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अम्बिका खण्ड · अध्याय 118

वामनतीर्थयात्रा

अध्याय 117अध्याय-सूचीअध्याय 119

श्लोक 1 (skanda.8.118.1)

सनत्कुमार उवाच । तथा स पाप्मया व्यास आसुर्या संगतस्तदा । तदेव रूपं संप्राप्तो वामनं देवसत्तमः

sanatkumāra uvāca | tathā sa pāpmayā vyāsa āsuryā saṅgatastadā | tadeva rūpaṁ saṁprāpto vāmanaṁ devasattamaḥ

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! इस प्रकार उस आसुरी पाप-शक्ति से युक्त होकर, वह देवश्रेष्ठ पुनः अपने उसी वामन-रूप को प्राप्त हो गया।

श्लोक 2 (skanda.8.118.2)

तं तथा वर्तमानं तु देवास्सर्वे सवासवाः । अब्रुवन् किमिदं देव तव वैकृतमीदृशम्

taṁ tathā vartamānaṁ tu devāssarve savāsavāḥ | abruvan kimidaṁ deva tava vaikṛtamīdṛśam

उसे इस प्रकार देखकर, इन्द्र सहित सभी देवगण बोले - हे देव! यह तुम्हारा ऐसा विकार क्यों हुआ?

श्लोक 3 (skanda.8.118.3)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ऋषयः शंसितव्रताः । मरीचिर्भृगुरत्रिश्च अङ्गिरा क्रतुरेव च

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā ṛṣayaḥ śaṁsitavratāḥ | marīcirbhṛguratriśca aṅgirā kraturevaca

उनके इस वचन को सुनकर, प्रशंसित व्रतों वाले ऋषि - मरीचि, भृगु, अत्रि, अंगिरा और क्रतु,

श्लोक 4 (skanda.8.118.4)

वसिष्ठश्च पुलस्त्यश्च पुलहो रुचिरेव च । विश्वामित्रो वामदेवो भरद्वाजस्तथौशिजः

vasiṣṭhaśca pulastyaśca pulaho rucireva ca | viśvāmitro vāmadevo bharadvājastathauśijaḥ

वसिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, रुचि, विश्वामित्र, वामदेव, भरद्वाज, तथा उशिजपुत्र (कक्षीवान्),

श्लोक 5 (skanda.8.118.5)

गौतमश्च शरद्वाँश्च कश्यपश्चोद्दलस्तथा । वत्सारो नैध्रुवश्चैव च्यवनश्चात्मवानपि

gautamaśca śaradvām̐śca kaśyapaścoddalastathā | vatsāro naidhruvaścaiva cyavanaścātmavānapi

गौतम, शरद्वान्, कश्यप, उद्दल, वत्सार, नैध्रुव, तथा संयमी च्यवन,

श्लोक 6 (skanda.8.118.6)

दधीचश्च ऋचीकश्च जमदग्निश्च विश्रुतः । जामदग्न्यस्तथा रामो ह्यगस्तिश्च महातपाः

dadhīcaśca ṛcīkaśca jamadagniśca viśrutaḥ | jāmadagnyastathā rāmo hyagastiśca mahātapāḥ

दधीचि, ऋचीक, विख्यात जमदग्नि, जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम), तथा महातपस्वी अगस्त्य,

श्लोक 7 (skanda.8.118.7)

बृहस्पतिश्च शुक्रश्च शक्तिश्च सपराशरः । कुणिश्च कुणिबाहश्च तथा सारस्वतश्च यः

bṛhaspatiśca śukraśca śaktiśca saparāśaraḥ | kuṇiśca kuṇibāhaśca tathā sārasvataśca yaḥ

बृहस्पति, शुक्र, शक्ति, पराशर सहित, कुणि, कुणिबाह, तथा सारस्वत -

श्लोक 8 (skanda.8.118.8)

एते चान्ये च ऋषयो नारदश्च सपर्वतः । ऊचुर्देवांस्तदा व्यास ब्रह्मणा संप्रचोदिताः

ete cānye ca ṛṣayo nāradaśca saparvataḥ | ūcurdevāṁstadā vyāsa brahmaṇā saṁpracoditāḥ

ये और अन्य ऋषिगण, तथा पर्वत सहित नारद - हे व्यास! ये सब, ब्रह्मा द्वारा प्रेरित होकर, तब देवताओं से बोले -

श्लोक 9 (skanda.8.118.9)

ऋषय ऊचुः । वयं देवाद्य संप्राप्ता ब्रह्मलोकात् सुरेश्वराः । आज्ञप्ता ब्रह्मणा क्षिप्रं देवस्यास्य कृतेन ह

ṛṣaya ūcuḥ | vayaṁ devādya saṁprāptā brahmalokāt sureśvarāḥ | ājñaptā brahmaṇā kṣipraṁ devasyāsya kṛtena ha

ऋषियों ने कहा - हे सुरेश्वरो! हम आज ब्रह्मलोक से आए हैं, इस देव के कृत्य के कारण ब्रह्मा द्वारा शीघ्र भेजे गए हैं।

श्लोक 10 (skanda.8.118.10)

यदनेन परित्यज्य स्वधर्मं देवबन्धुना । प्रतिग्रहः कृतो राज्यं वैकुण्ठेन महात्मना

yadanena parityajya svadharmaṁ devabandhunā | pratigrahaḥ kṛto rājyaṁ vaikuṇṭhena mahātmanā

क्योंकि इस देव-बन्धु, महात्मा वैकुण्ठ ने अपने स्वधर्म को त्यागकर राज्य को स्वीकार किया,

श्लोक 11 (skanda.8.118.11)

ततः पाप्मासुराणां या सर्वप्राणिभयंकरी । सासुरान् संपरित्यज्य केशवं संविवेश ह

tataḥ pāpmāsurāṇāṁ yā sarvaprāṇibhayaṅkarī | sāsurān saṁparityajya keśavaṁ saṁviveśa ha

इसीलिए वह पापशक्ति, जो असुरों की और सब प्राणियों के लिए भयंकर है, असुरों को छोड़कर केशव में प्रवेश कर गई।

श्लोक 12 (skanda.8.118.12)

तथाभिभूतो देवोयमशक्तः शत्रुबाधने । न चास्य तेजः सर्वे वै पश्यध्वं पूर्ववच्छुभम्

tathābhibhūto devoyamaśaktaḥ śatrubādhane | na cāsya tejaḥ sarve vai paśyadhvaṁ pūrvavacchubham

इस प्रकार अभिभूत होकर यह देव अब शत्रुओं को पीड़ित करने में असमर्थ है, और तुम सब देख सकते हो कि इसका शुभ तेज भी पहले जैसा नहीं रहा।

श्लोक 13 (skanda.8.118.13)

स एष यदि मन्यध्वं तीर्थेषु सुसमाहितः । स्नात्वाश्वमेधेन पुनर्यजतां दैवतैस्सह

sa eṣa yadi manyadhvaṁ tīrtheṣu susamāhitaḥ | snātvāśvamedhena punaryajatāṁ daivataissaha

यदि तुम सहमत हो, तो यह देव, एकाग्रचित्त होकर तीर्थों में स्नान करके, देवताओं सहित पुनः अश्वमेध यज्ञ करे।

श्लोक 14 (skanda.8.118.14)

ततः पिनाकिनं दृष्टवा तेन पूतश्च सर्वशः । भविता पाप्मया मुक्त एवमाह पितामहः

tataḥ pinākinaṁ dṛṣṭavā tena pūtaśca sarvaśaḥ | bhavitā pāpmayā mukta evamāha pitāmahaḥ

तब पिनाकधारी शिव का दर्शन करके, उससे सर्वथा पवित्र होकर, वह पाप-शक्ति से मुक्त हो जाएगा - ऐसा पितामह ब्रह्मा ने कहा है।

श्लोक 15 (skanda.8.118.15)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते सहितास्सर्वे देवा मुनिजनैस्सह । तीर्थयात्रामकुर्वन् तं गृहीत्वा विष्णुमव्ययम्

sanatkumāra uvāca | tataste sahitāssarve devā munijanaissaha | tīrthayātrāmakurvan taṁ gṛhītvā viṣṇumavyayam

सनत्कुमार ने कहा - तब वे सभी देवगण, मुनिजनों सहित एकत्र होकर, उस अविनाशी विष्णु को साथ लेकर तीर्थयात्रा करने लगे।

श्लोक 16 (skanda.8.118.16)

ते तु पुष्करिणीं रम्यां सुषुम्णेति सुविश्रुताम् । नलिनीवनसंछन्नां प्रहृष्टाण्डजनादिताम्

te tu puṣkariṇīṁ ramyāṁ suṣumṇeti suviśrutām | nalinīvanasaṁchannāṁ prahṛṣṭāṇḍajanāditām

वे उस रमणीय, सुषुम्णा नाम से सुविख्यात पुष्करिणी के पास पहुँचे, जो कमल-वनों से आच्छादित और प्रसन्न पक्षियों के कलरव से गुंजित थी,

श्लोक 17 (skanda.8.118.17)

बहुवृक्षवनोपेतां फुल्लपङ्कजशोभिताम् । बहूपवनवृक्षाढ्यां सूक्ष्मकाञ्चनबालुकाम्

bahuvṛkṣavanopetāṁ phullapaṅkajaśobhitām | bahūpavanavṛkṣāḍhyāṁ sūkṣmakāñcanabālukām

अनेक वृक्ष-वनों से युक्त, खिले हुए कमलों से शोभित, अनेक उपवन-वृक्षों से समृद्ध, तथा सूक्ष्म स्वर्ण-बालुका वाली,

श्लोक 18 (skanda.8.118.18)

वज्रवैदूर्यनीलाङ्कामिन्द्रनीललतोपलाम् । विविधाण्डजशब्दाढ्यां सिद्धचारणसेविताम्

vajravaidūryanīlāṅkāmindranīlalatopalām | vividhāṇḍajaśabdāḍhyāṁ siddhacāraṇasevitām

वज्र, वैदूर्य और नीलमणि से चिह्नित, इन्द्रनील मणि की लताओं वाली, विविध पक्षियों की ध्वनि से भरपूर, तथा सिद्धों और चारणों द्वारा सेवित,

श्लोक 19 (skanda.8.118.19)

किन्नरोद्गीतमधुरामप्सरोभिश्च सेविताम् । मत्तभ्रमरगीताढ्यां श्रीनिकेतननिकेतनाम्

kinnarodgītamadhurāmapsarobhiśca sevitām | mattabhramaragītāḍhyāṁ śrīniketananiketanām

किन्नरों के गान से मधुर, अप्सराओं द्वारा सेवित, उन्मत्त भ्रमरों के गुंजन से भरपूर, तथा श्री (लक्ष्मी) के निवास का ही मानो निवास-स्थान।

श्लोक 20 (skanda.8.118.20)

यस्यां स्नात्वा नरो मर्त्यः स्वशरीरेण सुव्रत । विमानेनार्कभासेन गच्छन्ति ह्यमरालयम्

yasyāṁ snātvā naro martyaḥ svaśarīreṇa suvrata | vimānenārkabhāsena gacchanti hyamarālayam

हे सुव्रत! जिसमें स्नान करके मरणधर्मा मनुष्य भी अपने ही शरीर से, सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर बैठकर अमरलोक को चला जाता है।

श्लोक 21 (skanda.8.118.21)

तामासाद्य तदा देवाः सुषुम्नामृषिभिस्सह । पद्मानि जगृहुश्चैव मृणालानि बिसानि च

tāmāsādya tadā devāḥ suṣumnāmṛṣibhissaha | padmāni jagṛhuścaiva mṛṇālāni bisāni ca

उस सुषुम्ना पुष्करिणी में पहुँचकर, ऋषियों सहित देवगण कमल, कमलनाल और कमल-कन्द लेने लगे।

श्लोक 22 (skanda.8.118.22)

अथ तत्र महापद्मं विकचं सुमनोहरम् । सहस्रपत्रसंछन्नमगस्त्योद्धृत्य गृह्य तत्

atha tatra mahāpadmaṁ vikacaṁ sumanoharam | sahasrapatrasaṁchannamagastyoddhṛtya gṛhya tat

वहाँ अगस्त्य ने एक विशाल, खिला हुआ, अत्यन्त मनोहर, सहस्र पंखुड़ियों वाला कमल निकालकर, उसे लेकर -

श्लोक 23 (skanda.8.118.23)

तस्यास्तीरे निचिक्षेप ततः सस्नौ यथासुखम् । जग्राह तच्च देवेन्द्र अदृष्टः केनचिद्विभुः

tasyāstīre nicikṣepa tataḥ sasnau yathāsukham | jagrāha tacca devendra adṛṣṭaḥ kenacidvibhuḥ

उसे उस पुष्करिणी के तट पर रख दिया, फिर सुखपूर्वक स्नान किया। तभी प्रभु इन्द्र ने, किसी के भी न देखते हुए, उसे उठा लिया।

श्लोक 24 (skanda.8.118.24)

अथागस्त्यः समुत्तीर्णो न तत्पद्ममपश्यत । सर्वांश्च तानुपामन्त्र्य इदमाह महामनाः

athāgastyaḥ samuttīrṇo na tatpadmamapaśyat | sarvāṁśca tānupāmantrya idamāha mahāmanāḥ

जब अगस्त्य स्नान से बाहर निकले, तो उन्हें वह कमल नहीं दिखा। तब उस महामना ने उन सबको संबोधित करके यह कहा -

श्लोक 25 (skanda.8.118.25)

अगस्त्य उवाच । मम पद्म महद्देवाः केनादत्तं सुपुष्पितम् । सनत्कुमार उवाच । ततस्त ऋषयस्सर्वे देवाश्चापि ऋषेस्तदा । प्रत्ययान् विविधाँश्चक्रुरेकैकश्येन सुव्रत

agastya uvāca | mama padma mahaddevāḥ kenādattaṁ supuṣpitam | sanatkumāra uvāca | tatasta ṛṣayassarve devāścāpi ṛṣestadā | pratyayān vividhām̐ścakrurekaikaśyena suvrata

अगस्त्य ने कहा - हे महान् देवो! मेरा वह सुपुष्पित कमल किसने हर लिया? सनत्कुमार ने कहा - तब उन सभी ऋषियों और देवताओं ने भी उस ऋषि को, एक-एक करके, विविध प्रकार के आश्वासन दिए, हे सुव्रत!

श्लोक 26 (skanda.8.118.26)

इन्द्र उवाच । स यज्ञैर्यजतामिष्टैर्बहुभिश्चाप्तदक्षिणैः । वसेत् स्वर्गे च नियतं यस्ते हरति पङ्कजम्

indra uvāca | sa yajñairyajatāmiṣṭairbahubhiścāptadakṣiṇaiḥ | vaset svarge ca niyataṁ yaste harati paṅkajam

इन्द्र ने कहा - जिस किसी ने भी तुम्हारा वह कमल हरा हो, वह अनेक इष्ट यज्ञों तथा प्रचुर दक्षिणाओं से स्वर्ग में निश्चय ही निवास करने का पात्र बने।

श्लोक 27 (skanda.8.118.27)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते मेनिरे सर्वे देवेन्द्रेण महात्मना । गृहीतं पङ्कजं व्यास इन्द्रश्चैनमुवाच ह

sanatkumāra uvāca | tataste menire sarve devendreṇa mahātmanā | gṛhītaṁ paṅkajaṁ vyāsa indraścainamuvāca ha

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब उन सबने समझ लिया कि वह कमल महात्मा देवेन्द्र ने ही लिया था, और इन्द्र ने भी उससे यह कहा -

श्लोक 28 (skanda.8.118.28)

इन्द्र उवाच । ऋषीणां धर्मतत्त्वानि शृणुयाय वयं कथम् । उपायोयं कृतस्तस्माद् गृहाणेदं जलोद्भवम्

indra uvāca | ṛṣīṇāṁ dharmatattvāni śṛṇuyāya vayaṁ katham | upāyoyaṁ kṛtastasmād gṛhāṇedaṁ jalodbhavam

इन्द्र ने कहा - हम ऋषियों के धर्म-तत्त्व को कैसे सुनें (जान सकें), इसके लिए ही यह उपाय किया गया था। अतः यह जल से उत्पन्न कमल ग्रहण करो।

श्लोक 29 (skanda.8.118.29)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते तत्र संपूज्य अग्नीन् देवान् पितॄनपि । ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा च विष्णोः कृत्वा तथाशिषः

sanatkumāra uvāca | tataste tatra saṁpūjya agnīn devān pitṝnapi | brāhmaṇāṁstarpayitvā ca viṣṇoḥ kṛtvā tathāśiṣaḥ

सनत्कुमार ने कहा - तब उन्होंने वहाँ अग्नियों, देवताओं और पितरों की पूजा करके, ब्राह्मणों को तृप्त करके, तथा विष्णु के लिए आशीर्वाद देकर -

श्लोक 30 (skanda.8.118.30)

जग्मुरन्यानि तीर्थानि सुपुण्यानि शुभानि च । बहूनि व्यास मुनयो देवाश्च सुसमाहिताः

jagmuranyāni tīrthāni supuṇyāni śubhāni ca | bahūni vyāsa munayo devāśca susamāhitāḥ

हे व्यास! वे मुनि और देवगण, पूर्ण एकाग्रचित्त होकर, अन्य अनेक पुण्यमय और शुभ तीर्थों की ओर गए।

श्लोक 31 (skanda.8.118.31)

अथापश्यन्त ते वृक्षमेकं शुष्कं महातरुम् । कोटरे च शुकं तस्य शुष्यन्तं व्याकुलेन्द्रियम्

athāpaśyanta te vṛkṣamekaṁ śuṣkaṁ mahātarum | koṭare ca śukaṁ tasya śuṣyantaṁ vyākulendriyam

तब उन्होंने एक विशाल, सूखे हुए वृक्ष को देखा, तथा उसकी कोटर में एक तोते को भी, जो स्वयं भी सूखता जा रहा था और जिसकी इन्द्रियाँ व्याकुल थीं।

श्लोक 32 (skanda.8.118.32)

ते दृष्टवा तमपृच्छन्त महेन्द्रेण दिवौकसः । दिव्येन चक्षुषा दृष्ट्वा शुकं तुष्ट्वा यशस्विनः

te dṛṣṭavā tamapṛcchanta mahendreṇa divaukasaḥ | divyena cakṣuṣā dṛṣṭvā śukaṁ tuṣṭvā yaśasvinaḥ

उसे देखकर, स्वर्गवासी देवगण महेन्द्र के साथ उससे प्रश्न पूछने लगे। दिव्य दृष्टि से उस तोते को देखकर, वे यशस्वी देवगण संतुष्ट हुए।

श्लोक 33 (skanda.8.118.33)

इन्द्र उवाच । खगेश्वर मृते ह्यस्मिन् कस्मात्तिष्ठसि पादपे । अपुष्पफलपत्रे त्वं शुष्के निरुपजीविते

indra uvāca | khageśvara mṛte hyasmin kasmāttiṣṭhasi pādape | apuṣpaphalapatre tvaṁ śuṣke nirupajīvite

इन्द्र ने कहा - हे पक्षिराज! इस मृत वृक्ष पर, जो फूल-फल-पत्र-रहित, सूखा और निर्जीव है, तुम क्यों टिके हो?

श्लोक 34 (skanda.8.118.34)

शुक उवाच । एष वृक्षः पुरा ह्यासीत् सुमहान् कल्पवृक्षवत् । फलैरमृतकल्पैश्च चिरश्चाप्युपजीवितः

śuka uvāca | eṣa vṛkṣaḥ purā hyāsīt sumahān kalpavṛkṣavat | phalairamṛtakalpaiśca ciraścāpyupajīvitaḥ

शुक ने कहा - यह वृक्ष पहले कल्पवृक्ष के समान अत्यन्त महान् था, और मैं इसके अमृत-तुल्य फलों से चिरकाल तक जीवित रहा हूँ।

श्लोक 35 (skanda.8.118.35)

दशामिमां पुनः प्राप्तः कालेन च वनस्पतिः । जह्यादेनं कथं प्राज्ञः कृतज्ञो मादृशः पुनः

daśāmimāṁ punaḥ prāptaḥ kālena ca vanaspatiḥ | jahyādenaṁ kathaṁ prājñaḥ kṛtajño mādṛśaḥ punaḥ

अब समय के प्रभाव से इस वृक्ष ने यह दशा पुनः पाई है। मेरे जैसा बुद्धिमान् और कृतज्ञ पुरुष इसे कैसे त्याग सकता है?

श्लोक 36 (skanda.8.118.36)

कृतघ्नः स्यामहं देव भृतमेनं परित्यजन् । ये लोका ह्यस्य वृक्षस्य ते मे सन्तु शचीपते

kṛtaghnaḥ syāmahaṁ deva bhṛtamenaṁ parityajan | ye lokā hyasya vṛkṣasya te me santu śacīpate

हे देव! उसे त्यागकर, जिसने मुझे पाला-पोसा, मैं कृतघ्न बन जाऊँगा। हे शचीपते! इस वृक्ष के जो भी लोक हों, वे ही मुझे भी प्राप्त हों।

श्लोक 37 (skanda.8.118.37)

इन्द्र उवाच । प्रज्ञावानसि मेधावी महात्मा नयतत्त्ववित् । कथं मूढमिवात्मानं करोषि खगपार्थिव

indra uvāca | prajñāvānasi medhāvī mahātmā nayatattvavit | kathaṁ mūḍhamivātmānaṁ karoṣi khagapārthiva

इन्द्र ने कहा - तुम बुद्धिमान्, मेधावी, महात्मा और नीति-तत्त्व के ज्ञाता हो। हे पक्षिराज! फिर तुम अपने आपको मूर्ख के समान क्यों बना रहे हो?

श्लोक 38 (skanda.8.118.38)

वनस्पतिरयं साधो धर्म एषोस्य नित्यदा । अबुद्धिपूर्वं पक्षीन्द्र स्वभावाच्चात्र कारितः

vanaspatirayaṁ sādho dharma eṣosya nityadā | abuddhipūrvaṁ pakṣīndra svabhāvāccātra kāritaḥ

हे साधो! यह तो वनस्पति है, और इसका यह धर्म सदा ऐसा ही है, जो बिना किसी बुद्धि के, हे पक्षीन्द्र! केवल स्वभाव से ही होता है।

श्लोक 39 (skanda.8.118.39)

नास्येयं बुद्धिरभवद्वयांसि मयि नित्यशः । वसन्तु मम खादन्तु फलानि च यथासुखम्

nāsyeyaṁ buddhirabhavadvayāṁsi mayi nityaśaḥ | vasantu mama khādantu phalāni ca yathāsukham

इस वृक्ष में कभी यह बुद्धि नहीं रही कि पक्षी सदा मुझ पर बसें और सुखपूर्वक मेरे फल खाएँ।

श्लोक 40 (skanda.8.118.40)

अचेतनो यथा हद्यग्निरापो वायुश्च तत्त्वतः । भूतानामुपकाराय स्वभावान्नान्यथा हि ते

acetano yathā hyagnirāpo vāyuśca tattvataḥ | bhūtānāmupakārāya svabhāvānnānyathā hi te

जिस प्रकार अग्नि, जल और वायु वास्तव में अचेतन हैं, तथापि वे प्राणियों के उपकार के लिए हैं - यह उनका स्वभाव है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 41 (skanda.8.118.41)

तद्वत् त्वं खग वृक्षस्य बुद्ध्वा कर्म स्वभावजम् । परित्यज्येममन्यत्र गच्छ यत्र सुखं भवेत्

tadvat tvaṁ khaga vṛkṣasya buddhvā karma svabhāvajam | parityajyemamanyatra gaccha yatra sukhaṁ bhavet

उसी प्रकार, हे पक्षी! वृक्ष के इस स्वभावजन्य कर्म को समझकर, इसे त्यागकर, वहाँ जाओ जहाँ तुम्हें सुख मिले।

श्लोक 42 (skanda.8.118.42)

शुक उवाच । न मूढोस्मि सुरेशान मावमंस्था वचो मम । शृणुष्व च यथाप्रज्ञा मम देवेश्वर प्रभो

śuka uvāca | na mūḍhosmi sureśāna māvamaṁsthā vaco mama | śṛṇuṣva ca yathāprajñā mama deveśvara prabho

शुक ने कहा - हे सुरेशान! मैं मूर्ख नहीं हूँ। मेरे वचन का अनादर मत कीजिए। हे देवेश्वर! हे प्रभो! मेरी बुद्धि के अनुसार जो कुछ है, उसे सुनिए।

श्लोक 43 (skanda.8.118.43)

अचेतनो यथा ह्यग्निरापो वायुश्च तत्त्वतः । न तथा सुरशार्दूल वृक्षगुल्मलतादयः

acetano yathā hyagnirāpo vāyuśca tattvataḥ | na tathā suraśārdūla vṛkṣagulmalatādayaḥ

हे सुरशार्दूल! जैसे अग्नि, जल और वायु वस्तुतः अचेतन हैं, वैसे वृक्ष, झाड़ियाँ और लताएँ नहीं हैं।

श्लोक 44 (skanda.8.118.44)

विहितो ह्येष संसारः सर्वेषामेव कर्मिणाम् । तस्मादचेतनत्वन्ते न वृक्षेषु सुरेश्वर

vihito hyeṣa saṁsāraḥ sarveṣāmeva karmiṇām | tasmādacetanatvante na vṛkṣeṣu sureśvara

यह संसार सभी कर्म करने वाले प्राणियों के लिए ही विहित है। इसलिए, हे सुरेश्वर! वृक्षों में अचेतनता नहीं है।

श्लोक 45 (skanda.8.118.45)

यथा च बुद्धिर्वृक्षाणां कथं कुर्याम सर्वशः । उपकारास्तु भूतानामिति मे तन्निशामय

yathā ca buddhirvṛkṣāṇāṁ kathaṁ kuryāma sarvaśaḥ | upakārāstu bhūtānāmiti me tanniśāmaya

वृक्षों में यह बुद्धि किस प्रकार है कि 'हम प्राणियों का उपकार सब प्रकार से करें' - यह मुझसे सुनिए।

श्लोक 46 (skanda.8.118.46)

स्वयम्भुरेतानवदत् सृष्ट्वा मुख्यान्महायशाः । प्रजानामुपकाराय वर्तध्वमिति सर्वशः

svayaṁbhuretānavadat sṛṣṭvā mukhyānmahāyaśāḥ | prajānāmupakārāya vartadhvamiti sarvaśaḥ

अत्यन्त यशस्वी स्वयंभू ब्रह्मा ने, इन प्रमुख वृक्षों को उत्पन्न करके, उनसे कहा - तुम सब सर्वदा प्रजाओं के उपकार के लिए ही वर्तमान रहो।

श्लोक 47 (skanda.8.118.47)

ततस्ते फलपुष्पत्वक्प्रबालादिभिरन्तशः । उपकाराय वर्तन्ते सर्वभूतेषु लोकप

tataste phalapuṣpatvakprabālādibhirantaśaḥ | upakārāya vartante sarvabhūteṣu lokapa

हे लोकपाल! तभी से वे अपने फल, फूल, छाल, नई कोंपल आदि से, अन्ततः सभी प्राणियों के उपकार के लिए ही विद्यमान रहते हैं।

श्लोक 48 (skanda.8.118.48)

वायुरग्निस्तथापश्च किन्तवाविदितं प्रभो । बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते यथावद्धि नगाः शुभाः

vāyuragnistathāpaśca kintavaviditaṁ prabho | buddhipūrvaṁ pravartante yathāvaddhi nagāḥ śubhāḥ

वायु, अग्नि और जल भी - किन्तु, हे प्रभो! क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं कि ये शुभ वृक्ष कैसे ठीक-ठीक सोच-समझकर ही प्रवृत्त होते हैं?

श्लोक 49 (skanda.8.118.49)

इन्द्र उवाच । कथं तवेदं विज्ञानं को धर्मः कश्च ते श्रमः । एतद्वेदितुमिच्छामः कथयस्व खगेश्वर

indra uvāca | kathaṁ tavedaṁ vijñānaṁ ko dharmaḥ kaśca te śramaḥ | etadveditumicchāmaḥ kathayasva khageśvara

इन्द्र ने कहा - तुम्हें यह ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? तुम्हारा धर्म क्या है, तुम्हारा तप क्या है? हे पक्षिराज! यह हम जानना चाहते हैं, बताओ।

श्लोक 50 (skanda.8.118.50)

शुक उवाच । जन्मप्रभृति देवेश न मित्रद्रुहणे मम । बुद्धिः समभवन्नित्यं मृत्यावपि समागते

śuka uvāca | janmaprabhṛti deveśa na mitradruhaṇe mama | buddhiḥ samabhavannityaṁ mṛtyāvapi samāgate

शुक ने कहा - हे देवेश! जन्म से लेकर आज तक मेरे मन में कभी मित्र के प्रति द्रोह की बुद्धि नहीं उठी, मृत्यु के आ जाने पर भी नहीं।

श्लोक 51 (skanda.8.118.51)

मातापितृपरश्चाहं स्वदारनिरतस्तथा । नावमन्ये च भूतानि ऋतुकाले व्रजामि च

mātāpitṛparaścāhaṁ svadāraniratastathā | nāvamanye ca bhūtāni ṛtukāle vrajāmi ca

मैं माता-पिता का सेवक हूँ, अपनी ही पत्नी में अनुरक्त हूँ, किसी भी प्राणी का अनादर नहीं करता, और (अपनी पत्नी के पास) केवल ऋतुकाल में ही जाता हूँ।

श्लोक 52 (skanda.8.118.52)

न भक्षयामि धान्यानि परेषां देवताधिप । तेन मे ज्ञानममलं प्रवृत्तं सुरसत्तम

na bhakṣayāmi dhānyāni pareṣāṁ devatādhipa | tena me jñānamamalaṁ pravṛttaṁ surasattama

हे देवताधिप! मैं दूसरों का अन्न नहीं खाता। हे सुरश्रेष्ठ! इसी कारण मुझमें यह निर्मल ज्ञान उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 53 (skanda.8.118.53)

इन्द्र उवाच । तुष्टोस्मि तव सद्बुद्ध्या अनया खगसत्तम । वरं वृणु प्रदास्यामि यद् भवान्मन्यते शुभम्

indra uvāca | tuṣṭosmi tava sadbuddhyā anayā khagasattama | varaṁ vṛṇu pradāsyāmi yad bhavānmanyate śubham

इन्द्र ने कहा - हे पक्षिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी इस सद्बुद्धि से प्रसन्न हूँ। जो भी शुभ वस्तु तुम्हें उचित लगे, वह वर माँगो, मैं दूँगा।

श्लोक 54 (skanda.8.118.54)

शुक उवाच । जीवतामेष देवेन्द्र त्वत्प्रसादाद् वनस्पतिः । अतो नान्यमहं देव वृणुयां वरमुत्तमम्

śuka uvāca | jīvatāmeṣa devendra tvatprasādād vanaspatiḥ | ato nānyamahaṁ deva vṛṇuyāṁ varamuttamam

शुक ने कहा - हे देवेन्द्र! तुम्हारी कृपा से यह वनस्पति (वृक्ष) जीवित हो जाए। हे देव! इससे बढ़कर मैं कोई अन्य उत्तम वर नहीं माँगूँगा।

श्लोक 55 (skanda.8.118.55)

इन्द्र उवाच । कर्मणा स्वेन जन्तूनां गतयः संप्रकीर्तिताः । स्वेनैव कर्मणा पातः किन्तवानेन बुद्धिमन्

indra uvāca | karmaṇā svena jantūnāṁ gatayaḥ saṁprakīrtitāḥ | svenaiva karmaṇā pātaḥ kintavānena buddhiman

इन्द्र ने कहा - प्राणियों की गतियाँ उनके अपने ही कर्मों से निर्धारित होती हैं, ऐसा कहा गया है; अपने ही कर्म से पतन भी होता है। किन्तु, हे बुद्धिमान्! तुम्हारे इस (कृत्य के) कारण -

श्लोक 56 (skanda.8.118.56)

इदं विमानमारुह्य मया दत्तं खगोत्तम । मम लोकं व्रज क्षिप्रं स्तूयमानो यथा नर

idaṁ vimānamāruhya mayā dattaṁ khagottama | mama lokaṁ vraja kṣipraṁ stūyamāno yathā naraḥ

हे पक्षिश्रेष्ठ! मेरे द्वारा दिए गए इस विमान पर चढ़कर, स्तुति किए जाते हुए किसी मनुष्य की भाँति, शीघ्र मेरे लोक को चलो।

श्लोक 57 (skanda.8.118.57)

शुक उवाच । न लोकानहमिच्छामि न विमानं न वै सुखम् । प्रयाचितं प्रयच्छस्व जीवतामेष वै नगः

śuka uvāca | na lokānahamicchāmi na vimānaṁ na vai sukham | prayācitaṁ prayacchasva jīvatāmeṣa vai nagaḥ

शुक ने कहा - मुझे न तो लोक चाहिए, न विमान, न सुख। मैंने जो माँगा है, वही दो - यही वृक्ष जीवित हो जाए।

श्लोक 58 (skanda.8.118.58)

सनत्कुमार उवाच । सद्भावं तस्य तं ज्ञात्वा सर्वं च सुरसत्तमः । चकार स यथापूर्वं वृक्षं सर्वगुणान्वितम्

sanatkumāra uvāca | sadbhāvaṁ tasya taṁ jñātvā sarvaṁ ca surasattamaḥ | cakāra sa yathāpūrvaṁ vṛkṣaṁ sarvaguṇānvitam

सनत्कुमार ने कहा - उसके इस सद्भाव को पूरी तरह जानकर, उस सुरश्रेष्ठ इन्द्र ने उस वृक्ष को पुनः पूर्व की भाँति सब गुणों से युक्त बना दिया।

श्लोक 59 (skanda.8.118.59)

शुकश्च कर्मणा तेन दृढभक्तितयापि च । दीनेष्वभ्युपपत्त्या च ब्रह्मलोकं जगाम ह

śukaśca karmaṇā tena dṛḍhabhaktitayāpi ca | dīneṣvabhyupapattyā ca brahmalokaṁ jagāma ha

और शुक भी उस कर्म के द्वारा, अपनी दृढ़ भक्ति के कारण, तथा दीनों की सहायता करने के गुण के कारण, ब्रह्मलोक को प्राप्त हुआ।

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