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अम्बिका खण्ड · अध्याय 121

जामदग्न्य को वरदान

अध्याय 120अध्याय-सूचीअध्याय 122

श्लोक 1 (skanda.8.121.1)

सनत्कुमार उवाच । तेऽथ दृष्ट्वा महादेवं सप्तलोकैकबान्धवम् । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे जानुभ्यां शिरसा नताः

sanatkumāra uvāca | te'tha dṛṣṭvā mahādevaṁ saptalokaikabāndhavam | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve jānubhyāṁ śirasā natāḥ

सनत्कुमार बोले - तदनन्तर सप्तलोकों के एकमात्र बन्धु महादेव को देखकर सब देवता हाथ जोड़कर तथा घुटनों और सिर से प्रणाम करके बोले।

श्लोक 2 (skanda.8.121.2)

भगवँल्लोककामेन हरिणा देवसत्तम । कृतः प्रतिग्रहः पूर्वं येन पाप्मा तमर्च्छत

bhagava~llokakāmena hariṇā devasattama | kṛtaḥ pratigrahaḥ pūrvaṁ yena pāpmā tamarcchata

हे भगवन्, हे देवश्रेष्ठ! लोकहित की कामना से हरि ने पहले जो प्रतिग्रह (यज्ञ-दान) किया था, उसी के कारण पाप उन तक जा पहुँचा है।

श्लोक 3 (skanda.8.121.3)

तदस्य जगतो नाथ भक्तस्य प्रणतस्य च । अस्माभिर्याच्यमानस्त्वं कुरु श्रेयः सुरेश्वरः

tadasya jagato nātha bhaktasya praṇatasya ca | asmābhiryācyamānastvaṁ kuru śreyaḥ sureśvaraḥ

अतः हे जगन्नाथ! हम लोगों द्वारा याचना किये जाने पर आप इस भक्त और प्रणत जगत् का कल्याण कीजिये, हे सुरेश्वर!

श्लोक 4 (skanda.8.121.4)

समाप्यतामयं यज्ञः पाप्मना मुच्यतां हरिः । स्वामूर्जां प्रतिपद्यन्तां देवाः सर्वे सवासवाः

samāpyatāmayaṁ yajñaḥ pāpmanā mucyatāṁ hariḥ | svāmūrjāṁ pratipadyantāṁ devāḥ sarve savāsavāḥ

यह यज्ञ पूर्ण किया जाय, हरि पाप से मुक्त हों, और वासव सहित सभी देवता अपने-अपने बल को पुनः प्राप्त करें।

श्लोक 5 (skanda.8.121.5)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भगवान् हृषिताननः । समाप्य यज्ञं शूलेन गिरिं तं समवारयत्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā bhagavān hṛṣitānanaḥ | samāpya yajñaṁ śūlena giriṁ taṁ samavārayat

उनका वह वचन सुनकर प्रसन्नमुख भगवान् ने यज्ञ को पूर्ण करके अपने त्रिशूल से उस पर्वत को रोक दिया।

श्लोक 6 (skanda.8.121.6)

तस्माद् भेदात्ततो ह्यापः सुधाशंखेन्दुपाण्डराः । निःसृतास्तत्र ते विष्णुं स्नपयाञ्चक्रिरे तदा

tasmād bhedāttato hyāpaḥ sudhāśaṁkhendupāṇḍarāḥ | niḥsṛtāstatra te viṣṇuṁ snapayāñcakrire tadā

उस भेदन से अमृत, शंख और चन्द्रमा के समान श्वेत जल वहाँ से निकला, और उन्होंने उससे विष्णु को स्नान कराया।

श्लोक 7 (skanda.8.121.7)

तस्याथ स्नातमात्रस्य शरीरादभिनिःसृता । पाप्मासुरी महाघोरा विकृता विकृतानना

tasyātha snātamātrasya śarīrādabhiniḥsṛtā | pāpmāsurī mahāghorā vikṛtā vikṛtānanā

स्नान करते ही उनके शरीर से अत्यन्त भयंकर, विकृत रूप और विकृत मुखवाली 'पाप्मा' नामक असुरी प्रकट हो गयी।

श्लोक 8 (skanda.8.121.8)

देवानभिद्रुता हन्तुं निरुद्धा देवबन्धुना । उवाच तां न हन्तव्या देवाः सर्वे सवासवाः

devānabhidrutā hantuṁ niruddhā devabandhunā | uvāca tāṁ na hantavyā devāḥ sarve savāsavāḥ

वह देवताओं को मारने के लिये उन पर झपटी, किन्तु देवबन्धु (रुद्र) ने उसे रोक दिया - (यहाँ मूल पाठ का एक अंश खण्डित है) - और कहा कि उसे वासव सहित समस्त देवताओं द्वारा नहीं मारा जाना चाहिये।

श्लोक 9 (skanda.8.121.9)

इहैव च तव स्थानं भविष्यति सुपूजितम् । पुण्या च सर्वतीर्थेभ्यः सर्वपातकनाशनी

ihaiva ca tava sthānaṁ bhaviṣyati supūjitam | puṇyā ca sarvatīrthebhyaḥ sarvapātakanāśanī

यहीं पर तुम्हारा सुपूजित स्थान होगा, और तुम समस्त तीर्थों से भी अधिक पवित्र, सब पापों का नाश करनेवाली बनोगी।

श्लोक 10 (skanda.8.121.10)

सप्त पूर्वान् परांश्चैव तारयिष्यसि नित्यशः । संध्येति जगति ख्याता सर्वतीर्थवरा शुभा

sapta pūrvān parāṁścaiva tārayiṣyasi nityaśaḥ | saṁdhyeti jagati khyātā sarvatīrthavarā śubhā

तुम सदा सात पूर्व और सात परवर्ती पीढ़ियों को तार दोगी, और संसार में 'संध्या' नाम से विख्यात, समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ तथा शुभ कहलाओगी।

श्लोक 11 (skanda.8.121.11)

वारिधारा शुभा दिव्या सर्वयज्ञफलप्रदा । त्वामुपास्य कुलान् सप्त तारयिष्यन्ति मानवाः

vāridhārā śubhā divyā sarvayajñaphalapradā | tvāmupāsya kulān sapta tārayiṣyanti mānavāḥ

तुम समस्त यज्ञों का फल देनेवाली शुभ दिव्य जलधारा बनोगी; तुम्हारी उपासना करके मनुष्य सात कुलों को तार देंगे।

श्लोक 12 (skanda.8.121.12)

ततस्ते दैवताः सर्वे रुद्रस्य वचनात्तदा । अर्चयित्वा यथान्यायं देवदेवमुमापतिम्

tataste daivatāḥ sarve rudrasya vacanāttadā | arcayitvā yathānyāyaṁ devadevamumāpatim

तब उन सभी देवताओं ने रुद्र के वचन से उमापति देवदेव का विधिपूर्वक पूजन करके,

श्लोक 13 (skanda.8.121.13)

देवस्यायतनं कृत्वा जग्मुस्त्रिदिवमेव च । गतेषु देवसंघेषु शिवकूटे तदा हरिः

devasyāyatanaṁ kṛtvā jagmustridivameva ca | gateṣu devasaṁgheṣu śivakūṭe tadā hariḥ

उस देवता का मन्दिर बनाकर स्वर्ग को चले गये। देवगणों के चले जाने पर हरि तब शिवकूट में,

श्लोक 14 (skanda.8.121.14)

अश्वमेधं तदा यष्ट्वा देवमाराधयत् स्थितः । तस्याथ वर्षैः षड्भिस्तु सहस्रेण च तन्यतः । मासैः षड्भिश्च देवेशस्तुतोष वृषभध्वजः

aśvamedhaṁ tadā yaṣṭvā devamārādhayat sthitaḥ | tasyātha varṣaiḥ ṣaḍbhistu sahasreṇa ca tanyataḥ | māsaiḥ ṣaḍbhiśca deveśastutoṣa vṛṣabhadhvajaḥ

अश्वमेध यज्ञ करके उस देवता की आराधना में स्थित रहे। इस प्रकार छह हजार छह वर्ष और छह मास बीत जाने पर वृषभध्वज देवेश प्रसन्न हो गये।

श्लोक 15 (skanda.8.121.15)

सोमः सनन्दिः सगण इदं प्रोवाच तं पुनः । हृष्यमाणः सुतुष्टात्मा ब्रूहि किं प्रददानि ते

somaḥ sanandiḥ sagaṇa idaṁ provāca taṁ punaḥ | hṛṣyamāṇaḥ sutuṣṭātmā brūhi kiṁ pradadāni te

उमा-सहित, नन्दी-सहित तथा गणों-सहित उन्होंने पुनः प्रसन्न और परितुष्ट होकर उससे कहा - बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ?

श्लोक 16 (skanda.8.121.16)

विष्णुरुवाच । भगवन् पाप्मना वापि तपसा वापि लोकप । लोपो न मे यथा स्याद्वै तन्ममाचक्ष्व कालहन्

viṣṇuruvāca | bhagavan pāpmanā vāpi tapasā vāpi lokapa | lopo na me yathā syādvai tanmamācakṣva kālahan

विष्णु बोले - हे भगवन्, हे लोकपाल, हे कालहन्! ऐसा उपाय मुझे बताइये जिससे न तो पाप से और न तप से मेरा नाश हो।

श्लोक 17 (skanda.8.121.17)

ततः प्रहस्य देवेशः प्रीयमाणः प्रजापतिः । उवाच विष्णुमामन्त्र्य गुह्यं चर महाव्रतम्

tataḥ prahasya deveśaḥ prīyamāṇaḥ prajāpatiḥ | uvāca viṣṇumāmantrya guhyaṁ cara mahāvratam

तब हँसकर, प्रसन्न होते हुए, प्रजापति देवेश ने विष्णु को सम्बोधित करके कहा - गुह्य महाव्रत का आचरण करो।

श्लोक 18 (skanda.8.121.18)

स चाथ कृतरक्षस्तं सर्वधर्मावहं शुभम् । योगं यन्त्रं व्रतं चैव परमैश्वर्यसाधनम्

sa cātha kṛtarakṣastaṁ sarvadharmāvahaṁ śubham | yogaṁ yantraṁ vrataṁ caiva paramaiśvaryasādhanam

और तब सुरक्षा-विधान करके उन्होंने उसे सम्पूर्ण धर्म को लानेवाला वह शुभ योग, अनुशासन और व्रत बताया, जो परम ऐश्वर्य का साधन है।

श्लोक 19 (skanda.8.121.19)

यत्तत्पाशुपतं दिव्यं विधानं सार्वकामिकम् । तच्चीर्त्वा द्वादश समाः परमैश्वर्यमाप्तवान्

yattatpāśupataṁ divyaṁ vidhānaṁ sārvakāmikam | taccīrtvā dvādaśa samāḥ paramaiśvaryamāptavān

वह दिव्य पाशुपत विधान, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है, उसका बारह वर्ष तक आचरण करके उन्होंने परम ऐश्वर्य प्राप्त किया।

श्लोक 20 (skanda.8.121.20)

तस्य देवः स्वयं शूली तुष्टः प्रेक्ष्य तथाविधम् । शरीरार्धं ददौ तस्मै तदभूद्विष्णुशङ्करम्

tasya devaḥ svayaṁ śūlī tuṣṭaḥ prekṣya tathāvidham | śarīrārdhaṁ dadau tasmai tadabhūdviṣṇuśaṅkaram

शूलधारी देव स्वयं उसे उस प्रकार देखकर प्रसन्न हुए और उसे अपने शरीर का आधा भाग दे दिया; वही विष्णु-शंकर (हरिहर) रूप हो गया।

श्लोक 21 (skanda.8.121.21)

य इमं शृणुयान्मर्त्त्यः सदा पर्वसु पर्वसु । अर्चयेच्छिवविष्णुं च स गच्छेत् परमां गतिम्

ya imaṁ śṛṇuyānmarttyaḥ sadā parvasu parvasu | arcayecchivaviṣṇuṁ ca sa gacchet paramāṁ gatim

जो मनुष्य प्रत्येक पर्व पर सदा इसे सुनता है और शिव-विष्णु का पूजन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 22 (skanda.8.121.22)

एवं स विष्णुर्जित्वा तु वामनः सुमहाबलः । त्रैलोक्यं सर्वदेवेभ्यः सर्वं प्रति समर्पयत्

evaṁ sa viṣṇurjitvā tu vāmanaḥ sumahābalaḥ | trailokyaṁ sarvadevebhyaḥ sarvaṁ prati samarpayat

इस प्रकार अत्यन्त बलशाली विष्णु ने वामन-रूप में विजय पाकर त्रैलोक्य को सम्पूर्ण रूप से सभी देवताओं को लौटा दिया।

श्लोक 23 (skanda.8.121.23)

सनत्कुमार उवाच । ततो देवैः समाक्रान्ते त्रैलोक्ये मुनिपुङ्गव । येऽसुरा हतशेषास्तु ते समाश्रित्य दानवौ

sanatkumāra uvāca | tato devaiḥ samākrānte trailokye munipuṅgava | ye'surā hataśeṣāstu te samāśritya dānavau

सनत्कुमार बोले - हे मुनिपुंगव! फिर जब देवताओं ने त्रैलोक्य पर अधिकार कर लिया, तब जो असुर वध से शेष बचे थे, वे दो दानवों (तारक और मय) की शरण में गये।

श्लोक 24 (skanda.8.121.24)

तारकं च मयं चैव चक्रुर्युद्धं सहामरैः । मयश्च तारकश्चैव पुत्रपौत्रसमावृतौ

tārakaṁ ca mayaṁ caiva cakruryuddhaṁ sahāmaraiḥ | mayaśca tārakaścaiva putrapautrasamāvṛtau

तारक और मय की शरण लेकर उन्होंने देवताओं के साथ युद्ध किया। मय और तारक दोनों पुत्र-पौत्रों से घिरे हुए थे।

श्लोक 25 (skanda.8.121.25)

विप्रचित्तिश्च दनुजो ये च तस्य सुताः स्मृताः । निवातकवचाः सर्वे पौलोमाः कालकासुताः । सैंहिकेयाश्च विक्रान्ता बालेयश्च तथा गणः

vipracittiśca danujo ye ca tasya sutāḥ smṛtāḥ | nivātakavacāḥ sarve paulomāḥ kālakāsutāḥ | saiṁhikeyāśca vikrāntā bāleyaśca tathā gaṇaḥ

विप्रचित्ति दानव तथा उसके स्मरणीय पुत्र, सभी निवातकवच, पौलोम, कालका के पुत्र, पराक्रमी सैंहिकेय, तथा बालेय गण भी वहाँ थे।

श्लोक 26 (skanda.8.121.26)

एते चान्ये च बहवो दानवा बलदर्पिताः । सन्नद्धाः समभिक्रुद्धा आह्वयन्त तदा सुरान्

ete cānye ca bahavo dānavā baladarpitāḥ | sannaddhāḥ samabhikruddhā āhvayanta tadā surān

ये और अन्य बहुत-से बल के मद में चूर दानव कवच पहनकर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस समय देवताओं को युद्ध के लिये ललकारने लगे।

श्लोक 27 (skanda.8.121.27)

संप्रेक्ष्य तानाह्वयतो देवा अपि सुदंशिताः । तैस्सहैत्य तदा चक्रुः समरं समरैषिणः

saṁprekṣya tānāhvayato devā api sudaṁśitāḥ | taissahaitya tadā cakruḥ samaraṁ samaraiṣiṇaḥ

उन ललकारनेवालों को देखकर सुसज्जित देवता भी युद्ध की इच्छा से उनके साथ आकर संग्राम करने लगे।

श्लोक 28 (skanda.8.121.28)

तेषां तदभवद् युद्ध तुमुलं लोमहर्षणम् । वर्षाणान्तु शतान्यष्टौ सहस्राणि च षोडश

teṣāṁ tadabhavad yuddha tumulaṁ lomaharṣaṇam | varṣāṇāntu śatānyaṣṭau sahasrāṇi ca ṣoḍaśa

उनका वह युद्ध अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी हो गया, जो आठ सौ वर्ष और सोलह हजार वर्षों तक चला,

श्लोक 29 (skanda.8.121.29)

दिव्यानि न च संग्रामे एकपक्षे जयोभवत् । अथ देवास्तदा युद्धे सैंहिकेयैर्दुरासदैः

divyāni na ca saṁgrāme ekapakṣe jayobhavat | atha devāstadā yuddhe saiṁhikeyairdurāsadaiḥ

अर्थात् दिव्य वर्षों तक, किन्तु किसी एक पक्ष की विजय नहीं हुई। तदनन्तर उस युद्ध में देवता दुर्जय सैंहिकेयों द्वारा

श्लोक 30 (skanda.8.121.30)

पराजिता महासत्वाः सिंहैः पशुगणा इव । तेषां तद्बलमालक्ष्य सहस्राक्षः पुरन्दरः

parājitā mahāsatvāḥ siṁhaiḥ paśugaṇā iva | teṣāṁ tadbalamālakṣya sahasrākṣaḥ purandaraḥ

जो स्वयं महाबली थे, फिर भी वे सिंहों द्वारा पशुओं के समूह की भाँति पराजित हो गये। उनका वह बल देखकर सहस्राक्ष पुरन्दर (इन्द्र)

श्लोक 31 (skanda.8.121.31)

जगाम देवदेवेशं शरणं रुद्रमव्ययम् । स गत्वा स्वर्णचूडस्य गिरेः शृङ्गे कृतालयम्

jagāma devadeveśaṁ śaraṇaṁ rudramavyayam | sa gatvā svarṇacūḍasya gireḥ śṛṅge kṛtālayam

देवदेवेश अविनाशी रुद्र की शरण में गया। वहाँ जाकर उसने स्वर्णचूड पर्वत के शिखर पर निवास करते हुए

श्लोक 32 (skanda.8.121.32)

देव्या सह महादेवमपश्यद् गणसंवृतम् । दीप्यमानं यथा वह्निं दुर्दृश्यमकृतात्मभिः

devyā saha mahādevamapaśyad gaṇasaṁvṛtam | dīpyamānaṁ yathā vahniṁ durdṛśyamakṛtātmabhiḥ

देवी के साथ, गणों से घिरे महादेव को देखा, जो अग्नि के समान प्रज्वलित थे और अशुद्ध-अन्तःकरणवालों के लिये दुर्दर्शनीय थे।

श्लोक 33 (skanda.8.121.33)

तमसौ नन्दिना पूर्वमाख्यातो देवसत्तमः । दृष्ट्वा प्रणम्य शिरसा इदं वचनमूचिवान्

tamasau nandinā pūrvamākhyāto devasattamaḥ | dṛṣṭvā praṇamya śirasā idaṁ vacanamūcivān

उन देवश्रेष्ठ (इन्द्र) को पहले नन्दी ने सूचित किया; उन्हें देखकर और सिर से प्रणाम करके उसने यह वचन कहा।

श्लोक 34 (skanda.8.121.34)

देव वर्षशतान्यष्टौ सहस्त्राणि च षोडश । दिव्यानि समतीतानि संग्रामस्य दिवौकसाम्

deva varṣaśatānyaṣṭau sahastrāṇi ca ṣoḍaśa | divyāni samatītāni saṁgrāmasya divaukasām

हे देव! देवताओं के इस संग्राम को आठ सौ और सोलह हजार दिव्य वर्ष बीत चुके हैं।

श्लोक 35 (skanda.8.121.35)

तारकश्च मयश्चैव दानवौ युद्धदुर्मदौ । तावाश्रित्यासुराः सर्वे देवान् घ्नन्ति यथा पशून्

tārakaśca mayaścaiva dānavau yuddhadurmadau | tāvāśrityāsurāḥ sarve devān ghnanti yathā paśūn

युद्ध के मद में चूर तारक और मय, इन दो दानवों की शरण लेकर समस्त असुर देवताओं को पशुओं की भाँति मार रहे हैं।

श्लोक 36 (skanda.8.121.36)

तेषां तु वध्यमानानां देवानां देवसत्तम । जीवितं संप्रयच्छस्व यथा वा देव युज्यते

teṣāṁ tu vadhyamānānāṁ devānāṁ devasattama | jīvitaṁ saṁprayacchasva yathā vā deva yujyate

हे देवश्रेष्ठ! जो देवता मारे जा रहे हैं, उन्हें जीवन प्रदान कीजिये, अथवा हे देव, जो भी उचित हो वह कीजिये।

श्लोक 37 (skanda.8.121.37)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भगवान् गोवृषध्वजः । चिन्तयित्वा ततस्तत्र रामरामेत्यथाब्रवीत्

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā bhagavān govṛṣadhvajaḥ | cintayitvā tatastatra rāmarāmetyathābravīt

सनत्कुमार बोले - उसका वह वचन सुनकर बैलध्वज भगवान् ने वहाँ विचार करके 'राम, राम' ऐसा कहा।

श्लोक 38 (skanda.8.121.38)

भगवानुवाच । राम राम महाबाहो चीर्णं ते सुमहत्तपः । गच्छ देवान् सुयुद्धेन कुरु सर्वान् गतज्वरान्

bhagavānuvāca | rāma rāma mahābāho cīrṇaṁ te sumahattapaḥ | gaccha devān suyuddhena kuru sarvān gatajvarān

भगवान् बोले - हे राम, राम, महाबाहो! तुमने बहुत बड़ी तपस्या की है। जाओ, अच्छे युद्ध से समस्त देवताओं को उनके सन्ताप से मुक्त कर दो।

श्लोक 39 (skanda.8.121.39)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तस्तदा रामो जामदग्न्यः प्रतापवान् । उवाच दीनया वाचा प्रणम्य बहुमानतः

sanatkumāra uvāca | evamuktastadā rāmo jāmadagnyaḥ pratāpavān | uvāca dīnayā vācā praṇamya bahumānataḥ

सनत्कुमार बोले - ऐसा कहे जाने पर प्रतापी जामदग्न्य राम ने बड़े आदर से प्रणाम करके दीन वाणी में कहा।

श्लोक 40 (skanda.8.121.40)

राम उवाच । भगवन्नल्पवीर्योस्मि तपसा कर्षितो भृशम् । अनस्त्रविच्च देवेश न शक्ष्ये संयुगं विभो

rāma uvāca | bhagavannalpavīryosmi tapasā karṣito bhṛśam | anastravicca deveśa na śakṣye saṁyugaṁ vibho

राम बोले - हे भगवन्! मैं अल्पशक्ति वाला हूँ, तप से अत्यन्त कृश हो गया हूँ, और अस्त्रविद्या भी नहीं जानता; हे देवेश, हे विभो! मैं युद्ध करने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 41 (skanda.8.121.41)

देवदेव उवाच । गच्छ शक्ष्यसि विप्राद्य योद्धुं त्वं त्वद्य मा शुचः । अहं त्वाप्याययिष्यामि मा व्यथां कुरु भार्गव

devadeva uvāca | gaccha śakṣyasi viprādya yoddhuṁ tvaṁ tvadya mā śucaḥ | ahaṁ tvāpyāyayiṣyāmi mā vyathāṁ kuru bhārgava

देवदेव बोले - हे विप्र! जाओ, आज तुम युद्ध करने में समर्थ हो जाओगे, शोक मत करो। मैं तुम्हें बल दूँगा, हे भार्गव, व्यथा मत करो।

श्लोक 42 (skanda.8.121.42)

सनत्कुमार उवाच । ततः स भगवानिन्द्रं प्राह देवपतिं हरः । एष हंस्यति ते शत्रून् रथमस्मै प्रयच्छ च

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa bhagavānindraṁ prāha devapatiṁ haraḥ | eṣa haṁsyati te śatrūn rathamasmai prayaccha ca

सनत्कुमार बोले - तब भगवान् हर ने देवपति इन्द्र से कहा - यह तुम्हारे शत्रुओं का वध करेगा, इसे रथ दो।

श्लोक 43 (skanda.8.121.43)

ततः प्रणम्य शक्रोपि राममादाय चैव ह । जगाम तं तदोद्देशं संग्रामो यत्र सोभवत्

tataḥ praṇamya śakropi rāmamādāya caiva ha | jagāma taṁ tadoddeśaṁ saṁgrāmo yatra sobhavat

तब प्रणाम करके शक्र भी राम को साथ लेकर उस स्थान पर गया, जहाँ वह संग्राम हो रहा था।

श्लोक 44 (skanda.8.121.44)

ततः स रथमुख्येन संपाद्य तु पुरन्दरः । राममाह स्वयं शक्रः सैंहिकेयानुपाह्वय

tataḥ sa rathamukhyena saṁpādya tu purandaraḥ | rāmamāha svayaṁ śakraḥ saiṁhikeyānupāhvaya

तब पुरन्दर ने उन्हें श्रेष्ठ रथ पर बैठाकर स्वयं शक्र ने राम से कहा - सैंहिकेयों को ललकारो।

श्लोक 45 (skanda.8.121.45)

स तेन रथमुख्येन रामः प्रहरतां वरः । कवची बद्धतूणीरः शरी खङ्गी शरासनी

sa tena rathamukhyena rāmaḥ praharatāṁ varaḥ | kavacī baddhatūṇīraḥ śarī khaṅgī śarāsanī

योद्धाओं में श्रेष्ठ राम उस उत्तम रथ पर सवार होकर, कवच पहने, तरकश बाँधे, बाण, खड्ग और धनुष लिये हुए,

श्लोक 46 (skanda.8.121.46)

बद्धगोधांगुलित्रश्च बद्धध्वजपताकवान् । अभिदुद्राव वेगेन सैंहिकेयान् दुरासदान्

baddhagodhāṁgulitraśca baddhadhvajapatākavān | abhidudrāva vegena saiṁhikeyān durāsadān

अंगुलित्राण बाँधे, ध्वजा-पताका फहराते हुए, दुर्जय सैंहिकेयों पर वेग से टूट पड़ा।

श्लोक 47 (skanda.8.121.47)

तेषां तस्य च संग्रामः सुघोरस्समपद्यत । शार्दूलानां यथारण्ये सिंहेन सह भीषणः

teṣāṁ tasya ca saṁgrāmaḥ sughorassamapadyata | śārdūlānāṁ yathāraṇye siṁhena saha bhīṣaṇaḥ

उनके और उसके बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ, जैसे वन में सिंह के साथ बाघों का भीषण युद्ध होता है।

श्लोक 48 (skanda.8.121.48)

तत्राद्भुतमपश्यन्त सिद्धगन्धर्वचारणाः । येदेकोपि तदा रङ्गे दृश्यतेनेकरूपवान्

tatrādbhutamapaśyanta siddhagandharvacāraṇāḥ | yedekopi tadā raṅge dṛśyatenekarūpavān

वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण एक आश्चर्य देखते थे कि वह अकेला होते हुए भी युद्धभूमि में मानो अनेक रूपों में दिखाई देता था।

श्लोक 49 (skanda.8.121.49)

नाददानः शराँश्चित्रान् सन्दधानस्तथैव च । धनुर्विकर्षमाणो वा दृश्यते भार्गवस्तदा

nādadānaḥ śarā~ścitrān sandadhānastathaiva ca | dhanurvikarṣamāṇo vā dṛśyate bhārgavastadā

कभी अद्भुत बाण उठाते हुए, कभी उन्हें धनुष पर चढ़ाते हुए, कभी धनुष खींचते हुए भार्गव उस समय दिखाई देते थे।

श्लोक 50 (skanda.8.121.50)

मण्डलीकृतमेवास्य कार्मुकं सुमहत्तदा । दृश्यते शत्रुभिश्चैव दुर्निरीक्ष्यश्च सोभवत्

maṇḍalīkṛtamevāsya kārmukaṁ sumahattadā | dṛśyate śatrubhiścaiva durnirīkṣyaśca sobhavat

उनका वह विशाल धनुष तब मानो सदा वृत्ताकार खिंचा हुआ ही शत्रुओं को दिखाई देता था, और वे स्वयं दुर्दर्शनीय हो गये थे।

श्लोक 51 (skanda.8.121.51)

तेषां स भार्गवः क्रुद्धः परावृत्य महाबलः । चिक्षेपैकैकशो व्यास मुखे तीक्ष्णाञ्छरान् दश

teṣāṁ sa bhārgavaḥ kruddhaḥ parāvṛtya mahābalaḥ | cikṣepaikaikaśo vyāsa mukhe tīkṣṇāñcharān daśa

हे व्यास! उन क्रुद्ध महाबली भार्गव ने घूमकर एक-एक करके उनके मुख पर दस तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 52 (skanda.8.121.52)

तत्राद्भुतमपश्यन्त लाघवं तस्य धीमतः । साधु साध्विति भूतानां तत्र शब्दो महानभूत्

tatrādbhutamapaśyanta lāghavaṁ tasya dhīmataḥ | sādhu sādhviti bhūtānāṁ tatra śabdo mahānabhūt

वहाँ सबने उस बुद्धिमान् की अद्भुत फुर्ती देखी, और सब प्राणियों में 'साधु, साधु' का महान् घोष हुआ।

श्लोक 53 (skanda.8.121.53)

सनत्कुमार उवाच । तैः शरैर्भिन्नवदनाः सैंहिकेया महाबलाः । सगन्धा निपतन्त्युर्व्यां ताला वाय्वाहता इव

sanatkumāra uvāca | taiḥ śarairbhinnavadanāḥ saiṁhikeyā mahābalāḥ | sagandhā nipatantyurvyāṁ tālā vāyvāhatā iva

सनत्कुमार बोले - उन बाणों से मुख बिंधे हुए महाबली सैंहिकेय, वायु से गिराये गये ताड़वृक्षों के समान, एक साथ पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 54 (skanda.8.121.54)

स तदा दशसाहस्रस्तेषां वै देवविद्विषाम् । भार्गवेण गणो दग्धः कालेनेव यथा जगत्

sa tadā daśasāhasrasteṣāṁ vai devavidviṣām | bhārgaveṇa gaṇo dagdhaḥ kāleneva yathā jagat

उन देव-द्वेषियों का वह दस हजार का समूह भार्गव द्वारा उसी प्रकार भस्म कर दिया गया, जैसे काल द्वारा संसार भस्म होता है।

श्लोक 55 (skanda.8.121.55)

ततो देवाः सऋषयो गन्धर्वाश्च सचारणाः । साधु साध्विति तं प्रोच्य तुष्टुवुर्हृषिताननाः

tato devāḥ saṛṣayo gandharvāśca sacāraṇāḥ | sādhu sādhviti taṁ procya tuṣṭuvurhṛṣitānanāḥ

तब ऋषियों सहित देवता और चारणों सहित गन्धर्व 'साधु, साधु' कहकर, प्रसन्नमुख होकर उसकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 56 (skanda.8.121.56)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तत्कर्म संवीक्ष्य भगवान् पाकशासनः । बहुमानेन संपूज्य भार्गवं सह दैवतैः

sanatkumāra uvāca | tasya tatkarma saṁvīkṣya bhagavān pākaśāsanaḥ | bahumānena saṁpūjya bhārgavaṁ saha daivataiḥ

सनत्कुमार बोले - उनका वह कर्म देखकर भगवान् पाकशासन (इन्द्र) ने देवताओं सहित बड़े आदर से भार्गव का सम्मान करते हुए,

श्लोक 57 (skanda.8.121.57)

इदमाह महातेजाः परिष्वज्य पुनः पुनः । तवैतत्कर्म नान्यस्य सदृशं दिवि विद्यते

idamāha mahātejāḥ pariṣvajya punaḥ punaḥ | tavaitatkarma nānyasya sadṛśaṁ divi vidyate

अत्यन्त तेजस्वी इन्द्र ने उसे बार-बार आलिंगन करके कहा - तुम्हारा यह कर्म स्वर्ग में किसी अन्य के समान नहीं है।

श्लोक 58 (skanda.8.121.58)

यदि ते सिंहिकापुत्राः सहसैव हतास्त्वया । तव वै तन् महत्कर्म त्रिपुरे त्र्यम्बकस्य वा । न त्वयास्ति समो लोके सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्

yadi te siṁhikāputrāḥ sahasaiva hatāstvayā | tava vai tan mahatkarma tripure tryambakasya vā | na tvayāsti samo loke satyametad bravīmyaham

यदि सिंहिका के पुत्र तुमने एक साथ ही मार डाले, तो निश्चय ही यह वैसा ही महान् कर्म है जैसा त्र्यम्बक का त्रिपुर-वध। संसार में तुम्हारे समान कोई नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ।

श्लोक 59 (skanda.8.121.59)

एते न तुल्या देवेन मानुषेण न केनचित् । अवध्याः सर्वभूतानां त्वयैकेन निषूदिताः

ete na tulyā devena mānuṣeṇa na kenacit | avadhyāḥ sarvabhūtānāṁ tvayaikena niṣūditāḥ

ये सब न किसी देवता के, न किसी मनुष्य के तुल्य थे, समस्त प्राणियों के लिये अवध्य थे, फिर भी तुमने अकेले ही इन्हें मार डाला।

श्लोक 60 (skanda.8.121.60)

तस्मात्तव वयं तुष्टाः प्रयच्छामो ह्यवध्यताम् । अक्षयं च बलं युद्धे यशञ्च परमं भुवि

tasmāttava vayaṁ tuṣṭāḥ prayacchāmo hyavadhyatām | akṣayaṁ ca balaṁ yuddhe yaśañca paramaṁ bhuvi

अतः तुमसे प्रसन्न होकर हम तुम्हें अवध्यता, युद्ध में अक्षय बल, और पृथ्वी पर परम यश प्रदान करते हैं।

श्लोक 61 (skanda.8.121.61)

त्र्यम्बकश्च वरैर्दिव्यैरिष्टैस्त्वां प्रतिपत्स्यते । यथाकामञ्च युद्धेषु समूहं त्वं विजेष्यसि

tryambakaśca varairdivyairiṣṭaistvāṁ pratipatsyate | yathākāmañca yuddheṣu samūhaṁ tvaṁ vijeṣyasi

और त्र्यम्बक भी तुम्हें दिव्य, अभीष्ट वरों से अनुगृहीत करेंगे, और तुम युद्धों में इच्छानुसार समूहों को जीत सकोगे।

श्लोक 62 (skanda.8.121.62)

सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तस्तैर्व्यास देवैस्तुष्टैर्महातपाः । जगाम त्र्यम्बकं देवं हृष्टतुष्टमना यतिः

sanatkumāra uvāca | sa evamuktastairvyāsa devaistuṣṭairmahātapāḥ | jagāma tryambakaṁ devaṁ hṛṣṭatuṣṭamanā yatiḥ

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! उन प्रसन्न देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह महातपस्वी यति हृष्ट-तुष्ट मन से त्र्यम्बक देव के पास गया।

श्लोक 63 (skanda.8.121.63)

देवा अपि सुसंयत्तास्तारकं युद्धदुर्मदम् । अवाकिरन्त वेगेन मयेन सहितं तदा

devā api susaṁyattāstārakaṁ yuddhadurmadam | avākiranta vegena mayena sahitaṁ tadā

देवता भी सुसज्जित होकर युद्ध के मद में चूर तारक को मय के सहित उस समय वेग से घेरने लगे।

श्लोक 64 (skanda.8.121.64)

ते दैत्यवेगप्रतिरुद्धवेगा महाबलाः सिन्धुसमानवेगाः । जघ्नुर्भृशं दैत्यगणान्निपत्य सिंहा यथारण्यचरा मतङ्गान्

te daityavegapratiruddhavegā mahābalāḥ sindhusamānavegāḥ | jaghnurbhṛśaṁ daityagaṇānnipatya siṁhā yathāraṇyacarā mataṅgān

वे महाबली देवता, दैत्यों के वेग से जिनका वेग रुक गया था, फिर भी समुद्र के समान वेगवान् थे, वन-विचरण करते सिंहों की भाँति हाथियों पर टूट पड़कर दैत्यसमूहों का अत्यन्त संहार करने लगे।

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