अम्बिका खण्ड · अध्याय 119
यातुधान्युपाख्यान
श्लोक 1 (skanda.8.119.1)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते दैवतास्सर्वे कृमिलां नाम वै पुरीम् । उपागता ह्यवैक्षन्त तत्र चेदं महामुने
sanatkumāra uvāca | tataste daivatāssarve kṛmilāṁ nāma vai purīm | upāgatā hyavaikṣanta tatra cedaṁ mahāmune
सनत्कुमार ने कहा - तब वे सभी देवगण कृमिला नामक नगरी में पहुँचे, और हे महामुने! वहाँ उन्होंने यह देखा -
श्लोक 2 (skanda.8.119.2)
ब्राह्मणी गौतमी नाम रुद्राणीव यथापरा । धार्मिकी च वदान्या च तपसा दग्धकिल्विषा
brāhmaṇī gautamī nāma rudrāṇīva yathāparā | dhārmikī ca vadānyā ca tapasā dagdhakilviṣā
वहाँ गौतमी नाम की एक ब्राह्मणी थी, जो मानो दूसरी रुद्राणी हो, धर्मात्मा, उदार, और तप से जिसके पाप जल चुके थे।
श्लोक 3 (skanda.8.119.3)
तस्यास्तपसि सक्ताया ब्रह्मलोकं गते पतौ । कृष्णसर्पेण महता सुतो दष्टो ममार ह
tasyāstapasi saktāyā brahmalokaṁ gate patau | kṛṣṇasarpeṇa mahatā suto daṣṭo mamāra ha
जब वह तपस्या में लीन थी, और उसका पति ब्रह्मलोक को जा चुका था, तब एक विशाल काले सर्प द्वारा डसे जाने से उसका पुत्र मर गया।
श्लोक 4 (skanda.8.119.4)
तं देशमागमत्तत्र व्याधोर्जुनक इत्युत । स आगतस्तदापश्यद्विषेण समभिप्लुतम्
taṁ deśamāgamattatra vyādhorjunaka ityuta | sa āgatastadāpaśyadviṣeṇa samabhiplutam
उसी क्षण वहाँ अर्जुनक नाम का एक व्याध (शिकारी) आ पहुँचा। उसने आते ही उस बालक को विष से पूर्णतः व्याप्त देखा।
श्लोक 5 (skanda.8.119.5)
स गत्वा गौतमीं प्राह सुतोयं ते तपोधने । दष्टोहिना ममाराशु किन्नैनमवबुध्यसे
sa gatvā gautamīṁ prāha sutoyaṁ te tapodhane | daṣṭohinā mamārāśu kinnainamavabudhyase
वह गौतमी के पास जाकर बोला - हे तपोधने! यह तुम्हारा पुत्र है, जो सर्प से डसा जाकर तुरन्त मर गया है। तुम इसे क्यों नहीं जान रही हो?
श्लोक 6 (skanda.8.119.6)
सा तथोक्ता समागम्य पुत्रं दृष्ट्वा गतायुषम् । रुरोद बहुधा व्यास मृतापत्या महाव्रता
sā tathoktā samāgamya putraṁ dṛṣṭvā gatāyuṣam | ruroda bahudhā vyāsa mṛtāpatyā mahāvratā
यह सुनकर, वह वहाँ आई, और अपने प्राणहीन पुत्र को देखकर, हे व्यास! वह महाव्रता, पुत्र-वियोगिनी, बहुत विलाप करने लगी।
श्लोक 7 (skanda.8.119.7)
तस्या विलपमानाया व्याधः सोर्जुनकस्तदा । बिलं खनित्वा निष्कृष्य तमहिं समबन्धत
tasyā vilapamānāyā vyādhaḥ sorjunakastadā | bilaṁ khanitvā niṣkṛṣya tamahiṁ samabandhata
जब वह इस प्रकार विलाप कर रही थी, तब उस अर्जुनक शिकारी ने बिल खोदकर उस सर्प को बाहर खींच निकाला, और उसे बाँध दिया।
श्लोक 8 (skanda.8.119.8)
स बद्धस्तेन दुष्टात्मा कृष्णसर्पः सुदुःखितः । उवाच तं तदा व्याधं योसावर्जुनकः स्मृतः
sa baddhastena duṣṭātmā kṛṣṇasarpaḥ suduḥkhitaḥ | uvāca taṁ tadā vyādhaṁ yosāvarjunakaḥ smṛtaḥ
उससे बाँधा गया वह दुष्ट-हृदय काला सर्प, अत्यन्त दुखी होकर, उस व्याध अर्जुनक से बोला -
श्लोक 9 (skanda.8.119.9)
किं मया तव बद्धेन नाधर्मं परिपश्यसि । न चैव भक्ष्या मर्त्यानां वयं किं मां न मुञ्चसि
kiṁ mayā tava baddhena nādharmaṁ paripaśyasi | na caiva bhakṣyā martyānāṁ vayaṁ kiṁ māṁ na muñcasi
मुझे बाँधने में तुम्हें क्या मिला? क्या तुम इसमें अधर्म नहीं देखते? हम मनुष्यों के भक्ष्य भी नहीं हैं। तुम मुझे क्यों नहीं छोड़ते?
श्लोक 10 (skanda.8.119.10)
अर्जुन उवाच । त्वामाद्य खण्डशः कृत्वा भक्षं दास्यामि वहिर्णे । त्वयायं भक्षितो यस्मादृषिपुत्रो ममार ह
arjuna uvāca | tvāmādya khaṇḍaśaḥ kṛtvā bhakṣaṁ dāsyāmi vahirṇe | tvayāyaṁ bhakṣito yasmādṛṣiputro mamāra ha
अर्जुन ने कहा - मैं आज तुम्हें टुकड़े-टुकड़े करके अग्नि को भोजन के रूप में अर्पित करूँगा, क्योंकि तुमने ही इस ऋषिपुत्र को खा लिया - अर्थात् इसकी मृत्यु का कारण बने।
श्लोक 11 (skanda.8.119.11)
सर्प उवाच । कालेन चोदितोहं तं दष्टवानृषिपुत्रकम् । न मां दोषेणार्जुनक क्षेप्तुमर्हसि तत्त्वतः
sarpa uvāca | kālena coditohaṁ taṁ daṣṭavānṛṣiputrakam | na māṁ doṣeṇārjunaka kṣeptumarhasi tattvataḥ
सर्प ने कहा - मैंने काल द्वारा प्रेरित होकर ही उस ऋषिपुत्र को डसा है। हे अर्जुनक! तुम्हें वस्तुतः मुझ पर दोष नहीं मढ़ना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.8.119.12)
अर्जुन उवाच । चोदितो यदि कालेन दष्टवानसि पन्नग । निमित्तं त्वं हि मरणे तस्माद्धंस्यामि ते भृशम्
arjuna uvāca | codito yadi kālena daṣṭavānasi pannaga | nimittaṁ tvaṁ hi maraṇe tasmāddhaṁsyāmi te bhṛśam
अर्जुन ने कहा - हे सर्प! यदि तुम काल द्वारा प्रेरित होकर ही डसे हो, तो भी तुम ही मृत्यु के निमित्त (साधन) हो। अतः मैं तुम्हें अवश्य ही मार डालूँगा।
श्लोक 13 (skanda.8.119.13)
सनत्कुमार उवाच । ततस्सा गौतमी व्यास कालं मृत्युमथाकरोत् । दुःखेन परमेणार्ता कालो भीतस्ततोभ्यगात्
sanatkumāra uvāca | tatassā gautamī vyāsa kālaṁ mṛtyumathākarot | duḥkhena parameṇārtā kālo bhītastatobhyagāt
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब वह गौतमी, अत्यन्त दुःख से पीड़ित होकर, काल और मृत्यु को (शाप देने के लिए) पुकारने लगी, और भयभीत हुआ काल वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 14 (skanda.8.119.14)
काल उवाच । अहं हि सर्वसत्वानां कालो नास्त्यत्र संशयः । चोदितो मृत्युनैवाहं हतवानृषिपुत्रकम्
kāla uvāca | ahaṁ hi sarvasatvānāṁ kālo nāstyatra saṁśayaḥ | codito mṛtyunaivāhaṁ hatavānṛṣiputrakam
काल ने कहा - मैं ही समस्त प्राणियों का काल हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु मृत्यु द्वारा ही प्रेरित होकर मैंने ऋषिपुत्र को मारा है।
श्लोक 15 (skanda.8.119.15)
अर्जुन उवाच । त्वया वा मृत्युना वायं चोदितो दष्टवान्यदि । वधे निमित्तमेषोस्य तस्मादेनं निहन्म्यहम्
arjuna uvāca | tvayā vā mṛtyunā vāyaṁ codito daṣṭavānyadi | vadhe nimittameṣosya tasmādenaṁ nihanmyaham
अर्जुन ने कहा - चाहे तुमसे प्रेरित होकर, चाहे मृत्यु से प्रेरित होकर, यह सर्प डसा हो - तो भी इसके वध में यही (सर्प) निमित्त है। इसीलिए मैं इसे मार डालूँगा।
श्लोक 16 (skanda.8.119.16)
सनत्कुमार उवाच । अथ मृत्युस्तदाभेत्य तं देशं सुमहामनाः । गौतम्यास्तपसो भीत इदं प्रोवाच सुस्वरम्
sanatkumāra uvāca | atha mṛtyustadābhetya taṁ deśaṁ sumahāmanāḥ | gautamyāstapaso bhīta idaṁ provāca susvaram
सनत्कुमार ने कहा - तब वह अत्यन्त गम्भीर मृत्यु भी उस स्थान पर आ पहुँचा, और गौतमी के तप से भयभीत होकर, मधुर स्वर में यह कहने लगा -
श्लोक 17 (skanda.8.119.17)
अहमप्येष संबद्धं नियत्या सुसमाहितः । मारयामि न मे दोषं कर्तुमर्हसि सुव्रते
ahamapyeṣa saṁbaddhaṁ niyatyā susamāhitaḥ | mārayāmi na me doṣaṁ kartumarhasi suvrate
हे सुव्रते! मैं भी नियति से पूर्णतः बद्ध होकर ही मारता हूँ; तुम्हें मुझ पर दोष नहीं लगाना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.8.119.18)
अर्जुन उवाच । नियतिर्वास्तु मृत्युर्वा कालो वाप्यस्तु कारणम् । कृष्णसर्पो निमित्तं तु तस्माद्वध्यो न संशयः
arjuna uvāca | niyatirvāstu mṛtyurvā kālo vāpyastu kāraṇam | kṛṣṇasarpo nimittaṁ tu tasmādvadhyo na saṁśayaḥ
अर्जुन ने कहा - चाहे नियति कारण हो, चाहे मृत्यु, चाहे काल हो - किन्तु काला सर्प तो साक्षात् निमित्त है, अतः वही वध्य है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 19 (skanda.8.119.19)
सनत्कुमार उवाच । अथागान्नियतिस्तत्र उवाचेदं च सा तदा । गौतमीं दुःखितां व्यास भीता प्राह तदा वचः
sanatkumāra uvāca | athāgānniyatistatra uvācedaṁ ca sā tadā | gautamīṁ duḥkhitāṁ vyāsa bhītā prāha tadā vacaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब नियति भी वहाँ आ पहुँची, और हे व्यास! भयभीत होकर उस दुखी गौतमी से यह वचन कहने लगी -
श्लोक 20 (skanda.8.119.20)
कृतान्तवशगा साध्वि जन्तून्नित्यमतन्द्रिता । पाशैर्बद्ध्वा वशं मृत्योर्नयामि वरवर्णिनि
kṛtāntavaśagā sādhvi jantūnnityamatandritā | pāśairbaddhvā vaśaṁ mṛtyornayāmi varavarṇini
हे साध्वी! मैं सदा कृतान्त (यम) के अधीन रहकर, अथक होकर, प्राणियों को पाशों से बाँधकर मृत्यु के वश में ले जाती हूँ, हे वरवर्णिनी!
श्लोक 21 (skanda.8.119.21)
कृतान्त उवाच । अहं हि किङ्करः साध्वि यमस्य सुमहात्मनः । तेन प्रचोदितो जन्तून्नयामि यमसादनम्
kṛtānta uvāca | ahaṁ hi kiṅkaraḥ sādhvi yamasya sumahātmanaḥ | tena pracodito jantūnnayāmi yamasādanam
कृतान्त ने कहा - हे साध्वी! मैं तो महात्मा यम का सेवक हूँ। उन्हीं से प्रेरित होकर मैं प्राणियों को यम के धाम ले जाता हूँ।
श्लोक 22 (skanda.8.119.22)
अर्जुन उवाच । यमोपि वा कृतान्तो वा एते वाप्यस्य कारणम् । नैवमेवं दुराचारो विमोक्ष्येत कदाचन
arjuna uvāca | yamopi vā kṛtānto vā ete vāpyasya kāraṇam | naivamevaṁ durācāro vimokṣyeta kadācana
अर्जुन ने कहा - चाहे यम कारण हों, चाहे कृतान्त, चाहे ये सब कारण हों - इस दुराचारी सर्प को इस प्रकार कभी मुक्त नहीं किया जा सकता।
श्लोक 23 (skanda.8.119.23)
सनत्कुमार उवाच । ततो यमस्तदा व्यास स्वयमेव महामनाः । तत्रागात्तामिदं चैव गौतमीं सोभ्युवाच ह
sanatkumāra uvāca | tato yamastadā vyāsa svayameva mahāmanāḥ | tatrāgāttāmidaṁ caiva gautamīṁ sobhyuvāca ha
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब स्वयं महामनस्वी यम भी वहाँ आ पहुँचे, और उन्होंने उस गौतमी से यह कहा -
श्लोक 24 (skanda.8.119.24)
नाहं नैते महासत्वास्त पुत्रस्य कारणम् । मरणे तस्य वीक्षस्व शृणु चापि वचो मम
nāhaṁ naite mahāsatvāsta putrasya kāraṇam | maraṇe tasya vīkṣasva śṛṇu cāpi vaco mama
न मैं, न ये महाबली गण, तुम्हारे पुत्र की मृत्यु के वास्तविक कारण हैं। उसकी मृत्यु का सत्य देखो, और मेरा वचन भी सुनो।
श्लोक 25 (skanda.8.119.25)
जन्तूनां देहसंयोगो धर्माधर्मकृतः शुभे । वियोगश्चापि देहेन ताभ्यामेव क्षयात्पुनः
jantūnāṁ dehasaṁyogo dharmādharmakṛtaḥ śubhe | viyogaścāpi dehena tābhyāmeva kṣayātpunaḥ
हे शुभे! प्राणियों का देह से संयोग धर्म और अधर्म के कारण होता है, और देह से वियोग भी उन्हीं दोनों के क्षय होने से होता है।
श्लोक 26 (skanda.8.119.26)
देहिनां धर्म एवैक आयुषो हेतुरुच्यते । तत्क्षये मरणं प्रोक्तं कालो मृत्युश्च स स्मृतः
dehināṁ dharma evaika āyuṣo heturucyate | tatkṣaye maraṇaṁ proktaṁ kālo mṛtyuśca sa smṛtaḥ
जीवधारियों की आयु का हेतु धर्म ही कहा गया है। उसके क्षय होने पर मृत्यु होती है, और वही काल तथा मृत्यु कहलाता है।
श्लोक 27 (skanda.8.119.27)
कृते वर्षसहस्रैस्तु चतुर्भिः काल उच्यते । त्रेतायान्तु त्रिसाहस्रो द्वापरे द्विसहस्रिकः
kṛte varṣasahasraistu caturbhiḥ kāla ucyate | tretāyāntu trisāhasro dvāpare dvisahasrikaḥ
कृतयुग में यह काल (मानव आयु की अवधि) चार हजार वर्षों का कहा जाता है, त्रेता में तीन हजार का, द्वापर में दो हजार का,
श्लोक 28 (skanda.8.119.28)
कलौ तु शतमेवाहुः कालं जन्तोर्महाव्रते । अकालेन्यत्ततः प्रोक्तं तच्चापि मरणं शृणु
kalau tu śatamevāhuḥ kālaṁ jantormahāvrate | akālenyattataḥ proktaṁ taccāpi maraṇaṁ śṛṇu
और हे महाव्रते! कलियुग में तो केवल सौ वर्ष ही एक प्राणी का पूर्ण काल कहा जाता है। इससे कम आयु में जो मृत्यु होती है, उसे अकाल-मृत्यु कहते हैं; उसे भी सुनो।
श्लोक 29 (skanda.8.119.29)
इन्द्रियेष्वस्य ये देवा वसन्ति द्विपदां वरे । तेस्य सर्वे हरन्त्येकं भागं दैवतसत्तमाः
indriyeṣvasya ye devā vasanti dvipadāṁ vare | tesya sarve harantyekaṁ bhāgaṁ daivatasattamāḥ
हे द्विपदों में श्रेष्ठे! जो देवगण किसी प्राणी की इन्द्रियों में निवास करते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ देवगण उसकी आयु का एक भाग हर लेते हैं -
श्लोक 30 (skanda.8.119.30)
चक्षुषा पश्यतो दुष्टं दुष्टं च ब्रुवतस्तथा । शृण्वतो मन्वतश्चैव बुध्यतश्चापि पश्यतः
cakṣuṣā paśyato duṣṭaṁ duṣṭaṁ ca bruvatastathā | śṛṇvato manvataścaiva budhyataścāpi paśyataḥ
जब वह नेत्रों से बुरा देखता है, बुरा बोलता है, बुरा सुनता है, बुरा सोचता है, बुरा समझता है, अथवा बुरा जानता है -
श्लोक 31 (skanda.8.119.31)
तथा स्पर्शयतश्चैव जिघ्रतो भुञ्जतोपि वा । आदानाद् गमानाच्चैव आनन्दोत्सर्गतस्तथा
tathā sparśayataścaiva jighrato bhuñjatopi vā | ādānād gamānāccaiva ānandotsargatastathā
तथा जब वह स्पर्श करता है, सूँघता है, अथवा खाता है दुष्ट रूप से, जब वह ग्रहण करने, चलने, तथा आनन्द के उत्सर्जन (मैथुन आदि) में दुष्टता करता है -
श्लोक 32 (skanda.8.119.32)
भागं भूतानि चान्यं तु हरन्ति पुनरेव हि । सुदुष्टं वर्ततस्तेषु भागञ्च व्याधयोपरम्
bhāgaṁ bhūtāni cānyaṁ tu haranti punareva hi | suduṣṭaṁ vartatasteṣu bhāgañca vyādhayoparam
तब अन्य भूत-गण भी एक भाग हर लेते हैं, जब वह उनके प्रति अत्यन्त दुष्टतापूर्वक बर्ताव करता है; और व्याधियाँ भी एक और भाग हर लेती हैं।
श्लोक 33 (skanda.8.119.33)
अपरं पितरो भागं देवाश्चान्यमतोपरम् । अपरं चर्षयो वह्निश्चन्द्रादित्यौ ग्रहास्तथा
aparaṁ pitaro bhāgaṁ devāścānyamataoparam | aparaṁ carṣayo vahniścandrādityau grahāstathā
पितर एक और भाग हरते हैं, देवगण एक और भाग, तथा ऋषिगण, अग्नि, चन्द्र-सूर्य और ग्रह भी एक-एक भाग हरते हैं।
श्लोक 34 (skanda.8.119.34)
तस्यैवं देहिनः साध्वि यावदेवाहृतं भवेत् । तावदेव स जीवेत अकालः स च वक्ष्यते
tasyaivaṁ dehinaḥ sādhvi yāvadevāhṛtaṁ bhavet | tāvadeva sa jīveta akālaḥ sa ca vakṣyate
हे साध्वी! इस प्रकार जितना भी उस देहधारी से हरा जाता है, उतने ही समय तक वह जीवित रहता है; और उसी को 'अकाल' कहा जाता है।
श्लोक 35 (skanda.8.119.35)
यथा च म्रियते जन्तुरकाले तपसैधिते । तथा शृणु ममाद्येह गदतो वरवर्णिनि
yathā ca mriyate janturakāle tapasaidhite | tathā śṛṇu mamādyeha gadato varavarṇini
हे तपस्या से समृद्ध! किस प्रकार एक प्राणी असमय में मरता है, वह आज मुझसे यहाँ सुनो, हे वरवर्णिनि!
श्लोक 36 (skanda.8.119.36)
यावन्न हीयते तस्य जन्तोरायुर्महाव्रते । तावत्स जीवितं प्राप्य तस्यान्ते म्रियते पुनः
yāvanna hīyate tasya jantorāyurmahāvrate | tāvatsa jīvitaṁ prāpya tasyānte mriyate punaḥ
हे महाव्रते! जब तक उस प्राणी की आयु क्षीण नहीं होती, तब तक वह जीवन पाकर रहता है, और उसके अन्त में ही पुनः मरता है।
श्लोक 37 (skanda.8.119.37)
तस्य येनापराधेन आयुर्देवा हरन्ति तत् । तेनाधर्मो महान्तस्य उत्पन्नो जीवितान्तकः
tasya yenāparādhena āyurdevā haranti tat | tenādharmo mahāntasya utpanno jīvitāntakaḥ
जिस अपराध के कारण देवगण उसकी आयु हरते हैं, उसी अधर्म से उसके लिए वह महान् अधर्म उत्पन्न होता है, जो उसके जीवन का अन्त कर देता है।
श्लोक 38 (skanda.8.119.38)
प्रादुर्भूतस्तदा साध्वि व्याधिर्मर्माणि कृन्तति । स कृत्तमर्मा ह्यवशो देहं त्यक्त्वा महाव्रते
prādurbhūtastadā sādhvi vyādhirmarmāṇi kṛntati | sa kṛttamarmā hyavaśo dehaṁ tyaktvā mahāvrate
तब, हे साध्वी! उत्पन्न हुआ रोग उसके मर्मस्थानों को काट डालता है। हे महाव्रते! अपने मर्मस्थान कटे हुए, वह विवश होकर देह त्याग देता है,
श्लोक 39 (skanda.8.119.39)
अन्यद्देहं समासाद्य गतिमन्यां प्रपद्यते । येस्य व्याधिं न कुरुते सोधर्मोनुग्रहात् पुनः
anyaddehaṁ samāsādya gatimanyāṁ prapadyate | yesya vyādhiṁ na kurute sodharmonugrahāt punaḥ
और नया देह पाकर, वह दूसरी गति को प्राप्त होता है। किन्तु जिसके लिए, कृपावश, वह अधर्म व्याधि उत्पन्न नहीं करता,
श्लोक 40 (skanda.8.119.40)
देवानां देहवासानां तमप्यन्येन हन्ति वै । विषशस्त्रप्रपतनैर्जन्तुभिश्च पृथग्विधैः । अन्यैश्च बहुभिर्घोरैर्नात्र दोषः प्रपश्यतः
devānāṁ dehavāsānāṁ tamapyanyena hanti vai | viṣaśastraprapatanairjantubhiśca pṛthagvidhaiḥ | anyaiśca bahubhirghorairnātra doṣaḥ prapaśyataḥ
उसे भी वे देह में निवास करने वाले देवगण किसी अन्य उपाय से मार डालते हैं - विष से, शस्त्र से, गिरने से, विविध जन्तुओं से, तथा अन्य अनेक भयंकर उपायों से। इसमें किसी के लिए कोई दोष नहीं है, यह समझो।
श्लोक 41 (skanda.8.119.41)
सनत्कुमार उवाच । ततस्सा तपसा दृष्टवा गौतमी सुमहाव्रता । तमर्जुनकमाहेदं वचनं दुःखवर्जिता
sanatkumāra uvāca | tatassā tapasā dṛṣṭavā gautamī sumahāvratā | tamarjunakamāhedaṁ vacanaṁ duḥkhavarjitā
सनत्कुमार ने कहा - तब वह महाव्रता गौतमी, अपने तप से इस सत्य को देखकर, दुःख से मुक्त होकर, उस अर्जुनक से यह वचन कहने लगी -
श्लोक 42 (skanda.8.119.42)
गौतम्युवाच । मुञ्चार्जुनक नायं मे पन्नगो वधमर्हति । आविष्टोयमधर्मेण दैवतैश्चादशत् सुतम्
gautamyuvāca | muñcārjunaka nāyaṁ me pannago vadhamarhati | āviṣṭoyamadharmeṇa daivataiścādaśat sutam
गौतमी ने कहा - हे अर्जुनक! इसे छोड़ दो; यह सर्प वध के योग्य नहीं है। अधर्म से आविष्ट होकर, तथा देवताओं द्वारा प्रेरित होकर ही इसने मेरे पुत्र को डसा है।
श्लोक 43 (skanda.8.119.43)
ईश्वरास्ते महात्मानो जन्तूनाविश्य चेतनान् । अचेतनाँश्च सर्वेत्र प्रयुञ्जन्ति यथातथम्
īśvarāste mahātmāno jantūnāviśya cetanān | acetanām̐śca sarvetra prayuñjanti yathātatham
वे महात्मा ईश्वरगण चेतन और अचेतन दोनों ही प्राणियों में प्रवेश करके, सर्वत्र उन्हें उचित रूप से प्रयुक्त करते हैं।
श्लोक 44 (skanda.8.119.44)
मृत एष स्वधर्मेण नास्ति दोषस्तपस्विनाम् । गच्छध्वं दैवताः सर्वे स्वान् गृहान् किमिहास्यते
mṛta eṣa svadharmeṇa nāsti doṣastapasvinām | gacchadhvaṁ daivatāḥ sarve svān gṛhān kimihāsyate
यह मेरा पुत्र अपने ही धर्म से मरा है; इसमें तपस्वियों (आप सबका) कोई दोष नहीं है। हे सब देवताओ! अपने-अपने घर जाओ; यहाँ और क्यों ठहरना?
श्लोक 45 (skanda.8.119.45)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ता देवताः सर्वाः प्रेषिता ब्रह्मयोषिता । सममूचुस्तदा व्यास गौतमीं तामिदं वचः
sanatkumāra uvāca | tatastā devatāḥ sarvāḥ preṣitā brahmayoṣitā | samamūcustadā vyāsa gautamīṁ tāmidaṁ vacaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब उस ब्राह्मणी द्वारा विदा किए गए वे सभी देवगण, हे व्यास! उस गौतमी से एक साथ यह वचन कहने लगे -
श्लोक 46 (skanda.8.119.46)
देवा ऊचुः । तुष्टाः स्म तव धर्मज्ञे तपसा दग्धकिल्बिषे । जीवतामेष ते पुत्रः स्वधर्मे चावतिष्ठतु
devā ūcuḥ | tuṣṭāḥ sma tava dharmajñe tapasā dagdhakilbiṣe | jīvatāmeṣa te putraḥ svadharme cāvatiṣṭhatu
देवताओं ने कहा - हे धर्मज्ञे! हे तप से पाप-रहित! हम तुमसे प्रसन्न हैं। तुम्हारा यह पुत्र जीवित हो जाए, और अपने धर्म में स्थिर रहे।
श्लोक 47 (skanda.8.119.47)
सर्प एष स्वयं साध्वि अधर्मो मूर्तिमान् स्थितः । व्याधरूपी च धर्मोयं पश्यैतौ सुमहाव्रते
sarpa eṣa svayaṁ sādhvi adharmo mūrtimān sthitaḥ | vyādharūpī ca dharmoyaṁ paśyaitau sumahāvrate
हे साध्वी! यह सर्प स्वयं मूर्तिमान् अधर्म है, और यह व्याध-रूपी धर्म है। हे महाव्रते! इन दोनों को देखो।
श्लोक 48 (skanda.8.119.48)
परीक्षा ते कृता ह्येषा देवैरेतैर्महाव्रते । तवाक्षया भविष्यन्ति लोकाः सर्वे न संशयः
parīkṣā te kṛtā hyeṣā devairetairmahāvrate | tavākṣayā bhaviṣyanti lokāḥ sarve na saṁśayaḥ
हे महाव्रते! तुम्हारी यह परीक्षा हम इन देवताओं द्वारा ली गई है। तुम्हें सभी लोक अक्षय रूप से प्राप्त होंगे, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 49 (skanda.8.119.49)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते सहसा तत्र देवा इन्द्रपुरोगमाः । अवैक्षन्त यथावृत्तं तच्च सर्वं न्यवेदयम्
sanatkumāra uvāca | tataste sahasā tatra devā indrapurogamāḥ | avaikṣanta yathāvṛttaṁ tacca sarvaṁ nyavedayam
सनत्कुमार ने कहा - तब वे देवगण, इन्द्र को आगे किए हुए, वहाँ जो कुछ हुआ था, उसे तुरन्त देखते रहे। यह सब मैंने तुम्हें बता दिया है।
श्लोक 50 (skanda.8.119.50)
स्नात्वा चान्यदगच्छन्ते पुनस्तीर्थं समाहिताः । सर्व एव महाभागास्तथान्यानि पुनः पुनः
snātvā cānyadagacchante punastīrthaṁ samāhitāḥ | sarva eva mahābhāgāstathānyāni punaḥ punaḥ
स्नान करके, वे सभी महाभाग देवगण, एकाग्रचित्त होकर, फिर दूसरे तीर्थ को गए, और इसी प्रकार बार-बार अन्य तीर्थों को भी गए।
श्लोक 51 (skanda.8.119.51)
क्रमेण विहरन्तस्ते कृत्यामभ्यागमत्पुनः । यत्र कृत्या हता पूर्वं देवेन्द्रेण महौजसा
krameṇa viharantaste kṛtyāmabhyāgamatpunaḥ | yatra kṛtyā hatā pūrvaṁ devendreṇa mahaujasā
इस प्रकार क्रमशः विचरण करते हुए, वे पुनः उस स्थान पर पहुँचे जहाँ पहले उस कृत्या को महातेजस्वी देवेन्द्र ने मारा था।
श्लोक 52 (skanda.8.119.52)
व्यास उवाच । केन सोत्पादिता कृत्या किमर्थं कस्य वा विभो । कथं च निहता भूय एतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca | kena sotpāditā kṛtyā kimarthaṁ kasya vā vibho | kathaṁ ca nihatā bhūya etadicchāmi veditum
व्यास ने कहा - हे प्रभो! वह कृत्या किसके द्वारा, किसलिए, और किसकी उत्पन्न की गई थी? वह किस प्रकार मारी गई? यह मैं पुनः जानना चाहता हूँ।
श्लोक 53 (skanda.8.119.53)
सनत्कुमार उवाच । तृणबिन्दुरिति ख्यात आसीद्राजा महाबलः । स प्रोवाच मुनीन् सप्त इदं वचनकोविदः
sanatkumāra uvāca | tṛṇabinduriti khyāta āsīdrājā mahābalaḥ | sa provāca munīn sapta idaṁ vacanakovidaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तृणबिन्दु नाम से विख्यात एक महाबली राजा थे। उस वाक्य-कुशल राजा ने सात मुनियों से यह कहा -
श्लोक 54 (skanda.8.119.54)
याजयध्वं हि मां विप्रा दास्ये वित्तं हि वो बहु । तेब्रुवन्न वयं साधो याजयाम नरेश्वर
yājayadhvaṁ hi māṁ viprā dāsye vittaṁ hi vo bahu | tebruvanna vayaṁ sādho yājayāma nareśvara
हे विप्रो! मेरे लिए यज्ञ कराओ; मैं तुम्हें प्रचुर धन दूँगा। उन्होंने कहा - हे साधो! हे नरेश्वर! हम यज्ञ नहीं करा सकते।
श्लोक 55 (skanda.8.119.55)
स दीक्षितो यदान्येन अनावृष्ट्या महामनाः । ते वै बुभुक्षयाविष्टा यज्ञं प्राप्ता यदृच्छया
sa dīkṣito yadānyena anāvṛṣṭyā mahāmanāḥ | te vai bubhukṣayāviṣṭā yajñaṁ prāptā yadṛcchayā
जब उस महामना राजा ने किसी अन्य आचार्य से दीक्षा ली, और उस समय (देश में) अनावृष्टि थी, तब वे ही ऋषिगण भूख से पीड़ित होकर संयोगवश उस यज्ञ में जा पहुँचे।
श्लोक 56 (skanda.8.119.56)
अथ तानब्रवीद्राजा ब्रूत किं प्रददानि वः । ऊचुस्ते क्रुद्धवदनाः सुतं नो दत्स्व पार्थिव
atha tānabravīdrājā brūta kiṁ pradadāni vaḥ | ūcuste kruddhavadanāḥ sutaṁ no datsva pārthiva
तब राजा ने उनसे कहा - बताओ, मैं तुम्हें क्या दूँ? उन्होंने क्रोधित मुखों से कहा - हे राजन्! अपना पुत्र हमें दे दो।
श्लोक 57 (skanda.8.119.57)
तेभ्यः सत्कृत्य पुत्रञ्च धनञ्चैव स पार्थिवः । प्रणम्य बहुमानेन पाराशर्योपपादयत्
tebhyaḥ satkṛtya putrañca dhanañcaiva sa pārthivaḥ | praṇamya bahumānena pārāśaryopapādayat
उस राजा ने उनका सत्कार करके, बड़े आदर से प्रणाम करते हुए, अपने पुत्र को तथा धन को भी, पाराशर्य ऋषि के हाथ में सौंप दिया।
श्लोक 58 (skanda.8.119.58)
तथा तस्यानतस्यैवं द्रव्यं हित्वा तपोधनाः । सुतं गृहीत्वागच्छन्ते सौकुमार्यात् स बालकः
tathā tasyānatasyaivaṁ dravyaṁ hitvā tapodhanāḥ | sutaṁ gṛhītvāgacchante saukumāryāt sa bālakaḥ
उस झुकते हुए राजा का धन छोड़कर, उन तपोधन ऋषियों ने उसके पुत्र को ही लेकर प्रस्थान किया, क्योंकि वह बालक अत्यन्त कोमल था -
श्लोक 59 (skanda.8.119.59)
क्षुत्तृषाभ्यर्दितस्तत्र अध्वना च ममार ह । दावाग्नौ ते च तं न्यस्य निरीक्षन्तोवतस्थिरे
kṣuttṛṣābhyarditastatra adhvanā ca mamāra ha | dāvāgnau te ca taṁ nyasya nirīkṣantovatasthire
वह मार्ग में भूख-प्यास से पीड़ित होकर मर गया। तब उन ऋषियों ने उसे वन की अग्नि में डालकर, वहीं खड़े होकर देखते रहे।
श्लोक 60 (skanda.8.119.60)
तेषां तत्रेक्षतां व्यास आजगाम नराधिपः । उवाच तानृषीँश्चेदं प्रहसन् दिव्यकुण्डलः
teṣāṁ tatrekṣatāṁ vyāsa ājagāma narādhipaḥ | uvāca tānṛṣīm̐ścedaṁ prahasan divyakuṇḍalaḥ
हे व्यास! जब वे वहाँ देख रहे थे, तभी वह राजा (तृणबिन्दु) वहाँ आ पहुँचा। दिव्य कुण्डलों वाले उस राजा ने हँसते हुए उन ऋषियों से यह कहा -
श्लोक 61 (skanda.8.119.61)
तृणबिन्दुरुवाच । यूयं प्रतिग्रहं मत्तो नागृह्णत तपोधनाः । याजयध्वं न चैवास्मान् मुनयस्तपसैधिताः
tṛṇabinduruvāca | yūyaṁ pratigrahaṁ matto nāgṛhṇata tapodhanāḥ | yājayadhvaṁ na caivāsmān munayastapasaidhitāḥ
तृणबिन्दु ने कहा - हे तपोधनो! तुमने मुझसे कोई भेंट स्वीकार नहीं की; तथा हे तप से समृद्ध मुनियो! तुमने मेरे लिए यज्ञ भी नहीं कराया।
श्लोक 62 (skanda.8.119.62)
इह दोषं न पश्यध्वं मरणेस्य शिशोर्द्विजाः । अधर्म्ये चायशस्ये च अहो धर्मे हि वो मतिः
iha doṣaṁ na paśyadhvaṁ maraṇesya śiśordvijāḥ | adharmye cāyaśasye ca aho dharme hi vo matiḥ
हे द्विजो! तुम इस बालक की मृत्यु में, जो अधर्म्य और अपयशकारी है, कोई दोष नहीं देखते। आश्चर्य है, तुम्हारी बुद्धि धर्म में ऐसी लगी है!
श्लोक 63 (skanda.8.119.63)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते तमनादृत्य अनुक्त्वा किञ्चिदेव च । जग्मुरन्यां दिशं व्यास वने क्षुत्परिपीडिताः
sanatkumāra uvāca | tataste tamanādṛtya anuktvā kiñcideva ca | jagmuranyāṁ diśaṁ vyāsa vane kṣutparipīḍitāḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब उन्होंने उसकी उपेक्षा करके, कुछ भी न कहते हुए, हे व्यास! वन में भूख से पीड़ित होकर, दूसरी दिशा की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 64 (skanda.8.119.64)
तृणबिन्दुश्च तपसा तत्र वृक्षान् बहूँस्तदा । असृजत् तत्क्षणाद् व्यास तेषां सुखहितेप्सया
tṛṇabinduśca tapasā tatra vṛkṣān bahūm̐stadā | asṛjat tatkṣaṇād vyāsa teṣāṁ sukhahitepsayā
तब तृणबिन्दु ने अपने तप से वहाँ तत्काल अनेक वृक्षों की सृष्टि कर दी, हे व्यास! उन्हीं (ऋषियों) के सुख और हित की कामना से।
श्लोक 65 (skanda.8.119.65)
ते च तद्वनमासाद्य बहून् वृक्षान् फलान्वितान् । अपश्यन्त तदा व्यास परां तुष्टिं च ते ययुः
te ca tadvanamāsādya bahūn vṛkṣān phalānvitān | apaśyanta tadā vyāsa parāṁ tuṣṭiṁ ca te yayuḥ
वे उस वन में पहुँचकर फलों से लदे अनेक वृक्षों को देखने लगे, और हे व्यास! तब वे परम संतोष को प्राप्त हुए।
श्लोक 66 (skanda.8.119.66)
गृहीत्वा बिभिदुश्चैव ददृशुश्चैव तेष्वथ । सुवर्णमन्नं भक्षाँश्च तथा रौप्यञ्च सुप्रभम्
gṛhītvā bibhiduścaiva dadṛśuścaiva teṣvatha | suvarṇamannaṁ bhakṣām̐śca tathā raupyañca suprabham
उन्होंने उन फलों को तोड़कर देखा, तो उनमें उन्हें स्वर्ण, अन्न, विविध खाद्य पदार्थ, तथा उज्ज्वल चाँदी भी मिली।
श्लोक 67 (skanda.8.119.67)
तृणुबिन्दुकृतं तच्च तेमन्यन्त तपोन्विताः । ततस्ते तद्वनं त्यक्त्वा ऋष्यः सप्त सुव्रताः । अन्यां दिशं प्रपद्यन्त तृणबिन्दुश्चुकोप च
tṛṇubindukṛtaṁ tacca temanyanta taponvitāḥ | tataste tadvanaṁ tyaktvā ṛṣyaḥ sapta suvratāḥ | anyāṁ diśaṁ prapadyanta tṛṇabinduścukopa ca
उन तपस्वियों ने समझ लिया कि यह सब तृणबिन्दु द्वारा ही किया गया है। तब वे सातों सुव्रत ऋषि उस वन को त्यागकर दूसरी दिशा में चले गए, और तृणबिन्दु क्रुद्ध हो गया।
श्लोक 68 (skanda.8.119.68)
उवाच तानृषीन् गत्वा प्रणतः प्राञ्जलिश्च सः । मन्युनातिपरीतात्मा संविग्नोथ नराधिपः
uvāca tānṛṣīn gatvā praṇataḥ prāñjaliśca saḥ | manyunātiparītātmā saṁvignotha narādhipaḥ
वह राजा, क्रोध से पूर्णतः व्याकुल-चित्त होकर, उन ऋषियों के पास जाकर, हाथ जोड़कर, नमन करते हुए, विचलित होकर बोला -
श्लोक 69 (skanda.8.119.69)
तृणबिन्दुरुवाच । नैवास्मि पतितो विप्रा दुष्टकर्मा न चैव ह । न चैव वर्जितो विप्रैर्न चायज्वा न पापकृत्
tṛṇabinduruvāca | naivāsmi patito viprā duṣṭakarmā na caiva ha | na caiva varjito viprairna cāyajvā na pāpakṛt
तृणबिन्दु ने कहा - हे विप्रो! मैं न तो पतित हूँ, न दुष्ट-कर्मा हूँ, न ब्राह्मणों द्वारा त्यक्त हूँ, न यज्ञ-रहित हूँ, न पापकर्मा हूँ।
श्लोक 70 (skanda.8.119.70)
नराधिपानां वंशेस्मि जातः शुद्धे तपोधनाः । सम्यक् प्रजाः पालयामि किं मां न बहु मन्यत
narādhipānāṁ vaṁśesmi jātaḥ śuddhe tapodhanāḥ | samyak prajāḥ pālayāmi kiṁ māṁ na bahu manyata
हे तपोधनो! मैं राजाओं के शुद्ध वंश में जन्मा हूँ, और अपनी प्रजा का भली-भाँति पालन करता हूँ। फिर तुम मेरा इतना अनादर क्यों कर रहे हो?
श्लोक 71 (skanda.8.119.71)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ऋषयस्ते महाव्रताः । ऊचुर्न ते वयं राजन् प्रतिगृहणीम सर्वथा
tasya tadvacanaṁ śrutvā ṛṣayaste mahāvratāḥ | ūcurna te vayaṁ rājan pratigṛhaṇīma sarvathā
उसके इस वचन को सुनकर, उन महाव्रती ऋषियों ने कहा - हे राजन्! हम तुमसे कदापि कुछ स्वीकार नहीं करेंगे।
श्लोक 72 (skanda.8.119.72)
शोभनोसि गुणैर्युक्तः प्रजापालः प्रजापतिः । सन्तुष्टाः स्मो न ते द्रव्यं प्रतिगृह्णीम भूपते
śobhanosi guṇairyuktaḥ prajāpālaḥ prajāpatiḥ | santuṣṭāḥ smo na te dravyaṁ pratigṛhṇīma bhūpate
तुम गुणों से युक्त, उत्तम, प्रजा के पालक, प्रजापति-तुल्य हो। हम संतुष्ट हैं, किन्तु, हे भूपते! हम तुम्हारी सम्पत्ति स्वीकार नहीं करेंगे।
श्लोक 73 (skanda.8.119.73)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्त्वा राजानं सर्व एव ययुर्मुने । सोपि राजा महामन्युस्तदा दीप्तं हुताशनम्
sanatkumāra uvāca | ta evamuktvā rājānaṁ sarva eva yayurmune | sopi rājā mahāmanyustadā dīptaṁ hutāśanam
सनत्कुमार ने कहा - हे मुने! इस प्रकार राजा से कहकर वे सब चले गए। तब वह राजा भी, अत्यन्त क्रोध से भरा हुआ, जलती हुई अग्नि की ओर बढ़ा -
श्लोक 74 (skanda.8.119.74)
जुहाव कृत्यां तस्माच्च चकार सुमहाबलाम् । यातुधानीमिति ख्यातामुवाचेदं च तां तदा
juhāva kṛtyāṁ tasmācca cakāra sumahābalām | yātudhānīmiti khyātāmuvācedaṁ ca tāṁ tadā
और उसमें आहुति देकर उससे एक अत्यन्त महाबली कृत्या को उत्पन्न किया, जो 'यातुधानी' नाम से विख्यात हुई। तब उसने उससे यह कहा -
श्लोक 75 (skanda.8.119.75)
गत्वा सप्त मुनीन् कृत्ये भक्षयस्व महाबले । उपधार्य हि नामानि वसिष्ठादीँस्तपोधनान्
gatvā sapta munīn kṛtye bhakṣayasva mahābale | upadhārya hi nāmāni vasiṣṭhādīm̐stapodhanān
हे कृत्ये! हे महाबले! जाकर उन सातों मुनियों को - वसिष्ठ आदि तपोधनों को - उनके नाम पहचानकर खा जाओ।
श्लोक 76 (skanda.8.119.76)
सा गत्वा तु शुभान्नाम दिव्यां पुष्करिणीं शुभाम् । तस्यास्तीरं समासाद्य तस्थौ तान् वै प्रतीक्षती
sā gatvā tu śubhānnāma divyāṁ puṣkariṇīṁ śubhām | tasyāstīraṁ samāsādya tasthau tān vai pratīkṣatī
वह जाकर शुभान्ना नामक उस दिव्य, शुभ पुष्करिणी के तट पर पहुँची, और वहीं ठहरकर उनकी प्रतीक्षा करने लगी।
श्लोक 77 (skanda.8.119.77)
ऋषयस्तेपि संविग्नाः क्षुत्तृष्णाव्याकुलेन्द्रियाः । अन्यान्देशान् विमार्गन्तः शुभां वापीं ययुस्ततः
ṛṣayastepi saṁvignāḥ kṣuttṛṣṇāvyākulendriyāḥ | anyāndeśān vimārgantaḥ śubhāṁ vāpīṁ yayustataḥ
वे ऋषिगण भी, हुनगर-प्यास से व्याकुल-इन्द्रिय होकर, अन्य स्थानों की खोज करते हुए, उस शुभ बावड़ी की ओर आ पहुँचे।
श्लोक 78 (skanda.8.119.78)
सनत्कुमार उवाच । तेषां तद्गमने व्यास दृष्ट्वा दोषं पुरन्दरः । परिव्राजकवेषेण श्वद्वितीयोभ्यगच्छत
sanatkumāra uvāca | teṣāṁ tadgamane vyāsa dṛṣṭvā doṣaṁ purandaraḥ | parivrājakaveṣeṇa śvadvitīyobhyagacchat
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! उनके इस प्रकार वहाँ जाने में आने वाले संकट को देखकर, इन्द्र परिव्राजक (परिव्राजक साधु) का वेश धारण कर, एक कुत्ते के साथ वहाँ आया।
श्लोक 79 (skanda.8.119.79)
तं दृष्ट्वा तेब्रुवन् सर्वे परस्परमनुल्वणम् । हसन्तं तं महाबाहुं त्रिदण्डव्यग्रपाणिनम्
taṁ dṛṣṭvā tebruvan sarve parasparamanulvaṇam | hasantaṁ taṁ mahābāhuṁ tridaṇḍavyagrapāṇinam
उस हँसते हुए, महाबाहु, हाथ में त्रिदण्ड लिए हुए, अत्यन्त सामान्य दिखने वाले पुरुष को देखकर, वे सब आपस में एक-दूसरे से कहने लगे -
श्लोक 80 (skanda.8.119.80)
ऋषय ऊचुः । नूनमेष दिवारात्रौ नित्यमेव ह्यतन्द्रितः । चखाद यत एषोत्र ततोयं पीवरोभवत्
ṛṣaya ūcuḥ | nūnameṣa divārātrau nityameva hyatandritaḥ | cakhāda yata eṣotra tatoyaṁ pīvarobhavat
ऋषियों ने कहा - निश्चय ही यह दिन-रात्रि सदा अथक होकर खाता रहा है, इसीलिए यह यहाँ इतना मोटा हो गया है।
श्लोक 81 (skanda.8.119.81)
अथवोत्तानहस्तोयं नित्यमेव प्रयाचकः । तपःस्वाध्यायविक्रेता तेनायं पीवरोभवत्
athavottānahastoyaṁ nityameva prayācakaḥ | tapaḥsvādhyāyavikretā tenāyaṁ pīvarobhavat
अथवा यह सदा हाथ फैलाए हुए भिखारी होगा, तप और स्वाध्याय को बेचने वाला; इसी से यह इतना मोटा हो गया है।
श्लोक 82 (skanda.8.119.82)
तमेवं बहुधा कल्प्य ऋषयस्ते तपोधनाः । पप्रच्छुरमितात्मानं कस्त्वमित्येव वादिनः
tamevaṁ bahudhā kalpya ṛṣayaste tapodhanāḥ | papracchuramitātmānaṁ kastvamityeva vādinaḥ
इस प्रकार उसके विषय में बहुत तरह की कल्पनाएँ करके, उन तपोधन ऋषियों ने उस अपरिमेय आत्मा वाले (इन्द्र) से पूछा - तुम कौन हो?
श्लोक 83 (skanda.8.119.83)
इन्द्र उवाच । अहं परिव्राड् विप्रेन्द्रा आगच्छामि दशेरकात् । प्रयास्यामि शुभां वापीं नाम्नाहं तु शुनस्सखा
indra uvāca | ahaṁ parivrāḍ viprendrā āgacchāmi daśerakāt | prayāsyāmi śubhāṁ vāpīṁ nāmnāhaṁ tu śunassakhā
इन्द्र ने कहा - हे विप्रेन्द्रो! मैं एक परिव्राजक हूँ, दशेरक से आ रहा हूँ, और उस शुभ बावड़ी की ओर जा रहा हूँ। मेरा नाम श्वसखा (कुत्ते का मित्र) है।
श्लोक 84 (skanda.8.119.84)
श्वानो मम सदा हीष्टाः शुनां चैव सदा ह्यहम् । तस्माच्छुनः सखा नाम्ना ख्यातोहं द्विजसत्तमाः
śvāno mama sadā hīṣṭāḥ śunāṁ caiva sadā hyaham | tasmācchunaḥ sakhā nāmnā khyātohaṁ dvijasattamāḥ
मुझे कुत्ते सदा प्रिय हैं, और मैं भी सदा कुत्तों का प्रिय हूँ। हे द्विजश्रेष्ठो! इसीलिए मैं 'श्वसखा' नाम से विख्यात हूँ।
श्लोक 85 (skanda.8.119.85)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते सह तेनैव शुभां पुष्करिणीं ययुः । ददृशुस्तां च कृत्यां ते तया चैव निवारिताः
sanatkumāra uvāca | tataste saha tenaiva śubhāṁ puṣkariṇīṁ yayuḥ | dadṛśustāṁ ca kṛtyāṁ te tayā caiva nivāritāḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब वे उसी के साथ उस शुभ पुष्करिणी की ओर गए, और वहाँ उन्होंने उस कृत्या को देखा; उसी ने उन्हें रोक लिया।
श्लोक 86 (skanda.8.119.86)
यदि वा रोचते विप्रा अस्यामभ्यवगाहितुम् । नामानि कथयित्वेह चरध्वं सुखमव्ययाः
yadi vā rocate viprā asyāmabhyavagāhitum | nāmāni kathayitveha caradhvaṁ sukhamavyayāḥ
(कृत्या ने कहा -) हे विप्रो! यदि तुम्हें इसमें स्नान करना अच्छा लगता है, तो अपने-अपने नाम बताकर, हे अविनाशियो! सुखपूर्वक विचरो।
श्लोक 87 (skanda.8.119.87)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते तां तदा कन्यामूचुरेवं भवत्विति । श्वसखा चेदमाहैनानृषीन् सर्वानरिदन्दमः
sanatkumāra uvāca | tataste tāṁ tadā kanyāmūcurevaṁ bhavatviti | śvasakhā cedamāhaināanṛṣīn sarvānaridandamaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब उन्होंने उस कन्या से 'ऐसा ही हो' कहा। इसी बीच शत्रुओं को दमन करने वाले श्वसखा ने उन सब ऋषियों से यह कहा -
श्लोक 88 (skanda.8.119.88)
विप्रा इयं यातुधानी नेयं प्रकृतमानुषी । भवितव्यं हि कार्येण यथेयं वदते हि वः
viprā iyaṁ yātudhānī neyaṁ prakṛtamānuṣī | bhavitavyaṁ hi kāryeṇa yatheyaṁ vadate hi vaḥ
हे विप्रो! यह यातुधानी है, यह साधारण मनुष्य-स्त्री नहीं है। इसका उद्देश्य ही ऐसा है कि यह तुमसे इस प्रकार कह रही है।
श्लोक 89 (skanda.8.119.89)
ते यूयं यदि मन्यध्वं श्रेयः परमकं हितम् । तथा नामानि विब्रूत यथेयं नोपधारयेत्
te yūyaṁ yadi manyadhvaṁ śreyaḥ paramakaṁ hitam | tathā nāmāni vibrūta yatheyaṁ nopadhārayet
यदि तुम अपने परम श्रेय और हित को चाहते हो, तो अपने नाम इस प्रकार बताओ कि यह उन्हें ठीक से समझ न सके।
श्लोक 90 (skanda.8.119.90)
सनत्कुमार उवाच । एवं भवत्विति प्रोच्य ते व्यास मुनयः शुभाः । नामानि तस्याः श्राव्यैव यथेष्टं ते जगाहिरे
sanatkumāra uvāca | evaṁ bhavatviti procya te vyāsa munayaḥ śubhāḥ | nāmāni tasyāḥ śrāvyaiva yatheṣṭaṁ te jagāhire
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! 'ऐसा ही हो' कहकर, वे शुभ मुनि उसे अपने नाम केवल सुना भर देते हुए, अपनी इच्छानुसार उस बावड़ी में उतर गए।
श्लोक 91 (skanda.8.119.91)
नैरुक्तानि स्वनामानि दुर्बोधानि च तेब्रुवन् । न मेने यानि कृत्या सा ततस्ते जलमाविशन्
nairuktāni svanāmāni durbodhāni ca tebruvan | na mene yāni kṛtyā sā tataste jalamāviśan
उन्होंने अपने नाम व्युत्पत्ति-गत, दुर्बोध रूप में कहे, जिन्हें वह कृत्या ठीक से समझ नहीं सकी; तत्पश्चात् वे जल में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 92 (skanda.8.119.92)
सनत्कुमार उवाच । तेषामलक्षयित्वा सा नामानि तु शिखोद्भवा । श्वसखं प्राह ब्रूहि त्वं ततो यास्यसि वा न वा
sanatkumāra uvāca | teṣāmalakṣayitvā sā nāmāni tu śikhodbhavā | śvasakhaṁ prāha brūhi tvaṁ tato yāsyasi vā na vā
सनत्कुमार ने कहा - उनके नामों को न समझ पाने के कारण, उस अग्नि से उत्पन्न कृत्या ने श्वसखा से कहा - अब तुम बताओ, तभी तुम आगे जा सकोगे, अन्यथा नहीं।
श्लोक 93 (skanda.8.119.93)
श्वसख उवाच । शुनामस्मि सखा क्रूरे श्वभिश्च सह संगतः । श्वसखं तेन मां विद्धि यातुधानि निशाचरि
śvasakha uvāca | śunāmasmi sakhā krūre śvabhiśca saha saṅgataḥ | śvasakhaṁ tena māṁ viddhi yātudhāni niśācari
श्वसखा ने कहा - हे क्रूरे! मैं कुत्तों का मित्र हूँ, और सदा कुत्तों के साथ रहता हूँ। इसीलिए, हे यातुधानी! हे निशाचरी! मुझे 'श्वसखा' जानो।
श्लोक 94 (skanda.8.119.94)
यातुधान्युवाच । सकृदेव पुनर्ब्रूहि नाम त्वं मानुषाधम । ततो यास्यसि विप्राणां समीपं विदितो मम
yātudhānyuvāca | sakṛdeva punarbrūhi nāma tvaṁ mānuṣādhama | tato yāsyasi viprāṇāṁ samīpaṁ vidito mama
यातुधानी ने कहा - हे नराधम! एक बार फिर अपना नाम बताओ, तभी तुम मेरे द्वारा पहचाने जाकर उन ब्राह्मणों के पास जा सकोगे।
श्लोक 95 (skanda.8.119.95)
श्वसख उवाच । शुनामस्मि सखा देवः सख्यं मेनपगं श्वभिः । श्वसखा तेन हन्मि त्वा यातुधानि निशामय
śvasakha uvāca | śunāmasmi sakhā devaḥ sakhyaṁ menapagaṁ śvabhiḥ | śvasakhā tena hanmi tvā yātudhāni niśāmaya
श्वसखा ने कहा - मैं ही वह देव हूँ जो कुत्तों का मित्र है; कुत्तों के साथ मेरी मित्रता कभी नहीं छूटती। हे यातुधानी! सुन लो - मैं ही श्वसखा हूँ, और तुझे मारने वाला भी मैं ही हूँ।
श्लोक 96 (skanda.8.119.96)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्त्वा तां क्रूरां त्रिदण्डेन सुरेश्वरः । मूर्ध्न्याजघान तेनाशु भस्मसादभवच्च सा
sanatkumāra uvāca | sa evamuktvā tāṁ krūrāṁ tridaṇḍena sureśvaraḥ | mūrdhnyājaghāna tenāśu bhasmasādabhavacca sā
सनत्कुमार ने कहा - ऐसा कहकर, सुरेश्वर इन्द्र ने उस क्रूर यातुधानी को अपने त्रिदण्ड से सिर पर मारा; उससे वह तुरन्त भस्म हो गई।
श्लोक 97 (skanda.8.119.97)
तृणबिन्दुसुतश्चासौ कृत्यया हतमात्रया । शक्रेण जीवितस्तूर्णं पितरं समुपागमत्
tṛṇabindusutaścāsau kṛtyayā hatamātrayā | śakreṇa jīvitastūrṇaṁ pitaraṁ samupāgamat
जैसे ही वह कृत्या मारी गई, वैसे ही तृणबिन्दु का वह पुत्र भी इन्द्र द्वारा पुनर्जीवित हो उठा, और तुरन्त अपने पिता के पास चला गया।
श्लोक 98 (skanda.8.119.98)
सनत्कुमार उवाच । एवं तां स निहत्येन्द्रः श्वसखा शक्तिनन्दन । मृणालविसपद्मानि ऋषीणामहरत्पुनः
sanatkumāra uvāca | evaṁ tāṁ sa nihatyendraḥ śvasakhā śaktinandana | mṛṇālavisapadmāni ṛṣīṇāmaharatpunaḥ
सनत्कुमार ने कहा - हे शक्तिनन्दन! इस प्रकार श्वसखा-रूपी इन्द्र ने उसे मारकर, फिर ऋषियों के कमलनाल, कन्द और कमलों को भी हर लिया।
श्लोक 99 (skanda.8.119.99)
ततस्ते सम्यगुत्तीर्णा अपश्यन्तो रुषान्विताः । चक्रिरे शपथान् विप्राः परस्परमनुव्रताः
tataste samyaguttīrṇā apaśyanto ruṣānvitāḥ | cakrire śapathān viprāḥ parasparamanuvratāḥ
जब वे भली-भाँति स्नान करके निकले, तो अपनी वे वस्तुएँ न पाकर, क्रुद्ध होकर, वे ब्राह्मण आपस में एक-दूसरे के प्रति शपथ लेने लगे।
श्लोक 100 (skanda.8.119.100)
ततस्ते सर्व एवैत्य श्वसखं मुनिसत्तमाः । अब्रुवन् त्वयि शंका नो ब्रूहि येन विमुच्यसे
tataste sarva evaitya śvasakhaṁ munisattamāḥ | abruvan tvayi śaṅkā no brūhi yena vimucyase
तब वे सभी श्रेष्ठ मुनि, श्वसखा के पास आकर बोले - हमारा संदेह तुम पर ही है; बताओ, किस प्रकार तुम इस संदेह से मुक्त हो सकते हो।
श्लोक 101 (skanda.8.119.101)
श्वसख उवाच । यो वो हरति मूलानि पुष्पाणि च फलानि च । स सुखी मिष्टमश्नातु ससुहृत् सपरिग्रहः
śvasakha uvāca | yo vo harati mūlāni puṣpāṇi ca phalāni ca | sa sukhī miṣṭamaśnātu sasuhṛt saparigrahaḥ
श्वसखा ने कहा - जो भी तुम्हारे कन्द, पुष्प और फलों को हर ले गया हो, वह सुखी होकर, अपने मित्रों और परिवार सहित, मिष्ठान्न खाए।
श्लोक 102 (skanda.8.119.102)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते ऋषयो व्यास ऊचुः सर्वे पुरन्दरम् । त्वया गृहीतं द्रव्यं नस्तत् प्रयच्छस्व नः पुनः
sanatkumāra uvāca | taste ṛṣayo vyāsa ūcuḥ sarve purandaram | tvayā gṛhītaṁ dravyaṁ nastat prayacchasva naḥ punaḥ
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! तब उन सभी ऋषियों ने इन्द्र से कहा - तुमने ही हमारी सम्पत्ति ली है; उसे हमें पुनः लौटा दो।
श्लोक 103 (skanda.8.119.103)
तेषां स भगवान् व्यास मूलानि च फलानि च । सर्वाण्येवाददत् प्रीत इदं चोवाच तानृषीन्
teṣāṁ sa bhagavān vyāsa mūlāni ca phalāni ca | sarvāṇyevādadat prīta idaṁ covāca tānṛṣīn
हे व्यास! तब उन भगवान् इन्द्र ने प्रसन्न होकर उनके सभी कन्द और फल लौटा दिए, और उन ऋषियों से यह कहा -
श्लोक 104 (skanda.8.119.104)
इन्द्र उवाच । इयं कृत्या हता विप्रा युष्मदर्थे पुरा कृता । मया हितार्थं युष्माकं त्रिदण्डेन तपोधनाः । क्रुद्धेन राज्ञा युष्माकं कृतैषा तृणबिन्दुना
indra uvāca | iyaṁ kṛtyā hatā viprā yuṣmadarthe purā kṛtā | mayā hitārthaṁ yuṣmākaṁ tridaṇḍena tapodhanāḥ | kruddhena rājñā yuṣmākaṁ kṛtaiṣā tṛṇabindunā
इन्द्र ने कहा - हे विप्रो! यह वही कृत्या है, जो पहले तुम्हारे विनाश के लिए बनाई गई थी। हे तपोधनो! मैंने तुम्हारे हित के लिए ही उसे त्रिदण्ड से मार डाला। इसे तुम्हारे ही ऊपर क्रुद्ध राजा तृणबिन्दु ने उत्पन्न किया था।
श्लोक 105 (skanda.8.119.105)
सनत्कुमार उवाच । तामागम्य ततो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । विष्णुं तं स्नपयाञ्चक्रुस्तीर्थे ऋषिगणार्च्चिते
sanatkumāra uvāca | tāmāgamya tato devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | viṣṇuṁ taṁ snapayāñcakrustīrthe ṛṣigaṇārccite
सनत्कुमार ने कहा - तब वहाँ पहुँचकर, देवगण और तपोधन ऋषियों ने, ऋषिगणों द्वारा पूजित उस तीर्थ में, विष्णु को स्नान कराया।
श्लोक 106 (skanda.8.119.106)
ततस्ते हिमवच्छैलं समागम्य मुदान्विताः । अयाजययन् तदा विष्णुमश्वमेधेन सुव्रताः
tataste himavacchailaṁ samāgamya mudānvitāḥ | ayājayan tadā viṣṇumaśvamedhena suvratāḥ
तब वे सुव्रत ऋषि हिमालय पर्वत पर पहुँचकर, प्रसन्नतापूर्वक, विष्णु से अश्वमेध यज्ञ करवाने लगे।
श्लोक 107 (skanda.8.119.107)
तस्मिन् यजति देवेशस्त्र्यम्बकः सगणेश्वरः । यज्ञं प्रति मुदा युक्त आजगाम विहायसा
tasmin yajati deveśastryambakaḥ sagaṇeśvaraḥ | yajñaṁ prati mudā yukta ājagāma vihāyasā
जब वह यज्ञ चल रहा था, तब देवेश त्र्यम्बक (शिव), अपने गणों के स्वामी सहित, प्रसन्नतापूर्वक आकाश-मार्ग से उस यज्ञ में पधारे।
श्लोक 108 (skanda.8.119.108)
व्यास उवाच । अहो बत त्वयेदं मे कथितं ब्रह्मणः सुत । यातुधान्या उपाख्यानं परं गुह्यं सुदुर्विदम्
vyāsa uvāca | aho bata tvayedaṁ me kathitaṁ brahmaṇaḥ suta | yātudhānyā upākhyānaṁ paraṁ guhyaṁ sudurvidam
व्यास ने कहा - हे ब्रह्मा के पुत्र! अहो! तुमने मुझे यातुधानी का यह परम गोपनीय और अत्यन्त दुर्बोध उपाख्यान सुनाया।
श्लोक 109 (skanda.8.119.109)
इदं हि गुह्यं परमं महार्थवत् सदा यशस्यं परमं च पावनम् । त्वया महायोग यथावदीरितं पुरामृतं पूर्णशशिप्रभं यथा
idaṁ hi guhyaṁ paramaṁ mahārthavat sadā yaśasyaṁ paramaṁ ca pāvanam | tvayā mahāyoga yathāvadīritaṁ purāmṛtaṁ pūrṇaśaśiprabhaṁ yathā
यह अत्यन्त गोपनीय, महान् अर्थ से युक्त, सदा यशस्कर और परम पवित्र कथा है। हे महायोगी! तुमने इसे यथावत् उसी प्रकार सुनाया है, जैसे पूर्ण चन्द्रमा के समान कान्तिमान् प्राचीन अमृत हो।