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अम्बिका खण्ड · अध्याय 116

वामनावतार

अध्याय 115अध्याय-सूचीअध्याय 117

श्लोक 1 (skanda.8.116.1)

सनत्कुमार उवाच । एवं तदभवद् व्यास अमृतस्यावमन्थनम् । युद्धञ्च सुमहाघोरं प्रह्लादेन सहैव तु

sanatkumāra uvāca | evaṁ tadabhavad vyāsa amṛtasyāvamanthanam | yuddhañca sumahāghoraṁ prahlādena sahaiva tu

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! इस प्रकार अमृत-मन्थन घटित हुआ, और प्रह्लाद के साथ वह अत्यन्त भयंकर युद्ध भी हुआ।

श्लोक 2 (skanda.8.116.2)

स तु कालेन महता कृत्वा युद्धशतान्युत । पुत्रे विरोचने राज्यं प्रददावसुरेश्वरः

sa tu kālena mahatā kṛtvā yuddhaśatānyuta | putre virocane rājyaṁ pradadāvasureśvaraḥ

वह असुरेश्वर प्रह्लाद, दीर्घकाल तक सैकड़ों युद्ध करके, अपना राज्य पुत्र विरोचन को सौंपकर -

श्लोक 3 (skanda.8.116.3)

विरोचनः पुनर्व्यास राज्यस्यार्थे महाबलः । आटीबके हतो युद्धे देवेन्द्रेण महौजसा

virocanaḥ punarvyāsa rājyasyārthe mahābalaḥ | āṭībake hato yuddhe devendreṇa mahaujasā

हे व्यास! फिर वह महाबली विरोचन राज्य के लिए, 'आटीबक' नामक युद्ध में महातेजस्वी देवेन्द्र द्वारा मारा गया।

श्लोक 4 (skanda.8.116.4)

व्यास उवाच । आटीबकः स संग्रामः कथमासीन्महाभयः । श्रोतुमिच्छामि भगवन् परं कौतूहलं हि मे

vyāsa uvāca | āṭībakaḥ sa saṅgrāmaḥ kathamāsīnmahābhayaḥ | śrotumicchāmi bhagavan paraṁ kautūhalaṁ hi me

व्यास ने कहा - वह अत्यन्त भयंकर 'आटीबक' नामक संग्राम कैसे हुआ? हे भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ, मुझे इसमें बड़ा कौतूहल है।

श्लोक 5 (skanda.8.116.5)

सनत्कुमार उवाच । बभूव पुनरेवेह देवानामसुरैः सह । सख्यं ते ददृशुश्चैव दूराद्वै विस्मिताननाः

sanatkumāra uvāca | babhūva punareveha devānāmasuraiḥ saha | sakhyaṁ te dadṛśuścaiva dūrādvai vismitānanāḥ

सनत्कुमार ने कहा - यहाँ फिर से देवों और असुरों में मित्रता हो गई। एक दिन उन्होंने दूर से ही विस्मित मुख से कुछ देखा -

श्लोक 6 (skanda.8.116.6)

घोरामिलावृते तस्मिन् वर्षे विकृतरूपिणीम् । उग्रामाथर्वणीं कृत्यामसुराणां भयंकरीम्

ghorāmilāvṛte tasmin varṣe vikṛtarūpiṇīm | ugrāmātharvaṇīṁ kṛtyāmasurāṇāṁ bhayaṅkarīm

उस इला-वृत्त प्रदेश में एक भयंकर, विकृत रूप वाली, उग्र, अथर्वण-मंत्र से उत्पन्न कृत्या को, जो असुरों के लिए भी भयंकर थी,

श्लोक 7 (skanda.8.116.7)

तां दृष्टवा तेब्रुवन् केयमाटिरित्येव देवताः । असुरा बक इत्येव विवादश्चाप्यजायत

tāṁ dṛṣṭavā tebruvan keyamāṭirityeva devatāḥ | asurā baka ityeva vivādaścāpyajāyata

उसे देखकर देवताओं ने कहा - यह 'आटि' कौन है? और असुरों ने कहा - यह तो 'बक' है। इस प्रकार उनमें विवाद उत्पन्न हो गया।

श्लोक 8 (skanda.8.116.8)

सापि कृत्या तदा घोरा देवेभ्यो दर्शनं ददौ । आटिरित्येव तेषां च असुराणां बकोभवत्

sāpi kṛtyā tadā ghorā devebhyo darśanaṁ dadau | āṭirityeva teṣāṁ ca asurāṇāṁ bakobhavat

वह भयंकर कृत्या भी देवताओं को 'आटि' के रूप में दिखाई दी, और उन्हीं असुरों को 'बक' के रूप में दिखाई दी।

श्लोक 9 (skanda.8.116.9)

तेषां पणोभवत्तत्र राज्यं प्रति महामुने । यो नो जितः स नो दासो जेता स्वामी भवत्विति

teṣāṁ paṇobhavattatra rājyaṁ prati mahāmune | yo no jitaḥ sa no dāso jetā svāmī bhavatviti

हे महामुने! वहाँ उनके बीच राज्य को लेकर यह शर्त हुई - हममें से जो पराजित हो, वह हमारा दास हो; जो विजयी हो, वही स्वामी बने।

श्लोक 10 (skanda.8.116.10)

ततस्सा ह्याटिरूपेण सर्वेभ्यो दर्शनं ददौ । ततस्ते विजिता देवाः प्रोचुर्ना स्म जिता इति

tatassā hyāṭirūpeṇa sarvebhyo darśanaṁ dadau | tataste vijitā devāḥ procurnā sma jitā iti

तब उसने सबको 'आटि' के ही रूप में दर्शन दिया। फिर भी, देवताओं को (असुरों द्वारा) पराजित कहे जाने पर, उन्होंने कहा - हम पराजित नहीं हुए।

श्लोक 11 (skanda.8.116.11)

बक एवैष सुव्यक्तं जिता यूयं न संशयः । नायमाटिर्बकोयं वै न बकश्चाटिरेव हि

baka evaiṣa suvyaktaṁ jitā yūyaṁ na saṁśayaḥ | nāyamāṭirbakoyaṁ vai na bakaścāṭireva hi

(असुरों ने कहा -) यह स्पष्टतः बक ही है; तुम निश्चय ही पराजित हो। यह आटि नहीं, बक ही है; और बक नहीं, आटि ही है (ऐसा विवाद दोनों ओर से चलता रहा)।

श्लोक 12 (skanda.8.116.12)

एवं विवदतां युद्धमभवद्राज्यकारणात् । तेषां दानवमुख्यानां देवैस्सह भयावहम्

evaṁ vivadatāṁ yuddhamabhavadrājyakāraṇāt | teṣāṁ dānavamukhyānāṁ devaissaha bhayāvaham

इस प्रकार विवाद करते हुए उन प्रमुख दानवों का देवताओं के साथ राज्य के कारण एक भयंकर युद्ध हो गया।

श्लोक 13 (skanda.8.116.13)

वर्षाणां वै सहस्रं तु हतो यत्र विरोचनः । हते विरोचने ब्रह्मा बलिं तेषां महासुरम्

varṣāṇāṁ vai sahasraṁ tu hato yatra virocanaḥ | hate virocane brahmā baliṁ teṣāṁ mahāsuram

वह युद्ध सहस्र वर्षों तक चला, जिसमें विरोचन मारा गया। विरोचन के मारे जाने पर ब्रह्मा ने उन (दानवों) के महासुर बलि को -

श्लोक 14 (skanda.8.116.14)

अभ्यषेचयदिन्द्रत्वे स च राजा बभूव ह । ततस्स लोकांस्त्रीन् व्यास बलेनाक्रामदव्ययः

abhyaṣecayadindratve sa ca rājā babhūva ha | tatassa lokāṁstrīn vyāsa balenākrāmadavyayaḥ

- इन्द्र-पद पर अभिषिक्त किया, और वह राजा बन गया। हे व्यास! तब उस अविनाशी बलि ने अपने बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया।

श्लोक 15 (skanda.8.116.15)

त्रैलोक्यस्येश्वरश्चैव स जज्ञे ह्यसुरेश्वरः । जित्वा युद्धेन देवेन्द्रं स्थानादच्यावयत् प्रभुः

trailokyasyeśvaraścaiva sa jajñe hyasureśvaraḥ | jitvā yuddhena devendraṁ sthānādacyāvayat prabhuḥ

वह असुरेश्वर त्रिलोक का स्वामी बन गया। युद्ध में इन्द्र को जीतकर, उस प्रभु ने उसे उसके पद से हटा दिया।

श्लोक 16 (skanda.8.116.16)

इन्द्रत्वमकरोच्चैव यमत्वञ्च महाबलः । स एव वरुणश्चाभूद्धनेशोग्निस्तथैव च

indratvamakaroccaiva yamatvañca mahābalaḥ | sa eva varuṇaścābhūddhaneśognistathaiva ca

वह महाबली स्वयं इन्द्र भी बना और यम भी। वह स्वयं वरुण भी बना, धनेश (कुबेर) भी, तथा अग्नि भी।

श्लोक 17 (skanda.8.116.17)

आदित्यश्चैव सोमश्च पर्जन्यो वृष्टिसर्जनः । सर्वं जगति कर्तव्यं स एव कुरुते सदा

ādityaścaiva somaśca parjanyo vṛṣṭisarjanaḥ | sarvaṁ jagati kartavyaṁ sa eva kurute sadā

वह आदित्य भी बना, सोम भी, तथा वर्षा करने वाला पर्जन्य भी। संसार में जो कुछ भी करने योग्य कार्य था, वह सब वही सदा करता था।

श्लोक 18 (skanda.8.116.18)

एवं शासति वै राज्यं देवानामसुखं तदा । भ्रष्टैश्वर्या महात्मानो भ्रमन्ति शकुना इव

evaṁ śāsati vai rājyaṁ devānāmasukhaṁ tadā | bhraṣṭaiśvaryā mahātmāno bhramanti śakunā iva

जब वह इस प्रकार राज्य पर शासन करता था, तब देवताओं को दुःख हुआ। ऐश्वर्य से भ्रष्ट वे महात्मा पक्षियों के समान इधर-उधर भटकते रहे।

श्लोक 19 (skanda.8.116.19)

तेषां ब्रह्मा ददौ बुद्धिं दुःखितानां महात्मनाम् । आश्वास्य बहुधा व्यास कारुण्याद् देवसत्तमः

teṣāṁ brahmā dadau buddhiṁ duḥkhitānāṁ mahātmanām | āśvāsya bahudhā vyāsa kāruṇyād devasattamaḥ

हे व्यास! उन दुःखी महात्माओं को, करुणावश बहुत प्रकार से सान्त्वना देकर, वह देवश्रेष्ठ ब्रह्मा उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करने लगे।

श्लोक 20 (skanda.8.116.20)

ब्रह्मोवाच । देवा न शक्यो युष्माभिर्बलिरेष प्रवाधितुम् । महात्मा धार्मिकश्चायममरश्च न संशयः

brahmovāca | devā na śakyo yuṣmābhirbalireṣa pravādhitum | mahātmā dhārmikaścāyamamaraśca na saṁśayaḥ

ब्रह्मा ने कहा - हे देवो! यह बलि तुमसे बाधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह महात्मा है, धर्मात्मा है, और निश्चय ही अमर हो चुका है।

श्लोक 21 (skanda.8.116.21)

ब्रह्मण्यश्च बलीयाँश्च तथा लब्धवरश्च ह । तं गत्वा विप्ररूपेण विष्णुरेष प्रयाचतु

brahmaṇyaśca balīyām̐śca tathā labdhavaraśca ha | taṁ gatvā vipraḥrūpeṇa viṣṇureṣa prayācatu

वह ब्राह्मण-भक्त है, अत्यन्त बलवान् है, और उसने वर भी प्राप्त कर लिया है। उसके पास ब्राह्मण-रूप धारण कर विष्णु जाकर याचना करें।

श्लोक 22 (skanda.8.116.22)

वामनं रूपमास्थाय भूमेर्वै विक्रमत्रयम् । दास्यते स गृहीत्वा तत् क्रमतामेष सर्वशः

vāmanaṁ rūpamāsthāya bhūmervai vikramatrayam | dāsyate sa gṛhītvā tat kramatāmeṣa sarvaśaḥ

वामन-रूप धारण करके, वह पृथ्वी के तीन पग माँगे; वह इसे स्वीकार करके देगा, और यह विष्णु सर्वथा उतने पग नाप ले।

श्लोक 23 (skanda.8.116.23)

भूमिं क्रमसमां सर्वं करिष्यति न संशयः । क्रमं द्वितीयं धातास्य अन्तरिक्षे ततः स्वयम्

bhūmiṁ kramasamāṁ sarvaṁ kariṣyati na saṁśayaḥ | kramaṁ dvitīyaṁ dhātāsya antarikṣe tataḥ svayam

वह निश्चय ही सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने एक ही पग के बराबर कर लेगा। उसके दूसरे पग को, अन्तरिक्ष में, मैं स्वयं धारण करूँगा -

श्लोक 24 (skanda.8.116.24)

अहं चैव प्रदास्यामि तृतीयं क्रममित्युत । एवं वो राज्यलाभोयं दृश्यते नान्यथा सुराः

ahaṁ caiva pradāsyāmi tṛtīyaṁ kramamityuta | evaṁ vo rājyalābhoyaṁ dṛśyate nānyathā surāḥ

- और मैं ही उसे तीसरा पग भी दूँगा। हे देवो! इसी प्रकार तुम्हें राज्य की पुनःप्राप्ति दिखाई देती है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 25 (skanda.8.116.25)

यस्मिन्काले प्रक्रमते विष्णुरेष त्रिविष्टपम् । तस्मिन्काले च रक्षध्वं सर्वयत्नेन दानवान्

yasminkāle prakramate viṣṇureṣa triviṣṭapam | tasminkāle ca rakṣadhvaṁ sarvayatnena dānavān

जिस समय यह विष्णु स्वर्ग (त्रिविष्टप) की ओर पग बढ़ाए, उस समय तुम सब अपने पूर्ण प्रयत्न से दानवों से (उनकी) रक्षा करना।

श्लोक 26 (skanda.8.116.26)

सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता देवेशा निश्चित्य बहुधा शुभम् । विष्णुमूचुर्महासत्वाः क्रियतां ब्रह्मणो वचः

sanatkumāra uvāca | ta evamuktā deveśā niścitya bahudhā śubham | viṣṇumūcurmahāsatvāḥ kriyatāṁ brahmaṇo vacaḥ

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार आज्ञप्त होकर, वे महासत्त्वशाली देवेश्वर, इस शुभ योजना पर बहुत विचार करके, विष्णु से बोले - ब्रह्मा के वचन का पालन किया जाए।

श्लोक 27 (skanda.8.116.27)

दीक्षितश्चासुरश्रेष्ठो हयमेधेन सोद्य वै । कल्यं चावभृथं तस्य गत्वा याचस्व तं प्रभो

dīkṣitaścāsuraśreṣṭho hayamedhena sodya vai | kalyaṁ cāvabhṛthaṁ tasya gatvā yācasva taṁ prabho

उस असुरश्रेष्ठ ने अभी अश्वमेध यज्ञ के लिए दीक्षा ली है, और कल उसका अवभृथ-स्नान होगा। हे प्रभो! उसके पास जाकर उससे याचना करो।

श्लोक 28 (skanda.8.116.28)

सनत्कुमार उवाच । एवमस्त्विति तेनोक्ता देवा युद्धाय दंशिताः । अतिष्ठन्त तदा सर्वे शक्रं कृत्वा पुरस्सरम्

sanatkumāra uvāca | evamastviti tenoktā devā yuddhāya daṁśitāḥ | atiṣṭhanta tadā sarve śakraṁ kṛtvā purassaram

सनत्कुमार ने कहा - 'ऐसा ही हो' कहकर, उससे कहे गए वचन के अनुसार, देवगण शस्त्र धारण कर युद्ध के लिए इन्द्र को आगे कर सभी वहाँ खड़े हो गए।

श्लोक 29 (skanda.8.116.29)

नारदोथ तदा गत्वा पूजितस्तेन भक्तितः । सुखोपविष्टः प्राहेदं वचनं वदतां वरः

nāradotha tadā gatvā pūjitastena bhaktitaḥ | sukhopaviṣṭaḥ prāhedaṁ vacanaṁ vadatāṁ varaḥ

तब नारद वहाँ गए, और बलि द्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होकर, सुखपूर्वक बैठे हुए, उन वक्ताओं में श्रेष्ठ नारद ने यह वचन कहा -

श्लोक 30 (skanda.8.116.30)

धर्मेण तव तुष्टोहमृषयश्च तपोधनाः । अनासुरमिद वृत्तं तव दानवसत्तम

dharmeṇa tava tuṣṭohamṛṣayaśca tapodhanāḥ | anāsuramida vṛttaṁ tava dānavasattama

हे दानवश्रेष्ठ! मैं और तपोधन ऋषि तुम्हारे धर्म से प्रसन्न हैं। तुम्हारा यह आचरण असुरोचित नहीं, बल्कि (देवोचित) है।

श्लोक 31 (skanda.8.116.31)

सर्वे हि दानवाः क्रूराः ब्रह्मघ्ना लोककण्टकाः । त्वं तु ब्राह्मणभक्तश्च लोकानां हितकृत्तथा

sarve hi dānavāḥ krūrāḥ brahmaghnā lokakaṇṭakāḥ | tvaṁ tu brāhmaṇabhaktaśca lokānāṁ hitakṛttathā

सभी दानव क्रूर, ब्रह्महत्यारे और लोक के लिए कण्टक-स्वरूप होते हैं। किन्तु तुम ब्राह्मण-भक्त हो और लोकों के हितकारी भी हो।

श्लोक 32 (skanda.8.116.32)

तस्मात्तव शुभं चिन्त्यं सदैवासुरपुङ्गव । यथा च ते शुभं किञ्चित् स्याद् राजन्नित्यमेव हि

tasmāttava śubhaṁ cintyaṁ sadaivāsurapuṅgava | yathā ca te śubhaṁ kiñcit syād rājannityameva hi

अतः, हे असुरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे कल्याण की सदा चिन्ता करता हूँ। हे राजन्! तुम्हारा सदा ही कुछ न कुछ मंगल हो, ऐसी मेरी इच्छा है।

श्लोक 33 (skanda.8.116.33)

एष देवैः प्रणिहितो विष्णुर्विप्रत्वमास्थितः । त्रीँस्त्वा राज्यार्थमुद्युक्तः प्रार्थयिष्यति विक्रमान्

eṣa devaiḥ praṇihito viṣṇurvipratvamāsthitaḥ | trīm̐stvā rājyārthamudyuktaḥ prārthayiṣyati vikramān

यह विष्णु, ब्राह्मण-रूप धारण करके, देवताओं द्वारा भेजा गया है; यह राज्य पाने के उद्देश्य से तत्पर होकर तुमसे तीन पग माँगेगा।

श्लोक 34 (skanda.8.116.34)

तन्न तस्य त्वया देयं राज्यं पश्चान्न ते भवेत् । अतः परं भवान् राजन् प्रमाणमसुरेश्वर

tanna tasya tvayā deyaṁ rājyaṁ paścānna te bhavet | ataḥ paraṁ bhavān rājan pramāṇamasureśvara

अतः उसे कुछ भी मत देना, अन्यथा बाद में तुम्हारा राज्य नहीं रहेगा। इससे आगे, हे राजन्! हे असुरेश्वर! तुम स्वयं ही प्रमाण हो (निर्णय तुम्हारा ही है)।

श्लोक 35 (skanda.8.116.35)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा बलिर्वैरोचनिस्तदा । उवाच प्रणतो व्यास नारदं दानवेश्वरः

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā balirvairocanistadā | uvāca praṇato vyāsa nāradaṁ dānaveśvaraḥ

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! उसके इस वचन को सुनकर, विरोचन-पुत्र बलि, दानवेश्वर, प्रणाम करते हुए नारद से बोला -

श्लोक 36 (skanda.8.116.36)

शत्रवस्ते मम दृढं तेषां चाहं महामुने । यदि ते मां प्रयाचन्ते कृतार्थोस्मि ततो ननु

śatravaste mama dṛḍhaṁ teṣāṁ cāhaṁ mahāmune | yadi te māṁ prayācante kṛtārthosmi tato nanu

हे महामुने! वे निश्चय ही मेरे शत्रु हैं, और मैं भी उनका शत्रु हूँ। किन्तु यदि वे मुझसे याचना करें, तो मैं अवश्य ही कृतार्थ हो जाऊँगा।

श्लोक 37 (skanda.8.116.37)

स्वधर्मं संपरित्यज्य यदि चेन्मधुसूदनः । मां प्रयाचति दीनात्मा सफलं जीवितं मम

svadharmaṁ saṁparityajya yadi cenmadhusūdanaḥ | māṁ prayācati dīnātmā saphalaṁ jīvitaṁ mama

यदि मधुसूदन (विष्णु) अपने धर्म को त्यागकर, दीन-मन होकर मुझसे याचना करेंगे, तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा।

श्लोक 38 (skanda.8.116.38)

व्रतं चेदं मम ब्रह्मन् सदैव हि महामुने । याचितो न ददामीति न वदेयमिति प्रभो

vrataṁ cedaṁ mama brahman sadaiva hi mahāmune | yācito na dadāmīti na vadeyamiti prabho

हे ब्रह्मन्! हे महामुने! हे प्रभो! यह मेरा सदा का व्रत है कि याचना किए जाने पर मैं कभी 'नहीं दूँगा' ऐसा नहीं कहता।

श्लोक 39 (skanda.8.116.39)

उर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति याचतो विप्रसत्तम । ब्रुवतो न ददामीति नरकायोत्क्रमन्त्यथ

ūrdhvaṁ prāṇā hyutkrāmanti yācato viprasattama | bruvato na dadāmīti narakāyotkramantyatha

हे विप्रश्रेष्ठ! जब कोई याचना करता है, तब प्राण ऊपर उठने लगते हैं; किन्तु जब कोई 'नहीं दूँगा' कहता है, तब वे प्राण नरक की ओर उठने लगते हैं।

श्लोक 40 (skanda.8.116.40)

देहीति रुदितस्याख्या नास्तीति प्रतिरोदना । मा मां नारद पश्यन्तु रुदन्तमितरे जनाः

dehīti ruditasyākhyā nāstīti pratirodanā | mā māṁ nārada paśyantu rudantamitare janāḥ

'दो' कहना ही रोने का नाम है, और 'नहीं है' कहना उसका प्रतिवाद-रोना है। हे नारद! अन्य लोग मुझे रोता हुआ न देखें (अर्थात् मैं कभी 'नहीं' कहकर स्वयं को रुलाना नहीं चाहता)।

श्लोक 41 (skanda.8.116.41)

एषा भवति सर्वस्य पुरुषस्य महामुने । याचतो मम दातायमिच्छा तद्ध्यक्षयं फलम्

eṣā bhavati sarvasya puruṣasya mahāmune | yācato mama dātāyamicchā taddhyakṣayaṁ phalam

हे महामुने! प्रत्येक पुरुष की यही इच्छा होती है - याचना करने वाले को देने वाला मैं ही बनूँ; और यही अक्षय फल देने वाली इच्छा है।

श्लोक 42 (skanda.8.116.42)

सोहं यदि न दास्यामि शत्रुभ्यो याचितं महत् । नरकं रौरवं नाम प्रतिपत्स्याम्यसंशयम्

sohaṁ yadi na dāsyāmi śatrubhyo yācitaṁ mahat | narakaṁ rauravaṁ nāma pratipatsyāmyasaṁśayam

यदि मैं शत्रुओं द्वारा माँगी गई महान् वस्तु भी न दूँ, तो मैं निश्चय ही रौरव नामक नरक को प्राप्त होऊँगा।

श्लोक 43 (skanda.8.116.43)

यो हि वै याचमानाय न ददाति नराधमः । स तं हिनस्ति याचन्तमाशाच्छेदान्न संशयः

yo hi vai yācamānāya na dadāti narādhamaḥ | sa taṁ hinasti yācantamāśācchedānna saṁśayaḥ

जो नराधम याचना करने वाले को नहीं देता, वह उसकी आशा को काटकर, उस याचक की हत्या ही करता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 44 (skanda.8.116.44)

भबान्मम पिता व्यक्तं पुत्रः स्नेहकृतो ह्यहम् । नाहं न दास्ये विप्रेन्द्र निर्वृतिस्ते भवत्वियम्

bhabānmama pitā vyaktaṁ putraḥ snehakṛto hyaham | nāhaṁ na dāsye viprendra nirvṛtiste bhavatviyam

आप स्पष्ट रूप से मेरे पिता के समान हैं, और स्नेहवश मैं आपका पुत्र हूँ। हे विप्रेन्द्र! मैं नहीं देने से इनकार नहीं करूँगा - आपको यह संतोष प्राप्त हो।

श्लोक 45 (skanda.8.116.45)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स तं तदामन्त्र्य तेन चैव सुपूजितः । दिवमक्रामदव्यग्रश्चिन्तयानः कथं भवेत्

sanatkumāra uvāca | tatassa taṁ tadāmantrya tena caiva supūjitaḥ | divamakrāmadavyagraścintayānaḥ kathaṁ bhavet

सनत्कुमार ने कहा - तब उससे विदा लेकर, और उसके द्वारा भली-भाँति पूजित होकर, नारद अविचलित मन से यह सोचते हुए कि यह कैसे होगा, स्वर्ग की ओर चले गए।

श्लोक 46 (skanda.8.116.46)

गतेथ तस्मिन्दिवसे रजन्यां स महायशाः । विष्णुर्वामनरूपेण विप्रो भूत्वा तमर्थयत्

gatetha tasmindivase rajanyāṁ sa mahāyaśāḥ | viṣṇurvāmanarūpeṇa vipro bhūtvā tamarthayat

वह दिन बीत जाने पर, रात्रि में, वह महायशस्वी विष्णु वामन-रूप में ब्राह्मण बनकर उससे याचना करने गए।

श्लोक 47 (skanda.8.116.47)

स चापि राजा विप्रेन्द्र रत्नानि च वसूनि च । ग्रामान्दासीश्च महिषीर्गवाश्वान् रथहस्तिनः

sa cāpi rājā viprendra ratnāni ca vasūni ca | grāmāndāsīśca mahiṣīrgavāśvān rathahastinaḥ

वह राजा भी हर आते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण को रत्न, धन, गाँव, दासियाँ, भैंसें, गौएँ, घोड़े, रथ और हाथी,

श्लोक 48 (skanda.8.116.48)

वाहनानि च चित्राणि सुवर्णं शयनानि च । शय्यास्तरणवस्त्राणि भूषणानि गृहाणि च

vāhanāni ca citrāṇi suvarṇaṁ śayanāni ca | śayyāstaraṇavastrāṇi bhūṣaṇāni gṛhāṇi ca

तथा विचित्र सवारियाँ, स्वर्ण, शय्याएँ, बिछौने, वस्त्र, आभूषण और घर -

श्लोक 49 (skanda.8.116.49)

यं यमर्थयते विप्रो यावद्यश्च यथा यथा । तथा तथा स दैत्येन्द्रो ददात्येवाविचारयन्

yaṁ yamarthayate vipro yāvadyaśca yathā yathā | tathā tathā sa daityendro dadātyevāvicārayan

जो ब्राह्मण जो कुछ, जितना और जिस प्रकार माँगता था, उस दैत्येन्द्र ने बिना विचार किए, उसी प्रकार, उसे उतना ही दिया।

श्लोक 50 (skanda.8.116.50)

तं तथा वर्तमानं तु वामनः सुमहायशाः । प्राह मह्यं प्रयच्छस्व यदहं प्रब्रवीमि ते

taṁ tathā vartamānaṁ tu vāmanaḥ sumahāyaśāḥ | prāha mahyaṁ prayacchasva yadahaṁ prabravīmi te

इस प्रकार उदार आचरण करते हुए उस राजा से, अत्यन्त यशस्वी वामन ने कहा - मुझे वही दे दो, जो मैं तुमसे कहूँगा।

श्लोक 51 (skanda.8.116.51)

स तमर्घेण पाद्येन आसनादिभिरेव च । संपूज्यैवाब्रवीद् ब्रूहि यत्तवेष्टं द्विजोत्तम

sa tamargheṇa pādyena āsanādibhireva ca | saṁpūjyaivābravīd brūhi yattaveṣṭaṁ dvijottama

अर्घ्य, पाद्य और आसन आदि से उसका सत्कार करके, राजा ने कहा - हे द्विजोत्तम! जो तुम्हें इष्ट हो, वह कहो।

श्लोक 52 (skanda.8.116.52)

वामन उवाच । यदि प्रयच्छसे राजन् याचमानाय कामतः । ततो ब्रवीम्यन्यथा तु न वक्ष्याम्यसुरेश्वर

vāmana uvāca | yadi prayacchase rājan yācamānāya kāmataḥ | tato bravīmyanyathā tu na vakṣyāmyasureśvara

वामन ने कहा - हे राजन्! यदि तुम याचक को उसकी इच्छानुसार देने को तैयार हो, तभी मैं कहूँगा; अन्यथा, हे असुरेश्वर! मैं नहीं कहूँगा।

श्लोक 53 (skanda.8.116.53)

बलिरुवाच । ज्ञात्वार्थं प्रतिजानीयां देयं ब्राह्मण तद्यदि । दातुं च शक्यं तत् स्यात्तु ततोहं दातुमुत्सहे

baliruvāca | jñātvārthaṁ pratijānīyāṁ deyaṁ brāhmaṇa tadyadi | dātuṁ ca śakyaṁ tat syāttu tatohaṁ dātumutsahe

बलि ने कहा - हे ब्राह्मण! प्रयोजन जानकर ही मैं प्रतिज्ञा करूँगा, कि यदि वह देने योग्य हो और देना संभव भी हो, तभी मैं देने का उत्साह रखता हूँ।

श्लोक 54 (skanda.8.116.54)

वामन उवाच । प्रतिज्ञा भवतो नित्यमियं ह्यसुरसत्तम । यद्यत्प्रयाचते विप्रो दद्यां तत्तदहं त्विति

vāmana uvāca | pratijñā bhavato nityamiyaṁ hyasurasattama | yadyatprayācate vipro dadyāṁ tattadahaṁ tviti

वामन ने कहा - हे असुरश्रेष्ठ! यह तुम्हारी सदा की प्रतिज्ञा है कि 'ब्राह्मण जो-जो माँगे, वह-वह मैं दूँगा'।

श्लोक 55 (skanda.8.116.55)

दीक्षितश्चाश्वमेधेन त्वं ददास्यसुराधिप । यद्यत् प्रयाचते विप्रस्तत्तद्दत्से न संशयः

dīkṣitaścāśvamedhena tvaṁ dadāsyasurādhipa | yadyat prayācate viprastattaddatse na saṁśayaḥ

हे असुराधिप! तुम अश्वमेध की दीक्षा में हो, और जो-जो ब्राह्मण माँगे, तुम वह-वह देते हो, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 56 (skanda.8.116.56)

सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो निश्चित्य पुनरेवाह तं नृपः । प्रहस्य सुमहावीर्यं इदं वचनकोविदः

sanatkumāra uvāca | sa evamukto niścitya punarevāha taṁ nṛpaḥ | prahasya sumahāvīryaṁ idaṁ vacanakovidaḥ

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार कहे जाने पर, वह राजा, फिर से विचार करके, वाक्य-कुशल होकर मुस्कुराते हुए उस महापराक्रमी (वामन) से यह बोला -

श्लोक 57 (skanda.8.116.57)

बलिरुवाच । भवान् विष्णुर्विप्ररूपी छद्मना मां प्रयाचसे । क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य कार्पण्यं च प्रभाषसे

baliruvāca | bhavān viṣṇurvipraḥrūpī chadmanā māṁ prayācase | kṣatradharmaṁ samutsṛjya kārpaṇyaṁ ca prabhāṣase

बलि ने कहा - आप ब्राह्मण-रूप धारण किए हुए विष्णु हैं, और छल से मुझसे याचना कर रहे हैं। आप क्षत्रधर्म को त्यागकर कृपणता की बात कर रहे हैं।

श्लोक 58 (skanda.8.116.58)

दीनानामपि सर्वेषामहं दद्यां प्रयाचितः । राज्यं विना हि देवाय तुभ्यं दास्ये यथेप्सितम्

dīnānāmapi sarveṣāmahaṁ dadyāṁ prayācitaḥ | rājyaṁ vinā hi devāya tubhyaṁ dāsye yathepsitam

सभी दीन जनों को भी माँगने पर मैं देता हूँ। हे देव! राज्य को छोड़कर, तुम्हें जो कुछ इच्छित हो, वह मैं दूँगा।

श्लोक 59 (skanda.8.116.59)

वामन उवाच । सत्यमेतदहं विष्णुर्हृतराज्या वयं त्वया । न राज्येद्य स्पृहास्माकं निःस्पृहा हि ततो वयम् । गृहं त्वां संप्रयाचाम यत्र वत्स्यामि निर्वृतः

vāmana uvāca | satyametadahaṁ viṣṇurhṛtarājyā vayaṁ tvayā | na rājyedya spṛhāsmākaṁ niḥspṛhā hi tato vayam | gṛhaṁ tvāṁ saṁprayācāma yatra vatsyāmi nirvṛtaḥ

वामन ने कहा - यह सत्य है, मैं ही विष्णु हूँ, और तुमने हमारा राज्य हर लिया है। किन्तु अब हमें राज्य की स्पृहा नहीं है, हम उसके प्रति निःस्पृह हैं। मैं तो तुमसे एक घर माँग रहा हूँ, जहाँ मैं संतुष्ट होकर निवास करूँ।

श्लोक 60 (skanda.8.116.60)

बलिरुवाच । किंप्रमाणं गृहं तद्वै प्रयाचसि सुरेश्वर । कीदृशं क्व च तद् दास्ये ब्रूहि वामन सर्वशः

baliruvāca | kiṁpramāṇaṁ gṛhaṁ tadvai prayācasi sureśvara | kīdṛśaṁ kva ca tad dāsye brūhi vāmana sarvaśaḥ

बलि ने कहा - हे सुरेश्वर! तुम किस माप का घर माँग रहे हो? हे वामन! वह कैसा हो, और कहाँ हो - जो मैं दूँ - यह सब मुझे बताओ।

श्लोक 61 (skanda.8.116.61)

वामन उवाच । सर्वभूमिगुणैर्युक्तं यत्र तत्र महागृहम् । मम क्रमैस्त्रिभिर्युक्तं दत्स्व राजन् गृहार्थिने

vāmana uvāca | sarvabhūmiguṇairyuktaṁ yatra tatra mahāgṛham | mama kramaistribhiryuktaṁ datsva rājan gṛhārthine

वामन ने कहा - जहाँ कहीं भी हो, सब भूमि के गुणों से युक्त, मेरे तीन पगों जितने विस्तार का, वही महागृह मुझ घर-चाहने वाले को दे दो, हे राजन्!

श्लोक 62 (skanda.8.116.62)

सनत्कुमार उवाच । अथ शुक्रस्तदा व्यास बलिं प्राह महातपाः । न दातव्यं महाराज विष्णुरेव महाबलः

sanatkumāra uvāca | atha śukrastadā vyāsa baliṁ prāha mahātapāḥ | na dātavyaṁ mahārāja viṣṇureva mahābalaḥ

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब महातपस्वी शुक्राचार्य ने बलि से कहा - हे महाराज! यह मत दो, यह तो स्वयं महाबली विष्णु ही है।

श्लोक 63 (skanda.8.116.63)

अयं स हन्ता सर्वेषां दानवानां दुरासदः । छद्मनैवमिहायातो विष्णुरेनं विसर्जय

ayaṁ sa hantā sarveṣāṁ dānavānāṁ durāsadaḥ | chadmanaivamihāyāto viṣṇurenaṁ visarjaya

यह वही अजेय विष्णु है, जो समस्त दानवों का संहारक है। वह इस प्रकार छल से यहाँ आया है - इसे विदा कर दो।

श्लोक 64 (skanda.8.116.64)

अनादृत्य वचस्तस्य प्रोवाच दितिनन्दनः । दास्ये तुभ्यं गृहं विष्णो यादृशं त्वं प्रयाचसे

anādṛtya vacastasya provāca ditinandanaḥ | dāsye tubhyaṁ gṛhaṁ viṣṇo yādṛśaṁ tvaṁ prayācase

उसके इस वचन का अनादर करते हुए, दिति के पुत्र (बलि) ने कहा - हे विष्णु! मैं तुम्हें वही घर दूँगा, जैसा तुम माँग रहे हो।

श्लोक 65 (skanda.8.116.65)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रोवाच मधुसूदनः । बलिं राजानमनघं सर्वेषामेव सन्निधौ

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā provāca madhusūdanaḥ | baliṁ rājānamanaghaṁ sarveṣāmeva sannidhau

सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर, मधुसूदन ने सबके समक्ष उस निष्पाप राजा बलि से कहा -

श्लोक 66 (skanda.8.116.66)

वामन उवाच । साध्यो देवोहमनघ धर्मपुत्रो दितेः सुत । ततः प्रतिग्रहे दोषो न ममास्ति महाबल

vāmana uvāca | sādhyo devohamanagha dharmaputro diteḥ suta | tataḥ pratigrahe doṣo na mamāsti mahābala

वामन ने कहा - हे निष्पाप! हे दिति के पुत्र! मैं साध्य नामक देव, धर्म का पुत्र हूँ। अतः, हे महाबल! (यह दान) स्वीकार करने में मुझे कोई दोष नहीं है।

श्लोक 67 (skanda.8.116.67)

यदि देयं गृहं मध्यं पश्चात् तापो न ते यदि । हस्ते मम जलं राजन् पातयस्वासुरेश्वर

yadi deyaṁ gṛhaṁ madhyaṁ paścāt tāpo na te yadi | haste mama jalaṁ rājan pātayasvāsureśvara

यदि यह घर अवश्य ही देने योग्य है, और यदि बाद में तुम्हें पश्चाताप न हो, तो, हे राजन्! हे असुरेश्वर! मेरे हाथ में जल डालो।

श्लोक 68 (skanda.8.116.68)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स बाढमित्युक्त्वा भृङ्गारेण महाबलः । प्रदातुमुपचक्राम वामनाय गृहं महत्

sanatkumāra uvāca | tatassa bāḍhamityuktvā bhṛṅgāreṇa mahābalaḥ | pradātumupacakrāma vāmanāya gṛhaṁ mahat

सनत्कुमार ने कहा - तब वह महाबली, 'ऐसा ही हो' कहकर, कलश से जल डालते हुए वामन को वह महान् गृह देने के लिए उद्यत हुआ।

श्लोक 69 (skanda.8.116.69)

अथ ते दानवाः क्रूराः प्रतिषेधनलालसाः । आजग्मुर्भृशमायत्ता बलिं प्रति महामुने

atha te dānavāḥ krūrāḥ pratiṣedhanalālasāḥ | ājagmurbhṛśamāyattā baliṁ prati mahāmune

हे महामुने! तब वे क्रूर दानव, जो इसे रोकने के लिए उत्सुक थे, अत्यन्त तत्पर होकर बलि के पास आए।

श्लोक 70 (skanda.8.116.70)

प्रह्लादो भ्रातृभिः सार्धं मयो जम्भोर्द्धलोचनः । विप्रचित्तिश्च विक्रान्त अन्ये च सुमहाबलाः

prahlādo bhrātṛbhiḥ sārdhaṁ mayo jambhorddhalocanaḥ | vipracittiśca vikrānta anye ca sumahābalāḥ

प्रह्लाद अपने भाइयों सहित, मय, ऊर्ध्वलोचन जम्भ, पराक्रमी विप्रचित्ति, तथा अन्य महाबली दानव -

श्लोक 71 (skanda.8.116.71)

ऊचुस्ते तं तदा गत्वा कृत्वा प्रह्लादमग्रतः । बलिं वैरोचनिं व्यास चिन्तयन्तः पराभवम्

ūcuste taṁ tadā gatvā kṛtvā prahlādamagrataḥ | baliṁ vairocaniṁ vyāsa cintayantaḥ parābhavam

हे व्यास! वे सब, प्रह्लाद को आगे करके, विरोचन-पुत्र बलि के पास जाकर, उसके पराभव की आशंका करते हुए, उससे बोले -

श्लोक 72 (skanda.8.116.72)

प्रह्लाद उवाच । किमिदं पुत्र दुर्बुद्धे त्वया व्यवसितं महत् । नाशनं दितिपुत्राणां नैतत् कार्यं महाबल

prahlāda uvāca | kimidaṁ putra durbuddhe tvayā vyavasitaṁ mahat | nāśanaṁ ditiputrāṇāṁ naitat kāryaṁ mahābala

प्रह्लाद ने कहा - हे दुर्बुद्धि पुत्र! तुमने यह क्या बड़ा निश्चय कर लिया है? यह तो दिति-पुत्रों के विनाश का कारण है; हे महाबल! यह कार्य मत करो।

श्लोक 73 (skanda.8.116.73)

विष्णुरेव महामायो दुरात्मा दैत्यघातकः । लोकत्रयमपि ह्येष क्रमिष्यति न संशयः

viṣṇureva mahāmāyo durātmā daityaghātakaḥ | lokatrayamapi hyeṣa kramiṣyati na saṁśayaḥ

यह तो स्वयं विष्णु ही है, महामायावी, दैत्यों का घातक। यह निश्चय ही तीनों लोकों को अपने पगों से नाप लेगा।

श्लोक 74 (skanda.8.116.74)

त्वमस्माकं गतिः पुत्र त्वं वीर्यं त्वं पराक्रमः । त्वयि जीवितमायत्तं मा नः क्षिप्रं विनाशय

tvamasmākaṁ gatiḥ putra tvaṁ vīryaṁ tvaṁ parākramaḥ | tvayi jīvitamāyattaṁ mā naḥ kṣipraṁ vināśaya

हे पुत्र! तुम्हीं हमारी गति हो, तुम्हीं हमारा वीर्य हो, तुम्हीं हमारा पराक्रम हो। हमारा जीवन तुम पर ही निर्भर है; हमें शीघ्र विनष्ट मत करो।

श्लोक 75 (skanda.8.116.75)

हिरण्यकशिपू राजा हिरण्याक्षश्च दानवः । तव राज्ञः कलां पुत्र नार्घतः षोडशीमपि

hiraṇyakaśipū rājā hiraṇyākṣaśca dānavaḥ | tava rājñaḥ kalāṁ putra nārghataḥ ṣoḍaśīmapi

राजा हिरण्यकशिपु और दानव हिरण्याक्ष, हे पुत्र! तुम्हारे राज्य की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं थे।

श्लोक 76 (skanda.8.116.76)

मैतस्य विबुधस्य त्वं गृहं दत्स्व ब्रवीम्यहम् । एतद्धि श्रेयः सर्वेषां तव चैव महाबल

maitasya vibudhasya tvaṁ gṛhaṁ datsva bravīmyaham | etaddhi śreyaḥ sarveṣāṁ tava caiva mahābala

मैं कहता हूँ कि तुम इस देव को घर मत दो। हे महाबल! यही सबके तथा तुम्हारे भी लिए श्रेयस्कर है।

श्लोक 77 (skanda.8.116.77)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रह्लादस्य महात्मनः । बलिः प्रणम्य धर्मात्मा इदमाह महायशाः

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā prahlādasya mahātmanaḥ | baliḥ praṇamya dharmātmā idamāha mahāyaśāḥ

सनत्कुमार ने कहा - उस महात्मा प्रह्लाद के इस वचन को सुनकर, धर्मात्मा, यशस्वी बलि ने प्रणाम करके यह कहा -

श्लोक 78 (skanda.8.116.78)

बलिरुवाच । जानेहं विबुधोयं वै विष्णुः सर्वासुरान्तकः । प्रतिज्ञैव ममेयं हि दातव्यं याचितेन मे

baliruvāca | jānehaṁ vibudhoyaṁ vai viṣṇuḥ sarvāsurāntakaḥ | pratijñaiva mameyaṁ hi dātavyaṁ yācitena me

बलि ने कहा - मैं जानता हूँ कि यह देव, सब असुरों का अन्तक, विष्णु ही है। किन्तु मेरी यह प्रतिज्ञा है कि जो भी मुझसे याचना करे, उसे मुझे अवश्य देना है।

श्लोक 79 (skanda.8.116.79)

अहं दानपतिः ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । कथं तदन्यथा कुर्याञ्जीविते सति दानवाः

ahaṁ dānapatiḥ khyātastriṣu lokeṣu viśrutaḥ | kathaṁ tadanyathā kuryāñjīvite sati dānavāḥ

हे दानवो! मैं दान का स्वामी कहलाता हूँ, तीनों लोकों में प्रसिद्ध हूँ। मैं अपने जीवन के रहते हुए भी उसे अन्यथा कैसे करूँ?

श्लोक 80 (skanda.8.116.80)

अधर्म्यमयशस्यञ्च अस्वर्ग्यं भयदं महत् । कथं नामानृतं कुर्यामिति मे व्रतमाहितम् । प्रतिश्रुत्य कथं भूयोसुरास्ते धर्मकारणात्

adharmyamayaśasyañca asvargyaṁ bhayadaṁ mahat | kathaṁ nāmānṛtaṁ kuryāmiti me vratamāhitam | pratiśrutya kathaṁ bhūyosurāste dharmakāraṇāt

अधर्म्य, अपयशकारी, स्वर्ग-विरोधी, तथा महाभयदायक - मैं ऐसा असत्य कैसे करूँ? यही मेरा व्रत निश्चित है। हे असुरो! एक बार प्रतिज्ञा करके, धर्म के कारण, इसे फिर कैसे तोड़ूँ?

श्लोक 81 (skanda.8.116.81)

प्रह्लाद उवाच । दानवानां सदैत्यानां पुत्र धर्मः स्वयं कृतः । अधर्मेण हि वर्धन्ते सदैव दितिदानवाः

prahlāda uvāca | dānavānāṁ sadaityānāṁ putra dharmaḥ svayaṁ kṛtaḥ | adharmeṇa hi vardhante sadaiva ditidānavāḥ

प्रह्लाद ने कहा - हे पुत्र! दानवों और दैत्यों का धर्म तो स्वयं ही रचा हुआ है। दिति के दानव सदा अधर्म से ही वृद्धि पाते हैं।

श्लोक 82 (skanda.8.116.82)

माया चैवानृतं चैव दम्भः सर्ववधस्तथा । यज्ञानां परिमोषश्च धर्म एष हि नः शुभः

māyā caivānṛtaṁ caiva dambhaḥ sarvavadhastathā | yajñānāṁ parimoṣaśca dharma eṣa hi naḥ śubhaḥ

माया, असत्य, दम्भ, सर्व-हिंसा, तथा यज्ञों को लूटना - यही हमारा शुभ धर्म है।

श्लोक 83 (skanda.8.116.83)

स त्वं प्रतिश्रुत्य विभो मा ददस्व दुरात्मने । तथा हि नो भवेद् वृद्धिरन्यथेह भयं महत्

sa tvaṁ pratiśrutya vibho mā dadasva durātmane | tathā hi no bhaved vṛddhirannyatheha bhayaṁ mahat

अतः, हे विभो! प्रतिज्ञा करके भी, इस दुरात्मा को मत दो। इसी से हमारी वृद्धि होगी; अन्यथा यहाँ महान् भय है।

श्लोक 84 (skanda.8.116.84)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा बलिर्निश्चिन्त्य बुद्धिमान् । उवाचासुरशार्दूल इदं वचनकोविदः

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā balirniścintya buddhimān | uvācāsuraśārdūla idaṁ vacanakovidaḥ

सनत्कुमार ने कहा - उसके इस वचन को सुनकर, बुद्धिमान् बलि ने भली-भाँति विचार करके, वाक्य-कुशल होकर उस असुरशार्दूल (प्रह्लाद) से यह कहा -

श्लोक 85 (skanda.8.116.85)

बलिरुवाच । य एष धर्मो धर्मेण भवद्भिः संप्रचोदितः । न ह्यस्य फलमानन्त्य क्रूरस्यासुरसत्तम

baliruvāca | ya eṣa dharmo dharmeṇa bhavadbhiḥ saṁpracoditaḥ | na hyasya phalamānantya krūrasyāsurasattama

बलि ने कहा - हे असुरश्रेष्ठ! आप सबके द्वारा प्रेरित यह जो 'धर्म' है, उस क्रूर धर्म का फल अनन्त नहीं है।

श्लोक 86 (skanda.8.116.86)

हिरण्यकशिपू राजा नात्यन्तं सुखमाप्तवान् । हिरण्याक्षस्तथा चैव अन्धकश्चैव तत्सुतः

hiraṇyakaśipū rājā nātyantaṁ sukhamāptavān | hiraṇyākṣastathā caiva andhakaścaiva tatsutaḥ

राजा हिरण्यकशिपु ने अन्ततः सुख नहीं पाया, और वैसे ही हिरण्याक्ष ने, तथा उसके पुत्र अन्धक ने भी नहीं।

श्लोक 87 (skanda.8.116.87)

भवान् पितामहोस्माकं तथा क्रूरेण कर्मणा । तस्मान्नेदं प्रशंसन्ति ये केचिद्विदुषो जनाः

bhavān pitāmahosmākaṁ tathā krūreṇa karmaṇā | tasmānnedaṁ praśaṁsanti ye kecidviduṣo janāḥ

आप हमारे पितामह हैं, और आप भी उसी क्रूर कर्म से (सुख न पा सके)। इसीलिए जो भी विद्वान् जन हैं, वे इस (क्रूर धर्म) की प्रशंसा नहीं करते।

श्लोक 88 (skanda.8.116.88)

ऋषयः पश्य सत्येन धर्मेण दिवि संस्थिताः । देवा जयन्ति चात्यर्थं ग्रहा दिव्यन्ति चैव हि

ṛṣayaḥ paśya satyena dharmeṇa divi saṁsthitāḥ | devā jayanti cātyarthaṁ grahā divyanti caiva hi

देखो, ऋषिगण सत्य और धर्म से ही स्वर्ग में स्थित हैं; देवगण अत्यन्त विजयी होते हैं, और ग्रह भी दीप्तिमान् रहते हैं।

श्लोक 89 (skanda.8.116.89)

न कश्चिद् दृश्यते व्योम्नि तथा क्रूरेण कर्मणा । प्रसादयन् क्षामये त्वां ब्रवीमि दितिजेश्वर

na kaścid dṛśyate vyomni tathā krūreṇa karmaṇā | prasādayan kṣāmaye tvāṁ bravīmi ditijeśvara

आकाश में क्रूर कर्म से कोई भी स्थित नहीं दिखता। हे दितिजेश्वर! मैं आपको प्रसन्न करते हुए, क्षमा माँगते हुए यह कह रहा हूँ।

श्लोक 90 (skanda.8.116.90)

प्रह्लाद उवाच । दुष्टं वाप्यथवा क्रूरं शोभनं वापि दानव । स्वकर्म न विमोक्तव्यं पारम्पर्यागतं महत्

prahlāda uvāca | duṣṭaṁ vāpyathavā krūraṁ śobhanaṁ vāpi dānava | svakarma na vimoktavyaṁ pāramparyāgataṁ mahat

प्रह्लाद ने कहा - हे दानव! चाहे वह दुष्ट हो, चाहे क्रूर हो, अथवा चाहे शुभ हो - परम्परा से चला आया अपना महान् धर्म कभी नहीं त्यागना चाहिए।

श्लोक 91 (skanda.8.116.91)

पितृभिश्चैव तथा चैव पितामहैः । आचीर्णं पुत्र नैतत्ते विमोक्तव्यं महामुने

pitṛbhiścaiva tathā caiva pitāmahaiḥ | ācīrṇaṁ putra naitatte vimoktavyaṁ mahāmune

[टिप्पणी: इस श्लोक की पहली पंक्ति का आरम्भिक अंश स्रोत में क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है।] ...जो हमारे पूर्वजों तथा पितामहों द्वारा आचरित किया गया है, हे पुत्र! उसे तुम्हें कभी त्यागना नहीं चाहिए।

श्लोक 92 (skanda.8.116.92)

बलिरुवाच । पितृभिर्हि यथा चीर्ण कर्तव्यं यदशङ्कितैः । गर्हितं यत् सतां चापि पितामह शृणुष्व मे

baliruvāca | pitṛbhirhi yathā cīrṇa kartavyaṁ yadaśaṅkitaiḥ | garhitaṁ yat satāṁ cāpi pitāmaha śṛṇuṣva me

बलि ने कहा - हे पितामह! जो कुछ पितरों द्वारा निर्भय होकर किया गया, क्या वह सब करने योग्य ही होता है? और जो सत्पुरुषों द्वारा निन्दित हो, उसे भी सुनिए - मुझसे सुनिए।

श्लोक 93 (skanda.8.116.93)

आसीदृषिरदीनात्मा वामदेव इति श्रुतः । तस्य दृष्टवोर्वशी मोहाद्रेतः स्कन्दो बभूव ह

āsīdṛṣiradīnātmā vāmadeva iti śrutaḥ | tasya dṛṣṭavorvaśī mohādretaḥ skando babhūva ha

वामदेव नाम से विख्यात एक निश्छल-मन ऋषि थे। उन्होंने उर्वशी को देखकर मोहवश स्खलित बीज छोड़ा।

श्लोक 94 (skanda.8.116.94)

तद् भूमावविद्धं वै चखाद वडवा किल । तस्या गर्भः समभवत् सद्यः सोश्वतरी भवत्

tad bhūmāvaviddhaṁ vai cakhāda vaḍavā kila | tasyā garbhaḥ samabhavat sadyaḥ sośvatarī bhavat

वह बीज भूमि पर बिना निशाना बने गिर पड़ा, जिसे एक घोड़ी ने चर लिया। उसे तत्काल गर्भ हो गया, और तुरन्त एक अश्वतरी (खच्चरी) उत्पन्न हुई।

श्लोक 95 (skanda.8.116.95)

तामृषिः स सुतस्नेहात् पुपोष बहुला समाः । अथागात्तत्र राजर्षिरष्टको नाम वीर्यवान्

tāmṛṣiḥ sa sutasnehāt pupoṣa bahulā samāḥ | athāgāttatra rājarṣiraṣṭako nāma vīryavān

वह ऋषि पुत्र-स्नेह से उसका पालन-पोषण अनेक वर्षों तक करता रहा। तब वहाँ अष्टक नामक एक पराक्रमी राजर्षि आया।

श्लोक 96 (skanda.8.116.96)

स तामपश्यद्राजेन्द्र ऋषेराश्रममध्यगाम् । अचिन्तयद्धृदा चैव इदं परमहर्षितः

sa tāmapaśyadrājendra ṛṣerāśramamadhyagām | acintayaddhṛdā caiva idaṁ paramaharṣitaḥ

उस राजाओं में श्रेष्ठ ने उस अश्वतरी को उस ऋषि के आश्रम में विचरण करते हुए देखा, और मन में अत्यन्त हर्षित होकर यह सोचा -

श्लोक 97 (skanda.8.116.97)

मम पत्न्यास्तु सदृशी इयं लक्षणसम्पदा । यदि दद्यादिमां विप्रः स्यादग्रं मम संगतम्

mama patnyāstu sadṛśī iyaṁ lakṣaṇasampadā | yadi dadyādimāṁ vipraḥ syādagraṁ mama saṅgatam

यह अपने शुभ लक्षणों में मेरी रानी के योग्य ही है। यदि यह ब्राह्मण इसे मुझे दे दें, तो मुझे यह उत्तम प्राप्ति होगी।

श्लोक 98 (skanda.8.116.98)

न चायं दास्यते विप्रो मह्यमेनां सुदुर्लभाम् । उपायं तु करिष्यामि येन दास्यति सुप्रभाम्

na cāyaṁ dāsyate vipro mahyamenāṁ sudurlabhām | upāyaṁ tu kariṣyāmi yena dāsyati suprabhām

किन्तु यह ब्राह्मण मुझे इसे, जो अत्यन्त दुर्लभ है, यूँ ही नहीं देगा। मैं कोई ऐसा उपाय करूँगा, जिससे वह इस तेजस्विनी को दे दे।

श्लोक 99 (skanda.8.116.99)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स राजा तं गत्वा वामदेवमुवाच ह । प्रणम्य बहुमानेन निकृत्या शक्तिनन्दन

sanatkumāra uvāca | tatassa rājā taṁ gatvā vāmadevamuvāca ha | praṇamya bahumānena nikṛtyā śaktinandana

सनत्कुमार ने कहा - हे शक्तिनन्दन! तब वह राजा वामदेव के पास जाकर, बड़े आदर से प्रणाम कर, छल से उससे बोला -

श्लोक 100 (skanda.8.116.100)

राजोवाच । अश्वतर्यानया कार्यं मम किञ्चिन्महामुने । संवत्सरं सुसंपूर्णं प्रयच्छस्व प्रयाचितः

rājovāca | aśvataryānayā kāryaṁ mama kiñcinmahāmune | saṁvatsaraṁ susaṁpūrṇaṁ prayacchasva prayācitaḥ

राजा ने कहा - हे महामुने! मुझे इस अश्वतरी से कुछ काम है। मैं याचना करता हूँ - इसे मुझे पूरे एक वर्ष के लिए दे दीजिए।

श्लोक 101 (skanda.8.116.101)

परिप्राप्ते पुनः कृत्ये तुभ्यं वै द्विजसत्तम । पुनः प्रदास्ये विप्रेन्द्र यदि देया प्रदीयताम्

paripraprāpte punaḥ kṛtye tubhyaṁ vai dvijasattama | punaḥ pradāsye viprendra yadi deyā pradīyatām

हे द्विजश्रेष्ठ! कार्य पूरा हो जाने पर मैं इसे तुम्हें पुनः लौटा दूँगा। हे विप्रेन्द्र! यदि यह देने योग्य हो, तो कृपया दे दें।

श्लोक 102 (skanda.8.116.102)

ततः स ऋषिशार्दूलस्तस्मै प्रादादनिन्दिताम् । तां गृहीत्वा ययौ राजा लब्धेति हृषितस्तदा

tataḥ sa ṛṣiśārdūlastasmai prādādanindatām | tāṁ gṛhītvā yayau rājā labdheti hṛṣitastadā

तब उस श्रेष्ठ ऋषि ने उसे वह निष्कलंक अश्वतरी दे दी। राजा उसे लेकर, 'मुझे मिल गई' यह सोचकर हर्षित होते हुए चला गया।

श्लोक 103 (skanda.8.116.103)

अथ संवत्सरे पूर्णे तमाह ऋषिसत्तमः । तमुवाच ततो विप्रः प्रयच्छाश्वतरीं शुभाम्

atha saṁvatsare pūrṇe tamāha ṛṣisattamaḥ | tamuvāca tato vipraḥ prayacchāśvatarīṁ śubhām

जब वर्ष पूरा हो गया, तो उस श्रेष्ठ ऋषि ने राजा से कहा। उस ब्राह्मण ने उससे कहा - अब वह शुभ अश्वतरी लौटा दो।

श्लोक 104 (skanda.8.116.104)

न ददौ स हि दुर्बुद्धिर्ऋषिः क्रोधाज्जघान तम् । तस्य पुत्रस्ततो राजा बभूव नरपुङ्गवः

na dadau sa hi durbuddhirṛṣiḥ krodhājjaghāna tam | tasya putrastato rājā babhūva narapuṅgavaḥ

किन्तु उस दुर्बुद्धि राजा ने उसे नहीं लौटाया, तो ऋषि ने क्रोधवश उसे शाप देकर मार डाला। तत्पश्चात् उसका पुत्र राजा बना, जो नरश्रेष्ठ था।

श्लोक 105 (skanda.8.116.105)

तमप्याह ततो विप्रो न ददौ स च तां तदा । ततो ममार सोप्येवं विप्रक्रोधाद् दुरात्मवान्

tamapyāha tato vipro na dadau sa ca tāṁ tadā | tato mamāra sopyevaṁ viprakrodhād durātmavān

उस ब्राह्मण ने उससे भी कहा, किन्तु उसने भी उसे नहीं लौटाया। तब वह दुरात्मा भी उस ब्राह्मण के क्रोध से इसी प्रकार मर गया।

श्लोक 106 (skanda.8.116.106)

तस्य पुत्रोभवच्चैव राजा दितिजसत्तमः । तमुवाच ततो विप्रः प्रयच्छाश्वतरीमिति

tasya putrobhavaccaiva rājā ditijasattamaḥ | tamuvāca tato vipraḥ prayacchāśvatarīmiti

हे दितिजसत्तम! उसका पुत्र भी राजा बना। उस ब्राह्मण ने उससे भी कहा - 'अश्वतरी लौटा दो'।

श्लोक 107 (skanda.8.116.107)

अथ सोपि तथा कृत्वा याचितः सुदुरात्मवान् । उवाच नाहं दास्यामि पितृहन्त्रे दुरात्मने

atha sopi tathā kṛtvā yācitaḥ sudurātmavān | uvāca nāhaṁ dāsyāmi pitṛhantre durātmane

उस अत्यन्त दुरात्मा ने भी, इस प्रकार माँगे जाने पर, कहा - मैं अपने पिता के हत्यारे, दुरात्मा को यह नहीं दूँगा।

श्लोक 108 (skanda.8.116.108)

ततस्तमप्यसौ क्रुद्धो विप्रः प्राणैर्व्ययोजयत् । ततो बालः सुतस्तस्य राजाभवदतिद्युतिः

tatastamapyasau kruddho vipraḥ prāṇairvyayojayat | tato bālaḥ sutastasya rājābhavadatidyutiḥ

तब उस ब्राह्मण ने क्रुद्ध होकर उसे भी प्राणों से वियुक्त कर दिया। तत्पश्चात् उसका बाल पुत्र, अत्यन्त तेजस्वी, राजा बना।

श्लोक 109 (skanda.8.116.109)

तमप्यसौ तथा विप्रः प्रोवाच क्रोधमूर्छितः । नाशयिष्ये कुलं तद् वै अष्टकस्य दुरात्मनः

tamapyasau tathā vipraḥ provāca krodhamūrchitaḥ | nāśayiṣye kulaṁ tad vai aṣṭakasya durātmanaḥ

उससे भी उस ब्राह्मण ने क्रोध से मूर्छित होकर कहा - मैं दुरात्मा अष्टक के उस सम्पूर्ण कुल का ही नाश कर दूँगा।

श्लोक 110 (skanda.8.116.110)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा बालः संपूज्य तं द्विजम् । उवाच सचिवान् पृष्ट्वा पश्चाद्दास्यामि वाडवाम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā bālaḥ saṁpūjya taṁ dvijam | uvāca sacivān pṛṣṭvā paścāddāsyāmi vāḍavām

उसके इस वचन को सुनकर, उस बालक ने उस द्विज का सत्कार करके कहा - मैं अपने मन्त्रियों से पूछकर, फिर आपको यह घोड़ी दे दूँगा।

श्लोक 111 (skanda.8.116.111)

सचिवान् स तदानाय्य अपृच्छद् दानवेश्वर । इयमश्वतरी ब्रूत दातव्या नेति वा शुभा

sacivān sa tadānāyya apṛcchad dānaveśvara | iyamaśvatarī brūta dātavyā neti vā śubhā

हे दानवेश्वर! उसने तब मन्त्रियों को बुलाकर पूछा - बताओ, यह शुभ अश्वतरी दी जाए या नहीं?

श्लोक 112 (skanda.8.116.112)

सचिवा ऊचुः । पितामहस्य ते पित्रा इयमश्वतरी पुरा । वर्षमेकं प्रयाच्येह समानीता नरेश्वर

sacivā ūcuḥ | pitāmahasya te pitrā iyamaśvatarī purā | varṣamekaṁ prayācyeha samānītā nareśvara

मन्त्रियों ने कहा - हे नरेश्वर! यह अश्वतरी पहले तुम्हारे प्रपितामह के पिता (परदादा) द्वारा एक वर्ष के लिए माँगकर यहाँ लाई गई थी।

श्लोक 113 (skanda.8.116.113)

पूर्णे वर्षे तु विप्रस्य याचतोपि महामुने । न दत्ता स च कोपेन विप्रस्यास्य ममार ह

pūrṇe varṣe tu viprasya yācatopi mahāmune | na dattā sa ca kopena viprasyāsya mamāra ha

वर्ष पूरा होने पर, हे महामुने! ब्राह्मण के माँगने पर भी, वह नहीं लौटाई गई, और इसी ब्राह्मण के क्रोध से वह (राजा) मर गया।

श्लोक 114 (skanda.8.116.114)

ततः पितामहस्तुभ्यमासीद्राजा प्रजेश्वर । तथैव सोप्यदत्वैनां विप्रक्रोधान्ममार ह

tataḥ pitāmahastubhyamāsīdrājā prajeśvara | tathaiva sopyadatvaināṁ viprakrodhānmamāra ha

तब, हे प्रजेश्वर! तुम्हारे प्रपितामह राजा हुए। उन्होंने भी उसे न लौटाकर, उसी प्रकार ब्राह्मण के क्रोध से प्राण त्याग दिए।

श्लोक 115 (skanda.8.116.115)

भवाँस्तु यदि पूर्वेषां वृत्तं समनुवर्तते । न देया विप्ररूपस्य मृत्योरस्य दुरात्मनः

bhavām̐stu yadi pūrveṣāṁ vṛttaṁ samanuvartate | na deyā vipraḥrūpasya mṛtyorasya durātmanaḥ

यदि तुम भी अपने पूर्वजों के आचरण का ही अनुसरण करते हो, तो ब्राह्मण-रूप में इस मृत्यु-स्वरूप दुरात्मा को यह मत दो।

श्लोक 116 (skanda.8.116.116)

तेषान्तद्वचनं श्रुत्वा सचिवानां प्रमन्युमान् । निर्भत्स्य तानधर्मज्ञानिदमाह महातपाः

teṣāntadvacanaṁ śrutvā sacivānāṁ pramanyumān | nirbhatsya tānadharmajñānidamāha mahātapāḥ

उन मन्त्रियों के इस वचन को सुनकर, उस महातपस्वी बालक-राजा ने रोषपूर्वक उन अधर्मज्ञ मन्त्रियों को धिक्कारते हुए यह कहा -

श्लोक 117 (skanda.8.116.117)

पूर्वे ते मौर्ख्यमास्थाय कृतवन्तोतिदारुणम् । अधर्म्यमयशस्यञ्च सद्भिश्चैव विगर्हितम्

pūrve te maurkhyamāsthāya kṛtavantotidāruṇam | adharmyamayaśasyañca sadbhiścaiva vigarhitam

मेरे पूर्वजों ने मूर्खता का सहारा लेकर अत्यन्त दारुण, अधर्म्य और अपयशकारी कार्य किया, जो सत्पुरुषों द्वारा निन्दित है।

श्लोक 118 (skanda.8.116.118)

अहन्न तेषां पन्थानमनुवर्ते कथञ्चन । अद्य तानकृतप्रज्ञान् पितॄनथ पितामहान्

ahanna teṣāṁ panthānamanuvarte kathañcana | adya tānakṛtaprajñān pitṝnatha pitāmahān

मैं किसी भी प्रकार उनके उस मार्ग का अनुसरण नहीं करूँगा। आज उन अज्ञानी पितरों और पितामहों को -

श्लोक 119 (skanda.8.116.119)

गर्तस्थान् तारयिष्यामि कुलं च सुमहत्तथा । इत्युक्त्वा निधने तेषां जातः पुत्रो महामतिः

gartasthān tārayiṣyāmi kulaṁ ca sumahattathā | ityuktvā nidhane teṣāṁ jātaḥ putro mahāmatiḥ

जो गड्ढे में पड़े हैं, उन्हें, और अपने महान् कुल को भी, मैं उद्धार करूँगा। ऐसा कहकर - उनकी मृत्यु के पश्चात् जन्मा वह महाबुद्धि पुत्र -

श्लोक 120 (skanda.8.116.120)

विप्रस्याश्वतरीदाने मतिं चक्रे सुनिश्चिताम् । ततस्तमृषिमभ्यर्च्य गन्धमाल्यादिभिर्नृपः

viprasyāśvatarīdāne matiṁ cakre suniścitām | tatastamṛṣimabhyarcya gandhamālyādibhirnṛpaḥ

उस ब्राह्मण को अश्वतरी देने का दृढ़ निश्चय कर लिया। तब उस राजा ने चन्दन-माला आदि से उस ऋषि की पूजा करके,

श्लोक 121 (skanda.8.116.121)

ताञ्चैवाश्वतरीं प्रादादात्मीयां स नराधिपः । वसु चैव हि दत्त्वास्मै ऋषिं तं स प्रसादयत्

tāñcaivāśvatarīṁ prādādātmīyāṁ sa narādhipaḥ | vasu caiva hi dattvāsmai ṛṣiṁ taṁ sa prasādayat

उस राजा ने अपनी वह अश्वतरी उसे लौटा दी, और उसे धन भी देकर उस ऋषि को प्रसन्न किया।

श्लोक 122 (skanda.8.116.122)

ततः स ऋषिशार्दूलः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । उत्थाप्य राजशार्दूलमिदमाह तदा विभुः

tataḥ sa ṛṣiśārdūlaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā | utthāpya rājaśārdūlamidamāha tadā vibhuḥ

तब उस श्रेष्ठ ऋषि ने, अत्यन्त प्रसन्न अन्तःकरण से, उस राजशार्दूल को उठाकर, तब यह कहा -

श्लोक 123 (skanda.8.116.123)

त्वया तीर्णाः सुपुत्रेण पितरः सपितामहाः । नरकस्था महाबाहो ब्राह्मणस्वेन वेष्टिताः

tvayā tīrṇāḥ suputreṇa pitaraḥ sapitāmahāḥ | narakasthā mahābāho brāhmaṇasvena veṣṭitāḥ

हे महाबाहो! एक उत्तम पुत्र के रूप में तुमने अपने पितरों और पितामहों का उद्धार कर दिया, जो ब्राह्मण की सम्पत्ति के कारण नरक में फँसे हुए थे।

श्लोक 124 (skanda.8.116.124)

न कृत्यं मम रत्नैश्च नाश्वतर्या नराधिप । तुष्टस्तुभ्यं प्रयच्छामि सर्वमेतन्नराधिप

na kṛtyaṁ mama ratnaiśca nāśvataryā narādhipa | tuṣṭastubhyaṁ prayacchāmi sarvametannarādhipa

हे नराधिप! मुझे न तो रत्नों की आवश्यकता है, न ही अश्वतरी की। प्रसन्न होकर, हे नराधिप! मैं यह सब तुम्हें ही लौटा देता हूँ।

श्लोक 125 (skanda.8.116.125)

यद्यष्टको ममैवं वै कृतवान् स्याद् दुरात्मवान् । तत्पुत्रो वा महाबाहो पिता वा तव दुर्मतिः

yadyaṣṭako mamaivaṁ vai kṛtavān syād durātmavān | tatputro vā mahābāho pitā vā tava durmatiḥ

हे महाबाहो! यदि अष्टक ने भी इसी प्रकार मुझे लौटाया होता, अथवा उसका पुत्र, अथवा तुम्हारा दुर्बुद्धि पिता भी ऐसा करता,

श्लोक 126 (skanda.8.116.126)

विनाशं न गतास्ते स्युरहन्तुष्टश्च सर्वशः । तदापृच्छे गमिष्यामि तवैषा द्रव्यमेव च

vināśaṁ na gatāste syurahantuṣṭaśca sarvaśaḥ | tadāpṛcche gamiṣyāmi tavaiṣā dravyameva ca

तो वे विनाश को न प्राप्त होते, और मैं भी सर्वथा प्रसन्न होता। अब मैं तुमसे विदा लेकर जाता हूँ; यह वस्तु तुम्हारी ही है।

श्लोक 127 (skanda.8.116.127)

ततस्स ऋषिशार्दूलो जगाम वनमेव हि । राजाप्यश्वतरीं लब्ध्वा तया रेमे यथासुखम्

tatassa ṛṣiśārdūlo jagāma vanameva hi | rājāpyaśvatarīṁ labdhvā tayā reme yathāsukham

तत्पश्चात् वह श्रेष्ठ ऋषि वन को ही चला गया, और राजा भी अपनी अश्वतरी पाकर उसके साथ यथेच्छ सुखपूर्वक रहने लगा।

श्लोक 128 (skanda.8.116.128)

एवं हि न प्रशंसन्ति पूर्वेषां धर्मवर्जितम् । कर्म सर्वे द्विजा राजन् ये चान्ये धर्मवादिनः । तस्माद्दास्याम्यहं राज्यं वामनाय महात्मने

evaṁ hi na praśaṁsanti pūrveṣāṁ dharmavarjitam | karma sarve dvijā rājan ye cānye dharmavādinaḥ | tasmāddāsyāmyahaṁ rājyaṁ vāmanāya mahātmane

इस प्रकार, हे राजन्! सभी द्विजजन तथा अन्य जो भी धर्मवादी हैं, वे पूर्वजों के धर्महीन कर्म की प्रशंसा नहीं करते। इसीलिए मैं महात्मा वामन को यह राज्य दूँगा।

श्लोक 129 (skanda.8.116.129)

सनत्कुमार उवाच । ततस्सोसुरशार्दूलो वामनस्य तदा करे । पातयामास विधिवज्जलं परमपूजितम्

sanatkumāra uvāca | tatassosuraśārdūlo vāmanasya tadā kare | pātayāmāsa vidhivajjalaṁ paramapūjitam

सनत्कुमार ने कहा - तब उस असुरशार्दूल (बलि) ने, उस परम पूज्य वामन के हाथ में विधिपूर्वक जल गिराया।

श्लोक 130 (skanda.8.116.130)

तस्य पातितमात्रे तु जले विष्णोर्महात्मनः । दैत्येन्द्रस्योपरि तदा पुष्पवृष्टिः पपात ह

tasya pātitamātre tu jale viṣṇormahātmanaḥ | daityendrasyopari tadā puṣpavṛṣṭiḥ papāta ha

उस महात्मा विष्णु के हाथ में जल गिरते ही, उस दैत्येन्द्र (बलि) के ऊपर पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 131 (skanda.8.116.131)

साधुसाध्विति भूतानामदृश्यानाञ्च निस्वनः । देवदुन्दुभयश्चात्र स्वयं नेदुरनाहताः

sādhusādhviti bhūtānāmadṛśyānāñca nisvanaḥ | devadundubhayaścātra svayaṁ nedurnāhatāḥ

अदृश्य भूतगणों का 'साधु साधु' की ध्वनि सुनाई देने लगी, और देवताओं के दुन्दुभि बिना बजाए ही स्वयं बज उठे।

श्लोक 132 (skanda.8.116.132)

मरुतश्च शुभान् गन्धानादाय प्रववुः शुभाः । हताः स्थ दानवास्सर्वे इति चात्राभवत् स्वनः

marutaśca śubhān gandhānādāya pravavuḥ śubhāḥ | hatāḥ stha dānavāssarve iti cātrābhavat svanaḥ

शुभ वायुएँ शुभ सुगन्ध लेकर बहने लगीं, और वहाँ यह ध्वनि भी सुनाई दी - 'हे दानवो! तुम सब अब पराजित हो चुके हो'।

श्लोक 133 (skanda.8.116.133)

तत्कर्म तस्यातिसुदुष्करं तदा समीक्ष्य सर्वे ऋषयस्तपोधनाः । प्रशंसमाना दितिनन्दनेश्वरं प्रणेमुरारान्मधुसूदनं तदा

tatkarma tasyātisudukṣkaraṁ tadā samīkṣya sarve ṛṣayastapodhanāḥ | praśaṁsamānā ditinandaneśvaraṁ praṇemurārānmadhusūdanaṁ tadā

तब उस बलि के उस अत्यन्त दुष्कर कर्म को देखकर, सभी तपोधन ऋषियों ने उस दिति-पुत्रों के स्वामी की प्रशंसा करते हुए, तत्पश्चात् दूर से ही मधुसूदन को भी प्रणाम किया।

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