

hatvā tvāhaṁ pradāsyāmi rudrāya balimojasā | tvayā hataśchadmanā me bhrātā jyeṣṭho durātmanā | tasyādya karmaṇaḥ prāptaṁ phalaṁ duṣṭātmanastava

तुझे मारकर मैं बलपूर्वक रुद्र को बलि चढ़ाऊँगा। हे दुष्टात्मन्! तूने कपट से मेरे ज्येष्ठ भाई का वध किया था; आज तुझ दुरात्मा को उसी कर्म का फल प्राप्त हो रहा है।

श्लोक 8 (skanda.8.106.8)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हिरण्याक्षस्य संयुगे । उवाच भगवान्विष्णुः क्रोधयानो दितेः सुतम्

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā hiraṇyākṣasya saṁyuge | uvāca bhagavānviṣṇuḥ krodhayāno diteḥ sutam

सनत्कुमार ने कहा - युद्धभूमि में हिरण्याक्ष का वह वचन सुनकर भगवान् विष्णु ने क्रोधित होकर दिति-पुत्र से कहा -

श्लोक 9 (skanda.8.106.9)

हतोसौ नरसिंहेन मया दैत्यः प्रतापवान् । विक्रम्य संयुगे तद्वद्भवतोपि वधो ध्रुवः

hatosau narasiṁhena mayā daityaḥ pratāpavān | vikramya saṁyuge tadvadbhavatopi vadho dhruvaḥ

उस पराक्रमी दैत्य को मैंने नृसिंह रूप धारण कर मार डाला था; उसी प्रकार पराक्रम दिखाकर युद्ध में तेरा भी वध निश्चित है।

श्लोक 10 (skanda.8.106.10)

यदि त्वं गच्छसे खं वा पातालं वाप्यतः परम् । पर्वतं वोदधिं वापि न तथापि विमोक्ष्यसे

yadi tvaṁ gacchase khaṁ vā pātālaṁ vāpyataḥ param | parvataṁ vodadhiṁ vāpi na tathāpi vimokṣyase

चाहे तू आकाश में चला जाए, चाहे पाताल में या उससे भी परे, चाहे पर्वत में जाए अथवा समुद्र में, फिर भी तू मुक्त नहीं हो सकेगा।

श्लोक 11 (skanda.8.106.11)

यत्ते बलं तपो यच्च या च माया तवासुर । तत्सर्वं निर्धमाम्यद्य तव देहात् सजीवितम्

yatte balaṁ tapo yacca yā ca māyā tavāsura | tatsarvaṁ nirdhamāmyadya tava dehāt sajīvitam

हे असुर! तेरा जो बल है, जो तप है और जो माया है, वह सब मैं आज तेरे शरीर से प्राणों सहित निकाल दूँगा।

श्लोक 12 (skanda.8.106.12)

हिरण्याक्ष उवाच । त्वं मया शरविष्टब्धो देवैर्मन्त्रैर्विमोक्षितः । बद्धं चास्त्रेण भूयस्त्वां पक्षिराजो व्यमोचयत्

hiraṇyākṣa uvāca | tvaṁ mayā śaraviṣṭabdho devairmantrairvimokṣitaḥ | baddhaṁ cāstreṇa bhūyastvāṁ pakṣirājo vyamocayat

हिरण्याक्ष ने कहा - मैंने तुझे बाणों से जड़ कर दिया था, तब देवताओं ने मंत्रों से तुझे मुक्त किया था; फिर जब मैंने तुझे अस्त्र से बाँध दिया, तब पक्षिराज ने तुझे छुड़ाया था।

श्लोक 13 (skanda.8.106.13)

भूयो मृतस्त्वं दुर्बुद्धे देवैरुज्जीवितो भवः । भूयस्त्वाहं वधिष्यामि सिंहो मृगमिवाजने

bhūyo mṛtastvaṁ durbuddhe devairujjīvito bhavaḥ | bhūyastvāhaṁ vadhiṣyāmi siṁho mṛgamivājane

हे दुर्बुद्धे! फिर तू मर गया था, तब देवताओं ने तुझे पुनर्जीवित किया था। अब मैं फिर से तुझे उसी तरह मार डालूँगा, जैसे सिंह वन में मृग को मार डालता है।

श्लोक 14 (skanda.8.106.14)

तव का शक्तिरद्येह महेश्वरमृते वरम् । मां स्प्रष्टुमपि हस्तेन नरस्येव हुताशनम्

tava kā śaktiradyeha maheśvaramṛte varam | māṁ spraṣṭumapi hastena narasyeva hutāśanam

महेश्वर के अतिरिक्त तुझमें आज यहाँ यह सामर्थ्य ही कहाँ है कि तू हाथ से भी मुझे छू सके - जैसे साधारण मनुष्य अग्नि को हाथ से नहीं छू सकता।

श्लोक 15 (skanda.8.106.15)

त्वं लोकमयमास्थाय शरीरं तैरधिष्ठितम् । सर्वैराप्यायितश्चैव संयुगे मामुपागतः

tvaṁ lokamayamāsthāya śarīraṁ tairadhiṣṭhitam | sarvairāpyāyitaścaiva saṁyuge māmupāgataḥ

तूने समस्त लोकों से बना और उन्हीं सबसे अधिष्ठित शरीर धारण किया है, और उन सब देवताओं द्वारा बल दिए जाने पर ही तू युद्ध में मेरे सामने आया है।

श्लोक 16 (skanda.8.106.16)

अहन्तु स्वेन तपसा बलेन च समन्वितः । न च मां त्वं तथाप्यद्य शक्तः सिंहं यथा मृगः

ahantu svena tapasā balena ca samanvitaḥ | na ca māṁ tvaṁ tathāpyadya śaktaḥ siṁhaṁ yathā mṛgaḥ

मैं तो अपने ही तप और बल से युक्त हूँ; फिर भी आज तू मुझ पर उस तरह विजय पाने में समर्थ नहीं है, जैसे मृग सिंह पर विजय नहीं पा सकता।

श्लोक 17 (skanda.8.106.17)

योद्धुं वाप्यभिसर्तुं वा सह देवैर्दुरात्मवान् । न त्वावयोरेतदेव ह्यन्तरं सुमहत्तरम्

yoddhuṁ vāpyabhisartuṁ vā saha devairdurātmavān | na tvāvayoretadeva hyantaraṁ sumahattaram

हे दुरात्मन्! तू देवताओं के सहित भी न युद्ध करने में समर्थ है, न ही सामना करने में। हम दोनों के बीच यही बहुत बड़ा अन्तर है।

श्लोक 18 (skanda.8.106.18)

यः स्यात्कुलीनो विद्वान्वा सतां मार्गे च संस्थितः । सोनेनैव जितं मत्वा आत्मानं संयुगं त्यजेत्

yaḥ syātkulīno vidvānvā satāṁ mārge ca saṁsthitaḥ | sonenaiva jitaṁ matvā ātmānaṁ saṁyugaṁ tyajet

जो कुलीन हो, विद्वान् हो, अथवा सज्जनों के मार्ग पर स्थित हो, वह तो इसी बात से अपने को पराजित मानकर युद्ध का ही परित्याग कर देता है।

श्लोक 19 (skanda.8.106.19)

निर्घृणस्त्यक्तलज्जश्च छिद्रघाती दुरात्मवान् । त्वदन्यः को भवेत्तिर्यङ् नैतद्दैत्यस्य विद्यते

nirghṛṇastyaktalajjaśca chidraghātī durātmavān | tvadanyaḥ ko bhavettiryaṅ naitaddaityasya vidyate

निर्दय, लज्जारहित, छिद्र देखकर वार करनेवाला और दुरात्मा - तेरे सिवा ऐसा पशु-तुल्य कौन होगा? यह आचरण किसी कुलीन दैत्य में नहीं पाया जाता।

श्लोक 20 (skanda.8.106.20)

न त्वं मम कृतो मृत्युरहन्तु तव संयुगे । एते सिद्धाः प्रपश्यन्तु चारणाश्च सहस्रशः । आवयोरन्तरं संख्ये बहुधा युध्यमानयोः

na tvaṁ mama kṛto mṛtyurahantu tava saṁyuge | ete siddhāḥ prapaśyantu cāraṇāśca sahasraśaḥ | āvayorantaraṁ saṁkhye bahudhā yudhyamānayoḥ

तू मेरी मृत्यु का कारण नहीं बनेगा, बल्कि मैं ही युद्ध में तेरी मृत्यु का कारण बनूँगा। ये हजारों सिद्ध और चारण देख लें - बार-बार लड़ते हुए हम दोनों के बीच का यह अन्तर।

श्लोक 21 (skanda.8.106.21)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्त्वा हिरण्याक्षः शरैराशीविषोपमैः । जघ्ने वराहं संक्रुद्धो वज्राशनिसमत्विषम्

sanatkumāra uvāca | evamuktvā hiraṇyākṣaḥ śarairāśīviṣopamaiḥ | jaghne varāhaṁ saṁkruddho vajrāśanisamatviṣam

सनत्कुमार ने कहा - ऐसा कहकर हिरण्याक्ष ने क्रुद्ध होकर, वज्र और अशनि के समान तेजस्वी उस वराह को सर्पविष के समान बाणों से मारा।

श्लोक 22 (skanda.8.106.22)

सोथ तेनार्द्यमानोपि वराहः सुमहाबलः । गत्वा वेगेन संक्रुद्धो रथं जग्राह नादयन्

sotha tenārdyamānopi varāhaḥ sumahābalaḥ | gatvā vegena saṁkruddho rathaṁ jagrāha nādayan

उनसे पीड़ित होते हुए भी वे अत्यन्त बलशाली वराह वेगपूर्वक जाकर, क्रुद्ध होकर गरजते हुए, उसके रथ को पकड़ लिया।

श्लोक 23 (skanda.8.106.23)

गृहीत्वा कूबरे चापि आक्षिप्योत्क्षिप्य वेगवत् । साश्वं ससारथिं देवश्चिक्षेप च ररास च

gṛhītvā kūbare cāpi ākṣipyotkṣipya vegavat | sāśvaṁ sasārathiṁ devaścikṣepa ca rarāsa ca

रथ के धुरे को पकड़कर, वेगपूर्वक उसे घुमाकर और ऊपर उठाकर, उस देव ने घोड़ों और सारथि सहित उसे फेंक दिया और गरज उठे।

श्लोक 24 (skanda.8.106.24)

तस्य त्वाक्षेपविक्षेपैश्छिन्नयोक्त्राश्च ते हयाः । उद्भ्रान्ता रथमुख्यश्च विसन्धिः समपद्यत

tasya tvākṣepavikṣepaiśchinnayoktrāśca te hayāḥ | udbhrāntā rathamukhyaśca visandhiḥ samapadyata

उस घुमाने और फेंकने से उसके घोड़ों के जुए के तस्में टूट गए, वे घबरा उठे, और वह उत्तम रथ जोड़-जोड़ से बिखर गया।

श्लोक 25 (skanda.8.106.25)

हिरण्याक्षो रथं त्यक्त्वा पदातिर्धनुषा तदा । मृगेन्द्रं मोहनास्त्रेण बलवानभ्यताडयत्

hiraṇyākṣo rathaṁ tyaktvā padātirdhanuṣā tadā | mṛgendraṁ mohanāstreṇa balavānabhyatāḍayat

तब हिरण्याक्ष रथ छोड़कर पैदल ही धनुष लेकर उस बलशाली मृगेन्द्र को मोहनास्त्र से मारने लगा।

श्लोक 26 (skanda.8.106.26)

मोहः समाविशच्चैव तं देवं नन्दिवर्धनम् । देवैर्मन्त्रप्रभावेण नष्टमोहः कृतः पुनः

mohaḥ samāviśaccaiva taṁ devaṁ nandivardhanam | devairmantraprabhāveṇa naṣṭamohaḥ kṛtaḥ punaḥ

उस मोहनास्त्र से भगवान् नन्दिवर्धन मोहग्रस्त हो गए; परन्तु देवताओं के मंत्र-प्रभाव से उनका वह मोह पुनः दूर कर दिया गया।

श्लोक 27 (skanda.8.106.27)

एष शस्त्रैर्बहुविधैर्दैत्येन्द्रो हि रुषान्वितः । आजघान न चाप्येनं रुजा स समयोजयत्

eṣa śastrairbahuvidhairdaityendro hi ruṣānvitaḥ | ājaghāna na cāpyenaṁ rujā sa samayojayat

फिर उस दैत्येन्द्र ने क्रोध से भरकर अनेक प्रकार के शस्त्रों से उन पर प्रहार किया, परन्तु उन्हें किसी पीड़ा से युक्त नहीं कर सका।

श्लोक 28 (skanda.8.106.28)

अथैनं स महातेजा वराहः प्रहसन्निव । वृक्षमुत्पाट्य वेगेन दैत्यं मूर्ध्नि व्यताडयत्

athainaṁ sa mahātejā varāhaḥ prahasanniva | vṛkṣamutpāṭya vegena daityaṁ mūrdhni vyatāḍayat

तब उस महातेजस्वी वराह ने मानो हँसते हुए एक वृक्ष उखाड़कर वेगपूर्वक उस दैत्य के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 29 (skanda.8.106.29)

तस्य तेन प्रहारेण दैत्यस्याभिहतस्य ह । धनुः पपात वेगेन हस्तावापश्च पञ्चकः

tasya tena prahāreṇa daityasyābhihatasya ha | dhanuḥ papāta vegena hastāvāpaśca pañcakaḥ

उस प्रहार से आहत हुए उस दैत्य का धनुष तथा पाँच अंगुलियों वाला दस्ताना भी वेगपूर्वक हाथ से गिर पड़ा।

श्लोक 30 (skanda.8.106.30)

ततो हाहा कृतं दैत्यैर्दानवैश्च सुदुःखितैः । शस्त्रैश्च बहुभिः क्रुद्धा वराहं समताडयन्

tato hāhā kṛtaṁ daityairdānavaiśca suduḥkhitaiḥ | śastraiśca bahubhiḥ kruddhā varāhaṁ samatāḍayan

तब अत्यन्त दुःखित हुए दैत्यों और दानवों ने हाहाकार मचाया, और क्रुद्ध होकर अनेक शस्त्रों से वराह पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 31 (skanda.8.106.31)

स हन्यमानस्तैर्दैत्यैर्व्यदाय सुमहाबलः । मुखं सर्वाणि शस्त्राणि जग्रास च ररास च

sa hanyamānastairdaityairvyadāya sumahābalaḥ | mukhaṁ sarvāṇi śastrāṇi jagrāsa ca rarāsa ca

उन दैत्यों द्वारा प्रहार किए जाने पर भी उस महाबली ने मुख फैलाकर उन सब शस्त्रों को निगल लिया और गरज उठे।

श्लोक 32 (skanda.8.106.32)

तत्तथा विकृतं दृष्ट्वा हिरण्याक्षः प्रतापवान् । शूलं जग्राह संक्रुद्धः कृत्वा रुद्राय वै नमः

tattathā vikṛtaṁ dṛṣṭvā hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | śūlaṁ jagrāha saṁkruddhaḥ kṛtvā rudrāya vai namaḥ

यह अद्भुत दृश्य देखकर प्रतापी हिरण्याक्ष ने क्रुद्ध होकर रुद्र को नमस्कार करके त्रिशूल उठा लिया।

श्लोक 33 (skanda.8.106.33)

तद्युगान्तानलप्रख्यं महाशूलमतिप्रभम् । चिक्षेप दैत्यः संक्रुद्धो वराहाय महास्वनम्

tadyugāntānalaprakhyaṁ mahāśūlamatiprabham | cikṣepa daityaḥ saṁkruddho varāhāya mahāsvanam

उस प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तेजस्वी और महाध्वनि करते हुए उस महाशूल को क्रुद्ध दैत्य ने वराह पर फेंका।

श्लोक 34 (skanda.8.106.34)

तमापतन्तं बहुधा नदन्तं ज्वालाः स्फुलिङ्गाश्च समुद्गिरन्तम् । दृष्ट्वा सुराः सिद्धगणाश्च सर्वे हाहेति चक्रुर्भयमूढचित्ताः

tamāpatantaṁ bahudhā nadantaṁ jvālāḥ sphuliṅgāśca samudgirantam | dṛṣṭvā surāḥ siddhagaṇāśca sarve hāheti cakrurbhayamūḍhacittāḥ

उस बार-बार गरजते हुए और ज्वालाओं तथा चिनगारियों को उगलते हुए आते हुए त्रिशूल को देखकर सभी देवता और सिद्धगण भय से व्याकुल होकर हाहाकार कर उठे।

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