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अम्बिका खण्ड · अध्याय 122

हरिश्चन्द्रगिरि-वर्णन

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123

श्लोक 1 (skanda.8.122.1)

सनत्कुमार उवाच । सैहिकेयवधं दृष्ट्वा सुराणां च जयं तथा । सहसा दैत्यसैन्यानि प्रभग्नानि समन्ततः

sanatkumāra uvāca | saihikeyavadhaṁ dṛṣṭvā surāṇāṁ ca jayaṁ tathā | sahasā daityasainyāni prabhagnāni samantataḥ

सनत्कुमार बोले - सैंहिकेयों का वध और देवताओं की विजय देखकर दैत्यों की सेनाएँ सहसा चारों ओर से भग्न हो गयीं।

श्लोक 2 (skanda.8.122.2)

अन्येन प्रच्युतस्तारो मयो वीरो विरोचनः

anyena pracyutastāro mayo vīro virocanaḥ

(यहाँ मूल पाठ का प्रथम चरण खण्डित है) - किसी अन्य के द्वारा तार को गिराया गया; वीर मय और विरोचन...

श्लोक 3 (skanda.8.122.3)

विप्रचित्तिश्च षण्डश्च प्रह्लादश्च महासुरः । कालनेमिस्ततः क्रुद्धः केशवं प्रति संयुगे

vipracittiśca ṣaṇḍaśca prahlādaśca mahāsuraḥ | kālanemistataḥ kruddhaḥ keśavaṁ prati saṁyuge

विप्रचित्ति, षण्ड, और महासुर प्रह्लाद - फिर क्रुद्ध कालनेमि केशव की ओर युद्ध में बढ़ा।

श्लोक 4 (skanda.8.122.4)

सरथं महदास्थाय शतनल्वोर्ध्वकेतुमत् । अभिदुद्राव वेगेन केशवं प्रति दानवः

sarathaṁ mahadāsthāya śatanalvordhvaketumat | abhidudrāva vegena keśavaṁ prati dānavaḥ

सौ नल लम्बे, ऊँची ध्वजावाले महान् रथ पर चढ़कर वह दानव वेगपूर्वक केशव की ओर दौड़ा।

श्लोक 5 (skanda.8.122.5)

तस्यापतत एवाथ चक्रमप्रतिघं महत् । ससर्ज केशवो व्यास स तद् व्यष्टम्भयत्तदा

tasyāpatata evātha cakramapratighaṁ mahat | sasarja keśavo vyāsa sa tad vyaṣṭambhayattadā

हे व्यास! उसके आक्रमण करते ही केशव ने अपना महान् अप्रतिहत चक्र छोड़ा, किन्तु उसने उसे रोक दिया।

श्लोक 6 (skanda.8.122.6)

तद् विष्टब्धं तदालक्ष्य सर्वे देवाः प्रमन्यवः । पराजिता बभूवुर्हि विशस्त्राः कालनेमिना

tad viṣṭabdhaṁ tadālakṣya sarve devāḥ pramanyavaḥ | parājitā babhūvurhi viśastrāḥ kālaneminā

चक्र को रुका देखकर सभी देवता क्रुद्ध हो उठे, फिर भी वे शस्त्रहीन होकर कालनेमि द्वारा पराजित हो गये।

श्लोक 7 (skanda.8.122.7)

स तान्विद्राव्य दैत्येन्द्रो विमुखान् प्रचकार ह

sa tānvidrāvya daityendro vimukhān pracakāra ha

(यहाँ मूल पाठ का प्रथम चरण खण्डित है) - उन्हें भगाकर दैत्येन्द्र ने उन्हें विमुख कर दिया।

श्लोक 8 (skanda.8.122.8)

कृत्वा चकार च तदा लोकपालत्वमव्ययः । भुवं द्याञ्च तदा व्याप्य वर्तमानो महाबलः

kṛtvā cakāra ca tadā lokapālatvamavyayaḥ | bhuvaṁ dyāñca tadā vyāpya vartamāno mahābalaḥ

ऐसा करके अविनाशी कालनेमि ने लोकपाल का पद ग्रहण कर लिया, और वह महाबली पृथ्वी तथा स्वर्ग को व्याप्त करके विद्यमान रहने लगा।

श्लोक 9 (skanda.8.122.9)

स्वयम्भूरिव लोकाँस्त्रीनचरल्लोकमायया

svayambhūriva lokā~strīnacarallokamāyayā

वह स्वयम्भू ब्रह्मा के समान अपनी माया से तीनों लोकों में विचरने लगा।

श्लोक 10 (skanda.8.122.10)

सनत्कुमार उवाच । तं तथावस्थितं दृष्ट्वा दैत्यं देवाः सवासवाः । भयत्रस्तास्तदा जग्मुः शरणं हरिमव्ययम्

sanatkumāra uvāca | taṁ tathāvasthitaṁ dṛṣṭvā daityaṁ devāḥ savāsavāḥ | bhayatrastāstadā jagmuḥ śaraṇaṁ harimavyayam

सनत्कुमार बोले - उस दैत्य को इस प्रकार प्रतिष्ठित देखकर वासव सहित देवता भय से त्रस्त होकर अविनाशी हरि की शरण में गये।

श्लोक 11 (skanda.8.122.11)

शरण्यः स च देवेशो हरिस्त्रैलोक्यबान्धवः । तेषां प्रादाद् भयत्राणं दानवस्य वधेप्सया

śaraṇyaḥ sa ca deveśo haristrailokyabāndhavaḥ | teṣāṁ prādād bhayatrāṇaṁ dānavasya vadhepsayā

वह शरण देनेवाले देवेश हरि, त्रैलोक्य के बन्धु, दानव के वध की इच्छा से उन्हें भयरक्षा प्रदान करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.8.122.12)

स तदा द्यां भुवञ्चैव व्याप्य रूपेण सर्वशः । चक्रं तदब्जं सस्मार यत्तद् रुद्रेण निर्मितम्

sa tadā dyāṁ bhuvañcaiva vyāpya rūpeṇa sarvaśaḥ | cakraṁ tadabjaṁ sasmāra yattad rudreṇa nirmitam

उसने तब अपने रूप से आकाश और पृथ्वी दोनों को सर्वथा व्याप्त करके उस कमलचिह्नित चक्र का स्मरण किया, जो रुद्र द्वारा निर्मित था।

श्लोक 13 (skanda.8.122.13)

ततस्तेन तदा व्यास दानवस्य शिरो महत् । जहार पक्वं तालाग्रात् फलं वायुरिवोद्धतः

tatastena tadā vyāsa dānavasya śiro mahat | jahāra pakvaṁ tālāgrāt phalaṁ vāyurivoddhataḥ

हे व्यास! तब उससे उन्होंने दानव का विशाल मस्तक इस प्रकार उड़ा दिया जैसे प्रचण्ड वायु ताड़वृक्ष के अग्रभाग से पके फल को उड़ा देती है।

श्लोक 14 (skanda.8.122.14)

तस्मिन् विनिहते दैत्ये तारकश्च मयश्च ह । विनिवृत्तौ महायोधौ पातालं प्रतिवेगितौ

tasmin vinihate daitye tārakaśca mayaśca ha | vinivṛttau mahāyodhau pātālaṁ prativegitau

उस दैत्य के मारे जाने पर तारक और मय, वे दोनों महान् योद्धा, लौटकर वेगपूर्वक पाताल की ओर भाग गये।

श्लोक 15 (skanda.8.122.15)

सनत्कुमार उवाच । एवं व्यासाभवद्युद्धमुग्रं तत्तारकामयम् । कालनेमिर्हतो यत्र विश्रुतश्च विरोचनः

sanatkumāra uvāca | evaṁ vyāsābhavadyuddhamugraṁ tattārakāmayam | kālanemirhato yatra viśrutaśca virocanaḥ

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार वह तारक-मय-सम्बन्धी उग्र युद्ध हुआ, जिसमें कालनेमि मारा गया और विरोचन विख्यात हुआ।

श्लोक 16 (skanda.8.122.16)

सैंहिकेयाश्च विक्रान्तास्तुहुण्डश्च महासुरः । सुरोचनः शतावर्तो हालो गार्ग्यशिरास्तथा

saiṁhikeyāśca vikrāntāstuhuṇḍaśca mahāsuraḥ | surocanaḥ śatāvarto hālo gārgyaśirāstathā

वीर सैंहिकेय, महासुर तुहुण्ड, सुरोचन, शतावर्त, हाल, तथा गार्ग्यशिरा भी वहाँ थे।

श्लोक 17 (skanda.8.122.17)

विपाकः सह पाकेन चण्डः कार्तस्वनः कुभः । एते चान्ये च दैत्येन्द्रा निहतास्तारकामये । ध्वजे पुनर्हतः क्रूरो विप्रचित्तिः सहानुजः

vipākaḥ saha pākena caṇḍaḥ kārtasvanaḥ kubhaḥ | ete cānye ca daityendrā nihatāstārakāmaye | dhvaje punarhataḥ krūro vipracittiḥ sahānujaḥ

विपाक, पाक, चण्ड, कार्तस्वन, कुभ - ये और अन्य दैत्येन्द्र तारक-मय के युद्ध में मारे गये; और ध्वज-युद्ध में क्रूर विप्रचित्ति अपने छोटे भाई सहित पुनः मारा गया।

श्लोक 18 (skanda.8.122.18)

व्यास उवाच । कथं तदभवद्युद्धं देवानामसुरैः सह । कथञ्च ध्वज इत्येवं तस्य नाम बभूव ह

vyāsa uvāca | kathaṁ tadabhavadyuddhaṁ devānāmasuraiḥ saha | kathañca dhvaja ityevaṁ tasya nāma babhūva ha

व्यास बोले - देवताओं का असुरों के साथ वह युद्ध कैसे हुआ, और वह 'ध्वज' नाम से कैसे प्रसिद्ध हुआ?

श्लोक 19 (skanda.8.122.19)

जामदग्न्यश्च तत्कर्म कृत्वा भृगुकुलोद्वहः । दुष्करं सर्वभूतानामागतस्त्र्यम्बकान्तिकम् । किमुक्तो देवदेवेन एतदिच्छामि वेदितुम्

jāmadagnyaśca tatkarma kṛtvā bhṛgukulodvahaḥ | duṣkaraṁ sarvabhūtānāmāgatastryambakāntikam | kimukto devadevena etadicchāmi veditum

भृगुकुल का उद्धार करनेवाले जामदग्न्य ने सब प्राणियों के लिये दुष्कर वह कार्य करके त्र्यम्बक के समीप जाकर देवदेव से क्या कहलाया - यह जानना चाहता हूँ।

श्लोक 20 (skanda.8.122.20)

सनत्कुमार उवाच । जमदग्नेस्तदा सूनुरमरैः प्रेषितः स्वयम् । जगाम गुह्यं देवस्य पुरिश्चन्द्रं निवेशनम्

sanatkumāra uvāca | jamadagnestadā sūnuramaraiḥ preṣitaḥ svayam | jagāma guhyaṁ devasya puriścandraṁ niveśanam

सनत्कुमार बोले - तब जमदग्नि का पुत्र स्वयं अमरों द्वारा भेजा जाकर देवता के गुह्य निवास पुरिश्चन्द्र को गया।

श्लोक 21 (skanda.8.122.21)

व्यास उवाच । कथं तदभवद्दिव्यं पुरिश्चन्द्रं निवेशनम् । स्थानं गुह्यं महेशस्य कथयस्व दृढव्रत

vyāsa uvāca | kathaṁ tadabhavaddivyaṁ puriścandraṁ niveśanam | sthānaṁ guhyaṁ maheśasya kathayasva dṛḍhavrata

व्यास बोले - हे दृढव्रत! वह दिव्य पुरिश्चन्द्र निवास, महेश का गुह्य स्थान, कैसे हुआ - मुझे बताइये।

श्लोक 22 (skanda.8.122.22)

सनत्कुमार उवाच । अत्र ते संप्रवक्ष्यामि पुरावृत्तं महामते । यच्छ्रुत्वा पापकर्मापि गच्छेत परमां गतिम्

sanatkumāra uvāca | atra te saṁpravakṣyāmi purāvṛttaṁ mahāmate | yacchrutvā pāpakarmāpi gaccheta paramāṁ gatim

सनत्कुमार बोले - हे महामते! मैं तुम्हें यहाँ वह प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, जिसे सुनकर पापकर्मी भी परम गति को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.8.122.23)

पुराभूतां महात्मानौ नरनारायणावृषी । ताभ्यां कार्येण देवानां ब्रह्मवध्या कृता किल

purābhūtāṁ mahātmānau naranārāyaṇāvṛṣī | tābhyāṁ kāryeṇa devānāṁ brahmavadhyā kṛtā kila

प्राचीनकाल में नर और नारायण नामक दो महात्मा ऋषि थे; देवताओं के कार्य के लिये उन दोनों से ब्रह्महत्या हो गयी थी।

श्लोक 24 (skanda.8.122.24)

तयाभिभूतौ तौ देवौ पाप्मयातिमहाबलौ । अभूतान्नष्टसंज्ञौ तौ तिर्यग्योनिगतौ भृशम्

tayābhibhūtau tau devau pāpmayātimahābalau | abhūtānnaṣṭasaṁjñau tau tiryagyonigatau bhṛśam

उस पाप से अभिभूत होकर वे दोनों अत्यन्त बलशाली देव संज्ञाशून्य हो गये और पशु-योनि में अत्यधिक पड़ गये।

श्लोक 25 (skanda.8.122.25)

अथ संवत्सरे दिव्ये समतीतेमितात्मवान् । आगाद् ब्रह्मा स्वयं तत्र दैवतैर्ऋषिभिः सह

atha saṁvatsare divye samatītemitātmavān | āgād brahmā svayaṁ tatra daivatairṛṣibhiḥ saha

फिर जब एक दिव्य वर्ष बीत गया, तब संयमी ब्रह्मा स्वयं देवताओं और ऋषियों के साथ वहाँ आये।

श्लोक 26 (skanda.8.122.26)

स तं संबोधयामास सनरं देवपस्तदा । तथापि हि न तौ बुद्धौ कर्मणा संवृतौ भृशम्

sa taṁ saṁbodhayāmāsa sanaraṁ devapastadā | tathāpi hi na tau buddhau karmaṇā saṁvṛtau bhṛśam

उस देवपति ने नर सहित नारायण को जगाने का प्रयत्न किया, फिर भी वे दोनों अपने कर्म से अत्यन्त आच्छादित बुद्धि के कारण नहीं जग सके।

श्लोक 27 (skanda.8.122.27)

तान् ब्रह्मा स तदा प्राह सर्वानेव दिवौकसः । यूयं नारायणस्यार्थे चरध्वं धर्ममुत्तमम्

tān brahmā sa tadā prāha sarvāneva divaukasaḥ | yūyaṁ nārāyaṇasyārthe caradhvaṁ dharmamuttamam

तब ब्रह्मा ने उन समस्त देवताओं से कहा - तुम लोग नारायण के लिये उत्तम धर्म का आचरण करो।

श्लोक 28 (skanda.8.122.28)

ततो विमोक्ष्यते देवः सनरो ब्रह्मवध्यया । तमेवंवादिनं देवाः प्रणम्य शिरसा तदा । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे किन्तपः कर्म शाधि नः

tato vimokṣyate devaḥ sanaro brahmavadhyayā | tamevaṁvādinaṁ devāḥ praṇamya śirasā tadā | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve kintapaḥ karma śādhi naḥ

'तब वह देव नर सहित ब्रह्महत्या से मुक्त हो जायेगा।' ऐसा कहनेवाले उन्हें प्रणाम करके सब देवता हाथ जोड़कर बोले - हमें बताइये कि कौन-सा तप, कौन-सा कर्म करें।

श्लोक 29 (skanda.8.122.29)

ब्रह्मोवाच । जपध्वं प्रयताः सर्वे वायुभक्षा जितेन्द्रियाः । रुद्राणां हृदयं सम्यक् ततो योगमवाप्स्यथ

brahmovāca | japadhvaṁ prayatāḥ sarve vāyubhakṣā jitendriyāḥ | rudrāṇāṁ hṛdayaṁ samyak tato yogamavāpsyatha

ब्रह्मा बोले - तुम सब संयमित, वायुभक्षी, जितेन्द्रिय होकर रुद्रों के हृदय-मन्त्र का भलीभाँति जप करो, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।

श्लोक 30 (skanda.8.122.30)

सनत्कुमार उवाच । त एवमस्त्विति प्रोच्य जजपुः सलिलेशयाः । ऋषिभिस्सह देवेशा वर्षायुतशतानि षट्

sanatkumāra uvāca | ta evamastviti procya jajapuḥ salileśayāḥ | ṛṣibhissaha deveśā varṣāyutaśatāni ṣaṭ

सनत्कुमार बोले - 'ऐसा ही हो' कहकर जल में शयन करते हुए वे देवेश ऋषियों सहित छह लाख वर्ष तक जप करते रहे।

श्लोक 31 (skanda.8.122.31)

अथ कालेन महता तेषां युक्तात्मनां तदा । योगः प्रादुरभूत् सूक्ष्मो यतोग्निरभवच्छुभः

atha kālena mahatā teṣāṁ yuktātmanāṁ tadā | yogaḥ prādurabhūt sūkṣmo yatognirabhavacchubhaḥ

फिर बहुत समय बीतने पर, उन एकाग्रचित्त लोगों में एक सूक्ष्म योग प्रकट हुआ, जिससे शुभ अग्नि उत्पन्न हुई।

श्लोक 32 (skanda.8.122.32)

तेनाग्निना ब्रह्मवध्या नरनारायणौ तदा । सा दग्धा संपरित्यज्य उदकं प्रविवेश ह

tenāgninā brahmavadhyā naranārāyaṇau tadā | sā dagdhā saṁparityajya udakaṁ praviveśa ha

उस अग्नि से नर-नारायण से चिपकी हुई ब्रह्महत्या तब जल गयी, और उन्हें छोड़कर वह जल में प्रविष्ट हो गयी।

श्लोक 33 (skanda.8.122.33)

नास्तयापः समाविष्टा रसवत्यो न जज्ञिरे । अगन्धाश्च विवर्णाश्च प्रभावत्यो न चैव ह । पृथिवी चाल्पवीर्याभूत्तेजस्तिग्मं च नाभवत्

nāstayāpaḥ samāviṣṭā rasavatyo na jajñire | agandhāśca vivarṇāśca prabhāvatyo na caiva ha | pṛthivī cālpavīryābhūttejastigmaṁ ca nābhavat

उससे व्याप्त हुए जल का रस जाता रहा, वे गन्धहीन और वर्णहीन हो गये तथा उनका प्रभाव जाता रहा; और पृथ्वी अल्पशक्ति हो गयी, तेज की तीक्ष्णता भी न रही।

श्लोक 34 (skanda.8.122.34)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते तन्तथा दृष्ट्वा युयुजुर्भूय एव च । हृदयं जजपुश्चैव रुद्राणां युक्तमानसाः

sanatkumāra uvāca | tataste tantathā dṛṣṭvā yuyujurbhūya eva ca | hṛdayaṁ jajapuścaiva rudrāṇāṁ yuktamānasāḥ

सनत्कुमार बोले - तब यह देखकर वे फिर एकाग्रचित्त होकर योगयुक्त हुए और रुद्रों के हृदय-मन्त्र का पुनः जप करने लगे।

श्लोक 35 (skanda.8.122.35)

अथागाद् भगवान्देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः । उवाच देवान् तुष्टोस्मि ब्रूत यद्वोभिकांक्षितम्

athāgād bhagavāndevaḥ śūlapāṇirvṛṣadhvajaḥ | uvāca devān tuṣṭosmi brūta yadvobhikāṁkṣitam

तब त्रिशूलधारी बैलध्वज भगवान् देव आये और देवताओं से बोले - मैं प्रसन्न हूँ, कहो तुम्हें क्या अभीष्ट है।

श्लोक 36 (skanda.8.122.36)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ता देवताः सम्यग् रुद्रं दृष्ट्वाभिरेमिरे । तुष्टुवुश्चानता भूत्वा यज्ञजीमूतवाहनम्

sanatkumāra uvāca | tatastā devatāḥ samyag rudraṁ dṛṣṭvābhiremire | tuṣṭuvuścānatā bhūtvā yajñajīmūtavāhanam

सनत्कुमार बोले - तब उन देवताओं ने रुद्र को भलीभाँति देखकर आनन्दित होकर, झुककर, यज्ञ-मेघ पर विराजमान उनकी स्तुति की।

श्लोक 37 (skanda.8.122.37)

देवा ऊचुः । नमः परमदेवाय युगान्तानलवर्च्चसे । सलिले तप्यमानाय रुद्राणां हृदयाय च

devā ūcuḥ | namaḥ paramadevāya yugāntānalavarccase | salile tapyamānāya rudrāṇāṁ hṛdayāya ca

देवता बोले - परमदेव को, युगान्त-अग्नि के समान तेजस्वी को, जल में तपस्या करनेवाले को, और रुद्रों के हृदय को नमस्कार है।

श्लोक 38 (skanda.8.122.38)

महापरशुहस्ताय हिरण्यायतनाय च । वसूनां पतये चैव देवानां पतये नमः

mahāparaśuhastāya hiraṇyāyatanāya ca | vasūnāṁ pataye caiva devānāṁ pataye namaḥ

महान् परशु हाथ में धारण करनेवाले को, स्वर्णमय आवासवाले को, वसुओं के स्वामी और देवताओं के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 39 (skanda.8.122.39)

शुचये रेरिहाणाय सद्योजाताय मन्यवे । ग्रहाणां पतये चैव ग्रहाणां हृदयाय च

śucaye rerihāṇāya sadyojātāya manyave | grahāṇāṁ pataye caiva grahāṇāṁ hṛdayāya ca

पवित्र को, लपलपाती ज्वाला-रूप को, सद्योजात को, क्रोध-रूप को, ग्रहों के स्वामी को, और ग्रहों के हृदय को नमस्कार।

श्लोक 40 (skanda.8.122.40)

महाग्रहानुयाताय ग्रहराजाय वै नमः । नमः शमदमोग्राय उग्रदण्डधराय च

mahāgrahānuyātāya graharājāya vai namaḥ | namaḥ śamadamogrāya ugradaṇḍadharāya ca

महाग्रहों से अनुगमन किये गये को, ग्रहराज को नमस्कार है; शम-दम में उग्र को और उग्र दण्ड धारण करनेवाले को नमस्कार है।

श्लोक 41 (skanda.8.122.41)

यमाय यमनाथाय यमदण्डधराय च । नमः परमदेवाय पराणां परमाय च

yamāya yamanāthāya yamadaṇḍadharāya ca | namaḥ paramadevāya parāṇāṁ paramāya ca

यम को, यम के स्वामी को, यम-दण्ड धारण करनेवाले को नमस्कार है; परमदेव को और परों में भी परम को नमस्कार है।

श्लोक 42 (skanda.8.122.42)

महतां पतये चैव कमण्डलुधराय च । वामदेवाय ज्येष्ठाय पशूनां पतये नमः

mahatāṁ pataye caiva kamaṇḍaludharāya ca | vāmadevāya jyeṣṭhāya paśūnāṁ pataye namaḥ

महानों के स्वामी को, कमण्डलुधारी को, वामदेव को, ज्येष्ठ को, पशुओं के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 43 (skanda.8.122.43)

प्रधानपतये चैव प्रधानस्य प्रवर्तिने । नमः सहस्रवक्त्राय गदिने शूलिने नमः

pradhānapataye caiva pradhānasya pravartine | namaḥ sahasravaktrāya gadine śūline namaḥ

प्रधान (प्रकृति) के स्वामी को, प्रधान को प्रवृत्त करनेवाले को नमस्कार; सहस्रमुख को, गदाधारी को, शूलधारी को नमस्कार है।

श्लोक 44 (skanda.8.122.44)

नमः पवनरूपाय बहुरूपाय वेधसे । नमः क्रतुविहन्त्रे च कामानलविघातिने

namaḥ pavanarūpāya bahurūpāya vedhase | namaḥ kratuvihantre ca kāmānalavighātine

वायु-रूप को, बहुरूपी विधाता को नमस्कार है; यज्ञ-विनाशक को और काम-अग्नि के नाशक को नमस्कार है।

श्लोक 45 (skanda.8.122.45)

नमश्छन्दोङ्गरूपाय विरूपनयनाय च । इन्द्रियग्रामघाताय नमो वेदान्तगाय च

namaśchandoṅgarūpāya virūpanayanāya ca | indriyagrāmaghātāya namo vedāntagāya ca

छन्दों के अंगरूप को, विरूप-नेत्र को नमस्कार है; इन्द्रियसमूह के संहारक को और वेदान्तगामी को नमस्कार है।

श्लोक 46 (skanda.8.122.46)

नमोस्त्वशनिघाताय मनसामुन्मनाय च । वेदवेदाङ्गमालाय नमस्ते पद्ममालिने

namostvaśanighātāya manasāmunmanāya ca | vedavedāṅgamālāya namaste padmamāline

वज्रपात-रूप को नमस्कार हो, मनों के लिये अमन-रूप को नमस्कार; वेद-वेदांगमाला को, कमलमाली को नमस्कार है।

श्लोक 47 (skanda.8.122.47)

नमः शैलप्रदाहाय शैलजातोद्भवाय च । महते विश्वरूपाय महद्भिर्महिताय च

namaḥ śailapradāhāya śailajātodbhavāya ca | mahate viśvarūpāya mahadbhirmahitāya ca

पर्वतों को दग्ध करनेवाले को, पर्वतजा (पार्वती) से उत्पन्न को नमस्कार है; महान् विश्वरूप को और महानों द्वारा पूजित को नमस्कार।

श्लोक 48 (skanda.8.122.48)

सहस्रशतनेत्राय ललाटनयनाय च । महायोगप्रणेत्रे च तथा तत्पुरुषाय च

sahasraśatanetrāya lalāṭanayanāya ca | mahāyogapraṇetre ca tathā tatpuruṣāya ca

शतसहस्र नेत्रोंवाले को, ललाट-नेत्र को नमस्कार; महायोग के प्रवर्तक को और तत्पुरुष को नमस्कार है।

श्लोक 49 (skanda.8.122.49)

नमो वेदरहस्याय देववेदस्तुताय च । योगिने ध्यायमानाय अशनीपातहासिने

namo vedarahasyāya devavedastutāya ca | yogine dhyāyamānāya aśanīpātahāsine

वेद के रहस्य को, देव-वेद द्वारा स्तुत को नमस्कार; ध्यान किये जानेवाले योगी को, वज्रपात-सी हास्यवाले को नमस्कार।

श्लोक 50 (skanda.8.122.50)

हृच्छयाय नमस्तेस्तु नमः सर्वगताय च । कुमारवरनाथाय कुमारजनकाय च

hṛcchayāya namastestu namaḥ sarvagatāya ca | kumāravaranāthāya kumārajanakāya ca

हृदय में शयन करनेवाले को तुम्हें नमस्कार, सर्वव्यापी को नमस्कार; श्रेष्ठ कुमार के स्वामी को और कुमार के जनक को नमस्कार।

श्लोक 51 (skanda.8.122.51)

दण्डहस्ताय चरते अन्तकायाजिताय च । शुभाय शुभरूपाय शुभसर्वप्रवर्तिने

daṇḍahastāya carate antakāyājitāya ca | śubhāya śubharūpāya śubhasarvapravartine

हाथ में दण्ड लिये विचरनेवाले को, अन्तक-रूप को, अजित को नमस्कार; शुभ को, शुभरूप को, सब शुभ को प्रवृत्त करनेवाले को नमस्कार।

श्लोक 52 (skanda.8.122.52)

शिवाय शिवनाथाय सदा सर्वशिवाय च । धनुर्वेदरहस्याय धनुर्वेदप्रवर्तिने

śivāya śivanāthāya sadā sarvaśivāya ca | dhanurvedarahasyāya dhanurvedapravartine

शिव को, शिव के स्वामी को, सदा सर्वशिव को नमस्कार; धनुर्वेद के रहस्य को और धनुर्वेद के प्रवर्तक को नमस्कार।

श्लोक 53 (skanda.8.122.53)

सर्वपापापहन्त्रे च सर्वपाप्मविघातिने । शिवः सौम्यश्च देवेश दिश नो यन्मनोगतम्

sarvapāpāpahantre ca sarvapāpmavighātine | śivaḥ saumyaśca deveśa diśa no yanmanogatam

समस्त पापों के नाशक को नमस्कार है - हे देवेश! शिव और सौम्य होकर हमें वह दीजिये जो हमारे मन में है।

श्लोक 54 (skanda.8.122.54)

यदपव्याहृतं किञ्चिदस्माभिर्भगवन् विभो । तत्सर्वं भक्तवात्सल्यादस्माकं क्षन्तुमर्हसि

yadapavyāhṛtaṁ kiñcidasmābhirbhagavan vibho | tatsarvaṁ bhaktavātsalyādasmākaṁ kṣantumarhasi

हे भगवन्, हे विभो! हमसे जो कुछ भी अनुचित कहा गया हो, उस सबको भक्तवत्सलता से क्षमा कीजिये।

श्लोक 55 (skanda.8.122.55)

पाप्मयाभिपरीतात्मा देवबन्धुरयं विभो । नरेण सह देवेश स भवेच्चन्द्रनिर्मलः

pāpmayābhiparītātmā devabandhurayaṁ vibho | nareṇa saha deveśa sa bhaveccandranirmalaḥ

हे विभो! पाप से घिरा हुआ यह देवबन्धु (नारायण), हे देवेश, नर के साथ चन्द्रमा के समान निर्मल हो जाये।

श्लोक 56 (skanda.8.122.56)

सनत्कुमार उवाच । य इमं त्र्यम्बकस्तोत्रं भक्तिमान् सततं नरः । पठति प्रयतो व्यास पाप्मया स विमुच्यते

sanatkumāra uvāca | ya imaṁ tryambakastotraṁ bhaktimān satataṁ naraḥ | paṭhati prayato vyāsa pāpmayā sa vimucyate

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! जो भक्तिमान् मनुष्य संयमपूर्वक सदा इस त्र्यम्बक-स्तोत्र का पाठ करता है, वह पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 57 (skanda.8.122.57)

सर्वपापैश्च मुच्येत नष्टञ्च लभते पुनः । न च दुर्गतिमाप्नोति यदि स्याद्वै सुपापकृत्

sarvapāpaiśca mucyeta naṣṭañca labhate punaḥ | na ca durgatimāpnoti yadi syādvai supāpakṛt

वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, खोया हुआ पुनः प्राप्त कर लेता है, और यदि वह महापापी भी हो तो भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 58 (skanda.8.122.58)

सनत्कुमार उवाच । एवं स भगवान् देवैः स्तुतस्तुष्टश्च लोकपः । उवाच देवान्देवेशः सर्वान् सत्यवतीसुत

sanatkumāra uvāca | evaṁ sa bhagavān devaiḥ stutastuṣṭaśca lokapaḥ | uvāca devāndeveśaḥ sarvān satyavatīsuta

सनत्कुमार बोले - हे सत्यवतीसुत! इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुत होकर वे भगवान् लोकपाल, देवेश, प्रसन्न होकर सब देवताओं से बोले।

श्लोक 59 (skanda.8.122.59)

देवदेव उवाच । भो देवाः परितुष्टोस्मि वरं वृणुत कांक्षितम् । दास्येहं तन्महाप्रज्ञा मा तूष्णीं ब्रूत सर्वशः

devadeva uvāca | bho devāḥ parituṣṭosmi varaṁ vṛṇuta kāṁkṣitam | dāsyehaṁ tanmahāprajñā mā tūṣṇīṁ brūta sarvaśaḥ

देवदेव बोले - हे देवगण! मैं परितुष्ट हूँ, अभीष्ट वर माँगो; हे महाप्रज्ञ लोगों! मैं वह दूँगा, चुप मत रहो, सब कुछ कहो।

श्लोक 60 (skanda.8.122.60)

देवा ऊचुः । हरिरेष महादेव पाप्मया हतमानसः । तामस्य निर्णुद क्षिप्रं नीहारमिव भास्करः

devā ūcuḥ | harireṣa mahādeva pāpmayā hatamānasaḥ | tāmasya nirṇuda kṣipraṁ nīhāramiva bhāskaraḥ

देवता बोले - हे महादेव! यह हरि पाप से पीड़ितमन है; जैसे सूर्य कुहरे को दूर करता है, वैसे ही शीघ्र उसके इस पाप को दूर कीजिये।

श्लोक 61 (skanda.8.122.61)

एष लोकहितार्थाय देवानाञ्च महाबलः । कुरुते कर्म देवेश पाप्मानं ह्यस्य नाशय

eṣa lokahitārthāya devānāñca mahābalaḥ | kurute karma deveśa pāpmānaṁ hyasya nāśaya

यह महाबली लोकहित के लिये और देवताओं के लिये कार्य करता है, हे देवेश! इसके पाप का नाश कीजिये।

श्लोक 62 (skanda.8.122.62)

वयं च समतां तुभ्यं गणतां गणमध्यगाः । लभेम सर्वदैवेश यदि त्वं मन्यसे विभो

vayaṁ ca samatāṁ tubhyaṁ gaṇatāṁ gaṇamadhyagāḥ | labhema sarvadaiveśa yadi tvaṁ manyase vibho

हे सर्वदेवेश! और यदि आप उचित समझें तो हम भी आपके तुल्य होकर आपके गणों में सम्मिलित होकर गणपद प्राप्त करें।

श्लोक 63 (skanda.8.122.63)

सनत्कुमार उवाच । तेषामेवं तु वदतां देवानामृषिसत्तम । उवाच भगवाञ्छर्वः प्रहसन् प्रीतमानसः

sanatkumāra uvāca | teṣāmevaṁ tu vadatāṁ devānāmṛṣisattama | uvāca bhagavāñcharvaḥ prahasan prītamānasaḥ

सनत्कुमार बोले - हे ऋषिसत्तम! उन देवताओं के इस प्रकार कहने पर भगवान् शर्व मुस्कुराते हुए, प्रसन्नचित्त होकर बोले।

श्लोक 64 (skanda.8.122.64)

विष्णुरेष सुराः सद्यो मोक्ष्यते पाप्मयानया । पाप्मा चेयं महाभागा ऊषरे संभविष्यति

viṣṇureṣa surāḥ sadyo mokṣyate pāpmayānayā | pāpmā ceyaṁ mahābhāgā ūṣare saṁbhaviṣyati

'हे देवगण! यह विष्णु शीघ्र ही इस पाप से मुक्त हो जायेगा; और यह महाभागा पाप-देवी ऊसर भूमि में जाकर बस जायेगी।'

श्लोक 65 (skanda.8.122.65)

निर्यासश्चैव वृक्षाणामपां फेनस्तथैव च । महोरगाणां गन्धश्च स्त्रीणां निन्दा तथैव च

niryāsaścaiva vṛkṣāṇāmapāṁ phenastathaiva ca | mahoragāṇāṁ gandhaśca strīṇāṁ nindā tathaiva ca

'वृक्षों का गोंद, तथा जल का फेन, महासर्पों की गन्ध, और स्त्रियों की निन्दा - इन में भी वह निवास करेगी।'

श्लोक 66 (skanda.8.122.66)

दीक्षितस्य च विप्रस्य अशुभस्यावकीर्तनम् । ब्राह्मणानां परीवादो गवामपरिकीर्तनम्

dīkṣitasya ca viprasya aśubhasyāvakīrtanam | brāhmaṇānāṁ parīvādo gavāmaparikīrtanam

'दीक्षित ब्राह्मण के अशुभ का कथन, ब्राह्मणों की निन्दा, गौओं का अकीर्तन,'

श्लोक 67 (skanda.8.122.67)

अग्नेरज्वलनञ्चैव नदीनां बन्ध एव च । य एतानि नरः कुर्याद्रागमोहसमन्वितः । स एतां प्राप्नुयाल्लोके स्वयंभूरपि लोकपः

agnerajvalanañcaiva nadīnāṁ bandha eva ca | ya etāni naraḥ kuryādrāgamohasamanvitaḥ | sa etāṁ prāpnuyālloke svayaṁbhūrapi lokapaḥ

'और अग्नि का न जलाना, तथा नदियों को बाँधना - जो मनुष्य राग-मोह से युक्त होकर ये कर्म करता है, वह चाहे स्वयंभू लोकपाल भी क्यों न हो, इस पाप को प्राप्त करता है।'

श्लोक 68 (skanda.8.122.68)

यदा तु वसुदेवस्य सुतो विष्णुर्भविष्यति । तदा स रूपिणीमेनां नर एषोपभोक्ष्यते

yadā tu vasudevasya suto viṣṇurbhaviṣyati | tadā sa rūpiṇīmenāṁ nara eṣopabhokṣyate

'किन्तु जब विष्णु वसुदेव के पुत्र होंगे, तब यह पुरुष इसे साकार रूप में भोगेगा।'

श्लोक 69 (skanda.8.122.69)

तत्रोपभुज्य वरदो हरेर्जातां स्वसान्तदा । विमुक्तः पाप्मया भूय इमं लोकं चरिष्यति

tatropabhujya varado harerjātāṁ svasāntadā | vimuktaḥ pāpmayā bhūya imaṁ lokaṁ cariṣyati

'वहाँ भोगकर, वरदाता होकर, हरि की उत्पन्न बहन के रूप में, फिर पाप से मुक्त होकर वह इस लोक में विचरेगा।'

श्लोक 70 (skanda.8.122.70)

यथा त्वस्य स्वसापीयं नैव बाधां करिष्यति । तथा चरत्वयं घोरं तपः परमदुश्चरम्

yathā tvasya svasāpīyaṁ naiva bādhāṁ kariṣyati | tathā caratvayaṁ ghoraṁ tapaḥ paramaduścaram

'जिससे उसकी यह बहन उसे बाधा न पहुँचाये, इसलिये यह घोर और अत्यन्त कठिन तप करे।'

श्लोक 71 (skanda.8.122.71)

यूयं च ऋषिभिः सार्धमिहैव सुसमाहिताः । पुरश्चरणमव्यग्राः कुरुध्वं मदनुज्ञया

yūyaṁ ca ṛṣibhiḥ sārdhamihaiva susamāhitāḥ | puraścaraṇamavyagrāḥ kurudhvaṁ madanujñayā

'और तुम भी ऋषियों के साथ यहीं भलीभाँति एकाग्रचित्त होकर, विचलित हुए बिना, मेरी अनुमति से पुरश्चरण करो।'

श्लोक 72 (skanda.8.122.72)

सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता देवेन देवास्सर्वे तदा हरिम् । ऊचुः कुरु तपो घोरं ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि

sanatkumāra uvāca | ta evamuktā devena devāssarve tadā harim | ūcuḥ kuru tapo ghoraṁ tataḥ śreyo hyavāpsyasi

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार देव द्वारा कहे जाने पर सब देवताओं ने तब हरि से कहा - घोर तप करो, तब कल्याण को प्राप्त करोगे।

श्लोक 73 (skanda.8.122.73)

ततः स चन्द्रं शैलेन्द्रमारुह्य सुसमाहितः । तपश्चचार सुमहदिन्द्रियग्रामतापनम्

tataḥ sa candraṁ śailendramāruhya susamāhitaḥ | tapaścacāra sumahadindriyagrāmatāpanam

तब वे चन्द्र नामक पर्वतश्रेष्ठ पर चढ़कर, भलीभाँति एकाग्रचित्त होकर, इन्द्रियसमूह को तपानेवाला महान् तप करने लगे।

श्लोक 74 (skanda.8.122.74)

देवा अपि महात्मान ऋषिभिस्सह सुव्रतैः । हिरण्यवर्णं शैलेन्द्रे तपस्तेपुस्समाहिताः

devā api mahātmāna ṛṣibhissaha suvrataiḥ | hiraṇyavarṇaṁ śailendre tapastepussamāhitāḥ

महात्मा देवता भी सुव्रती ऋषियों सहित उस सुवर्णवर्ण पर्वतश्रेष्ठ पर एकाग्रचित्त होकर तप करने लगे।

श्लोक 75 (skanda.8.122.75)

अथ तेषां समाप्ते तु व्रते तस्मिन् पिनाकधृक् । आदिदेश व्रतं दीप्तं यत्तत् पाशुपतं महत्

atha teṣāṁ samāpte tu vrate tasmin pinākadhṛk | ādideśa vrataṁ dīptaṁ yattat pāśupataṁ mahat

फिर उनका वह व्रत पूर्ण होने पर पिनाकधारी ने उन्हें वह देदीप्यमान, महान् पाशुपत व्रत बताया।

श्लोक 76 (skanda.8.122.76)

उवाच स तु तुष्टात्मा आभाष्य सुरपुंगवान् । मेघदुन्दुभिनिर्घोषं धीरम्भीरशब्दवत्

uvāca sa tu tuṣṭātmā ābhāṣya surapuṁgavān | meghadundubhinirghoṣaṁ dhīrambhīraśabdavat

प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने देवश्रेष्ठों को सम्बोधित करते हुए मेघ और दुन्दुभि की गम्भीर ध्वनि के समान गम्भीर वाणी में कहा।

श्लोक 77 (skanda.8.122.77)

देवदेव उवाच । पुरश्चरणमेतद्धि सुचीर्णं लोकपाः स्वयम् । इदं पाशुपतं चीर्त्वा निर्वृता यात निर्भयाः

devadeva uvāca | puraścaraṇametaddhi sucīrṇaṁ lokapāḥ svayam | idaṁ pāśupataṁ cīrtvā nirvṛtā yāta nirbhayāḥ

देवदेव बोले - हे लोकपालो! तुमने स्वयं यह पुरश्चरण भलीभाँति सम्पन्न किया है; इस पाशुपत व्रत का पालन करके सन्तुष्ट और निर्भय होकर जाओ।

श्लोक 78 (skanda.8.122.78)

एतत् परं पवित्रञ्च सांख्ययोगाधिकं व्रतम् । नास्मात्परतरं किञ्चित् सूक्ष्मं वा विद्यते क्वचित्

etat paraṁ pavitrañca sāṁkhyayogādhikaṁ vratam | nāsmātparataraṁ kiñcit sūkṣmaṁ vā vidyate kvacit

'यह व्रत परम पवित्र है, सांख्य और योग से भी श्रेष्ठ है; इससे बढ़कर या इससे सूक्ष्म कुछ भी कहीं नहीं है।'

श्लोक 79 (skanda.8.122.79)

भस्मना दिग्धसर्वाङ्गो दिग्वासाः शुचिरेव च । शरीरस्थैर्यजन् रुद्रं सर्वपापैः प्रमुच्यते

bhasmanā digdhasarvāṅgo digvāsāḥ śucireva ca | śarīrasthairyajan rudraṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

'जो अपने समस्त अंगों को भस्म से लीपकर, दिशाओं को वस्त्र बनाकर, पवित्र होकर, शरीर की स्थिरता से रुद्र का यजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 80 (skanda.8.122.80)

आर्द्र स्नानात् परं भस्म आर्द्रे जन्तुवधो ध्रुवम् । आर्द्रन्तु प्रकृतिं विद्यात् प्रकृतिं चापि बन्धनम्

ārdra snānāt paraṁ bhasma ārdre jantuvadho dhruvam | ārdrantu prakṛtiṁ vidyāt prakṛtiṁ cāpi bandhanam

'गीली अवस्था के स्नान से भस्म श्रेष्ठ है, क्योंकि गीली अवस्था में जीव-हिंसा निश्चित है; गीलेपन को प्रकृति समझना चाहिये, और प्रकृति को ही बन्धन।'

श्लोक 81 (skanda.8.122.81)

प्रकृतेस्तु प्रहाणार्थं भस्मना स्नानमिष्यते । दिग्वासस्त्वं च शौचञ्च येन जायेन्न कर्हिचित्

prakṛtestu prahāṇārthaṁ bhasmanā snānamiṣyate | digvāsastvaṁ ca śaucañca yena jāyenna karhicit

'प्रकृति के त्याग के लिये ही भस्म-स्नान का विधान है, तथा दिगम्बरत्व और शौच भी, जिससे मनुष्य फिर कभी जन्म न ले।'

श्लोक 82 (skanda.8.122.82)

यन्त्राणां परमं यन्त्रमन्यद्यस्मान्न विद्यते । षडङ्ग सर्वकामीयं सर्वलोकनमस्कृतम्

yantrāṇāṁ paramaṁ yantramanyadyasmānna vidyate | ṣaḍaṅga sarvakāmīyaṁ sarvalokanamaskṛtam

'यह विधानों में परम विधान है, इससे बढ़कर अन्य कुछ नहीं है; यह षडंग है, सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाला और सम्पूर्ण जगत् द्वारा नमस्कृत है।'

श्लोक 83 (skanda.8.122.83)

शुचि सर्वपवित्रं च सर्वपापापहं शुभम् । तपसो वर्धनं चैव ते चरन्तु समाहिताः । यन्त्रं त्वपापं विज्ञेयं प्रकृतिस्सा च संस्मृता

śuci sarvapavitraṁ ca sarvapāpāpahaṁ śubham | tapaso vardhanaṁ caiva te carantu samāhitāḥ | yantraṁ tvapāpaṁ vijñeyaṁ prakṛtissā ca saṁsmṛtā

'यह पवित्र, सर्वथा शुद्ध, समस्त पाप-नाशक और शुभ है, तथा तप की वृद्धि करनेवाला है - इसे वे एकाग्रचित्त होकर आचरण करें; यह विधान निष्पाप जानना चाहिये, और यही प्रकृति भी कही गयी है।'

श्लोक 84 (skanda.8.122.84)

बन्धश्च त्रिविधः प्रोक्तः सन्यासफलमेव च । तस्मात् सर्वप्रहाणार्थं यन्त्रमेतत् समाचरेत्

bandhaśca trividhaḥ proktaḥ sanyāsaphalameva ca | tasmāt sarvaprahāṇārthaṁ yantrametat samācaret

'बन्धन तीन प्रकार का कहा गया है, और सन्यास का फल भी; अतः सबके त्याग के लिये इस विधान का आचरण करना चाहिये।'

श्लोक 85 (skanda.8.122.85)

असम्मतः सदा लोके येन जीर्येन्न कर्हिचित् । योगञ्च परमं प्राप्य योगानां यत्परं महत्

asammataḥ sadā loke yena jīryenna karhicit | yogañca paramaṁ prāpya yogānāṁ yatparaṁ mahat

'जिसके द्वारा मनुष्य लोक में सामान्य मान्यता से परे रहता है और कभी जीर्ण नहीं होता, तथा योगों में जो श्रेष्ठ महान् परम योग है, उसे प्राप्त करता है,'

श्लोक 86 (skanda.8.122.86)

यस्मात् परतरं नास्ति षडङ्गं सर्वकामिकम् । येन मुक्तः पतेद् भूयो न योगी मरणादिषु

yasmāt parataraṁ nāsti ṣaḍaṅgaṁ sarvakāmikam | yena muktaḥ pated bhūyo na yogī maraṇādiṣu

'जिससे बढ़कर कुछ नहीं है, वह षडंग, सब कामनाओं का पूरक है, जिसे प्राप्त कर मुक्त योगी पुनः मरण आदि में नहीं गिरता।'

श्लोक 87 (skanda.8.122.87)

तं योगं समनुप्राप्य सिद्धो दिव्येन कर्मणा । न लिप्यते महायोगी कर्मभिस्तु कृताकृतैः

taṁ yogaṁ samanuprāpya siddho divyena karmaṇā | na lipyate mahāyogī karmabhistu kṛtākṛtaiḥ

'उस योग को प्राप्त करके, दिव्य कर्म से सिद्ध हुआ महायोगी, किये और न किये गये कर्मों से लिप्त नहीं होता।'

श्लोक 88 (skanda.8.122.88)

सनत्कुमार उवाच । एवं ते देवदेवेन समाज्ञप्ता दिवौकसः । समाप्य तद्व्रतं घोरं शंकरस्य गणा बभुः

sanatkumāra uvāca | evaṁ te devadevena samājñaptā divaukasaḥ | samāpya tadvrataṁ ghoraṁ śaṁkarasya gaṇā babhuḥ

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार देवदेव द्वारा आज्ञप्त होकर उन देवताओं ने उस घोर व्रत को पूर्ण करके शंकर के गण बन गये।

श्लोक 89 (skanda.8.122.89)

ते गणत्वमनुप्राप्य तस्य देवस्य शूलिनः । अन्वगृहणन्त तं देशं तपसा भाविता भृशम्

te gaṇatvamanuprāpya tasya devasya śūlinaḥ | anvagṛhaṇanta taṁ deśaṁ tapasā bhāvitā bhṛśam

उस शूलधारी देव के गणत्व को प्राप्त करके, तप से अत्यन्त परिपक्व होकर, उन्होंने उस प्रदेश को अनुगृहीत किया।

श्लोक 90 (skanda.8.122.90)

देवा ऊचुः । यस्मादिह सुचीर्णं नः पुरश्चरणमन्तशः । तस्मादिदं महेशस्य गुह्यमायतनं स्मृतम्

devā ūcuḥ | yasmādiha sucīrṇaṁ naḥ puraścaraṇamantaśaḥ | tasmādidaṁ maheśasya guhyamāyatanaṁ smṛtam

देवता बोले - चूँकि यहाँ हमारा पुरश्चरण पूर्णतः भलीभाँति सम्पन्न हुआ, इसलिये यह महेश का गुह्य निवास कहा जायेगा।

श्लोक 91 (skanda.8.122.91)

पुरिश्चन्द्रमिति ख्यातं त्रिषु लोकेषु दीप्तिमत् । पञ्चयोजनविस्तीर्णं तावदेवायतं शुभम्

puriścandramiti khyātaṁ triṣu lokeṣu dīptimat | pañcayojanavistīrṇaṁ tāvadevāyataṁ śubham

'तीनों लोकों में देदीप्यमान और पुरिश्चन्द्र नाम से विख्यात, पाँच योजन चौड़ा और उतना ही लम्बा, यह शुभ स्थान होगा।'

श्लोक 92 (skanda.8.122.92)

सिद्धचारणसंकीर्णमप्सरोगणनादितम् । बहुपक्षिनिनादञ्च नदीप्रस्रवणाकुलम् । भविष्यति महापुण्यं तपोधनतपोवनम्

siddhacāraṇasaṁkīrṇamapsarogaṇanāditam | bahupakṣininādañca nadīprasravaṇākulam | bhaviṣyati mahāpuṇyaṁ tapodhanatapovanam

'सिद्ध और चारणों से भरा हुआ, अप्सरागणों के कोलाहल से गूँजता हुआ, बहुत पक्षियों की ध्वनि से युक्त और नदी-झरनों से भरपूर, यह तपस्वियों का महापुण्य तपोवन होगा।'

श्लोक 93 (skanda.8.122.93)

योत्रागत्य चरुं कृत्वा भोजयित्वा च ब्राह्मणम् । अर्चयेद्देवदेवेशं रुद्रलोके स मोदते

yotrāgatya caruṁ kṛtvā bhojayitvā ca brāhmaṇam | arcayeddevadeveśaṁ rudraloke sa modate

जो यहाँ आकर चरु बनाकर ब्राह्मण को भोजन कराकर देवदेवेश की अर्चना करता है, वह रुद्रलोक में आनन्दित होता है।

श्लोक 94 (skanda.8.122.94)

यश्चात्र नियमं कृत्वा भस्मस्नायी यतव्रतः । मुहूर्तमपि तिष्ठेत स गच्छेद् गणमध्यताम्

yaścātra niyamaṁ kṛtvā bhasmasnāyī yatavrataḥ | muhūrtamapi tiṣṭheta sa gacched gaṇamadhyatām

'और जो यहाँ नियम धारण करके भस्म-स्नान करता हुआ, संयतव्रती होकर एक मुहूर्त भी ठहरता है, वह गणों के मध्य पद को प्राप्त करता है।'

श्लोक 95 (skanda.8.122.95)

अक्षयश्चामरश्चैव जरारोगविवर्जितः । रुद्रस्य गणपो भूत्वा योगैश्वर्यमवाप्स्यति

akṣayaścāmaraścaiva jarārogavivarjitaḥ | rudrasya gaṇapo bhūtvā yogaiśvaryamavāpsyati

'अक्षय, अमर, जरा-रोग से रहित होकर, रुद्र का गणपति बनकर वह योगैश्वर्य को प्राप्त करेगा।'

श्लोक 96 (skanda.8.122.96)

कामचारी सुपापात्मा योप्यत्र दिवसं वसेत् । सोश्वमेधफलं प्राप्य सर्वपापैः प्रमुच्यते

kāmacārī supāpātmā yopyatra divasaṁ vaset | sośvamedhaphalaṁ prāpya sarvapāpaiḥ pramucyate

'यहाँ तक कि स्वेच्छाचारी, अत्यन्त पापी भी यदि एक दिन यहाँ निवास करे, तो वह अश्वमेध का फल पाकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 97 (skanda.8.122.97)

सकामोपि दुराचारो योत्र प्राणान् परित्यजेत् । सोपि देवसदः प्राप्य देवैः सह चरिष्यति

sakāmopi durācāro yotra prāṇān parityajet | sopi devasadaḥ prāpya devaiḥ saha cariṣyati

'यहाँ तक कि सकाम और दुराचारी होकर भी जो यहाँ प्राणत्याग करता है, वह भी देवसदन प्राप्त कर देवताओं के साथ विचरण करेगा।'

श्लोक 98 (skanda.8.122.98)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते दैवताः सर्वे प्राप्य तत्परमं तपः । इज्यास्नानं तदा चक्रुरीशस्य परमात्मनः

sanatkumāra uvāca | tataste daivatāḥ sarve prāpya tatparamaṁ tapaḥ | ijyāsnānaṁ tadā cakrurīśasya paramātmanaḥ

सनत्कुमार बोले - तब वे सब देवता उस परम तप को प्राप्त करके परमात्मा ईश की पूजा और स्नान करने लगे।

श्लोक 99 (skanda.8.122.99)

अथ ते कृतकृत्याश्च महायोगबलान्विताः । हरिं प्रति मनश्चक्रुर्गन्तुं सर्वे दिवौकसः

atha te kṛtakṛtyāśca mahāyogabalānvitāḥ | hariṁ prati manaścakrurgantuṁ sarve divaukasaḥ

फिर कृतकृत्य होकर तथा महायोग के बल से युक्त होकर सब देवताओं ने हरि के पास जाने के लिये अपना मन लगाया।

श्लोक 100 (skanda.8.122.100)

तं ज्वलन्तमिवादित्यमागच्छन्तो महाबलाः । हरिश्चन्द्रगिरौ व्यास हरिं ददृशुरव्ययम्

taṁ jvalantamivādityamāgacchanto mahābalāḥ | hariścandragirau vyāsa hariṁ dadṛśuravyayam

हे व्यास! सूर्य के समान प्रज्वलित उन महाबली देवताओं ने आते हुए हरिश्चन्द्र पर्वत पर अविनाशी हरि को देखा।

श्लोक 101 (skanda.8.122.101)

सोपि कालेन महता धूतपाप्मा महातपाः । तदैव लब्ध्वा देवानां समतां मुदितात्मवान्

sopi kālena mahatā dhūtapāpmā mahātapāḥ | tadaiva labdhvā devānāṁ samatāṁ muditātmavān

वे भी बहुत समय बीतने पर, पाप से मुक्त होकर, महातपस्वी होकर, उसी समय देवताओं के तुल्य पद पाकर आनन्दित हुए।

श्लोक 102 (skanda.8.122.102)

प्रति तदा वेगादुत्थाय ऋषिसत्तम । शिखरात् सन्निपत्याशु तेषां मध्येवतिष्ठत

prati tadā vegādutthāya ṛṣisattama | śikharāt sannipatyāśu teṣāṁ madhyevatiṣṭhata

(यहाँ मूल पाठ के आरम्भ में कुछ अक्षर खण्डित हैं) - हे ऋषिसत्तम! उनकी ओर वेग से उठकर, शिखर से शीघ्र उतरकर, वे उनके मध्य में जा खड़े हुए।

श्लोक 103 (skanda.8.122.103)

ततस्ते मुदिताः सम्यग्घरिणा सह संगताः । शिखरं तद् गिरेस्तस्य फलेन समयोजयन्

tataste muditāḥ samyagghariṇā saha saṁgatāḥ | śikharaṁ tad girestasya phalena samayojayan

तब वे प्रसन्न होकर हरि के साथ भलीभाँति मिले, और उस पर्वत के शिखर को फल (पुण्य-फल) से युक्त कर दिया।

श्लोक 104 (skanda.8.122.104)

यस्माद्धरिरयं ह्यत्र चन्द्रवन्निर्मलो बभौ । तपसा महता चैव तस्मादेषोचलेश्वरः

yasmāddharirayaṁ hyatra candravannirmalo babhau | tapasā mahatā caiva tasmādeṣocaleśvaraḥ

चूँकि यह हरि यहाँ महान् तप से चन्द्रमा के समान निर्मल हो गये, इसलिये यह पर्वत 'अचलेश्वर' कहलायेगा।

श्लोक 105 (skanda.8.122.105)

हरिश्चन्द्र इति ख्यातो भविष्यति न संशयः । यस्मादप्रकृतेनैव प्रपातोत्र कृतः पुनः । तस्माद् भृगुरयं लोके पुण्यो भवतु सर्वशः

hariścandra iti khyāto bhaviṣyati na saṁśayaḥ | yasmādaprakṛtenaiva prapātotra kṛtaḥ punaḥ | tasmād bhṛgurayaṁ loke puṇyo bhavatu sarvaśaḥ

'निःसंदेह यह हरिश्चन्द्र नाम से विख्यात होगा; और चूँकि यहाँ असाधारण रूप से पुनः पतन (कूद) किया गया, इसलिये यह भृगु (गिरिपात) संसार में सर्वथा पुण्यकारी हो।'

श्लोक 106 (skanda.8.122.106)

अत्र योभ्येत्य देवेशा भृगुप्रपतनं नरः । साधयेत स गच्छेत हरेर्लोकमतिप्रभम्

atra yobhyetya deveśā bhṛguprapatanaṁ naraḥ | sādhayeta sa gaccheta harerlokamatiprabham

'हे देवेशगण! यहाँ आकर जो मनुष्य भृगु-पतन सम्पन्न करता है, वह हरि के अत्यन्त प्रभावशाली लोक को प्राप्त करता है।'

श्लोक 107 (skanda.8.122.107)

महापातकसंयुक्तो व्याधिना समुपद्रुतः । योत्र साधयते प्राणान् सोपि मुच्येन्महाभयात्

mahāpātakasaṁyukto vyādhinā samupadrutaḥ | yotra sādhayate prāṇān sopi mucyenmahābhayāt

'महापातक से युक्त और रोग से पीड़ित मनुष्य भी यदि यहाँ प्राण त्यागता है, तो वह भी महाभय से मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 108 (skanda.8.122.108)

यद्वा प्रार्थयते नित्यं प्रपाते चात्र किंचन । तत्प्राप्नुयान्नरः सर्वमचिरात्तच्च वै स्मृतम्

yadvā prārthayate nityaṁ prapāte cātra kiṁcana | tatprāpnuyānnaraḥ sarvamacirāttacca vai smṛtam

'और मनुष्य इस प्रपात पर जो कुछ भी सदा माँगता है, वह सब उसे शीघ्र प्राप्त हो जाता है - ऐसा स्मरण किया गया है।'

श्लोक 109 (skanda.8.122.109)

सनत्कुमार उवाच । हरिश्चन्द्रमिमं यस्तु पुरिश्चन्द्रन्तु धर्मवित् । पठेत शृणुयाद्वापि स पाप्मानं विशस्यति

sanatkumāra uvāca | hariścandramimaṁ yastu puriścandrantu dharmavit | paṭheta śṛṇuyādvāpi sa pāpmānaṁ viśasyati

सनत्कुमार बोले - जो धर्मज्ञ इस हरिश्चन्द्र और पुरिश्चन्द्र के वृत्तान्त को पढ़ता या सुनता है, वह अपने पाप का नाश कर देता है।

श्लोक 110 (skanda.8.122.110)

इदं तु यः शुचिरनसूयवान् सदा नरः पठेद् द्विजगणदेवसंसदि । स निर्मलो रविरिव तेजसा ज्वलन् त्रिविष्टपे वसति यथामरोवरः

idaṁ tu yaḥ śuciranasūyavān sadā naraḥ paṭhed dvijagaṇadevasaṁsadi | sa nirmalo raviriva tejasā jvalan triviṣṭape vasati yathāmarovaraḥ

जो पवित्र और ईर्ष्यारहित मनुष्य ब्राह्मणों तथा देवताओं की सभा में सदा इसका पाठ करता है, वह सूर्य के समान निर्मल तेज से प्रज्वलित होता हुआ श्रेष्ठ अमर की भाँति स्वर्ग में निवास करता है।

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