Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 109

वृकबन्ध

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

श्लोक 1 (skanda.8.109.1)

सनत्कुमार उवाच । तस्य कालेन महता रमतः शक्तिनन्दन । भार्यायां चित्रलेखायां वृकोनामाभवत्सुतः

sanatkumāra uvāca | tasya kālena mahatā ramataḥ śaktinandana | bhāryāyāṁ citralekhāyāṁ vṛkonāmābhavatsutaḥ

सनत्कुमार ने कहा - हे शक्तिनन्दन! दीर्घ काल तक इस प्रकार विहार करते हुए उनकी पत्नी चित्रलेखा से वृक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 2 (skanda.8.109.2)

स वृको बलवान्नित्यं विचरन् पृथिवीमिमाम् । नर्दमानोवधील्लोके भूतानि शतशो महान्

sa vṛko balavānnityaṁ vicaran pṛthivīmimām | nardamānovadhīlloke bhūtāni śataśo mahān

वह बलशाली महान् वृक निरन्तर इस पृथ्वी पर विचरण करते हुए, गरजते हुए, संसार में सैकड़ों प्राणियों का वध करता रहता था।

श्लोक 3 (skanda.8.109.3)

अथाससाद शैलेन्द्र हिमवन्तं महागिरिम् । गौरीकूटसमीपे च कार्तिकेयालयं शुभम्

athāsasāda śailendra himavantaṁ mahāgirim | gaurīkūṭasamīpe ca kārtikeyālayaṁ śubham

एक बार वह पर्वतराज महागिरि हिमालय के पास पहुँचा और गौरीकूट के समीप कार्तिकेय के शुभ निवासस्थान में जा पहुँचा।

श्लोक 4 (skanda.8.109.4)

तमजानँस्तदाभ्येत्य बलेनाविनयेन च । नादयानो द्रुमाञ्छुभ्रान् रत्नहेमविभूषितान्

tamajāna~stadābhyetya balenāvinayena ca | nādayāno drumāñchubhrān ratnahemavibhūṣitān

उस स्थान को न पहचानते हुए, बल और उद्दण्डता से वहाँ पहुँचकर, वह गरजने लगा और रत्नों तथा सोने से सुसज्जित उन शुभ वृक्षों पर टूट पड़ा।

श्लोक 5 (skanda.8.109.5)

सर्वर्तुपुष्पफलदान् सर्वकामप्रदानपि । शिलामणिमयाः शुभ्राः शातकुम्भमयास्तथा

sarvartupuṣpaphaladān sarvakāmapradānapi | śilāmaṇimayāḥ śubhrāḥ śātakumbhamayāstathā

जो सभी ऋतुओं में फल-फूल देनेवाले और सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले थे, तथा मणि और स्वच्छ स्वर्ण से बने हुए वृक्षों को भी उसने नहीं छोड़ा।

श्लोक 6 (skanda.8.109.6)

हरितालमयाश्चान्यास्तथा मानःशिलोपालान् । उत्पाट्योत्पाट्य वेगेन बभञ्ज रूषितो यथा

haritālamayāścānyāstathā mānaḥśilopālān | utpāṭyotpāṭya vegena babhañja rūṣito yathā

अन्य हरताल से तथा मैनसिल के पत्थरों से बने वृक्षों को भी बार-बार उखाड़कर, क्रुद्ध होकर उसने वेगपूर्वक तोड़-फोड़ दिया।

श्लोक 7 (skanda.8.109.7)

स गर्जमानः सततं गजो मत्त इवापरः । बभञ्ज तद्वनं शुभ्रं कार्तिकेस्य धीमतः

sa garjamānaḥ satataṁ gajo matta ivāparaḥ | babhañja tadvanaṁ śubhraṁ kārtikesya dhīmataḥ

वह मानो कोई दूसरा मदमत्त गज हो, इस प्रकार निरन्तर गरजते हुए उसने बुद्धिमान् कार्तिकेय के उस शुभ वन को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

श्लोक 8 (skanda.8.109.8)

तस्य गर्जितशब्देन वनभङ्गस्वनेन च । स्कन्दस्य गणपः शूरो निर्जगाम स मन्दिरात्

tasya garjitaśabdena vanabhaṅgasvanena ca | skandasya gaṇapaḥ śūro nirjagāma sa mandirāt

उसकी गर्जना की ध्वनि और वन के टूटने की आवाज सुनकर, स्कन्द का शूरवीर गणपति अपने भवन से बाहर निकल आया।

श्लोक 9 (skanda.8.109.9)

कोकवक्त्र इति ख्यातो दृढं स्कन्दस्य वल्लभः । महात्मा बलसंपन्नो गत्वा वृकमवैक्षत

kokavaktra iti khyāto dṛḍhaṁ skandasya vallabhaḥ | mahātmā balasaṁpanno gatvā vṛkamavaikṣata

कोकवक्त्र नाम से प्रसिद्ध, स्कन्द का दृढ़ प्रिय, बलसम्पन्न वह महात्मा वहाँ जाकर वृक को देखने लगा।

श्लोक 10 (skanda.8.109.10)

स तं दृष्ट्वा महाकायं तरुणं प्रियदर्शनम् । जीमूतमिव नर्दन्तं किञ्चित्प्रकुपिताननम्

sa taṁ dṛṣṭvā mahākāyaṁ taruṇaṁ priyadarśanam | jīmūtamiva nardantaṁ kiñcitprakupitānanam

उस विशालकाय, तरुण, सुन्दर, कुछ क्रुद्ध मुखवाले और मेघ के समान गरजते हुए वृक को देखकर -

श्लोक 11 (skanda.8.109.11)

उवाच वचनं हृष्टः कोकवक्त्रो हसन्निव । कस्य त्वमिह संप्राप्तो बालो देवगृहं शुभम्

uvāca vacanaṁ hṛṣṭaḥ kokavaktro hasanniva | kasya tvamiha saṁprāpto bālo devagṛhaṁ śubham

- प्रसन्न होकर कोकवक्त्र ने हँसते हुए-से यह कहा - अरे बालक! तू किसका पुत्र है और इस देवगृह में क्यों आ पहुँचा है?

श्लोक 12 (skanda.8.109.12)

न जानीषे किमेतत्त्वं स्कन्दस्य सुमहात्मनः । वेश्म देवैस्सगन्धर्वैः सयक्षोरगकिन्नरैः

na jānīṣe kimetattvaṁ skandasya sumahātmanaḥ | veśma devaissagandharvaiḥ sayakṣoragakinnaraiḥ

क्या तू नहीं जानता कि यह महात्मा स्कन्द का निवासस्थान है, जो देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, नागों और किन्नरों सहित -

श्लोक 13 (skanda.8.109.13)

कृतं दयितभत्यर्थं गणैश्चापि सुपूजितम् । कुमारो मन्दरं यातः सर्वैस्सह गणेश्वरैः

kṛtaṁ dayitabhatyarthaṁ gaṇaiścāpi supūjitam | kumāro mandaraṁ yātaḥ sarvaissaha gaṇeśvaraiḥ

- अपने प्रिय सेवकों के लिए बनाया गया है, और गणों द्वारा सम्मानित है? कुमार तो सब गणेश्वरों के साथ मन्दराचल पर्वत को गए हुए हैं,

श्लोक 14 (skanda.8.109.14)

रक्षार्थं मामिह स्थाप्य वारयामि ततो हि ते । तुष्टोस्मि तव रूपेण बलेन वपुषा तथा

rakṣārthaṁ māmiha sthāpya vārayāmi tato hi te | tuṣṭosmi tava rūpeṇa balena vapuṣā tathā

मुझे यहाँ रक्षा के लिए नियुक्त करके गए हैं, इसलिए मैं तुझे रोकता हूँ। हाँ, तेरे रूप, बल और शरीर से मैं प्रसन्न हूँ।

श्लोक 15 (skanda.8.109.15)

उपारमस्व तेन त्वा ब्रवीमि सुमहाबल । अहं करिष्ये यद् भग्नं तथैव पुनरेव हि

upāramasva tena tvā bravīmi sumahābala | ahaṁ kariṣye yad bhagnaṁ tathaiva punareva hi

हे महाबली! इसीलिए मैं तुझसे कहता हूँ - अब रुक जा। जो कुछ तूने तोड़ा है, उसे मैं पहले जैसा ही बनवा दूँगा,

श्लोक 16 (skanda.8.109.16)

वक्ष्ये देवं च तं सम्यक् त्वदर्थं शूकरेश्वर । यथा न कुप्यते तुभ्यं प्रसादं ते करोति च

vakṣye devaṁ ca taṁ samyak tvadarthaṁ śūkareśvara | yathā na kupyate tubhyaṁ prasādaṁ te karoti ca

और हे शूकरराज-पुत्र! मैं उस देव से तेरे लिए भलीभाँति निवेदन करूँगा, जिससे वे तुझ पर क्रुद्ध न होकर तुझ पर कृपा करें।

श्लोक 17 (skanda.8.109.17)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वृकः संरक्तलोचनः । उवाच कोकवदनमिदं मृगपतिस्तदा

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā vṛkaḥ saṁraktalocanaḥ | uvāca kokavadanamidaṁ mṛgapatistadā

सनत्कुमार ने कहा - उसका यह वचन सुनकर लाल नेत्रोंवाला वह मृगपति वृक कोकवक्त्र से यह बोला -

श्लोक 18 (skanda.8.109.18)

न बिभेमि कुमारस्य तव वा पापचेतसः । बले मम कुमारोसौ न तुल्यः सगणेश्वरः

na bibhemi kumārasya tava vā pāpacetasaḥ | bale mama kumārosau na tulyaḥ sagaṇeśvaraḥ

मैं न तो कुमार से डरता हूँ, और न ही तुझ दुष्टबुद्धि से। बल में वह कुमार अपने गणेश्वरों सहित भी मेरे समान नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.8.109.19)

यद्वो बलञ्च दर्पश्च तत् कुरुध्वमशंकिताः । नामावशेषमेतद्वः कर्ताहं वनमन्ततः

yadvo balañca darpaśca tat kurudhvamaśaṁkitāḥ | nāmāvaśeṣametadvaḥ kartāhaṁ vanamantataḥ

तुम लोगों में जो भी बल और अभिमान है, वह निःशंक होकर दिखा दो; अन्ततः मैं तुम सबको केवल नाम-मात्र शेष कर दूँगा, और इस वन का भी यही हाल करूँगा।

श्लोक 20 (skanda.8.109.20)

ततः स वृक्षमुत्पाट्य हैमं वैदूर्यपल्लवम् । कोकवक्त्राय चिक्षेप ननाद च यथा वृषः

tataḥ sa vṛkṣamutpāṭya haimaṁ vaidūryapallavam | kokavaktrāya cikṣepa nanāda ca yathā vṛṣaḥ

सनत्कुमार ने कहा - तब उसने वैदूर्यमणि के पत्तोंवाला एक स्वर्ण-वृक्ष उखाड़कर कोकवक्त्र पर फेंका, और साँड़ के समान गरज उठा।

श्लोक 21 (skanda.8.109.21)

ततः प्रहस्य कोकास्यस्तमेवोद्गृह्य पादपम् । वृकं तं तेन संक्रुद्धः शिरस्यभिजघान ह

tataḥ prahasya kokāsyastamevodgṛhya pādapam | vṛkaṁ taṁ tena saṁkruddhaḥ śirasyabhijaghāna ha

तब कोकास्य ने हँसते हुए उसी वृक्ष को उठाकर, क्रुद्ध होकर उसी से वृक के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 22 (skanda.8.109.22)

स तेन सुप्रहारेण भ्रमित्वा मण्डलं मृगः । पपात भूमौ निःसंज्ञो यथा शक्रध्वजो महान्

sa tena suprahāreṇa bhramitvā maṇḍalaṁ mṛgaḥ | papāta bhūmau niḥsaṁjño yathā śakradhvajo mahān

उस भारी प्रहार से वह मृग एक चक्कर खाकर, चेतनाहीन होकर, ऐसे भूमि पर गिर पड़ा, जैसे कोई विशाल इन्द्रध्वज गिर पड़ता है।

श्लोक 23 (skanda.8.109.23)

ततस्तं पतितं दृष्टवा कोकास्यः प्रहसँस्तदा । बबन्ध पाशैर्बहुभिर्वेश्म चैव प्रवेशयत्

tatastaṁ patitaṁ dṛṣṭavā kokāsyaḥ prahasa~stadā | babandha pāśairbahubhirveśma caiva praveśayat

तब उसे गिरा हुआ देखकर कोकास्य हँसते हुए, अनेक पाशों से उसे बाँधकर अपने भवन के भीतर ले गया।

श्लोक 24 (skanda.8.109.24)

तं वद्धं पतितं दृष्टवा सहायास्तस्य ते मृगाः । प्रद्रुता सहसा सर्वे भयार्ता जीवितैषिणः

taṁ vaddhaṁ patitaṁ dṛṣṭavā sahāyāstasya te mṛgāḥ | pradrutā sahasā sarve bhayārtā jīvitaiṣiṇaḥ

उसे बँधा हुआ और गिरा हुआ देखकर उसके साथी मृग भय से पीड़ित होकर, अपने प्राणों की रक्षा की इच्छा से तुरन्त सब भाग खड़े हुए।

श्लोक 25 (skanda.8.109.25)

अथागात्तेन कालेन गणपैर्बहुभिर्वृतः । कार्तिकेयो मयूरेण कूजमानेन सानुगः

athāgāttena kālena gaṇapairbahubhirvṛtaḥ | kārtikeyo mayūreṇa kūjamānena sānugaḥ

इसी बीच बहुत से गणपतियों से घिरे हुए, बोलते हुए मयूर पर सवार कार्तिकेय अपने अनुचरों सहित वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 26 (skanda.8.109.26)

तस्य तत् कथयामास कोकवक्त्रो गणेश्वरः । वृकं च दर्शयामास पाशैर्बद्धं महाबलम्

tasya tat kathayāmāsa kokavaktro gaṇeśvaraḥ | vṛkaṁ ca darśayāmāsa pāśairbaddhaṁ mahābalam

गणेश्वर कोकवक्त्र ने उन्हें सब वृत्तान्त बताया, और पाशों से बँधे हुए उस महाबली वृक को भी दिखाया।

श्लोक 27 (skanda.8.109.27)

कोकवक्त्र उवाच । भगवन् वराहरूपस्य सुतः श्रीमान् वृकः किल । हिरण्याक्षो हतो येन दानवो देवकण्टकः

kokavaktra uvāca | bhagavan varāharūpasya sutaḥ śrīmān vṛkaḥ kila | hiraṇyākṣo hato yena dānavo devakaṇṭakaḥ

कोकवक्त्र ने कहा - हे भगवन्! यह श्रीमान् वृक उसी वराहरूपधारी के पुत्र हैं, जिन्होंने देवताओं के कण्टकस्वरूप उस दानव हिरण्याक्ष का वध किया था।

श्लोक 28 (skanda.8.109.28)

बभञ्जायं सुदुष्टात्मा सहितोन्यैर्वनं तव । ततः पाशैर्मया बद्धः क्रियतामस्य यत् परम्

babhañjāyaṁ suduṣṭātmā sahitonyairvanaṁ tava | tataḥ pāśairmayā baddhaḥ kriyatāmasya yat param

इस दुष्टात्मा ने अन्यों के साथ मिलकर आपके इस वन को नष्ट कर दिया; इसलिए मैंने इसे पाशों से बाँध दिया है। अब जो भी उचित हो, वह इसके साथ किया जाए।

श्लोक 29 (skanda.8.109.29)

स्कन्द उवाच । नायं शक्यो मयाद्येह मोक्तुं मृगकुलाधमः । मुक्ते वक्तव्यता लोके भविष्यति न संशय

skanda uvāca | nāyaṁ śakyo mayādyeha moktuṁ mṛgakulādhamaḥ | mukte vaktavyatā loke bhaviṣyati na saṁśaya

स्कन्द ने कहा - इस मृगकुल में अधम इस वृक को मैं आज यहाँ मुक्त नहीं कर सकता; इसे छोड़ देने पर संसार में निन्दा होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 30 (skanda.8.109.30)

देवो मां वक्ष्यते व्यक्तं स्कन्दो भीतो न संशयः । यो मुमोच सुतं तस्य वराहस्य कृतागसम्

devo māṁ vakṣyate vyaktaṁ skando bhīto na saṁśayaḥ | yo mumoca sutaṁ tasya varāhasya kṛtāgasam

वह देव भी स्पष्ट रूप से मुझसे कहेंगे कि 'यह स्कन्द भयभीत हो गया', इसमें सन्देह नहीं - क्योंकि मैंने उस अपराधी वराहपुत्र को छोड़ दिया।

श्लोक 31 (skanda.8.109.31)

उक्तो गतश्चाहमद्य स्थाणुना परमात्मना । मा क्षमेथा वराहस्य तनुं त्वासौ ह्वयेद्यदि

ukto gataścāhamadya sthāṇunā paramātmanā | mā kṣamethā varāhasya tanuṁ tvāsau hvayedyadi

परमात्मा स्थाणु ने मुझसे आज ही यह कहा था - 'यदि वराह स्वयं तुझे बुलाए, तो भी तू उसे क्षमा मत करना' - उसी आदेश का पालन करते हुए मैं यहाँ आया हूँ।

श्लोक 32 (skanda.8.109.32)

इयञ्च मम तेनाद्य शक्तिर्दत्तातिभास्वरा । संवर्त्तिकेति विख्याता सर्वास्त्रबलनाशनी

iyañca mama tenādya śaktirdattātibhāsvarā | saṁvarttiketi vikhyātā sarvāstrabalanāśanī

और आज उन्होंने ही मुझे यह अत्यन्त तेजस्वी शक्ति भी दी है, जो संवर्तिका के नाम से प्रसिद्ध है और सब अस्त्रों के बल को नष्ट कर देनेवाली है।

श्लोक 33 (skanda.8.109.33)

सोयं दुरात्मा दुर्वृत्तः सर्वलोकप्रबाधकः । गृह्यतां वध्यतां चैव क्षिप्रमाविष्कृतं बलात्

soyaṁ durātmā durvṛttaḥ sarvalokaprabādhakaḥ | gṛhyatāṁ vadhyatāṁ caiva kṣipramāviṣkṛtaṁ balāt

यह दुष्ट आचरणवाला दुरात्मा समस्त लोकों को कष्ट देनेवाला है; इसे तुरन्त पकड़ा जाए और बलपूर्वक इसका खुलेआम वध किया जाए।

श्लोक 34 (skanda.8.109.34)

सनत्कुमार उवाच । तत एनं बहिस्सर्वे स्कन्दस्य गणनायकाः । बद्ध्वा बहुविधैः पाशैर्यातयन्त सहस्रशः

sanatkumāra uvāca | tata enaṁ bahissarve skandasya gaṇanāyakāḥ | baddhvā bahuvidhaiḥ pāśairyātayanta sahasraśaḥ

सनत्कुमार ने कहा - तब स्कन्द के गणनायकों ने उसे बाहर ले जाकर, अनेक प्रकार के पाशों से बाँधकर, हजारों प्रहारों से यातना देने लगे।

श्लोक 35 (skanda.8.109.35)

स यात्यमानो दुःखार्त्तो विललाप यथा नरः । निरयस्थो दुराचारः कर्मभिः स्वैः सुपाशितः

sa yātyamāno duḥkhārtto vilalāpa yathā naraḥ | nirayastho durācāraḥ karmabhiḥ svaiḥ supāśitaḥ

इस प्रकार यातना पाता हुआ वह दुःख से पीड़ित होकर विलाप करने लगा, जैसे नरक में पड़ा हुआ कोई दुराचारी अपने ही कर्मों के पाशों में जकड़ा हुआ विलाप करता है।

श्लोक 36 (skanda.8.109.36)

तं यात्यमानं सन्दृश्य नारदः सुमहातपाः । गत्वा न्यवेदयत्तस्य वराहस्यामितात्मनः

taṁ yātyamānaṁ sandṛśya nāradaḥ sumahātapāḥ | gatvā nyavedayattasya varāhasyāmitātmanaḥ

उसे इस प्रकार यातना पाते हुए देखकर महातपस्वी नारद वहाँ से जाकर अपरिमित आत्मबलवाले वराह को यह सब निवेदन करने लगे -

श्लोक 37 (skanda.8.109.37)

एष पुत्रो वृकस्तुभ्यं बद्धः पाशैरनेकशः । यात्यते कार्तिकेयस्य किङ्करैर्दुष्कृती यथा

eṣa putro vṛkastubhyaṁ baddhaḥ pāśairanekaśaḥ | yātyate kārtikeyasya kiṅkarairduṣkṛtī yathā

यह आपका पुत्र वृक, अनेक पाशों से बँधा हुआ, कार्तिकेय के दासों द्वारा इस तरह यातना दिया जा रहा है, जैसे कोई महापापी।

श्लोक 38 (skanda.8.109.38)

न नाम तव देवस्य लोकार्थायोद्यतस्य च । करोति सन्नतिं स्कन्दो बालभावाच्च रोषतः

na nāma tava devasya lokārthāyodyatasya ca | karoti sannatiṁ skando bālabhāvācca roṣataḥ

संसार के हित के लिए उद्यत आप जैसे देव के प्रति भी स्कन्द बाल-स्वभाव और क्रोध के कारण कोई विनम्रता नहीं दिखा रहे हैं।

श्लोक 39 (skanda.8.109.39)

अथवा स्वमलं स्कन्दो मन्यते बलवत्तरम् । त्वत्तोत्मनस्ततः पुत्रं तव पाशैर्बबन्ध ह

athavā svamalaṁ skando manyate balavattaram | tvattotmanastataḥ putraṁ tava pāśairbabandha ha

अथवा शायद स्कन्द अपने बल को आपसे भी अधिक बलवान् मानता है, और इसीलिए उसने आपके पुत्र को पाशों से बाँध दिया है।

श्लोक 40 (skanda.8.109.40)

तद्यावदेव तं नासौ प्रमापयति देवप । तावदेव भवान् गत्वा विमोचयतु मा चिरम्

tadyāvadeva taṁ nāsau pramāpayati devapa | tāvadeva bhavān gatvā vimocayatu mā ciram

अतः जब तक वह उसे मार नहीं डालता, हे देवश्रेष्ठ! तब तक ही आप वहाँ जाकर उसे बिना विलम्ब किए छुड़ा लीजिए।

श्लोक 41 (skanda.8.109.41)

सनत्कुमार उवाच । नारदस्य वचः श्रुत्वा वराहो नन्दिवर्धनः । जीमूत इव कालान्ते ननाद रूषिताननः

sanatkumāra uvāca | nāradasya vacaḥ śrutvā varāho nandivardhanaḥ | jīmūta iva kālānte nanāda rūṣitānanaḥ

सनत्कुमार ने कहा - नारद का यह वचन सुनकर वराह नन्दिवर्धन क्रोध से भरे हुए मुखवाले होकर, प्रलयकालीन मेघ के समान गरज उठे।

श्लोक 42 (skanda.8.109.42)

तस्य क्रोधात्तदा वह्निर्नेत्राभ्यामति दीप्तिमान् । निश्चक्राम जगत् सर्वं संहरन्निव तेजसा

tasya krodhāttadā vahnirnetrābhyāmati dīptimān | niścakrāma jagat sarvaṁ saṁharanniva tejasā

उनके क्रोध से उनके दोनों नेत्रों से अत्यन्त तेजस्वी अग्नि निकलने लगी, जो मानो अपने तेज से सारे संसार को भस्म कर देना चाहती थी।

श्लोक 43 (skanda.8.109.43)

उत्थाय चासनाद्देवः सहसैवोन्निरीक्षणः । प्रतस्थे शिखरं दिव्यं गौर्या मृगपतिः स्वयम्

utthāya cāsanāddevaḥ sahasaivonnirīkṣaṇaḥ | pratasthe śikharaṁ divyaṁ gauryā mṛgapatiḥ svayam

वे देव तुरन्त ही अपने आसन से उठकर, ऊपर की ओर देखते हुए, स्वयं उस मृगपति ने गौरी के दिव्य शिखर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 44 (skanda.8.109.44)

स कम्पयन्महीं सर्वां स्तूयमानो महात्मभिः । उत्पातानुत्थितान् पश्यन् जगामाविनिवारितः

sa kampayanmahīṁ sarvāṁ stūyamāno mahātmabhiḥ | utpātānutthitān paśyan jagāmāvinivāritaḥ

सारी पृथ्वी को कँपाते हुए, महात्माओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए, तथा उत्पन्न होते हुए अपशकुनों को देखते हुए भी, वे बिना रुके आगे बढ़ते गए।

श्लोक 45 (skanda.8.109.45)

गच्छतस्तस्य देवस्य पन्थानं भुजगोच्छिनत् । दंष्ट्रा च वृक्षमापत्य पपात धरणीतले

gacchatastasya devasya panthānaṁ bhujagocchinat | daṁṣṭrā ca vṛkṣamāpatya papāta dharaṇītale

उस देव के मार्ग को एक सर्प ने काट दिया, और उनकी दाढ़ एक वृक्ष से टकराकर धरती पर गिर पड़ी।

श्लोक 46 (skanda.8.109.46)

रुधिरं चास्रवद्वक्त्राद्धृदयञ्च प्रवेपत । भयञ्चास्याभवत्तत्र वेगो येनाभिहन्यते

rudhiraṁ cāsravadvaktrāddhṛdayañca pravepata | bhayañcāsyābhavattatra vego yenābhihanyate

उनके मुख से रक्त बहने लगा, हृदय काँपने लगा, और उन्हें वहाँ ऐसा भय हुआ, मानो किसी वेग से आहत हो गए हों।

श्लोक 47 (skanda.8.109.47)

वायवः प्रतिलोमाश्च उरसा चापतद् भुवि । स्नेहश्चास्य प्रियां स्मृत्वा तदात्यर्थमजायत

vāyavaḥ pratilomāśca urasā cāpatad bhuvi | snehaścāsya priyāṁ smṛtvā tadātyarthamajāyata

प्रतिकूल वायु चलने लगी, वे छाती के बल भूमि पर गिर पड़े, और उस समय उन्हें अपनी प्रिय पत्नी का स्मरण करके अत्यन्त स्नेह उमड़ आया।

श्लोक 48 (skanda.8.109.48)

एताँश्चान्यान् सुबहुश उत्पातान् भयसूचकान् । अनादृत्य मृगेन्द्रोसौ जगामैव महाबलः

etā~ścānyān subahuśa utpātān bhayasūcakān | anādṛtya mṛgendrosau jagāmaiva mahābalaḥ

इन सब और इनके अतिरिक्त भय के सूचक अन्य अनेक अपशकुनों की उपेक्षा करते हुए, वह महाबली मृगेन्द्र आगे ही बढ़ता गया।

श्लोक 49 (skanda.8.109.49)

तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य निमित्तानि च सुव्रत । पूजां सज्जामकुर्वन्ते देवलोके दिवौकसः

taṁ prasthitamabhiprekṣya nimittāni ca suvrata | pūjāṁ sajjāmakurvante devaloke divaukasaḥ

हे सुव्रत! उन्हें इस प्रकार प्रस्थान करते और उन अपशकुनों को देखकर देवलोक में देवगण उनकी पूजा की तैयारी करने लगे।

श्लोक 50 (skanda.8.109.50)

स सिद्धसंघैरनुगम्यमानो यक्षैश्च गन्धर्वमहोरगैश्च । रक्षोगणैश्चारणकिन्नरैश्च जगाम गौरीशिखरं महात्मा

sa siddhasaṁghairanugamyamāno yakṣaiśca gandharvamahoragaiśca | rakṣogaṇaiścāraṇakinnaraiśca jagāma gaurīśikharaṁ mahātmā

सिद्धगणों, यक्षों, गन्धर्वों, महानागों, राक्षसगणों, चारणों और किन्नरों द्वारा अनुगमन किए जाते हुए वे महात्मा गौरीशिखर की ओर चले गए।

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110