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अम्बिका खण्ड · अध्याय 115

अमृतमथन-युद्ध

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (skanda.8.115.1)

व्यास उवाच । अमृतेपहृते तस्मिन् विष्णुना छद्मरूपिणा । दैत्याश्च दानवाश्चैव किं चक्रु स्तदन्तरम्

vyāsa uvāca | amṛtepahṛte tasmin viṣṇunā chadmarūpiṇā | daityāśca dānavāścaiva kiṁ cakru statantaram

व्यास ने कहा - जब छद्मरूपधारी विष्णु द्वारा वह अमृत हर लिया गया, तब उसके पश्चात् दैत्यों और दानवों ने क्या किया?

श्लोक 2 (skanda.8.115.2)

सनत्कुमार उवाच । ते क्रोधाद्वञ्चिताः सर्वे विष्णुना दानवेश्वराः । सन्नह्य युद्धाय तदा गर्हन्तो विष्णुमूचिरे

sanatkumāra uvāca | te krodhādvañcitāḥ sarve viṣṇunā dānaveśvarāḥ | sannahya yuddhāya tadā garhanto viṣṇumūcire

सनत्कुमार ने कहा - विष्णु द्वारा छले जाने पर क्रोधित हुए वे सब दानवेश्वर, युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर, विष्णु की निन्दा करते हुए बोले -

श्लोक 3 (skanda.8.115.3)

धिग्बल धिक् च ते शौर्यं पाप धिक् ते पराक्रमम् । विश्रम्भघाती नित्यं त्वन्नीचकर्मा दुरात्मवान्

dhigbala dhik ca te śauryaṁ pāpa dhik te parākramam | viśrambhaghātī nityaṁ tvannīcakarmā durātmavān

धिक्कार है तुम्हारे बल को, धिक्कार है तुम्हारे शौर्य को, हे पापी! धिक्कार है तुम्हारे पराक्रम को। तुम विश्वासघाती हो, सदा नीच कर्म करने वाले, दुरात्मा हो।

श्लोक 4 (skanda.8.115.4)

त्वया निकृत्या निहतो हिरण्यकशिपुः पुरा । हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रोमृतं चेदमपाहृतम्

tvayā nikṛtyā nihato hiraṇyakaśipuḥ purā | hiraṇyākṣaśca daityendromṛtaṁ cedamapāhṛtam

तुमने ही पहले छल से हिरण्यकशिपु को मारा, और दैत्येन्द्र हिरण्याक्ष को भी; और अब यह अमृत भी छल से हर लिया गया।

श्लोक 5 (skanda.8.115.5)

न तवास्ति बलं युद्धे निकृत्या हि बली भवान् । युद्धे स्थितो भवानस्तु न नो मोक्षमवाप्स्यति

na tavāsti balaṁ yuddhe nikṛtyā hi balī bhavān | yuddhe sthito bhavānastu na no mokṣamavāpsyati

तुम्हारे पास युद्ध में बल नहीं है; तुम तो छल से ही बलवान् हो। अब युद्ध में स्थित होकर देखो - तुम हमसे मुक्ति नहीं पाओगे।

श्लोक 6 (skanda.8.115.6)

सनत्कुमार उवाच । ततः स दैत्याराट् क्रुद्ध उद्गिरन् पावकार्चिषः । रथेनाम्बुदनादेन विष्णुमेवाभिदुद्रुवे

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa daityārāṭ kruddha udgiran pāvakārciṣaḥ | rathenāmbudanādena viṣṇumevābhidudruve

सनत्कुमार ने कहा - तब वह दैत्यराज (बलि) क्रुद्ध होकर, अग्नि की ज्वालाएँ उगलता हुआ, मेघ-गर्जन के समान रथ पर चढ़कर विष्णु की ओर दौड़ा।

श्लोक 7 (skanda.8.115.7)

विप्रचितिश्च दैत्येन्द्रो गजेन गजिनं तदा । समाह्वयत् सहस्राक्षं गजिनं वज्रपाणिनम्

vipracitiśca daityendro gajena gajinaṁ tadā | samāhvayat sahasrākṣaṁ gajinaṁ vajrapāṇinam

दैत्येन्द्र विप्रचित्ति ने अपने हाथी पर चढ़कर, हाथी पर सवार, सहस्राक्ष, वज्रपाणि इन्द्र को ललकारा।

श्लोक 8 (skanda.8.115.8)

विरोचनस्तु संक्रुद्धो धनेशं राक्षसाधिपम् । गजेनैवाभिदुद्राव जलदो भास्करं यथा

virocanastu saṅkruddho dhaneśaṁ rākṣasādhipam | gajenaivābhidudrāva jalado bhāskaraṁ yathā

विरोचन अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हाथी पर सवार होकर, धनेश (कुबेर), राक्षसों के स्वामी की ओर उसी प्रकार दौड़ा जैसे मेघ सूर्य की ओर दौड़ता है।

श्लोक 9 (skanda.8.115.9)

बलिर्वैरोचनिश्चापि यमं पितृगणाधिपम् । रथेनैवाभिदुद्राव विघ्नो विघ्नमिवापरम्

balirvairocaniścāpi yamaṁ pitṛgaṇādhipam | rathenaivābhidudrāva vighno vighnamivāparam

विरोचन-पुत्र बलि भी रथ पर सवार होकर पितृगणों के स्वामी यम की ओर उसी प्रकार दौड़ा जैसे एक विघ्न दूसरे विघ्न की ओर दौड़े।

श्लोक 10 (skanda.8.115.10)

अनुह्राश्च दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपोः सुतः । वरुणं प्रति दुद्राव नदीवेगो यथार्णवम्

anuhrāśca daityendro hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ | varuṇaṁ prati dudrāva nadīvego yathārṇavam

हिरण्यकशिपु का पुत्र, दैत्येन्द्र अनुह्राद, वरुण की ओर उसी प्रकार दौड़ा जैसे नदी का वेग समुद्र की ओर दौड़ता है।

श्लोक 11 (skanda.8.115.11)

मयस्तु दानवश्रेष्ठस्तारस्तारक एव च । आदित्यैस्सह संसक्ता गजा इव महागजैः

mayastu dānavaśreṣṭhastārastāraka eva ca | ādityaissaha saṁsaktā gajā iva mahāgajaiḥ

दानवश्रेष्ठ मय, तार और तारक, आदित्यों के साथ उसी प्रकार भिड़ गए जैसे हाथी बड़े हाथियों के साथ भिड़ते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.115.12)

शरभः शतकेतुश्च बलो मूकश्च दानवः । रुद्रानेवाभ्यभावन्त सिंहाः सिंहानिवाजने

śarabhaḥ śataketuśca balo mūkaśca dānavaḥ | rudrānevābhyabhāvanta siṁhāḥ siṁhānivājane

शरभ, शतकेतु, बल और मूक नामक दानव, रुद्रों पर उसी प्रकार टूट पड़े जैसे जंगल में सिंह सिंहों पर टूट पड़ते हैं।

श्लोक 13 (skanda.8.115.13)

शम्भुः कार्तस्वनश्चैव महामायश्च शम्बरः । वसुभिः सह संसक्ता व्यसनानीव साधुभिः

śambhuḥ kārtasvanaścaiva mahāmāyaśca śambaraḥ | vasubhiḥ saha saṁsaktā vyasanānīva sādhubhiḥ

शम्भु, कार्तस्वन, तथा महामायावी शम्बर, वसुओं से उसी प्रकार भिड़ गए जैसे विपत्तियाँ साधु-पुरुषों से भिड़ती हैं।

श्लोक 14 (skanda.8.115.14)

नरकोथ हयग्रीवस्तथेन्द्रदमनोसुरः । अश्विभ्यां सह संसक्ता ग्रहाभ्यामिव तारकाः

narakotha hayagrīvastathendradamanosuraḥ | aśvibhyāṁ saha saṁsaktā grahābhyāmiva tārakāḥ

नरक, हयग्रीव, तथा असुर इन्द्रदमन, अश्विनीकुमारों से उसी प्रकार भिड़ गए जैसे तारे ग्रहों से भिड़ते हैं।

श्लोक 15 (skanda.8.115.15)

अन्ये चान्यैस्सुरैस्सार्धं महामाया महाबलाः । आहूयाहूय युध्यन्ते सर्वे क्रोधेन दानवाः

anye cānyaissuraissārdhaṁ mahāmāyā mahābalāḥ | āhūyāhūya yudhyante sarve krodhena dānavāḥ

अन्य महामायावी, महाबली दानव भी अन्य देवताओं के साथ ललकार-ललकार कर, सब क्रोधपूर्वक युद्ध करने लगे।

श्लोक 16 (skanda.8.115.16)

विप्रचित्तिर्महामायः सहस्राक्षं त्रिभिः शरैः । अर्दयामास नादेन नादयानो दिशो दश

vipracittirmahāmāyaḥ sahasrākṣaṁ tribhiḥ śaraiḥ | ardayāmāsa nādena nādayāno diśo daśa

महामायावी विप्रचित्ति ने तीन बाणों से सहस्राक्ष इन्द्र को पीड़ित किया, और अपनी गर्जना से दसों दिशाओं को गुंजायमान कर दिया।

श्लोक 17 (skanda.8.115.17)

तस्येन्द्रः कार्मुकं चित्रमस्यतो लघुहस्तवान् । वज्रेण शतधारेण शतधा व्यभजद्बली

tasyendraḥ kārmukaṁ citramasyato laghuhastavān | vajreṇa śatadhāreṇa śatadhā vyabhajadbalī

इन्द्र ने, हाथ की फुर्ती से, उसके विचित्र, बाण चलाते हुए धनुष को, अपने सौ धार वाले वज्र से बलपूर्वक सौ टुकड़ों में विभाजित कर दिया।

श्लोक 18 (skanda.8.115.18)

ततोस्य गजमाघोरे कार्मुकं गृह्णतोपरम् । गजेन पोथयामास स पपात यथा गिरिः

tatosya gajamāghore kārmukaṁ gṛhṇatoparam | gajena pothayāmāsa sa papāta yathā giriḥ

फिर जब वह भयंकर युद्ध में दूसरा धनुष उठा रहा था, तब इन्द्र ने अपने हाथी से उसके हाथी को पछाड़ दिया, और वह पर्वत के समान गिर पड़ा।

श्लोक 19 (skanda.8.115.19)

तमाप्लुतं गजाच्चैव दानवं देवराड् बली । वज्रेणाताडयत् क्रौञ्चं शक्त्या गुह इवाहवे

tamāplutaṁ gajāccaiva dānavaṁ devarāḍ balī | vajreṇātāḍayat krauñcaṁ śaktyā guha ivāhave

उस हाथी से कूद पड़े दानव को बलशाली देवराज ने अपने वज्र से उसी प्रकार मारा जैसे युद्ध में गुह (कार्तिकेय) ने अपनी शक्ति से क्रौंच-पर्वत को मारा था।

श्लोक 20 (skanda.8.115.20)

स तेन वज्रघातेन दानवो मूढचेतनः । अपतद् भूतले क्षिप्रं वातरुग्ण इव द्रुमः

sa tena vajraghātena dānavo mūḍhacetanaḥ | apatad bhūtale kṣipraṁ vātarugṇa iva drumaḥ

उस वज्र-प्रहार से वह दानव चेतनाहीन होकर तुरन्त भूमि पर गिर पड़ा, जैसे वायु से टूटा हुआ वृक्ष गिरता है।

श्लोक 21 (skanda.8.115.21)

ततो हाहाकृतमभूद्दानवानां बले तदा । साधुसाध्विति देवानां सिंहनादाश्च बृंहिताः

tato hāhākṛtamabhūddānavānāṁ bale tadā | sādhusādhviti devānāṁ siṁhanādāśca bṛṁhitāḥ

तब दानवों की सेना में हाहाकार मच गया, और देवताओं में 'साधु साधु' की ध्वनि, सिंह-गर्जना और गजों की चिंघाड़ें गूँज उठीं।

श्लोक 22 (skanda.8.115.22)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां स शक्त्या भीमरूपया । मातङ्गस्तस्य संमत्तमनयद्यमसादनम्

pratilabhya tataḥ saṁjñāṁ sa śaktyā bhīmarūpayā | mātaṅgastasya saṁmattamanayadyamasādanam

चेत में आकर, उसने अपनी भयंकर शक्ति से इन्द्र के मत्त हाथी को यम के धाम पहुँचा दिया।

श्लोक 23 (skanda.8.115.23)

ततोस्य पृष्ठरक्षाँश्च कवचञ्च महाप्रभम् । शातयामास देवाग्र्यस्स हित्वा संयुगं ययौ

tatosya pṛṣṭharakṣām̐śca kavacañca mahāprabham | śātayāmāsa devāgryassa hitvā saṁyugaṁ yayau

फिर उसने इन्द्र के पीछे के रक्षकों और उसके अत्यन्त तेजस्वी कवच को भी नष्ट कर दिया। तब उस देवश्रेष्ठ इन्द्र ने युद्ध छोड़कर वहाँ से प्रस्थान किया।

श्लोक 24 (skanda.8.115.24)

बलिर्यमस्य पुण्ड्रं च कृतान्तं कलहं तथा । कालञ्च नियतिञ्चैव किङ्करान् पाशमेव च

baliryamasya puṇḍraṁ ca kṛtāntaṁ kalahaṁ tathā | kālañca niyatiñcaiva kiṅkarān pāśameva ca

बलि ने यम के पुण्ड्र, कृतान्त, कलह, काल, नियति, किंकरों तथा पाश को भी - एक-एक करके देखते हुए उन सभी को -

श्लोक 25 (skanda.8.115.25)

एकैकं पश्यतस्तीक्ष्णैः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः । यमञ्चैव चतुष्षष्ट्या हृदये समविध्यत

ekaikaṁ paśyatastīkṣṇaiḥ pañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ | yamañcaiva catuṣṣaṣṭyā hṛdaye samavidhyat

- पाँच-पाँच तीक्ष्ण बाणों से बींध दिया, और यम को स्वयं चौंसठ बाणों से हृदय में बींध दिया।

श्लोक 26 (skanda.8.115.26)

तस्य चानदतः क्षिप्रं यमः क्रुद्धो हसँस्तदा । दण्डेन रथमाहत्य भस्मसायुज्यमानयत्

tasya cānadataḥ kṣipraṁ yamaḥ kruddho hasam̐stadā | daṇḍena rathamāhatya bhasmasāyujyamānayat

जब वह गर्जना कर रहा था, तब क्रुद्ध यम ने हँसते हुए तुरन्त अपने दण्ड से उसके रथ पर प्रहार कर उसे भस्म में मिला दिया।

श्लोक 27 (skanda.8.115.27)

हते रथे ससूते तु साश्वे सह पदानुगैः । तिष्ठतिष्ठेति सन्नद्य यमं बलिरधावत

hate rathe sasūte tu sāśve saha padānugaiḥ | tiṣṭhatiṣṭheti sannadya yamaṁ baliradhāvat

सारथि, अश्वों और पदाति-सैनिकों सहित रथ के नष्ट हो जाने पर, बलि 'ठहरो, ठहरो' कहते हुए शस्त्र धारण कर यम की ओर दौड़ा।

श्लोक 28 (skanda.8.115.28)

तस्यापतत एवाशु यमो दण्डमवासृजत् । मूर्ध्नि तेन प्रहारेण ततः सोगान्महीतलम्

tasyāpatata evāśu yamo daṇḍamavāsṛjat | mūrdhni tena prahāreṇa tataḥ sogānmahītalam

जैसे ही वह टूट पड़ा, यम ने तुरन्त अपना दण्ड चला दिया; उस प्रहार से सिर में चोट खाकर वह भूतल पर गिर पड़ा।

श्लोक 29 (skanda.8.115.29)

ततो हाहाकृतमभूद्दानवानां बले तदा । गृहण गृहणेति चाप्यूचुः कष्टं कष्टं तथापरे

tato hāhākṛtamabhūddānavānāṁ bale tadā | gṛhaṇa gṛhaṇeti cāpyūcuḥ kaṣṭaṁ kaṣṭaṁ tathāpare

तब पुनः दानवों की सेना में हाहाकार मच गया; कुछ 'पकड़ो, पकड़ो' चिल्लाने लगे, और अन्य 'हाय, हाय कष्ट है' कहने लगे।

श्लोक 30 (skanda.8.115.30)

अनुह्रादस्तु वरुणं नाराचेन महाबलः । आहत्य हृदये क्रुद्धो रथोपस्थे न्यपातयत्

anuhrādastu varuṇaṁ nārācena mahābalaḥ | āhatya hṛdaye kruddho rathopasthe nyapātayat

महाबली अनुह्राद ने क्रुद्ध होकर वरुण को नाराच बाण से हृदय में बींध दिया, और उसे रथ के आसन पर गिरा दिया।

श्लोक 31 (skanda.8.115.31)

स उत्थाय क्षणाद्देवो विकृष्य बलवद्धनुः । सायकाँस्तस्य संधार्य धनुश्चिच्छेद वीर्यवान्

sa utthāya kṣaṇāddevo vikṛṣya balavaddhanuḥ | sāyakām̐stasya saṁdhārya dhanuścicheda vīryavān

वह देव क्षणभर में उठकर, अपने बलवान् धनुष को खींचकर, बाण संधानकर, उस पराक्रमी ने अनुह्राद के धनुष को काट डाला।

श्लोक 32 (skanda.8.115.32)

अश्वाञ्जघान सूतस्य शिरः कायादपातयत् । तस्य प्रस्कन्दतश्चापि हताश्वाद्रथसत्तमात्

aśvāñjaghāna sūtasya śiraḥ kāyādapātayat | tasya praskandataścāpi hatāśvādrathasattamāt

उसने उसके अश्वों को मार डाला, सारथि के सिर को धड़ से अलग कर दिया। जब वह अपने अश्वहीन उत्तम रथ से कूद पड़ा,

श्लोक 33 (skanda.8.115.33)

बिभेद हृदयं शीघ्रं स पपात यथा मृतः । मयस्तारस्तारकश्च आदित्यान् दृढमार्दयन्

bibheda hṛdayaṁ śīghraṁ sa papāta yathā mṛtaḥ | mayastārastārakaśca ādityān dṛḍhamārdayan

तब वरुण ने तुरन्त उसका हृदय बींध दिया, और वह मृतवत् गिर पड़ा। इधर मय, तार और तारक आदित्यों को दृढ़तापूर्वक पीड़ित करने लगे।

श्लोक 34 (skanda.8.115.34)

तेपि तान् विरथाञ्चक्रुः सर्वाञ्छरशतैस्त्रिभिः । शरभः शतकेतुश्च बलो मूकश्च दानवः

tepi tān virathāñcakruḥ sarvāñcharaśataistribhiḥ | śarabhaḥ śataketuśca balo mūkaśca dānavaḥ

किन्तु उन आदित्यों ने भी तीन-तीन सौ बाणों से उन सबको रथहीन कर दिया। इधर शरभ, शतकेतु, बल और मूक नामक दानव -

श्लोक 35 (skanda.8.115.35)

रुद्रानस्त्रैर्बहुविधैर्नादयन्तोर्दयन्युधि । तेषामस्त्राणि तानि स्म प्रतिवार्य महाबलाः

rudrānastrairbahuvidhairnādayantordayanyudhi | teṣāmastrāṇi tāni sma prativārya mahābalāḥ

- अनेक प्रकार के अस्त्रों से गरजते हुए, रुद्रों को पीड़ित करने लगे। उन महाबली रुद्रों ने उनके उन अस्त्रों को रोककर -

श्लोक 36 (skanda.8.115.36)

शलभा इव केदारान् मुहूर्तेन व्यनाशयन् । ते काल्यमानास्तै रुद्रैर्बहुभिर्विरथास्तदा

śalabhā iva kedārān muhūrtena vyanāśayan | te kālyamānāstai rudrairbahubhirvirathāstadā

- उन्हें एक ही क्षण में उसी प्रकार नष्ट कर डाला जैसे टिड्डियाँ खेतों को नष्ट कर देती हैं। उन अनेक रुद्रों द्वारा खदेड़े जाकर वे तब रथहीन हो गए,

श्लोक 37 (skanda.8.115.37)

रणं त्यक्त्वा महामाया विपलायन्त सर्वशः । शम्भुः कार्तस्वनश्चैव महामायश्च शम्बरः

raṇaṁ tyaktvā mahāmāyā vipalāyanta sarvaśaḥ | śambhuḥ kārtasvanaścaiva mahāmāyaśca śambaraḥ

वे महामायावी दानव युद्ध छोड़कर सभी दिशाओं में भाग गए। इधर शम्भु, कार्तस्वन और महामायावी शम्बर -

श्लोक 38 (skanda.8.115.38)

वसूनभ्यद्रवन् युद्धे गजाः प्रतिगजानिव । तेषान्तु वसवः सर्वे स्वापनास्त्रं ससर्जिरे

vasūnabhyadravan yuddhe gajāḥ pratigajāniva | teṣāntu vasavaḥ sarve svāpanāstraṁ sasarjire

- युद्ध में वसुओं पर उसी प्रकार टूट पड़े जैसे हाथी प्रतिपक्षी हाथियों पर टूट पड़ते हैं। तब सब वसुओं ने उन पर निद्रा-अस्त्र का प्रयोग किया,

श्लोक 39 (skanda.8.115.39)

रथेष्ववस्थिता येन बभुः सुप्ता यथा मृगाः । तान् सुप्तान् रथयन्तारो रणात्तस्मादपाहरन्

ratheṣvavasthitā yena babhuḥ suptā yathā mṛgāḥ | tān suptān rathayantāro raṇāttasmādapāharan

जिससे वे रथों पर बैठे-बैठे ही, मृगों के समान, सो गए। उन सोए हुए योद्धाओं को उनके सारथियों ने उस युद्ध-भूमि से हटा दिया,

श्लोक 40 (skanda.8.115.40)

हरतां चैव सूतानामुत्तमाङ्गान्यपातयन् । ते हतेष्वथ सूतेषु उद्भ्रान्तैर्वाजिभिस्तदा

haratāṁ caiva sūtānāmuttamāṅgānyapātayan | te hateṣvatha sūteṣu udbhrāntairvājibhistadā

किन्तु उन्हें ले जाते हुए सारथियों के सिर भी काट डाले गए। सारथियों के मारे जाने पर, अनियंत्रित घोड़ों के कारण -

श्लोक 41 (skanda.8.115.41)

सुप्ता एव रणे सर्वे भ्राम्यन्ते दितिसूनवः । नरकोथ हयग्रीवस्तथेन्द्रदमनोपि च

suptā eva raṇe sarve bhrāmyante ditisūnavaḥ | narakotha hayagrīvastathendradamanopi ca

वे सभी दिति-पुत्र, सोए हुए ही, युद्ध-भूमि में इधर-उधर घूमते रहे। इधर नरक, हयग्रीव तथा असुर इन्द्रदमन भी -

श्लोक 42 (skanda.8.115.42)

अश्विनौ द्वौ सुसंयत्ता युयुधुस्ते सुरेश्वराः । तानापतत एवाथ तौ देवौ भिषजां वरौ

aśvinau dvau susaṁyattā yuyudhuste sureśvarāḥ | tānāpatata evātha tau devau bhiṣajāṁ varau

उन दोनों अश्विनीकुमारों से, जो देवश्रेष्ठ थे, भली-भाँति सन्नद्ध होकर युद्ध करने लगे। किन्तु जैसे ही वे उन पर टूट पड़े, वैद्यों में श्रेष्ठ उन दोनों देवों ने -

श्लोक 43 (skanda.8.115.43)

दण्डेनास्त्रेण विरथान् सर्वानेव प्रचक्रतुः । पुनश्चापततः सर्वान् गदिनः क्रोधमूर्छितान्

daṇḍenāstreṇa virathān sarvāneva pracakratuḥ | punaścāpatataḥ sarvān gadinaḥ krodhamūrchitān

- दण्ड-अस्त्र से उन सबको रथहीन कर दिया। फिर जब वे सब क्रोध से मूर्छित, गदाधारी होकर पुनः आ धमके,

श्लोक 44 (skanda.8.115.44)

वायव्यास्त्रेण सहसा संचिक्षिपतुराहवे । अन्ये चान्याँस्तदा देवा दितिपुत्रान् व्यपोथयन्

vāyavyāstreṇa sahasā saṁcikṣipaturāhave | anye cānyām̐stadā devā ditiputrān vyapothayan

तब वायव्य अस्त्र से उन्होंने युद्ध में उन्हें तुरन्त उड़ा दिया। इधर अन्य देवगणों ने भी अन्य दिति-पुत्रों को कुचल डाला,

श्लोक 45 (skanda.8.115.45)

अभज्यन्त यथा सिंहैर्मृगारण्येभिसंहताः । प्रह्लादश्चापि दैत्येन्द्रो विष्णुना सह संगतः

abhajyanta yathā siṁhairmṛgāraṇyebhisaṁhatāḥ | prahlādaścāpi daityendro viṣṇunā saha saṅgataḥ

जिससे वे उसी प्रकार तितर-बितर हो गए जैसे वन में सिंहों से घिरे मृग तितर-बितर होते हैं। इधर दैत्येन्द्र प्रह्लाद भी विष्णु के साथ जूझ रहा था।

श्लोक 46 (skanda.8.115.46)

महत् कृत्वा तदा युद्धं विरथः समपद्यत । स चक्रेण हताश्वस्तु हतसूतपदानुगः

mahat kṛtvā tadā yuddhaṁ virathaḥ samapadyata | sa cakreṇa hatāśvastu hatasūtapadānugaḥ

बड़ा युद्ध करने के बाद वह रथहीन हो गया - चक्र से उसके अश्व मारे गए, उसका सारथि और पैदल अनुचर भी मारे गए।

श्लोक 47 (skanda.8.115.47)

गदां गृहीत्वा प्रस्कन्द्य जनार्दनमुपाद्रवत् । तस्योद्यतकरस्याथ धावतश्च महामुने

gadāṁ gṛhītvā praskandya janārdanamupādravat | tasyodyatakarasyātha dhāvataśca mahāmune

गदा उठाकर, कूदकर, वह जनार्दन की ओर दौड़ पड़ा। हे महामुने! उसके हाथ उठाए हुए दौड़ते समय ही,

श्लोक 48 (skanda.8.115.48)

चिच्छेद तां गदामाशु चक्रेणैव जनार्दनः । अथ ते दानवाः शूरस्तैर्देवैर्भग्नविक्रमाः

cicheda tāṁ gadāmāśu cakreṇaiva janārdanaḥ | atha te dānavāḥ śūrastairdevairbhagnavikramāḥ

जनार्दन ने अपने चक्र से ही उस गदा को तुरन्त काट डाला। तब वे शूरवीर दानव उन देवों द्वारा पराक्रमहीन कर दिए गए,

श्लोक 49 (skanda.8.115.49)

अभज्यन्त यथा सिंहैर्वने मृगगणा भयात् । तान्भग्नान् भज्यमानाँश्च दृष्टवा त्यक्त्वा रणं ययुः

abhajyanta yathā siṁhairvane mṛgagaṇā bhayāt | tānbhagnān bhajyamānām̐śca dṛṣṭavā tyaktvā raṇaṁ yayuḥ

वन में सिंहों के भय से मृग-समूहों के समान तितर-बितर हो गए। उन टूटे हुए, भागते हुए दानवों को देखकर, शेष सब भी युद्ध छोड़कर चले गए।

श्लोक 50 (skanda.8.115.50)

प्रह्लादोपि रणं त्यक्त्वा तानेवानुजगाम ह । तेषु भग्नेष्वथेन्द्रस्य जयशब्दं सुपूजितम्

prahlādopi raṇaṁ tyaktvā tānevānujagāma ha | teṣu bhagneṣvathendrasya jayaśabdaṁ supūjitam

प्रह्लाद ने भी युद्ध छोड़कर उन्हीं का अनुसरण किया। उनके पराजित हो जाने पर, इन्द्र की विजय-घोषणा का समादरपूर्वक स्वर उठा,

श्लोक 51 (skanda.8.115.51)

समं चक्रुस्तदा देवाः सनारायणलोकपाः । सिंहनादांश्च विविधान् वादित्राणि न्यवादयन्

samaṁ cakrustadā devāḥ sanārāyaṇalokapāḥ | siṁhanādāṁśca vividhān vāditrāṇi nyavādayan

और नारायण सहित सब देवताओं और लोकपालों ने मिलकर उसे एक स्वर में गुँजाया, विविध सिंह-गर्जनाएँ कीं, तथा वाद्य बजाए।

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