अम्बिका खण्ड · अध्याय 117
त्रैलोक्यक्रमण
श्लोक 1 (skanda.8.117.1)
सनत्कुमार उवाच । ततस्स भगवान् विष्णुरुवाचासुरपुङ्गवम् । क्रमामि विक्रमैः पश्य दानवेश्वर सुप्रभ
sanatkumāra uvāca | tatassa bhagavān viṣṇuruvācāsurapuṅgavam | kramāmi vikramaiḥ paśya dānaveśvara suprabha
सनत्कुमार ने कहा - तब भगवान् विष्णु ने उस असुरश्रेष्ठ से कहा - हे दानवेश्वर! हे सुप्रभ! देखो, मैं अब पगों से नापता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.8.117.2)
यदि चेत् पूर्यते दत्तं न चेद्दातव्य इत्युत । भवता भूमिभागोन्यः सत्यवाग् भव दानव
yadi cet pūryate dattaṁ na ceddātavya ityuta | bhavatā bhūmibhāgonyaḥ satyavāg bhava dānava
यदि तुम्हारे द्वारा दिया गया वचन पूर्ण होता है, तो ठीक है; अन्यथा 'यह अन्य भूमि-भाग है, यह देने योग्य नहीं' मत कहना। हे दानव! सत्यवादी बनो।
श्लोक 3 (skanda.8.117.3)
बलिरुवाच । क्रमस्व वामनश्रेष्ठ क्रमाँस्त्रीनद्य सर्वशः । न चेत् पूर्येत दाताहं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
baliruvāca | kramasva vāmanaśreṣṭha kramām̐strīnadya sarvaśaḥ | na cet pūryeta dātāhaṁ satyametad bravīmi te
बलि ने कहा - हे वामनश्रेष्ठ! आज तीनों पग सर्वथा नापो। यदि वे पूर्ण न भी हों, तो भी मैं दाता रहूँगा - मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.8.117.4)
सनत्कुमार उवाच । ततस्स देवदेवेशं महादेवमुमापतिम् । प्रणेमे परया भक्त्या क्रमिष्यन् विष्णुरव्ययः
sanatkumāra uvāca | tatassa devadeveśaṁ mahādevamumāpatim | praṇeme parayā bhaktyā kramiṣyan viṣṇuravyayaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब वह अविनाशी विष्णु, पग रखने से पूर्व, परम भक्ति के साथ देवाधिदेव, उमापति महादेव को प्रणाम करने लगे।
श्लोक 5 (skanda.8.117.5)
ततो देवाः सुसंयत्ताः सन्नद्धा युद्धलालसाः । आकाशेन महासत्वास्तत्राजग्मुर्महाबलाः
tato devāḥ susaṁyattāḥ sannaddhā yuddhalālasāḥ | ākāśena mahāsatvāstatrājagmurmahābalāḥ
तब वे महाबली, महासत्त्वशाली, युद्ध के लिए उत्सुक देवगण, सुसज्जित होकर, शस्त्रधारण किए हुए आकाश-मार्ग से वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 6 (skanda.8.117.6)
ततस्स पुष्करद्वीपे विष्णुः परमदीप्तिमत् । रूपं कृत्वा भुवं द्याञ्च वै क्रममाचरत्
tatassa puṣkaradvīpe viṣṇuḥ paramadīptimat | rūpaṁ kṛtvā bhuvaṁ dyāñca vai kramamācarat
तब उस पुष्करद्वीप में विष्णु ने अत्यन्त तेजस्वी रूप धारण किया, और [टिप्पणी: यहाँ पंक्ति का मध्य भाग स्रोत में क्षतिग्रस्त होकर अप्राप्य है] पृथ्वी और द्युलोक (आकाश) के विषय में अपना पग बढ़ाया।
श्लोक 7 (skanda.8.117.7)
स पादमुदये कृत्वा द्वितीयं सरितां पतौ । पुष्करस्यैवोत्तरतस्तेन लोकमिमं गतः
sa pādamudaye kṛtvā dvitīyaṁ saritāṁ patau | puṣkarasyaivottaratastena lokamimaṁ gataḥ
उसने पहला पग उदयाचल पर रखा, और दूसरा नदियों के स्वामी समुद्र में, पुष्कर के ही उत्तर की ओर - इस प्रकार उसने इस लोक को व्याप्त कर लिया।
श्लोक 8 (skanda.8.117.8)
क्रमित्वा विक्रमं चैकपादमुत्क्षिपतस्तदा । अजको नाम दैत्येन्द्रः पादं तं समगृह्णत
kramitvā vikramaṁ caikapādamutkṣipatastadā | ajako nāma daityendraḥ pādaṁ taṁ samagṛhṇata
इस प्रकार पग नापकर, जब उसने अपना एक पैर उठाया, तब अजक नामक दैत्येन्द्र ने उस पैर को पकड़ लिया।
श्लोक 9 (skanda.8.117.9)
स तं सहैवासुरेण उत्क्षिपन्मधुसूदनः । क्षिप्तोसावसुरो व्यास अद्यापि न निवर्तते
sa taṁ sahaivāsureṇa utkṣipanmadhusūdanaḥ | kṣiptosāvasuro vyāsa adyāpi na nivartate
मधुसूदन ने उसे उस असुर सहित ही उछाल दिया। हे व्यास! वह फेंका गया असुर आज तक भी नहीं लौटा है।
श्लोक 10 (skanda.8.117.10)
ततो द्वितीयं रुद्रस्य योगं परममास्थितः । अन्तरिक्षे भुवर्लोक एक एव क्रमोभवत्
tato dvitīyaṁ rudrasya yogaṁ paramamāsthitaḥ | antarikṣe bhuvarloka eka eva kramobhavat
फिर, रुद्र के परम योग का आश्रय लेकर, अन्तरिक्ष में भुवर्लोक में उसका दूसरा पग हुआ, जो केवल एक ही पग था।
श्लोक 11 (skanda.8.117.11)
ततोन्तरिक्षाद् भूयोपि ब्रह्मणो योगमास्थितः । स्वर्लोकमखिलं व्यास क्रममेकं चकार ह
tatontarikṣād bhūyopi brahmaṇo yogamāsthitaḥ | svarlokamakhilaṁ vyāsa kramamekaṁ cakāra ha
तत्पश्चात् अन्तरिक्ष से भी आगे, ब्रह्मा के योग का आश्रय लेकर, हे व्यास! उसने एक ही पग में सम्पूर्ण स्वर्लोक को नाप लिया।
श्लोक 12 (skanda.8.117.12)
तं तु लोकं समासाद्य निःसृतं देवसत्तमः । जनलोकं समासाद्य न समाप्तञ्च तत्ततः
taṁ tu lokaṁ samāsādya niḥsṛtaṁ devasattamaḥ | janalokaṁ samāsādya na samāptañca tattataḥ
उस लोक को व्याप्त करके भी, वह देवश्रेष्ठ उससे आगे बढ़ गया, और जनलोक तक पहुँच गया, फिर भी वह पग वहाँ समाप्त नहीं हुआ।
श्लोक 13 (skanda.8.117.13)
तस्य चोत्क्रामतस्तत्र दैत्याः शस्त्रास्त्रपाणयः । अभ्यक्रमन्त वेगेन देवास्तान्सन्न्यवारयन्
tasya cotkrāmatastatra daityāḥ śastrāstrapāṇayaḥ | abhyakramanta vegena devāstānsannyavārayan
जब वह इस प्रकार आगे बढ़ रहा था, तब शस्त्र-अस्त्र धारण किए हुए दैत्य वेगपूर्वक उस पर टूट पड़े, किन्तु देवताओं ने उन्हें रोक दिया।
श्लोक 14 (skanda.8.117.14)
दश पुत्रसहस्राणि तनयानां बलेस्तदा । युध्यमाना हतास्तेन विविधायुधपाणयः
daśa putrasahasrāṇi tanayānāṁ balestadā | yudhyamānā hatāstena vividhāyudhapāṇayaḥ
बलि के दस हजार पुत्र और उनके पुत्रगण, जो विविध शस्त्र हाथों में लिए युद्ध कर रहे थे, तब उस विष्णु द्वारा मारे गए।
श्लोक 15 (skanda.8.117.15)
बाणो वातश्च द्वावेतौ बलिपुत्रौ महाबलौ । तस्माद् भ्रष्टौ तदा व्यास संग्रामाद्ययतुर्मुने
bāṇo vātaśca dvāvetau baliputrau mahābalau | tasmād bhraṣṭau tadā vyāsa saṅgrāmādyayaturmune
बाण और वात नामक बलि के दोनों महाबली पुत्र भी उस युद्ध से पराजित होकर, हे व्यास! हे मुने! वहाँ से भाग गए।
श्लोक 16 (skanda.8.117.16)
अथ ब्रह्मा तदाभ्येत्य समयं प्रचकार ह । विमुच्य पाशान्देवेश इमं लोकं पितामहः
atha brahmā tadābhyetya samayaṁ pracakāra ha | vimucya pāśāndeveśa imaṁ lokaṁ pitāmahaḥ
तब ब्रह्मा वहाँ आकर एक व्यवस्था बनाई। हे देवेश! उस पितामह ने बलि के पाश खोलकर उसे इस लोक (पाताल) में भेज दिया।
श्लोक 17 (skanda.8.117.17)
बले त्वयाखिलं राज्यं देवानां प्रतिपादितम् । सत्ये त्वं समये स्थित्वा मा राज्यं कामये पुनः
bale tvayākhilaṁ rājyaṁ devānāṁ pratipāditam | satye tvaṁ samaye sthitvā mā rājyaṁ kāmaye punaḥ
(ब्रह्मा ने कहा -) हे बलि! तुमने अपने सम्पूर्ण राज्य को देवताओं को समर्पित कर दिया। अब तुम सत्य और अपनी प्रतिज्ञा में स्थिर रहो, और पुनः राज्य की कामना मत करो।
श्लोक 18 (skanda.8.117.18)
यावन्मन्वन्तरमिदमेष ते समयः शुभः । परिपाल्यः सदा वत्स गच्छ चैव यथासुखम्
yāvanmanvantaramidameṣa te samayaḥ śubhaḥ | paripālyaḥ sadā vatsa gaccha caiva yathāsukham
जब तक यह मन्वन्तर रहे, तब तक यह तुम्हारा शुभ अनुबन्ध है, जिसका सदा पालन करना चाहिए, हे वत्स! अब तुम सुखपूर्वक जाओ।
श्लोक 19 (skanda.8.117.19)
इदं यज्ञफलं सम्यगवाप्स्यसि न संशयः । योगञ्च मत्प्रसादेन भूय एव ह्यवाप्स्यसि
idaṁ yajñaphalaṁ samyagavāpsyasi na saṁśayaḥ | yogañca matprasādena bhūya eva hyavāpsyasi
तुम इस यज्ञ का फल पूर्ण रूप से पाओगे, इसमें संदेह नहीं। और मेरी कृपा से तुम पुनः योग को भी प्राप्त करोगे।
श्लोक 20 (skanda.8.117.20)
स एवमुक्तस्तमापृच्छ्य पातालं संविवेश ह । देवा अपि ततः प्राप्य स्वं राज्यं मुमुदुर्भृशम्
sa evamuktastamāpṛcchya pātālaṁ saṁviveśa ha | devā api tataḥ prāpya svaṁ rājyaṁ mumudurbhṛśam
इस प्रकार कहे जाने पर, बलि ने उनसे विदा लेकर पाताल में प्रवेश किया। और देवगण भी अपना राज्य पुनः प्राप्त कर अत्यन्त हर्षित हुए।
श्लोक 21 (skanda.8.117.21)
व्यास उवाच । कीदृक् स भगवान् विष्णुस्त्यक्त्वा स्वं धर्ममूर्जितम् । प्रत्याहरत त्रैलोक्यं न चैवास्यानयोभवत्
vyāsa uvāca | kīdṛk sa bhagavān viṣṇustyaktvā svaṁ dharmamūrjitam | pratyāharata trailokyaṁ na caivāsyānayobhavat
व्यास ने कहा - वह भगवान् विष्णु कैसे अपने बलशाली धर्म को त्यागे बिना ही त्रिलोक को पुनः प्राप्त कर सका, और उसमें कोई अनीति भी नहीं हुई?
श्लोक 22 (skanda.8.117.22)
सनत्कुमार उवाच । क्रमतस्तस्य देवस्य विष्णोर्दीप्तानलप्रभम् । बभौ रूपमतीवोग्रं दुर्निरीक्ष्यं सुरैरपि
sanatkumāra uvāca | kramatastasya devasya viṣṇordīptānalaprabham | babhau rūpamatīvograṁ durnirīkṣyaṁ surairapi
सनत्कुमार ने कहा - पग नापते हुए उस देव विष्णु का रूप, प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, अत्यन्त उग्र, और देवताओं के लिए भी अदृश्य-सा हो गया।
श्लोक 23 (skanda.8.117.23)
अथ देवाः सहेन्द्रेण विष्णुं परमदैवतम् । तुष्टुवुः प्रशशंसुश्च कृतकृत्यं महाबलम्
atha devāḥ sahendreṇa viṣṇuṁ paramadaivatam | tuṣṭuvuḥ praśaśaṁsuśca kṛtakṛtyaṁ mahābalam
तब इन्द्र सहित देवगण उस परम देव, कृतकृत्य, महाबली विष्णु की स्तुति और प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 24 (skanda.8.117.24)
प्रीत्या परमया युक्ताः सर्वे दिव्यास्त्रधारिणः । दानवैरर्द्यमानानामस्माकं विबुधेश्वरः
prītyā paramayā yuktāḥ sarve divyāstradhāriṇaḥ | dānavairardyamānānāmasmākaṁ vibudheśvaraḥ
सभी दिव्यास्त्रधारी देवगण परम प्रीति से युक्त होकर बोले - दानवों से पीड़ित हम सबके लिए, हे देवेश्वर! तुम्हीं -
श्लोक 25 (skanda.8.117.25)
त्राता राज्यप्रदश्चैव त्वमभूस्सुरसत्तम । त्वया स्म सुखिनः सर्वे कर्मिणः सुकृतैर्यथा
trātā rājyapradaścaiva tvamabhūssurasattama | tvayā sma sukhinaḥ sarve karmiṇaḥ sukṛtairyathā
हे सुरश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे रक्षक और राज्य-प्रदाता बने। तुम्हारे द्वारा हम सब वैसे ही सुखी हुए जैसे कर्मशील पुरुष अपने सुकृतों से सुखी होते हैं।
श्लोक 26 (skanda.8.117.26)
तव देव प्रभावेण राज्यं भोक्ष्याम विज्वराः । तपनस्य(?) प्रभावेण यथा पूर्वं सुरेतराः
tava deva prabhāveṇa rājyaṁ bhokṣyāma vijvarāḥ | tapanasya prabhāveṇa yathā pūrvaṁ suretaraḥ
हे देव! तुम्हारे ही प्रभाव से हम अब बिना किसी चिन्ता के राज्य भोगेंगे, जैसे पहले सूर्य के प्रभाव से (पृथ्वी सुरक्षित रहती है)।
श्लोक 27 (skanda.8.117.27)
त्वं हि नः परमं धाम तथैव च परा गतिः । परं पवित्रं त्वं चैव ऋते देवमुमापतिम्
tvaṁ hi naḥ paramaṁ dhāma tathaiva ca parā gatiḥ | paraṁ pavitraṁ tvaṁ caiva ṛte devamumāpatim
तुम्हीं हमारा परम धाम हो, तुम्हीं हमारी परम गति हो; उमापति देव को छोड़कर, तुम्हीं परम पवित्र हो।
श्लोक 28 (skanda.8.117.28)
सनत्कुमार उवाच । तस्यैवं स्तूयमानस्य त्रिदशैः शार्ङ्गधन्वनः । अभूत् तुष्टिस्तदात्यर्थं बहुमानस्तथात्मनि
sanatkumāra uvāca | tasyaivaṁ stūyamānasya tridaśaiḥ śārṅgadhanvanaḥ | abhūt tuṣṭistadātyarthaṁ bahumānastathātmani
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार तैंतीस देवताओं द्वारा स्तुत होने पर, शार्ङ्गधन्वा (विष्णु) को अत्यन्त सन्तोष हुआ, तथा अपने प्रति भी बड़ा अभिमान उत्पन्न हो गया।
श्लोक 29 (skanda.8.117.29)
ततोभिमानतस्तस्य स योगः परमो मुने । अभ्रश्यत यथा वह्निः सलिलेन समुक्षितः
tatobhimānatastasya sa yogaḥ paramo mune | abhraśyata yathā vahniḥ salilena samukṣitaḥ
हे मुने! उस अभिमान के कारण उसका वह परम योग-बल उसी प्रकार क्षीण हो गया, जैसे जल से सींची गई अग्नि बुझ जाती है।
श्लोक 30 (skanda.8.117.30)
ततस्तदन्तरं लब्ध्वा पाप्मा सा ह्यासुरी मुने । प्रहृष्टा संप्रहृष्यैनमाविवेश जनार्दनम्
tatastadantaraṁ labdhvā pāpmā sā hyāsurī mune | prahṛṣṭā saṁprahṛṣyainamāviveśa janārdanam
हे मुने! तब उस अन्तर को पाकर, वह पापमयी आसुरी शक्ति अत्यन्त प्रसन्न होकर जनार्दन में प्रवेश कर गई।
श्लोक 31 (skanda.8.117.31)
स तया पाप्मया व्यास आविष्टो विष्णुरव्ययः । न बभौ दीप्तिमाँस्तत्र सन्तः प्राप्येव दारुणम्
sa tayā pāpmayā vyāsa āviṣṭo viṣṇuravyayaḥ | na babhau dīptimām̐statra santaḥ prāpyeva dāruṇam
हे व्यास! उस पाप-शक्ति से आविष्ट होकर, वह अविनाशी विष्णु वहाँ अपनी तेजस्विता खो बैठे, जैसे कोई सज्जन किसी दारुण संकट को प्राप्त कर अपनी कान्ति खो देता है।