अम्बिका खण्ड · अध्याय 126
सगर की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.8.126.1)
व्यास उवाच । भस्त्रापदमिति प्रोक्तं त्वया ब्रह्मसुताव्यय । कथं तदभवत् स्थानमेतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca | bhastrāpadamiti proktaṁ tvayā brahmasutāvyaya | kathaṁ tadabhavat sthānametadicchāmi veditum
व्यास बोले - हे अविनाशी ब्रह्मपुत्र! आपने जिसे भस्त्रापद कहा है, वह स्थान कैसे बना - यह जानना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.8.126.2)
सनत्कुमार उवाच । इक्ष्वाकुकुलसंभूतो बाहुर्नाम प्रजेश्वरः । हैहयैस्तालजंघैश्च तस्य राज्यमशेषतः । हृतं विप्रेन्द्र विक्रम्य सभार्यः स वनं ययौ
sanatkumāra uvāca | ikṣvākukulasaṁbhūto bāhurnāma prajeśvaraḥ | haihayaistālajaṁghaiśca tasya rājyamaśeṣataḥ | hṛtaṁ viprendra vikramya sabhāryaḥ sa vanaṁ yayau
सनत्कुमार बोले - इक्ष्वाकु कुल में बाहु नामक एक प्रजापालक राजा हुए। हे विप्रेन्द्र! हैहयों और तालजंघों ने बलपूर्वक उनका सम्पूर्ण राज्य छीन लिया, तब वे अपनी पत्नी सहित वन को चले गये।
श्लोक 3 (skanda.8.126.3)
स ऋचीकाश्रमं गत्वा ऋचीकेनानुपालितः । उवास वनमध्ये तु गर्भिण्या भार्यया सह
sa ṛcīkāśramaṁ gatvā ṛcīkenānupālitaḥ | uvāsa vanamadhye tu garbhiṇyā bhāryayā saha
ऋचीक के आश्रम में जाकर, ऋचीक द्वारा संरक्षित होकर, वे अपनी गर्भवती पत्नी सहित वन के बीच रहने लगे।
श्लोक 4 (skanda.8.126.4)
तस्याः प्रसवकाले तु भार्यायाः शक्तिनन्दन । सपत्न्या रागमोहेन गरोस्यै संप्रदापितः
tasyāḥ prasavakāle tu bhāryāyāḥ śaktinandana | sapatnyā rāgamohena garosyai saṁpradāpitaḥ
हे शक्तिनन्दन! उस पत्नी के प्रसवकाल में सपत्नी ने राग और मोह के कारण उसे विष पिला दिया।
श्लोक 5 (skanda.8.126.5)
सा तेन वेदनां प्राप्य तप्यमाना रुजान्विता । शीतं तोयमिति प्रोच्य मूर्च्छिता न्यपतद् भुवि
sā tena vedanāṁ prāpya tapyamānā rujānvitā | śītaṁ toyamiti procya mūrcchitā nyapatad bhuvi
उससे वेदना पाकर, पीड़ा से संतप्त होकर वह 'शीतल जल' कहती हुई मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 6 (skanda.8.126.6)
तां तथा पतितां दृष्ट्वा स राजा मन्युतापितः । कुम्भमादाय वृद्धोपि तोयार्थं सरितं ययौ
tāṁ tathā patitāṁ dṛṣṭvā sa rājā manyutāpitaḥ | kumbhamādāya vṛddhopi toyārthaṁ saritaṁ yayau
उसे इस प्रकार गिरा देखकर वे राजा शोक-संतप्त होकर, वृद्ध होते हुए भी, कलश लेकर जल के लिये नदी गये।
श्लोक 7 (skanda.8.126.7)
स पूरयित्वा कुम्भं तं स्कन्धेनादाय दुःखितः । वृद्धभावाच्छ्रमाच्चैव पापात च ममार च
sa pūrayitvā kumbhaṁ taṁ skandhenādāya duḥkhitaḥ | vṛddhabhāvācchramāccaiva pāpāta ca mamāra ca
कलश भरकर उसे कंधे पर उठाकर, दुःखी होकर, वृद्धावस्था, थकान और पाप के कारण वे मर गये।
श्लोक 8 (skanda.8.126.8)
मृतो मृत इतीत्येवमृषिभिः समुदाहृते । सा देवी मूर्च्छितोत्तस्थौ पतिशोकसमाहता
mṛto mṛta itītyevamṛṣibhiḥ samudāhṛte | sā devī mūrcchitottasthau patiśokasamāhatā
'वे मर गये, मर गये' - इस प्रकार ऋषियों द्वारा घोषित होने पर, पतिशोक से आहत वह रानी मूर्छा से उठ खड़ी हुई।
श्लोक 9 (skanda.8.126.9)
सा गरस्य च तापेन पतिमृत्युकृतेन च । समाहता तदा व्यास कुररीव व्यनादयत्
sā garasya ca tāpena patimṛtyukṛtena ca | samāhatā tadā vyāsa kurarīva vyanādayat
हे व्यास! विष की जलन से और पति की मृत्यु से पीड़ित होकर वह उस समय कुररी पक्षी की भाँति विलाप करने लगी।
श्लोक 10 (skanda.8.126.10)
बाहोस्तु ऋषयस्सर्वे वसिष्ठाद्याः समागताः । कृत्वा तु चयनं सम्यक् संस्कारमभिरोचयन्
bāhostu ṛṣayassarve vasiṣṭhādyāḥ samāgatāḥ | kṛtvā tu cayanaṁ samyak saṁskāramabhirocayan
बाहु के लिये वसिष्ठ आदि सभी ऋषि एकत्र हुए, और चिता ठीक से बनाकर संस्कार करने का विचार किया।
श्लोक 11 (skanda.8.126.11)
तमग्निं प्रविशन्ती सा शैव्या गर्भेण दूषिता । वारिता ऋषिभिर्व्यास और्वेण च महात्मना
tamagniṁ praviśantī sā śaivyā garbheṇa dūṣitā | vāritā ṛṣibhirvyāsa aurveṇa ca mahātmanā
विष-दूषित गर्भवाली वह शैव्या उस अग्नि में प्रवेश करने लगी, तो हे व्यास! ऋषियों ने और महात्मा और्व ने उसे रोक दिया।
श्लोक 12 (skanda.8.126.12)
तस्यास्तत्र दिने व्यास सायाह्ने मन्युनाशनः । गरेण सह गर्भोसौ निःसृतोनलसप्रभः
tasyāstatra dine vyāsa sāyāhne manyunāśanaḥ | gareṇa saha garbhosau niḥsṛtonalasaprabhaḥ
हे व्यास! उसी दिन सायंकाल में, वह शोकनाशक गर्भ विष के साथ अग्निसमान तेजस्वी होकर बाहर निकल आया।
श्लोक 13 (skanda.8.126.13)
तस्मै सगर इत्येव नाम चक्रे ऋषिस्तदा । संस्कारञ्चाकरोत्तस्य सर्वमेव कृपान्वितः
tasmai sagara ityeva nāma cakre ṛṣistadā | saṁskārañcākarottasya sarvameva kṛpānvitaḥ
ऋषि ने तब उसका नाम 'सगर' रखा, और करुणा से युक्त होकर उसके समस्त संस्कार सम्पन्न किये।
श्लोक 14 (skanda.8.126.14)
धनुर्वेदं ददौ चैव वेदान् साङ्गाँस्तथैव च । अस्त्रग्रामञ्च विपुलं रथञ्चासङ्गमव्ययम्
dhanurvedaṁ dadau caiva vedān sāṅgā~stathaiva ca | astragrāmañca vipulaṁ rathañcāsaṅgamavyayam
उसने उसे धनुर्वेद, अंगों सहित वेद, विशाल अस्त्रसमूह, तथा निर्बाध अविनाशी रथ भी प्रदान किया।
श्लोक 15 (skanda.8.126.15)
स तेन रथमुख्येन युधि शत्रूञ्जघान ह । और्वास्त्रं चैव सन्धाय तेषां धर्ममनाशयत्
sa tena rathamukhyena yudhi śatrūñjaghāna ha | aurvāstraṁ caiva sandhāya teṣāṁ dharmamanāśayat
उस श्रेष्ठ रथ से उसने युद्ध में शत्रुओं को मार डाला, और और्व अस्त्र का प्रयोग करके उनके बल (धर्म) का नाश किया।
श्लोक 16 (skanda.8.126.16)
स हत्वा तांस्तथा व्यास प्राप्य राज्यमथापि च । वैनतेयस्वसां प्राप्य शैव्याञ्चैव सुमध्यमाम्
sa hatvā tāṁstathā vyāsa prāpya rājyamathāpi ca | vainateyasvasāṁ prāpya śaivyāñcaiva sumadhyamām
हे व्यास! उन्हें मारकर और राज्य पाकर, उसने वैनतेय की बहन और सुन्दर शैव्या को भी पत्नी रूप में प्राप्त किया।
श्लोक 17 (skanda.8.126.17)
अनपत्यो महाबाहुस्त्र्यम्बकं देवसत्तमम् । आराधयन् महातेजाः पुत्रहेतोर्नराधिपः
anapatyo mahābāhustryambakaṁ devasattamam | ārādhayan mahātejāḥ putrahetornarādhipaḥ
निःसंतान, महाबाहु, महातेजस्वी वह राजा पुत्र-प्राप्ति के लिये देवश्रेष्ठ त्र्यम्बक की आराधना करने लगा।
श्लोक 18 (skanda.8.126.18)
तस्मै प्रादात् स भगवान् पुत्रवंशकरं प्रभुः । षष्टि चैव सहस्राणि सुतानां सुमहात्मनाम्
tasmai prādāt sa bhagavān putravaṁśakaraṁ prabhuḥ | ṣaṣṭi caiva sahasrāṇi sutānāṁ sumahātmanām
उन प्रभु भगवान् ने उसे वंश चलानेवाला पुत्र प्रदान किया - साठ हजार महात्मा पुत्र।
श्लोक 19 (skanda.8.126.19)
सनत्कुमार उवाच । लब्ध्वा स तु वरं राजा भार्याद्वयमुवाच ह । वैनतेयस्वसां चैव शैव्याञ्चैव महामनाः
sanatkumāra uvāca | labdhvā sa tu varaṁ rājā bhāryādvayamuvāca ha | vainateyasvasāṁ caiva śaivyāñcaiva mahāmanāḥ
सनत्कुमार बोले - वह वर पाकर उस महामनस्वी राजा ने अपनी दोनों पत्नियों, वैनतेय की बहन तथा शैव्या से कहा।
श्लोक 20 (skanda.8.126.20)
सगर उवाच । मह्यं देवेन दत्तश्च पुत्रो वंशकरः शुभः । षष्टिं चैव सहस्राणि पुत्राणां सुमहात्मनाम्
sagara uvāca | mahyaṁ devena dattaśca putro vaṁśakaraḥ śubhaḥ | ṣaṣṭiṁ caiva sahasrāṇi putrāṇāṁ sumahātmanām
सगर बोले - देवता ने मुझे शुभ, वंश चलानेवाला पुत्र दिया है - साठ हजार महात्मा पुत्र।
श्लोक 21 (skanda.8.126.21)
तत्र का वृणुते देव्यौ वरं देवी शुभं हितम् । ब्रूत नाहं विभागं वः करोमि विदितात्मनाम्
tatra kā vṛṇute devyau varaṁ devī śubhaṁ hitam | brūta nāhaṁ vibhāgaṁ vaḥ karomi viditātmanām
'हे देवियो! तुम दोनों में से कौन कौन-सा शुभ, हितकर वर चुनती है - कहो; तुम स्वयं जानो, मैं तुम्हारा बँटवारा नहीं करूँगा।'
श्लोक 22 (skanda.8.126.22)
वैनतेयस्वसोवाच । षष्टिः पुत्रसहस्राणि मम सन्तु नराधिप । शैव्याब्रवीत् सुतो मह्यमेको वंशकरोस्तु वै
vainateyasvasovāca | ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi mama santu narādhipa | śaivyābravīt suto mahyameko vaṁśakarostu vai
वैनतेय की बहन बोली - हे नराधिप! साठ हजार पुत्र मुझे मिलें। शैव्या बोली - मुझे एक ही वंशकर पुत्र हो।
श्लोक 23 (skanda.8.126.23)
सनत्कुमार उवाच । असमञ्जसुतं शैव्या ततः सा संप्रसूयत । वैनतेयस्वसास्तुम्बं महान्तं संप्रसूयत
sanatkumāra uvāca | asamañjasutaṁ śaivyā tataḥ sā saṁprasūyata | vainateyasvasāstumbaṁ mahāntaṁ saṁprasūyata
सनत्कुमार बोले - शैव्या ने तब असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया, और वैनतेय की बहन ने एक विशाल तुम्बे को जन्म दिया।
श्लोक 24 (skanda.8.126.24)
तस्मात्तुम्बात्ततस्तानि सहस्राणि दशैव तु । गुणितानि व्यास षड्भिः संभवन्त महाबलाः
tasmāttumbāttatastāni sahasrāṇi daśaiva tu | guṇitāni vyāsa ṣaḍbhiḥ saṁbhavanta mahābalāḥ
हे व्यास! उस तुम्बे से फिर दस हजार को छह से गुणा करने पर होनेवाले वे महाबली पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 25 (skanda.8.126.25)
असमञ्जः परित्यक्तः सगरेण सुतस्ततः । अधार्मिक इति ज्ञात्वा अनाचारे व्यवस्थितः
asamañjaḥ parityaktaḥ sagareṇa sutastataḥ | adhārmika iti jñātvā anācāre vyavasthitaḥ
वह पुत्र असमंजस, अधर्मी और कदाचार में स्थित जानकर, सगर द्वारा त्याग दिया गया।
श्लोक 26 (skanda.8.126.26)
अंशुमाँस्तस्य पुत्रस्तु बाल एवाति धार्मिकः । तस्मिन् प्रीतिं तदा चक्रे सगरो राजसत्तमः
aṁśumā~stasya putrastu bāla evāti dhārmikaḥ | tasmin prītiṁ tadā cakre sagaro rājasattamaḥ
उसका पुत्र अंशुमान् बाल्यावस्था से ही अत्यन्त धार्मिक था; राजश्रेष्ठ सगर ने उसमें स्नेह किया।
श्लोक 27 (skanda.8.126.27)
असमञ्जे परित्यक्ते हयमेधेन दीक्षितः । षष्टिं तानि सहस्राणि हयस्यारक्षणे दधौ
asamañje parityakte hayamedhena dīkṣitaḥ | ṣaṣṭiṁ tāni sahasrāṇi hayasyārakṣaṇe dadhau
असमंजस के त्याग दिये जाने पर सगर अश्वमेध यज्ञ में दीक्षित हुए, और उन साठ हजार पुत्रों को घोड़े की रक्षा में लगाया।
श्लोक 28 (skanda.8.126.28)
तेषां हयं चारयतामुद्युक्तानां महात्मनाम् । अन्तर्धानगतः शक्र आक्षिपत्तं हयोत्तमम्
teṣāṁ hayaṁ cārayatāmudyuktānāṁ mahātmanām | antardhānagataḥ śakra ākṣipattaṁ hayottamam
जब वे महात्मा पुत्र सावधानी से घोड़े को चराने में लगे थे, तब शक्र अदृश्य होकर उस श्रेष्ठ घोड़े को चुरा ले गया।
श्लोक 29 (skanda.8.126.29)
ते लोकान् सर्वशो गत्वा अपश्यन्तो हयोत्तमम् । पितरं दीक्षितं प्राप्य तं हयं संन्यवेदयन
te lokān sarvaśo gatvā apaśyanto hayottamam | pitaraṁ dīkṣitaṁ prāpya taṁ hayaṁ saṁnyavedayana
वे समस्त लोकों में घूमकर भी उस श्रेष्ठ घोड़े को न पाकर, दीक्षित पिता के पास आकर उस घोड़े का समाचार सुनाने लगे।
श्लोक 30 (skanda.8.126.30)
स संक्रुद्धस्तदा राजा निर्दहन्निव तान्सुतान् । उवाच क्रोधताम्राक्षो नश्यध्वं क्षिप्रमद्य वै
sa saṁkruddhastadā rājā nirdahanniva tānsutān | uvāca krodhatāmrākṣo naśyadhvaṁ kṣipramadya vai
उस समय अत्यन्त क्रुद्ध राजा ने मानो अपने पुत्रों को दग्ध करते हुए, क्रोध से लाल नेत्र करके कहा - आज ही तुरन्त नष्ट हो जाओ!
श्लोक 31 (skanda.8.126.31)
नागन्तव्यं विना वोद्य हयं क्रूरा विमार्गत । सुतैः किं मम युष्माभिर्यात सर्वे यमक्षयम्
nāgantavyaṁ vinā vodya hayaṁ krūrā vimārgata | sutaiḥ kiṁ mama yuṣmābhiryāta sarve yamakṣayam
'हे क्रूरो! आज घोड़े के बिना लौटकर मत आना, खोजते रहो। तुम जैसे पुत्रों से मुझे क्या लाभ? जाओ, सब यमलोक को चले जाओ।'
श्लोक 32 (skanda.8.126.32)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता विप्रेन्द्र त्रैलोक्यमखिलं तदा । विमृग्य खानयामासुरिमां सर्वां वसुन्धराम्
sanatkumāra uvāca | ta evamuktā viprendra trailokyamakhilaṁ tadā | vimṛgya khānayāmāsurimāṁ sarvāṁ vasundharām
सनत्कुमार बोले - हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार कहे जाने पर उन्होंने सम्पूर्ण त्रैलोक्य को खोजा, और इस सारी पृथ्वी को खोद डाला।
श्लोक 33 (skanda.8.126.33)
दिग्गजाँस्ते ततो दृष्टवा ऋषीँश्च नियतव्रतान् । धारयन्तोवनिं सर्वान् दृष्ट्वा चाभिप्रणम्य च
diggajā~ste tato dṛṣṭavā ṛṣī~śca niyatavratān | dhārayantovaniṁ sarvān dṛṣṭvā cābhipraṇamya ca
फिर उन्होंने दिग्गजों को तथा पृथ्वी को धारण करनेवाले नियतव्रती ऋषियों को देखा, और सबको देखकर प्रणाम किया।
श्लोक 34 (skanda.8.126.34)
कपिलं ते मुनिं सुप्तमवैक्षन्त जलाशये । अदूरेस्य हयं चैव क्रुद्धास्ते मेनिरे तदा
kapilaṁ te muniṁ suptamavaikṣanta jalāśaye | adūresya hayaṁ caiva kruddhāste menire tadā
उन्होंने जलाशय के पास सोये हुए मुनि कपिल को देखा, और उनके निकट ही घोड़े को भी; तब क्रुद्ध होकर उन्होंने सोचा।
श्लोक 35 (skanda.8.126.35)
प्रेरिता भावितार्थेन काले पक्वा मुमूर्षवः । पितृशापादथोचुस्ते कपिलं मुनिसत्तमम्
preritā bhāvitārthena kāle pakvā mumūrṣavaḥ | pitṛśāpādathocuste kapilaṁ munisattamam
अपने प्रारब्ध से प्रेरित होकर, काल में पके हुए, मरणासन्न, और पिता के शाप से भी वे मुनिश्रेष्ठ कपिल से बोले।
श्लोक 36 (skanda.8.126.36)
एष नो हयमुख्यस्य हर्ता सुप्तो दुरात्मवान् । एनमद्य वयं सर्वे नयाम पितुरन्तिकम्
eṣa no hayamukhyasya hartā supto durātmavān | enamadya vayaṁ sarve nayāma piturantikam
'यह सोया हुआ दुरात्मा ही हमारे श्रेष्ठ घोड़े का चोर है; इसे आज हम सब पिता के पास ले चलें।'
श्लोक 37 (skanda.8.126.37)
सनत्कुमार उवाच । ततस्ते कालपाशेन बद्धास्सर्वे महाबलाः । नियतेर्वशगाश्चैव पद्भिस्तं समताडयन्
sanatkumāra uvāca | tataste kālapāśena baddhāssarve mahābalāḥ | niyatervaśagāścaiva padbhistaṁ samatāḍayan
सनत्कुमार बोले - तब वे सब महाबली, काल के पाश में बँधे हुए और नियति के अधीन होकर, उन्हें पैरों से मारने लगे।
श्लोक 38 (skanda.8.126.38)
स तैरभ्यर्दितः क्रुद्धः शरदामयुतं तदा । निरुद्धं सहसा वायुमुत्ससर्ज यथाहिराट्
sa tairabhyarditaḥ kruddhaḥ śaradāmayutaṁ tadā | niruddhaṁ sahasā vāyumutsasarja yathāhirāṭ
उनसे पीड़ित होकर क्रुद्ध होते हुए उन्होंने दस हजार वर्षों से रोके हुए श्वास को सहसा छोड़ दिया, जैसे सर्पराज छोड़ता है।
श्लोक 39 (skanda.8.126.39)
तस्य वक्त्राद्विनिःसृत्य स वायुर्ज्वलनात्मकः । ददाह सागरान् सर्वान् न्यायधर्मबहिष्कृतान्
tasya vaktrādviniḥsṛtya sa vāyurjvalanātmakaḥ | dadāha sāgarān sarvān nyāyadharmabahiṣkṛtān
उनके मुख से निकलकर वह अग्निस्वरूप वायु न्याय और धर्म से बहिष्कृत हो चुके उन सभी सागरपुत्रों को भस्म कर गयी।
श्लोक 40 (skanda.8.126.40)
सनत्कुमार उवाच । तेषु दग्धेषु सर्वेषु ऋषयो नारदादयः । सगराय यथावृत्तमाचख्युरतिदुष्करम्
sanatkumāra uvāca | teṣu dagdheṣu sarveṣu ṛṣayo nāradādayaḥ | sagarāya yathāvṛttamācakhyuratiduṣkaram
सनत्कुमार बोले - उन सबके भस्म होने पर नारद आदि ऋषियों ने सगर को यह अत्यन्त दुष्कर घटना ज्यों-की-त्यों सुनायी।
श्लोक 41 (skanda.8.126.41)
ततस्स राजा दुःखार्त्तः संस्तभ्यात्मानमात्मना । अंशुमन्तं प्रियं पौत्रमादिदेश महामनाः
tatassa rājā duḥkhārttaḥ saṁstabhyātmānamātmanā | aṁśumantaṁ priyaṁ pautramādideśa mahāmanāḥ
तब वह दुःखार्त राजा अपने मन को स्वयं संभालकर, उस महामनस्वी ने अपने प्रिय पौत्र अंशुमान् को आदेश दिया।
श्लोक 42 (skanda.8.126.42)
सगर उवाच । इमं रथं समारुह्य गच्छ तं हयमुत्तमम् । इहानय महाबाहो कालो नो नात्यगाद्यथा
sagara uvāca | imaṁ rathaṁ samāruhya gaccha taṁ hayamuttamam | ihānaya mahābāho kālo no nātyagādyathā
सगर बोले - हे महाबाहो! इस रथ पर चढ़कर जाओ, और हमारा समय बीतने से पहले उस श्रेष्ठ घोड़े को यहाँ ले आओ।
श्लोक 43 (skanda.8.126.43)
समाचरेथास्तद्वाक्य यथासावृषिसत्तमः । क्रोधं न कुरुतेस्मासु त्वयि नः सन्ततिर्ध्रुवा
samācarethāstadvākya yathāsāvṛṣisattamaḥ | krodhaṁ na kurutesmāsu tvayi naḥ santatirdhruvā
'उस ऋषिश्रेष्ठ का जो वचन हो, उसका पालन करना, जिससे वे हम पर क्रोधित न हों - हमारी सन्तान अब निश्चय ही तुम्हीं पर निर्भर है।'
श्लोक 44 (skanda.8.126.44)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो रथमास्थितो नृपो महानुभावः सुरसिद्धपूजितः । जगाम वेगेन सुरेन्द्रविक्रमः स यत्र योगी सगरान्तको बभौ
sanatkumāra uvāca | sa evamukto rathamāsthito nṛpo mahānubhāvaḥ surasiddhapūjitaḥ | jagāma vegena surendravikramaḥ sa yatra yogī sagarāntako babhau
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार आदेश पाकर, रथ पर बैठा वह महानुभाव राजकुमार, देवताओं और सिद्धों से पूजित, देवेन्द्र-सदृश पराक्रमी होकर वेगपूर्वक वहाँ गया जहाँ वह योगी, सगर-वंश का मानो अन्तक बना हुआ, शोभित हो रहा था।