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अम्बिका खण्ड · अध्याय 111

दानधर्म

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

श्लोक 1 (skanda.8.111.1)

व्यास उवाच । गते दिवं महादेवे व्रतमादेष्टुमुत्तमम् । एकाकिनी महादेवी किञ्चक्रे तदनन्तरम्

vyāsa uvāca | gate divaṁ mahādeve vratamādeṣṭumuttamam | ekākinī mahādevī kiñcakre tadanantaram

व्यास ने कहा - जब महादेव उत्तम व्रत सिखाने के लिए स्वर्गलोक चले गए, तब अकेली रह गई महादेवी ने उसके बाद क्या किया?

श्लोक 2 (skanda.8.111.2)

सनत्कुमार उवाच । गते दिवं महादेवे देवीं गिरिवरात्मजाम् । उपतस्थुर्महाभागा देव्यो लोकस्य मातरः

sanatkumāra uvāca | gate divaṁ mahādeve devīṁ girivarātmajām | upatasthurmahābhāgā devyo lokasya mātaraḥ

सनत्कुमार ने कहा - महादेव के स्वर्गलोक चले जाने पर, पर्वतराज-पुत्री देवी के पास संसार की माताएँ कहलानेवाली महाभागा देवियाँ आ उपस्थित हुईं -

श्लोक 3 (skanda.8.111.3)

भरतस्य सुताग्नेस्तु मालिनीत्यभिविश्रुता । शुचावती च देवस्य पर्जन्यस्य सुताव्यया

bharatasya sutāgnestu mālinītyabhiviśrutā | śucāvatī ca devasya parjanyasya sutāvyayā

अग्नि की पुत्री और भरत की माता, मालिनी नाम से प्रसिद्ध, तथा देवता पर्जन्य की अविनाशी पुत्री शुचावती,

श्लोक 4 (skanda.8.111.4)

सावित्री वेदमाता च गायत्री दुर्गया सह । श्रीः कीर्तिश्चैव लक्ष्मीश्च धृतिः प्रज्ञा तथैव च

sāvitrī vedamātā ca gāyatrī durgayā saha | śrīḥ kīrtiścaiva lakṣmīśca dhṛtiḥ prajñā tathaiva ca

सावित्री, वेदमाता गायत्री, दुर्गा के साथ, श्री, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति और प्रज्ञा भी,

श्लोक 5 (skanda.8.111.5)

ख्यातिर्दितिर्दनुश्चैव अदितिः सिंहिका खशा । राका कुहूः सिनीवाली तथैवानुमतिः शुभा

khyātirditirdanuścaiva aditiḥ siṁhikā khaśā | rākā kuhūḥ sinīvālī tathaivānumatiḥ śubhā

ख्याति, दिति, दनु, अदिति, सिंहिका, खशा, राका, कुहू, सिनीवाली, तथा शुभा अनुमति -

श्लोक 6 (skanda.8.111.6)

गङ्गा सरस्वती चैव तथान्याः सरितः शुभाः । ऋषीणां चैव याः पत्न्यो देवानां यक्षरक्षसाम् । उरगाणां खगानाञ्च गन्धर्वाणां तथैव च

gaṅgā sarasvatī caiva tathānyāḥ saritaḥ śubhāḥ | ṛṣīṇāṁ caiva yāḥ patnyo devānāṁ yakṣarakṣasām | uragāṇāṁ khagānāñca gandharvāṇāṁ tathaiva ca

गंगा, सरस्वती और अन्य शुभ नदियाँ, तथा ऋषियों, देवताओं, यक्षों, राक्षसों, नागों, पक्षियों और गन्धर्वों की जो पत्नियाँ थीं -

श्लोक 7 (skanda.8.111.7)

एतास्सर्वास्तथागम्य नमस्कृत्य च पार्वतीम् । पप्रच्छुः सर्वधर्मज्ञा धर्मं धर्मार्थसंश्रिताः

etāssarvāstathāgamya namaskṛtya ca pārvatīm | papracchuḥ sarvadharmajñā dharmaṁ dharmārthasaṁśritāḥ

ये सब वहाँ आकर और पार्वती को नमस्कार करके, सम्पूर्ण धर्म को जाननेवाली और धर्म तथा अर्थ का आश्रय लेनेवाली उन देवियों ने धर्म के विषय में पूछा -

श्लोक 8 (skanda.8.111.8)

केन धर्मेण देवेशे तपसा वा शुभानने । सुमहत् प्राप्य पुण्यं किञ्चाक्षय्यं प्रकीर्तितम्

kena dharmeṇa deveśe tapasā vā śubhānane | sumahat prāpya puṇyaṁ kiñcākṣayyaṁ prakīrtitam

हे देवेशी! हे शुभानने! किस धर्म के द्वारा अथवा किस तप के द्वारा महान् पुण्य प्राप्त होता है, और कौन-सा पुण्य अक्षय कहा गया है?

श्लोक 9 (skanda.8.111.9)

देव्युवाच । युष्माकन्तु हितार्थाय लोकानाञ्चैव सुव्रताः । कथयिष्याम्यहं धर्मं यथावदनुपूर्वशः

devyuvāca | yuṣmākantu hitārthāya lokānāñcaiva suvratāḥ | kathayiṣyāmyahaṁ dharmaṁ yathāvadanupūrvaśaḥ

देवी ने कहा - हे सुव्रताओं! तुम्हारे और सम्पूर्ण लोकों के हित के लिए मैं यथावत् क्रमपूर्वक धर्म का वर्णन करूँगी।

श्लोक 10 (skanda.8.111.10)

अन्नदानात् परं दानं नैव किञ्चिद्धि विद्यते । अन्नाद् भवन्ति भूतानि तस्मात्तदधिकं स्मृतम्

annadānāt paraṁ dānaṁ naiva kiñciddhi vidyate | annād bhavanti bhūtāni tasmāttadadhikaṁ smṛtam

अन्नदान से बढ़कर कोई भी दान नहीं है। अन्न से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, इसीलिए वह सर्वाधिक कहा गया है।

श्लोक 11 (skanda.8.111.11)

अन्नं यस्तु सुसंस्कृत्य प्रयच्छेत द्विजातये । स सर्वकामानाप्नोति पूज्यते च त्रिविष्टपे

annaṁ yastu susaṁskṛtya prayaccheta dvijātaye | sa sarvakāmānāpnoti pūjyate ca triviṣṭape

जो व्यक्ति भलीभाँति पका हुआ अन्न द्विज को देता है, वह सब कामनाओं को प्राप्त करता है, और स्वर्गलोक में पूजा जाता है।

श्लोक 12 (skanda.8.111.12)

मयूरहंसयुक्तेन सर्वकामसमृद्धिना । विमानेनार्कभासेन अन्नदो याति वै दिवम्

mayūrahaṁsayuktena sarvakāmasamṛddhinā | vimānenārkabhāsena annado yāti vai divam

मयूरों और हंसों से युक्त, सब कामनाओं से समृद्ध, सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर चढ़कर अन्नदाता स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 13 (skanda.8.111.13)

यदि मानुष्यमायाति कदाचित् स नरोत्तमः । धनधान्यसमाकीर्णः कुलीनः स्याच्च रूपवान्

yadi mānuṣyamāyāti kadācit sa narottamaḥ | dhanadhānyasamākīrṇaḥ kulīnaḥ syācca rūpavān

यदि वह श्रेष्ठ पुरुष कभी मनुष्य-योनि में लौटता है, तो धन-धान्य से परिपूर्ण, कुलीन और रूपवान् होता है।

श्लोक 14 (skanda.8.111.14)

यथाशक्ति तु यो दद्याद् दिवसे दिवसे नरः । स तेन कर्मणाप्नोति प्रजापतिसलोकताम्

yathāśakti tu yo dadyād divase divase naraḥ | sa tena karmaṇāpnoti prajāpatisalokatām

जो मनुष्य प्रतिदिन अपनी शक्ति के अनुसार अन्नदान करता है, वह उस कर्म से प्रजापति के लोक में सहवास प्राप्त करता है।

श्लोक 15 (skanda.8.111.15)

कदाचिदपि यो दद्यादन्नं विप्राय संस्कृतम् । तस्यापि तच्छतगुणं सहस्रगुणमेव च

kadācidapi yo dadyādannaṁ viprāya saṁskṛtam | tasyāpi tacchataguṇaṁ sahasraguṇameva ca

जो एक बार भी विधिवत् पका हुआ अन्न ब्राह्मण को देता है, उसे भी वह दान सौ गुना, हजार गुना होकर -

श्लोक 16 (skanda.8.111.16)

उपतिष्ठति लोकेषु इहापि च सुखी भवेत् । अवधूतमवज्ञातमसत्कृतमथापि च

upatiṣṭhati lokeṣu ihāpi ca sukhī bhavet | avadhūtamavajñātamasatkṛtamathāpi ca

लोकों में उसकी सेवा में उपस्थित रहता है, और इस लोक में भी वह सुखी होता है। और जो अनादरपूर्वक, तिरस्कारपूर्वक अथवा असम्मानपूर्वक भी -

श्लोक 17 (skanda.8.111.17)

अन्नं प्रदद्याद्यो देव्यो यादृशं तादृशं शुभाः । तस्यापि नरके घोरे यात्यमानस्य राक्षसैः

annaṁ pradadyādyo devyo yādṛśaṁ tādṛśaṁ śubhāḥ | tasyāpi narake ghore yātyamānasya rākṣasaiḥ

हे शुभाओं! जैसा-तैसा भी अन्न देता है, उसे भी - घोर नरक में राक्षसों द्वारा ले जाए जाते समय भी -

श्लोक 18 (skanda.8.111.18)

उपतिष्ठेत बहुधा तृप्तिर्येनास्य जायते । यदि मानुष्यमायाति कदाचित् स नरः पुनः

upatiṣṭheta bahudhā tṛptiryenāsya jāyate | yadi mānuṣyamāyāti kadācit sa naraḥ punaḥ

बार-बार वह तृप्ति उपस्थित होती है, जिससे उसे सन्तोष मिलता है। और यदि वह मनुष्य फिर कभी मनुष्य-योनि में आता है, तो -

श्लोक 19 (skanda.8.111.19)

म्लेच्छेषु भोगी भवति रमते च यथामरः । अन्नेमेवं विशिष्टं हि तस्मान्न परमं भुवि

mleccheṣu bhogī bhavati ramate ca yathāmaraḥ | annemevaṁ viśiṣṭaṁ hi tasmānna paramaṁ bhuvi

वह म्लेच्छों में भी भोगी होकर देवता के समान रमण करता है। इस प्रकार अन्न इतना श्रेष्ठ है कि पृथ्वी पर उससे बढ़कर कुछ नहीं है।

श्लोक 20 (skanda.8.111.20)

अन्नं प्रजापतिः प्रोक्तं स च संवत्सरो मतः । संवत्सरश्च यज्ञोसौ यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितम्

annaṁ prajāpatiḥ proktaṁ sa ca saṁvatsaro mataḥ | saṁvatsaraśca yajñosau yajñe sarvaṁ pratiṣṭhitam

अन्न को ही प्रजापति कहा गया है, और वही संवत्सर (वर्ष) माना गया है। संवत्सर ही यज्ञ है, और यज्ञ में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है।

श्लोक 21 (skanda.8.111.21)

तस्माद् भवन्ति भूतानि स्थावराणि चराणि च । तस्मादन्नं विशिष्ठन्तु सर्वेभ्य इति वै श्रुतिः

tasmād bhavanti bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | tasmādannaṁ viśiṣṭhantu sarvebhya iti vai śrutiḥ

उसी से सब स्थावर और जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं। इसलिए यह श्रुति-वचन है कि अन्न सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 22 (skanda.8.111.22)

अन्नदानात्परं दानं नैव किञ्चिद्धि विद्यते । अन्नाद् भवन्ति भूतानि तस्मात्तद्वै प्रशस्यते

annadānātparaṁ dānaṁ naiva kiñciddhi vidyate | annād bhavanti bhūtāni tasmāttadvai praśasyate

अन्नदान से बढ़कर कोई भी दान नहीं है। अन्न से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, इसीलिए वही सराहनीय है।

श्लोक 23 (skanda.8.111.23)

सुगन्धाः शीतलाश्चापो रसैर्दिव्यैः समन्विताः । यः प्रयच्छति विप्रेभ्यस्तस्य दानफलं शृणु

sugandhāḥ śītalāścāpo rasairdivyaiḥ samanvitāḥ | yaḥ prayacchati viprebhyastasya dānaphalaṁ śṛṇu

जो व्यक्ति सुगन्धित, शीतल और दिव्य रसों से युक्त जल ब्राह्मणों को देता है, उसके दान का फल सुनो -

श्लोक 24 (skanda.8.111.24)

विमानं सूर्यसंकाशमप्सरोगणनादितम् । सोधिरूह्य दिवं याति वरुणस्य सलोकताम्

vimānaṁ sūryasaṁkāśamapsarogaṇanāditam | sodhirūhya divaṁ yāti varuṇasya salokatām

वह सूर्य के समान तेजस्वी और अप्सराओं के समूह की ध्वनि से गुंजायमान विमान पर सवार होकर स्वर्गलोक में वरुण के लोक में जा पहुँचता है।

श्लोक 25 (skanda.8.111.25)

तत्रासावयुतान्यष्टावुषित्वा देववत् सुखी । कुले महत्यसंकीर्णो जायते धनधान्यवान्

tatrāsāvayutānyaṣṭāvuṣitvā devavat sukhī | kule mahatyasaṁkīrṇo jāyate dhanadhānyavān

वहाँ अस्सी हजार वर्षों तक देवता के समान सुखी होकर निवास करके, वह किसी उत्तम, निर्दोष कुल में धन-धान्य से सम्पन्न होकर जन्म लेता है।

श्लोक 26 (skanda.8.111.26)

आपान्तु पूर्णं यो भाण्डं ब्राह्मणाय प्रयच्छति । रसास्तस्योपतिष्ठन्ति पूज्यते च दिवं गतः

āpāntu pūrṇaṁ yo bhāṇḍaṁ brāhmaṇāya prayacchati | rasāstasyopatiṣṭhanti pūjyate ca divaṁ gataḥ

जो जल से भरा हुआ पात्र ब्राह्मण को देता है, उसकी सेवा में सब रस उपस्थित रहते हैं, और स्वर्गलोक में जाकर वह पूजा जाता है।

श्लोक 27 (skanda.8.111.27)

भाजनानि च यो दद्यात् सुपूर्णानि शुभाननाः । भाजनं स्यात् स भोगानां तारयेच्च पितॄन् भयात्

bhājanāni ca yo dadyāt supūrṇāni śubhānanāḥ | bhājanaṁ syāt sa bhogānāṁ tārayecca pitṝn bhayāt

हे शुभाननाओं! जो पूर्ण भरे हुए पात्र देता है, वह स्वयं भोगों का पात्र बनता है, और अपने पितरों को भय से पार कर देता है।

श्लोक 28 (skanda.8.111.28)

तडागं यस्तु कुर्वीत अपां देव्यः समृद्धिमत् । अपः पिबन्ति वै यत्र सर्वे जन्तव एव च

taḍāgaṁ yastu kurvīta apāṁ devyaḥ samṛddhimat | apaḥ pibanti vai yatra sarve jantava eva ca

हे देवियो! जो जल से समृद्ध कोई तालाब बनवाता है, जहाँ सब प्राणी जल पीते हैं -

श्लोक 29 (skanda.8.111.29)

तारयित्वा च स पितॄँस्तथैव च पितामहान् । प्रपितामहाँश्च लोकेषु कमिकेषु विहङ्गमः

tārayitvā ca sa pitṝ~stathaiva ca pitāmahān | prapitāmahā~śca lokeṣu kamikeṣu vihaṅgamaḥ

वह अपने पिता, पितामह और प्रपितामह - तीनों पीढ़ियों को उन-उन लोकों में पार कर देता है, और स्वयं पक्षी के समान -

श्लोक 30 (skanda.8.111.30)

चरते देववद्देव्यो वर्षायुतशतानि षट् । पुनश्च मानुषे लोके सर्वरोगविवर्जितः

carate devavaddevyo varṣāyutaśatāni ṣaṭ | punaśca mānuṣe loke sarvarogavivarjitaḥ

हे देवियो! वह छह लाख वर्षों तक देवता के समान विचरण करता है, और फिर मनुष्यलोक में सब रोगों से रहित होकर -

श्लोक 31 (skanda.8.111.31)

भोगी भवति भोगानां राजमात्रश्च जायते । दाता यज्या च बलवान् सुप्रभः प्रियदर्शनः

bhogī bhavati bhogānāṁ rājamātraśca jāyate | dātā yajyā ca balavān suprabhaḥ priyadarśanaḥ

वह भोगों का भोगी, राजतुल्य, दानशील, यज्ञ करनेवाला, बलवान्, तेजस्वी और प्रियदर्शन बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 32 (skanda.8.111.32)

अवटं यो नरः कुर्यादपां पूर्णं शुचिस्मिताः । दद्याच्च ब्राह्मणेभ्यस्तं भोजयित्वा यथार्थवत्

avaṭaṁ yo naraḥ kuryādapāṁ pūrṇaṁ śucismitāḥ | dadyācca brāhmaṇebhyastaṁ bhojayitvā yathārthavat

हे शुद्ध हास्यवाली देवियो! जो पुरुष जल से भरा हुआ कोई कुआँ बनवाकर, ब्राह्मणों को भलीभाँति भोजन कराकर उसे उन्हें अर्पित करता है,

श्लोक 33 (skanda.8.111.33)

अष्टाभिश्च विचित्राभिः पताकाभिरलंकृतम् । ध्वजेन वैजयन्त्या च पुष्पैश्च समलंकृतम्

aṣṭābhiśca vicitrābhiḥ patākābhiralaṁkṛtam | dhvajena vaijayantyā ca puṣpaiśca samalaṁkṛtam

आठ रंग-बिरंगी पताकाओं से सुसज्जित, ध्वजा और वैजयन्ती माला से, तथा पुष्पों से भी भलीभाँति अलंकृत करके -

श्लोक 34 (skanda.8.111.34)

स तारयित्वा तु पितॄन् विमानेन नरोत्तमः । यात्यप्सरोपगीतेन वरुणस्य सलोकताम्

sa tārayitvā tu pitṝn vimānena narottamaḥ | yātyapsaropagītena varuṇasya salokatām

वह श्रेष्ठ पुरुष अपने पितरों को पार करके, अप्सराओं द्वारा गाए जाते हुए विमान पर सवार होकर वरुण के लोक में सहवास पाता है।

श्लोक 35 (skanda.8.111.35)

हिरण्यं हेम भूमिं वा तिलान् रत्नानि वापि यः । प्रदद्यात् सर्वभूतेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु

hiraṇyaṁ hema bhūmiṁ vā tilān ratnāni vāpi yaḥ | pradadyāt sarvabhūtebhyastasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

जो चाँदी, सोना, भूमि, तिल अथवा रत्न सब प्राणियों के हित के लिए दान करता है, उसके पुण्य का फल सुनो -

श्लोक 36 (skanda.8.111.36)

स विमानेन महता सर्वलोकसमन्वितः । इन्द्रस्य लोकं संप्राप्य मोदते विबुधो यथा

sa vimānena mahatā sarvalokasamanvitaḥ | indrasya lokaṁ saṁprāpya modate vibudho yathā

वह विशाल विमान पर सवार होकर, सब लोकों में सम्मानित होते हुए, इन्द्र के लोक को प्राप्त करके देवता के समान आनन्दित होता है।

श्लोक 37 (skanda.8.111.37)

ततश्च्युतश्च धर्मात्मा सर्वकामसमृद्धिमान् । कुले महति लोकेसौ जायते सुभगश्च ह

tataścyutaśca dharmātmā sarvakāmasamṛddhimān | kule mahati lokesau jāyate subhagaśca ha

वहाँ से च्युत होने पर वह धर्मात्मा, सब कामनाओं से समृद्ध होकर, इस लोक में किसी महान् कुल में सौभाग्यशाली होकर जन्म लेता है।

श्लोक 38 (skanda.8.111.38)

यस्तु वृक्षं प्रकुरुते छायापुष्पफलोपगम् । पथि देव्यो नरः सोम्ये स तारयति वै पितॄन्

yastu vṛkṣaṁ prakurute chāyāpuṣpaphalopagam | pathi devyo naraḥ somye sa tārayati vai pitṝn

हे देवियो! जो सुखद मार्ग पर छाया, पुष्प और फल देनेवाला वृक्ष लगाता है, वह मनुष्य निश्चय ही अपने पितरों को पार कर देता है।

श्लोक 39 (skanda.8.111.39)

तथैव दत्त्वा विप्रेभ्यो निष्क्रीय च पुनर्नरः । स यत् फलमवाप्नोति तच्छृणुध्वं महाप्रभाः

tathaiva dattvā viprebhyo niṣkrīya ca punarnaraḥ | sa yat phalamavāpnoti tacchṛṇudhvaṁ mahāprabhāḥ

हे महाप्रभाओ! तथा वही वृक्ष विप्रों को देकर, फिर उनसे उसे मोल लेकर, वह मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह सुनो -

श्लोक 40 (skanda.8.111.40)

यावद् वृक्षस्य पुष्पाणि उपयुञ्जन्ति देहिनः । फलानि चैव भक्ष्यन्ते जन्तुभिः फलितस्य तु

yāvad vṛkṣasya puṣpāṇi upayuñjanti dehinaḥ | phalāni caiva bhakṣyante jantubhiḥ phalitasya tu

जब तक उस वृक्ष के फूलों का उपयोग प्राणी करते रहते हैं, और जब तक फलवाले वृक्ष के फल जीवों द्वारा खाए जाते रहते हैं -

श्लोक 41 (skanda.8.111.41)

तावद्वर्षसहस्राणि तारयित्वा पितॄनपि । सोमलोकं समासाद्य सोमृतं फलमाप्नुयात्

tāvadvarṣasahasrāṇi tārayitvā pitṝnapi | somalokaṁ samāsādya somṛtaṁ phalamāpnuyāt

उतने ही हजार वर्षों तक अपने पितरों को भी पार करके, वह चन्द्रलोक को प्राप्त करके अमृत के समान फल पाता है।

श्लोक 42 (skanda.8.111.42)

फलानि यः प्रयच्छेत ब्राह्मणेभ्यस्समाहितः । फलानां स तु भागी स्याद्बहूनां सुभगश्च ह

phalāni yaḥ prayaccheta brāhmaṇebhyassamāhitaḥ | phalānāṁ sa tu bhāgī syādbahūnāṁ subhagaśca ha

जो एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणों को फल देता है, वह स्वयं अनेक फलों का भागी और सौभाग्यशाली बनता है।

श्लोक 43 (skanda.8.111.43)

काष्ठानि यः प्रयच्छेत हेमन्ते नरसत्तमः । ब्राह्मणेभ्यस्तदा देव्यः सोग्निलोकं समश्नुते

kāṣṭhāni yaḥ prayaccheta hemante narasattamaḥ | brāhmaṇebhyastadā devyaḥ sognilokaṁ samaśnute

हे देवियो! जो श्रेष्ठ पुरुष हेमन्त ऋतु में ब्राह्मणों को ईंधन की लकड़ियाँ देता है, वह अग्निलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 44 (skanda.8.111.44)

भाजनं यः प्रयच्छेत हैमं रत्नविभूषितम् । सोप्सरःशतसंकीर्णे विमाने दिवि मोदते

bhājanaṁ yaḥ prayaccheta haimaṁ ratnavibhūṣitam | sopsaraḥśatasaṁkīrṇe vimāne divi modate

जो रत्नों से अलंकृत सुवर्ण-पात्र दान करता है, वह सैकड़ों अप्सराओं से भरे हुए विमान में स्वर्गलोक में आनन्द मनाता है।

श्लोक 45 (skanda.8.111.45)

राजतं यः प्रयच्छेत विप्रेभ्यो भाजनं शुभाः । स गान्धर्वपदं प्राप्य उर्वश्या सह मोदते

rājataṁ yaḥ prayaccheta viprebhyo bhājanaṁ śubhāḥ | sa gāndharvapadaṁ prāpya urvaśyā saha modate

हे शुभाओ! जो ब्राह्मणों को चाँदी का पात्र देता है, वह गन्धर्व-पद को प्राप्त करके उर्वशी के साथ आनन्द मनाता है।

श्लोक 46 (skanda.8.111.46)

ताम्रं यो भाजनं दद्याद् ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः । स भवेद् यक्षराजस्य यक्षो बलसमन्वितः

tāmraṁ yo bhājanaṁ dadyād brāhmaṇebhyo viśeṣataḥ | sa bhaved yakṣarājasya yakṣo balasamanvitaḥ

जो ब्राह्मणों को विशेष रूप से ताँबे का पात्र देता है, वह यक्षराज का बलशाली यक्ष बनता है।

श्लोक 47 (skanda.8.111.47)

गृहं यस्तु प्रयच्छेत सर्वकामसमृद्धिमत् । स लोकं ब्रह्मणः प्राप्य सर्वकामैर्निषेव्यते

gṛhaṁ yastu prayaccheta sarvakāmasamṛddhimat | sa lokaṁ brahmaṇaḥ prāpya sarvakāmairniṣevyate

जो सब कामनाओं से समृद्ध घर दान करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करके सब कामनाओं के द्वारा सेवित होता है।

श्लोक 48 (skanda.8.111.48)

सर्वकोटीः स तत्रोष्य चतस्रस्तेन कर्मणा । गृहमेधी यदा दाता भोगवाँश्चैव जायते

sarvakoṭīḥ sa tatroṣya catasrastena karmaṇā | gṛhamedhī yadā dātā bhogavā~ścaiva jāyate

वह उस कर्म से चारों कोटि युग वहाँ निवास करके, जब गृहस्थ दाता के रूप में लौटता है, तो भोगवान् बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 49 (skanda.8.111.49)

ओषधीर्यः प्रयच्छेत धान्यानि विविधानि च । स सर्वकामसंमृष्टं सोमलोकं समश्नुते

oṣadhīryaḥ prayaccheta dhānyāni vividhāni ca | sa sarvakāmasaṁmṛṣṭaṁ somalokaṁ samaśnute

जो औषधियाँ और विविध प्रकार के अन्न दान करता है, वह सब कामनाओं से युक्त सोमलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 50 (skanda.8.111.50)

तत्र वर्षसहस्राणि सप्त स्थित्वा पुनर्नरः । इह सर्व धनोपेतो भोगावानभिजायते

tatra varṣasahasrāṇi sapta sthitvā punarnaraḥ | iha sarva dhanopeto bhogāvānabhijāyate

वहाँ सात हजार वर्षों तक निवास करके, वह मनुष्य पुनः इस लोक में सब धनों से युक्त और भोगवान् होकर जन्म लेता है।

श्लोक 51 (skanda.8.111.51)

यस्तु क्षेत्रं प्रयच्छेत निष्पन्नं फलवत्पुनः । स तु क्षेत्रपतिर्भूत्वा प्राजापत्यं समश्नुते

yastu kṣetraṁ prayaccheta niṣpannaṁ phalavatpunaḥ | sa tu kṣetrapatirbhūtvā prājāpatyaṁ samaśnute

जो पका हुआ, फलदायी खेत दान करता है, वह क्षेत्रपति बनकर प्रजापति के लोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 52 (skanda.8.111.52)

यस्तु भूमिं प्रयच्छेत ब्रह्मणाय महात्मने । स सर्वलोकेषु सुखी विमानेन सुवर्चसा

yastu bhūmiṁ prayaccheta brahmaṇāya mahātmane | sa sarvalokeṣu sukhī vimānena suvarcasā

जो महात्मा ब्राह्मण को भूमि दान करता है, वह सब लोकों में तेजस्वी विमान पर सुखी होता है,

श्लोक 53 (skanda.8.111.53)

बहून्यब्दसहस्राणि चरते कामरूपवान् । यद्धि मानुष्यमायाति स नरः कालपर्ययात्

bahūnyabdasahasrāṇi carate kāmarūpavān | yaddhi mānuṣyamāyāti sa naraḥ kālaparyayāt

और अनेक हजार वर्षों तक इच्छानुसार रूप धारण करके विचरण करता है। कालान्तर में जब वह मनुष्य पुनः मनुष्य-योनि में आता है,

श्लोक 54 (skanda.8.111.54)

तत्र कामदुहा तस्य मही भवति सर्वशः । यस्तु वस्त्रं प्रयच्छेत ब्राह्मणाय महायशाः

tatra kāmaduhā tasya mahī bhavati sarvaśaḥ | yastu vastraṁ prayaccheta brāhmaṇāya mahāyaśāḥ

तब उसके लिए पृथ्वी ही सब प्रकार से कामधेनु के समान हो जाती है। और जो महायशस्वी पुरुष ब्राह्मण को वस्त्र दान करता है,

श्लोक 55 (skanda.8.111.55)

स लोकं प्राप्य वैराजं वर्षकोटिं सुखं वसेत् । आसनं यः प्रयच्छेत संवीतं ब्राह्मणाय वै

sa lokaṁ prāpya vairājaṁ varṣakoṭiṁ sukhaṁ vaset | āsanaṁ yaḥ prayaccheta saṁvītaṁ brāhmaṇāya vai

वह वैराज लोक को प्राप्त करके करोड़ों वर्षों तक सुखपूर्वक निवास करता है। और जो ब्राह्मण को वस्त्र से ढका हुआ आसन देता है,

श्लोक 56 (skanda.8.111.56)

स राज्यस्थानमाप्नोति स्वर्गं चाप्नोति विज्वरः । यस्तु शय्यां प्रयच्छेत स्वास्तीर्णां नरसत्तमः

sa rājyasthānamāpnoti svargaṁ cāpnoti vijvaraḥ | yastu śayyāṁ prayaccheta svāstīrṇāṁ narasattamaḥ

वह राज्य-पद प्राप्त करता है, और शोकरहित होकर स्वर्ग भी प्राप्त करता है। और जो श्रेष्ठ पुरुष सुसज्जित शय्या दान करता है,

श्लोक 57 (skanda.8.111.57)

स तु भार्याः प्रिया देव्यो बह्वीर्भक्ताः समश्नुते । यस्तु कन्यां प्रयच्छेत ब्राह्मणाय स्वलंकृताम्

sa tu bhāryāḥ priyā devyo bahvīrbhaktāḥ samaśnute | yastu kanyāṁ prayaccheta brāhmaṇāya svalaṁkṛtām

हे देवियो! वह अनेक प्रिय और भक्तिपरायण पत्नियाँ प्राप्त करता है। और जो सुसज्जित कन्या ब्राह्मण को विवाह में देता है,

श्लोक 58 (skanda.8.111.58)

स गत्वा पितृलोकं वै वर्षायुतशतं वसेत् । इह चापि पुनर्जातः सर्वकामसमन्वितः

sa gatvā pitṛlokaṁ vai varṣāyutaśataṁ vaset | iha cāpi punarjātaḥ sarvakāmasamanvitaḥ

वह पितृलोक को जाकर एक लाख वर्षों तक निवास करता है, और यहाँ भी पुनः सब कामनाओं से युक्त होकर जन्म लेता है।

श्लोक 59 (skanda.8.111.59)

भार्याः प्राप्नोति भक्ताश्च प्रजावाँश्चोपजायते । अश्वं यस्तु प्रयच्छेत हेमचित्रं सुलक्षणम्

bhāryāḥ prāpnoti bhaktāśca prajāvā~ścopajāyate | aśvaṁ yastu prayaccheta hemacitraṁ sulakṣaṇam

वह भक्तिपरायण पत्नियाँ प्राप्त करता है और सन्तानवान् होकर जन्म लेता है। और जो सोने से अलंकृत, शुभ लक्षणोंवाला घोड़ा दान करता है,

श्लोक 60 (skanda.8.111.60)

स तेन कर्मणा देव्यो गान्धर्वं लोकमश्नुते । रथमश्वं गजं दासीं कन्यां गृहमथापि च

sa tena karmaṇā devyo gāndharvaṁ lokamaśnute | rathamaśvaṁ gajaṁ dāsīṁ kanyāṁ gṛhamathāpi ca

हे देवियो! वह उस कर्म से गन्धर्वलोक प्राप्त करता है। और जो रथ, घोड़ा, हाथी, दासी, कन्या, तथा घर -

श्लोक 61 (skanda.8.111.61)

भूमिञ्च यः प्रयच्छेत स राजा भुवि जायते ।

bhūmiñca yaḥ prayaccheta sa rājā bhuvi jāyate |

- और साथ ही भूमि भी दान करता है, वह पृथ्वी पर राजा होकर जन्म लेता है। (आगे इस श्लोक का शेष चरण मूल में त्रुटित है।)

श्लोक 62 (skanda.8.111.62)

विधिना मन्त्रयुक्तेन तस्य धर्मफलं महत् । सर्वकामदुघा सास्य धेनुर्भूत्वोपतिष्ठति

vidhinā mantrayuktena tasya dharmaphalaṁ mahat | sarvakāmadughā sāsya dhenurbhūtvopatiṣṭhati

विधिपूर्वक मन्त्रों के साथ किए गए इस दान से उसे महान् धर्मफल प्राप्त होता है, और वह पृथ्वी सब कामनाओं को देनेवाली कामधेनु बनकर उसकी सेवा में उपस्थित रहती है।

श्लोक 63 (skanda.8.111.63)

जलधेनुं च यो दद्यात् तस्य दानफलं महत् । प्रापां शुभां तडागं वा कूपं वापि सुपुष्कलम्

jaladhenuṁ ca yo dadyāt tasya dānaphalaṁ mahat | prāpāṁ śubhāṁ taḍāgaṁ vā kūpaṁ vāpi supuṣkalam

जो जलधेनु का दान करता है, उसके दान का फल महान् होता है - अथवा जो शुभ प्याऊ, तालाब, या भरपूर कुआँ बनवाता है,

श्लोक 64 (skanda.8.111.64)

कृत्वा कुम्भान् सुसंपूर्णान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् । पुष्पैश्च विवधाकारैरभ्यर्च्य द्विजसत्तमान्

kṛtvā kumbhān susaṁpūrṇān gandhamālyairalaṁkṛtān | puṣpaiśca vivadhākārairabhyarcya dvijasattamān

पूर्ण भरे हुए, गन्ध और मालाओं से सजाए हुए घड़े बनवाकर, तथा विविध प्रकार के पुष्पों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करके,

श्लोक 65 (skanda.8.111.65)

भक्ष्यभोज्यैः सुप्तृप्ताँस्तान् तिलपात्राणि दापयेत् । दक्षिणां पुष्कलां दाद्यत् तेभ्यस्तां स्पर्शयेत्ततः

bhakṣyabhojyaiḥ suptṛptā~stān tilapātrāṇi dāpayet | dakṣiṇāṁ puṣkalāṁ dādyat tebhyastāṁ sparśayettataḥ

उन्हें खाद्य-भोज्य पदार्थों से भलीभाँति तृप्त करके, उन्हें तिल के पात्र दे, उन्हें प्रचुर दक्षिणा दे, और फिर उनसे उस जलधेनु का स्पर्श कराए,

श्लोक 66 (skanda.8.111.66)

आपः शिवाश्च सौम्याश्च तर्पयन्तु पितॄन्मम । कामगाः कामदातारो भवन्तु पितरः सदा

āpaḥ śivāśca saumyāśca tarpayantu pitṝnmama | kāmagāḥ kāmadātāro bhavantu pitaraḥ sadā

[संकल्प-मन्त्र] - 'ये शुभ और सौम्य जल मेरे पितरों को तृप्त करें; मेरे पितर सदा इच्छानुसार गमन करनेवाले और इच्छाओं को देनेवाले बनें।'

श्लोक 67 (skanda.8.111.67)

एवं दत्त्वा तु तां धेनुं पुनः क्रीत्वा च वै तदा । वाहयेत्तत् प्रपां देव्यो ब्रह्मलोकसमर्पणीम्

evaṁ dattvā tu tāṁ dhenuṁ punaḥ krītvā ca vai tadā | vāhayettat prapāṁ devyo brahmalokasamarpaṇīm

हे देवियो! इस प्रकार वह गौ दान करके और फिर उसे पुनः मोल लेकर, ब्रह्मलोक को अर्पित की जानेवाली उस प्याऊ को चलवाना चाहिए,

श्लोक 68 (skanda.8.111.68)

तिलपात्राणि दत्त्वा च तथा वस्त्रयुगं नवम् । सुवर्णस्य च सान्निध्यं फलानि विविधानि च

tilapātrāṇi dattvā ca tathā vastrayugaṁ navam | suvarṇasya ca sānnidhyaṁ phalāni vividhāni ca

और तिल के पात्र, एक नया वस्त्रयुग, थोड़ा सुवर्ण और विविध प्रकार के फल देकर -

श्लोक 69 (skanda.8.111.69)

ततो दद्याच्छुचिः स्नातो ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ।

tato dadyācchuciḥ snāto brāhmaṇebhyo yathāvidhi |

तब पवित्र होकर, स्नान करके, विधिपूर्वक ब्राह्मणों को दान देना चाहिए। (आगे इस श्लोक का शेष अंश मूल में त्रुटित है।)

श्लोक 70 (skanda.8.111.70)

घृतं गावः प्रसूयन्ते घृतं भूम्यां प्रतिष्ठितम् । घृतमग्निश्च देवाश्च घृतं मे संप्रदीयताम्

ghṛtaṁ gāvaḥ prasūyante ghṛtaṁ bhūmyāṁ pratiṣṭhitam | ghṛtamagniśca devāśca ghṛtaṁ me saṁpradīyatām

[मन्त्र] - 'घी को ही गौएँ उत्पन्न करती हैं, घी ही पृथ्वी में प्रतिष्ठित है; अग्नि और देवता भी घृतस्वरूप हैं - मुझे घृत प्राप्त हो।'

श्लोक 71 (skanda.8.111.71)

एवं विधानतो दत्त्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । यो नरो गां प्रयच्छेत सवत्सां कांस्यदोहनीम्

evaṁ vidhānato dattvā brahmalokamavāpnuyāt | yo naro gāṁ prayaccheta savatsāṁ kāṁsyadohanīm

इस प्रकार विधिपूर्वक दान करके वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। अब सुनो, जो पुरुष बछड़े सहित, काँसे के दुहनी-पात्र सहित गाय दान करता है,

श्लोक 72 (skanda.8.111.72)

हेमशृङ्गीं रूप्यखुरां दुकूलक्षौमवासिताम् । शय्यास्तरणसंपन्नां बहुपुष्पफलैर्युताम्

hemaśṛṅgīṁ rūpyakhurāṁ dukūlakṣaumavāsitām | śayyāstaraṇasaṁpannāṁ bahupuṣpaphalairyutām

जिसके सींग सोने से मढ़े हों, खुर चाँदी से मढ़े हों, जो रेशमी और सूती वस्त्र से ढकी हो, बिछौने से युक्त हो और फल-फूलों से अलंकृत हो,

श्लोक 73 (skanda.8.111.73)

ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा तु गन्धमाल्यैरलंकृताम् । दानकाले ततस्तस्याः सुरा गात्राणि संश्रिताः

brāhmaṇāṁstarpayitvā tu gandhamālyairalaṁkṛtām | dānakāle tatastasyāḥ surā gātrāṇi saṁśritāḥ

ब्राह्मणों को तृप्त करके, उस गन्ध और मालाओं से अलंकृत गौ को दान करता है - दान के उस क्षण उसके अंगों में देवगण आकर निवास करते हैं -

श्लोक 74 (skanda.8.111.74)

ब्रह्मा तस्याः स्थितो मूर्ध्नि शक्रोपानं समाश्रितः । चन्द्रादित्यौ च नेत्रस्थौ घ्राणे वायुः प्रतिष्ठितः

brahmā tasyāḥ sthito mūrdhni śakropānaṁ samāśritaḥ | candrādityau ca netrasthau ghrāṇe vāyuḥ pratiṣṭhitaḥ

ब्रह्मा उसके मस्तक पर विराजते हैं, इन्द्र उसके कंधे के उभार में स्थित होते हैं, चन्द्रमा और सूर्य उसके नेत्रों में रहते हैं, वायु उसकी नासिका में प्रतिष्ठित रहती है,

श्लोक 75 (skanda.8.111.75)

मुखं तस्याः श्रितो वह्निर्जिह्वा सोमः स्वयं प्रभुः । कर्णयोस्तु दिशः सर्वाः शिरा रुद्राः समाश्रिताः

mukhaṁ tasyāḥ śrito vahnirjihvā somaḥ svayaṁ prabhuḥ | karṇayostu diśaḥ sarvāḥ śirā rudrāḥ samāśritāḥ

अग्नि उसके मुख में स्थित है, स्वयं सोमप्रभु उसकी जिह्वा हैं, सब दिशाएँ उसके दोनों कानों में हैं, रुद्रगण उसकी नाड़ियों में निवास करते हैं,

श्लोक 76 (skanda.8.111.76)

पादयोर्लोकपालाश्च सर्वेस्थीनि च पर्वताः । समुद्रास्सप्त जठरे ग्रीवायां तपनाः श्रिताः

pādayorlokapālāśca sarvesthīni ca parvatāḥ | samudrāssapta jaṭhare grīvāyāṁ tapanāḥ śritāḥ

लोकपाल उसके पैरों में हैं, पर्वत उसकी सब हड्डियाँ हैं, सातों समुद्र उसके उदर में हैं, और सूर्यगण उसकी ग्रीवा में स्थित हैं,

श्लोक 77 (skanda.8.111.77)

सास्नां गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा पार्श्वयोर्वसवः शुभाः । प्रजापतिरुपस्थश्च मूत्रं तीर्थानि सर्वशः

sāsnāṁ gaṅgā saricchreṣṭhā pārśvayorvasavaḥ śubhāḥ | prajāpatirupasthaśca mūtraṁ tīrthāni sarvaśaḥ

नदियों में श्रेष्ठ गंगा उसकी गलकम्बल में हैं, शुभ वसुगण उसके दोनों पार्श्वों में हैं, प्रजापति उसकी उपस्थ में हैं, और सब तीर्थ उसका मूत्र हैं,

श्लोक 78 (skanda.8.111.78)

पुरीषं श्रीरभूत्तस्या नागाश्चास्त्राणि सर्वशः । साध्या विश्वेथ लोकाश्च पुच्छमाश्रित्य संस्थिताः

purīṣaṁ śrīrabhūttasyā nāgāścāstrāṇi sarvaśaḥ | sādhyā viśvetha lokāśca pucchamāśritya saṁsthitāḥ

श्री उसका गोबर है, नाग उसकी सब अस्थियाँ हैं, तथा साध्यगण, विश्वेदेव और सब लोक उसकी पूँछ में स्थित हैं,

श्लोक 79 (skanda.8.111.79)

मन्त्रा यज्ञाश्च दानानि यमाश्च ऋषिभिस्सह । नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव तारारूपाणि यानि च

mantrā yajñāśca dānāni yamāśca ṛṣibhissaha | nakṣatrāṇi grahāścaiva tārārūpāṇi yāni ca

मन्त्र, यज्ञ, दान, ऋषियों सहित नियम, नक्षत्र, ग्रह तथा जो भी तारों के रूप हैं -

श्लोक 80 (skanda.8.111.80)

गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगती पंक्तिरेव च । अनुष्टुबृग्यजुश्चैव सामान्याथर्वणं तथा

gāyatrī caiva triṣṭup ca jagatī paṁktireva ca | anuṣṭubṛgyajuścaiva sāmānyātharvaṇaṁ tathā

गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, पंक्ति, अनुष्टुप्, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तथा अथर्ववेद -

श्लोक 81 (skanda.8.111.81)

लोकस्य मातरश्चैव मेघा वर्षमथापि च । धर्मो नारायणश्चैव भूतानि सरितस्तथा

lokasya mātaraścaiva meghā varṣamathāpi ca | dharmo nārāyaṇaścaiva bhūtāni saritastathā

लोक की माताएँ, मेघ, वर्षा, धर्म, स्वयं नारायण, सब भूत और नदियाँ -

श्लोक 82 (skanda.8.111.82)

रोमकूपानि संश्रित्य तस्या देवा व्यवस्थिताः । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाः पक्षिभिः सह

romakūpāni saṁśritya tasyā devā vyavasthitāḥ | yakṣāśca rākṣasāścaiva piśācāḥ pakṣibhiḥ saha

- ये सब देवगण उसके रोमकूपों में स्थित रहते हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच पक्षियों के साथ,

श्लोक 83 (skanda.8.111.83)

यज्ञाश्च दक्षिणाश्चैव तथा चाप्सरसः शुभाः । गन्धर्वाश्च महात्मानो ये चान्येप्येवमादयः

yajñāśca dakṣiṇāścaiva tathā cāpsarasaḥ śubhāḥ | gandharvāśca mahātmāno ye cānyepyevamādayaḥ

यज्ञ, दक्षिणाएँ, शुभ अप्सराएँ, महात्मा गन्धर्व, और इसी प्रकार के अन्य जो भी हैं -

श्लोक 84 (skanda.8.111.84)

तस्या विषाणयोर्व्यास सर्व एव समाश्रिताः । फलानि यज्ञदानानां गतयश्च पृथग्विधाः

tasyā viṣāṇayorvyāsa sarva eva samāśritāḥ | phalāni yajñadānānāṁ gatayaśca pṛthagvidhāḥ

हे व्यास! ये सब उसके दोनों सींगों में स्थित हैं - तथा यज्ञों और दानों के फल एवं अलग-अलग गतियाँ भी,

श्लोक 85 (skanda.8.111.85)

वत्सं समाश्रिताः सर्वे सर्वं देवमयं शुभम् । देवैरध्यासितां तां तु सर्वलोकनमस्कृताम्

vatsaṁ samāśritāḥ sarve sarvaṁ devamayaṁ śubham | devairadhyāsitāṁ tāṁ tu sarvalokanamaskṛtām

और सब उसके बछड़े में भी निवास करते हैं - इस प्रकार वह गौ पूर्णतः शुभ और देवतामय है। देवताओं से अधिष्ठित और सम्पूर्ण लोकों द्वारा नमस्कृत उस गौ को -

श्लोक 86 (skanda.8.111.86)

विप्रेभ्यो मन्त्रवद्धस्ते प्रदद्यात् सुसमाहितः । कुशान् सुवर्णं बीजानि तिलान् सिद्धार्थकाँस्तथा

viprebhyo mantravaddhaste pradadyāt susamāhitaḥ | kuśān suvarṇaṁ bījāni tilān siddhārthakā~stathā

- एकाग्रचित्त होकर मन्त्रोच्चारण के साथ, हाथ में कुश, सुवर्ण, बीज, तिल तथा सफेद सरसों लेकर ब्राह्मणों को अर्पित करना चाहिए,

श्लोक 87 (skanda.8.111.87)

प्रदद्याद् गां ततोद्भिस्तु मन्त्रेणानेन सुव्रत । सर्वदेवमयीं दोग्ध्रीं सर्वलोकमयीं तथा

pradadyād gāṁ tatodbhistu mantreṇānena suvrata | sarvadevamayīṁ dogdhrīṁ sarvalokamayīṁ tathā

हे सुव्रत! और फिर जल के साथ इस मन्त्र से उस गौ को दान करना चाहिए, जो सब देवमय दुधार गौ और सब लोकमय भी है -

श्लोक 88 (skanda.8.111.88)

सर्वलोकनिमित्ताय सर्वलोकहिताय च । प्रयच्छामि महासत्वामक्षयाय शुभामिति

sarvalokanimittāya sarvalokahitāya ca | prayacchāmi mahāsatvāmakṣayāya śubhāmiti

[मन्त्र] - 'सब लोकों के निमित्त और सब लोकों के कल्याण के लिए, इस महासत्त्व, शुभ गौ को मैं अपने अक्षय पुण्य के लिए अर्पित करता हूँ।'

श्लोक 89 (skanda.8.111.89)

एवं स दत्त्वा तां गां तु यत्र यत्र प्रजायते । तत्र तत्र गता सा तं जन्तुं तारयते भयात्

evaṁ sa dattvā tāṁ gāṁ tu yatra yatra prajāyate | tatra tatra gatā sā taṁ jantuṁ tārayate bhayāt

इस प्रकार वह गौ दान करके, वह जहाँ-जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ-वहाँ पहुँचकर वह गौ उस प्राणी को भय से पार कर देती है।

श्लोक 90 (skanda.8.111.90)

सर्व कामदुहा चैव सर्वलोकप्रदा तथा । सर्वज्ञानप्रदा चैव सर्वयज्ञफला तथा

sarva kāmaduhā caiva sarvalokapradā tathā | sarvajñānapradā caiva sarvayajñaphalā tathā

वह गौ सब कामनाओं को देनेवाली, सब लोकों को देनेवाली, सब ज्ञान को देनेवाली, और सब यज्ञों का फल देनेवाली है।

श्लोक 91 (skanda.8.111.91)

सर्वांल्लोकान् तया गत्वा रमते च यथामरः । इह जातश्च तामेव कामगां संप्रपद्यते

sarvāṁllokān tayā gatvā ramate ca yathāmaraḥ | iha jātaśca tāmeva kāmagāṁ saṁprapadyate

उसके द्वारा सब लोकों में जाकर वह देवता के समान आनन्द मनाता है, और यहाँ जन्म लेने पर उसे वही कामधेनु फिर प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 92 (skanda.8.111.92)

स तया मानुषो जातो गोसहस्री महाबलः । रूपवान् धनवांश्चैव बहुपुत्रश्च जायते

sa tayā mānuṣo jāto gosahasrī mahābalaḥ | rūpavān dhanavāṁścaiva bahuputraśca jāyate

उसके द्वारा वह मनुष्य-जन्म पाकर हजार गौओंवाला, महाबली, रूपवान्, धनवान् और बहुपुत्रवान् बनता है।

श्लोक 93 (skanda.8.111.93)

प्रसूयमानां यो गां तु दद्यादुभयतोमुखीम् । यथोक्तेन विधानेन स जातिस्मरतां लभेत्

prasūyamānāṁ yo gāṁ tu dadyādubhayatomukhīm | yathoktena vidhānena sa jātismaratāṁ labhet

जो प्रसव के समय गौ को, दोनों ओर मुखवाली गौ को, कथित विधि के अनुसार दान करता है, वह अपने पूर्वजन्मों का स्मरण करनेवाला बनता है।

श्लोक 94 (skanda.8.111.94)

यस्तु गां संप्रयच्छेत ब्राह्मणेभ्यो यथातथम् । तमप्यसौ भयार्थेभ्यस्त्रायते नरकादपि

yastu gāṁ saṁprayaccheta brāhmaṇebhyo yathātatham | tamapyasau bhayārthebhyastrāyate narakādapi

जो ब्राह्मणों को यथाविधि गौ दान करता है, वह गौ उसे भय के कारणों से, यहाँ तक कि नरक से भी बचा लेती है।

श्लोक 95 (skanda.8.111.95)

कृष्णाजिनं च यो दद्याद् व्रतिने ब्रह्मचारिणे । पृथिवीफलमाप्नोति योगश्चास्य प्रवर्तते

kṛṣṇājinaṁ ca yo dadyād vratine brahmacāriṇe | pṛthivīphalamāpnoti yogaścāsya pravartate

जो व्रतधारी ब्रह्मचारी को काले मृग की खाल दान करता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वी दान करने का फल प्राप्त करता है, और उसमें योग-शक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 96 (skanda.8.111.96)

योगिभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो ब्राह्मणेभ्यो यतात्मवान् । यः प्रयच्छेदावसथं सोश्वमेधफलं लभेत्

yogibhyo brahmacāribhyo brāhmaṇebhyo yatātmavān | yaḥ prayacchedāvasathaṁ sośvamedhaphalaṁ labhet

जो संयतात्मा होकर योगियों, ब्रह्मचारियों और ब्राह्मणों को निवासस्थान दान करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 97 (skanda.8.111.97)

आप्तोर्यामं पौण्डरीकं गोसहस्रञ्च विन्दति । स्मृञ्च परमा लब्ध्वा योगमाप्नोति सुव्रताः

āptoryāmaṁ pauṇḍarīkaṁ gosahasrañca vindati | smṛñca paramā labdhvā yogamāpnoti suvratāḥ

हे सुव्रताओ! वह आप्तोर्याम और पौण्डरीक यज्ञों का तथा हजार गौओं के दान का फल प्राप्त करता है, और परम स्मृति पाकर योग को भी प्राप्त करता है।

श्लोक 98 (skanda.8.111.98)

कमण्डलुं तु यो दद्याद् ब्राह्मणाय नरोत्तमः । स तेन कर्मणा देव्यो धर्मनित्यत्वमाप्नुते

kamaṇḍaluṁ tu yo dadyād brāhmaṇāya narottamaḥ | sa tena karmaṇā devyo dharmanityatvamāpnute

हे देवियो! जो श्रेष्ठ पुरुष ब्राह्मण को कमण्डलु दान करता है, वह उस कर्म से धर्म में स्थायित्व प्राप्त करता है।

श्लोक 99 (skanda.8.111.99)

व्याधितं यस्तु विप्रर्षे दीनं मूढमचेतसम् । उद्धरेत यथाशक्त्या स मुच्येद् ब्रह्महत्यया

vyādhitaṁ yastu viprarṣe dīnaṁ mūḍhamacetasam | uddhareta yathāśaktyā sa mucyed brahmahatyayā

हे विप्रर्षे! जो अपनी शक्ति के अनुसार किसी रोगी, दीन, मूढ़ या अचेत व्यक्ति का उद्धार करता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 100 (skanda.8.111.100)

यः सुवर्ण प्रयच्छेत दरिद्राय द्विजातये । दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति देवताः

yaḥ suvarṇa prayaccheta daridrāya dvijātaye | daśānāmaśvamedhānāṁ phalaṁ prāpnoti devatāḥ

हे देवियो! जो किसी निर्धन द्विज को सुवर्ण दान करता है, वह दस अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 101 (skanda.8.111.101)

यश्चैवेमानि सर्वाणि दानान्युक्तानि कृत्स्नशः । ददाति युगपद्देव्यः स पृथ्व्यामेकराड् भवेत्

yaścaivemāni sarvāṇi dānānyuktāni kṛtsnaśaḥ | dadāti yugapaddevyaḥ sa pṛthvyāmekarāḍ bhavet

हे देवियो! और जो ये सब कहे गए दान एक साथ, सम्पूर्ण रूप से देता है, वह पृथ्वी पर एकच्छत्र सम्राट् बनता है।

श्लोक 102 (skanda.8.111.102)

इदं यः शृणुयान्नित्यं दद्याच्चैव स्वशक्तितः । पठेत च महाभागाः सोपि गच्छेत् त्रिविष्टपम्

idaṁ yaḥ śṛṇuyānnityaṁ dadyāccaiva svaśaktitaḥ | paṭheta ca mahābhāgāḥ sopi gacchet triviṣṭapam

हे महाभागाओ! और जो इसे सदा सुनता है, अपनी शक्ति के अनुसार दान भी करता है, तथा इसका पाठ भी करता है, वह भी स्वर्गलोक को जाता है।

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