अम्बिका खण्ड · अध्याय 110
देवदेवस्य देवलोकगमन
श्लोक 1 (skanda.8.110.1)
सनत्कुमार उवाच । विनिर्गम्य कुमारोपि रम्यात् स्वभवनात्तदा । रराम गणपैः सार्धं क्रीडनैर्बहुभिः शुभैः
sanatkumāra uvāca | vinirgamya kumāropi ramyāt svabhavanāttadā | rarāma gaṇapaiḥ sārdhaṁ krīḍanairbahubhiḥ śubhaiḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब कुमार भी अपने रमणीय भवन से बाहर निकलकर, गणों के साथ अनेक शुभ क्रीड़ाओं में रमण करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.110.2)
आनयामास तञ्चापि वराहस्य सुतं प्रभुः । वृकं विमुच्य पाशेभ्य उत्ससर्ज हसन् विभुः
ānayāmāsa tañcāpi varāhasya sutaṁ prabhuḥ | vṛkaṁ vimucya pāśebhya utsasarja hasan vibhuḥ
उन प्रभु ने वराह के उस पुत्र वृक को भी मँगवाया, और उसे पाशों से मुक्त करके हँसते हुए विभु ने उसे छोड़ दिया।
श्लोक 3 (skanda.8.110.3)
उत्सृष्टं धावमानञ्च पुनर्जग्राह वेगितम् । पुनरेवोत्सृजच्चैनं जग्राह च पुनः पुनः । एवं रराम तेनासौ वराहोभ्यागमच्च तम्
utsṛṣṭaṁ dhāvamānañca punarjagrāha vegitam | punarevotsṛjaccainaṁ jagrāha ca punaḥ punaḥ | evaṁ rarāma tenāsau varāhobhyāgamacca tam
छोड़ते ही वेगपूर्वक भागते हुए उसे उन्होंने फिर पकड़ लिया, फिर छोड़ दिया, और बार-बार पकड़ते रहे; इस प्रकार वे उसके साथ खेलने लगे, और इतने में वराह भी वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 4 (skanda.8.110.4)
शिलां गृहीत्वा महतीं संक्रुद्धोन्तकसन्निभः । चिक्षेप कार्त्तिकेयाय नादयन् जलदो यथा
śilāṁ gṛhītvā mahatīṁ saṁkruddhontakasannibhaḥ | cikṣepa kārttikeyāya nādayan jalado yathā
यमराज के समान क्रुद्ध हुए वराह ने एक विशाल शिला उठाकर, मेघ के समान गरजते हुए, कार्तिकेय पर फेंकी।
श्लोक 5 (skanda.8.110.5)
तामापतन्तीं बहुधा नदन्तीं विहायसा मृत्युसमानरूपाम् । जग्राह वेगेन महातिवेगां कोकामुखः प्रज्वलितामिवोल्काम्
tāmāpatantīṁ bahudhā nadantīṁ vihāyasā mṛtyusamānarūpām | jagrāha vegena mahātivegāṁ kokāmukhaḥ prajvalitāmivolkām
आकाश में बार-बार गरजते हुए, मृत्यु के समान भयंकर रूपवाली, अत्यन्त वेगवती उस शिला को आती हुई देखकर, कोकास्य ने उसे प्रज्वलित उल्का के समान वेगपूर्वक पकड़ लिया।
श्लोक 6 (skanda.8.110.6)
ततश्चक्रं सहस्रारं युगान्ताग्निसमप्रभम् । विनायकस्याव्यग्राय गणाय व्यसृजत् प्रभुः
tataścakraṁ sahasrāraṁ yugāntāgnisamaprabham | vināyakasyāvyagrāya gaṇāya vyasṛjat prabhuḥ
फिर उन प्रभु ने प्रलयकालीन अग्नि के समान तेजस्वी सहस्र-आरोंवाला चक्र उस अविचल गण पर छोड़ दिया।
श्लोक 7 (skanda.8.110.7)
तदन्तकप्रतीकाशं चक्रं सर्वसुरारिहम् । विवेश सगणस्तूर्णं ततस्तद् विन्यवर्तत
tadantakapratīkāśaṁ cakraṁ sarvasurāriham | viveśa sagaṇastūrṇaṁ tatastad vinyavartata
यमराज के समान भयंकर, सब असुरशत्रुओं का नाशक वह चक्र गण-सहित उस पर आ पड़ा, परन्तु तुरन्त ही वापस लौट गया।
श्लोक 8 (skanda.8.110.8)
तन्निवृत्तं पुनश्चक्रमकृत्वा कार्यमुज्ज्वलम् । न जग्राह तदा विष्णुरवमेने च तत्तदा
tannivṛttaṁ punaścakramakṛtvā kāryamujjvalam | na jagrāha tadā viṣṇuravamene ca tattadā
अपने उज्ज्वल कार्य को पूर्ण किए बिना ही वापस लौटे उस चक्र को विष्णु ने ग्रहण नहीं किया, और उस समय उसका तिरस्कार किया।
श्लोक 9 (skanda.8.110.9)
तत्तदानचितं तेन चक्रं दानवघातिना । विष्णुना प्रययौ क्षिप्रं स्वमेव भवनं प्रति
tattadānacitaṁ tena cakraṁ dānavaghātinā | viṣṇunā prayayau kṣipraṁ svameva bhavanaṁ prati
दानवों का नाश करनेवाले उस विष्णु द्वारा तिरस्कृत हुआ वह चक्र तुरन्त अपने ही भवन को लौट गया।
श्लोक 10 (skanda.8.110.10)
तस्मिञ्चक्रे तदा याते भगवान्नन्दिवर्धनः । वृक्षमुत्पाट्य वेगेन कुमारमभिजघ्निवान्
tasmiñcakre tadā yāte bhagavānnandivardhanaḥ | vṛkṣamutpāṭya vegena kumāramabhijaghnivān
उस चक्र के चले जाने पर भगवान् नन्दिवर्धन ने एक वृक्ष उखाड़कर वेगपूर्वक कुमार पर प्रहार किया।
श्लोक 11 (skanda.8.110.11)
अगण्य तं प्रहारन्तु भगवाननलात्मजः । शक्तिं संवर्त्तिकां क्रोधाच्चिक्षेप च ननाद च
agaṇya taṁ prahārantu bhagavānanalātmajaḥ | śaktiṁ saṁvarttikāṁ krodhāccikṣepa ca nanāda ca
उस प्रहार की उपेक्षा करके अग्निपुत्र भगवान् ने क्रोधपूर्वक संवर्तिका नामक शक्ति फेंकी और गरज उठे।
श्लोक 12 (skanda.8.110.12)
सा दहन्तीव तेजांसि नदन्ती बहुधा तदा । हन्तुं वराहं प्रययौ शक्तिर्दिव्य इवाशुगः
sā dahantīva tejāṁsi nadantī bahudhā tadā | hantuṁ varāhaṁ prayayau śaktirdivya ivāśugaḥ
मानो तेजों को जलाती हुई और बार-बार गरजती हुई वह दिव्य शक्ति वराह का वध करने के लिए किसी वेगवान् बाण के समान चली गई।
श्लोक 13 (skanda.8.110.13)
तामापतन्तीं वेगेन भगवान्नन्दिवर्धनः । जघानास्त्रैर्बहुविधैर्नादयन् सिंहराडिव
tāmāpatantīṁ vegena bhagavānnandivardhanaḥ | jaghānāstrairbahuvidhairnādayan siṁharāḍiva
वेगपूर्वक आती हुई उस शक्ति को भगवान् नन्दिवर्धन ने सिंहराज के समान गरजते हुए अनेक प्रकार के अस्त्रों से मारा।
श्लोक 14 (skanda.8.110.14)
तानि सा भस्मसात् कृत्वा शक्तिः संवर्त्तिका शुभा । विवेश हृदयं तस्य कामिनीव दृढं प्रिया
tāni sā bhasmasāt kṛtvā śaktiḥ saṁvarttikā śubhā | viveśa hṛdayaṁ tasya kāminīva dṛḍhaṁ priyā
उस शुभ संवर्तिका शक्ति ने उन सब अस्त्रों को भस्म करके, दृढ़ प्रेम रखनेवाली प्रेयसी के समान उसके हृदय में प्रवेश कर लिया।
श्लोक 15 (skanda.8.110.15)
स तया भिन्नहृदयो योगेन परमेण ह । योगीव देहं तं त्यक्त्वा देहेनान्येन तस्थिवान्
sa tayā bhinnahṛdayo yogena parameṇa ha | yogīva dehaṁ taṁ tyaktvā dehenānyena tasthivān
उससे हृदय विदीर्ण होने पर उन्होंने परम योग के द्वारा, किसी योगी के समान, उस देह को त्यागकर दूसरी देह में स्थिति की।
श्लोक 16 (skanda.8.110.16)
सोन्यद्देहं समास्थाय पौराणं सुरसत्तमः । देवैः सर्वैः परिवृतो जगाम भवमन्दिरम्
sonyaddehaṁ samāsthāya paurāṇaṁ surasattamaḥ | devaiḥ sarvaiḥ parivṛto jagāma bhavamandiram
उस देवश्रेष्ठ ने अपना प्राचीन मूल दिव्य रूप धारण करके, सब देवताओं से घिरे हुए, भव के भवन की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 17 (skanda.8.110.17)
तत्रापश्यन्महादेवं जटामुकुटधारिणम् । चन्द्रलेखांशुजालौघनिरस्ततिमिरोत्करम्
tatrāpaśyanmahādevaṁ jaṭāmukuṭadhāriṇam | candralekhāṁśujālaughanirastatimirotkaram
वहाँ उन्होंने महादेव को जटाओं के मुकुटवाला, चन्द्रकला की किरणों के समूह से समस्त अन्धकार को दूर करनेवाला देखा।
श्लोक 18 (skanda.8.110.18)
भद्रपीठे समासीनं काञ्चने मणिभूषणे । भ्राजमानं श्रियात्यर्थं पार्वत्या पार्श्वसंस्थया
bhadrapīṭhe samāsīnaṁ kāñcane maṇibhūṣaṇe | bhrājamānaṁ śriyātyarthaṁ pārvatyā pārśvasaṁsthayā
वे मणियों से अलंकृत स्वर्ण भद्रासन पर विराजमान थे, और पार्श्व में स्थित पार्वती के साथ अत्यन्त शोभा से देदीप्यमान हो रहे थे।
श्लोक 19 (skanda.8.110.19)
गणैश्च विविधाकारैर्बहुभिः कामरूपिभिः । नृत्तगीतप्रियैर्नित्यं समन्तात् परिवारितम्
gaṇaiśca vividhākārairbahubhiḥ kāmarūpibhiḥ | nṛttagītapriyairnityaṁ samantāt parivāritam
विविध रूपोंवाले, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, नृत्य और गीत में प्रीति रखनेवाले अनेक गणों से वे सब ओर से घिरे हुए थे।
श्लोक 20 (skanda.8.110.20)
तं दृष्टवा शंकरं विष्णुः प्रसन्नेनान्तरात्मना । तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैरिदञ्चोवाच सुस्वरम्
taṁ dṛṣṭavā śaṁkaraṁ viṣṇuḥ prasannenāntarātmanā | tuṣṭāva vividhaiḥ stotrairidañcovāca susvaram
उन शंकर को देखकर विष्णु ने प्रसन्न अन्तरात्मा से अनेक प्रकार की स्तुतियों द्वारा उनकी स्तुति की और मधुर स्वर में यह कहा -
श्लोक 21 (skanda.8.110.21)
वाराहं रूपमास्थाय त्वत्तेजोबृंहितेन मे । रणे विक्रम्य भगवन् हिरण्याक्षो निषूदितः
vārāhaṁ rūpamāsthāya tvattejobṛṁhitena me | raṇe vikramya bhagavan hiraṇyākṣo niṣūditaḥ
हे भगवन्! आपके ही तेज से बढ़ी हुई शक्ति से, वराह रूप धारण करके मैंने युद्ध में पराक्रम दिखाकर हिरण्याक्ष का वध किया।
श्लोक 22 (skanda.8.110.22)
त्वं देव कारणं नित्यं संभूतेः प्रलयस्य च । त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगदव्यक्तमूर्त्तिना
tvaṁ deva kāraṇaṁ nityaṁ saṁbhūteḥ pralayasya ca | tvayā sarvamidaṁ vyāptaṁ jagadavyaktamūrttinā
हे देव! आप ही सृष्टि और प्रलय के नित्य कारण हैं। आपने ही अपने अव्यक्त स्वरूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है।
श्लोक 23 (skanda.8.110.23)
त्वत्प्रसादेन देवेश ब्रह्माहं शक्र एव च । पूज्याः स्म लोके सततं तथैवान्ये दिवौकसः
tvatprasādena deveśa brahmāhaṁ śakra eva ca | pūjyāḥ sma loke satataṁ tathaivānye divaukasaḥ
हे देवेश! आपकी ही कृपा से ब्रह्मा, मैं और इन्द्र, तथा अन्य सब देवगण भी संसार में निरन्तर पूजनीय हैं।
श्लोक 24 (skanda.8.110.24)
त्वयि प्रीते महादेव सर्वे प्रीता वयं प्रभो । त्वयि क्रुद्धे विनाशो नो भविता नात्र संशयः
tvayi prīte mahādeva sarve prītā vayaṁ prabho | tvayi kruddhe vināśo no bhavitā nātra saṁśayaḥ
हे महादेव! हे प्रभो! आपके प्रसन्न होने पर हम सब प्रसन्न रहते हैं; और आपके क्रुद्ध होने पर हमारा विनाश निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 25 (skanda.8.110.25)
स्तुवन्तमेवं भगवान् विष्णुं चन्द्रार्धशेखरः । सहस्रसूर्यतेजस्कः प्रीतः प्रोवाच शंकरः
stuvantamevaṁ bhagavān viṣṇuṁ candrārdhaśekharaḥ | sahasrasūryatejaskaḥ prītaḥ provāca śaṁkaraḥ
इस प्रकार स्तुति करते हुए विष्णु से अर्धचन्द्रधारी, सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर कहा -
श्लोक 26 (skanda.8.110.26)
भक्त्या तुष्टोस्मि ते विष्णो देवकार्योद्यमेन च । वरं वरय भद्रन्ते यस्ते मनसि वर्तते
bhaktyā tuṣṭosmi te viṣṇo devakāryodyamena ca | varaṁ varaya bhadrante yaste manasi vartate
हे विष्णो! तुम्हारी भक्ति से और देवकार्य में तुम्हारे उद्यम से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो; जो कुछ तुम्हारे मन में है, वह वर माँग लो।
श्लोक 27 (skanda.8.110.27)
विष्णुरुवाच । यदि तुष्टोसि नो देव यदि देयो वरश्च नः । यत्तत् पापहरं दिव्यं व्रतमादेष्टुमर्हसि
viṣṇuruvāca | yadi tuṣṭosi no deva yadi deyo varaśca naḥ | yattat pāpaharaṁ divyaṁ vratamādeṣṭumarhasi
विष्णु ने कहा - हे देव! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं और यदि हमें कोई वर देना चाहते हैं, तो जो वह पापनाशक दिव्य व्रत है, वह हमें बताने की कृपा करें,
श्लोक 28 (skanda.8.110.28)
यदाश्रित्य वयं सर्वे सशक्रास्सार्वकामिकम् । युद्धे जेष्याम दैतेयान् दुःखशोकविवर्जिताः
yadāśritya vayaṁ sarve saśakrāssārvakāmikam | yuddhe jeṣyāma daiteyān duḥkhaśokavivarjitāḥ
जिसका आश्रय लेकर हम सब, इन्द्र सहित, सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले उस व्रत के प्रभाव से, दुःख और शोक से रहित होकर युद्ध में दैत्यों पर विजय प्राप्त कर सकें।
श्लोक 29 (skanda.8.110.29)
देवदेव उवाच । हन्त वः कथयिष्यामि गुह्यमेतत् सनातनम् । व्रतं पाशुपतं दिव्यं येन कामानवाप्स्यथ
devadeva uvāca | hanta vaḥ kathayiṣyāmi guhyametat sanātanam | vrataṁ pāśupataṁ divyaṁ yena kāmānavāpsyatha
देवाधिदेव ने कहा - अच्छा, मैं तुम्हें यह सनातन गुह्य रहस्य बताता हूँ - वह दिव्य पाशुपत व्रत, जिससे तुम अपनी सब कामनाओं को प्राप्त कर सकोगे।
श्लोक 30 (skanda.8.110.30)
इत्युक्त्वा देवदेवेशो देवानां हितकाम्यया । ययौ दिवमथामन्त्र्य देवीं गिरिवरात्मजाम्
ityuktvā devadeveśo devānāṁ hitakāmyayā | yayau divamathāmantrya devīṁ girivarātmajām
सनत्कुमार ने कहा - ऐसा कहकर देवताओं के हित की कामना से देवाधिदेव ने पर्वतराज की पुत्री देवी से आज्ञा लेकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 31 (skanda.8.110.31)
अथ हिमगिरितुल्यचारुमूर्त्तिं वृषभवरं भगवाँस्तदाधिरूढः । सुरगणसहितः प्रभुस्सुमेरुं व्रतमुपदेष्टुमना जगाम शर्वः
atha himagiritulyacārumūrttiṁ vṛṣabhavaraṁ bhagavā~stadādhirūḍhaḥ | suragaṇasahitaḥ prabhussumeruṁ vratamupadeṣṭumanā jagāma śarvaḥ
तब हिमालय के समान सुन्दर स्वरूपवाले उत्तम वृषभ पर सवार होकर, देवगणों सहित, वह व्रत सिखाने की इच्छा से प्रभु शर्व सुमेरु पर्वत की ओर चले गए।