अम्बिका खण्ड · अध्याय 108
वराहोत्सव
श्लोक 1 (skanda.8.108.1)
सनत्कुमार उवाच । तस्मिन्विनिहते दैत्ये सुराः सर्वेभितुष्टुवुः । ऋषयश्च तपोयुक्ता पुष्पवृष्ट्यश्च पेतिरे
sanatkumāra uvāca | tasminvinihate daitye surāḥ sarvebhituṣṭuvuḥ | ṛṣayaśca tapoyuktā puṣpavṛṣṭyaśca petire
सनत्कुमार ने कहा - उस दैत्य के मारे जाने पर सभी देवताओं ने स्तुति की, तपोनिष्ठ ऋषियों ने भी स्तुति की, और पुष्पों की वर्षा होने लगी।
श्लोक 2 (skanda.8.108.2)
देवदुन्दुभयो नेदुरदृश्याः सुमहास्वनाः । भूतानां चाभवच्छर्म प्रकृतिस्थं जगद्बभौ
devadundubhayo neduradṛśyāḥ sumahāsvanāḥ | bhūtānāṁ cābhavaccharma prakṛtisthaṁ jagadbabhau
अदृश्य दिव्य दुन्दुभियाँ महाध्वनि के साथ बज उठीं, प्राणियों को शान्ति मिली, और जगत् अपनी सामान्य अवस्था में लौट आया।
श्लोक 3 (skanda.8.108.3)
जगामादृश्यतां चक्रं ततः स्वस्थाभवन् सुराः । ऋषयश्चैव लोकाश्च दैत्यं तं ददृशुर्हतम्
jagāmādṛśyatāṁ cakraṁ tataḥ svasthābhavan surāḥ | ṛṣayaścaiva lokāśca daityaṁ taṁ dadṛśurhatam
तब वह चक्र अदृश्य हो गया, देवता स्वस्थ हो गए, और ऋषियों तथा समस्त लोकों ने उस दैत्य को मरा हुआ देखा।
श्लोक 4 (skanda.8.108.4)
असुरा अपि ते सर्वे पुरद्वाराणि सर्वशः । पिधाय यत्नात् सन्नद्धाः प्राकरेष्ववतस्थिरे
asurā api te sarve puradvārāṇi sarvaśaḥ | pidhāya yatnāt sannaddhāḥ prākareṣvavatasthire
उधर सभी असुर नगर के सब द्वारों को यत्नपूर्वक बन्द करके सन्नद्ध होकर परकोटों पर जा डटे।
श्लोक 5 (skanda.8.108.5)
ते भीता मुक्तकेशाश्च रजोध्वस्ता भयार्दिताः । जीवितं सं परीप्सन्तः स्थिताः प्राकारगास्तदा
te bhītā muktakeśāśca rajodhvastā bhayārditāḥ | jīvitaṁ saṁ parīpsantaḥ sthitāḥ prākāragāstadā
वे भयभीत, बिखरे केशोंवाले, धूल से धूसरित और भय से पीड़ित होकर, अपने प्राणों की रक्षा की कामना करते हुए परकोटों पर खड़े हो गए।
श्लोक 6 (skanda.8.108.6)
भगवानपि दीप्तार्चिर्हविषेद्ध इवानलः । भीषयानोसुरान्सर्वान् पृथिवीमन्वचिन्वत
bhagavānapi dīptārcirhaviṣeddha ivānalaḥ | bhīṣayānosurānsarvān pṛthivīmanvacinvata
भगवान् भी घृत से प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान होकर, समस्त असुरों को भयभीत करते हुए पृथ्वी में खोज करने लगे।
श्लोक 7 (skanda.8.108.7)
स बहिः सर्वतोन्विष्य उत्पाट्य च महीरुहान् । प्रणष्टामिव गां गोपः समन्तादन्वचिन्वत
sa bahiḥ sarvatonviṣya utpāṭya ca mahīruhān | praṇaṣṭāmiva gāṁ gopaḥ samantādanvacinvata
वे नगर के बाहर सब ओर खोज करते हुए और वृक्षों को उखाड़ते हुए, ऐसे खोजने लगे, जैसे कोई ग्वाला अपनी खोई हुई गाय को चारों ओर ढूँढ़ता है।
श्लोक 8 (skanda.8.108.8)
पर्वतान्स तदोत्पाट्य दैत्योद्यानान्यचूर्णयत् । आरामान् स तडागानि बभञ्ज च ररास च
parvatānsa tadotpāṭya daityodyānānyacūrṇayat | ārāmān sa taḍāgāni babhañja ca rarāsa ca
तब उन्होंने पर्वतों को उखाड़कर दैत्यों के उद्यानों को चूर-चूर कर दिया, तथा बगीचों और तालाबों को भी तोड़-फोड़ दिया और गरजते रहे।
श्लोक 9 (skanda.8.108.9)
ततो दक्षिणतो गत्वा मुहूर्त्तं देवसत्तमः । शंखं पर्वतमासाद्य ननर्द जलदो यथा
tato dakṣiṇato gatvā muhūrttaṁ devasattamaḥ | śaṁkhaṁ parvatamāsādya nanarda jalado yathā
तब वे देवश्रेष्ठ कुछ क्षण दक्षिण दिशा में जाकर शंख नामक पर्वत के पास पहुँचे, और मेघ के समान गरज उठे।
श्लोक 10 (skanda.8.108.10)
असुरा ह्यपि ते भीताः प्राकारान्तरसंस्थिताः । अवैक्षन्त मृगेन्द्रं तं धावन्तं सर्वतोदिशः
asurā hyapi te bhītāḥ prākārāntarasaṁsthitāḥ | avaikṣanta mṛgendraṁ taṁ dhāvantaṁ sarvatodiśaḥ
वे भयभीत असुर भी परकोटों के भीतर खड़े होकर, उस मृगेन्द्र को सब दिशाओं में दौड़ते हुए देखने लगे।
श्लोक 11 (skanda.8.108.11)
सोपि देवस्तदा शंखमुत्पाट्य नगमुत्तमम् । अपश्यत् पृथिवीं बद्धां रक्ष्यमाणां च दानवैः
sopi devastadā śaṁkhamutpāṭya nagamuttamam | apaśyat pṛthivīṁ baddhāṁ rakṣyamāṇāṁ ca dānavaiḥ
तब उन देव ने उस उत्तम शंख पर्वत को उखाड़ लिया, और देखा कि पृथ्वी बँधी हुई है और दानवों द्वारा रक्षित है।
श्लोक 12 (skanda.8.108.12)
सागराम्भसि विक्षिप्य शंखं तं पर्वतोत्तमम् । अवधीद्दानवान् सर्वान् मेदिन्या येभिरक्षिणः
sāgarāmbhasi vikṣipya śaṁkhaṁ taṁ parvatottamam | avadhīddānavān sarvān medinyā yebhirakṣiṇaḥ
उस उत्तम शंख पर्वत को समुद्र के जल में फेंककर, उन्होंने पृथ्वी की रक्षा करनेवाले उन सब दानवों का वध कर डाला।
श्लोक 13 (skanda.8.108.13)
ततो विद्राव्य नागेन्द्रान् प्रगृह्य पृथिवीं बलात् । जगाम दैत्यान् सन्धृष्य रत्नान्यदाय सर्वशः
tato vidrāvya nāgendrān pragṛhya pṛthivīṁ balāt | jagāma daityān sandhṛṣya ratnānyadāya sarvaśaḥ
तब उन्होंने नागराजों को भगाकर, बलपूर्वक पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया और उसके सब रत्नों को लेकर, दैत्यों को कुचलते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 14 (skanda.8.108.14)
स तां दंष्ट्रांकुरे लग्नां वहन् भाति मृगेश्वरः । विषाणलग्नां लम्बन्तीं मृणालीं गजराडिव
sa tāṁ daṁṣṭrāṁkure lagnāṁ vahan bhāti mṛgeśvaraḥ | viṣāṇalagnāṁ lambantīṁ mṛṇālīṁ gajarāḍiva
दाढ़ की नोक पर अटकी हुई उस पृथ्वी को धारण किए हुए वह मृगेश्वर ऐसे शोभित हुए, जैसे कोई गजराज अपने दाँत में अटकी हुई लटकती हुई कमलनाल धारण किए हो।
श्लोक 15 (skanda.8.108.15)
स तां सागरमध्येन वहन्भाति मृगेश्वरः । वराहरूपी कालान्ते ब्रह्मेव वसुधां पुरा
sa tāṁ sāgaramadhyena vahanbhāti mṛgeśvaraḥ | varāharūpī kālānte brahmeva vasudhāṁ purā
समुद्र के मध्य से उसे धारण करते हुए वह वराहरूपधारी मृगेश्वर ऐसे शोभित हुए, जैसे प्राचीनकाल में प्रलय के अन्त में ब्रह्मा ने पृथ्वी को धारण किया था।
श्लोक 16 (skanda.8.108.16)
स सागरन्तमुत्तीर्य भगवान्नन्दिवर्धनः । स्वस्थाने स्थापयामास महीं तां पुनरेव हि
sa sāgarantamuttīrya bhagavānnandivardhanaḥ | svasthāne sthāpayāmāsa mahīṁ tāṁ punareva hi
तब भगवान् नन्दिवर्धन समुद्र को पार करके उस पृथ्वी को पुनः उसके स्थान पर स्थापित कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.8.108.17)
ततः शक्राय लोकाँस्त्रीनदात् स मधुसूदनः । उवाच राजा त्वन्नोद्य मित्रञ्चाहं तवानघ
tataḥ śakrāya lokā~strīnadāt sa madhusūdanaḥ | uvāca rājā tvannodya mitrañcāhaṁ tavānagha
तब मधुसूदन ने इन्द्र को तीनों लोक प्रदान किए और कहा - हे निष्पाप! अब से तुम हमारे राजा हो और मैं तुम्हारा मित्र हूँ।
श्लोक 18 (skanda.8.108.18)
येन्येपि तेरयः केचिद्भविष्यन्त्यसुरेश्वराः । तेषामपि वधं घोरं करिष्यामि न संशयः
yenyepi terayaḥ kecidbhaviṣyantyasureśvarāḥ | teṣāmapi vadhaṁ ghoraṁ kariṣyāmi na saṁśayaḥ
भविष्य में जो भी अन्य असुर तुम्हारे शत्रु होंगे, उनका भी मैं भयंकर वध करूँगा - इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 19 (skanda.8.108.19)
ततस्तमृषयः सर्वे देवताश्च सवासवाः । ऊचुः स्वां मूर्त्तिमास्थाय यथा पूर्वं तथा भव
tatastamṛṣayaḥ sarve devatāśca savāsavāḥ | ūcuḥ svāṁ mūrttimāsthāya yathā pūrvaṁ tathā bhava
तब समस्त ऋषियों और वासव सहित देवताओं ने उनसे कहा - अपना मूल स्वरूप धारण करके पूर्व की भाँति हो जाइए।
श्लोक 20 (skanda.8.108.20)
वराह उवाच । इयं मूर्त्तिर्मया देवाः प्राप्ता परमवर्च्चसा । न चानया रतिः काचित् प्राप्ता मे सदृशी भुवि
varāha uvāca | iyaṁ mūrttirmayā devāḥ prāptā paramavarccasā | na cānayā ratiḥ kācit prāptā me sadṛśī bhuvi
वराह ने कहा - हे देवगण! मैंने यह स्वरूप परम तेज के द्वारा प्राप्त किया है, और इस पृथ्वी पर मुझे इसके समान कोई और आनन्द नहीं मिला।
श्लोक 21 (skanda.8.108.21)
सोहं कञ्चिद्विहृत्येह कालं मूर्त्यानया सुखम् । भविष्यामि पुनर्देवः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः
sohaṁ kañcidvihṛtyeha kālaṁ mūrtyānayā sukham | bhaviṣyāmi punardevaḥ satyametad bravīmi vaḥ
अतः मैं कुछ काल तक इसी स्वरूप से यहाँ सुखपूर्वक विहार करूँगा, और फिर से देव-स्वरूप हो जाऊँगा - यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 22 (skanda.8.108.22)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे देवाः सवासवाः । प्रदक्षिणमुपावृत्य जग्मुः स्थानानि सर्वशः
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā sarve devāḥ savāsavāḥ | pradakṣiṇamupāvṛtya jagmuḥ sthānāni sarvaśaḥ
सनत्कुमार ने कहा - उनका यह वचन सुनकर वासव सहित सभी देवता उनकी प्रदक्षिणा करके अपने-अपने स्थानों को चले गए।
श्लोक 23 (skanda.8.108.23)
गतेषु देवसंघेषु भगवान्नन्दिवर्धनः । विजहार सुखं तत्र हत्वा दानवपुंगवम्
gateṣu devasaṁgheṣu bhagavānnandivardhanaḥ | vijahāra sukhaṁ tatra hatvā dānavapuṁgavam
देवसमूहों के चले जाने पर, उस दानवश्रेष्ठ का वध करके, भगवान् नन्दिवर्धन वहाँ सुखपूर्वक विहार करने लगे।
श्लोक 24 (skanda.8.108.24)
तस्य तत्रोपतिष्ठन्तमृग्यो भूत्वा सहस्रशः । वैदिक्योप्सरसः शुभ्रास्ताभिस्सह रराम सः
tasya tatropatiṣṭhantamṛgyo bhūtvā sahasraśaḥ | vaidikyopsarasaḥ śubhrāstābhissaha rarāma saḥ
वैदिक अप्सराएँ हजारों की संख्या में सुन्दर मृगियों का रूप धारण करके वहाँ उनकी सेवा में उपस्थित हुईं, और उन्हीं के साथ वे विहार करने लगे।
श्लोक 25 (skanda.8.108.25)
स ताभिर्विचरन्देवो महात्मा नन्दिवर्धनः । रेमे मत्तो महानागो यथारण्ये करेणुभिः
sa tābhirvicarandevo mahātmā nandivardhanaḥ | reme matto mahānāgo yathāraṇye kareṇubhiḥ
वे महात्मा देव नन्दिवर्धन उनके साथ विचरण करते हुए इस प्रकार रमण करने लगे, जैसे कोई मदमत्त महान् गजराज वन में हथिनियों के साथ रमण करता है।
श्लोक 26 (skanda.8.108.26)
स सिंह इव सिंहीभिः शार्दूल इव चोन्नदनन् । रराम सागरानूपे ऐरावत इवापरः
sa siṁha iva siṁhībhiḥ śārdūla iva connadanan | rarāma sāgarānūpe airāvata ivāparaḥ
वे सिंहनियों के साथ सिंह के समान, गरजते हुए व्याघ्र के समान, और मानो दूसरे ऐरावत के समान, समुद्र-तट के जलाशयों में रमण करते रहे।
श्लोक 27 (skanda.8.108.27)
रममाणस्य सिद्धाश्च ऋषयश्च तपोधनाः । पुष्पाणां रुचिरा वृष्टीः पातयन्ति वियत्स्थिताः
ramamāṇasya siddhāśca ṛṣayaśca tapodhanāḥ | puṣpāṇāṁ rucirā vṛṣṭīḥ pātayanti viyatsthitāḥ
इस प्रकार रमण करते हुए उन पर सिद्ध और तपोधन ऋषिगण आकाश में स्थित होकर सुन्दर पुष्पों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 28 (skanda.8.108.28)
तुष्टुवुश्चापरे नित्यं चक्रुश्चैनं प्रदक्षिणम् । देवदुन्दुभयो नित्यं सर्व एवान्ववादयन्
tuṣṭuvuścāpare nityaṁ cakruścainaṁ pradakṣiṇam | devadundubhayo nityaṁ sarva evānvavādayan
अन्य लोग निरन्तर उनकी स्तुति करते और उनकी प्रदक्षिणा करते रहते थे, तथा दिव्य दुन्दुभियाँ निरन्तर बजती रहती थीं।
श्लोक 29 (skanda.8.108.29)
नृत्यन्त्यप्सरसश्चास्य वराहस्याग्रतस्तदा । वादयन्ति च गन्धर्वा गायन्ति च महात्मनः
nṛtyantyapsarasaścāsya varāhasyāgratastadā | vādayanti ca gandharvā gāyanti ca mahātmanaḥ
उस महात्मा वराह के आगे अप्सराएँ नृत्य करने लगीं, और गन्धर्व वाद्य बजाने तथा गायन करने लगे।
श्लोक 30 (skanda.8.108.30)
रमयन्तो वराहन्तं देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः । यक्षाः पुण्यजनना ये च तथा देवजनाश्च ये
ramayanto varāhantaṁ devāścendrapurogamāḥ | yakṣāḥ puṇyajananā ye ca tathā devajanāśca ye
इन्द्र प्रमुख देवगण, यक्ष, पुण्यजन, तथा अन्य दिव्य जन भी उस वराह को प्रसन्न करते हुए वहाँ उपस्थित हुए।
श्लोक 31 (skanda.8.108.31)
यातुधानाश्च ये केचिद् ब्रह्मधानाश्च सर्वशः । मनुष्याः पशवश्चैव ऋषयश्चैव सर्वशः
yātudhānāśca ye kecid brahmadhānāśca sarvaśaḥ | manuṣyāḥ paśavaścaiva ṛṣayaścaiva sarvaśaḥ
जो भी यातुधान और ब्रह्मधान थे, तथा मनुष्य, पशु और समस्त ऋषिगण भी वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 32 (skanda.8.108.32)
राजन्याः क्षत्रियाः सर्वे निकायाश्चैव सर्वशः । तत्राजग्मुर्निरीक्षन्तो वराहस्योत्सवं शुभम्
rājanyāḥ kṣatriyāḥ sarve nikāyāścaiva sarvaśaḥ | tatrājagmurnirīkṣanto varāhasyotsavaṁ śubham
सभी राजन्य, क्षत्रिय और अन्य सब जातियाँ भी वहाँ आकर वराह के उस शुभ उत्सव को देखने लगीं।
श्लोक 33 (skanda.8.108.33)
बह्वाश्चर्यसमाकीर्णं बह्वालक्ष्य सदैव च । एवं तस्याभवद् व्यास वराहस्य महात्मनः । उत्सवः सुमहान् दिव्यः प्रत्यहं नन्दिवर्धनः
bahvāścaryasamākīrṇaṁ bahvālakṣya sadaiva ca | evaṁ tasyābhavad vyāsa varāhasya mahātmanaḥ | utsavaḥ sumahān divyaḥ pratyahaṁ nandivardhanaḥ
अनेक आश्चर्यों से भरा हुआ और सदैव अनेक अद्भुत दृश्यों से युक्त - हे व्यास! इस प्रकार उस महात्मा वराह नन्दिवर्धन का यह अत्यन्त महान् और दिव्य उत्सव प्रतिदिन होता रहा।
श्लोक 34 (skanda.8.108.34)
तस्योत्सोवोसौ ऋषिसंघजुष्टः सदा सुरैः सिद्धजनैश्च जुष्टः । गन्धर्वयक्षोरगराक्षसैश्च विद्याधरैश्चैव सहाप्सरोभिः
tasyotsovosau ṛṣisaṁghajuṣṭaḥ sadā suraiḥ siddhajanaiśca juṣṭaḥ | gandharvayakṣoragarākṣasaiśca vidyādharaiścaiva sahāpsarobhiḥ
उस उत्सव का सेवन ऋषिसमूह करते थे, देवता और सिद्धजन सदैव उसमें सम्मिलित रहते थे, तथा गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, विद्याधर और अप्सराएँ भी उसमें शामिल होती थीं।