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अम्बिका खण्ड · अध्याय 114

नीलकण्ठोपाख्यान

अध्याय 113अध्याय-सूचीअध्याय 115

श्लोक 1 (skanda.8.114.1)

व्यास उवाच । कथं तदुत्थितं घोरं विषं सूर्यायुतप्रभम् । कथं पीतं भगवता शङ्करेणामितौजसा

vyāsa uvāca | kathaṁ tadutthitaṁ ghoraṁ viṣaṁ sūryāyutaprabham | kathaṁ pītaṁ bhagavatā śaṅkareṇāmitaujasā

व्यास ने कहा - वह भयंकर विष, जो दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी था, किस प्रकार उत्पन्न हुआ, और अमित तेजस्वी भगवान् शंकर ने उसे किस प्रकार पान किया?

श्लोक 2 (skanda.8.114.2)

कथञ्च देवदेवस्य कण्ठे कुन्देन्दुसप्रभे । नीलो वर्णः समुत्पन्न एतदिच्छामि वेदितुम्

kathañca devadevasya kaṇṭhe kundendusaprabhe | nīlo varṇaḥ samutpanna etadicchāmi veditum

तथा उस देवाधिदेव के गले पर, जो कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा के समान कान्तिमान् था, नीला रंग किस प्रकार उत्पन्न हुआ? यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.8.114.3)

सनत्कुमार उवाच । कस्मिन्देशे महापुण्ये एतदाख्यानमुत्तमम् । वृत्तं ब्रह्मपुरोगाय कस्मिन् काले महाद्युते

sanatkumāra uvāca | kasmindeśe mahāpuṇye etadākhyānamuttamam | vṛttaṁ brahmapurogāya kasmin kāle mahādyute

सनत्कुमार ने कहा - हे महातेजस्वी! यह उत्तम आख्यान किस पुण्यक्षेत्र में, किस काल में, ब्रह्मा के समक्ष घटित हुआ था?

श्लोक 4 (skanda.8.114.4)

एतदाख्याहि नः सम्यग् यथावृत्तं तपोधन । नीलकण्ठः कथं देवः शर्वस्त्रिभुवनेश्वरः

etadākhyāhi naḥ samyag yathāvṛttaṁ tapodhana | nīlakaṇṭhaḥ kathaṁ devaḥ śarvastribhuvaneśvaraḥ

हे तपोधन! यह सब हमें ठीक-ठीक, जैसा घटित हुआ वैसा ही बताइए - त्रिभुवनेश्वर देव शर्व नीलकण्ठ किस प्रकार बने?

श्लोक 5 (skanda.8.114.5)

सूत उवाच । यथा श्रुतं मया पूर्वं वायुना जगदायुना । कथ्यमानं द्विजश्रेष्ठाः सत्रे वर्षसहस्रिके

sūta uvāca | yathā śrutaṁ mayā pūrvaṁ vāyunā jagadāyunā | kathyamānaṁ dvijaśreṣṭhāḥ satre varṣasahasrike

सूत ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठो! जैसा मैंने पूर्वकाल में, जगत् के प्राणदाता वायु द्वारा एक सहस्र-वर्षीय सत्र में कहे जाते हुए सुना था,

श्लोक 6 (skanda.8.114.6)

नीलता केन कण्ठस्य देवदेवस्य शूलिनः । तदहं कीर्तयिष्यामि शृणुध्वं संश्रितव्रताः

nīlatā kena kaṇṭhasya devadevasya śūlinaḥ | tadahaṁ kīrtayiṣyāmi śṛṇudhvaṁ saṁśritavratāḥ

त्रिशूलधारी देवाधिदेव के कण्ठ की नीलता किस कारण से हुई - वह मैं कहूँगा; हे व्रतधारियो! सुनो।

श्लोक 7 (skanda.8.114.7)

उत्तरे शैलराजस्य सरांसि सरितो ह्रदाः । कीर्णेषु देशेषु पर्वतेषु च

uttare śailarājasya sarāṁsi sarito hradāḥ | kīrṇeṣu deśeṣu parvateṣu ca

पर्वतराज (हिमालय) के उत्तर में सरोवर, नदियाँ और ह्रद हैं... [टिप्पणी: यहाँ स्रोत-पाण्डुलिपि में इस पंक्ति का आरम्भिक अंश (क्षेत्रों का विवरण) क्षतिग्रस्त है] ...से भरे हुए प्रदेशों और पर्वतों में -

श्लोक 8 (skanda.8.114.8)

गिरिशृङ्गेषु तुङ्गेषु गह्वरोपवनेषु च । भक्षा महात्मानो मुनयः शंसितव्रताः

giriśṛṅgeṣu tuṅgeṣu gahvaropavaneṣu ca | bhakṣā mahātmāno munayaḥ śaṁsitavratāḥ

ऊँचे पर्वत-शिखरों पर, गुफाओं और उपवनों में, [स्रोत में यहाँ भोजन-सम्बन्धी शब्द क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है] खाने वाले महात्मा, प्रशंसित व्रतों वाले मुनि निवास करते हैं,

श्लोक 9 (skanda.8.114.9)

संस्तुवन्ति महादेवं यजन्तोत्र यथाविधि । ऋग्यजुःसामवेदैश्च नृत्यगीतार्चनादिभिः

saṁstuvanti mahādevaṁ yajantotra yathāvidhi | ṛgyajuḥsāmavedaiśca nṛtyagītārcanādibhiḥ

वे यहाँ विधिपूर्वक यजन करते हुए, ऋक्, यजुः और साम वेदों के मन्त्रों से, तथा नृत्य, गान, अर्चना आदि से महादेव की स्तुति करते हैं।

श्लोक 10 (skanda.8.114.10)

प्रवृत्ते ज्योतिषां चक्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे

pravṛtte jyotiṣāṁ cakre madhyaṁ prāpte divākare

[टिप्पणी: इस श्लोक की पहली पंक्ति स्रोत-पाण्डुलिपि में क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है; केवल दूसरी पंक्ति सुरक्षित है।] ...जब ज्योतिष-चक्र गतिमान होकर सूर्य मध्याह्न को प्राप्त होता है -

श्लोक 11 (skanda.8.114.11)

दैवता नियतात्मानः सर्वे तिष्ठन्ति तां कलाम् । नियमानि समाप्यान्ते तस्मिन् काले दिवौकसाम्

daivatā niyatātmānaḥ sarve tiṣṭhanti tāṁ kalām | niyamāni samāpyānte tasmin kāle divaukasām

तब सभी संयतात्मा देवता उस क्षण पर स्थिर हो जाते हैं; उसी समय स्वर्गवासियों के नियम समाप्त होते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.114.12)

तेषां मध्ये गतो वायुः प्राणिनां जीवितोद्भवः । नमस्ते नीलकण्ठाय इत्युवाच सदागतिः

teṣāṁ madhye gato vāyuḥ prāṇināṁ jīvitodbhavaḥ | namaste nīlakaṇṭhāya ityuvāca sadāgatiḥ

उनके बीच वायु, जो प्राणियों के जीवन का स्रोत है, गया, और सदा गतिमान उस वायु ने कहा - नीलकण्ठ को नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.8.114.13)

तच्छ्रुत्वा भावितात्मानो मुनयः संशितव्रताः । बालखिल्या इति ख्याताः पतङ्गसहचारिणः

tacchrutvā bhāvitātmāno munayaḥ saṁśitavratāḥ | bālakhilyā iti khyātāḥ pataṅgasahacāriṇaḥ

यह सुनकर, शुद्ध-अन्तःकरण वाले, दृढ़-व्रती मुनि, जो बालखिल्य नाम से विख्यात हैं और सूर्य के साथ चलते हैं,

श्लोक 14 (skanda.8.114.14)

अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । ते स्म पृच्छन्ति वै वायुं वायुपर्णाम्बुभोजनाः

aṣṭāśītisahasrāṇi munīnāmūrdhvaretasām | te sma pṛcchanti vai vāyuṁ vāyuparṇāmbubhojanāḥ

अठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि, जो वायु, पत्ते और जल का ही भोजन करते हैं, उन्होंने वायु से पूछा -

श्लोक 15 (skanda.8.114.15)

बालखिल्या ऊचुः । नीलकण्ठेति यत् प्रोक्तं त्वया पवनसत्तम । तद्वयं श्रोतुमिच्छाम त्वत्प्रसादात् प्रभञ्जन

bālakhilyā ūcuḥ | nīlakaṇṭheti yat proktaṁ tvayā pavanasattama | tadvayaṁ śrotumicchāma tvatprasādāt prabhañjana

बालखिल्यों ने कहा - हे वायुश्रेष्ठ! तुमने जो 'नीलकण्ठ' कहा, उसे हम तुम्हारी कृपा से सुनना चाहते हैं, हे प्रभञ्जन!

श्लोक 16 (skanda.8.114.16)

नीलता केन कण्ठस्य प्रकारेणाम्बिकापतेः । श्रोतुमिच्छामहे सम्यक् त्वद्वक्त्रात्तु विशेषतः

nīlatā kena kaṇṭhasya prakāreṇāmbikāpateḥ | śrotumicchāmahe samyak tvadvaktrāttu viśeṣataḥ

अम्बिकापति (शिव) के कण्ठ की नीलता किस प्रकार हुई - यह हम तुम्हारे ही मुख से विशेष रूप से भली-भाँति सुनना चाहते हैं।

श्लोक 17 (skanda.8.114.17)

एतत्पुण्यं यदस्माभिस्तद्धि नः परमं हितम् । वाचो याः संप्रवर्तन्ते सर्वास्तास्तु त्वयेरिताः

etatpuṇyaṁ yadasmābhistaddhi naḥ paramaṁ hitam | vāco yāḥ saṁpravartante sarvāstāstu tvayeritāḥ

यह जो पुण्यमय (कथा) हम सुनेंगे, वही हमारा परम हित है। जो भी वाणियाँ प्रवृत्त होती हैं, वे सब तुम्हारे ही द्वारा प्रेरित हैं।

श्लोक 18 (skanda.8.114.18)

वर्णस्थानगते वायौ वाग्विधिः संप्रवर्तते । ज्ञानं विज्ञानमुत्साहस्त्वत्तो वायो प्रवर्तते

varṇasthānagate vāyau vāgvidhiḥ saṁpravartate | jñānaṁ vijñānamutsāhastvatto vāyo pravartate

वायु के वर्ण-स्थानों में स्थित होने पर ही वाणी की क्रिया चलती है। हे वायु! ज्ञान, विज्ञान और उत्साह भी तुमसे ही प्रवृत्त होते हैं।

श्लोक 19 (skanda.8.114.19)

न योगेन सर्वे वर्णाः प्रवर्तिताः । यतो वाचो निवर्तन्ते देहबद्धाश्च दुर्लभाः

na yogena sarve varṇāḥ pravartitāḥ | yato vāco nivartante dehabaddhāśca durlabhāḥ

[टिप्पणी: इस पंक्ति का आरम्भिक अंश स्रोत में क्षतिग्रस्त है।] ...योग के बिना सभी वर्ण प्रवृत्त नहीं होते; जहाँ से वाणियाँ लौट आती हैं, वहाँ देह में बद्ध (जीव) दुर्लभ हैं।

श्लोक 20 (skanda.8.114.20)

तत्रापि तेस्ति सद्भावः सर्वगस्त्वं सदानिल । नान्यः सर्वगतो देवस्त्वदृतेस्ति समीरण

tatrāpi testi sadbhāvaḥ sarvagastvaṁ sadānila | nānyaḥ sarvagato devastvadṛtesti samīraṇa

वहाँ भी तुम्हारी ही सद्भावना है, क्योंकि हे सदागति! तुम सर्वव्यापी हो। हे समीरण! तुम्हारे बिना अन्य कोई भी सर्वगत देव नहीं है।

श्लोक 21 (skanda.8.114.21)

स चैव जीवलोकोयं धारितः पवन त्वया । एष वै जीवलोकस्ते प्रत्यक्षो जीवितोद्भव

sa caiva jīvalokoyaṁ dhāritaḥ pavana tvayā | eṣa vai jīvalokaste pratyakṣo jīvitodbhava

हे पवन! यह सम्पूर्ण जीव-लोक तुम्हारे ही द्वारा धारण किया गया है। हे जीवन के स्रोत! यह जीव-लोक तुम्हारे लिए प्रत्यक्ष है।

श्लोक 22 (skanda.8.114.22)

वेत्थ वाचस्पतिं देवं मनोनायकमीश्वरम् । ब्रूहि त्वं केन देशेस्य किं कृता रूपविक्रिया

vettha vācaspatiṁ devaṁ manonāyakamīśvaram | brūhi tvaṁ kena deśesya kiṁ kṛtā rūpavikriyā

तुम वाचस्पति देव, मन के अधिनायक ईश्वर को जानते हो। बताओ, उनके किस देश में, किस कारण से यह रूप-विकार हुआ?

श्लोक 23 (skanda.8.114.23)

श्रुत्वा वाक्यं ततस्तेषामृषीणां भावितात्मनाम् । प्रत्युवाच महातेजा वायुर्लोकनमस्कृतः

śrutvā vākyaṁ tatasteṣāmṛṣīṇāṁ bhāvitātmanām | pratyuvāca mahātejā vāyurlokanamaskṛtaḥ

उन शुद्ध-अन्तःकरण ऋषियों के वचन सुनकर, सम्पूर्ण लोक द्वारा वन्दित वह महातेजस्वी वायु उत्तर देने लगा।

श्लोक 24 (skanda.8.114.24)

वायुरुवाच । पुरा कृतयुगे विप्रा वेदनिर्णयतत्परः । वसिष्ठो नाम धर्मात्मा मानसो वै प्रजापतिः

vāyuruvāca | purā kṛtayuge viprā vedanirṇayatatparaḥ | vasiṣṭho nāma dharmātmā mānaso vai prajāpatiḥ

वायु ने कहा - हे विप्रो! पूर्वकाल में सत्ययुग में, वेद के निर्णय में तत्पर, धर्मात्मा वसिष्ठ नामक मानस-पुत्र प्रजापति थे।

श्लोक 25 (skanda.8.114.25)

पप्रच्छ कार्तिकेयं वै मयूरवरवाहनम् । क्रौञ्चदेहान्तकरणं देव्या हृदयनन्दनम्

papraccha kārtikeyaṁ vai mayūravaravāhanam | krauñcadehāntakaraṇaṁ devyā hṛdayanandanam

उन्होंने कार्तिकेय से पूछा, जिनका सुन्दर वाहन मयूर है, जिन्होंने क्रौंच-पर्वत के देह का अन्त किया, और जो देवी के हृदय के आनन्ददाता हैं,

श्लोक 26 (skanda.8.114.26)

महिषासुरनारीणां नयनाञ्जनतस्करम् । महासेनं महात्मानं मेघस्तनितनिस्वनम्

mahiṣāsuranārīṇāṁ nayanāñjanataskaram | mahāsenaṁ mahātmānaṁ meghastanitanisvanam

जो महिषासुर की स्त्रियों के नेत्रों के अंजन को चुरा लेने वाले हैं, जो महासेन नाम से महात्मा हैं, और जिनकी वाणी मेघ-गर्जन के समान है,

श्लोक 27 (skanda.8.114.27)

उमामनोहर्षकरं बालकं छद्मरूपिणम् । बहुमङ्गलसंयुक्तां कथां पापप्रणाशनीम् । वसिष्ठः प्रार्थयामास तस्मिन् काले महातपाः

umāmanoharṣakaraṁ bālakaṁ chadmarūpiṇam | bahumaṅgalasaṁyuktāṁ kathāṁ pāpapraṇāśanīm | vasiṣṭhaḥ prārthayāmāsa tasmin kāle mahātapāḥ

जो उमा के मन को हर्षित करने वाले बालक हैं, और अनेक रूप धारण करने वाले हैं - उन्हीं से महातपस्वी वसिष्ठ ने उस समय बहु-मंगलमय, पाप-नाशक कथा की याचना की।

श्लोक 28 (skanda.8.114.28)

वसिष्ठ उवाच । शुचिं प्रपद्ये वरदं ब्रह्मण्यममितौजसम् । भक्तानुकम्पिनं नित्यं सर्वज्ञं प्रियदर्शनम्

vasiṣṭha uvāca | śuciṁ prapadye varadaṁ brahmaṇyamamitaujasam | bhaktānukampinaṁ nityaṁ sarvajñaṁ priyadarśanam

वसिष्ठ ने कहा - मैं उस पवित्र, वरदाता, ब्रह्मण्य, अमित तेजस्वी, सदा भक्तों पर दया करने वाले, सर्वज्ञ, प्रियदर्शन देव की शरण लेता हूँ।

श्लोक 29 (skanda.8.114.29)

नमस्ते ष्यन्द अग्निगर्भ नमोस्तु ते

namaste ṣyanda agnigarbha namostu te

[टिप्पणी: इस श्लोक की पहली पंक्ति स्रोत में पूर्णतः क्षतिग्रस्त है, तथा दूसरी पंक्ति का भी आरम्भिक अंश अप्राप्य है; केवल यह अंश सुरक्षित है।] हे अग्निगर्भ! ...तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 30 (skanda.8.114.30)

नमस्ते शरजन्माय नमस्ते कृत्तिकासुत । नमो द्वादशनेत्राय षण्मुखाय नमोस्तु ते

namaste śarajanmāya namaste kṛttikāsuta | namo dvādaśanetrāya ṣaṇmukhāya namostu te

हे शर (सरकंडों) में जन्मे! तुम्हें नमस्कार है। हे कृत्तिका-पुत्र! तुम्हें नमस्कार है। हे द्वादशनेत्र, षण्मुख! तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 31 (skanda.8.114.31)

नमस्ते शक्तिहस्ताय दिव्यस्र

namaste śaktihastāya divyasra

[टिप्पणी: इस श्लोक की पहली पंक्ति का उत्तरार्ध और सम्पूर्ण दूसरी पंक्ति स्रोत में क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है; केवल यह आरम्भिक अंश सुरक्षित है।] हे शक्ति (भाला) हाथ में धारण करने वाले! तुम्हें नमस्कार है, हे दिव्य... ।

श्लोक 32 (skanda.8.114.32)

नमो हिरण्यरेताय नमस्ते भृतशम्भवे । नमः कुक्कुटहस्ताय तथा छागप्रियाय च

namo hiraṇyaretāya namaste bhṛtaśambhave | namaḥ kukkuṭahastāya tathā chāgapriyāya ca

हे हिरण्यरेता (स्वर्ण-तेज वाले)! तुम्हें नमस्कार है, हे पोषण से उत्पन्न! तुम्हें नमस्कार है। हे कुक्कुट-हस्त! तथा हे बकरे को प्रिय मानने वाले! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 33 (skanda.8.114.33)

नमस्ते रक्तवासाय नमो नीलशिखण्डिने । नमोत्यन्तकुमाराय सर्वदैवतपूजिते

namaste raktavāsāya namo nīlaśikhaṇḍine | namotyantakumārāya sarvadaivatapūjite

हे रक्त-वस्त्रधारी! तुम्हें नमस्कार है, हे नील-शिखण्डी (नीली शिखा वाले)! तुम्हें नमस्कार है। हे सदा कुमार रहने वाले, सब देवताओं से पूजित! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 34 (skanda.8.114.34)

नमः क्रौञ्चविनाशाय महिषासुरघातिने । नमस्ते ऊर्णव मूर्त्तये

namaḥ krauñcavināśāya mahiṣāsuraghātine | namaste ūrṇava mūrttaye

हे क्रौंच (पर्वत) के नाशक! हे महिषासुर के संहारक! तुम्हें नमस्कार है। [टिप्पणी: इस पंक्ति में दो स्थानों पर पाठ स्रोत में क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है; केवल आंशिक शब्द 'ऊर्णव' और 'मूर्त्तये' सुरक्षित हैं।] हे...मूर्ति वाले! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 35 (skanda.8.114.35)

नमस्ते बालरूपाय उन्मत्तललिताय च । यदेतद् दृश्यते स्थाणोः शुभं शुभ्राञ्जनोपमम्

namaste bālarūpāya unmattalalitāya ca | yadetad dṛśyate sthāṇoḥ śubhaṁ śubhrāñjanopamam

हे बाल-रूप वाले! तथा हे उन्मत्त-चंचल! तुम्हें नमस्कार है। अब जो यह स्थाणु (शिव) के विषय में शुभ, उज्ज्वल अंजन के समान वस्तु दिखाई देती है -

श्लोक 36 (skanda.8.114.36)

तत् किमर्थं समुत्पन्नं कण्ठे कुन्देन्दुसन्निभे । एतदाप्ताय दान्ताय भक्ताय तव पृच्छते

tat kimarthaṁ samutpannaṁ kaṇṭhe kundendusannibhe | etadāptāya dāntāya bhaktāya tava pṛcchate

वह किस कारण से कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा के समान उस कण्ठ पर उत्पन्न हुआ - यह अपने विश्वस्त, संयमी, भक्त इस पूछने वाले को बताओ।

श्लोक 37 (skanda.8.114.37)

ब्रूहि मङ्गलसंयुक्तां कथां पुण्यसमाश्रिताम् । एवं स्तुतो च वसिष्ठेन मुनिना भावितात्मना

brūhi maṅgalasaṁyuktāṁ kathāṁ puṇyasamāśritām | evaṁ stuto ca vasiṣṭhena muninā bhāvitātmanā

कल्याणमयी, पुण्य के आश्रयभूत इस कथा को कहो। इस प्रकार शुद्ध-अन्तःकरण मुनि वसिष्ठ द्वारा स्तुत होकर -

श्लोक 38 (skanda.8.114.38)

श्रुत्वा वाक्यं ततस्तस्य वसिष्ठस्य महात्मनः । प्रत्युवाच महातेजा दैत्यारिः पावकोद्भवः

śrutvā vākyaṁ tatastasya vasiṣṭhasya mahātmanaḥ | pratyuvāca mahātejā daityāriḥ pāvakodbhavaḥ

उस महात्मा वसिष्ठ के वचन सुनकर, दैत्यों के शत्रु, अग्नि से उत्पन्न, वह महातेजस्वी (कार्तिकेय) उत्तर देने लगे।

श्लोक 39 (skanda.8.114.39)

यदुक्तं भवता प्रश्नं यन्मां पृच्छसि वै द्विज । श्रूयतां वदतां श्रेष्ठ कथ्यमानमिदं मया

yaduktaṁ bhavatā praśnaṁ yanmāṁ pṛcchasi vai dvija | śrūyatāṁ vadatāṁ śreṣṭha kathyamānamidaṁ mayā

हे द्विज! तुमने जो प्रश्न किया है, जो मुझसे पूछा है, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! मेरे द्वारा कहे जाते हुए इसे सुनो।

श्लोक 40 (skanda.8.114.40)

उमोत्सङ्गोपविष्टेन यथा पूर्वं मया श्रुतः । पार्वत्याश्चैव संवादः शंकरस्य महात्मनः

umotsaṅgopaviṣṭena yathā pūrvaṁ mayā śrutaḥ | pārvatyāścaiva saṁvādaḥ śaṅkarasya mahātmanaḥ

जैसा मैंने पूर्वकाल में, उमा की गोद में बैठकर, पार्वती और महात्मा शंकर के संवाद को सुना था,

श्लोक 41 (skanda.8.114.41)

तमहं संप्रवक्ष्यामि यथातथ्यं महामुने । कैलासशिखरे रम्ये नानाधातुविचित्रिते

tamahaṁ saṁpravakṣyāmi yathātathyaṁ mahāmune | kailāsaśikhare ramye nānādhātuvicitrite

हे महामुने! उस संवाद को मैं यथातथ्य कहूँगा - कैलास के रमणीय शिखर पर, जो नाना धातुओं से विचित्रित है,

श्लोक 42 (skanda.8.114.42)

तरुणादित्यसंकाशे तप्तकाञ्चनसन्निभे । वज्रस्फटिकसोपाने चित्रपट्टशिलातले

taruṇādityasaṅkāśe taptakāñcanasannibhe | vajrasphaṭikasopāne citrapaṭṭaśilātale

जो उदीयमान सूर्य के समान, तपे हुए स्वर्ण के समान चमकता है, जहाँ वज्र और स्फटिक की सीढ़ियाँ हैं, और चित्रित पट्ट-शिला का तल है,

श्लोक 43 (skanda.8.114.43)

जाम्बूनदमये दिव्ये नानारत्नविभूषिते । नानाद्रुमलताकीर्णे नानापुष्पफलोदके

jāmbūnadamaye divye nānāratnavibhūṣite | nānādrumalatākīrṇe nānāpuṣpaphalodake

जो जाम्बूनद स्वर्ण से बना, दिव्य, नाना रत्नों से विभूषित है, जो नाना वृक्षों और लताओं से भरा, तथा नाना पुष्पों, फलों और जलाशयों से युक्त है,

श्लोक 44 (skanda.8.114.44)

हंसकारण्डवाकीर्णे चक्रवाकोपशोभिते । षट्पदोद्गीतकमले धारासंपातनादिते

haṁsakāraṇḍavākīrṇe cakravākopaśobhite | ṣaṭpadodgītakamale dhārāsaṁpātanādite

जो हंसों और कारण्डवों से भरा, चक्रवाकों से सुशोभित है, जहाँ भ्रमरों द्वारा गुंजित कमल हैं, और जलधाराओं के गिरने से शब्दायमान है,

श्लोक 45 (skanda.8.114.45)

मत्तक्रौञ्चमयूराणां नादैर्विक्रुष्टकन्दरे । अप्सरोगणसंकीर्णे किन्नरैश्चोपशोभिते

mattakrauñcamayūrāṇāṁ nādairvikruṣṭakandare | apsarogaṇasaṅkīrṇe kinnaraiścopaśobhite

जिसकी कन्दराएँ उन्मत्त क्रौंच पक्षियों और मोरों की ध्वनि से गूँजती हैं, जो अप्सरा-गणों से भरा और किन्नरों से सुशोभित है,

श्लोक 46 (skanda.8.114.46)

जीवन्जीवकदात्यूहविरुतैश्च प्रणादिते । कोकिलारावमधुरे सिद्धचारणसेविते

jīvañjīvakadātyūhavirutaiśca praṇādite | kokilārāvamadhure siddhacāraṇasevite

जो जीवंजीवक और दात्यूह पक्षियों के कलरव से गूँजता है, जो कोयल के मधुर स्वर से युक्त है, और सिद्धों तथा चारणों द्वारा सेवित है,

श्लोक 47 (skanda.8.114.47)

सौरभेयनिनादाढ्ये मेघस्तनितनिस्वने । विनायकभयोद्विग्नैः कुञ्जरैर्मुक्तकन्दरे

saurabheyaninādāḍhye meghastanitanisvane | vināyakabhayodvignaiḥ kuñjarairmuktakandare

जो सौरभेय (बैलों) की गर्जना से भरा है, मेघ-गर्जन के समान गूँजता है, तथा विनायक के भय से भयभीत होकर हाथियों द्वारा छोड़ी गई कन्दराओं वाला है,

श्लोक 48 (skanda.8.114.48)

वंशवादित्रनिर्घोषे श्रोत्रेन्द्रियमनोहरे । दोलाललितविक्षेपैर्वनितासिद्धसेविते

vaṁśavāditranirghoṣe śrotrendriyamanohare | dolālalitavikṣepairvanitāsiddhasevite

जो बाँसुरी और वाद्यों की ध्वनि से युक्त, कर्णप्रिय है, तथा झूलों के मनोहर हिंडोलों के साथ स्त्रियों और सिद्धों द्वारा सेवित है,

श्लोक 49 (skanda.8.114.49)

ध्वजैर्ल्लम्बितदोलानां घण्टानां विरुताकुले । बल्लकीघोषबहुले नृत्तव्यापारसंकुले

dhvajairllambitadolānāṁ ghaṇṭānāṁ virutākule | ballakīghoṣabahule nṛttavyāpārasaṅkule

जो झूलों पर लटकी हुई ध्वजाओं और घण्टियों की ध्वनि से व्याप्त है, वल्लकी-वीणा के घोष से भरपूर तथा नृत्य के कार्य-व्यापार से भीड़-भाड़ वाला है,

श्लोक 50 (skanda.8.114.50)

मुखैर्दर्द्दरवाद्यैश्च वल्गितास्फोटिते तथा । क्रीडाचेष्टाविनोदानां रवैराक्रन्दकन्दरे

mukhairdarddaravādyaiśca valgitāsphoṭite tathā | krīḍāceṣṭāvinodānāṁ ravairākrandakandare

जो मुख से बजाए गए ढोलक-वाद्यों से, तथा उछल-कूद और तालियों से गुंजित है, जहाँ कन्दराएँ क्रीड़ा-चेष्टा के मनोरंजक शोर से प्रतिध्वनित होती हैं,

श्लोक 51 (skanda.8.114.51)

हासैः सन्त्रासजननैर्विकरालैस्तथा मुखैः । देहबन्धैर्विचित्रैश्च प्रक्रीडितगणेश्वरे

hāsaiḥ santrāsajananairvikarālaistathā mukhaiḥ | dehabandhairvicitraiśca prakrīḍitagaṇeśvare

जहाँ भय उत्पन्न करने वाली हँसी और विकराल मुखों से, तथा विचित्र देह-मुद्राओं से गणेश्वर (गणों के स्वामी) क्रीड़ा करते रहते थे -

श्लोक 52 (skanda.8.114.52)

व्याघ्रसिंहमुखैर्घोरैस्सर्पाखुवदनैरपि । मृगमेषमुखैश्चान्यैर्गजवाजिमुखैस्तथा

vyāghrasiṁhamukhairghoraissarpākhuvadanairapi | mṛgameṣamukhaiścānyairgajavājimukhaistathā

तथा (गण) कहीं भयंकर व्याघ्र और सिंह के मुख वाले, कहीं सर्प और चूहे के मुख वाले, कहीं मृग और मेष के मुख वाले, तथा अन्यत्र हाथी और घोड़े के मुख वाले थे,

श्लोक 53 (skanda.8.114.53)

विडालवदनैश्चोग्रैः क्रोष्टुकाकारमूर्त्तिभिः । ह्रस्वैर्दीर्घैः कृशैः स्थूलैर्लम्बोदरमहोदरैः

viḍālavadanaiścograiḥ kroṣṭukākāramūrttibhiḥ | hrasvairdīrghaiḥ kṛśaiḥ sthūlairlambodaramahodaraiḥ

कहीं उग्र बिल्ली-मुख वाले, कहीं सियार के आकार वाले - कुछ ठिगने, कुछ लम्बे, कुछ दुबले, कुछ स्थूल, कुछ लटकते उदर वाले, कुछ विशाल उदर वाले,

श्लोक 54 (skanda.8.114.54)

ह्रस्वजंघैः प्रलम्बोष्ठैस्तालजंघैस्तथापरैः । गोकर्णैरेककर्णैश्च महाकर्णैरकर्णकैः

hrasvajaṅghaiḥ pralambauṣṭhaistālajaṅghaistathāparaiḥ | gokarṇaireka karṇaiśca mahākarṇairakarṇakaiḥ

कुछ छोटी पिंडलियों वाले, कुछ लटकते होंठ वाले, अन्य ताड़ के समान पिंडलियों वाले - कुछ गाय के कानों वाले, कुछ एक कान वाले, कुछ बड़े कान वाले, कुछ कानरहित,

श्लोक 55 (skanda.8.114.55)

एकपादैर्महापादैर्बहुपादैरपादकैः । एकमूर्धभिरत्युग्रैर्बहुमूर्धभिरुल्बणैः

ekapādairmahāpādairbahupādairapādakaiḥ | ekamūrdhabhiratyugrairbahumūrdhabhirulbaṇaiḥ

कुछ एक पैर वाले, कुछ बड़े पैर वाले, कुछ बहु-पैर वाले, कुछ पैर-रहित - कुछ अत्यन्त उग्र, एक सिर वाले, कुछ भयंकर, बहु-सिर वाले,

श्लोक 56 (skanda.8.114.56)

अमूर्धभिश्च गणपैर्महामूर्धभिरेव च । एकनेत्रैर्महानेत्रैर्बहुनेत्रैश्च सर्वशः

amūrdhabhiśca gaṇapairmahāmūrdhabhireva ca | ekanetrairmahānetrairbahunetraiśca sarvaśaḥ

तथा कुछ शीशरहित गण-नायक, कुछ विशाल-सिर वाले - सब प्रकार से कुछ एक नेत्र वाले, कुछ विशाल नेत्र वाले, कुछ बहु-नेत्र वाले,

श्लोक 57 (skanda.8.114.57)

कबन्धाकृतिभिश्चान्यैरनेत्रैर्गणनायकैः । एकनासैर्महानासैर्बहुनासैरनासिकैः

kabandhākṛtibhiścānyairanetrairgaṇanāyakaiḥ | ekanāsairmahānāsairbahunāsairanāsikaiḥ

तथा अन्य कबन्ध (धड़-मात्र) के आकार वाले, नेत्र-रहित गण-नायक - कुछ एक नासिका वाले, कुछ बड़ी नासिका वाले, कुछ बहु-नासिका वाले, कुछ नासिका-रहित,

श्लोक 58 (skanda.8.114.58)

एकवक्त्रैर्महावक्त्रैर्बहुवक्त्रैरवक्त्रकैः । एकदंष्ट्रैर्महादंष्ट्रैर्बहुदष्ट्रैरदंष्ट्रकैः

ekavaktrairmahāvaktrairbahuvaktrairavaktrakaiḥ | ekadaṁṣṭrairmahādaṁṣṭrairbahudaṣṭrairadaṁṣṭrakaiḥ

कुछ एक मुख वाले, कुछ विशाल मुख वाले, कुछ बहु-मुख वाले, कुछ मुख-रहित - कुछ एक दाढ़ वाले, कुछ विशाल दाढ़ वाले, कुछ बहु-दाढ़ वाले, कुछ दाढ़-रहित,

श्लोक 59 (skanda.8.114.59)

एकहस्तैर्महाहस्तैर्बहुहस्तैरहस्तकैः । विश्वरूपैर्विरूपैश्च सुरूपै रूपवर्जितैः । एवंविधैर्महायोगैर्भूतैर्भूतपतिर्वृतः

ekahastairmahāhastairbahuhastairahastakaiḥ | viśvarūpairvirūpaiśca surūpai rūpavarjitaiḥ | evaṁvidhairmahāyogairbhūtairbhūtapatirvṛtaḥ

कुछ एक हाथ वाले, कुछ विशाल हाथ वाले, कुछ बहु-हाथ वाले, कुछ हाथ-रहित - विश्वरूप, विरूप, सुरूप और रूपरहित - इस प्रकार के महायोगी भूतगणों से घिरे हुए भूतपति (शिव) थे।

श्लोक 60 (skanda.8.114.60)

विशुद्धरत्नाङ्गविभूषिताङ्गदा शिलातले हेममये मनोरमे । सुखोपविष्टं मदनाङ्गनाशनं चुचोद वाक्यं गिरिराज्यनन्दना

viśuddharatnāṅgavibhūṣitāṅgadā śilātale hemamaye manorame | sukhopaviṣṭaṁ madanāṅganāśanaṁ cucoda vākyaṁ girirājyanandanā

शुद्ध रत्नों से जड़े हुए बाजूबन्दों से सुशोभित, पर्वतराज-नन्दिनी (पार्वती) ने उस मनोरम, स्वर्णमय शिला-तल पर सुखपूर्वक बैठे हुए, काम के शरीर को नष्ट करने वाले (शिव) से यह वचन कहा -

श्लोक 61 (skanda.8.114.61)

देव्युवाच । भगवन् भूतभव्येश गोवृषाङ्कितशासन । तव कण्ठे महादेव भ्राजतेम्बुदसन्निभम्

devyuvāca | bhagavan bhūtabhavyeśa govṛṣāṅkitaśāsana | tava kaṇṭhe mahādeva bhrājatembudasannibham

देवी ने कहा - हे भगवन्! हे भूत-भविष्य के स्वामी! हे बैल-चिह्नित ध्वज वाले! हे महादेव! तुम्हारे कण्ठ पर मेघ के समान कुछ चमक रहा है।

श्लोक 62 (skanda.8.114.62)

नात्युल्वणं शुभं शुभ्रं नीलाञ्जनचयोपमम् । किमिदं देव दीप्तं ते कण्ठे कामाङ्गनाशन । को हेतुः कारणं किं वा येनेदं नीलमीश्वर । एतत्सर्वं यथान्यायं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

nātyulvaṇaṁ śubhaṁ śubhraṁ nīlāñjanacayopamam | kimidaṁ deva dīptaṁ te kaṇṭhe kāmāṅganāśana | ko hetuḥ kāraṇaṁ kiṁ vā yenedaṁ nīlamīśvara | etatsarvaṁ yathānyāyaṁ śrotumicchāmi tattvataḥ

वह न अधिक गहरा है, शुभ, उज्ज्वल, तथा नीले अंजन के ढेर के समान है। हे काम के शरीर के नाशक देव! तुम्हारे कण्ठ पर चमकता यह क्या है? हे ईश्वर! इसका क्या हेतु, क्या कारण है, जिससे यह नीला हुआ? यह सब मैं यथार्थ रूप से, विधिपूर्वक सुनना चाहती हूँ।

श्लोक 63 (skanda.8.114.63)

श्रुत्वा वाक्यं ततो देव्याः पार्वत्याः पार्वतीप्रियः । कथां मङ्गलसंयुक्तां कथयामास शङ्करः

śrutvā vākyaṁ tato devyāḥ pārvatyāḥ pārvatīpriyaḥ | kathāṁ maṅgalasaṁyuktāṁ kathayāmāsa śaṅkaraḥ

तब देवी पार्वती के इस वचन को सुनकर, पार्वती के प्रिय शंकर उस मंगलमय कथा को कहने लगे।

श्लोक 64 (skanda.8.114.64)

महेश्वर उवाच । मथ्यमानेमृते पूर्वं क्षीरोदे सुरदानवैः । अग्रे समुत्थितं घोरं विषं कालानलप्रभम्

maheśvara uvāca | mathyamānemṛte pūrvaṁ kṣīrode suradānavaiḥ | agre samutthitaṁ ghoraṁ viṣaṁ kālānalaprabham

महेश्वर ने कहा - पूर्वकाल में जब देवों और दानवों द्वारा क्षीरसागर से अमृत के लिए मन्थन किया गया, तब सबसे पहले एक भयंकर विष प्रकट हुआ, जो कालाग्नि के समान तेजस्वी था।

श्लोक 65 (skanda.8.114.65)

कालमृत्युरिवोद्भूतं युगान्तादित्यवर्चसम् । त्रैलोक्योत्सादसूर्याभं विस्फुरत्तत् समन्ततः

kālamṛtyurivodbhūtaṁ yugāntādityavarcasam | trailokyotsādasūryābhaṁ visphurattat samantataḥ

वह मानो साक्षात् काल-मृत्यु ही प्रकट हुआ था, युगान्त-सूर्य के तेज से युक्त, त्रिलोक के विनाश के लिए मानो सूर्य के समान, चारों ओर स्फुरित होता हुआ।

श्लोक 66 (skanda.8.114.66)

तं दृष्टवा सुरसंघाश्च दैत्याश्चैव वरानने । विषण्णवदनाः सर्वे गतास्ते ब्रह्मणोन्तिकम्

taṁ dṛṣṭavā surasaṅghāśca daityāścaiva varānane | viṣaṇṇavadanāḥ sarve gātāste brahmaṇontikam

हे वरानने! उसे देखकर देव-समूह और दैत्य सभी विषण्ण-मुख होकर ब्रह्मा के समीप गए।

श्लोक 67 (skanda.8.114.67)

दृष्टवा सुरगणान् भीतान्ब्रह्मोवाच महाद्युतिः । मयाष्टगुणमैश्वर्यं भवतां संप्रकल्पितम्

dṛṣṭavā suragaṇān bhītānbrahmovāca mahādyutiḥ | mayāṣṭaguṇamaiśvaryaṁ bhavatāṁ saṁprakalpitam

भयभीत देवगणों को देखकर वह महातेजस्वी ब्रह्मा बोले - मैंने तुम्हारे लिए आठ गुण वाला ऐश्वर्य निर्मित किया है।

श्लोक 68 (skanda.8.114.68)

त्रैलोक्यस्येश्वरा यूयं सर्वे च विगतज्वराः । विमानचारिणः सर्वे सर्वे स्वच्छन्दचारिणः

trailokyasyeśvarā yūyaṁ sarve ca vigatajvarāḥ | vimānacāriṇaḥ sarve sarve svacchandacāriṇaḥ

तुम सब त्रिलोक के स्वामी हो, सब चिन्ता से रहित हो, सब विमानों में विचरण करने वाले हो, सब स्वच्छन्द विचरण करने वाले हो।

श्लोक 69 (skanda.8.114.69)

प्रजाभिः सत्कृताः सम्यङ् नित्यं बहुमता मम । किमर्थे वा महाप्रज्ञा भृशमुद्विग्नचेतसः

prajābhiḥ satkṛtāḥ samyaṅ nityaṁ bahumatā mama | kimarthe vā mahāprajñā bhṛśamudvignacetasaḥ

प्रजाओं द्वारा भली-भाँति सत्कृत, सदा मेरे लिए बहुमान्य हो। हे महाप्रज्ञो! फिर किस कारण तुम्हारे चित्त इतने उद्विग्न हैं?

श्लोक 70 (skanda.8.114.70)

केन व्यावर्तितैश्वर्या येन मां समुपस्थिताः । प्रजासर्गे न सोत्रास्ति योज्ञान्मम निवर्तयेत्

kena vyāvartitaiśvaryā yena māṁ samupasthitāḥ | prajāsarge na sotrāsti yojñānmama nivartayet

किसने तुम्हारे ऐश्वर्य को विचलित किया है, जिस कारण तुम मेरे पास आए हो? प्रजा-सृष्टि में कोई ऐसा नहीं जो मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर सके।

श्लोक 71 (skanda.8.114.71)

अध्यात्मे चाधिभूते च अधिदैवे च नित्यशः । प्रजाकर्मविपाके च शक्ता यूयं प्रवर्तितुम्

adhyātme cādhibhūte ca adhidaive ca nityaśaḥ | prajākarmavipāke ca śaktā yūyaṁ pravartitum

अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव में, तथा सदा प्रजा के कर्म-विपाक में भी, तुम प्रवृत्त होने में सक्षम हो।

श्लोक 72 (skanda.8.114.72)

किं कार्यं कारणं किं वा कुतो वा भयमागतम् । येन यूयं समुद्विग्ना मृगा सिंहार्दिता इव

kiṁ kāryaṁ kāraṇaṁ kiṁ vā kuto vā bhayamāgatam | yena yūyaṁ samudvignā mṛgā siṁhārditā iva

क्या कार्य है, क्या कारण है, अथवा यह भय कहाँ से आया है, जिससे तुम सब इस प्रकार उद्विग्न हो, जैसे सिंह से पीड़ित हिरण?

श्लोक 73 (skanda.8.114.73)

एतत्सर्वं यथान्यायं शीघ्रमाख्यातुमर्हथ । श्रुत्वा वाक्यं ततस्तस्य ब्रह्मणः सुमहात्मनः

etatsarvaṁ yathānyāyaṁ śīghramākhyātumarhatha | śrutvā vākyaṁ tatastasya brahmaṇaḥ sumahātmanaḥ

यह सब मुझे शीघ्र, यथार्थ रूप से बताओ। तब उस महात्मा ब्रह्मा के इस वचन को सुनकर -

श्लोक 74 (skanda.8.114.74)

ऊचुस्त ऋषिभिः सार्धं सुरदैत्येन्द्रदानवाः । सुरासुरगणैर्ब्रह्मन् मथ्यमाने महोदधौ

ūcusta ṛṣibhiḥ sārdhaṁ suradaityendradānavāḥ | surāsuragaṇairbrahman mathyamāne mahodadhau

देवता, दैत्येन्द्र और दानव, ऋषियों के साथ मिलकर बोले - हे ब्रह्मन्! जब देव-असुर-गणों द्वारा महासागर का मन्थन किया जा रहा था,

श्लोक 75 (skanda.8.114.75)

भुजङ्गभृङ्गसंकाशं नीलजीमूतसन्निभम् । प्रादुर्भूतं विषं घोरं संवर्त्ताग्निसमप्रभम्

bhujaṅgabhṛṅgasaṅkāśaṁ nīlajīmūtasannibham | prādurbhūtaṁ viṣaṁ ghoraṁ saṁvarttāgnisamaprabham

तब सर्प और भ्रमर के समान, नीले मेघ के समान, एक भयंकर विष प्रकट हुआ, जो प्रलय-अग्नि के समान तेजस्वी था।

श्लोक 76 (skanda.8.114.76)

कालमृत्युरिवोद्भूतं युगान्ताग्निसमप्रभम् । त्रैलोक्योत्सादसूर्याभं विस्फुरत्तत् समन्ततः

kālamṛtyurivodbhūtaṁ yugāntāgnisamaprabham | trailokyotsādasūryābhaṁ visphurattat samantataḥ

वह मानो साक्षात् काल-मृत्यु ही था, प्रलयाग्नि के तेज से युक्त, त्रिलोक-विनाशक सूर्य के समान, चारों ओर स्फुरित होता हुआ।

श्लोक 77 (skanda.8.114.77)

तेजसामिव संघातं सुमहत् समुपस्थितम् । विषण्णवदनाः सर्वे दृष्टोद्भूतं महाविषम्

tejasāmiva saṅghātaṁ sumahat samupasthitam | viṣaṇṇavadanāḥ sarve dṛṣṭodbhūtaṁ mahāviṣam

मानो तेजों का महान् समूह ही उपस्थित हो गया हो। उस उत्पन्न महाविष को देखकर हम सब विषण्ण-मुख हो गए।

श्लोक 78 (skanda.8.114.78)

विषेणोत्तिष्ठता तेन कालानलसमत्विषा । निर्दग्धो रक्तगौराङ्गः कृतः कृष्णो जनार्दनः

viṣeṇottiṣṭhatā tena kālānalasamatviṣā | nirdagdho raktagaurāṅgaḥ kṛtaḥ kṛṣṇo janārdanaḥ

उस उठते हुए विष के, कालाग्नि के समान तेज से, लाल-गौर वर्ण वाला जनार्दन (विष्णु) झुलसकर काला हो गया।

श्लोक 79 (skanda.8.114.79)

तं दृष्टवा रक्तगौराङ्गं कृतं कृष्णं जनार्दनम् । सर्वे भीता वयं ब्रह्मँस्त्वामेव शरणं गताः

taṁ dṛṣṭavā raktagaurāṅgaṁ kṛtaṁ kṛṣṇaṁ janārdanam | sarve bhītā vayaṁ brahmam̐stvāmeva śaraṇaṁ gatāḥ

उस लाल-गौर जनार्दन को इस प्रकार काला हुआ देखकर हम सब भयभीत हो गए, और हे ब्रह्मन्! हम तुम्हारी ही शरण में आए हैं।

श्लोक 80 (skanda.8.114.80)

सुराणामसुराणाञ्च श्रुत्वा वाक्यं भयावहम् । प्रत्युवाच महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः

surāṇāmasurāṇāñca śrutvā vākyaṁ bhayāvaham | pratyuvāca mahātejā brahmā lokapitāmahaḥ

देवों और असुरों के इस भय उत्पन्न करने वाले वचन को सुनकर, महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्मा ने उत्तर दिया।

श्लोक 81 (skanda.8.114.81)

शृण्वन्तु देवताः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः । यत्तदग्रे समुद्भूतं मथ्यमाने महोदधौ

śṛṇvantu devatāḥ sarve ṛṣayaśca tapodhanāḥ | yattadagre samudbhūtaṁ mathyamāne mahodadhau

सब देवता और तपोधन ऋषि सुनें - जो पहले महासागर के मन्थन में उत्पन्न हुआ था,

श्लोक 82 (skanda.8.114.82)

विषं कालानलप्रख्यं कालकूटमिति श्रुतम् । तस्य प्रोद्भूतमात्रस्य विराजन्ते न देवताः

viṣaṁ kālānalaprakhyaṁ kālakūṭamiti śrutam | tasya prodbhūtamātrasya virājante na devatāḥ

वह विष, जो कालाग्नि के समान है, कालकूट नाम से जाना जाता है। उसके उत्पन्न होते ही देवता भी उसके सामने शोभा नहीं पाते।

श्लोक 83 (skanda.8.114.83)

तस्य विष्णुरहं वापि सर्वे वा सुरपुङ्गवाः । शक्नुवन्ति न वै सोढुं वेगमन्यत्र शङ्करात्

tasya viṣṇurahaṁ vāpi sarve vā surapuṅgavāḥ | śaknuvanti na vai soḍhuṁ vegamanyatra śaṅkarāt

उसके वेग को न विष्णु, न मैं, न सब श्रेष्ठ देवगण सहन कर सकते हैं - शंकर को छोड़कर कोई भी नहीं।

श्लोक 84 (skanda.8.114.84)

इत्युक्त्वा पद्मगर्भाभः पद्मयोनिरयोनिजः । मामेवं स्तोतुमारेभे ब्रह्मा वेदविदां वरः

ityuktvā padmagarbhābhaḥ padmayonirayonijaḥ | māmevaṁ stotumārebhe brahmā vedavidāṁ varaḥ

ऐसा कहकर, कमल-गर्भ के समान कान्ति वाले, कमल से उत्पन्न, अयोनिज, वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मा ने मेरी इस प्रकार स्तुति करना आरम्भ किया।

श्लोक 85 (skanda.8.114.85)

ब्रह्मोवाच । नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्ते नैकचक्षुषे । नमःपिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः

brahmovāca | namastubhyaṁ virūpākṣa namaste naikacakṣuṣe | namaḥpinākahastāya vajrahastāya vai namaḥ

ब्रह्मा ने कहा - हे विरूपाक्ष! तुम्हें नमस्कार है। हे अनेक नेत्रों वाले! तुम्हें नमस्कार है। पिनाक-हस्त को नमस्कार है, वज्र-हस्त को नमस्कार है।

श्लोक 86 (skanda.8.114.86)

नमस्त्रिशूलहस्ताय दण्डपाशासिपाणये । नमस्त्रैलोक्यनाथाय भूतानां पतये नमः

namastriśūlahastāya daṇḍapāśāsipāṇaye | namastrailokyanāthāya bhūtānāṁ pataye namaḥ

त्रिशूल-हस्त को नमस्कार है, दण्ड-पाश-असि धारण करने वाले को नमस्कार है। त्रिलोकनाथ को नमस्कार है, भूतों के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 87 (skanda.8.114.87)

नमः सुरारिहन्त्रे च सोमसूर्याग्निचक्षुषे । ब्रह्मणे चैव रुद्राय विष्णवे चैव ते नमः

namaḥ surārihantre ca somasūryāgnicakṣuṣe | brahmaṇe caiva rudrāya viṣṇave caiva te namaḥ

देवों के शत्रुओं के संहारक को नमस्कार है, चन्द्र-सूर्य-अग्नि नेत्रों वाले को नमस्कार है। ब्रह्मा को, रुद्र को, तथा विष्णु को भी - तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 88 (skanda.8.114.88)

सांख्याय चैव योगाय भूतग्रामाय वै नमः । मन्मथाङ्गविनाशाय कालकालाय वै नमः

sāṅkhyāya caiva yogāya bhūtagrāmāya vai namaḥ | manmathāṅgavināśāya kālakālāya vai namaḥ

सांख्य को, योग को, भूत-समूह को नमस्कार है। काम के अंगों के विनाशक को, काल के भी काल को नमस्कार है।

श्लोक 89 (skanda.8.114.89)

रुद्राय वसुरेताय देवदेवाय रंहसे । उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे

rudrāya vasuretāya devadevāya raṁhase | uṣṇīṣiṇe suvaktrāya sahasrākṣāya mīḍhuṣe

रुद्र को, जिनका तेज (वीर्य) वसुओं का स्रोत है, देवदेव को, गतिमान् को (नमस्कार है)। पगड़ी धारण करने वाले को, सुन्दर मुख वाले को, सहस्र नेत्रों वाले को, वर्षा करने वाले को (नमस्कार है)।

श्लोक 90 (skanda.8.114.90)

कपर्दिने करालाय शङ्कराय हराय च । विरूपाय सुरूपाय शिवाय वरदाय च

kapardine karālāya śaṅkarāya harāya ca | virūpāya surūpāya śivāya varadāya ca

जटाजूटधारी को, विकराल-रूप को, शंकर को, हर को (नमस्कार है)। विरूप को, सुरूप को, शिव को, वरदाता को (नमस्कार है)।

श्लोक 91 (skanda.8.114.91)

त्रिपुरघ्ने मखघ्नाय मातॄणां पतये नमः । बुद्धाय चैव शुद्धाय मुक्ताय केवलाय च

tripuraghne makhaghnāya mātṝṇāṁ pataye namaḥ | buddhāya caiva śuddhāya muktāya kevalāya ca

त्रिपुर के संहारक को, यज्ञ के विध्वंसक को, मातृकाओं के स्वामी को नमस्कार है। बुद्ध को, शुद्ध को, मुक्त को, केवल (परम एकाकी तत्त्व) को नमस्कार है।

श्लोक 92 (skanda.8.114.92)

लोकत्रयविधात्रे च शक्राय वरदाय च । अग्रायाथ तथोग्राय विप्रायानन्तचक्षुषे

lokatrayavidhātre ca śakrāya varadāya ca | agrāyātha tathogrāya viprāyānantacakṣuṣe

तीनों लोकों के विधाता को, शक्तिशाली वरदाता को (नमस्कार है)। अग्रगण्य को, उग्र को, विप्र को, अनन्त नेत्रों वाले को (नमस्कार है)।

श्लोक 93 (skanda.8.114.93)

रजसे चैव सत्वाय तमसेव्यक्तयोनये । नित्याय चैवानित्याय नित्यानित्याय वै नमः

rajase caiva satvāya tamasevyaktayonaye | nityāya caivānityāya nityānityāya vai namaḥ

रजस् को, सत्त्व को, तमस् को, अव्यक्त-योनि वाले को (नमस्कार है)। नित्य को, अनित्य को, नित्यानित्य को नमस्कार है।

श्लोक 94 (skanda.8.114.94)

व्यक्ताय चैवाव्यक्ताय व्यक्ताव्यक्ताय वै नमः । चिन्त्याय चैवाचिन्त्याय चिन्त्याचिन्त्याय वै नमः

vyaktāya caivāvyaktāya vyaktāvyaktāya vai namaḥ | cintyāya caivācintyāya cintyācintyāya vai namaḥ

व्यक्त को, अव्यक्त को, व्यक्ताव्यक्त को नमस्कार है। चिन्त्य को, अचिन्त्य को, चिन्त्याचिन्त्य को नमस्कार है।

श्लोक 95 (skanda.8.114.95)

सूक्ष्माय चैवासूक्ष्माय सूक्ष्मासूक्ष्माय वै नमः । भक्तानामार्तिनाशाय प्रियनरायणाय च

sūkṣmāya caivāsūkṣmāya sūkṣmāsūkṣmāya vai namaḥ | bhaktānāmārtināśāya priyanārāyaṇāya ca

सूक्ष्म को, असूक्ष्म को, सूक्ष्मासूक्ष्म को नमस्कार है। भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले को, नारायण के प्रिय को (नमस्कार है)।

श्लोक 96 (skanda.8.114.96)

उमाप्रियाय शर्वाय नन्दिवक्त्राङ्कनाय च । पक्षमासार्धमासाय ऋतुसंवत्सराय च

umāpriyāya śarvāya nandivaktrāṅkanāya ca | pakṣamāsārdhamāsāya ṛtusaṁvatsarāya ca

उमा के प्रिय को, शर्व को, नन्दी के मुख पर चिह्नित करने वाले को (नमस्कार है)। पक्ष, मास, अर्धमास को, ऋतु और संवत्सर को (नमस्कार है)।

श्लोक 97 (skanda.8.114.97)

बहुरूपाय मुण्डाय दण्डिनेथ वरूथिने । रथिने धन्विने नित्यं जटिने ब्रह्मचारिणे

bahurūpāya muṇḍāya daṇḍinetha varūthine | rathine dhanvine nityaṁ jaṭine brahmacāriṇe

बहुरूप को, मुण्डित को, दण्डधारी को, कवचधारी को (नमस्कार है)। रथी को, धनुर्धारी को, सदा जटाधारी को, ब्रह्मचारी को (नमस्कार है)।

श्लोक 98 (skanda.8.114.98)

ऋग्यजुःसामरूपाय पुरुषायेश्वराय च । नमस्ते भगवन्विरूपाक्ष नमस्ते भगवञ्छिव

ṛgyajuḥsāmarūpāya puruṣāyeśvarāya ca | namaste bhagavanvirūpākṣa namaste bhagavañchiva

ऋक्-यजुः-साम-रूप को, पुरुष को, ईश्वर को (नमस्कार है)। हे भगवन् विरूपाक्ष! तुम्हें नमस्कार है। हे भगवन् शिव! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 99 (skanda.8.114.99)

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते भूतभावन । इत्येवमादिचरितैः स्तुतं स्तुत्यं नमोस्तुते

namaste devadeveśa namaste bhūtabhāvana | ityevamādicaritaiḥ stutaṁ stutyaṁ namostute

हे देवदेवेश! तुम्हें नमस्कार है। हे भूतों के उत्पादक! तुम्हें नमस्कार है। इस प्रकार आदि चरितों से स्तुत, स्तुति के योग्य तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 100 (skanda.8.114.100)

प्रणम्य मूर्ध्ना प्रणतोस्मि रुद्रं जगद्गुरुं देववरं त्रिनेत्रम् । सूक्ष्मोसि योगातिशयाधिगम्यं तेजोनिधे व्यक्तमुपैमि रुद्रम्

praṇamya mūrdhnā praṇatosmi rudraṁ jagadguruṁ devavaraṁ trinetram | sūkṣmosi yogātiśayādhigamyaṁ tejonidhe vyaktamupaimi rudram

मस्तक झुकाकर मैं जगद्गुरु, देवश्रेष्ठ, त्रिनेत्र रुद्र को प्रणाम करता हूँ। हे तेजोनिधे! तुम सूक्ष्म हो, अतिशय योग से ही प्राप्य हो, फिर भी मैं व्यक्त रुद्र की शरण में जाता हूँ।

श्लोक 101 (skanda.8.114.101)

ज्ञात्वा तु भक्तिं मम देवदेव प्रसीद गङ्गाम्बुनिषिक्तकेश । त्वां सौरभेयाम्बुदचित्रयानं शिवं प्रयत्नात् शरणं गतोस्मि

jñātvā tu bhaktiṁ mama devadeva prasīda gaṅgāmbuniṣiktakeśa | tvāṁ saurabheyāmbudacitrayānaṁ śivaṁ prayatnāt śaraṇaṁ gatosmi

हे देवदेव! मेरी भक्ति को जानकर प्रसन्न हो, हे गंगाजल से सिंचित केशों वाले! मैं प्रयत्नपूर्वक तुम्हारी शरण में आया हूँ, हे शिव! जिनका विचित्र वाहन बैल-रूपी मेघ है।

श्लोक 102 (skanda.8.114.102)

एवं तेन तदा पूर्वं ब्रह्मणा लोककर्तृणा । स्तुतोहं विविधैः स्तोत्रैर्वेदवेदाङ्गसंभवैः

evaṁ tena tadā pūrvaṁ brahmaṇā lokakartṛṇā | stutohaṁ vividhaiḥ stotrairvedavedāṅgasaṁbhavaiḥ

इस प्रकार पूर्वकाल में उस लोक-कर्ता ब्रह्मा द्वारा मैं वेद-वेदांगों से उत्पन्न विविध स्तोत्रों से स्तुत किया गया।

श्लोक 103 (skanda.8.114.103)

ततः प्रीतो ह्यहं तस्य ब्रह्मणोथ महात्मनः । नतस्तं मुख्यया वृत्त्या पितामहमथाब्रुवम्

tataḥ prīto hyahaṁ tasya brahmaṇotha mahātmanaḥ | natastaṁ mukhyayā vṛttyā pitāmahamathābruvam

तब मैं उस महात्मा ब्रह्मा से प्रसन्न हुआ, और उन्हें उचित रीति से नमन करते हुए मैंने उन पितामह से कहा -

श्लोक 104 (skanda.8.114.104)

भगवन् भूतभव्येश भूताधिप महातपः । किं कार्यं ते मया ब्रह्मन् कर्तव्यं वद सुव्रत । श्रुत्वा वाक्यं ततो ब्रह्मा प्रत्युवाचाम्बुजेक्षणे

bhagavan bhūtabhavyeśa bhūtādhipa mahātapaḥ | kiṁ kāryaṁ te mayā brahman kartavyaṁ vada suvrata | śrutvā vākyaṁ tato brahmā pratyuvācāmbujekṣaṇe

हे भगवन्! हे भूत-भविष्य के स्वामी, भूतों के अधिपति, महातपस्वी! हे ब्रह्मन्! तुम्हारे लिए मुझे क्या कार्य करना है, बताओ, हे सुव्रत! - यह वचन सुनकर ब्रह्मा ने, हे कमल-नयनी! उत्तर दिया।

श्लोक 105 (skanda.8.114.105)

ब्रह्मोवाच । भूतभव्यभवन्नाथ श्रूयतां कारणेश्वर । सुरासुरगणैर्देव मथ्यमाने महोदधौ

brahmovāca | bhūtabhavyabhavannātha śrūyatāṁ kāraṇeśvara | surāsuragaṇairdeva mathyamāne mahodadhau

ब्रह्मा ने कहा - हे भूत-भविष्य-वर्तमान के स्वामी! हे कारणेश्वर! सुनो। हे देव! जब देव-असुर-गणों द्वारा महासागर का मन्थन किया गया,

श्लोक 106 (skanda.8.114.106)

मयूरभृङ्गसकाशं नीलजीमूतसन्निभम् । प्रादुर्भूतं विषं घोरं संवर्त्ताग्निसमप्रभम्

mayūrabhṛṅgasakāśaṁ nīlajīmūtasannibham | prādurbhūtaṁ viṣaṁ ghoraṁ saṁvarttāgnisamaprabham

मयूर और भ्रमर के समान, नीले मेघ के समान एक भयंकर विष प्रकट हुआ, जो प्रलय-अग्नि के समान तेजस्वी था।

श्लोक 107 (skanda.8.114.107)

कालमृत्युरिवोद्भूतं युगान्तादित्यवर्च्चसम् । त्रैलोक्योत्सादसूर्याभं विस्फुरत् तत् समन्ततः

kālamṛtyurivodbhūtaṁ yugāntādityavarccasam | trailokyotsādasūryābhaṁ visphurat tat samantataḥ

वह मानो साक्षात् काल-मृत्यु ही था, युगान्त-सूर्य के तेज से युक्त, त्रिलोक-विनाशक सूर्य के समान, चारों ओर स्फुरित होता हुआ।

श्लोक 108 (skanda.8.114.108)

विषेणोत्तिष्ठता तेन कालानलसमत्विषा । निर्दग्धो रक्तगौराङ्गः कृतः कृष्णो जनार्दनः

viṣeṇottiṣṭhatā tena kālānalasamatviṣā | nirdagdho raktagaurāṅgaḥ kṛtaḥ kṛṣṇo janārdanaḥ

उस उठते हुए विष के, कालाग्नि के समान तेज से, लाल-गौर वर्ण वाला जनार्दन झुलसकर काला हो गया।

श्लोक 109 (skanda.8.114.109)

तं दृष्टवा रक्तगौराङ्गं कृतं कृष्णं जनार्दनम् । ततः सर्वे वयं भीतास्त्वामेव शरणं गताः

taṁ dṛṣṭavā raktagaurāṅgaṁ kṛtaṁ kṛṣṇaṁ janārdanam | tataḥ sarve vayaṁ bhītāstvāmeva śaraṇaṁ gatāḥ

उस लाल-गौर जनार्दन को काला हुआ देखकर, हम सब भयभीत होकर तुम्हारी ही शरण में आए हैं।

श्लोक 110 (skanda.8.114.110)

तत् पिबस्व महादेव लोकानां हितकाम्यया । भवानग्रस्य भोक्ता वै भवान्देववरः प्रभुः

tat pibasva mahādeva lokānāṁ hitakāmyayā | bhavānagrasya bhoktā vai bhavāndevavaraḥ prabhuḥ

हे महादेव! लोकों के हित की कामना से उसे तुम्हीं पी लो। तुम्हीं अग्रभाग के भोक्ता हो, तुम्हीं देवश्रेष्ठ प्रभु हो।

श्लोक 111 (skanda.8.114.111)

भवांस्तस्य महावेगं समर्थः सन्नियच्छितुम् । नान्यः कश्चित् पुमाञ्छक्तो जगत्यस्मिँश्चराचरे

bhavāṁstasya mahāvegaṁ samarthaḥ sanniyacchitum | nānyaḥ kaścit pumāñchakto jagatyasmim̐ścarācare

तुम्हीं उसके महान् वेग को रोकने में समर्थ हो; इस चराचर जगत् में कोई अन्य पुरुष समर्थ नहीं है।

श्लोक 112 (skanda.8.114.112)

पातुमेको महादेव समर्थस्त्वं महाद्युते । तस्यैवोग्रप्रभावस्य कालानलसमत्विषः

pātumeko mahādeva samarthastvaṁ mahādyute | tasyaivograprabhāvasya kālānalasamatviṣaḥ

हे महाद्युते! केवल तुम्हीं, हे महादेव! उस उग्र-प्रभाव वाले, कालाग्नि के समान तेजस्वी विष को पीने में समर्थ हो।

श्लोक 113 (skanda.8.114.113)

वेगं सोढुं महादेव समर्थोन्यो न विद्यते । तस्यैवं ब्रुवतो देवि ब्रह्मणः परमेष्ठिनः

vegaṁ soḍhuṁ mahādeva samarthonyo na vidyate | tasyaivaṁ bruvato devi brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ

हे महादेव! उसके वेग को सहन करने में समर्थ कोई अन्य नहीं है। हे देवि! इस प्रकार उस परमेष्ठी ब्रह्मा के कहने पर -

श्लोक 114 (skanda.8.114.114)

बाढमित्येव तद्वाक्यं प्रतिगृह्य वरानने । तदहं पातुमारब्धो विषमन्तकसन्निभम्

bāḍhamityeva tadvākyaṁ pratigṛhya varānane | tadahaṁ pātumārabdho viṣamantakasannibham

हे वरानने! 'ऐसा ही हो' कहकर उस वचन को स्वीकार कर, मैंने यम के समान उस विष को पीना आरम्भ किया।

श्लोक 115 (skanda.8.114.115)

लोकत्रयहितार्थाय सुरदैत्येन्द्रसन्निधौ । पिबतो मे महाघोरं विषं सुरगणार्चिते । कण्ठे समभवत् क्षिप्रं कृष्णं कृष्णाम्बुजेक्षणे

lokatrayahitārthāya suradaityendrasannidhau | pibato me mahāghoraṁ viṣaṁ suragaṇārcite | kaṇṭhe samabhavat kṣipraṁ kṛṣṇaṁ kṛṣṇāmbujekṣaṇe

तीनों लोकों के हित के लिए, देव और दैत्येन्द्रों के समक्ष, हे सुरगण-अर्चिते! उस महाघोर विष को पीते हुए मेरे कण्ठ में वह शीघ्र ही काला रंग बन गया, हे नीलकमल-नयनी!

श्लोक 116 (skanda.8.114.116)

तद् दृष्ट्वोत्पलपत्राभं कण्ठे सक्तं महाविषम् । तक्षकं नागराजानं लेलिहानमिवोरगम्

tad dṛṣṭvotpalapatrābhaṁ kaṇṭhe saktaṁ mahāviṣam | takṣakaṁ nāgarājānaṁ lelihānamivoragam

उस कमल-पत्र के समान, कण्ठ में लगे हुए महाविष को देखकर, वह मानो तक्षक नागराज ही जिह्वा लपलपाता हुआ सर्प था, ऐसा प्रतीत हुआ।

श्लोक 117 (skanda.8.114.117)

अथोवाच महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः । शोभसे त्वं महादेव कण्ठेनानेन सुव्रत

athovāca mahātejā brahmā lokapitāmahaḥ | śobhase tvaṁ mahādeva kaṇṭhenānena suvrata

तब महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्मा ने कहा - हे महादेव! हे सुव्रत! तुम इस कण्ठ से और भी शोभित हो रहे हो।

श्लोक 118 (skanda.8.114.118)

इति तस्य वचः श्रुत्वा मया गिरिवरात्मजे । पश्यतां सुरसंघानां दैत्यानाञ्च वरानने

iti tasya vacaḥ śrutvā mayā girivarātmaje | paśyatāṁ surasaṅghānāṁ daityānāñca varānane

हे गिरिवरात्मजे! उनके इस वचन को सुनकर, हे वरानने! देव-समूहों और दैत्यों के देखते-देखते ही -

श्लोक 119 (skanda.8.114.119)

यक्षगन्धर्वसिद्धानां पिशाचोरगरक्षसाम् । धृतं कण्ठे विषं घोरं ततः श्रीकण्ठता मम

yakṣagandharvasiddhānāṁ piśācoragarakṣasām | dhṛtaṁ kaṇṭhe viṣaṁ ghoraṁ tataḥ śrīkaṇṭhatā mama

यक्षों, गन्धर्वों, सिद्धों, पिशाचों, नागों और राक्षसों के देखते हुए भी वह भयंकर विष मेरे कण्ठ में धारण किया गया, और उसी से मुझे श्रीकण्ठत्व प्राप्त हुआ।

श्लोक 120 (skanda.8.114.120)

तत्कालकूटं विषमुग्रतेजः कण्ठे धृतं पर्वतराजकन्ये । पश्यन् समस्तः सुरदैत्यसंघो हृष्टः परं विस्मयमाजगाम

tatkālakūṭaṁ viṣamugratejaḥ kaṇṭhe dhṛtaṁ parvatarājakanye | paśyan samastaḥ suradaityasaṅgho hṛṣṭaḥ paraṁ vismayamājagāma

हे पर्वतराज-कन्या! उस उग्र-तेजस्वी कालकूट विष को कण्ठ में धारण किए हुए देखकर, समस्त देव-दैत्य समूह हर्षित होकर परम विस्मय को प्राप्त हुआ।

श्लोक 121 (skanda.8.114.121)

ततः सुरगणाः सर्वे सयक्षोरगराक्षसाः । ऊचुः प्राञ्जलयो देवि मत्तमातङ्गगामिनि

tataḥ suragaṇāḥ sarve sayakṣoragarākṣasāḥ | ūcuḥ prāñjalayo devi mattamātaṅgagāmini

तब यक्ष, नाग और राक्षसों सहित सब देवगणों ने हाथ जोड़कर कहा - हे देवि! हे मत्त गजगामिनी!

श्लोक 122 (skanda.8.114.122)

अहो बलं वीर्यपराक्रमस्ते अहो वपुर्योगबलं तवेदम् । अहो विभूतिस्तव देवदेव गङ्गाजलप्लावितचन्द्रमौले

aho balaṁ vīryaparākramaste aho vapuryogabalaṁ tavedam | aho vibhūtistava devadeva gaṅgājalaplāvitacandramaule

अहो! तुम्हारा बल, तुम्हारा वीर्य-पराक्रम! अहो! तुम्हारा यह शरीर, यह योग-बल! अहो! हे देवदेव! तुम्हारी यह विभूति, जिनका चन्द्र-मुकुट गंगा-जल से प्लावित है!

श्लोक 123 (skanda.8.114.123)

त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं त्वमेव सूर्यो रजनीकरस्त्वम् । त्वमेव कालो नियतिस्त्वमेव त्वमेव मृत्युर्धनदस्त्वमेव

tvameva viṣṇuścaturānanastvaṁ tvameva sūryo rajanīkarastvam | tvameva kālo niyatistvameva tvameva mṛtyurdhanadastvameva

तुम्हीं विष्णु हो, तुम्हीं चतुर्मुख ब्रह्मा हो; तुम्हीं सूर्य हो, तुम्हीं चन्द्रमा हो। तुम्हीं काल हो, तुम्हीं नियति हो; तुम्हीं मृत्यु हो, तुम्हीं कुबेर हो।

श्लोक 124 (skanda.8.114.124)

त्वमेव सूक्ष्मः पुरुषोव्ययस्त्वं त्वमेव सूक्ष्माच्च परं च सूक्ष्मम् । व्यक्तं त्वमेव प्रकृतिस्त्वमेव त्वमेव सत्वं च भवोद्भवं च

tvameva sūkṣmaḥ puruṣovyayastvaṁ tvameva sūkṣmācca paraṁ ca sūkṣmam | vyaktaṁ tvameva prakṛtistvameva tvameva satvaṁ ca bhavodbhavaṁ ca

तुम्हीं सूक्ष्म पुरुष हो, तुम्हीं अव्यय हो; तुम्हीं सूक्ष्म से भी परम सूक्ष्म हो। तुम्हीं व्यक्त हो, तुम्हीं प्रकृति हो; तुम्हीं सत्त्व हो, तुम्हीं सृष्टि का उद्भव हो।

श्लोक 125 (skanda.8.114.125)

त्वमेव भूमिः सलिलं त्वमेव त्वमेव वह्निः पवनस्त्वमेव । त्वमेव खं भूतभविष्यभव्यं त्वमेव भूतं भवभव्ययुक्तम्

tvameva bhūmiḥ salilaṁ tvameva tvameva vahniḥ pavanastvameva | tvameva khaṁ bhūtabhaviṣyabhavyaṁ tvameva bhūtaṁ bhavabhavyayuktam

तुम्हीं पृथ्वी हो, तुम्हीं जल हो; तुम्हीं अग्नि हो, तुम्हीं वायु हो। तुम्हीं आकाश हो, तुम्हीं भूत-भविष्य हो; तुम्हीं भूतकाल हो, वर्तमान और भविष्य से युक्त हो।

श्लोक 126 (skanda.8.114.126)

त्वमेव यज्ञो नियमस्त्वमेव त्वमेव सर्वं प्रकरोषि धर्मम् । त्वमेव सर्वस्य चराचरस्य पृथग् विभक्ता प्रलये च गोप्ता

tvameva yajño niyamastvameva tvameva sarvaṁ prakaroṣi dharmam | tvameva sarvasya carācarasya pṛthag vibhaktā pralaye ca goptā

तुम्हीं यज्ञ हो, तुम्हीं नियम हो; तुम्हीं सम्पूर्ण धर्म को सम्पन्न करते हो। तुम्हीं इस सम्पूर्ण चराचर जगत् के पृथक्-पृथक् विभाजनकर्ता हो, और प्रलय में रक्षक हो।

श्लोक 127 (skanda.8.114.127)

इत्येवमुक्त्वा वचनं सुरेन्द्राः प्रणम्य मां सिद्धगणाश्च हृष्टाः । व्यपेतशोकाः प्रविभक्तसोमा गता विमनैरनिलोग्रवेगाः

ityevamuktvā vacanaṁ surendrāḥ praṇamya māṁ siddhagaṇāśca hṛṣṭāḥ | vyapetaśokāḥ pravibhaktasomā gatā vimanairanilogravegāḥ

इस प्रकार यह वचन कहकर, हर्षित इन्द्रादि देवगण और सिद्धगण मुझे प्रणाम करके, शोकरहित होकर, सोम को आपस में बाँटकर, वायु के समान वेगवान् विमानों से अपने-अपने स्थान चले गए।

श्लोक 128 (skanda.8.114.128)

इत्येतत् परमं गुह्यं पुण्यात्पुण्यतरं महत् । स्वयं स्वयंभुवा प्रोक्तं स्तोत्रं पापप्रणाशनम्

ityetat paramaṁ guhyaṁ puṇyātpuṇyataraṁ mahat | svayaṁ svayaṁbhuvā proktaṁ stotraṁ pāpapraṇāśanam

इस प्रकार यह परम गोपनीय, पुण्य से भी अधिक पुण्यकारी, महान्, पाप का नाश करने वाला स्तोत्र स्वयं स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा कहा गया।

श्लोक 129 (skanda.8.114.129)

यस्तु धारयते नित्यं मत्परो नियमे स्थितः । ब्रह्मोद्गीतं शिवं ह्येतत् सर्वरोगनिबर्हणम्

yastu dhārayate nityaṁ matparo niyame sthitaḥ | brahmodgītaṁ śivaṁ hyetat sarvaroganibarhaṇam

जो पुरुष सदा मुझमें तत्पर होकर, नियम में स्थित रहकर, इसे धारण करता है - ब्रह्मा द्वारा गाया गया यह मंगलमय स्तोत्र सब रोगों का नाशक है।

श्लोक 130 (skanda.8.114.130)

गतिं तस्य प्रवक्ष्यामि परत्रेह च देहिनः । विषं तस्य वरारोहे स्थावरं जंगमं तथा

gatiṁ tasya pravakṣyāmi paratreha ca dehinaḥ | viṣaṁ tasya varārohe sthāvaraṁ jaṅgamaṁ tathā

हे वरारोहे! मैं उस देहधारी की गति, इस लोक में और परलोक में, बताऊँगा। स्थावर और जंगम, दोनों प्रकार का विष उसका -

श्लोक 131 (skanda.8.114.131)

संप्राप्य गात्रं सुश्रोणि क्षिप्रं सप्रतिहन्यते । शममेत्य शुभं घोरं दुःस्वप्नं चापकर्षति

saṁprāpya gātraṁ suśroṇi kṣipraṁ sapratihanyate | śamametya śubhaṁ ghoraṁ duḥsvapnaṁ cāpakarṣati

हे सुश्रोणि! उसके शरीर में पहुँचकर वह विष शीघ्र ही निष्प्रभावी हो जाता है, शान्त हो जाता है। यह मंगलमय स्तोत्र भयंकर दुःस्वप्न को भी दूर कर देता है।

श्लोक 132 (skanda.8.114.132)

स्त्रीषु वल्लभतां याति सभायां पार्थिवस्य च । विवादे जयमाप्नोति युद्धे चैव न संशयः

strīṣu vallabhatāṁ yāti sabhāyāṁ pārthivasya ca | vivāde jayamāpnoti yuddhe caiva na saṁśayaḥ

वह स्त्रियों में प्रिय हो जाता है, राजा की सभा में भी। विवाद में वह विजय पाता है, और युद्ध में भी - इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 133 (skanda.8.114.133)

गच्छतोध्वनि च क्षेमं सत्वं चैवोपजायते । शरीरभेदे वक्ष्यामि गतिं तस्य वरानने

gacchatodhvani ca kṣemaṁ satvaṁ caivopajāyate | śarīrabhede vakṣyāmi gatiṁ tasya varānane

मार्ग पर चलने में उसे कल्याण प्राप्त होता है, और उसमें सत्त्व-गुण उत्पन्न होता है। हे वरानने! अब मैं उसकी शरीर-त्याग के पश्चात् की गति बताऊँगा।

श्लोक 134 (skanda.8.114.134)

हरिश्मश्रुर्नीलकण्ठः शशाङ्काङ्कितमूर्धजः । त्र्यक्षोभेद्यस्त्रिशूली च वृषकेतुर्महाबलः

hariśmaśrurnīlakaṇṭhaḥ śaśāṅkāṅkitamūrdhajaḥ | tryakṣobhedyastriśūlī ca vṛṣaketurmahābalaḥ

तवणी दाढ़ी वाला, नीलकण्ठ, चन्द्रमा से चिह्नित केशों वाला, त्रिनेत्र, अभेद्य, त्रिशूलधारी, बैल-ध्वज वाला, महाबली -

श्लोक 135 (skanda.8.114.135)

नन्दितुल्यवपुश्चैव नन्दितुल्यपराक्रमः । विचरत्यखिलं सिद्धः सप्तलोकं ममाज्ञया

nanditulyavapuścaiva nanditulyaparākramaḥ | vicaratyakhilaṁ siddhaḥ saptalokaṁ mamājñayā

नन्दी के समान शरीर वाला और नन्दी के समान पराक्रमी होकर, वह सिद्ध पुरुष मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण सातों लोकों में विचरण करता है।

श्लोक 136 (skanda.8.114.136)

न हन्यते गतिस्तस्य वायोरिव नभस्तले । मम पार्श्वचरो भूत्वा तिष्ठत्याभूतसंप्लवम्

na hanyate gatistasya vāyoriva nabhastale | mama pārśvacaro bhūtvā tiṣṭhatyābhūtasaṁplavam

वायु की भाँति आकाश-तल में उसकी गति कभी बाधित नहीं होती। वह मेरा पार्षद होकर प्रलय-काल तक स्थित रहता है।

श्लोक 137 (skanda.8.114.137)

येपि चैतद्वरारोहे सदा शृण्वन्ति मानवाः । तेषां चैव प्रवक्ष्यामि फलं फलसहस्रदे

yepi caitadvarārohe sadā śṛṇvanti mānavāḥ | teṣāṁ caiva pravakṣyāmi phalaṁ phalasahasrade

हे वरारोहे! जो मनुष्य भी इसे सदा सुनते हैं, उनका भी फल मैं बताऊँगा, हे सहस्रों फल देने वाली!

श्लोक 138 (skanda.8.114.138)

ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विन्दते महीम् । वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम्

brāhmaṇo vedamāpnoti kṣatriyo vindate mahīm | vaiśyastu labhate lābhaṁ śūdraḥ prāpnoti sadgatim

ब्राह्मण वेद प्राप्त करता है, क्षत्रिय भूमि पाता है, वैश्य लाभ पाता है, शूद्र सद्गति पाता है।

श्लोक 139 (skanda.8.114.139)

व्याधितो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् । गुर्विणी जनयेत् पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम्

vyādhito mucyate rogād baddho mucyeta bandhanāt | gurviṇī janayet putraṁ kanyā vindati satpatim

रोगी रोग से मुक्त होता है, बन्धा हुआ बन्धन से मुक्त होता है। गर्भवती स्त्री पुत्र को जन्म देती है, कन्या उत्तम पति पाती है।

श्लोक 140 (skanda.8.114.140)

नष्टञ्च लभते द्रव्यमिह लोके परत्र च । गवां शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत्फलम्

naṣṭañca labhate dravyamiha loke paratra ca | gavāṁ śatasahasrasya samyag dattasya yatphalam

वह खोए हुए द्रव्य को पुनः पाता है, इस लोक में और परलोक में भी। सौ सहस्र गौओं के भली-भाँति दिए गए दान का जो फल है -

श्लोक 141 (skanda.8.114.141)

तत्फलं समवाप्नोति श्रुत्वा मर्त्यः कथामिमाम् । अक्षरं वाथ पादं वा श्लोकं श्लोकार्धमेव वा

tatphalaṁ samavāpnoti śrutvā martyaḥ kathāmimām | akṣaraṁ vātha pādaṁ vā ślokaṁ ślokārdhameva vā

वही फल मनुष्य इस कथा को सुनकर प्राप्त करता है - चाहे एक अक्षर, चाहे एक पाद, चाहे एक श्लोक, चाहे आधा श्लोक ही सुने।

श्लोक 142 (skanda.8.114.142)

अथवा सर्वमध्यायं देवब्राह्मणसंसदि । यः पठेन्मानवो नित्यं मद्गतेनान्तरात्मना

athavā sarvamadhyāyaṁ devabrāhmaṇasaṁsadi | yaḥ paṭhenmānavo nityaṁ madgatenāntarātmanā

अथवा जो मनुष्य देवताओं और ब्राह्मणों की सभा में इस सम्पूर्ण अध्याय को नित्य मुझमें लीन अन्तरात्मा से पढ़ता है,

श्लोक 143 (skanda.8.114.143)

श्रद्दधानः सदोद्युक्तो रुद्रलोके महीयते । पठस्व देवि भद्रन्ते पाठयस्व च बान्धवान्

śraddadhānaḥ sadodyukto rudraloke mahīyate | paṭhasva devi bhadrante pāṭhayasva ca bāndhavān

श्रद्धावान् और सदा उद्यमशील होकर, वह रुद्रलोक में महिमामण्डित होता है। हे देवि! तुम भी इसे पढ़ो - तुम्हारा कल्याण हो - और अपने बन्धुओं को भी पढ़ाओ।

श्लोक 144 (skanda.8.114.144)

अतः परतरं स्तोत्रं न भूतं न भविष्यति । नापि यक्षाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः

ataḥ parataraṁ stotraṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati | nāpi yakṣāḥ piśācā vā na bhūtā na vināyakāḥ

इससे बढ़कर कोई स्तोत्र न हुआ है, न होगा। न यक्ष, न पिशाच, न भूत, न विनायक -

श्लोक 145 (skanda.8.114.145)

कुर्युर्विघ्नं गृहे तत्र यत्रायं तिष्ठते स्तवः । यथाविमुक्तं क्षेत्रेषु क्षेत्रं श्रेष्ठं प्रकल्पितम्

kuryurvighnaṁ gṛhe tatra yatrāyaṁ tiṣṭhate stavaḥ | yathāvimuktaṁ kṣetreṣu kṣetraṁ śreṣṭhaṁ prakalpitam

वे उस घर में कोई विघ्न नहीं कर सकते जहाँ यह स्तवन रखा जाता है। जिस प्रकार तीर्थों में अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) को श्रेष्ठ क्षेत्र माना गया है,

श्लोक 146 (skanda.8.114.146)

तथा स्तवो वरिष्ठोयं स्तवानां ब्रह्मनिर्मितः । यश्चैनं श्रावयेच्छ्राद्धे ब्राह्मणान् पादमन्ततः

tathā stavo variṣṭhoyaṁ stavānāṁ brahmanirmitaḥ | yaścainaṁ śrāvayecchrāddhe brāhmaṇān pādamantataḥ

वैसे ही यह ब्रह्मा-निर्मित स्तवन सब स्तवनों में सर्वश्रेष्ठ है। जो कोई श्राद्ध में ब्राह्मणों को इसका कम से कम एक पाद भी सुनाता है,

श्लोक 147 (skanda.8.114.147)

अक्षय्यमन्नपानं वै पितॄँस्तस्योपतिष्ठति । मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचाप्युदाहृतम्

akṣayyamannapānaṁ vai pitṝm̐stasyopatiṣṭhati | manasā cintitaṁ yacca yacca vācāpyudāhṛtam

उसके पितरों को अक्षय अन्न-पान प्राप्त होता है। जो कुछ भी मन से चिन्तन किया जाता है, और जो कुछ वाणी से कहा जाता है -

श्लोक 148 (skanda.8.114.148)

सर्वं संपद्यते तस्य स्तवस्यास्यानुकीर्तनात् । श्रुत्वैतत् परमं गुह्यं येपि स्युः पापयोनयः

sarvaṁ saṁpadyate tasya stavasyāsyānukīrtanāt | śrutvaitat paramaṁ guhyaṁ yepi syuḥ pāpayonayaḥ

वह सब इस स्तवन के पाठ से सिद्ध हो जाता है। इस परम गोपनीय स्तोत्र को सुनकर, जो भी पापयोनि में उत्पन्न हुए हों,

श्लोक 149 (skanda.8.114.149)

स्त्रियः शूद्राश्च तेपीह रुद्रलोकं व्रजन्त्युत । यदा मानुष्यतामेति कदाचित् कालपर्ययात्

striyaḥ śūdrāśca tepīha rudralokaṁ vrajantyuta | yadā mānuṣyatāmeti kadācit kālaparyayāt

स्त्रियाँ और शूद्र भी इसी लोक से रुद्रलोक को जाते हैं। यदि कभी कालक्रम से वे पुनः मनुष्य-योनि को प्राप्त हों,

श्लोक 150 (skanda.8.114.150)

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो विमले जायते कुले । देवभक्तश्च भवति धर्मञ्च कुरुते तदा

vedavedāṅgatattvajño vimale jāyate kule | devabhaktaśca bhavati dharmañca kurute tadā

तो वे वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ होकर, निर्मल कुल में जन्म लेते हैं, देवभक्त होते हैं, और धर्म का आचरण करते हैं।

श्लोक 151 (skanda.8.114.151)

इतिहासमिदं पुण्यं सर्वकिल्विषनाशनम् । ऊक्तं मयात्र तुष्टेन स्वयमेवाम्बुजेक्षणे

itihāsamidaṁ puṇyaṁ sarvakilviṣanāśanam | ūktaṁ mayātra tuṣṭena svayamevāmbujekṣaṇe

हे कमल-नयनी! यह पुण्यमय इतिहास, जो सब पापों का नाशक है, यहाँ मेरे द्वारा, प्रसन्न होकर, स्वयं ही कहा गया।

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