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अम्बिका खण्ड · अध्याय 123

राम-माहात्म्य

अध्याय 122अध्याय-सूचीअध्याय 124

श्लोक 1 (skanda.8.123.1)

सनत्कुमार उवाच । तं पुरिश्चन्द्रमासाद्य स रामः शक्तिनन्द । अपश्यत् परमेशानमसुरैः क्लिष्टमानसः

sanatkumāra uvāca | taṁ puriścandramāsādya sa rāmaḥ śaktinanda | apaśyat parameśānamasuraiḥ kliṣṭamānasaḥ

सनत्कुमार बोले - हे शक्तिनन्दन! उस पुरिश्चन्द्र स्थान में पहुँचकर, असुरों से क्लिष्टमन उन राम ने परमेश्वर को देखा।

श्लोक 2 (skanda.8.123.2)

स दृष्ट्वा तु महादेवं साम्बं सगणमव्ययम् । प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा तस्थौ प्रह्वस्तदाग्रतः

sa dṛṣṭvā tu mahādevaṁ sāmbaṁ sagaṇamavyayam | praṇataḥ prāñjalirbhūtvā tasthau prahvastadāgrataḥ

अम्बा (उमा) सहित, गणों सहित, अविनाशी महादेव को देखकर वे प्रणत होकर, हाथ जोड़कर, विनम्र होकर उनके सामने खड़े हो गये।

श्लोक 3 (skanda.8.123.3)

सनत्कुमार उवाच । सोपि देवस्तदा प्रीतो जामदग्न्यं महामनाः । उवाच वचसां योनिरिदं गम्भीरशब्दवत्

sanatkumāra uvāca | sopi devastadā prīto jāmadagnyaṁ mahāmanāḥ | uvāca vacasāṁ yoniridaṁ gambhīraśabdavat

सनत्कुमार बोले - वे महामनस्वी देव भी तब प्रसन्न होकर, वाणी के मूल स्रोत, गम्भीर शब्दों में जामदग्न्य से बोले।

श्लोक 4 (skanda.8.123.4)

किंशुकैरिव संछन्नं चन्दनेनोक्षितं यथा । तथा तं क्षतजेनैव सर्वतश्च समुक्षितम् । स्रवन्तं गैरिकं धातुमचलेन्द्रमिवापरम्

kiṁśukairiva saṁchannaṁ candanenokṣitaṁ yathā | tathā taṁ kṣatajenaiva sarvataśca samukṣitam | sravantaṁ gairikaṁ dhātumacalendramivāparam

जैसे टेसू के फूलों से ढका हो या चन्दन से सींचा गया हो, वैसे ही वे रक्त से चारों ओर सिंचित होकर, गेरू बहाते हुए मानो दूसरे पर्वतराज की भाँति दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 5 (skanda.8.123.5)

देवदेव उवाच । जामदग्न्य महत् कर्म कृतं सुरहितेप्सया । त्वया पुत्राद्य संग्रामे सैंहिकेयान् विनिघ्नता

devadeva uvāca | jāmadagnya mahat karma kṛtaṁ surahitepsayā | tvayā putrādya saṁgrāme saiṁhikeyān vinighnatā

देवदेव बोले - हे जामदग्न्य! हे पुत्र! देवताओं के हित की कामना से आज युद्ध में सैंहिकेयों का वध करके तुमने महान् कर्म किया है।

श्लोक 6 (skanda.8.123.6)

तवानेन महाबाहो कर्मणा परितोषितः । प्रयच्छामि वरान् सप्त तान्वदस्व यथेच्छसि

tavānena mahābāho karmaṇā paritoṣitaḥ | prayacchāmi varān sapta tānvadasva yathecchasi

हे महाबाहो! तुम्हारे इस कर्म से परितुष्ट होकर मैं तुम्हें सात वर देता हूँ; जैसा चाहो वैसा कहो।

श्लोक 7 (skanda.8.123.7)

राम उवाच । भगवन् यदि तुष्टोसि मम देहि स्वयं प्रभो । सर्वज्ञानसमुत्पत्तिं सर्ववेदप्रवर्त्तिताम्

rāma uvāca | bhagavan yadi tuṣṭosi mama dehi svayaṁ prabho | sarvajñānasamutpattiṁ sarvavedapravarttitām

राम बोले - हे भगवन्, हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे स्वयं वह सर्वज्ञान की उत्पत्ति दीजिये, जो समस्त वेदों द्वारा प्रवर्तित है।

श्लोक 8 (skanda.8.123.8)

अवध्यः स्यामहं युद्धे धनुर्वेदञ्च यच्छ मे । परशुं सर्वहन्तारमसङ्गं रथमेव च

avadhyaḥ syāmahaṁ yuddhe dhanurvedañca yaccha me | paraśuṁ sarvahantāramasaṅgaṁ rathameva ca

'मैं युद्ध में अवध्य हो जाऊँ, और मुझे धनुर्वेद, सर्वसंहारक परशु, तथा निर्बाध रथ प्रदान कीजिये।'

श्लोक 9 (skanda.8.123.9)

अस्त्रग्रामञ्च विपुलममरत्वं तथाक्षयम् । वरान्मह्यमिमान्देव प्रयच्छस्व नमस्तव

astragrāmañca vipulamamaratvaṁ tathākṣayam | varānmahyamimāndeva prayacchasva namastava

'और विशाल अस्त्रसमूह, तथा अक्षय अमरत्व - हे देव! ये वर मुझे प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।'

श्लोक 10 (skanda.8.123.10)

सनत्कुमार उवाच । तस्यैवं वदतौ व्यास प्रहस्य भगवान् हरः । उवाच सर्वमेतत्ते भविष्यति ममाज्ञया

sanatkumāra uvāca | tasyaivaṁ vadatau vyāsa prahasya bhagavān haraḥ | uvāca sarvametatte bhaviṣyati mamājñayā

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! उसके इस प्रकार कहने पर भगवान् हर ने हँसते हुए कहा - मेरी आज्ञा से यह सब तुम्हें प्राप्त होगा।

श्लोक 11 (skanda.8.123.11)

धनुर्वेदव्रतञ्चैव वर्षमेकं चरिष्यसि । तस्मादिहैव वस्तव्यं त्वया भृगुकुलोद्वह

dhanurvedavratañcaiva varṣamekaṁ cariṣyasi | tasmādihaiva vastavyaṁ tvayā bhṛgukulodvaha

'और तुम एक वर्ष तक धनुर्वेद का व्रत धारण करोगे, अतः हे भृगुकुलोद्वह! तुम्हें यहीं रहना होगा।'

श्लोक 12 (skanda.8.123.12)

ततस्तस्मै स भगवान् स्वयमेव त्रिलोचनः । आदिदेश व्रतं घोरं चचार स च संयतः

tatastasmai sa bhagavān svayameva trilocanaḥ | ādideśa vrataṁ ghoraṁ cacāra sa ca saṁyataḥ

तब भगवान् त्रिलोचन ने स्वयं ही उसे वह घोर व्रत बताया, और वह संयमपूर्वक उसका पालन करने लगा।

श्लोक 13 (skanda.8.123.13)

समाप्ते तु व्रते देवः स्वयमागम्य यज्ञहा । धनुर्वेदं ददौ तस्मै समन्त्रं सहसङग्रहम्

samāpte tu vrate devaḥ svayamāgamya yajñahā | dhanurvedaṁ dadau tasmai samantraṁ sahasaṅagraham

व्रत पूर्ण होने पर यज्ञहा देव स्वयं आकर उसे मन्त्र सहित, सम्यक् संग्रहसहित धनुर्वेद दिये।

श्लोक 14 (skanda.8.123.14)

सशुल्वं सपरिस्तोमं सोद्यमं सानुकर्षणम् । अस्त्रग्रामं च विपुलं प्रत्यस्त्रसहितं तथा

saśulvaṁ saparistomaṁ sodyamaṁ sānukarṣaṇam | astragrāmaṁ ca vipulaṁ pratyastrasahitaṁ tathā

धातु-अंगों सहित, पूर्ण विधानसहित, उद्यम और संचालन-विधिसहित, तथा प्रत्यस्त्रों सहित विशाल अस्त्रसमूह सहित।

श्लोक 15 (skanda.8.123.15)

प्रादात्तस्मै तदेशान इदं चोवाच सुस्वरम् । अयं त्वया धनुर्वेदः सहास्त्रैः सुमहाबल

prādāttasmai tadeśāna idaṁ covāca susvaram | ayaṁ tvayā dhanurvedaḥ sahāstraiḥ sumahābala

ईशान ने उसे यह प्रदान करके मधुर स्वर में कहा - हे महाबली! यह धनुर्वेद अस्त्रों सहित तुम्हारे द्वारा -

श्लोक 16 (skanda.8.123.16)

क्षत्रियेभ्यो न दातव्य इति मच्छासनं स्मर । यदि चेद्दास्यसे मोहात् क्षत्रियेभ्यः कदाचन । लघुत्वं यास्यसे तेषां युद्धे चापि जयो न ते

kṣatriyebhyo na dātavya iti macchāsanaṁ smara | yadi ceddāsyase mohāt kṣatriyebhyaḥ kadācana | laghutvaṁ yāsyase teṣāṁ yuddhe cāpi jayo na te

- क्षत्रियों को न दिया जाय, यह मेरी आज्ञा स्मरण रखो। यदि मोहवश तुम कभी क्षत्रियों को दोगे, तो उनके सामने लघुता को प्राप्त होगे और युद्ध में भी तुम्हारी विजय नहीं होगी।

श्लोक 17 (skanda.8.123.17)

सनत्कुमार उवाच । ततः स परशुं दत्वा रथं कामगमेव च । मनसा चिन्तिते युक्तमुपतिष्ठन्तमक्षयम्

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa paraśuṁ datvā rathaṁ kāmagameva ca | manasā cintite yuktamupatiṣṭhantamakṣayam

सनत्कुमार बोले - तब उसे परशु और इच्छानुसार गमन करनेवाला रथ देकर, जो मन में सोचते ही उपस्थित हो जाता था, अक्षय था,

श्लोक 18 (skanda.8.123.18)

यन्तृणा यक्षराजेन अमरेणाभिसंभृतम् । जगामादर्शनं तस्य सहसैव पिनाकधृक्

yantṛṇā yakṣarājena amareṇābhisaṁbhṛtam | jagāmādarśanaṁ tasya sahasaiva pinākadhṛk

यक्षराज नामक अमर सारथी से युक्त उस रथ को देकर, पिनाकधारी अकस्मात् ही उसकी दृष्टि से ओझल हो गये।

श्लोक 19 (skanda.8.123.19)

सोपि लब्ध्वा वरान् व्यास जगाम पितुरन्तिकम् । न चापश्यत तं तत्र कार्तवीर्यसुतैर्हतम्

sopi labdhvā varān vyāsa jagāma piturantikam | na cāpaśyata taṁ tatra kārtavīryasutairhatam

हे व्यास! वे वर पाकर वे भी अपने पिता के समीप गये, किन्तु वहाँ उन्हें न पाया, क्योंकि कार्तवीर्य के पुत्रों ने उनका वध कर दिया था।

श्लोक 20 (skanda.8.123.20)

अकृत्वा तस्य कर्तव्यं सोपि रामः प्रतापवान् । निःक्षत्रां पृथिवीं चक्रे सप्तकृत्वञ्च सत्रिकम्

akṛtvā tasya kartavyaṁ sopi rāmaḥ pratāpavān | niḥkṣatrāṁ pṛthivīṁ cakre saptakṛtvañca satrikam

उनके लिये कर्तव्य किये बिना ही वह प्रतापी राम भी सात बार पृथ्वी को पूर्णतः क्षत्रिय-रहित कर देने लगा।

श्लोक 21 (skanda.8.123.21)

रुधिरेण स तेषाञ्च ह्रदान् सप्त चकार ह । समन्तपञ्चके व्यास पितॄँस्तेनाभ्यतर्पयत्

rudhireṇa sa teṣāñca hradān sapta cakāra ha | samantapañcake vyāsa pitṝ~stenābhyatarpayat

उनके रक्त से उन्होंने सात ह्रद बनाये और हे व्यास! समन्तपंचक में उससे अपने पितरों को तृप्त किया।

श्लोक 22 (skanda.8.123.22)

ततश्च कृत्वा निःक्षत्रां पृथिवीं भृगुसत्तमः । महादेवप्रसादात्तु त्रैलोक्यस्येश्वरो बभौ

tataśca kṛtvā niḥkṣatrāṁ pṛthivīṁ bhṛgusattamaḥ | mahādevaprasādāttu trailokyasyeśvaro babhau

और इस प्रकार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करके, महादेव की कृपा से भृगुश्रेष्ठ त्रैलोक्य के ईश्वर के समान शोभित होने लगे।

श्लोक 23 (skanda.8.123.23)

तं श्रीस्तुष्टिर्धृतिश्चैव सिद्धिः कीर्तिर्यशस्तथा । श्रद्धा मेधा तथा क्षान्तिरनसूया प्रसंयमः

taṁ śrīstuṣṭirdhṛtiścaiva siddhiḥ kīrtiryaśastathā | śraddhā medhā tathā kṣāntiranasūyā prasaṁyamaḥ

श्री, तुष्टि, धृति, सिद्धि, कीर्ति, यश, श्रद्धा, मेधा, क्षान्ति, अनसूया और प्रसंयम -

श्लोक 24 (skanda.8.123.24)

ऊहा ह्यपोहा तर्कश्च दमश्च शम एव च । रूपिण्यो भार्गवं सर्वा मातरस्समुपस्थिताः

ūhā hyapohā tarkaśca damaśca śama eva ca | rūpiṇyo bhārgavaṁ sarvā mātarassamupasthitāḥ

ऊहा, अपोहा, तर्क, दम और शम - ये सब देवियाँ साकार रूप धारण करके माताओं के समान भार्गव के पास आयीं।

श्लोक 25 (skanda.8.123.25)

सनत्कुमार उवाच । तान्सर्वान् स तदा प्राह विशध्वं मामशङ्किताः । श्रीरियं तु दुराचारा दूर एवावतिष्ठताम्

sanatkumāra uvāca | tānsarvān sa tadā prāha viśadhvaṁ māmaśaṅkitāḥ | śrīriyaṁ tu durācārā dūra evāvatiṣṭhatām

सनत्कुमार बोले - उन सबसे तब उन्होंने कहा - निःशंक होकर मुझमें प्रवेश करो, किन्तु यह दुराचारिणी श्री दूर ही रहे।

श्लोक 26 (skanda.8.123.26)

तं तथावादिनं साध्वी उवाच श्रीर्महाबलम् । किमर्थ मां महाबाहो नाभिनन्दसि दुर्लभाम्

taṁ tathāvādinaṁ sādhvī uvāca śrīrmahābalam | kimartha māṁ mahābāho nābhinandasi durlabhām

उस महाबली से इस प्रकार कहे जाने पर साध्वी श्री ने कहा - हे महाबाहो! मुझ दुर्लभा का तुम आदर क्यों नहीं करते?

श्लोक 27 (skanda.8.123.27)

राम उवाच । चपला मदनीया च अध्रुवा चासि शोभने । अतस्त्वां नाभिनन्दामि मम त्वं दूरतो भव

rāma uvāca | capalā madanīyā ca adhruvā cāsi śobhane | atastvāṁ nābhinandāmi mama tvaṁ dūrato bhava

राम बोले - हे शोभने! तुम चंचल, मादक और अस्थिर हो, इसलिये मैं तुम्हारा स्वागत नहीं करता; मुझसे दूर रहो।

श्लोक 28 (skanda.8.123.28)

त्वयाविष्टो नरः सर्वो यदि स्यात् स्वयमीश्वरः । ऐश्वर्यमदसंमूढ अकार्येष्वेव वर्तते

tvayāviṣṭo naraḥ sarvo yadi syāt svayamīśvaraḥ | aiśvaryamadasaṁmūḍha akāryeṣveva vartate

'तुमसे आविष्ट कोई भी पुरुष, चाहे वह स्वयं ईश्वर ही क्यों न हो, ऐश्वर्य के मद से मोहित होकर केवल अकार्य में ही प्रवृत्त होता है।'

श्लोक 29 (skanda.8.123.29)

सनत्कुमार उवाच । स राजा भार्गवः श्रीमान् यज्ञैरीजे महामनाः । अधोगमच्च पृथिवी तस्य यज्ञे पुरा द्विज

sanatkumāra uvāca | sa rājā bhārgavaḥ śrīmān yajñairīje mahāmanāḥ | adhogamacca pṛthivī tasya yajñe purā dvija

सनत्कुमार बोले - हे द्विज! वह राजा, श्रीमान्, महामनस्वी भार्गव यज्ञों से यजन करने लगा, और पूर्वकाल में उसके यज्ञ में पृथ्वी नीचे धँस गयी।

श्लोक 30 (skanda.8.123.30)

व्यास उवाच । किमर्थं पृथिवी तस्य यज्ञे पातालमाविशत् । कारणं तत्र किं मन्ये एतदिच्छामि वेदितुम्

vyāsa uvāca | kimarthaṁ pṛthivī tasya yajñe pātālamāviśat | kāraṇaṁ tatra kiṁ manye etadicchāmi veditum

व्यास बोले - उसके यज्ञ में पृथ्वी पाताल में क्यों प्रविष्ट हो गयी? इसका क्या कारण था, यह जानना चाहता हूँ।

श्लोक 31 (skanda.8.123.31)

सनत्कुमार उवाच । स गत्वा पृथिवीपालः कश्यपं मुनिसत्तमम् । उवाच मम होता त्वं भव सत्ववतां वर

sanatkumāra uvāca | sa gatvā pṛthivīpālaḥ kaśyapaṁ munisattamam | uvāca mama hotā tvaṁ bhava satvavatāṁ vara

सनत्कुमार बोले - उस पृथ्वीपति ने मुनिश्रेष्ठ कश्यप के पास जाकर कहा - हे बलवानों में श्रेष्ठ! तुम मेरे होता बनो।

श्लोक 32 (skanda.8.123.32)

तं तथावादिनं व्यास तदोवाच नराधिपम् । कश्यपः कुपितस्तत्र निन्दमानो भृगूत्तमम्

taṁ tathāvādinaṁ vyāsa tadovāca narādhipam | kaśyapaḥ kupitastatra nindamāno bhṛgūttamam

हे व्यास! उस नरेश से इस प्रकार कहे जाने पर कश्यप वहाँ क्रुद्ध होकर भृगुश्रेष्ठ की निन्दा करते हुए बोले।

श्लोक 33 (skanda.8.123.33)

पतितस्त्वं दुराचारो भिन्नशीलः सुपापकृत् । कथं त्वा याजयिष्यामि भ्रूणवध्याभिकारिणम्

patitastvaṁ durācāro bhinnaśīlaḥ supāpakṛt | kathaṁ tvā yājayiṣyāmi bhrūṇavadhyābhikāriṇam

'तुम पतित, दुराचारी, भ्रष्टशील और महापापी हो; भ्रूणहत्या (ब्रह्महत्या) के दोषी तुम्हारा यजन मैं कैसे करूँ?'

श्लोक 34 (skanda.8.123.34)

सनत्कुमार उवाच । ततः स तेन वाक्येन उवाच ऋषिसत्तमम् । विषये मम मा तिष्ठ त्वमद्य मुनिसत्तम

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa tena vākyena uvāca ṛṣisattamam | viṣaye mama mā tiṣṭha tvamadya munisattama

सनत्कुमार बोले - तब उस वचन पर उसने उस ऋषिश्रेष्ठ से कहा - हे मुनिश्रेष्ठ! आज से मेरे राज्य में मत रहो।

श्लोक 35 (skanda.8.123.35)

स्वाम्यहं जगतो विप्र नाहं यत्र ततो व्रज । ततस्स तस्य तं देशं परित्यज्या व्रजत्तदा

svāmyahaṁ jagato vipra nāhaṁ yatra tato vraja | tatassa tasya taṁ deśaṁ parityajyā vrajattadā

'हे विप्र! मैं जगत् का स्वामी हूँ, जहाँ मैं नहीं हूँ वहाँ जाओ।' तब उसने उसका वह प्रदेश छोड़कर प्रस्थान किया।

श्लोक 36 (skanda.8.123.36)

नाससाद च तं देशं यत्रासौ न भवेत् प्रभुः । अनासादयमानश्च अटवीमाश्रितस्तदा । अन्तर्धानगतो भूत्वा चचार बहुलाः समाः

nāsasāda ca taṁ deśaṁ yatrāsau na bhavet prabhuḥ | anāsādayamānaśca aṭavīmāśritastadā | antardhānagato bhūtvā cacāra bahulāḥ samāḥ

किन्तु उसे ऐसा कोई प्रदेश नहीं मिला जहाँ वह स्वामी न हो; और न पाकर वह वन में जा बसा और अदृश्य होकर अनेक वर्षों तक विचरता रहा।

श्लोक 37 (skanda.8.123.37)

अथापश्यत् समासीनं कपोतं वृक्षसंस्थितम् । अनङ्गेनाभिसंबद्धं कपोत्या हार्यतां गतम्

athāpaśyat samāsīnaṁ kapotaṁ vṛkṣasaṁsthitam | anaṅgenābhisaṁbaddhaṁ kapotyā hāryatāṁ gatam

फिर उसने वृक्ष पर बैठे एक कबूतर को देखा, जो काम-बाण से बँधा हुआ और एक कबूतरी के प्रति आसक्त हो चुका था।

श्लोक 38 (skanda.8.123.38)

कपोत उवाच । यदाप्रभृति सुश्रोणि मया दृष्टासि शोभने । तदाप्रभृति शुष्यामि रतिं नाप्नोमि शोभने

kapota uvāca | yadāprabhṛti suśroṇi mayā dṛṣṭāsi śobhane | tadāprabhṛti śuṣyāmi ratiṁ nāpnomi śobhane

कबूतर बोला - हे सुश्रोणि, हे शोभने! जब से मैंने तुम्हें देखा है, तब से मैं क्षीण होता जा रहा हूँ, मुझे रति नहीं मिलती।

श्लोक 39 (skanda.8.123.39)

कपोत्युवाच । मैवं ब्रूया दुराचार अधर्म्यं हि कदाचन । कपोत उवाच । न चेद्दास्यसि मेत्र त्वं बलात्त्वाहं सुमध्यमे । स्वीकरिष्यामि यच्छस्व नतोस्मि तव पादयोः

kapotyuvāca | maivaṁ brūyā durācāra adharmyaṁ hi kadācana | kapota uvāca | na ceddāsyasi metra tvaṁ balāttvāhaṁ sumadhyame | svīkariṣyāmi yacchasva natosmi tava pādayoḥ

कबूतरी बोली - हे दुराचारी! ऐसा मत कहो, यह सदा अधर्म ही है। कबूतर बोला - हे सुमध्यमे! यदि तुम स्वयं मुझे नहीं दोगी, तो मैं यहीं तुम्हें बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा; समर्पित हो जाओ, मैं तुम्हारे चरणों में झुकता हूँ।

श्लोक 40 (skanda.8.123.40)

कपोत्युवाच । किन्न तेस्ति भयं क्रूर जामदग्न्यान्महाबलात् । येन त्वं धर्षसेद्येह पतिहीनां पतिव्रताम्

kapotyuvāca | kinna testi bhayaṁ krūra jāmadagnyānmahābalāt | yena tvaṁ dharṣasedyeha patihīnāṁ pativratām

कबूतरी बोली - हे क्रूर! क्या तुम्हें महाबली जामदग्न्य से भय नहीं है, कि आज तुम पतिहीन पतिव्रता का यहाँ उल्लंघन करना चाहते हो?

श्लोक 41 (skanda.8.123.41)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तः स तु तया कपोतः शक्तिनन्दन । उवाच रामः कोयं वै मम तुल्यो न केनचित्

sanatkumāra uvāca | evamuktaḥ sa tu tayā kapotaḥ śaktinandana | uvāca rāmaḥ koyaṁ vai mama tulyo na kenacit

सनत्कुमार बोले - हे शक्तिनन्दन! उससे इस प्रकार कहे जाने पर कबूतर बोला - यह राम कौन है? मेरे समान कोई नहीं है।

श्लोक 42 (skanda.8.123.42)

तस्यैवं वदतस्तत्र रामनामाङ्कितस्तदा । बाणः शिरो जहाराशु कश्यपस्तदपश्यत

tasyaivaṁ vadatastatra rāmanāmāṅkitastadā | bāṇaḥ śiro jahārāśu kaśyapastadapaśyata

वहाँ उसके इस प्रकार कहते ही राम के नाम से अंकित एक बाण ने शीघ्र उसका शिर काट दिया - यह कश्यप ने देखा।

श्लोक 43 (skanda.8.123.43)

स तं दृष्ट्वा तथावृत्तं भीतस्तस्मान्महाबलात् । याजयामास राजानं जामदग्न्यं महामनाः

sa taṁ dṛṣṭvā tathāvṛttaṁ bhītastasmānmahābalāt | yājayāmāsa rājānaṁ jāmadagnyaṁ mahāmanāḥ

वह ऐसा हुआ देखकर उस महाबली से भयभीत होकर उस महामनस्वी राजा जामदग्न्य का यजन करने लगा।

श्लोक 44 (skanda.8.123.44)

कश्यप उवाच । याजयाम्यहमद्यैव राजन् भार्गवसत्तम । यदि चेदीप्सितां मे त्वं ददासि शुभदक्षिणाम्

kaśyapa uvāca | yājayāmyahamadyaiva rājan bhārgavasattama | yadi cedīpsitāṁ me tvaṁ dadāsi śubhadakṣiṇām

कश्यप बोले - हे राजन्, हे भार्गवसत्तम! मैं आज ही तुम्हारा यजन करूँगा, यदि तुम मुझे अभीष्ट शुभ दक्षिणा दो।

श्लोक 45 (skanda.8.123.45)

राम उवाच । यद् ब्रवीषि न सन्देहो दाताहं तन्महातपः । मां याजय यथान्यायं तवास्म्यद्य वशे स्थितः

rāma uvāca | yad bravīṣi na sandeho dātāhaṁ tanmahātapaḥ | māṁ yājaya yathānyāyaṁ tavāsmyadya vaśe sthitaḥ

राम बोले - हे महातपस्वी! जो तुम कहो, उसे बिना संदेह के मैं दूँगा। मुझे विधिपूर्वक याजन कराओ, आज मैं तुम्हारे वश में हूँ।

श्लोक 46 (skanda.8.123.46)

सनत्कुमार उवाच । ततस्तस्याभवद् व्यास सुमहान् भूरिदक्षिणः । यज्ञोश्वमेधो देवानां यत्र तृप्तिरजायत

sanatkumāra uvāca | tatastasyābhavad vyāsa sumahān bhūridakṣiṇaḥ | yajñośvamedho devānāṁ yatra tṛptirajāyata

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तब उसका वह अत्यन्त विशाल, प्रचुर-दक्षिणा अश्वमेध यज्ञ हुआ, जिसमें देवताओं की तृप्ति हुई।

श्लोक 47 (skanda.8.123.47)

तस्याथ दक्षिणाकाले जामदग्न्यः प्रतापवान् । उवाच कस्यपं ब्रूहि दक्षिणां कां ददानि ते

tasyātha dakṣiṇākāle jāmadagnyaḥ pratāpavān | uvāca kasyapaṁ brūhi dakṣiṇāṁ kāṁ dadāni te

फिर दक्षिणा के समय प्रतापी जामदग्न्य ने कश्यप से कहा - बताओ, मैं तुम्हें कौन-सी दक्षिणा दूँ?

श्लोक 48 (skanda.8.123.48)

स प्राह पृथिवीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् । दक्षिणां दत्स्व मह्यं त्वं यच्च तेस्ति गृहे वसु

sa prāha pṛthivīṁ kṛtsnāṁ saśailavanakānanām | dakṣiṇāṁ datsva mahyaṁ tvaṁ yacca testi gṛhe vasu

उन्होंने कहा - मुझे पर्वत, वन और कानन सहित सम्पूर्ण पृथ्वी दक्षिणा में दो, तथा जो भी धन तुम्हारे घर में है वह भी।

श्लोक 49 (skanda.8.123.49)

स तस्मै तत्तथा कृत्वा विशुद्धेनान्तरात्मना । चीराण्यादाय तं प्राह कश्यपं किं करोम्यहम्

sa tasmai tattathā kṛtvā viśuddhenāntarātmanā | cīrāṇyādāya taṁ prāha kaśyapaṁ kiṁ karomyaham

उन्होंने विशुद्ध अन्तःकरण से उसे वैसा ही देकर, वल्कल वस्त्र धारण करके कश्यप से कहा - अब मैं क्या करूँ?

श्लोक 50 (skanda.8.123.50)

कश्यप उवाच । इमं देशं परित्यज्य देशमन्यं प्रयाहि भो । मम देशे न वस्तव्यं त्वयाद्य भृगुनन्दन

kaśyapa uvāca | imaṁ deśaṁ parityajya deśamanyaṁ prayāhi bho | mama deśe na vastavyaṁ tvayādya bhṛgunandana

कश्यप बोले - हे भृगुनन्दन! इस प्रदेश को छोड़कर किसी अन्य प्रदेश में जाओ; आज से मेरे प्रदेश में तुम्हें नहीं रहना है।

श्लोक 51 (skanda.8.123.51)

सनत्कुमार उवाच । स एवमस्त्विति प्रोच्य कृत्वा चाभि प्रदक्षिणाम् । जगाम सरितां योनिं समुद्रं वरुणालयम्

sanatkumāra uvāca | sa evamastviti procya kṛtvā cābhi pradakṣiṇām | jagāma saritāṁ yoniṁ samudraṁ varuṇālayam

सनत्कुमार बोले - वे 'ऐसा ही हो' कहकर, उनकी प्रदक्षिणा करके नदियों के उद्गम, वरुण के आवास समुद्र की ओर चले गये।

श्लोक 52 (skanda.8.123.52)

तं गत्वा सागरं भीममुवाच भृगुनन्दनः । मम देशं प्रयच्छस्व निवासाय महोदधे

taṁ gatvā sāgaraṁ bhīmamuvāca bhṛgunandanaḥ | mama deśaṁ prayacchasva nivāsāya mahodadhe

वहाँ जाकर भृगुनन्दन ने भयंकर सागर से कहा - हे महोदधि! मुझे निवास के लिये अपना प्रदेश दो।

श्लोक 53 (skanda.8.123.53)

समुद्र उवाच । योजयस्व यथान्यायं भवान् माद्य वशे स्थितः । वेलासमीपे त्वं स्थित्वा विकृष्य बलवद्धनुः । मुञ्चस्व सायकं राम परीप्सन् देशमुत्तमम्

samudra uvāca | yojayasva yathānyāyaṁ bhavān mādya vaśe sthitaḥ | velāsamīpe tvaṁ sthitvā vikṛṣya balavaddhanuḥ | muñcasva sāyakaṁ rāma parīpsan deśamuttamam

समुद्र बोला - हे भगवन्! आज आप मेरे वश में हैं, विधिपूर्वक तैयार हो जाइये। तट के समीप खड़े होकर, बलवान् धनुष खींचकर, हे राम! उत्तम प्रदेश की कामना से बाण छोड़िये।

श्लोक 54 (skanda.8.123.54)

यावत्स सायकः क्षिप्तस्तव प्राणसमीरितः । यास्यते तावदेवाहं प्रदास्यामि तवालयम्

yāvatsa sāyakaḥ kṣiptastava prāṇasamīritaḥ | yāsyate tāvadevāhaṁ pradāsyāmi tavālayam

'जितनी दूर तक तुम्हारे प्राणों से प्रेरित वह छोड़ा गया बाण जायेगा, उतनी ही भूमि मैं तुम्हें निवास के लिये दूँगा।'

श्लोक 55 (skanda.8.123.55)

सनत्कुमार उवाच । ततः स भृगुशार्दूलः कृत्वादरमतन्द्रितः । युयोज सायकं व्यास विकृष्य बलवद्धनुः

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa bhṛguśārdūlaḥ kṛtvādaramatandritaḥ | yuyoja sāyakaṁ vyāsa vikṛṣya balavaddhanuḥ

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तब वह भृगुश्रेष्ठ आदरपूर्वक और सजगता से बलवान् धनुष खींचकर बाण को जोड़ने लगा।

श्लोक 56 (skanda.8.123.56)

कृत्वा मनसि संकल्पं योजनानां शतं तदा । गमिष्यति ममायं वै अथैनमभिमन्त्रयत्

kṛtvā manasi saṁkalpaṁ yojanānāṁ śataṁ tadā | gamiṣyati mamāyaṁ vai athainamabhimantrayat

मन में संकल्प करके कि यह मेरा बाण सौ योजन तक जायेगा, उसने तब उसे अभिमन्त्रित किया।

श्लोक 57 (skanda.8.123.57)

सागरेण तदा शम्भुः स्तुतस्तदुपशान्तये । सुराणां हितकामार्थं सागराशोषणाय च

sāgareṇa tadā śambhuḥ stutastadupaśāntaye | surāṇāṁ hitakāmārthaṁ sāgarāśoṣaṇāya ca

तब समुद्र ने उस बाण की शान्ति के लिये, देवताओं के हित के लिये और सागर के न सूखने के लिये शम्भु की स्तुति की।

श्लोक 58 (skanda.8.123.58)

तं क्षिप्तं जामदग्न्येन रुरोधाप्रतिमं शरम् । स रुद्धो योजनान्येत्य न्यपतद् द्वादशैव तु

taṁ kṣiptaṁ jāmadagnyena rurodhāpratimaṁ śaram | sa ruddho yojanānyetya nyapatad dvādaśaiva tu

जामदग्न्य द्वारा छोड़े गये उस अनुपम बाण को उन्होंने रोक दिया; रुका हुआ वह केवल बारह योजन जाकर गिर पड़ा।

श्लोक 59 (skanda.8.123.59)

तावच्च देशमुदधिर्विससर्ज हसन्निव । आवसच्च महातेजा जामदग्न्योपि तं तथा

tāvacca deśamudadhirvisasarja hasanniva | āvasacca mahātejā jāmadagnyopi taṁ tathā

और उतना ही प्रदेश समुद्र ने मानो हँसते हुए छोड़ दिया, और महातेजस्वी जामदग्न्य भी वहाँ निवास करने लगा।

श्लोक 60 (skanda.8.123.60)

तं देशं भृगुतनयः सुरेन्द्रकल्पो हृष्टात्मा मृगगणपक्षिसंघजुष्टम् । सिंहेन्द्रद्विपशरभर्क्षघोरनादं श्रीमन्तं पुरमिव देवता चकार

taṁ deśaṁ bhṛgutanayaḥ surendrakalpo hṛṣṭātmā mṛgagaṇapakṣisaṁghajuṣṭam | siṁhendradvipaśarabharkṣaghoranādaṁ śrīmantaṁ puramiva devatā cakāra

देवराज-सदृश उस भृगुपुत्र ने प्रसन्नचित्त होकर, हिरण-समूहों और पक्षि-समूहों से युक्त, सिंह, गजराज, शरभ और भालुओं की भयंकर गर्जना से गूँजते उस प्रदेश को देवनगरी के समान श्रीसम्पन्न बना दिया।

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