अम्बिका खण्ड · अध्याय 107
हिरण्याक्षवध
श्लोक 1 (skanda.8.107.1)
तमापतन्तं वेगेन न शूलं दृष्टवान्मृगः । दैत्यसन्धे समासक्तः सर्वप्राणिभयङ्करम्
tamāpatantaṁ vegena na śūlaṁ dṛṣṭavānmṛgaḥ | daityasandhe samāsaktaḥ sarvaprāṇibhayaṅkaram
वेगपूर्वक आते हुए, सम्पूर्ण प्राणियों को भयभीत करनेवाले उस त्रिशूल को मृग (वराह) ने नहीं देखा, क्योंकि वे दैत्य के मर्मस्थल पर ही आसक्त थे।
श्लोक 2 (skanda.8.107.2)
अलक्षितेन तेनासौ शूलेनादितिनन्दनः । विभिन्नो हृदये व्यास मृतकल्पः पपात ह
alakṣitena tenāsau śūlenāditinandanaḥ | vibhinno hṛdaye vyāsa mṛtakalpaḥ papāta ha
हे व्यास! उस अलक्षित त्रिशूल से अदिति-नन्दन का हृदय बिंध गया और वे मृतकल्प होकर गिर पड़े।
श्लोक 3 (skanda.8.107.3)
ततो हाहा कृतं भूतैरदृश्यैर्मुनिसत्तम । उद्वेलाः सागराश्चासन् भास्करश्चाप्रभोभवत्
tato hāhā kṛtaṁ bhūtairadṛśyairmunisattama | udvelāḥ sāgarāścāsan bhāskaraścāprabhobhavat
हे मुनिश्रेष्ठ! तब अदृश्य भूतों ने हाहाकार किया, समुद्र अपनी सीमा तोड़कर उमड़ पड़े, और सूर्य निस्तेज हो गया।
श्लोक 4 (skanda.8.107.4)
उल्काः पेतुश्च सर्वत्र म्लानमाल्याः सुराभवन् । ग्रहाणामभवद्युद्धं विमानानि च पेतिरे
ulkāḥ petuśca sarvatra mlānamālyāḥ surābhavan | grahāṇāmabhavadyuddhaṁ vimānāni ca petire
सर्वत्र उल्काएँ गिरने लगीं, देवताओं की मालाएँ मुरझा गईं, ग्रहों में परस्पर युद्ध होने लगा, और विमान गिरने लगे।
श्लोक 5 (skanda.8.107.5)
जजपुर्मुनयः सर्वे वराहे पतिते तदा । महादेवं नमस्कृत्य ब्रह्मा सस्मार तं तदा
jajapurmunayaḥ sarve varāhe patite tadā | mahādevaṁ namaskṛtya brahmā sasmāra taṁ tadā
वराह के गिर जाने पर सभी मुनि जप करने लगे, और ब्रह्मा ने महादेव को नमस्कार करके उनका स्मरण किया।
श्लोक 6 (skanda.8.107.6)
ततो वितिमिरं सर्वमभवत् पूर्ववच्छुभम् । महादेवं नमस्कृत्य वराहश्चोदतिष्ठत
tato vitimiraṁ sarvamabhavat pūrvavacchubham | mahādevaṁ namaskṛtya varāhaścodatiṣṭhata
तब सब कुछ पूर्ववत् अंधकाररहित और शुभ हो गया, और महादेव को नमस्कार करके वराह पुनः उठ खड़े हुए।
श्लोक 7 (skanda.8.107.7)
तेजो माहेश्वरं दिव्यं विवेश मधुसूदनम् । सोप्यायिततनुस्तेन शूलं निष्कृष्य माधवः
tejo māheśvaraṁ divyaṁ viveśa madhusūdanam | sopyāyitatanustena śūlaṁ niṣkṛṣya mādhavaḥ
महेश्वर का दिव्य तेज मधुसूदन में प्रविष्ट हो गया, और उससे शक्ति पाकर माधव ने वह त्रिशूल अपने शरीर से खींच निकाला।
श्लोक 8 (skanda.8.107.8)
सहसानलसंकाशो बभूव स महाबलः । ततस्तेनैव शूलेन तं दैत्यं देवनन्दनः
sahasānalasaṁkāśo babhūva sa mahābalaḥ | tatastenaiva śūlena taṁ daityaṁ devanandanaḥ
वे महाबली तत्काल अग्नि के समान तेजस्वी हो उठे; फिर उसी त्रिशूल से उन देवनन्दन ने उस दैत्य पर -
श्लोक 9 (skanda.8.107.9)
जघान हृदये क्रुद्धः क्रौञ्चं शक्त्या यथा गुहः । स भिन्नहृदयस्तेन वराहेण महासुरः
jaghāna hṛdaye kruddhaḥ krauñcaṁ śaktyā yathā guhaḥ | sa bhinnahṛdayastena varāheṇa mahāsuraḥ
- क्रुद्ध होकर उसके हृदय पर वैसे ही प्रहार किया, जैसे गुह ने अपनी शक्ति से क्रौंच पर्वत पर किया था। उस वराह के प्रहार से वह महासुर हृदय में विदीर्ण हो गया।
श्लोक 10 (skanda.8.107.10)
नार्त्तिमानभवद् व्यास कृच्छ्रे विद्वानिव स्थितः । मध्ये भिन्नं स तच्छूलं निष्कृष्य च विसृज्य च
nārttimānabhavad vyāsa kṛcchre vidvāniva sthitaḥ | madhye bhinnaṁ sa tacchūlaṁ niṣkṛṣya ca visṛjya ca
हे व्यास! फिर भी संकट में भी विद्वान् के समान अविचल रहा, उसे कोई पीड़ा नहीं हुई; उसने अपने बीच से टूटे हुए उस त्रिशूल को खींचकर बाहर फेंक दिया,
श्लोक 11 (skanda.8.107.11)
खङ्गं निष्कृष्य वेगेन वराहं मूर्ध्न्यताडयत् । स तेन सुप्रहारेण वराहो नन्दिवर्धनः
khaṅgaṁ niṣkṛṣya vegena varāhaṁ mūrdhnyatāḍayat | sa tena suprahāreṇa varāho nandivardhanaḥ
और फिर तलवार खींचकर वेगपूर्वक वराह के सिर पर प्रहार किया। उस भारी प्रहार से वराह नन्दिवर्धन -
श्लोक 12 (skanda.8.107.12)
नार्तिमानभवद् व्यास बभूव रुधिराप्लुतः । नानाधातुविचित्रोसौ हिमवानिव पर्वतः
nārtimānabhavad vyāsa babhūva rudhirāplutaḥ | nānādhātuvicitrosau himavāniva parvataḥ
हे व्यास! फिर भी पीड़ित नहीं हुए, केवल रक्त से लथपथ हो गए, और अनेक धातुओं से चित्रित हिमालय पर्वत के समान दिखने लगे।
श्लोक 13 (skanda.8.107.13)
बभौ वराहो देवात्मा सर्वासुरविमर्दनः । पुनराहन्तुकामस्य तस्य दैत्यस्य सुव्रत
babhau varāho devātmā sarvāsuravimardanaḥ | punarāhantukāmasya tasya daityasya suvrata
हे सुव्रत! समस्त असुरों के संहारक वे देवात्मा वराह इस प्रकार शोभायमान हुए, जबकि वह दैत्य उन्हें फिर से मारना चाहता था।
श्लोक 14 (skanda.8.107.14)
अपहस्तप्रहारेण खङ्गं हस्तादपातयत् । अकुर्वातां ततो युद्धं नियुद्धकुशलावुभौ
apahastaprahāreṇa khaṅgaṁ hastādapātayat | akurvātāṁ tato yuddhaṁ niyuddhakuśalāvubhau
उन्होंने हाथ के एक ही प्रहार से उसकी तलवार उसके हाथ से गिरा दी; तब वे दोनों, जो मल्लयुद्ध में कुशल थे, बाहुयुद्ध करने लगे।
श्लोक 15 (skanda.8.107.15)
तौ गजाविव संक्रुद्धौ महिषाविव दर्पितौ । सिंहाविव च नर्दन्तौ संक्रुद्धौ वृषभाविव
tau gajāviva saṁkruddhau mahiṣāviva darpitau | siṁhāviva ca nardantau saṁkruddhau vṛṣabhāviva
वे दोनों क्रुद्ध हाथियों के समान, मदमत्त भैंसों के समान, गरजते हुए सिंहों के समान और क्रुद्ध साँडों के समान लड़ने लगे।
श्लोक 16 (skanda.8.107.16)
शरभाविव चायस्तौ शार्दूलाविव निर्घृणौ । परस्परमयुध्येतां परस्परजयैषिणौ
śarabhāviva cāyastau śārdūlāviva nirghṛṇau | parasparamayudhyetāṁ parasparajayaiṣiṇau
वे परिश्रान्त शरभों के समान और निर्दय व्याघ्रों के समान थे; दोनों एक-दूसरे पर विजय पाने की इच्छा से आपस में युद्ध करने लगे।
श्लोक 17 (skanda.8.107.17)
अंकुशैर्हस्तयोक्त्रैश्च क्षेपणैरपसर्पणैः । मण्डलैश्च पुनश्चित्रैः कर्षणैरपकर्षणैः
aṁkuśairhastayoktraiśca kṣepaṇairapasarpaṇaiḥ | maṇḍalaiśca punaścitraiḥ karṣaṇairapakarṣaṇaiḥ
वे अंकुशों के समान हाथों की पकड़ों, फेंकने और हटने की चालों, विचित्र मण्डलाकार गतियों, तथा खींचने और पीछे हटाने के दाँवों से -
श्लोक 18 (skanda.8.107.18)
तलैश्च मुष्टिभिश्चैव भुजैस्स चरणैरपि । नखैश्च दशनैश्चैव तथान्यैश्च महाबलौ
talaiśca muṣṭibhiścaiva bhujaissa caraṇairapi | nakhaiśca daśanaiścaiva tathānyaiśca mahābalau
तथा थप्पड़ों, मुक्कों, भुजाओं, चरणों, नखों, दाँतों और अन्य प्रकारों से भी वे दोनों महाबली परस्पर भिड़ते रहे।
श्लोक 19 (skanda.8.107.19)
तयोरेवमभूद्युद्धमुभयोर्देवदैत्ययोः । अहानि दश चाष्टौ च तथान्यानि चतुर्दश
tayorevamabhūdyuddhamubhayordevadaityayoḥ | ahāni daśa cāṣṭau ca tathānyāni caturdaśa
उन दोनों देव और दैत्य के बीच इस प्रकार का युद्ध अठारह दिनों तक, और फिर अन्य चौदह दिनों तक चलता रहा।
श्लोक 20 (skanda.8.107.20)
अन्यत्सहस्रमेवासीद्वर्षाणां तच्च मानुषम् । एष कालोभवत्तत्र ततो दैत्योबलोभवत्
anyatsahasramevāsīdvarṣāṇāṁ tacca mānuṣam | eṣa kālobhavattatra tato daityobalobhavat
मनुष्यों की गणना के अनुसार यह और भी एक हजार वर्षों के बराबर समय था। इतना समय बीत जाने पर वह दैत्य निर्बल पड़ने लगा।
श्लोक 21 (skanda.8.107.21)
तं हीयमानमालक्ष्य दैत्याधिपतिमूर्जितम् । आकाशे वागुवाचेदमशरीराति सुस्वना
taṁ hīyamānamālakṣya daityādhipatimūrjitam | ākāśe vāguvācedamaśarīrāti susvanā
उस पराक्रमी दैत्याधिपति को क्षीण होते देखकर, आकाश में एक बड़ी मधुर अशरीरी वाणी ने यह कहा -
श्लोक 22 (skanda.8.107.22)
शृणु देव वराहेदं श्रुत्वा चैव समाचर । अशक्योयं त्वया ह्येवं हन्तुं दैत्यो महाबलः
śṛṇu deva varāhedaṁ śrutvā caiva samācara | aśakyoyaṁ tvayā hyevaṁ hantuṁ daityo mahābalaḥ
हे देव वराह! यह सुनो और सुनकर वैसा ही आचरण करो। इस महाबली दैत्य को इस प्रकार मार पाना तुम्हारे लिए असम्भव है।
श्लोक 23 (skanda.8.107.23)
अबलोयं कृतः क्रूरो ध्रुवं माहेश्वरेण हि । तेजसा पश्य चैवैनमेष कालोस्य वर्तते
abaloyaṁ kṛtaḥ krūro dhruvaṁ māheśvareṇa hi | tejasā paśya caivainameṣa kālosya vartate
निश्चय ही महेश्वर के तेज से यह क्रूर दैत्य अभी निर्बल बनाया गया है; देखो, अब इसके अन्त का समय आ चुका है।
श्लोक 24 (skanda.8.107.24)
मुक्त्वैनं दैत्यराजानं चक्रेण विनिसूदय । माहेश्वरेण वैकुण्ठ ततो मृत्युमवाप्स्यति
muktvainaṁ daityarājānaṁ cakreṇa vinisūdaya | māheśvareṇa vaikuṇṭha tato mṛtyumavāpsyati
हे वैकुण्ठ! इसे छोड़कर तुम अपने चक्र से इस दैत्यराज का वध कर दो - महेश्वर के तेज के प्रभाव से ही अब यह मृत्यु को प्राप्त होगा।
श्लोक 25 (skanda.8.107.25)
ततस्तमभिसंश्रुत्य भगवान्नन्दिवर्धनः । मुमोच दैत्यराजानं पादेनाहत्य वक्षसि
tatastamabhisaṁśrutya bhagavānnandivardhanaḥ | mumoca daityarājānaṁ pādenāhatya vakṣasi
सनत्कुमार ने कहा - यह सुनकर भगवान् नन्दिवर्धन ने उस दैत्यराज की छाती पर पैर से प्रहार करके उसे छोड़ दिया।
श्लोक 26 (skanda.8.107.26)
स मुक्तस्तेन देवेन विबभौ दैत्यपुंगवः । भुक्तमुक्तो यथा सूर्यः सैंहिकेयेन राहुणा
sa muktastena devena vibabhau daityapuṁgavaḥ | bhuktamukto yathā sūryaḥ saiṁhikeyena rāhuṇā
उस देव द्वारा छोड़े जाने पर वह दैत्यश्रेष्ठ ऐसे सुशोभित हुआ, जैसे सिंहिका-पुत्र राहु के ग्रास से मुक्त हुआ सूर्य।
श्लोक 27 (skanda.8.107.27)
भगवानपि दीप्यन्तं श्रिया दैत्यं समीक्ष्य तम् । सस्मार तत्तदा चक्रं नमस्कृत्य पिनाकिनम्
bhagavānapi dīpyantaṁ śriyā daityaṁ samīkṣya tam | sasmāra tattadā cakraṁ namaskṛtya pinākinam
भगवान् ने भी उस तेज से दीप्त दैत्य को देखकर पिनाकधारी शिव को नमस्कार करके उस चक्र का स्मरण किया।
श्लोक 28 (skanda.8.107.28)
ततः सर्वा दिशो व्यास वह्निकुण्डानिभा बभुः । शब्दश्च सुमहानासीद्युगान्ताम्बुदसन्निभः
tataḥ sarvā diśo vyāsa vahnikuṇḍānibhā babhuḥ | śabdaśca sumahānāsīdyugāntāmbudasannibhaḥ
हे व्यास! तब सभी दिशाएँ अग्निकुण्ड के समान प्रज्वलित हो उठीं, और प्रलयकालीन मेघों के समान महाध्वनि हुई।
श्लोक 29 (skanda.8.107.29)
सिद्धाः पेतुश्च मेदिन्यां देवाँश्च भयमाविशत् । स्वस्त्यस्तु सर्वभूतानामित्यूचुर्मुनयस्तदा
siddhāḥ petuśca medinyāṁ devā~śca bhayamāviśat | svastyastu sarvabhūtānāmityūcurmunayastadā
सिद्ध पृथ्वी पर गिर पड़े, देवताओं में भय समा गया, और मुनियों ने तब कहा - सब प्राणियों का कल्याण हो।
श्लोक 30 (skanda.8.107.30)
सागराश्च व्यशुष्यन्त विनेशुर्नागपक्षिणः । दैत्याश्च दानवाश्चैव सर्वे ते विविशुर्विलम्
sāgarāśca vyaśuṣyanta vineśurnāgapakṣiṇaḥ | daityāśca dānavāścaiva sarve te viviśurvilam
समुद्र सूखने लगे, नाग और पक्षी नष्ट होने लगे, और सभी दैत्य तथा दानव बिलों में जा घुसे।
श्लोक 31 (skanda.8.107.31)
भयत्रस्तानि भूतानि उल्काः पेतुर्नभस्तलात् । आगच्छति युगान्ताग्निकल्पे चक्रे सुभास्वरे
bhayatrastāni bhūtāni ulkāḥ peturnabhastalāt | āgacchati yugāntāgnikalpe cakre subhāsvare
प्राणी भय से त्रस्त हो गए, आकाश से उल्काएँ गिरने लगीं - जब वह प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तेजस्वी चक्र आ रहा था।
श्लोक 32 (skanda.8.107.32)
क्षुरान्तं तन्महाचक्रं मज्जज्जलचरान्तकम् । दुर्निरीक्ष्यं सर्वघाति अभेद्यं प्रतिघाति च
kṣurāntaṁ tanmahācakraṁ majjajjalacarāntakam | durnirīkṣyaṁ sarvaghāti abhedyaṁ pratighāti ca
उस महान् चक्र की धार अत्यन्त तीक्ष्ण थी, वह जल में डूबे हुए जलचरों तक का भी अन्त कर देनेवाला था, देखा तक नहीं जा सकता था, सबका नाश करनेवाला, अभेद्य और प्रतिघातकारी था।
श्लोक 33 (skanda.8.107.33)
तथाप्रतिहतं दिव्यं मोहनं सर्वदेहिनाम् । करमागाद्वराहस्य शताशनिसमस्वनम्
tathāpratihataṁ divyaṁ mohanaṁ sarvadehinām | karamāgādvarāhasya śatāśanisamasvanam
इस प्रकार अप्रतिहत, दिव्य, सब देहधारियों को मोहित कर देनेवाला और सौ वज्रों के समान गर्जना करनेवाला वह चक्र वराह के हाथ में आ गया।
श्लोक 34 (skanda.8.107.34)
तदापतन्तं संवीक्ष्य सर्वभूतानि सर्वतः । पेतुर्भूमौ महाघोरमपश्यन्न च किञ्चन
tadāpatantaṁ saṁvīkṣya sarvabhūtāni sarvataḥ | peturbhūmau mahāghoramapaśyanna ca kiñcana
उस अत्यन्त भयंकर चक्र को आते हुए देखकर सब प्राणी सब ओर से भूमि पर गिर पड़े, और उन्हें कुछ भी दिखाई न पड़ा।
श्लोक 35 (skanda.8.107.35)
सोपि देवस्तदा कृत्वा रूपं सुमहदव्ययम् । त्रैलोक्यव्यापि चिक्षेप दानवं प्रति नादयन्
sopi devastadā kṛtvā rūpaṁ sumahadavyayam | trailokyavyāpi cikṣepa dānavaṁ prati nādayan
तब उन देव ने भी उस अविनाशी चक्र को अत्यन्त विशाल, त्रिलोकव्यापी रूप देकर गरजते हुए उस दानव पर फेंक दिया।
श्लोक 36 (skanda.8.107.36)
तद्युगान्तानलप्रख्यं क्षुरान्तं स्फोटयन्नभः । जगाम दानवं क्षिप्रं दिशः सर्वा दहन्निव
tadyugāntānalaprakhyaṁ kṣurāntaṁ sphoṭayannabhaḥ | jagāma dānavaṁ kṣipraṁ diśaḥ sarvā dahanniva
प्रलयकालीन अग्नि के समान वह तीक्ष्ण धारवाला चक्र आकाश को विदीर्ण करता हुआ और मानो सभी दिशाओं को जलाता हुआ शीघ्र ही उस दानव की ओर चला गया।
श्लोक 37 (skanda.8.107.37)
तत् स दानवशार्दूल उपयान्तं महारवम् । जघानास्त्रैर्बहुविधैरव्यथः शक्तिनन्दन
tat sa dānavaśārdūla upayāntaṁ mahāravam | jaghānāstrairbahuvidhairavyathaḥ śaktinandana
हे शक्ति-नन्दन! उस दानवश्रेष्ठ ने उस भयंकर ध्वनि करते हुए आते चक्र को निर्भय होकर अनेक प्रकार के अस्त्रों से मारा।
श्लोक 38 (skanda.8.107.38)
तच्च तानि महाचक्रमस्त्राण्यनलसन्निभम् । चकार भस्मसाद् व्यास जगाम च विनादयन्
tacca tāni mahācakramastrāṇyanalasannibham | cakāra bhasmasād vyāsa jagāma ca vinādayan
हे व्यास! अग्नि के समान तेजस्वी उस महाचक्र ने उन सब अस्त्रों को भस्म कर डाला और गरजते हुए आगे बढ़ता गया।
श्लोक 39 (skanda.8.107.39)
अथ मायां समसृजत् तैजसीं पार्थिवीमपि । वायवीं वारुणीञ्चैव तामसीमिन्द्रियात्मिकाम्
atha māyāṁ samasṛjat taijasīṁ pārthivīmapi | vāyavīṁ vāruṇīñcaiva tāmasīmindriyātmikām
तब उस दानव ने तेज, पृथ्वी, वायु और जल की माया रची, और इन्द्रियों को मोहित करनेवाली तामसी माया भी रची।
श्लोक 40 (skanda.8.107.40)
तथैवोत्पातकीं मायां मोहनीं स्तम्भनीमपि । निवर्तनीं जम्भनीं च चकारान्याश्च संयुगे
tathaivotpātakīṁ māyāṁ mohanīṁ stambhanīmapi | nivartanīṁ jambhanīṁ ca cakārānyāśca saṁyuge
उसी प्रकार उत्पातकारिणी, मोहिनी और स्तम्भिनी माया, तथा निवर्तनी और जम्भिनी माया भी और अन्य अनेक मायाएँ उसने उस युद्ध में रचीं।
श्लोक 41 (skanda.8.107.41)
ताः सर्वास्तत्तदा चक्रं नाशयद् भीमनादवत् । गत्वा तस्य शिरः कायादुन्ममाथ यथाचलम्
tāḥ sarvāstattadā cakraṁ nāśayad bhīmanādavat | gatvā tasya śiraḥ kāyādunmamātha yathācalam
उस भयंकर ध्वनि करते चक्र ने उन सब मायाओं को नष्ट कर दिया, और फिर पर्वत के समान उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 42 (skanda.8.107.42)
तत्तेन कृत्तं सुमहच्छिरोग्र्यं व्यात्ताननाग्निप्रतिमोग्रनेत्रम् । दंष्ट्रालमत्यद्भुतभीमनादं पपात मेरोरिव शृङ्गमुच्चम्
tattena kṛttaṁ sumahacchirogryaṁ vyāttānanāgnipratimogranetram | daṁṣṭrālamatyadbhutabhīmanādaṁ papāta meroriva śṛṅgamuccam
उससे कटा हुआ वह विशाल श्रेष्ठ सिर, जिसका खुला हुआ मुख अग्नि के समान भयानक नेत्रों से युक्त था, और जिसकी दाढ़ों से अत्यन्त अद्भुत तथा भयंकर गर्जना होती थी, मेरु पर्वत के ऊँचे शिखर के समान गिर पड़ा।
श्लोक 43 (skanda.8.107.43)
रथाङ्गनिष्पीतवपुर्विरागं न भाति तद्वक्त्रमतीव दीनम् । निशाप्रहाणे विनिवृत्तरश्मि विम्बं यथा चन्द्रमसो विशोभम्
rathāṅganiṣpītavapurvirāgaṁ na bhāti tadvaktramatīva dīnam | niśāprahāṇe vinivṛttaraśmi vimbaṁ yathā candramaso viśobham
चक्र से कुचला हुआ वह मुख अपनी आभा खोकर अत्यन्त निस्तेज हो गया - जैसे रात्रि की समाप्ति पर किरणें लौट जाने से चन्द्रमा का बिम्ब शोभाहीन हो जाता है।
श्लोक 44 (skanda.8.107.44)
तद्दन्तपंक्तिच्छदमादशानं मुहुश्च दन्तानपि संदशानम् । पपात दैत्यस्य शिरो निकृत्तं यथा गिरेः शृङ्गमतिप्रवृद्धम्
taddantapaṁkticchadamādaśānaṁ muhuśca dantānapi saṁdaśānam | papāta daityasya śiro nikṛttaṁ yathā gireḥ śṛṅgamatipravṛddham
अपनी दन्तपंक्ति से होंठों को बार-बार काटता हुआ और दाँतों को दाँतों से पीसता हुआ, वह दैत्य का कटा हुआ सिर पर्वत के अत्यन्त विशाल शिखर के समान गिर पड़ा।