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अम्बिका खण्ड · अध्याय 112

व्रत-विधि एवं मन्दराचल पर दानवों का आगमन

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

श्लोक 1 (skanda.8.112.1)

देव्युवाच । देव्याः शृणुत भूयोपि यथा दानं विना शुभाः । अयमेवोपवासेन यथा धर्मोभिलभ्यते

devyuvāca | devyāḥ śṛṇuta bhūyopi yathā dānaṁ vinā śubhāḥ | ayamevopavāsena yathā dharmobhilabhyate

देवी ने कहा - हे शुभे देवियो! अब पुनः सुनो कि दान के बिना ही केवल उपवास से किस प्रकार धर्म प्राप्त किया जाता है।

श्लोक 2 (skanda.8.112.2)

एकभक्तेन यो देव्यो मासं मार्गशिरं क्षपेत् । स तेन कर्मणा देव्यो गोमान् भवति नित्यशः

ekabhaktena yo devyo māsaṁ mārgaśiraṁ kṣapet | sa tena karmaṇā devyo gomān bhavati nityaśaḥ

हे देवियो! जो पुरुष एक ही बार भोजन करते हुए मार्गशीर्ष मास व्यतीत करता है, वह इस कर्म के प्रभाव से सदा गौओं का स्वामी होता है।

श्लोक 3 (skanda.8.112.3)

पौषमासेन पुत्राँश्च बहूनाप्नोति धार्मिकान् । माघमासे च कुर्वाणो भूयः प्राप्नोति वै प्रियाः

pauṣamāsena putrām̐śca bahūnāpnoti dhārmikān | māghamāse ca kurvāṇo bhūyaḥ prāpnoti vai priyāḥ

पौष मास में ऐसा व्रत करने से वह बहुत-से धर्मात्मा पुत्र पाता है, और माघ मास में करने पर उसे अत्यन्त प्रिय वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

श्लोक 4 (skanda.8.112.4)

एकभक्तन्तु कुर्वाणः फाल्गुने मासि नित्यशः । स्त्रीषु सौभाग्यमाप्नोति स्त्रियश्च परमप्रियाः

ekabhaktantu kurvāṇaḥ phālgune māsi nityaśaḥ | strīṣu saubhāgyamāpnoti striyaśca paramapriyāḥ

फाल्गुन मास में सदा एक बार भोजन करने वाला स्त्रियों में सौभाग्य पाता है और उसे परम प्रिय स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं।

श्लोक 5 (skanda.8.112.5)

यः क्षपेदेकभक्तेन चैत्रमासं नरोत्तमः । धनधान्यसमृद्धे स कुले जायेत रूपवान्

yaḥ kṣapedekabhaktena caitramāsaṁ narottamaḥ | dhanadhānyasamṛddhe sa kule jāyeta rūpavān

जो श्रेष्ठ पुरुष एक बार भोजन करके चैत्र मास बिताता है, वह धन-धान्य से समृद्ध कुल में रूपवान् होकर जन्म लेता है।

श्लोक 6 (skanda.8.112.6)

वैशाखं यः क्षपेन्मासमेकभक्तेन मानवः । याति स श्रेष्ठतां लोके पूजितो धनवानपि

vaiśākhaṁ yaḥ kṣapenmāsamekabhaktena mānavaḥ | yāti sa śreṣṭhatāṁ loke pūjito dhanavānapi

जो मनुष्य एक बार भोजन करते हुए वैशाख मास व्यतीत करता है, वह संसार में श्रेष्ठता को प्राप्त होता है, पूजित और धनवान् भी होता है।

श्लोक 7 (skanda.8.112.7)

ज्येष्ठमूलं तु यो मासमेकभक्तं समाचरेत् । भ्रातॄणां भवति ज्येष्ठो भोगं प्राप्नोति पुष्कलम्

jyeṣṭhamūlaṁ tu yo māsamekabhaktaṁ samācaret | bhrātṝṇāṁ bhavati jyeṣṭho bhogaṁ prāpnoti puṣkalam

जो पुरुष ज्येष्ठ मास में एक बार भोजन का व्रत करता है, वह अपने भाइयों में ज्येष्ठ होता है और प्रचुर भोग प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (skanda.8.112.8)

आषाढं चापि यो मासमेकभक्तं समाचरेत् । स राज्ञो मान्यतां प्राप्य कामानाप्नोति पुष्कलान्

āṣāḍhaṁ cāpi yo māsamekabhaktaṁ samācaret | sa rājño mānyatāṁ prāpya kāmānāpnoti puṣkalān

जो आषाढ़ मास में यह व्रत करता है, वह राजा से सम्मान पाकर प्रचुर मनोवांछित वस्तुएँ प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (skanda.8.112.9)

श्रावणे चापि यो मासे तथा चैवाचरेन्नरः । सेनापत्यं स संप्राप्य बलवानभिजायते

śrāvaṇe cāpi yo māse tathā caivācarennaraḥ | senāpatyaṁ sa saṁprāpya balavānabhijāyate

जो पुरुष श्रावण मास में इसी प्रकार व्रत करता है, वह सेनापति-पद पाकर बलवान् होकर जन्म लेता है।

श्लोक 10 (skanda.8.112.10)

यस्तु भाद्रपदं मासमेकभक्तं समाचरेत् । स तेन कर्मणा देव्यो धनवानभिजायते

yastu bhādrapadaṁ māsamekabhaktaṁ samācaret | sa tena karmaṇā devyo dhanavānabhijāyate

जो भाद्रपद मास में यह एकभक्त व्रत करता है, हे देवियो! वह इस कर्म से धनवान् होकर जन्म लेता है।

श्लोक 11 (skanda.8.112.11)

योपि चाश्वयुजं मासमेकभक्तेन तिष्ठति । वाणिज्यं फलते तस्य कृषिः पशुगणास्तथा

yopi cāśvayujaṁ māsamekabhaktena tiṣṭhati | vāṇijyaṁ phalate tasya kṛṣiḥ paśugaṇāstathā

जो आश्विन मास में इस व्रत में स्थित रहता है, उसका व्यापार, कृषि और पशुसमूह सब सफल होते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.112.12)

कार्तिकं त्वपि यो मासमेकभक्तेन तिष्ठति । सोश्वमेधफलं प्राप्य वह्निलोके महीयते

kārtikaṁ tvapi yo māsamekabhaktena tiṣṭhati | sośvamedhaphalaṁ prāpya vahniloke mahīyate

जो कार्तिक मास में भी इस व्रत में स्थित रहता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर अग्निलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 13 (skanda.8.112.13)

यः क्षपेदेकभक्तेन यावज्जीवं नरोत्तमः । विमानेनार्कवर्णेन शक्रलोकं स गच्छति

yaḥ kṣapedekabhaktena yāvajjīvaṁ narottamaḥ | vimānenārkavarṇena śakralokaṁ sa gacchati

जो श्रेष्ठ पुरुष जीवन भर एक बार भोजन का व्रत रखता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर बैठकर इन्द्रलोक को जाता है।

श्लोक 14 (skanda.8.112.14)

संवत्सरं तु यः पूर्णमेकभक्तेन तिष्ठति । स पार्थिवसमो भूत्वा महीं पाति महेन्द्रवत्

saṁvatsaraṁ tu yaḥ pūrṇamekabhaktena tiṣṭhati | sa pārthivasamo bhūtvā mahīṁ pāti mahendravat

जो पूरे एक वर्ष तक इस व्रत में स्थित रहता है, वह राजा के समान होकर महेन्द्र की भाँति पृथ्वी का पालन करता है।

श्लोक 15 (skanda.8.112.15)

अहोरात्रं तूपवासं कुर्यादेकं नरोत्तमः । दशानां स सुवर्णानां फलं प्राप्नोति शोभितम्

ahorātraṁ tūpavāsaṁ kuryādekaṁ narottamaḥ | daśānāṁ sa suvarṇānāṁ phalaṁ prāpnoti śobhitam

जो श्रेष्ठ पुरुष एक दिन-रात्रि का उपवास करता है, वह दस स्वर्णमुद्राओं के दान के सुशोभित फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (skanda.8.112.16)

मासे मासे त्वहोरत्रं यः करोति नरोत्तमः । स तेन कर्मणा शुद्धो विद्वान् भवति धार्मिकः

māse māse tvahorātraṁ yaḥ karoti narottamaḥ | sa tena karmaṇā śuddho vidvān bhavati dhārmikaḥ

जो श्रेष्ठ पुरुष प्रत्येक मास में यह दिन-रात्रि का व्रत करता है, वह इस कर्म से शुद्ध, विद्वान् और धर्मात्मा होता है।

श्लोक 17 (skanda.8.112.17)

चतुर्दशीमष्टमीं च पक्षयोरुभयोरपि । अहोरात्रं क्षपेद्यस्तु सम्वत्सरमशेषतः

caturdaśīmaṣṭamīṁ ca pakṣayorubhayorapi | ahorātraṁ kṣapedyastu samvatsaramaśeṣataḥ

जो दोनों पक्षों की चतुर्दशी और अष्टमी को पूरे संवत्सर भर दिन-रात्रि का व्रत करता है,

श्लोक 18 (skanda.8.112.18)

स तेन कर्मणा युक्तः सर्वपापविवर्जितः । न याति नरकं देव्यो यमञ्च न स पश्यति

sa tena karmaṇā yuktaḥ sarvapāpavivarjitaḥ | na yāti narakaṁ devyo yamañca na sa paśyati

वह इस कर्म से युक्त होकर सब पापों से मुक्त हो जाता है; हे देवियो! वह न नरक में जाता है, न यम को देखता है।

श्लोक 19 (skanda.8.112.19)

मासे मासे च यः कुर्यात् त्रिरात्रक्षपणं बुधः । कौबेरं लोकमासाद्य स विन्देत् परमं सुखम्

māse māse ca yaḥ kuryāt trirātrakṣapaṇaṁ budhaḥ | kauberaṁ lokamāsādya sa vindet paramaṁ sukham

जो बुद्धिमान् प्रत्येक मास में तीन रात्रि का उपवास करता है, वह कुबेर के लोक को प्राप्त कर परम सुख पाता है।

श्लोक 20 (skanda.8.112.20)

चतुर्थेहनि यो भुंक्ते प्रयतात्मा शुचिर्नरः । गान्धर्वं स पदं प्राप्य मोदते शक्रवद्दिवि

caturthehani yo bhuṅkte prayatātmā śucirnaraḥ | gāndharvaṁ sa padaṁ prāpya modate śakravaddivi

जो संयमी और पवित्र पुरुष केवल चौथे दिन भोजन करता है, वह गन्धर्व-पद प्राप्त कर स्वर्ग में इन्द्र के समान आनन्दित होता है।

श्लोक 21 (skanda.8.112.21)

पञ्चमेहनि यो भुंक्ते प्रतिमासमतन्द्रितः । वायुलोकं समासाद्य स्वर्गलोकं स गच्छति

pañcamehani yo bhuṅkte pratimāsamatandritaḥ | vāyulokaṁ samāsādya svargalokaṁ sa gacchati

जो अनथक होकर प्रतिमास पाँचवें दिन भोजन करता है, वह वायुलोक को प्राप्त कर स्वर्गलोक जाता है।

श्लोक 22 (skanda.8.112.22)

यो भुंक्ते दिवसे षष्ठे नित्यं नियममास्थितः । वारुणं लोकमासाद्य सोपि विन्देत् महत्पदम्

yo bhuṅkte divase ṣaṣṭhe nityaṁ niyamamāsthitaḥ | vāruṇaṁ lokamāsādya sopi vindet mahatpadam

जो सदा नियम में स्थित होकर छठे दिन भोजन करता है, वह भी वरुणलोक को प्राप्त कर महान् पद पाता है।

श्लोक 23 (skanda.8.112.23)

सप्तमेहनि यो भुंक्ते जितद्वन्द्वो दृढव्रतः । आदित्यलोकमासाद्य सोपि विन्देत् महत्पदम्

saptamehani yo bhuṅkte jitadvandvo dṛḍhavrataḥ | ādityalokamāsādya sopi vindet mahatpadam

जो द्वन्द्वों को जीतकर दृढ़व्रती होकर सातवें दिन भोजन करता है, वह भी आदित्यलोक को प्राप्त कर महान् पद पाता है।

श्लोक 24 (skanda.8.112.24)

अष्टमे चैव यो भुंक्ते दिवसे मानवः शुचिः । वैष्णवं लोकमासाद्य स भवेत् परमद्युतिः

aṣṭame caiva yo bhuṅkte divase mānavaḥ śuciḥ | vaiṣṇavaṁ lokamāsādya sa bhavet paramadyutiḥ

जो पवित्र मनुष्य आठवें दिन भोजन करता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त कर परम तेजस्वी होता है।

श्लोक 25 (skanda.8.112.25)

नवमेहनि यो भुंक्ते नरो नियममास्थितः । स वसूनां प्रियो भूत्वा चरते वसुभिः सह

navamehani yo bhuṅkte naro niyamamāsthitaḥ | sa vasūnāṁ priyo bhūtvā carate vasubhiḥ saha

जो नियमपूर्वक नवें दिन भोजन करता है, वह वसुओं का प्रिय होकर उन्हीं वसुओं के साथ विचरण करता है।

श्लोक 26 (skanda.8.112.26)

दशमेहनि भुक्त्वा तु दशाहस्य फलं लभेत् । अश्विभ्यां च समो भूत्वा सूर्यवज्ज्वलते सदा

daśamehani bhuktvā tu daśāhasya phalaṁ labhet | aśvibhyāṁ ca samo bhūtvā sūryavajjvalate sadā

दसवें दिन भोजन करके वह दस दिनों के व्रत का फल पाता है, और अश्विनीकुमारों के समान होकर सदा सूर्य की भाँति देदीप्यमान रहता है।

श्लोक 27 (skanda.8.112.27)

मानुष्यञ्च पुनः प्राप्य दशभार्या लभेत सः । सुबर्णमक्षयं चैव न चाकाले म्रियेत सः

mānuṣyañca punaḥ prāpya daśabhāryā labheta saḥ | subarṇamakṣayaṁ caiva na cākāle mriyeta saḥ

पुनः मनुष्य-जन्म पाकर वह दस पत्नियाँ प्राप्त करता है, अक्षय स्वर्ण पाता है, और असमय में उसकी मृत्यु नहीं होती।

श्लोक 28 (skanda.8.112.28)

एकादशे तु यो भुंक्ते दिवसे मानवः शुचिः । एकदश्याः फलं प्राप्य स रुद्रगणतां लभेत्

ekādaśe tu yo bhuṅkte divase mānavaḥ śuciḥ | ekadaśyāḥ phalaṁ prāpya sa rudragaṇatāṁ labhet

जो पवित्र मनुष्य ग्यारहवें दिन भोजन करता है, वह एकादशी-व्रत का फल पाकर रुद्रगणों की श्रेणी को प्राप्त होता है।

श्लोक 29 (skanda.8.112.29)

स्थित्वा तत्र शतान्यष्टावतिसौख्यसमन्वितः । ब्राह्मणत्वमनुप्राप्य यज्वा स इह जायते

sthitvā tatra śatānyaṣṭāvatisaukhyasamanvitaḥ | brāhmaṇatvamanuprāpya yajvā sa iha jāyate

वहाँ आठ सौ वर्षों तक अत्यन्त सुखपूर्वक रहकर, वह पुनः ब्राह्मणत्व पाकर यहाँ यज्ञकर्ता के रूप में जन्म लेता है।

श्लोक 30 (skanda.8.112.30)

द्वादशे दिवसे यस्तु देव्यो भुंक्ते सदा नरः । द्वादशाहं स संप्राप्य शक्रलोकमवाप्नुयात्

dvādaśe divase yastu devyo bhuṅkte sadā naraḥ | dvādaśāhaṁ sa saṁprāpya śakralokamavāpnuyāt

हे देवियो! जो मनुष्य सदा बारहवें दिन भोजन करता है, वह द्वादशाह-व्रत का फल पाकर इन्द्रलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (skanda.8.112.31)

तत्रोष्य स सुखं भूय इह जातो नरोत्तमः । राजा वा राजमात्रो वा धन्वा वा सुमहान् भवेत्

tatroṣya sa sukhaṁ bhūya iha jāto narottamaḥ | rājā vā rājamātro vā dhanvā vā sumahān bhavet

वहाँ सुखपूर्वक निवास करके यहाँ श्रेष्ठ पुरुष के रूप में जन्म लेकर वह राजा, राजतुल्य अथवा महान् धनुर्धर होता है।

श्लोक 32 (skanda.8.112.32)

त्रयोदशे तु यो नित्यमश्नाति दिवसे नरः । वसेत् स भार्गवस्थानं प्राप्य दिव्यसुखान्वितः

trayodaśe tu yo nityamaśnāti divase naraḥ | vaset sa bhārgavasthānaṁ prāpya divyasukhānvitaḥ

जो मनुष्य सदा तेरहवें दिन भोजन करता है, वह भृगु के धाम को प्राप्त कर दिव्य सुख से युक्त होकर वहाँ निवास करता है।

श्लोक 33 (skanda.8.112.33)

अथ चेन्मानुषो भूयस्स नरो जायते शुभाः । धनधान्यसमाकीर्णे जायते सत्कुले शुभः

atha cenmānuṣo bhūyassa naro jāyate śubhāḥ | dhanadhānyasamākīrṇe jāyate satkule śubhaḥ

हे शुभे! यदि वह पुनः मनुष्य-रूप में जन्म ले, तो धन-धान्य से भरे हुए उत्तम कुल में शुभ पुरुष के रूप में जन्म लेता है।

श्लोक 34 (skanda.8.112.34)

चतुर्दश तु यो नित्यं दिवसानि क्षपेन्नरः । तौषितं लोकमासाद्य भवेद् गणपतिर्वरः

caturdaśa tu yo nityaṁ divasāni kṣapennaraḥ | tauṣitaṁ lokamāsādya bhaved gaṇapatirvaraḥ

जो मनुष्य नित्य चौदह दिनों तक व्रत करता है, वह तुषित लोक को प्राप्त कर श्रेष्ठ गणपति होता है।

श्लोक 35 (skanda.8.112.35)

अर्धमासं क्षपेद्यस्तु नित्यमेव ह्यतन्द्रितः । देवराजेन तुल्योसौ भूत्वा स्वर्गेवतिष्ठति

ardhamāsaṁ kṣapedyastu nityameva hyatandritaḥ | devarājena tulyosau bhūtvā svargevatiṣṭhati

जो अनथक होकर आधे मास तक निरन्तर व्रत करता है, वह देवराज इन्द्र के तुल्य होकर स्वर्ग में स्थित रहता है।

श्लोक 36 (skanda.8.112.36)

इह राजा महाभूमौ भूय एवाभिजायते । यस्तु मासं क्षपेद्धीरो जितक्रोधो जितेन्द्रियः

iha rājā mahābhūmau bhūya evābhijāyate | yastu māsaṁ kṣapeddhīro jitakrodho jitendriyaḥ

वह यहाँ पुनः महापृथ्वी पर राजा होकर जन्म लेता है। और जो धीर पुरुष क्रोध तथा इन्द्रियों को जीतकर पूरे एक मास व्रत करता है -

श्लोक 37 (skanda.8.112.37)

विमानेन स दिव्येन अप्सरोभिस्समावृतः । पूज्यमानो यथा देवः स्तूयमानश्च सर्वशः

vimānena sa divyena apsarobhissamāvṛtaḥ | pūjyamāno yathā devaḥ stūyamānaśca sarvaśaḥ

- वह दिव्य विमान पर बैठकर अप्सराओं से घिरा हुआ, देवता के समान पूजित तथा सर्वत्र स्तुति किया जाता हुआ,

श्लोक 38 (skanda.8.112.38)

ज्वलन्नादित्यसंकाशो नित्यं सुखमुपाश्नुते । सर्वलोकेषु वसते बहून्यब्दायुतानि तु

jvalannādityasaṅkāśo nityaṁ sukhamupāśnute | sarvalokeṣu vasate bahūnyabdāyutāni tu

सूर्य के समान देदीप्यमान होकर नित्य सुख भोगता है, और अनेक हजारों वर्षों तक सब लोकों में निवास करता है।

श्लोक 39 (skanda.8.112.39)

ततो ब्रह्मसदं प्राप्य ब्रह्मणा स सुपूजितः । ब्रह्मलोके निवसते यथा ब्रह्मा नरोत्तमः

tato brahmasadaṁ prāpya brahmaṇā sa supūjitaḥ | brahmaloke nivasate yathā brahmā narottamaḥ

फिर ब्रह्मलोक को प्राप्त कर ब्रह्मा द्वारा सुपूजित होकर, वह श्रेष्ठ पुरुष ब्रह्मा के समान ब्रह्मलोक में निवास करता है।

श्लोक 40 (skanda.8.112.40)

अथ चेत्पुनरायाति ब्राह्मणो भवतीश्वरः । योगञ्च तत्र लभते योगैश्वर्यं समश्नुते

atha cetpunarāyāti brāhmaṇo bhavatīśvaraḥ | yogañca tatra labhate yogaiśvaryaṁ samaśnute

यदि वह पुनः लौटकर आता है तो ब्राह्मण और स्वामी होता है, और वहाँ योग प्राप्त कर योग-ऐश्वर्य को भोगता है।

श्लोक 41 (skanda.8.112.41)

योगीशस्स ततो भूत्वा शम्भोर्गणपतिर्भवेत् । सर्वेषां चोपवासानां विधिं परमपुण्यदम्

yogīśassa tato bhūtvā śambhorgaṇapatirbhavet | sarveṣāṁ copavāsānāṁ vidhiṁ paramapuṇyadam

वह योगीश्वर होकर तत्पश्चात् शम्भु का गणपति बनता है। मैंने समस्त उपवासों की परम पुण्यदायी विधि तुम्हें बताई।

श्लोक 42 (skanda.8.112.42)

देव्यः शृणुध्वं मत्तोन्यं यथावदनुपूर्वशः । स्नातः शुचिरथाचान्तो हुताग्निः सुसमाहितः

devyaḥ śṛṇudhvaṁ mattonyaṁ yathāvadanupūrvaśaḥ | snātaḥ śuciraathācānto hutāgniḥ susamāhitaḥ

हे देवियो! अब मुझसे दूसरा विधान क्रमशः यथावत् सुनो। स्नान कर, पवित्र होकर, आचमन करके, अग्नि में हवन करके, चित्त को एकाग्र करके -

श्लोक 43 (skanda.8.112.43)

दीक्षयित्वा तथात्मानमुपवासं चरेद् बुधः । स्नायात्त्रिषवणं चैव जुहुयादग्निमेव च

dīkṣayitvā tathātmānamupavāsaṁ cared budhaḥ | snāyāttriṣavaṇaṁ caiva juhuyādagnimeva ca

- इस प्रकार अपने आप को दीक्षित करके बुद्धिमान् पुरुष उपवास करे, तीनों संध्याओं में स्नान करे और अग्नि में हवन करे।

श्लोक 44 (skanda.8.112.44)

वाग्यतो क्रोधनो दान्तो धार्मिकः सत्यवाग् घृणी । जपन्सदैव गायत्रीं पवित्राणि च नित्यशः

vāgyato akrodhano dānto dhārmikaḥ satyavāg ghṛṇī | japansadaiva gāyatrīṁ pavitrāṇi ca nityaśaḥ

वह वाणी को संयत रखने वाला, क्रोधरहित, संयमी, धर्मात्मा, सत्यवादी और दयालु होकर सदा गायत्री तथा अन्य पवित्र मन्त्रों का जप करता रहे।

श्लोक 45 (skanda.8.112.45)

रुद्रानथ गणान् वापि रात्रौ च स्थण्डिलेशयः । कुशानास्तीर्य विधिवत् स्त्रीशूद्रैः परिवर्जितः

rudrānatha gaṇān vāpi rātrau ca sthaṇḍileśayaḥ | kuśānāstīrya vidhivat strīśūdraiḥ parivarjitaḥ

वह रुद्र अथवा गणों का ध्यान करते हुए रात्रि में भूमि पर कुशा बिछाकर विधिपूर्वक शयन करे, स्त्री और शूद्रों के संसर्ग से रहित होकर।

श्लोक 46 (skanda.8.112.46)

समश्नीयात् ततो देव्यो वीतशोको विमत्सरः । यावन्त्यहानि तिष्ठेत तावद्विप्राँस्तु भोजयेत्

samaśnīyāt tato devyo vītaśoko vimatsaraḥ | yāvantyahāni tiṣṭheta tāvadviprām̐stu bhojayet

हे देवियो! तत्पश्चात् शोकरहित और द्वेषरहित होकर वह भोजन करे, और जितने दिन यह व्रत करे उतने ही ब्राह्मणों को भोजन कराए।

श्लोक 47 (skanda.8.112.47)

ततः पूर्णे तु काले वै ब्राह्मणानां शतं वरम् । सहस्रमथवा शक्त्या पूजयित्वा तु सर्वशः

tataḥ pūrṇe tu kāle vai brāhmaṇānāṁ śataṁ varam | sahasramathavā śaktyā pūjayitvā tu sarvaśaḥ

फिर व्रत की अवधि पूर्ण होने पर, अपनी शक्ति के अनुसार सौ या हजार श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सब प्रकार से पूजन करके,

श्लोक 48 (skanda.8.112.48)

हविष्यं भोजनं दत्त्वा गाश्च वासांसि च क्रमात् । सुवर्णं तिलपात्रं च एकैकस्य प्रदापयेत् । ततस्तत्फलमाप्नोति यदन्यैर्दुर्लभं व्रतैः

haviṣyaṁ bhojanaṁ dattvā gāśca vāsāṁsi ca kramāt | suvarṇaṁ tilapātraṁ ca ekaikasya pradāpayet | tatastatphalamāpnoti yadanyairdurlabhaṁ vrataiḥ

उन्हें हविष्यान्न भोजन कराकर, क्रमशः गौएँ, वस्त्र, तथा प्रत्येक को सुवर्ण और तिलपात्र दान करे। इससे वह वह फल प्राप्त करता है जो अन्य व्रतों से दुर्लभ है।

श्लोक 49 (skanda.8.112.49)

वृषभं यस्तु नीलाङ्गमुत्सृजेत नरोत्तमः । अन्यं वापि महाभागाः स पितॄँस्तारयेन्नरः

vṛṣabhaṁ yastu nīlāṅgamutsṛjeta narottamaḥ | anyaṁ vāpi mahābhāgāḥ sa pitṝm̐stārayennaraḥ

हे महाभागे देवियो! जो श्रेष्ठ पुरुष नीले अंगों वाले अथवा अन्य किसी वृषभ को छोड़ता है, वह अपने पितरों का उद्धार करता है।

श्लोक 50 (skanda.8.112.50)

यावन्ति तस्य रोमाणि वृषभस्य महात्मनः । तावन्त्येव सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते

yāvanti tasya romāṇi vṛṣabhasya mahātmanaḥ | tāvantyeva sahasrāṇi varṣāṇāṁ divi modate

उस महात्मा वृषभ के जितने रोम हों, उतने ही हजारों वर्षों तक वह स्वर्ग में आनन्दित रहता है।

श्लोक 51 (skanda.8.112.51)

तिलपात्राणि यो दद्याद्विप्रेभ्यः शुद्धमानसः । अमावास्यां समासाद्य कृष्णानां सुसमाहितः

tilapātrāṇi yo dadyādviprebhyaḥ śuddhamānasaḥ | amāvāsyāṁ samāsādya kṛṣṇānāṁ susamāhitaḥ

जो शुद्ध मन वाला पुरुष अमावास्या के दिन एकाग्रचित्त होकर तिल के पात्र काले तिलों सहित ब्राह्मणों को दान करता है,

श्लोक 52 (skanda.8.112.52)

स पितॄँस्तर्पयित्वा तु अक्षयं नरपुंगवः । पितृलोकं समाप्नोति चिरञ्च सुखमश्नुते

sa pitṝm̐starpayitvā tu akṣayaṁ narapuṅgavaḥ | pitṛlokaṁ samāpnoti cirañca sukhamaśnute

वह श्रेष्ठ पुरुष अपने पितरों को अक्षय तृप्ति देकर पितृलोक को प्राप्त करता है और चिरकाल तक सुख भोगता है।

श्लोक 53 (skanda.8.112.53)

उपवासविधिस्त्वेष कथितो मे शुभाननाः । चान्द्रायणविधिं भूयः शृणुध्वं सुसमाहिताः

upavāsavidhistveṣa kathito me śubhānanāḥ | cāndrāyaṇavidhiṁ bhūyaḥ śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ

हे शुभाननाओ! यह उपवास-विधि मैंने तुम्हें बताई। अब चान्द्रायण-व्रत की विधि एकाग्रचित्त होकर पुनः सुनो।

श्लोक 54 (skanda.8.112.54)

यस्तु चान्द्रायणं कुर्याद्यथोक्तं सुसमाहितः । स सोमलोकमासाद्य सोमेन समतां व्रजेत्

yastu cāndrāyaṇaṁ kuryādyathoktaṁ susamāhitaḥ | sa somalokamāsādya somena samatāṁ vrajet

जो पुरुष एकाग्रचित्त होकर विधिवत् चान्द्रायण-व्रत करता है, वह सोमलोक को प्राप्त कर सोम के तुल्यता को प्राप्त करता है।

श्लोक 55 (skanda.8.112.55)

प्राजापत्यं तु यः कुर्यादेकशो बहुशोपि वा । प्रजापतिसमो भूत्वा तस्य लोके महीयते

prājāpatyaṁ tu yaḥ kuryādekaśo bahuśopi vā | prajāpatisamo bhūtvā tasya loke mahīyate

जो पुरुष प्राजापत्य-व्रत एक बार अथवा बार-बार करता है, वह प्रजापति के तुल्य होकर उन्हीं के लोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 56 (skanda.8.112.56)

यस्तु सान्तपनं कृच्छ्रं करोति नरसत्तमः । आत्मानमुद्धरेत् कृच्छ्रात् सोग्निलोकं च गच्छति

yastu sāntapanaṁ kṛcchraṁ karoti narasattamaḥ | ātmānamuddharet kṛcchrāt sognilokaṁ ca gacchati

जो श्रेष्ठ पुरुष सान्तपन कृच्छ्र-व्रत करता है, वह इस कठिन तप से अपना उद्धार करता है और अग्निलोक को जाता है।

श्लोक 57 (skanda.8.112.57)

महासान्तपनं यश्च करोति सुमहामनाः । सर्वज्ञतामवाप्नोति ब्रह्मलोकं च विन्दति

mahāsāntapanaṁ yaśca karoti sumahāmanāḥ | sarvajñatāmavāpnoti brahmalokaṁ ca vindati

जो महान् मनस्वी पुरुष महासान्तपन-व्रत करता है, वह सर्वज्ञता प्राप्त करता है और ब्रह्मलोक पाता है।

श्लोक 58 (skanda.8.112.58)

तुलापुरुषकं यश्च कुरुते द्विजसत्तमः । स मुक्तस्सर्वपापैस्तु गच्छेत दिवमूर्जितः

tulāpuruṣakaṁ yaśca kurute dvijasattamaḥ | sa muktassarvapāpaistu gaccheta divamūrjitaḥ

जो श्रेष्ठ द्विज तुलापुरुष-दान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर बलशाली रूप में स्वर्ग जाता है।

श्लोक 59 (skanda.8.112.59)

अतिकृच्छ्रेण तु नरः शर्वस्य भवनं व्रजेत् । कृच्छ्रातिकृच्छ्रेण तथा गाणपत्यमवाप्नुयात्

atikṛcchreṇa tu naraḥ śarvasya bhavanaṁ vrajet | kṛcchrātikṛcchreṇa tathā gāṇapatyamavāpnuyāt

अतिकृच्छ्र व्रत से मनुष्य शिव के भवन को प्राप्त होता है, और कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत से गणपति-पद प्राप्त करता है।

श्लोक 60 (skanda.8.112.60)

यस्तु सर्वाणि कृच्छ्राणि कुरुते नरसत्तमः । स यं प्रार्थयते कामं तमेव समुपाश्नुते

yastu sarvāṇi kṛcchrāṇi kurute narasattamaḥ | sa yaṁ prārthayate kāmaṁ tameva samupāśnute

जो श्रेष्ठ पुरुष सभी कृच्छ्र-व्रत करता है, वह जिस भी कामना की याचना करता है उसी को प्राप्त करता है।

श्लोक 61 (skanda.8.112.61)

यस्य कस्यचिदेतेषां कर्ता स्यात् सुसमाहितः । स तेन शुद्धो भवति देवत्वञ्चापि विन्दति

yasya kasyacideteṣāṁ kartā syāt susamāhitaḥ | sa tena śuddho bhavati devatvañcāpi vindati

इनमें से जिस किसी को भी एकाग्रचित्त होकर करने वाला उससे शुद्ध होता है और देवत्व भी प्राप्त करता है।

श्लोक 62 (skanda.8.112.62)

पयोभक्षस्तु यो नित्यं नरः संवत्सरं वसेत् । यावकं चोपयुञ्जानो गोमूत्रेणाभिसंस्कृतम्

payobhakṣastu yo nityaṁ naraḥ saṁvatsaraṁ vaset | yāvakaṁ copayuñjāno gomūtreṇābhisaṁskṛtam

जो मनुष्य एक वर्ष तक नित्य केवल दूध पीकर रहता है, अथवा गोमूत्र से संस्कारित यवागू (जौ का दलिया) खाकर रहता है,

श्लोक 63 (skanda.8.112.63)

पिण्याकफलभक्षो वा अक्षारलवणोपि वा । सोश्वमेधफलं प्राप्य ब्रह्मलोकं समश्नुते

piṇyākaphalabhakṣo vā akṣāralavaṇopi vā | sośvamedhaphalaṁ prāpya brahmalokaṁ samaśnute

अथवा तिलखली और फल खाकर, बिना क्षार-नमक के रहता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 64 (skanda.8.112.64)

सर्वपापविनिर्मुक्तो विमुक्तस्सर्वबन्धनैः । विमानेनार्कवर्णेन ब्रह्मवच्चरते च सः

sarvapāpavinirmukto vimuktassarvabandhanaiḥ | vimānenārkavarṇena brahmavaccarate ca saḥ

वह सब पापों से मुक्त, सब बन्धनों से रहित होकर, सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर ब्रह्मा के समान विचरण करता है।

श्लोक 65 (skanda.8.112.65)

यस्त्वेतान्येव सर्वाणि व्यस्तानि नरसत्तमः । यावदुच्छ्वासमाशेते महात्मा नष्टकिल्विषः

yastvetānyeva sarvāṇi vyastāni narasattamaḥ | yāvaducchvāsamāśete mahātmā naṣṭakilviṣaḥ

जो श्रेष्ठ पुरुष इन सभी व्रतों को पृथक्-पृथक् करते हुए जीवनपर्यन्त पालन करता है, वह महात्मा पाप से रहित हो जाता है,

श्लोक 66 (skanda.8.112.66)

स लोकान्वा महासत्वो यथेष्टान् मोक्षमेव वा । ऐश्वर्यं वा महत् प्राप्य दीप्यमानोवतिष्ठते

sa lokānvā mahāsatvo yatheṣṭān mokṣameva vā | aiśvaryaṁ vā mahat prāpya dīpyamānovatiṣṭhate

वह महान् सत्त्वशाली पुरुष इच्छानुसार लोकों को, अथवा मोक्ष को, अथवा महान् ऐश्वर्य को प्राप्त कर देदीप्यमान होकर स्थित रहता है।

श्लोक 67 (skanda.8.112.67)

एतान्येव च सर्वाणि दानानि च तपांसि च । विना मन्त्रेण सततं शूद्राणामपि सर्वशः

etānyeva ca sarvāṇi dānāni ca tapāṁsi ca | vinā mantreṇa satataṁ śūdrāṇāmapi sarvaśaḥ

ये सभी दान और तप शूद्रों के लिए भी सदा बिना मन्त्रों के सब प्रकार से विहित हैं,

श्लोक 68 (skanda.8.112.68)

विधीयते न सन्देहो एवमाह प्रजापतिः । अमन्त्रास्ते स्मृताः सर्वे शूद्रा विगतकल्मषाः

vidhīyate na sandeho evamāha prajāpatiḥ | amantrāste smṛtāḥ sarve śūdrā vigatakalmaṣāḥ

इसमें कोई सन्देह नहीं, ऐसा प्रजापति ने कहा है। शूद्र इन्हें बिना मन्त्रों के करके सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, ऐसा स्मृति में कहा गया है।

श्लोक 69 (skanda.8.112.69)

स्त्रीणां तु दैवतं भर्ता न ततोन्यद्विधीयते । स गतिः परमं धाम स धर्मः परमः स्मृतः

strīṇāṁ tu daivataṁ bhartā na tatonyadvidhīyate | sa gatiḥ paramaṁ dhāma sa dharmaḥ paramaḥ smṛtaḥ

स्त्रियों के लिए पति ही देवता है, उससे भिन्न कुछ भी विहित नहीं। वही उनकी गति है, वही परम धाम है, वही परम धर्म कहा गया है।

श्लोक 70 (skanda.8.112.70)

तेन या त्वभ्यनुज्ञाता इमं धर्मं समाचरेत् । सा फलं तस्य धर्मस्य प्राप्नोति सुसमाहिता

tena yā tvabhyanujñātā imaṁ dharmaṁ samācaret | sā phalaṁ tasya dharmasya prāpnoti susamāhitā

जो स्त्री अपने पति की अनुमति से इस धर्म का आचरण करती है, वह एकाग्रचित्त होकर उस धर्म का फल प्राप्त करती है।

श्लोक 71 (skanda.8.112.71)

या तु तेनाननुज्ञाता धर्मं किञ्चित् समाचरेत् । न तत्फलं सा लभते लभते च सती फलम्

yā tu tenānanujñātā dharmaṁ kiñcit samācaret | na tatphalaṁ sā labhate labhate ca satī phalam

किन्तु जो स्त्री उसकी अनुमति के बिना कोई धर्म-कृत्य करती है, वह उसका फल नहीं पाती; सती स्त्री ही फल पाती है।

श्लोक 72 (skanda.8.112.72)

या तु भर्त्राभ्यनुज्ञाता कृत्वा धर्मं सुपुष्कलम् । दद्यात्तु पत्युर्या नारी तस्यानन्तं भवेत् फलम्

yā tu bhartrābhyanujñātā kṛtvā dharmaṁ supuṣkalam | dadyāttu patyuryā nārī tasyānantaṁ bhavet phalam

जो स्त्री पति की अनुमति से प्रचुर धर्म-कार्य करके उसका फल अपने पति को अर्पित कर देती है, उसका फल अनन्त होता है।

श्लोक 73 (skanda.8.112.73)

यच्च प्रार्थयते किञ्चिदिह लोके परत्र वा । तत्सर्वं प्राप्नुते देव्यः सुभगा चापि जायते

yacca prārthayate kiñcidiha loke paratra vā | tatsarvaṁ prāpnute devyaḥ subhagā cāpi jāyate

हे देवियो! वह इस लोक या परलोक में जो भी कामना करती है, वह सब पाती है, और सौभाग्यशाली होकर जन्म लेती है।

श्लोक 74 (skanda.8.112.74)

वश्यश्चास्या भवेद् भर्त्ता प्रिया तस्य च सा तदा । पुत्रप्रजा च भति न च दुःखं समश्नुते

vaśyaścāsyā bhaved bhartā priyā tasya ca sā tadā | putraprajā ca bhati na ca duḥkhaṁ samaśnute

उसका पति उसके वश में हो जाता है और वह उसे प्रिय होती है, पुत्र-प्रजा से सम्पन्न होती है और दुःख नहीं भोगती।

श्लोक 75 (skanda.8.112.75)

एष धर्मो मयाख्यातो युष्माकं लोकमातरः । अतो भूयश्च किं त्वन्यच्छ्रोतुमिच्छथ शोभनाः

eṣa dharmo mayākhyāto yuṣmākaṁ lokamātaraḥ | ato bhūyaśca kiṁ tvanyacchrotumicchatha śobhanāḥ

हे लोकमाताओ! यह धर्म मैंने तुम्हें बताया। इसके अतिरिक्त हे शोभना देवियो! अब और क्या सुनना चाहती हो?

श्लोक 76 (skanda.8.112.76)

अयं हि धर्मः सुमहानतिप्रभः सुदुष्करश्चाप्यकृत्मभिर्वराः । न चैनमन्यस्य शठस्य कस्यचिदधर्मिणो वा कथयीत धर्मवित्

ayaṁ hi dharmaḥ sumahānatiprabhaḥ sudukṣkaraścāpyakṛtmabhirvarāḥ | na cainamanyasya śaṭhasya kasyacidadharmiṇo vā kathayīta dharmavit

हे वरा देवियो! यह धर्म अत्यन्त महान्, अत्यन्त प्रभावशाली और असंस्कृत जनों के लिए अत्यन्त दुष्कर है। धर्म को जानने वाला इसे किसी भी धूर्त अथवा अधर्मी को न बताए।

श्लोक 77 (skanda.8.112.77)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ताः सहिताः सर्वा देव्यो लोकस्य मातरः । पूजयित्वा महादेवीमूचुः संहृष्टचेतसः

sanatkumāra uvāca | tatastāḥ sahitāḥ sarvā devyo lokasya mātaraḥ | pūjayitvā mahādevīmūcuḥ saṁhṛṣṭacetasaḥ

सनत्कुमार ने कहा - तत्पश्चात् वे सब लोकमाता देवियाँ एकत्र होकर, महादेवी की पूजा करके, हर्षित चित्त से बोलीं -

श्लोक 78 (skanda.8.112.78)

अहो धर्मस्त्वयाख्यातः सर्वामरनमस्कृते । यस्य संसेवनात् क्षिप्रं प्राप्यते सुमहत् फलम्

aho dharmastvayākhyātaḥ sarvāmaranamaskṛte | yasya saṁsevanāt kṣipraṁ prāpyate sumahat phalam

हे सर्वदेवनमस्कृते! तुमने यह अद्भुत धर्म बताया है, जिसके आचरण से शीघ्र ही महान् फल प्राप्त होता है।

श्लोक 79 (skanda.8.112.79)

इतो वीक्षामहे देवि गिरेरस्य वनं शुभम् । पुष्पजातिसमाकीर्णं बहुपक्षिगणावृतम्

ito vīkṣāmahe devi girerasya vanaṁ śubham | puṣpajātisamākīrṇaṁ bahupakṣigaṇāvṛtam

हे देवि! यहाँ से हम इस पर्वत के सुन्दर वन को देखना चाहती हैं, जो विविध पुष्पों से भरा और अनेक पक्षिसमूहों से घिरा है।

श्लोक 80 (skanda.8.112.80)

तत उत्थाय सा देवी सहिता देवमातृभिः । मन्दरस्य गिरेर्दिव्यं द्रष्टुं तद्वनमुत्तमम्

tata utthāya sā devī sahitā devamātṛbhiḥ | mandarasya girerdivyaṁ draṣṭuṁ tadvanamuttamam

तब उठकर वह देवी, देवमाताओं के साथ, मन्दराचल पर्वत के उस उत्तम दिव्य वन को देखने चलीं।

श्लोक 81 (skanda.8.112.81)

विचचार महायोगा चक्षुर्दत्वा सुखापहम् । मानश्शिलानि शृङ्गाणि सौवर्णानि च वीक्षती

vicacāra mahāyogā cakṣurdatvā sukhāpaham | mānaśśilāni śṛṅgāṇi sauvarṇāni ca vīkṣatī

वह महायोगिनी देवी उस सुखदायक वन में विचरण करती हुईं, अपनी दृष्टि उसमें लगाकर मणि-शिलाओं और स्वर्णिम शिखरों को निहारती रहीं।

श्लोक 82 (skanda.8.112.82)

रम्याणि सिततोयानि गिरेः प्रस्रवणानि च । सरांस्युत्पलपूर्णानि वापीश्च सुमनोहराः । तुतोष गिरिजा दृष्ट्वा पार्श्वसंस्थं च नन्दिनम्

ramyāṇi sitatoyāni gireḥ prasravaṇāni ca | sarāṁsyutpalapūrṇāni vāpīśca sumanoharāḥ | tutoṣa girijā dṛṣṭvā pārśvasaṁsthaṁ ca nandinam

पर्वत के मनोहर, स्वच्छ जल वाले झरनों को, कमल-भरे सरोवरों को, और अत्यन्त सुन्दर बावड़ियों को देखकर, तथा अपने पार्श्व में स्थित नन्दी को देखकर, गिरिजा प्रसन्न हुईं।

श्लोक 83 (skanda.8.112.83)

तदा शुभावती नाम मेरुकन्या सुमध्यमा । उवाच हिमवत्पुत्रीं दर्शयंती शुभं वनम्

tadā śubhāvatī nāma merukanyā sumadhyamā | uvāca himavatputrīṁ darśayaṁtī śubhaṁ vanam

तब शुभावती नाम की सुडौल मेरु-कन्या ने हिमवत्पुत्री को वह सुन्दर वन दिखाते हुए कहा -

श्लोक 84 (skanda.8.112.84)

इदं पर्वतकन्ये त्वं पश्य केलिकलाशुभम् । वनं सर्वर्तुसंपन्नं यथाधित्वं सुभाषितम्

idaṁ parvatakanye tvaṁ paśya kelikalāśubham | vanaṁ sarvartusaṁpannaṁ yathādhitvaṁ subhāṣitam

हे पर्वतकन्ये! तुम इस वन को देखो, जो क्रीड़ा की कलाओं से शुभ और सभी ऋतुओं से सम्पन्न है, जैसा कि यहाँ सुन्दर वर्णन किया गया है।

श्लोक 85 (skanda.8.112.85)

अयं प्रसूते सुमहान् सपर्वस्यास्य शोभने । विदुषामथ कृच्छ्रेषु यथायुक्तं सुभाषितम्

ayaṁ prasūte sumahān saparvasyāsya śobhane | viduṣāmatha kṛcchreṣu yathāyuktaṁ subhāṣitam

हे शोभने! यह महान् पर्वत अपनी सभी शृंखलाओं सहित उत्पन्न होता है, जैसा कि विद्वानों ने कठिन प्रसंगों में भी उचित रूप से वर्णन किया है।

श्लोक 86 (skanda.8.112.86)

तथा स्वर्णोपलो भाति गिरेः शिखर उत्तमः । यथा लक्षणवद्विद्वान् प्रगीय इव सामगः

tathā svarṇopalo bhāti gireḥ śikhara uttamaḥ | yathā lakṣaṇavadvidvān pragīya iva sāmagaḥ

पर्वत का यह उत्तम, स्वर्णमय शिला वाला शिखर ऐसा शोभित होता है मानो कोई सुलक्षण विद्वान् सामगायक स्तुति गा रहा हो।

श्लोक 87 (skanda.8.112.87)

अयं च मणिमान्नित्यं शैलाग्रः प्रतिभास्वरः । भाति उद्यन्निवादित्य उभयस्तो महायुगे

ayaṁ ca maṇimānnityaṁ śailāgraḥ pratibhāsvaraḥ | bhāti udyannivāditya ubhayasto mahāyuge

यह जड़ाऊ रत्नों वाला पर्वत-शिखर सदा देदीप्यमान रहता है, मानो महायुग के दोनों संधिकालों में उदय होते सूर्य के समान चमक रहा हो।

श्लोक 88 (skanda.8.112.88)

अयं वैदूर्यशिखर इन्द्रनीलतलोपलः । भाति शर्वाणि विभ्राणः स्थलेश्वरहरोपरि

ayaṁ vaidūryaśikhara indranīlatalopalaḥ | bhāti śarvāṇi vibhrāṇaḥ sthaleśvaraharopari

यह वैदूर्यमणि का शिखर, जिसका तल इन्द्रनील मणि से बना है, ऐश्वर्य को धारण करते हुए भूमि के स्वामी शिव के समान शोभित होता है।

श्लोक 89 (skanda.8.112.89)

अयं मत्तो गजो मत्तः करेणुभिरिवावृतः । कृत्वाभ्यंजनयः सुभ्रु पल्लवः शिरसा नतः

ayaṁ matto gajo mattaḥ kareṇubhirivāvṛtaḥ | kṛtvābhyaṁjanayaḥ subhru pallavaḥ śirasā nataḥ

हे सुभ्रु! यह वृक्ष मानो मस्त हाथी है, जो हथिनियों से घिरा हुआ अपने पत्तों को अभ्यंजन कर सिर झुकाए खड़ा है।

श्लोक 90 (skanda.8.112.90)

अहो सुरूपं पश्येमं वनराजियुतं शुभे । यौवराज्येभिषिक्तं वै जयंतमिव चामरैः

aho surūpaṁ paśyemaṁ vanarājiyutaṁ śubhe | yauvarājyebhiṣiktaṁ vai jayaṁtamiva cāmaraiḥ

हे शुभे! देखो, यह वृक्ष-पंक्ति से सुशोभित यह वन कैसा सुरूप है, मानो चँवरों से युवराज-पद पर अभिषिक्त जयन्त को दिखा रहा हो।

श्लोक 91 (skanda.8.112.91)

पादपं चैव शर्वाणि पश्यैनं करपल्लवैः । मातुः समीपे नृत्यन्तं पुत्रं प्रियमिवौरसम्

pādapaṁ caiva śarvāṇi paśyainaṁ karapallavaiḥ | mātuḥ samīpe nṛtyantaṁ putraṁ priyamivaurasam

और हे शर्वाणि! इस वृक्ष को देखो, जो अपनी पल्लव-रूपी भुजाओं से मानो अपनी माता के समीप नाचता हुआ प्रिय पुत्र हो।

श्लोक 92 (skanda.8.112.92)

मन्ये प्रियावासमिमं देवताया वनस्य ह । अतीव दृश्यते शोभा नेदृशी दृष्टवत्यहम्

manye priyāvāsamimaṁ devatāyā vanasya ha | atīva dṛśyate śobhā nedṛśī dṛṣṭavatyaham

मुझे लगता है कि यह इस वन की देवता का प्रिय निवास है; इसकी शोभा अत्यन्त अद्भुत दिखती है, ऐसी मैंने पहले कभी नहीं देखी।

श्लोक 93 (skanda.8.112.93)

सनत्कुमार उवाच । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा शुभावत्या गिरेः सुता । निरैक्षिष्ट तरुं बालं हिमवत्तनयाव्यया

sanatkumāra uvāca | tasyāstadvacanaṁ śrutvā śubhāvatyā gireḥ sutā | niraikṣiṣṭa taruṁ bālaṁ himavattanayāvyayā

सनत्कुमार ने कहा - शुभावती के इस वचन को सुनकर, अविनाशिनी पर्वत-पुत्री ने उस छोटे वृक्ष को ध्यान से देखा।

श्लोक 94 (skanda.8.112.94)

तथा सा देवदेवी तं विचरन्ती महागिरौ । अपश्यद्बालसूर्याभं बालाशोकं सुपुष्पितम्

tathā sā devadevī taṁ vicarantī mahāgirau | apaśyadbālasūryābhaṁ bālāśokaṁ supuṣpitam

उस महापर्वत पर विचरण करती हुई उस देवदेवी ने बाल-सूर्य के समान कान्तिमान् एक कोमल, सुपुष्पित अशोक-वृक्ष को देखा।

श्लोक 95 (skanda.8.112.95)

आताम्रपल्लवशतैः कृत्वाञ्जलिमवस्थितम् । तं दृष्टवा गिरिजा देवी परां प्रीतिमगान्मुने

ātāmrapallavaśataiḥ kṛtvāñjalimavasthitam | taṁ dṛṣṭavā girijā devī parāṁ prītimagānmune

वह अपने सैकड़ों लाल पल्लवों से मानो अंजलि बाँधे खड़ा था। उसे देखकर, हे मुने! गिरिजा देवी परम प्रसन्नता को प्राप्त हुईं।

श्लोक 96 (skanda.8.112.96)

मनसाचिन्तयच्चैव पुत्रोयं पादपो मम । एष मे तनयः श्लाघ्यो भविता नन्दिवर्धनः

manasācintayaccaiva putroyaṁ pādapo mama | eṣa me tanayaḥ ślāghyo bhavitā nandivardhanaḥ

उन्होंने मन में विचार किया - यह वृक्ष मेरा पुत्र होगा, यह प्रशंसनीय पुत्र मेरा आनन्द बढ़ाने वाला होगा।

श्लोक 97 (skanda.8.112.97)

भगवत्यागते ह्येनमनुज्ञाता स्वयंभुवा । ग्रहीष्यामि प्रियं पुत्रं वालाशोकस्य पादपम्

bhagavatyāgate hyenamanujñātā svayaṁbhuvā | grahīṣyāmi priyaṁ putraṁ vālāśokasya pādapam

जब स्वयम्भू भगवान् यहाँ आएँगे, तब उनकी अनुमति पाकर मैं इस बाल-अशोक वृक्ष को अपने प्रिय पुत्र के रूप में ग्रहण करूँगी।

श्लोक 98 (skanda.8.112.98)

मम चायमपुत्राया भविता पादपोत्तमः । पुत्रः पुत्रवतां श्रेष्ठाः पुत्रशोकविनाशनः

mama cāyamaputrāyā bhavitā pādapottamaḥ | putraḥ putravatāṁ śreṣṭhāḥ putraśokavināśanaḥ

पुत्रहीन मेरे लिए यह उत्तम वृक्ष पुत्र बनेगा, जो पुत्रवतियों में श्रेष्ठ होकर पुत्र की शोक-रहितता का कारण बनेगा।

श्लोक 99 (skanda.8.112.99)

सनत्कुमार उवाच । सैवं विनिश्चित्य तदा पादपं प्रति शोभना । अन्यं देशं पक्रिम्य उमा तत्राभ्यपश्यत

sanatkumāra uvāca | saivaṁ viniścitya tadā pādapaṁ prati śobhanā | anyaṁ deśaṁ pakrimya umā tatrābhyapaśyat

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार उस वृक्ष के विषय में निश्चय करके, वह सुन्दरी उमा तब अन्यत्र चली गईं और वहाँ देखने लगीं।

श्लोक 100 (skanda.8.112.100)

अथास्मिन्नन्तरेभूवन्नुत्पातास्तत्र भीषणाः । वायुवेगो महानासीद् गिरिवृक्षनिपातनः

athāsminnantarebhūvannutpātāstatra bhīṣaṇāḥ | vāyuvego mahānāsīd girivṛkṣanipātanaḥ

इसी बीच वहाँ भयंकर उत्पात होने लगे। एक प्रचण्ड वायुवेग उठा, जो पर्वत के वृक्षों को गिराने वाला था।

श्लोक 101 (skanda.8.112.101)

शिखरं पर्वतेन्द्रस्य अपतद् व्यसनं विना । पादपाश्च विना वातमुन्मूलाः संबभूविरे

śikharaṁ parvatendrasya apatad vyasanaṁ vinā | pādapāśca vinā vātamunmūlāḥ saṁbabhūvire

बिना किसी कारण के ही पर्वतराज का एक शिखर गिर पड़ा, और बिना ही वायु के वृक्ष जड़ से उखड़ गए।

श्लोक 102 (skanda.8.112.102)

उल्काः पतन्ति चाकाशाद्वाति वायुरशोभनः । अक्षि सव्यं स्फुरच्चापि देव्यास्तत् कालिनन्दन

ulkāḥ patanti cākāśādvāti vāyuraśobhanaḥ | akṣi savyaṁ sphuraccāpi devyāstat kālinandana

हे कालिनन्दन! आकाश से उल्काएँ गिरने लगीं, अशुभ वायु बहने लगी, और उस देवी की बायीं आँख भी फड़कने लगी।

श्लोक 103 (skanda.8.112.103)

तान् वीक्ष्य विस्मिता देवी शैलादिमिदमब्रवीत् । सखीश्च सर्वकालेया इदं वचनकोविदाः

tān vīkṣya vismitā devī śailādimidamabravīt | sakhīśca sarvakāleyā idaṁ vacanakovidāḥ

इन सबको देखकर विस्मित देवी ने शैलादि (नन्दी) से तथा अपनी वाक्पटु सखियों से यह वचन कहा -

श्लोक 104 (skanda.8.112.104)

देव्युवाच । प्रमत्तो भाति शैलोयं वृक्षैस्तैः सर्वतो युतः । भयं महदिदं मन्ये नैतदाकस्मिकं स्मृतम्

devyuvāca | pramatto bhāti śailoyaṁ vṛkṣaistaiḥ sarvato yutaḥ | bhayaṁ mahadidaṁ manye naitadākasmikaṁ smṛtam

देवी ने कहा - यह पर्वत अपने चारों ओर के वृक्षों सहित मानो उन्मत्त-सा दिखाई देता है। मुझे इसमें बड़ा भय जान पड़ता है; ऐसा कहा गया है कि यह अकस्मात् नहीं होता।

श्लोक 105 (skanda.8.112.105)

न चानिमित्तमुत्पाता भवन्त्येते दुरासदाः । तथा कुरु यथा मे नो भयं यच्छन्त्यशोभनाः

na cānimittamutpātā bhavantyete durāsadāḥ | tathā kuru yathā me no bhayaṁ yacchantyaśobhanāḥ

ये दुर्धर्ष उत्पात बिना कारण नहीं होते। ऐसा करो कि ये अशुभ लक्षण मुझे और भय न दें।

श्लोक 106 (skanda.8.112.106)

ततो नन्दी प्रणम्याह देवदेवीं कृताञ्जलिः । कुतो भयं भवानि त्वां या त्वं माता दिवौकसाम्

tato nandī praṇamyāha devadevīṁ kṛtāñjaliḥ | kuto bhayaṁ bhavāni tvāṁ yā tvaṁ mātā divaukasām

तब नन्दी ने हाथ जोड़कर, प्रणाम करते हुए देवदेवी से कहा - हे भवानी! जो तुम देवताओं की माता हो, तुम्हें भय किस बात का हो सकता है?

श्लोक 107 (skanda.8.112.107)

सनत्कुमार उवाच । तस्यैवं वदतो व्यास देवीं विश्वस्य मातरम् । अन्धकोपि तदा दैत्यः पातालान्मन्दरं ययौ

sanatkumāra uvāca | tasyaivaṁ vadato vyāsa devīṁ viśvasya mātaram | andhakopi tadā daityaḥ pātālānmandaraṁ yayau

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! उसके इस प्रकार विश्वमाता देवी से कहते-कहते ही, दैत्य अन्धक भी पाताल से मन्दराचल की ओर आ पहुँचा।

श्लोक 108 (skanda.8.112.108)

प्रह्लादप्रमुखैर्दैत्यैर्दानवैश्च सहस्रशः । वृतः श्रीमान् महादैत्यः शक्रो देवगणैरिव

prahlādapramukhairdaityairdānavaiśca sahasraśaḥ | vṛtaḥ śrīmān mahādaityaḥ śakro devagaṇairiva

प्रह्लाद-प्रमुख दैत्यों और सहस्रों दानवों से घिरा हुआ वह श्रीमान् महादैत्य ऐसा दिखता था मानो देवगणों से घिरा हुआ इन्द्र हो।

श्लोक 109 (skanda.8.112.109)

स दैत्यानां मतेनैव वरिष्ठानां महासुरः । आगतो मन्दरं द्रष्टुं यथेन्द्रो नन्दनं वनम्

sa daityānāṁ matenaiva variṣṭhānāṁ mahāsuraḥ | āgato mandaraṁ draṣṭuṁ yathendro nandanaṁ vanam

वह महासुर, दैत्यों में श्रेष्ठ जनों की सम्मति से ही, मन्दराचल को देखने आया था, जैसे इन्द्र नन्दनवन को देखने जाता है।

श्लोक 110 (skanda.8.112.110)

प्रह्लादश्चानुह्रादश्च शिनिर्बाष्कलिरेव च । तुण्डस्तुहुण्डो वातापी बलिर्बाणो विरोचनः

prahlādaścānuhrādaśca śinirbāṣkalireva ca | tuṇḍastuhuṇḍo vātāpī balirbāṇo virocanaḥ

प्रह्लाद, अनुह्राद, शिनि, बाष्कलि, तुण्ड, तुहुण्ड, वातापि, बलि, बाण और विरोचन -

श्लोक 111 (skanda.8.112.111)

इल्वलो नमुचिर्व्यंसो विप्रचित्तिर्महासुरः । सुन्दो निसुन्दो नरको धेनुकोरिष्ट एव च

ilvalo namucirvyaṁso vipracittirmahāsuraḥ | sundo nisundo narako dhenukoriṣṭa eva ca

इल्वल, नमुचि, व्यंस, महासुर विप्रचित्ति, सुन्द, निसुन्द, नरक, धेनुक और अरिष्ट -

श्लोक 112 (skanda.8.112.112)

मुरः कार्त्तस्वनश्चैव हस्ती दुर्योधनो मयः । तारकस्तारकाक्षश्च विद्युन्माली प्रभाकरः

muraḥ kārttasvanaścaiva hastī duryodhano mayaḥ | tārakastārakākṣaśca vidyunmālī prabhākaraḥ

मुर, कार्त्तस्वन, हस्ती, दुर्योधन, मय, तारक, तारकाक्ष, विद्युन्माली और प्रभाकर -

श्लोक 113 (skanda.8.112.113)

हालाहलश्च कुम्भश्च संवरः कालसंवरः । धुन्धुस्तथेन्द्रदमनो हयग्रीवः शतोदरः

hālāhalaśca kumbhaśca saṁvaraḥ kālasaṁvaraḥ | dhundhustathendradamano hayagrīvaḥ śatodaraḥ

हालाहल, कुम्भ, संवर, कालसंवर, धुन्धु, इन्द्रदमन, हयग्रीव और शतोदर -

श्लोक 114 (skanda.8.112.114)

मेघनादः सिंहनादो दुन्दुभिः शतदुन्दुभिः । कालनेमिर्बको दंडो विपाकः पाक एव च

meghanādaḥ siṁhanādo dundubhiḥ śatadundubhiḥ | kālanemirbako daṇḍo vipākaḥ pāka eva ca

मेघनाद, सिंहनाद, दुन्दुभि, शतदुन्दुभि, कालनेमि, बक, दण्ड, विपाक और पाक -

श्लोक 115 (skanda.8.112.115)

वृषपर्वा शतावर्तः पुलोमा शरभस्तथा । बलो गगनमूर्धा च सूचीरोमा महायशाः

vṛṣaparvā śatāvartaḥ pulomā śarabhastathā | balo gaganamūrdhā ca sūcīromā mahāyaśāḥ

वृषपर्वा, शतावर्त, पुलोमा, शरभ, बल, गगनमूर्धा और अत्यन्त यशस्वी सूचीरोमा -

श्लोक 116 (skanda.8.112.116)

असिलोमा प्रलम्बश्च शंभुर्देवान्तकस्तथा । महिषो भीमसेनश्च वायुर्वादित्र एव च । अन्धकानुचराप्येते मंदरं समुपागताः

asilomā pralambaśca śaṁbhurdevāntakastathā | mahiṣo bhīmasenaśca vāyurvāditra eva ca | andhakānucarāpyete maṁdaraṁ samupāgatāḥ

असिलोमा, प्रलम्ब, शम्भु, देवान्तक, महिष, भीमसेन तथा वायु और वादित्र - अन्धक के ये सभी अनुचर भी मन्दराचल पर आ पहुँचे।

श्लोक 117 (skanda.8.112.117)

ते शस्त्रवंतो जितदेवसंघा महानुभावा धर्मपथच्युताश्च । सर्वे च शूरा ह्यनिवर्तिनश्च सहान्धका मन्दरगा बभूवुः

te śastravaṁto jitadevasaṁghā mahānubhāvā dharmapathacyutāśca | sarve ca śūrā hyanivartinaśca sahāndhakā mandaragā babhūvuḥ

वे सब शस्त्रधारी, देवसमूह को जीतने वाले, महान् प्रभावशाली, किन्तु धर्म के मार्ग से च्युत, तथा सब शूर और युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले - अन्धक के साथ ये सभी मन्दराचल पर पहुँच गए।

श्लोक 118 (skanda.8.112.118)

सनत्कुमार उवाच । तद् गजानामिव कुलं मत्तानां कालिनन्दन । वर्षतामिव मेघानां सविषाणां सरीसृपाम्

sanatkumāra uvāca | tad gajānāmiva kulaṁ mattānāṁ kālinandana | varṣatāmiva meghānāṁ saviṣāṇāṁ sarīsṛpām

सनत्कुमार ने कहा - हे कालिनन्दन! वह मानो मस्त हाथियों का समूह था, मानो वर्षा करते मेघों का समूह था, अथवा मानो विषैले सरीसृपों का समूह था।

श्लोक 119 (skanda.8.112.119)

दर्पितानां वराहाणां महाकुलमिवोल्वणम् । मन्दरे दानवकुलं तथा तत् प्रचचार ह

darpitānāṁ varāhāṇāṁ mahākulamivolvaṇam | mandare dānavakulaṁ tathā tat pracacāra ha

अथवा मानो उन्मत्त शूकरों का विशाल विकराल समूह हो - इस प्रकार वह दानव-कुल मन्दराचल पर विचरण करने लगा।

श्लोक 120 (skanda.8.112.120)

सोन्धको विचरँस्तत्र सखीभिः सहितां तदा । अपश्यद् देवदेवी तु वृकः सिंहवधूमिव

sondhako vicaram̐statra sakhībhiḥ sahitāṁ tadā | apaśyad devadevī tu vṛkaḥ siṁhavadhūmiva

वहाँ विचरण करते हुए उस अन्धक ने अपनी सखियों सहित उस देवदेवी को देख लिया, जैसे कोई भेड़िया सिंह की वधू को देख ले।

श्लोक 121 (skanda.8.112.121)

दृष्ट्वा भगवतीं देवीं स दैत्यो मूढचेतनः । प्रणामं नाकरोद् व्यास अन्ववैक्षत केवलम्

dṛṣṭvā bhagavatīṁ devīṁ sa daityo mūḍhacetanaḥ | praṇāmaṁ nākarod vyāsa anvavaikṣata kevalam

उस भगवती देवी को देखकर भी वह मूर्ख दैत्य कोई प्रणाम नहीं करता था, हे व्यास! वह केवल उन्हें एकटक देखता ही रह गया।

श्लोक 122 (skanda.8.112.122)

तं दृष्ट्वानिमिषं दैत्यं पश्यन्तमचलात्मजाम् । प्रह्लादस्तु महाबुद्धिरिदमाह वचोर्थवत्

taṁ dṛṣṭvānimiṣaṁ daityaṁ paśyantamacalātmajām | prahlādastu mahābuddhiridamāha vacorthavat

उस दैत्य को अपलक होकर पर्वतपुत्री को निहारते देख, महाबुद्धिमान् प्रह्लाद ने यह अर्थपूर्ण वचन कहा -

श्लोक 123 (skanda.8.112.123)

इयं लोकस्य जननी हिमवत्तनयाव्यया । उमेति जगति ख्याता तपोयोगबलान्विता

iyaṁ lokasya jananī himavattanayāvyayā | umeti jagati khyātā tapoyogabalānvitā

यह हिमवान् की अविनाशिनी पुत्री है, संसार की जननी है, जो तप और योग के बल से युक्त होकर उमा के नाम से जगत् में विख्यात है।

श्लोक 124 (skanda.8.112.124)

यस्य पुत्रोभवद् ब्रह्मा प्रजापत्यं च यो ददौ । वरेण यश्च पुत्रस्य पुत्रतां ब्रह्मणो गतः

yasya putrobhavad brahmā prajāpatyaṁ ca yo dadau | vareṇa yaśca putrasya putratāṁ brahmaṇo gataḥ

जिसका पति (शिव) ब्रह्मा का भी पुत्र माना गया और जिसने ब्रह्मा को प्रजापति-पद प्रदान किया, तथा जो वर देकर पुत्र के रूप में ब्रह्मा का पुत्रत्व प्राप्त हुआ,

श्लोक 125 (skanda.8.112.125)

अस्माकं देवतानाञ्च यो ददाति वराञ्छुभान् । आरध्यः सर्वलोकानां देवानां च महायशाः

asmākaṁ devatānāñca yo dadāti varāñchubhān | ārādhyaḥ sarvalokānāṁ devānāṁ ca mahāyaśāḥ

जो हम देवताओं को भी शुभ वर देता है, जो सम्पूर्ण लोकों तथा देवताओं के लिए आराधनीय और महायशस्वी है -

श्लोक 126 (skanda.8.112.126)

यः स्थितः सर्वमाविश्य भूतग्राममशेषतः । यस्यात्मना सर्वमिदं धार्यते जगदव्ययम्

yaḥ sthitaḥ sarvamāviśya bhūtagrāmamaśeṣataḥ | yasyātmanā sarvamidaṁ dhāryate jagadavyayam

जो सम्पूर्ण भूतसमूह में व्याप्त होकर स्थित है, और जिसकी आत्मा से यह सम्पूर्ण अविनाशी जगत् धारण किया जाता है -

श्लोक 127 (skanda.8.112.127)

यः स्वेच्छया सर्वमिदं निमेषार्धेन संक्षिपेत् । पत्नीयं तस्य देवस्य परमेशस्य धीमतः । शक्ता हीयं जगत्सर्वं क्षणेन दितिजाधिप

yaḥ svecchayā sarvamidaṁ nimeṣārdhena saṅkṣipet | patnīyaṁ tasya devasya parameśasya dhīmataḥ | śaktā hīyaṁ jagatsarvaṁ kṣaṇena ditijādhipa

जो अपनी इच्छा से इस सम्पूर्ण जगत् को आधे निमेष में समेट सकता है - यह उसी परमेश्वर की, उस बुद्धिमान् देव की पत्नी है। हे दितिजाधिप! यह क्षणभर में इस सम्पूर्ण जगत् को नष्ट करने में समर्थ है।

श्लोक 128 (skanda.8.112.128)

दग्धुं वाप्यथवा हर्तुं क्षेप्तुं नरक एव वा । कथमस्याः प्रणामं त्वं नाकरोर्दैत्य मोहितः

dagdhuṁ vāpyathavā hartuṁ kṣeptuṁ naraka eva vā | kathamasyāḥ praṇāmaṁ tvaṁ nākarordaitya mohitaḥ

वह इसे भस्म करने, हर लेने, अथवा नरक में फेंक देने में भी समर्थ है। हे दैत्य! तूने मोहित होकर उसे प्रणाम क्यों नहीं किया?

श्लोक 129 (skanda.8.112.129)

सनत्कुमार उवाच । अथैवं ब्रुवतस्तस्य धर्मयुक्तं सुरद्विषः । देवीभिः सहिता देवी क्षणेनान्तर्हिता मुने

sanatkumāra uvāca | athaivaṁ bruvatastasya dharmayuktaṁ suradviṣaḥ | devībhiḥ sahitā devī kṣaṇenāntarhitā mune

सनत्कुमार ने कहा - उस गोदेवद्वेषी (प्रह्लाद) के इस प्रकार धर्मयुक्त वचन कहते-कहते ही, हे मुने! वह देवी अन्य देवियों सहित क्षणभर में अन्तर्धान हो गईं।

श्लोक 130 (skanda.8.112.130)

अदृश्याः समपद्यन्त ताः स्त्रियो लोकमातरः

adṛśyāḥ samapadyanta tāḥ striyo lokamātaraḥ

वे मातृ-देवियाँ, लोक की माताएँ, अदृश्य हो गईं। [टिप्पणी: स्रोत-पाण्डुलिपि में यहाँ इस श्लोक की दूसरी पंक्ति क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है, अतः केवल उपलब्ध चरण ही यहाँ दिया गया है।]

श्लोक 131 (skanda.8.112.131)

अथ ते तासु नष्टासु मन्दरस्य शुभं वनम् । पादचारेण संप्राप्ता बहुदृश्यसमावृतम्

atha te tāsu naṣṭāsu mandarasya śubhaṁ vanam | pādacāreṇa saṁprāptā bahudṛśyasamāvṛtam

तब उन देवियों के अन्तर्धान हो जाने पर, वे (दैत्य) पैदल चलते हुए मन्दराचल के उस सुन्दर, अनेक दृश्यों से भरे वन में जा पहुँचे।

श्लोक 132 (skanda.8.112.132)

बलाभिः कलनीषंडैः सातिमुक्तप्रियंगुभिः । चंपकैर्बकुलैर्लोध्रैरशोकैर्नागसाह्वयैः

balābhiḥ kalanīṣaṇḍaiḥ sātimuktapriyaṅgubhiḥ | caṁpakairbakulairlodhrairaśokairnāgasāhvayaiḥ

वह वन बला, कदली-समूहों, अतिमुक्त-लता तथा प्रियंगु से, तथा चम्पा, बकुल, लोध्र, अशोक और नाग-केसर के वृक्षों से सुशोभित था -

श्लोक 133 (skanda.8.112.133)

पुन्नागैस्तिलकैश्चैव देवदारुवनैरपि । सरलैर्नारिकेलैश्च पद्मषंडैश्च शोभितम्

punnāgaistilakaiścaiva devadāruvanairapi | saralairnārikelaiśca padmaṣaṇḍaiśca śobhitam

तथा पुन्नाग, तिलक, देवदारु-वनों, सरल-वृक्षों, नारियलों और कमल-समूहों से भी अलंकृत था।

श्लोक 134 (skanda.8.112.134)

गह्वरैश्च नितम्बैश्च गुहाभिर्निर्झरैरपि । न तस्माद्रमणीयं हि पृथिव्यां विद्यते क्वचित्

gahvaraiśca nitambaiśca guhābhirnirjharairapi | na tasmādramaṇīyaṁ hi pṛthivyāṁ vidyate kvacit

तथा गहन कन्दराओं, ढालों, गुफाओं और झरनों से युक्त था। सचमुच पृथ्वी पर इससे अधिक रमणीय स्थान कहीं भी नहीं था।

श्लोक 135 (skanda.8.112.135)

अथ ते दैत्यपास्सर्वे व्यचरन्त महागिरौ । बहुनिर्झरसंकीर्णे नानापादपसंकुले

atha te daityapāssarve vyacaranta mahāgirau | bahunirjharasaṅkīrṇe nānāpādapasaṅkule

तब वे सभी दैत्यगण उस महान् पर्वत पर, जो अनेक झरनों से भरा और नाना वृक्षों से व्याप्त था, विचरण करने लगे।

श्लोक 136 (skanda.8.112.136)

तत्र ते विचरन्तस्तु एकस्मिन्निर्झरे स्थितान् । सिद्धानपश्यन् सप्तर्षीन् योगयुक्तान् महामुनीन्

tatra te vicarantastu ekasminnirjhare sthitān | siddhānapaśyan saptarṣīn yogayuktān mahāmunīn

वहाँ विचरण करते हुए उन्होंने एक झरने के पास बैठे हुए योगयुक्त सिद्ध सप्तर्षि महामुनियों को देखा।

श्लोक 137 (skanda.8.112.137)

उपविष्टान् शिलापट्टे मिथः कथयतः कथाः । धर्मयुक्ताश्च चित्रार्था मार्मिकाः सुसुखावहाः

upaviṣṭān śilāpaṭṭe mithaḥ kathayataḥ kathāḥ | dharmayuktāśca citrārthā mārmikāḥ susukhāvahāḥ

वे एक शिलाखण्ड पर बैठे हुए, आपस में धर्मयुक्त, विचित्रार्थ, मर्मस्पर्शी और अत्यन्त सुखदायक कथाएँ कह रहे थे।

श्लोक 138 (skanda.8.112.138)

तान्दृष्ट्वा सोन्धकोपृच्छत् प्रह्लादमसुरोत्तमम् । क इमे ऋषयो ह्यत्र किमर्थञ्चेह संगताः

tāndṛṣṭvā sondhakopṛcchat prahlādamasurottamam | ka ime ṛṣayo hyatra kimarthañceha saṅgatāḥ

उन्हें देखकर अन्धक ने असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद से पूछा - ये ऋषि कौन हैं, और किस प्रयोजन से यहाँ एकत्र हुए हैं?

श्लोक 139 (skanda.8.112.139)

तमुवाच तदा धीमानसुरो देवकण्टकम् । हिरण्यकशिपोः पुत्रो बुद्ध्वा मध्यं समास्थितः

tamuvāca tadā dhīmānasuro devakaṇṭakam | hiraṇyakaśipoḥ putro buddhvā madhyaṁ samāsthitaḥ

तब उस बुद्धिमान् दैत्य - हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद - ने जानकर उस देवकण्टक (अन्धक) से बीच का मार्ग अपनाकर कहा -

श्लोक 140 (skanda.8.112.140)

प्रह्लाद उवाच । एतेन्धक महात्मान ऋषयस्सप्त संगताः । भृगुरत्रिर्मरीचिश्च विश्वामित्रोङ्गिरास्तथा

prahlāda uvāca | etendhaka mahātmāna ṛṣayassapta saṅgatāḥ | bhṛguratrirmarīciśca viśvāmitroṅgirāstathā

प्रह्लाद ने कहा - हे अन्धक! ये यहाँ एकत्र सात महात्मा ऋषि हैं - भृगु, अत्रि, मरीचि, विश्वामित्र और अंगिरा,

श्लोक 141 (skanda.8.112.141)

भरद्वाजो वसिष्ठश्च योगसिद्धास्तपोधनाः । इहागता महात्मानस्तपसा दग्धकिल्बिषाः

bharadvājo vasiṣṭhaśca yogasiddhāstapodhanāḥ | ihāgatā mahātmānastapasā dagdhakilbiṣāḥ

तथा भरद्वाज और वसिष्ठ, जो योगसिद्ध, तपोधन और महात्मा हैं तथा जिनके पाप तप से जल चुके हैं, यहाँ आए हैं।

श्लोक 142 (skanda.8.112.142)

नैषान्निष्कारणं मन्ये मन्दरागमनं प्रभो । इतो वयमिहैकान्ते स्थित्वा सर्वेसुरेश्वराः । जानीम किमिमे कार्यमिह कुर्वन्ति साधकाः

naiṣānniṣkāraṇaṁ manye mandarāgamanaṁ prabho | ito vayamihaikānte sthitvā sarvesureśvarāḥ | jānīma kimime kāryamiha kurvanti sādhakāḥ

हे प्रभो! मैं नहीं मानता कि इनका मन्दराचल आगमन बिना कारण है। हम सब असुरेश्वर यहाँ किसी एकान्त में ठहरकर देखें कि ये साधकगण यहाँ क्या कार्य कर रहे हैं।

श्लोक 143 (skanda.8.112.143)

एते वै निभृता भूतास्तूष्णीं कृत्वा यथाबलाः । मतं गृह्णीम् सर्वेषां तूष्णीं तिष्ठत दैत्यपाः

ete vai nibhṛtā bhūtāstūṣṇīṁ kṛtvā yathābalāḥ | mataṁ gṛhṇīma sarveṣāṁ tūṣṇīṁ tiṣṭhata daityapāḥ

ये सब प्राणी शान्त होकर, अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार मौन धारण किए हुए हैं। हम सबकी सम्मति लें; हे दैत्यनायको! तुम भी मौन होकर ठहरो।

श्लोक 144 (skanda.8.112.144)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते समयं कृत्वा स्थिता असुरपुंगवाः । योस्माकं तु वदेत् किञ्चिद् वध्यो नः स भवेदिति

sanatkumāra uvāca | tataste samayaṁ kṛtvā sthitā asurapuṅgavāḥ | yosmākaṁ tu vadet kiñcid vadhyo naḥ sa bhavediti

सनत्कुमार ने कहा - तब वे असुरश्रेष्ठ यह प्रतिज्ञा करके ठहर गए कि हम में से जो कोई भी कुछ बोल दे, वह हमारे द्वारा वध्य होगा।

श्लोक 145 (skanda.8.112.145)

तत्र तेषु स्थितेष्वेवमसुरेषु दुरात्मसु । ऋषयस्ते तपोयुक्ता वाक्यान्यूचुः परस्परम्

tatra teṣu sthiteṣvevamasureṣu durātmasu | ṛṣayaste tapoyuktā vākyānyūcuḥ parasparam

जब वे दुरात्मा असुर इस प्रकार वहाँ ठहरे हुए थे, तब तपोयुक्त उन ऋषियों ने आपस में ये वचन कहे -

श्लोक 146 (skanda.8.112.146)

न शुद्धोयं गिरेर्देशोद्य गच्छामोन्यतो द्विजाः । इहागमो हि दैत्यानां दृश्यते सुदुरात्मनाम्

na śuddhoyaṁ girerdeśodya gacchāmonyato dvijāḥ | ihāgamo hi daityānāṁ dṛśyate sudurātmanām

पर्वत का यह स्थान अब पवित्र नहीं रहा, हे द्विजो! हम अन्यत्र चलें। यहाँ अत्यन्त दुरात्मा दैत्यों का आगमन देखा जा रहा है।

श्लोक 147 (skanda.8.112.147)

भवान्यपि गतान्यत्र असुराणां भयार्दिता । असुरास्ते दुरात्मानो येषामेष क्षयो ध्रुवः

bhavānyapi gatānyatra asurāṇāṁ bhayārditā | asurāste durātmāno yeṣāmeṣa kṣayo dhruvaḥ

भवानी भी असुरों के भय से पीड़ित होकर अन्यत्र चली गईं। ये दुरात्मा असुर निश्चय ही विनाश को प्राप्त होने वाले हैं।

श्लोक 148 (skanda.8.112.148)

गतास्ते निधनं सर्वे धर्मं ये नाशयन्नुत । राज्यार्थं यदि तैः क्रूरैर्न धर्मो नाशितो भवेत्

gātāste nidhanaṁ sarve dharmaṁ ye nāśayannuta | rājyārthaṁ yadi taiḥ krūrairna dharmo nāśito bhavet

वे सभी विनाश को प्राप्त हुए हैं जिन्होंने धर्म का नाश किया। यदि उन क्रूरों ने राज्य के लोभ में धर्म का नाश न किया होता,

श्लोक 149 (skanda.8.112.149)

नैवं ते निधनं सर्वे प्राप्ताः स्युरमरद्विषः । स्वराज्यपरिसंतुष्टा भवेयुर्यदि संस्थिताः । तेपि सर्वेषु लोकेषु बभुः पूज्याः सुरा इव

naivaṁ te nidhanaṁ sarve prāptāḥ syuramaradviṣaḥ | svarājyaparisaṁtuṣṭā bhaveyuryadi saṁsthitāḥ | tepi sarveṣu lokeṣu babhuḥ pūjyāḥ surā iva

तो वे सब उन देव-द्वेषियों को इस प्रकार विनाश प्राप्त न होता। यदि वे अपने ही राज्य से सन्तुष्ट होकर स्थिर रहते, तो वे भी सभी लोकों में देवताओं के समान पूज्य होते।

श्लोक 150 (skanda.8.112.150)

सनत्कुमार उवाच । अंगिरास्तानुवाचेदं न तेषां कामिनं त्विह । राज्यहेतोः प्रवृत्तानामधर्मः ससुपस्थितः

sanatkumāra uvāca | aṅgirāstānuvācedaṁ na teṣāṁ kāminaṁ tviha | rājyahetoḥ pravṛttānāmadharmaḥ sasupasthitaḥ

सनत्कुमार ने कहा - अंगिरा ने उनसे यह कहा - यहाँ उन कामी पुरुषों की गति नहीं होती, जो राज्य के लिए प्रवृत्त होकर अधर्म का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 151 (skanda.8.112.151)

उपार्जयति राज्यं वै धर्म एव हि कामिनः । सोधर्मं नैव कुर्वीत स्थैर्यं राज्यं न किंचन

upārjayati rājyaṁ vai dharma eva hi kāminaḥ | sodharmaṁ naiva kurvīta sthairyaṁ rājyaṁ na kiṁcana

जो व्यक्ति भी राज्य चाहता है, उसे धर्म से ही राज्य प्राप्त होता है; अतः उसे कभी अधर्म नहीं करना चाहिए, अन्यथा राज्य में कोई भी स्थिरता नहीं रहती।

श्लोक 152 (skanda.8.112.152)

अत्रिरुवाच । अधर्मे राज्यमिच्छन्ति जयन्ति युधि सर्वदा । नो प्रियाश्चैव लोकस्य भवन्ति हितजीविनः

atriruvāca | adharme rājyamicchanti jayanti yudhi sarvadā | no priyāścaiva lokasya bhavanti hitajīvinaḥ

अत्रि ने कहा - जो अधर्म से राज्य चाहते हैं, वे सदा युद्ध में विजय पा भी लें, तो भी वे न तो लोक को प्रिय होते हैं, न ही हितकारी जीवन जीने वाले होते हैं।

श्लोक 153 (skanda.8.112.153)

धार्मिकास्त्वचिरेणैव हत्वा शत्रूनविक्लवाः । राज्येषु संप्रतिष्ठन्ते तस्माद्धर्मं समाश्रयेत्

dhārmikāstvacireṇaiva hatvā śatrūnaviklavāḥ | rājyeṣu saṁpratiṣṭhante tasmāddharmaṁ samāśrayet

किन्तु धर्मात्मा पुरुष अविचलित होकर शत्रुओं का नाश करके शीघ्र ही राज्यों में सुप्रतिष्ठित हो जाते हैं। इसलिए मनुष्य को धर्म का ही आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 154 (skanda.8.112.154)

ये तु राज्यं बलेनैव धर्मं त्यक्त्वाशुभेरताः । इच्छन्तोपि न तद्राज्यं प्राप्नुवन्ति कदाचन

ye tu rājyaṁ balenaiva dharmaṁ tyaktvāśubherataḥ | icchantopi na tadrājyaṁ prāpnuvanti kadācana

किन्तु जो लोग धर्म को त्यागकर, अशुभ कर्मों में रत होकर, केवल बल से राज्य चाहते हैं, वे इच्छा करने पर भी कभी उस राज्य को प्राप्त नहीं करते।

श्लोक 155 (skanda.8.112.155)

अथ यत् प्राप्यते राज्यं तैस्तु क्रूरेण कर्मणा । न चिरं तद् भवेत्तेषां विद्विष्टाश्च भवन्त्यत

atha yat prāpyate rājyaṁ taistu krūreṇa karmaṇā | na ciraṁ tad bhavetteṣāṁ vidviṣṭāśca bhavantyata

और जो राज्य उन्हें क्रूर कर्म से प्राप्त होता भी है, वह उनके पास चिरकाल तक नहीं टिकता, और वे इसी कारण सबके विद्वेष के पात्र बन जाते हैं।

श्लोक 156 (skanda.8.112.156)

भृगुरुवाच । धर्म एष पुरा प्राप्तो ह्यसुराणां भयावहः । ब्रह्मणा सृष्टिकामेन न च ते वर्तयन्त्युत

bhṛguruvāca | dharma eṣa purā prāpto hyasurāṇāṁ bhayāvahaḥ | brahmaṇā sṛṣṭikāmena na ca te vartayantyuta

भृगु ने कहा - यह भय उत्पन्न करने वाला धर्म पूर्वकाल में सृष्टि की कामना करने वाले ब्रह्मा द्वारा असुरों को भी दिया गया था, किन्तु वे उसका आचरण नहीं करते।

श्लोक 157 (skanda.8.112.157)

स्वभावेन च ते सर्वे दारुणा वै निसर्गतः । दारुणाभिगमाच्चैव तत्कर्म समुपाश्रिताः

svabhāvena ca te sarve dāruṇā vai nisargataḥ | dāruṇābhigamāccaiva tatkarma samupāśritāḥ

वे सब स्वभाव से ही, जन्म से ही, क्रूर हैं, और अपने क्रूर स्वभाव के कारण ही वे उसी (हिंसक) कर्म का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 158 (skanda.8.112.158)

सनत्कुमार उवाच । असुरान्प्रति तेषां तु एवं कथयतां तदा । आगाद् धाता विधाता च कृतान्तश्चेति ते त्रयः

sanatkumāra uvāca | asurānprati teṣāṁ tu evaṁ kathayatāṁ tadā | āgād dhātā vidhātā ca kṛtāntaśceti te trayaḥ

सनत्कुमार ने कहा - जब वे इस प्रकार असुरों के विषय में बातचीत कर रहे थे, तभी वे तीनों - धाता, विधाता और कृतान्त (यम) - वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 159 (skanda.8.112.159)

तांस्ते संपूज्य विधिवत् परस्परमनुव्रताः । उपविष्टाः शिलास्वेव मनुयोपि च ते त्रयः

tāṁste saṁpūjya vidhivat parasparamanuvratāḥ | upaviṣṭāḥ śilāsveva manuyopi ca te trayaḥ

उन ऋषियों ने विधिपूर्वक उन तीनों का सत्कार किया, और परस्पर अनुसरण करते हुए वे तीनों भी शिलाओं पर बैठ गए।

श्लोक 160 (skanda.8.112.160)

उपविष्टाँश्चर्षयस्ताननमञ्च बहुमानतः । ऊचुः क्वेदं भवन्तोद्य प्रस्थिता लोकधारिणः

upaviṣṭām̐ścarṣayastānanamañca bahumānataḥ | ūcuḥ kvedaṁ bhavantodya prasthitā lokadhāriṇaḥ

उन्हें बैठे देखकर ऋषियों ने बड़े आदर से झुककर पूछा - हे लोकधारको! आप लोग आज कहाँ से चलकर यहाँ आए हैं?

श्लोक 161 (skanda.8.112.161)

धातोवाच । ब्रह्मलोकाद्ध्युपावृत्य वयमद्य गता द्विजाः । ब्रह्मणा स्म समाज्ञप्ताः कश्यपस्य ततोन्तिकम्

dhātovāca | brahmalokāddhyupāvṛtya vayamadya gatā dvijāḥ | brahmaṇā sma samājñaptāḥ kaśyapasya tatontikam

धाता ने कहा - हे द्विजो! हम आज ब्रह्मलोक से लौटकर आए हैं। ब्रह्मा की आज्ञा पाकर हम कश्यप के समीप गए थे।

श्लोक 162 (skanda.8.112.162)

भूयोपि मुनयः प्रोचुः किमुक्तः कश्यपो द्विजः । अथाब्रवीन्मुनीन् धाता कश्यपं तु यदुक्तवान्

bhūyopi munayaḥ procuḥ kimuktaḥ kaśyapo dvijaḥ | athābravīnmunīn dhātā kaśyapaṁ tu yaduktavān

फिर मुनियों ने पूछा - द्विज कश्यप से क्या कहा गया था? तब धाता ने उन मुनियों को बताया कि कश्यप से क्या कहा गया था।

श्लोक 163 (skanda.8.112.163)

यत्त्वया ज्ञापितो ब्रह्मन् ब्रह्मा लोकपितामहः । असुरा अपि मे पुत्रा देवाश्चापि प्रियाः प्रभो

yattvayā jñāpito brahman brahmā lokapitāmahaḥ | asurā api me putrā devāścāpi priyāḥ prabho

हे ब्रह्मन्! जो तुमने ब्रह्मा को - जगत्पितामह को - सूचित किया, उसमें यह कहा गया - हे प्रभो! असुर भी मेरे पुत्र हैं और देवता भी मुझे प्रिय हैं।

श्लोक 164 (skanda.8.112.164)

तेषां नैव यथान्योन्यं वैरं स्याल्लोकभावन । तथा कुर्वमरश्रेष्ठ भवेयं निर्वृतस्ततः

teṣāṁ naiva yathānyonyaṁ vairaṁ syāllokabhāvana | tathā kurvamaraśreṣṭha bhaveyaṁ nirvṛtastataḥ

हे लोकभावन! ऐसा करो कि उनमें परस्पर वैर न रहे, हे अमरश्रेष्ठ! इससे मुझे शान्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 165 (skanda.8.112.165)

तत्राहं ब्रह्मणाज्ञप्तो ब्रवीमि त्वां महामुने । देवासुरं यथावृत्तमन्योन्यं सख्यमेव च

tatrāhaṁ brahmaṇājñapto bravīmi tvāṁ mahāmune | devāsuraṁ yathāvṛttamanyonyaṁ sakhyameva ca

इसके लिए ब्रह्मा द्वारा आज्ञप्त होकर, हे महामुने! मैं तुम्हें बताता हूँ कि देव और असुरों के बीच पूर्व में क्या घटित हुआ था और उनकी परस्पर मित्रता किस प्रकार हुई थी।

श्लोक 166 (skanda.8.112.166)

अमृतोत्पादनं चैव राज्यं संस्थाञ्च कृत्स्नशः । त्वयोक्तं भगवान् सर्वं भविष्यमृषिसत्तम

amṛtotpādanaṁ caiva rājyaṁ saṁsthāñca kṛtsnaśaḥ | tvayoktaṁ bhagavān sarvaṁ bhaviṣyamṛṣisattama

तथा अमृत के उत्पादन, राज्य और उसकी सम्पूर्ण व्यवस्था के विषय में - हे भगवन्! हे ऋषिसत्तम! - सब कुछ जो होने वाला है, वह तुमने ही कहा है।

श्लोक 167 (skanda.8.112.167)

कथयामास लोकेशो देवासुरविचेष्टितम् । निवेद्य तस्य तत्सर्वं ब्रह्मणा प्रेषिता वयम् । इहागता भगवतीं द्रष्टुं हिमगिरेः सुताम्

kathayāmāsa lokeśo devāsuravicaṣṭitam | nivedya tasya tatsarvaṁ brahmaṇā preṣitā vayam | ihāgatā bhagavatīṁ draṣṭuṁ himagireḥ sutām

उस लोकेश्वर (कश्यप) ने देव-असुरों के भावी आचरण का वर्णन किया। यह सब उन्हें (ब्रह्मा को) निवेदित करके, हम ब्रह्मा द्वारा भेजे गए हैं, और यहाँ भगवती हिमगिरि-पुत्री का दर्शन करने आए हैं।

श्लोक 168 (skanda.8.112.168)

सनत्कुमार उवाच । तानेव वादिनो भूय ऋषयस्ते तपोधनाः । पप्रच्छुर्नियतात्मानः सर्व एव तदा मुने

sanatkumāra uvāca | tāneva vādino bhūya ṛṣayaste tapodhanāḥ | papracchurniyatātmānaḥ sarva eva tadā mune

सनत्कुमार ने कहा - हे मुने! तब उन संयतात्मा तपोधन ऋषियों ने पुनः उन्हीं वक्ताओं से सब मिलकर पूछा -

श्लोक 169 (skanda.8.112.169)

देवासुराणां यद् वृत्तं भविष्यं कथितं शुभाः । तद्वयं श्रोतुमिच्छामो यदि वोनुग्रहे मतिः

devāsurāṇāṁ yad vṛttaṁ bhaviṣyaṁ kathitaṁ śubhāḥ | tadvayaṁ śrotumicchāmo yadi vonugrahe matiḥ

हे शुभो! देव-असुरों का जो भविष्य वृत्तान्त आपने कहा, उसे हम सुनना चाहते हैं, यदि आपका मन अनुग्रह करने को हो।

श्लोक 170 (skanda.8.112.170)

किञ्च विज्ञापिता देवी युष्माभिः सुरसत्तमाः । कथयध्वं च तत्सर्व यद्यनुग्राह्यता हि नः

kiñca vijñāpitā devī yuṣmābhiḥ surasattamāḥ | kathayadhvaṁ ca tatsarva yadyanugrāhyatā hi naḥ

और हे सुरश्रेष्ठो! आपने देवी को जो सूचित किया, वह सब भी हमें बताइए, यदि हम अनुग्रह के पात्र हैं।

श्लोक 171 (skanda.8.112.171)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा त्रयस्ते देवसत्तमाः । त्वमाचक्ष्व कृतान्तेति वाक्यमूचुर्महाबलाः । ततः स तेषां बहुचित्रकारणं यथा भविष्यं कथयाञ्चकार । सुरासुराणां जगतश्च कारणं पुरा विधात्रा विहितं यथार्थवद्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā trayaste devasattamāḥ | tvamācakṣva kṛtānteti vākyamūcurmahābalāḥ | tataḥ sa teṣāṁ bahucitrakāraṇaṁ yathā bhaviṣyaṁ kathayāñcakāra | surāsurāṇāṁ jagataśca kāraṇaṁ purā vidhātrā vihitaṁ yathārthavad

उनका यह वचन सुनकर, वे तीनों महाबली देवश्रेष्ठ यह कहते हुए बोले - हे कृतान्त! तुम्हीं वर्णन करो। तब उसने (यम ने) उन्हें आगे होने वाले अनेक विचित्र कारणों का यथार्थ वर्णन किया - देव-असुरों तथा जगत् के उस कारण का, जो पूर्वकाल में विधाता द्वारा यथार्थ रूप में विहित किया गया था।

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