अम्बिका खण्ड · अध्याय 120
श्मशान-बाल-जीवन
श्लोक 1 (skanda.8.120.1)
व्यास उवाच । अतः परं स भगवान् यथागात्परमेश्वरः । यज्ञेन यजमानं तं समीक्ष्य कथयस्व नः
vyāsa uvāca | ataḥ paraṁ sa bhagavān yathāgātparameśvaraḥ | yajñena yajamānaṁ taṁ samīkṣya kathayasva naḥ
व्यास ने कहा - इसके पश्चात् वे भगवान् परमेश्वर (शिव), उस यज्ञ करते हुए यजमान (विष्णु) को देखकर, वहाँ किस प्रकार पधारे - यह हमें बताओ।
श्लोक 2 (skanda.8.120.2)
सनत्कुमार उवाच । स तु शूलधरो देवो भगवान् गोवृषध्वजः । कृष्णाष्टम्यामुवाचेदं देवीं हिमवतः सुताम्
sanatkumāra uvāca | sa tu śūladharo devo bhagavān govṛṣadhvajaḥ | kṛṣṇāṣṭamyāmuvācedaṁ devīṁ himavataḥ sutām
सनत्कुमार ने कहा - त्रिशूलधारी वह भगवान् देव, जिनका ध्वज बैल से चिह्नित है, कृष्णाष्टमी के दिन हिमवान् की पुत्री देवी से यह कहने लगे -
श्लोक 3 (skanda.8.120.3)
देव्यद्य सुभगे लोके कृष्णपक्षाष्टमी शुभा । रजन्यामद्य यास्याव श्मशानान्यभिवीक्षितुम्
devyadya subhage loke kṛṣṇapakṣāṣṭamī śubhā | rajanyāmadya yāsyāva śmaśānānyabhivīkṣitum
हे सुभगे देवि! आज इस लोक में कृष्ण पक्ष की शुभ अष्टमी है। आज रात्रि में हम दोनों श्मशानों को देखने चलें।
श्लोक 4 (skanda.8.120.4)
देव्युवाच । यथा ते रोचते देव तथा भवतु लोकप । तवेष्टं यन्महादेव ममापि द्विगुणं हि तत्
devyuvāca | yathā te rocate deva tathā bhavatu lokapa | taveṣṭaṁ yanmahādeva mamāpi dviguṇaṁ hi tat
देवी ने कहा - हे देव! हे लोकपाल! जैसा तुम्हें अच्छा लगे, वैसा ही हो। हे महादेव! जो तुम्हें इष्ट है, वह मुझे भी दुगुना प्रिय है।
श्लोक 5 (skanda.8.120.5)
अथ तस्मिन्दिने व्यास उज्जयिन्यां महामुने । ब्राह्मणस्य सुतो बालः शुचिर्विद्वान्ममार ह
atha tasmindine vyāsa ujjayinyāṁ mahāmune | brāhmaṇasya suto bālaḥ śucirvidvānmamāra ha
हे व्यास! हे महामुने! उसी दिन उज्जयिनी में एक ब्राह्मण का पुत्र, जो पवित्र और विद्वान् बालक था, मर गया।
श्लोक 6 (skanda.8.120.6)
तं तेभिसंस्कृत्य तदा अलंकृत्य यथाविधि । क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च श्मशानायैव निन्यिरे
taṁ tebhisaṁskṛtya tadā alaṁkṛtya yathāvidhi | krośantaśca rudantaśca śmaśānāyaiva ninyire
उन्होंने उसे विधिपूर्वक संस्कारित और अलंकृत करके, चिल्लाते और रोते हुए, श्मशान की ओर ले गए।
श्लोक 7 (skanda.8.120.7)
ते श्मशानं तदा नीत्वा बालं तं रक्तपादकम् । स्नेहाद् दुःखपरीताश्च रुरुदुर्बहुधा भृशम्
te śmaśānaṁ tadā nītvā bālaṁ taṁ raktapādakam | snehād duḥkhaparītāśca rurudurbahudhā bhṛśam
उस लाल पैरों वाले बालक को श्मशान में ले जाकर, वे स्नेहवश दुःख से अभिभूत होकर, अत्यन्त और अनेक प्रकार से रोने लगे।
श्लोक 8 (skanda.8.120.8)
तथा तान् रुदतो वीक्ष्य क्रुद्धो गृध्रः क्षुधान्वितः । प्राज्ञवत् स तु संदिश्य तानुवाच द्विजाँस्तदा
tathā tān rudato vīkṣya kruddho gṛdhraḥ kṣudhānvitaḥ | prājñavat sa tu saṁdiśya tānuvāca dvijām̐stadā
उन्हें इस प्रकार रोते देखकर, भूख से व्याकुल और क्रुद्ध एक गिद्ध ने, ज्ञानी की भाँति संकेत करते हुए, उन ब्राह्मणों से यह कहा -
श्लोक 9 (skanda.8.120.9)
विप्राः शृणुत मे वाक्यं मानुषा यद्वदामि वः । बुद्धिहीनाः स्थ सुव्यक्तं निशामयत मद्वचः
viprāḥ śṛṇuta me vākyaṁ mānuṣā yadvadāmi vaḥ | buddhihīnāḥ stha suvyaktaṁ niśāmayata madvacaḥ
हे विप्रो! हे मनुष्यो! जो मैं तुमसे कह रहा हूँ, उसे सुनो। तुम स्पष्टतः बुद्धिहीन हो; मेरे वचन को ध्यान से सुनो।
श्लोक 10 (skanda.8.120.10)
मृत एष हि कालेन किं शोचथ यथाबुधाः । रुदितो नैष जीवेत स्वार्थं कुरुत विज्वराः
mṛta eṣa hi kālena kiṁ śocatha yathābudhāḥ | rudito naiṣa jīveta svārthaṁ kuruta vijvarāḥ
यह काल के वश से मर गया है; तुम मूर्खों की भाँति क्यों शोक कर रहे हो? रोने से यह जीवित नहीं होगा; अपना कार्य करो, चिन्तारहित होकर।
श्लोक 11 (skanda.8.120.11)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तदा त्यक्त्वा सुतं ययुः । मुहुर्मुहुर्निरीक्षन्त अथ तान् जम्बुकोब्रवीत्
sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā tadā tyaktvā sutaṁ yayuḥ | muhurmuhurnirīkṣanta atha tān jambukobravīt
सनत्कुमार ने कहा - उसका यह वचन सुनकर, वे तब पुत्र को छोड़कर जाने लगे, बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए। तभी एक सियार उनसे बोला -
श्लोक 12 (skanda.8.120.12)
अहो धिङ् मानुषाः सर्वे वीक्षध्वं बुद्धिवर्जिताः । निःस्नेहाश्चाकृतज्ञाश्च त्यक्त्वैनं याथ वै कथम्
aho dhiṅ mānuṣāḥ sarve vīkṣadhvaṁ buddhivarjitāḥ | niḥsnehāścākṛtajñāśca tyaktvainaṁ yātha vai katham
अहो! धिक्कार है तुम सब मनुष्यों को! तुम बुद्धिहीन हो, देखो। तुम स्नेहरहित और कृतघ्न हो - इसे त्यागकर कैसे जा रहे हो?
श्लोक 13 (skanda.8.120.13)
दुःखेन लभ्यते पुत्रस्तथा चैव प्रसूयते । दुःखेन च पुनः क्रूरा वर्द्धते व्याध्युपद्रुतः
duḥkhena labhyate putrastathā caiva prasūyate | duḥkhena ca punaḥ krūrā varddhate vyādhyupadrutaḥ
पुत्र दुःखपूर्वक प्राप्त होता है, और दुःखपूर्वक ही जन्म भी लेता है। और फिर, क्रूर व्याधियों से पीड़ित होते हुए, दुःखपूर्वक ही वह बड़ा होता है।
श्लोक 14 (skanda.8.120.14)
विस्मृतानि हि वस्तानि चाटूनि सुबहूनि वै । अकरोद्यान्ययं बाल अहो निःस्नेहता हि वः
vismṛtāni hi vastāni cāṭūni subahūni vai | akarodyānyayaṁ bāla aho niḥsnehatā hi vaḥ
तुम भूल गए हो कि इस बालक ने तुम्हें कितनी बार अनेक मीठी-मीठी बातें कही होंगी। अहो! तुम्हारा यह स्नेहरहित होना कैसा है!
श्लोक 15 (skanda.8.120.15)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते जम्बुकवचः श्रुत्वा व्यास समागताः । परिवार्य रुदन्तश्च तस्थुः पितृवने तदा
sanatkumāra uvāca | taste jambukavacaḥ śrutvā vyāsa samāgatāḥ | parivārya rudantaśca tasthuḥ pitṛvane tadā
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! उस सियार का वचन सुनकर, वे लौट आए, और उस बालक को घेरकर, रोते हुए, उस श्मशान-वन में ही ठहर गए।
श्लोक 16 (skanda.8.120.16)
अथागान्निशि देवेशः कपर्दी प्रियया सह । गणैः सर्वैर्वृतो देवः सह नन्दीश्वरेण च
athāgānniśi deveśaḥ kapardī priyayā saha | gaṇaiḥ sarvairvṛto devaḥ saha nandīśvareṇa ca
तब रात्रि में जटाधारी देवेश, अपनी प्रिया सहित, अपने सभी गणों से घिरे हुए, तथा नन्दीश्वर सहित, वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 17 (skanda.8.120.17)
स तानीशः समभ्येत्य सर्वभूतसुखावहः । वरदोस्मीति तांस्तत्र रुदतः प्रत्युवाच ह
sa tānīśaḥ samabhyetya sarvabhūtasukhāvahaḥ | varadosmīti tāṁstatra rudataḥ pratyuvāca ha
वे ईश्वर, जो सब प्राणियों को सुख देने वाले हैं, उनके पास आकर, वहाँ रोते हुए उन सबसे बोले - मैं वरदाता हूँ।
श्लोक 18 (skanda.8.120.18)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते दीनया वाचा वाष्पपर्याकुलेक्षणाः । ऊचुर्जीवः सुतो नोयं भवेद्देवाज्ञया तव
sanatkumāra uvāca | taste dīnayā vācā vāṣpaparyākulekṣaṇāḥ | ūcurjīvaḥ suto noyaṁ bhavedevājñayā tava
सनत्कुमार ने कहा - तब उन्होंने, आँसुओं से भरे नेत्रों से, दीन वाणी में कहा - हे देव! तुम्हारी आज्ञा से हमारा यह पुत्र जीवित हो जाए।
श्लोक 19 (skanda.8.120.19)
तेषां स भगवांस्तत्र जीवयित्वा सुतं शिशुम् । गणेशत्वं ददौ दिव्यं वासं तत्रैव चाक्षयम्
teṣāṁ sa bhagavāṁstatra jīvayitvā sutaṁ śiśum | gaṇeśatvaṁ dadau divyaṁ vāsaṁ tatraiva cākṣayam
तब उस भगवान् ने वहीं उनके उस बालक को जीवित कर दिया, और उसे दिव्य गणेश-पद तथा वहीं अक्षय निवास प्रदान किया।
श्लोक 20 (skanda.8.120.20)
सनत्कुमार उवाच । एवं स तां निशां प्राप्य श्मशानानि यथाविधि । गत्वा जगाम वैदूर्यं कूटं हिमवतः शुभम्
sanatkumāra uvāca | evaṁ sa tāṁ niśāṁ prāpya śmaśānāni yathāvidhi | gatvā jagāma vaidūryaṁ kūṭaṁ himavataḥ śubham
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार उस रात्रि में विधिपूर्वक श्मशानों में विचरण करके, वे शिव फिर हिमालय के शुभ वैदूर्य शिखर की ओर चले गए।
श्लोक 21 (skanda.8.120.21)
स दीप्ततेजा विभुरव्ययात्मा पिनाकधृक् पर्वतकूटवासी । उवाच तान् यज्ञवरेण दीक्षितान् वरं वृणीध्वं त्रिदिवैकसंश्रयाः
sa dīptatejā vibhuravyayātmā pinākadhṛk parvatakūṭavāsī | uvāca tān yajñavareṇa dīkṣitān varaṁ vṛṇīdhvaṁ tridivaikasaṁśrayāḥ
वह देदीप्यमान तेजस्वी, अविनाशी आत्मा, पिनाकधारी, पर्वत-शिखर-वासी शिव, उस उत्तम यज्ञ में दीक्षित उन (देवताओं) से बोले - हे स्वर्ग के एकमात्र आश्रयदाताओ! वर माँगो।