अम्बिका खण्ड · अध्याय 125
ध्वज-युद्ध
श्लोक 1 (skanda.8.125.1)
सनत्कुमार उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि ध्वजसंग्राममूर्जितम् । देवानामसुराणाञ्च प्राणयोगविनाशनम्
sanatkumāra uvāca | ataḥ paraṁ pravakṣyāmi dhvajasaṁgrāmamūrjitam | devānāmasurāṇāñca prāṇayogavināśanam
सनत्कुमार बोले - अब इसके बाद मैं देवताओं और असुरों के प्राणसंहारक, प्रबल ध्वज-संग्राम का वर्णन करूँगा।
श्लोक 2 (skanda.8.125.2)
आसीद् दनुसुतः श्रीमान् विप्रचित्तिर्महाबलः । तपस्तेपे स युक्तात्मा भस्त्रापद इति श्रुतिः
āsīd danusutaḥ śrīmān vipracittirmahābalaḥ | tapastepe sa yuktātmā bhastrāpada iti śrutiḥ
दनु का पुत्र श्रीमान् महाबली विप्रचित्ति था; एकाग्रचित्त होकर उसने तप किया - सुना जाता है कि भस्त्रापद में।
श्लोक 3 (skanda.8.125.3)
स राध्य तत्र देवेशं भगवन्तं त्रिलोचनम् । वरं वव्रेमरत्वञ्च तस्मै प्रादात् स देवपः
sa rādhya tatra deveśaṁ bhagavantaṁ trilocanam | varaṁ vavremaratvañca tasmai prādāt sa devapaḥ
वहाँ त्रिलोचन भगवान् देवेश को प्रसन्न करके उसने वर माँगा - अमरत्व; उन देवपति ने उसे वह प्रदान किया।
श्लोक 4 (skanda.8.125.4)
ध्वजं मायामयं दिव्यं सर्वगं काञ्चनं शुभम् । उवाच चैनं तुष्टात्मा भगवान्दानवेश्वरम्
dhvajaṁ māyāmayaṁ divyaṁ sarvagaṁ kāñcanaṁ śubham | uvāca cainaṁ tuṣṭātmā bhagavāndānaveśvaram
और मायामय, दिव्य, सर्वव्यापी, स्वर्णिम, शुभ ध्वज भी; और प्रसन्नचित्त भगवान् ने उस दानवेश्वर से कहा।
श्लोक 5 (skanda.8.125.5)
अयं तव दनोः पुत्र विश्वरूपो ध्वजोत्तमः । एनमाश्रित्य युद्धेषु त्वमजय्यो भविष्यसि
ayaṁ tava danoḥ putra viśvarūpo dhvajottamaḥ | enamāśritya yuddheṣu tvamajayyo bhaviṣyasi
'हे दनु के पुत्र! यह विश्वरूप नामक श्रेष्ठ ध्वज तुम्हारा है; इसका आश्रय लेकर युद्धों में तुम अजेय होगे।'
श्लोक 6 (skanda.8.125.6)
अमरश्च महाबाहो शब्दं चेन्न करिष्यसि । अतोन्यथा तु ते भाग्यैर्भविता विजयो रणे
amaraśca mahābāho śabdaṁ cenna kariṣyasi | atonyathā tu te bhāgyairbhavitā vijayo raṇe
'हे महाबाहो! और तुम अमर रहोगे यदि कोई ध्वनि नहीं करोगे; अन्यथा युद्ध में तुम्हारी विजय का भाग्य टल जायेगा।'
श्लोक 7 (skanda.8.125.7)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो देवेन ध्वजेन महता युधि । दनुजैः सह विप्रेन्द्र देवान्सर्वान्समाह्वयत्
sanatkumāra uvāca | sa evamukto devena dhvajena mahatā yudhi | danujaiḥ saha viprendra devānsarvānsamāhvayat
सनत्कुमार बोले - हे विप्रेन्द्र! देवता से इस प्रकार कहे जाने पर वह उस महान् ध्वज के साथ युद्ध में दनुजों सहित समस्त देवताओं को ललकारने लगा।
श्लोक 8 (skanda.8.125.8)
तद्युद्धमभवद् घोरं तुमुलं लोमहर्षणम् । वर्षाणान्तु शतान्यष्टौ दश चैव सुदारुणम्
tadyuddhamabhavad ghoraṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam | varṣāṇāntu śatānyaṣṭau daśa caiva sudāruṇam
वह युद्ध अत्यन्त भयंकर, तुमुल और रोमांचकारी हुआ, जो आठ सौ दस वर्षों तक अत्यन्त दारुण रहा।
श्लोक 9 (skanda.8.125.9)
तत्राद्भुतमपश्यन्ते दनुपुत्रस्य धीमतः । ध्वजेन विश्वरूपेण यदेको न्यवधीद् बहून्
tatrādbhutamapaśyante danuputrasya dhīmataḥ | dhvajena viśvarūpeṇa yadeko nyavadhīd bahūn
वहाँ उस बुद्धिमान् दनुपुत्र का यह आश्चर्य देखा गया कि विश्वरूप ध्वज के सहारे वह अकेला ही बहुतों का वध कर देता था।
श्लोक 10 (skanda.8.125.10)
युध्यतश्चास्य संग्रामे ध्वजमाश्रित्य मायया । न देवाः प्रहरन्त्यस्य पश्यमानास्तु मोहिताः
yudhyataścāsya saṁgrāme dhvajamāśritya māyayā | na devāḥ praharantyasya paśyamānāstu mohitāḥ
माया से ध्वज का आश्रय लेकर युद्ध करते हुए उस पर देवता प्रहार नहीं कर पाते थे, यद्यपि वे देख रहे थे, फिर भी मोहित थे।
श्लोक 11 (skanda.8.125.11)
नापश्यन्ते दनुसुतान्नापि दैत्याँस्तथा रणे । ध्वजमेवाभिपश्यन्ति सर्वे मूढा दिवौकसः
nāpaśyante danusutānnāpi daityā~stathā raṇe | dhvajamevābhipaśyanti sarve mūḍhā divaukasaḥ
युद्ध में वे न तो दनु के पुत्रों को देखते थे और न ही दैत्यों को - मोहग्रस्त सब देवता केवल ध्वज को ही देखते थे।
श्लोक 12 (skanda.8.125.12)
मुमुचुर्यान्यमोघानि आयुधानि दिवौकसः । तानि छन्नान्यभूवन् हि ध्वजच्छायानिलेन वै
mumucuryānyamoghāni āyudhāni divaukasaḥ | tāni channānyabhūvan hi dhvajacchāyānilena vai
देवताओं ने जो-जो अमोघ अस्त्र छोड़े, वे सब ध्वज की छाया के वायु से ढक जाते थे।
श्लोक 13 (skanda.8.125.13)
अग्रतः पृष्ठतश्चैव पार्श्वयोरूर्ध्वमेव च । ध्वजमेवाभिपश्यन्ति न दैत्यान्नापि दानवान्
agrataḥ pṛṣṭhataścaiva pārśvayorūrdhvameva ca | dhvajamevābhipaśyanti na daityānnāpi dānavān
आगे, पीछे, दोनों ओर तथा ऊपर भी, उन्हें केवल ध्वज ही दिखाई देता था, न दैत्य और न दानव।
श्लोक 14 (skanda.8.125.14)
तत्र ते सायकास्तीक्ष्णा ज्वलन्तः पावकार्चिषः । निःसृत्य तु ध्वजाद् व्यास दारयन्ति सुरोत्तमान्
tatra te sāyakāstīkṣṇā jvalantaḥ pāvakārciṣaḥ | niḥsṛtya tu dhvajād vyāsa dārayanti surottamān
हे व्यास! वहाँ अग्निशिखा के समान प्रज्वलित तीक्ष्ण बाण ध्वज से निकलकर देवश्रेष्ठों को छिन्न-भिन्न कर देते थे।
श्लोक 15 (skanda.8.125.15)
गदाश्च परिघाश्चैव भिन्दिपालास्सतोमराः । निःसृतानि तथान्यानि दृश्यन्तेस्त्राणि वै ध्वजात्
gadāśca parighāścaiva bhindipālāssatomarāḥ | niḥsṛtāni tathānyāni dṛśyantestrāṇi vai dhvajāt
गदाएँ, परिघ, भिन्दिपाल तथा तोमर - ये और अन्य अस्त्र भी ध्वज से निकलते हुए दिखाई देते थे।
श्लोक 16 (skanda.8.125.16)
ते देवास्तेन दैत्येन ध्वजमाश्रित्य सर्वशः । भग्ना विचेतसः संख्ये कृता नष्टपराक्रमाः
te devāstena daityena dhvajamāśritya sarvaśaḥ | bhagnā vicetasaḥ saṁkhye kṛtā naṣṭaparākramāḥ
उन देवताओं को उस दैत्य ने, सर्वथा ध्वज का आश्रय लेकर, युद्ध में भग्न, संज्ञाशून्य और पराक्रमहीन कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.8.125.17)
तान् भग्नान् भज्यमानाँश्च सर्वान्दृष्ट्वा सुरोत्तमान् । जगर्ज जलदो यद्वद् ध्वजमाश्रित्य दानवः
tān bhagnān bhajyamānā~śca sarvāndṛṣṭvā surottamān | jagarja jalado yadvad dhvajamāśritya dānavaḥ
उन भग्न होते और भग्न हो चुके देवश्रेष्ठों को देखकर वह दानव, ध्वज का आश्रय लेकर, मेघ के समान गरजने लगा।
श्लोक 18 (skanda.8.125.18)
तस्य तच्छिद्रमालक्ष्य भगवान् पाकशासनः । ध्वजमालक्ष्य चिक्षेप वज्रं परममन्युमान्
tasya tacchidramālakṣya bhagavān pākaśāsanaḥ | dhvajamālakṣya cikṣepa vajraṁ paramamanyumān
उसका वह छिद्र (कमजोरी) देखकर भगवान् पाकशासन ने ध्वज को लक्ष्य करके अत्यन्त क्रोधित होकर वज्र फेंका।
श्लोक 19 (skanda.8.125.19)
ज्वलदादित्यसंकाशं तद् वज्रं भीमशब्दवत् । सध्वज दानवेशानमकरोद्यमगोचरम्
jvaladādityasaṁkāśaṁ tad vajraṁ bhīmaśabdavat | sadhvaja dānaveśānamakarodyamagocaram
वह वज्र, प्रज्वलित सूर्य के समान, भयंकर ध्वनिवाला, उस दानवेश्वर को ध्वज सहित यम के अधीन कर गया।
श्लोक 20 (skanda.8.125.20)
ध्वजे लक्ष्यं समाविश्य देवेन्द्रेण महात्मना । हतास्ते नानवास्सर्वे सहस्राणि चतुर्दश
dhvaje lakṣyaṁ samāviśya devendreṇa mahātmanā | hatāste nānavāssarve sahasrāṇi caturdaśa
महात्मा देवेन्द्र द्वारा ध्वज को लक्ष्य बनाये जाने पर वे सभी चौदह हजार, बिना किसी अपवाद के, मारे गये।
श्लोक 21 (skanda.8.125.21)
ते तेन शब्देन महानुभावा हतास्समालक्ष्य सुरेन्द्रकल्पाः । ध्वजे निवेश्यैन्द्रसमानचिह्ना वज्रेण देवेन्द्रबलेन सर्वे
te tena śabdena mahānubhāvā hatāssamālakṣya surendrakalpāḥ | dhvaje niveśyaindrasamānacihnā vajreṇa devendrabalena sarve
उस भीषण ध्वनि से इन्द्र के समान तेजस्वी वे सब वीर मारे गये - यह देखकर, ध्वज पर इन्द्र के समान चिह्न स्थापित कर, देवेन्द्र के बल से युक्त वज्र द्वारा वे सब नष्ट हो गये।