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अम्बिका खण्ड · अध्याय 124

कश्यप का पृथ्वीभाव

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

श्लोक 1 (skanda.8.124.1)

सनत्कुमार उवाच । जामदग्न्येन सा दत्ता तथा पृथ्वी महात्मने । गिरिशृङ्गं इवापातादधस्तात् सा तदाव्रजत्

sanatkumāra uvāca | jāmadagnyena sā dattā tathā pṛthvī mahātmane | giriśṛṅgaṁ ivāpātādadhastāt sā tadāvrajat

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार जामदग्न्य द्वारा उस महात्मा (कश्यप) को दी गयी वह पृथ्वी, पर्वत-शिखर के गिरने के समान, नीचे की ओर जाने लगी।

श्लोक 2 (skanda.8.124.2)

तामुवाच मुनिःक्रुद्धस्तिष्ठतिष्ठ वसुन्धरे । किमर्थं मां परित्यज्य अधस्ताद् व्रजसे शुभे

tāmuvāca muniḥkruddhastiṣṭhatiṣṭha vasundhare | kimarthaṁ māṁ parityajya adhastād vrajase śubhe

क्रुद्ध मुनि ने उससे कहा - हे वसुन्धरे! ठहरो, ठहरो! हे शुभे! मुझे छोड़कर तुम नीचे क्यों जा रही हो?

श्लोक 3 (skanda.8.124.3)

पृथिव्युवाच । जामदग्न्यं विना रामं प्रियं पतिमतिद्युतिम । न शक्नोमि मुने स्थातुं तद्गुणाहृतचेतना

pṛthivyuvāca | jāmadagnyaṁ vinā rāmaṁ priyaṁ patimatidyutima | na śaknomi mune sthātuṁ tadguṇāhṛtacetanā

पृथ्वी बोली - हे मुने! अपने प्रिय, परम तेजस्वी पति जामदग्न्य राम के बिना मैं ठहर नहीं सकती, उनके गुणों ने मेरा मन हर लिया है।

श्लोक 4 (skanda.8.124.4)

यदि मा यच्छसेद्य त्वं रामाय मुनिपुङ्गव । यास्याम्यहमधो नाथ न तिष्ठेयमतोन्यथा

yadi mā yacchasedya tvaṁ rāmāya munipuṅgava | yāsyāmyahamadho nātha na tiṣṭheyamatonyathā

'हे मुनिपुंगव! यदि आज तुम मुझे राम को नहीं सौंपोगे, तो हे नाथ, मैं नीचे चली जाऊँगी; अन्यथा मैं नहीं ठहरूँगी।'

श्लोक 5 (skanda.8.124.5)

सनत्कुमार उवाच । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा कश्यपस्तप्यतां वरः । उवाच वसुधां क्रुद्धो दहन्निव तदौजसा

sanatkumāra uvāca | tasyāstadvacanaṁ śrutvā kaśyapastapyatāṁ varaḥ | uvāca vasudhāṁ kruddho dahanniva tadaujasā

सनत्कुमार बोले - उसका वह वचन सुनकर तपस्वियों में श्रेष्ठ कश्यप क्रुद्ध होकर, मानो अपने तेज से दग्ध करते हुए, पृथ्वी से बोले।

श्लोक 6 (skanda.8.124.6)

कश्यप उवाच । गच्छ त्वं सुदुराचारे अधः पुनरवाग्गतिम् । वसुधाहं भविष्यामि पश्य मे तपसो बलम्

kaśyapa uvāca | gaccha tvaṁ sudurācāre adhaḥ punaravāggatim | vasudhāhaṁ bhaviṣyāmi paśya me tapaso balam

कश्यप बोले - हे दुराचारिणी! जाओ, पुनः नीचे की ओर चली जाओ; मैं स्वयं वसुधा बन जाऊँगा - देखो मेरे तप का बल!

श्लोक 7 (skanda.8.124.7)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स भगवान् व्यास योगं परममास्थितः । पृथिवीत्वमनुप्राप्तो धारयामास मानुषान्

sanatkumāra uvāca | tatassa bhagavān vyāsa yogaṁ paramamāsthitaḥ | pṛthivītvamanuprāpto dhārayāmāsa mānuṣān

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तब उन भगवान् ने परम योग में स्थित होकर पृथ्वीत्व को प्राप्त कर मनुष्यों को धारण किया।

श्लोक 8 (skanda.8.124.8)

बहून्यब्दसहस्राणि यदसौ पृथिवी बभौ । तदा पृथ्वी विषण्णा तं प्रसादयत कश्यपम

bahūnyabdasahasrāṇi yadasau pṛthivī babhau | tadā pṛthvī viṣaṇṇā taṁ prasādayata kaśyapama

जब वे अनेक सहस्र वर्षों तक पृथ्वी के रूप में रहे, तब [असली] पृथ्वी विषण्ण होकर उन कश्यप को प्रसन्न करने लगी।

श्लोक 9 (skanda.8.124.9)

पृथिव्युवाच । भगवन् तपसा तुभ्यं योगेन च बलेन च । न कश्चिदपि तुल्योस्ति दिवि वा भुवि वा विभो

pṛthivyuvāca | bhagavan tapasā tubhyaṁ yogena ca balena ca | na kaścidapi tulyosti divi vā bhuvi vā vibho

पृथ्वी बोली - हे भगवन्, हे विभो! तप, योग और बल में स्वर्ग या पृथ्वी पर आपके समान कोई भी नहीं है।

श्लोक 10 (skanda.8.124.10)

प्रसादये त्वां शिरसा दृष्ट्न्ते बलमुत्तमम् । यन्मयापकृतं किञ्चित्तत् क्षमस्व महामुने

prasādaye tvāṁ śirasā dṛṣṭnte balamuttamam | yanmayāpakṛtaṁ kiñcittat kṣamasva mahāmune

'आपका उत्तम बल देखकर मैं सिर झुकाकर आपको प्रसन्न करती हूँ; मैंने जो भी अपराध किया हो, हे महामुने, उसे क्षमा कीजिये।'

श्लोक 11 (skanda.8.124.11)

अहमेव हि लोकेषु पृथिवी स्यां तवाज्ञया । दीनाया मम विप्रेन्द्र प्रसादं कर्तुमर्हसि

ahameva hi lokeṣu pṛthivī syāṁ tavājñayā | dīnāyā mama viprendra prasādaṁ kartumarhasi

'मैं ही आपकी आज्ञा से लोकों में पृथ्वी बनूँ; हे विप्रेन्द्र! मुझ दीना पर कृपा कीजिये।'

श्लोक 12 (skanda.8.124.12)

सनत्कुमार उवाच । तां तथोपस्थितां दृष्ट्वा भगवानृषिसतमः । उवाच प्रहसन् देवीं पृथिवीं प्रणतां तदा

sanatkumāra uvāca | tāṁ tathopasthitāṁ dṛṣṭvā bhagavānṛṣisatamaḥ | uvāca prahasan devīṁ pṛthivīṁ praṇatāṁ tadā

सनत्कुमार बोले - उसे इस प्रकार उपस्थित देखकर ऋषिश्रेष्ठ भगवान् ने हँसते हुए उस प्रणत देवी पृथ्वी से कहा।

श्लोक 13 (skanda.8.124.13)

कश्यप उवाच । तवैव ह्यपचारेण मयेदं कृतमीदृशम् । त्वमिदानीं मया दत्तं पृथिवीत्वं समाचर

kaśyapa uvāca | tavaiva hyapacāreṇa mayedaṁ kṛtamīdṛśam | tvamidānīṁ mayā dattaṁ pṛthivītvaṁ samācara

कश्यप बोले - तुम्हारे ही अपराध से मैंने ऐसा किया था; अब तुम मेरे द्वारा दिये गये पृथ्वीत्व का पालन करो।

श्लोक 14 (skanda.8.124.14)

मम त्वं दुहितृत्वं च गत्वा कश्यपवंशजा । काश्यपी विदिता लोके भविष्यसि वसुन्धरे

mama tvaṁ duhitṛtvaṁ ca gatvā kaśyapavaṁśajā | kāśyapī viditā loke bhaviṣyasi vasundhare

'और मेरी पुत्री होकर, कश्यपवंश में उत्पन्न होकर, हे वसुन्धरे! तुम संसार में काश्यपी नाम से विख्यात होगी।'

श्लोक 15 (skanda.8.124.15)

सनत्कुमार उवाच । एवं सा पृथिवी व्यास अधोगत्वा पुनः स्थिता । पृथिवीत्वं समासाद्य बभूव विगतज्वरा

sanatkumāra uvāca | evaṁ sā pṛthivī vyāsa adhogatvā punaḥ sthitā | pṛthivītvaṁ samāsādya babhūva vigatajvarā

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार वह पृथ्वी नीचे जाकर पुनः स्थिर हो गयी, और पृथ्वीत्व प्राप्त करके संतापरहित हो गयी।

श्लोक 16 (skanda.8.124.16)

य इमं पृथिवीभावं कश्यपस्य महामुनेः । पृथिव्यागमनञ्चैव पुनर्भावं तथैव च

ya imaṁ pṛthivībhāvaṁ kaśyapasya mahāmuneḥ | pṛthivyāgamanañcaiva punarbhāvaṁ tathaiva ca

महामुनि कश्यप के इस पृथ्वीभाव को, पृथ्वी के आगमन को, तथा उसके पुनः पृथ्वी बनने को -

श्लोक 17 (skanda.8.124.17)

शृणुयात्पठते वापि शुचिर्भूत्वा सदैव हि । स लभेताक्षयाँल्लोकान् पृथिवीफलमेव च

śṛṇuyātpaṭhate vāpi śucirbhūtvā sadaiva hi | sa labhetākṣayā~llokān pṛthivīphalameva ca

- जो पवित्र होकर सदा इसे सुनता या पढ़ता है, वह अक्षय लोकों को और पृथ्वी-दान के फल को भी प्राप्त करता है।

श्लोक 18 (skanda.8.124.18)

तां सर्वलोकप्रभवामनेकशो मुने प्रणम्येह सदा नरोत्तमः । प्रकीर्त्तयेद्यो वसुधां वसुप्रदां स लोकमाप्नोति ऋषेरथाक्षयम्

tāṁ sarvalokaprabhavāmanekaśo mune praṇamyeha sadā narottamaḥ | prakīrttayedyo vasudhāṁ vasupradāṁ sa lokamāpnoti ṛṣerathākṣayam

हे मुने! जो श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण लोकों के उद्गम उस पृथ्वी को बार-बार यहाँ प्रणाम करके, धनप्रदा वसुधा का सदा कीर्तन करता है, वह उस ऋषि (कश्यप) के अक्षय लोक को प्राप्त करता है।

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