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अम्बिका खण्ड · अध्याय 129

अन्धकार-युद्ध

अध्याय 128अध्याय-सूचीअध्याय 130

श्लोक 1 (skanda.8.129.1)

सनत्कुमार उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि हालाहलमशेषतः । संग्रामं दितिपुत्राणां देवानां च भयावहम्

sanatkumāra uvāca | ataḥ paraṁ pravakṣyāmi hālāhalamaśeṣataḥ | saṁgrāmaṁ ditiputrāṇāṁ devānāṁ ca bhayāvaham

सनत्कुमार बोले - अब इसके बाद मैं दिति के पुत्रों और देवताओं के भयंकर संग्राम, हालाहल की कथा को पूर्णतः कहूँगा।

श्लोक 2 (skanda.8.129.2)

हालाहल इति ख्यातो गणो विक्रान्तपौरुषः । असुराणां बभौ व्यास दारुणो ब्रह्मकण्टकः

hālāhala iti khyāto gaṇo vikrāntapauruṣaḥ | asurāṇāṁ babhau vyāsa dāruṇo brahmakaṇṭakaḥ

हे व्यास! असुरों का एक पराक्रमी गण था, जो हालाहल के नाम से विख्यात और ब्रह्मकंटक-सा भयंकर था।

श्लोक 3 (skanda.8.129.3)

गतेषु दनुपुत्रेषु स गणः क्रोधमूर्च्छितः । बलं कृत्वा मुखं सर्वान् देवान्युद्धे समाह्वयत्

gateṣu danuputreṣu sa gaṇaḥ krodhamūrcchitaḥ | balaṁ kṛtvā mukhaṁ sarvān devānyuddhe samāhvayat

दनु के पुत्रों के चले जाने पर वह क्रोध से उन्मत्त गण, अपनी सेना को आगे कर, सब देवताओं को युद्ध के लिये ललकारने लगा।

श्लोक 4 (skanda.8.129.4)

तेषां तेषाञ्च संग्रामः सुघोरः समवर्तत । असुराणां जयश्चैव सदैव समपद्यत

teṣāṁ teṣāñca saṁgrāmaḥ sughoraḥ samavartata | asurāṇāṁ jayaścaiva sadaiva samapadyata

उनके बीच अत्यन्त घोर युद्ध हुआ, और उसमें सदा असुरों की ही विजय होती रही।

श्लोक 5 (skanda.8.129.5)

ततस्ते विबुधाः सर्वे विदर्पा हतविक्रमाः । हृतराज्याभ्यगच्छन्त ब्रह्माणं लोककारणम्

tataste vibudhāḥ sarve vidarpā hatavikramāḥ | hṛtarājyābhyagacchanta brahmāṇaṁ lokakāraṇam

तब वे सभी देवता, गर्वरहित होकर, पराक्रमहीन होकर, राज्य खोकर, संसार के कारणस्वरूप ब्रह्मा के पास गये।

श्लोक 6 (skanda.8.129.6)

ते तमूचूश्च संहत्य हृतराज्याः स्म सांप्रतम । कथं राज्यं पुनर्देव लभेम तव तेजसा

te tamūcūśca saṁhatya hṛtarājyāḥ sma sāṁpratama | kathaṁ rājyaṁ punardeva labhema tava tejasā

एकत्र होकर उन्होंने कहा - हमारा राज्य अभी छिन गया है; हे देव! आपके तेज से हम अपना राज्य पुनः कैसे प्राप्त करें?

श्लोक 7 (skanda.8.129.7)

तेषां श्रुत्वा वचस्तद्वै देवः सलिलसम्भवः । उवाच देवान् देवेशं प्रसादयत मा चिरम्

teṣāṁ śrutvā vacastadvai devaḥ salilasambhavaḥ | uvāca devān deveśaṁ prasādayata mā ciram

उनका वह वचन सुनकर जलसम्भव देव (ब्रह्मा) ने देवताओं से कहा - बिना विलम्ब किये देवेश को प्रसन्न करो।

श्लोक 8 (skanda.8.129.8)

स वो दाता महावीर्यो बलं देवस्त्रिलोचनः । येन तान् समरे सर्वान् विक्रमेण विजेष्यथ

sa vo dātā mahāvīryo balaṁ devastrilocanaḥ | yena tān samare sarvān vikrameṇa vijeṣyatha

'वह महापराक्रमी त्रिलोचन देव तुम्हें बल देंगे, जिससे तुम युद्ध में उन सबको पराक्रमपूर्वक जीत सकोगे।'

श्लोक 9 (skanda.8.129.9)

सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता देवेशं तपसाराध्य शङ्करम् । ऊचुः प्राञ्जलयो देवा बलं नो देहि यज्ञहन्

sanatkumāra uvāca | ta evamuktā deveśaṁ tapasārādhya śaṅkaram | ūcuḥ prāñjalayo devā balaṁ no dehi yajñahan

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर तप से शंकर देवेश को आराधित करके देवताओं ने हाथ जोड़कर कहा - हे यज्ञहन्! हमें बल दीजिये।

श्लोक 10 (skanda.8.129.10)

तेषां तु जपतामेवं तपसा तोषितो हरः । ददौ मन्त्रमनाधृष्यं सर्वमन्त्रोत्तमं तदा

teṣāṁ tu japatāmevaṁ tapasā toṣito haraḥ | dadau mantramanādhṛṣyaṁ sarvamantrottamaṁ tadā

इस प्रकार जप करते हुए उनके तप से प्रसन्न होकर हर ने तब उन्हें एक अजेय मन्त्र, सब मन्त्रों में श्रेष्ठ, प्रदान किया।

श्लोक 11 (skanda.8.129.11)

तं ते संप्राप्य विप्रर्षे कृतरक्षा दिवौकसः । अमूढा मूढवत् सर्वे असुरेष्वचरन् ततः

taṁ te saṁprāpya viprarṣe kṛtarakṣā divaukasaḥ | amūḍhā mūḍhavat sarve asureṣvacaran tataḥ

हे विप्रर्षे! उसे पाकर, सुरक्षित होकर, अमोहित होते हुए भी सब देवता मोहित के समान असुरों के बीच विचरने लगे।

श्लोक 12 (skanda.8.129.12)

असुरास्तु तदा मूढान् दृष्ट्वा सर्वान्दिवौकसः । अमन्यन्त दुराचारा मूढा इति यथातथम्

asurāstu tadā mūḍhān dṛṣṭvā sarvāndivaukasaḥ | amanyanta durācārā mūḍhā iti yathātatham

दुराचारी असुरों ने तब सब देवताओं को मोहित देखकर उन्हें ज्यों-का-त्यों सचमुच मोहित समझ लिया।

श्लोक 13 (skanda.8.129.13)

हृतरज्या इमे देवाः सर्वे मूढेन चेतसा । उन्मत्ता विभ्रमन्त्येवं पश्यतैतान् सुरेतराः

hṛtarajyā ime devāḥ sarve mūḍhena cetasā | unmattā vibhramantyevaṁ paśyataitān suretarāḥ

- 'राज्यहीन ये सब देवता मोहित चित्त से उन्मत्तों की भाँति भटक रहे हैं, इन्हें देखो' - ऐसा असुर कहने लगे।

श्लोक 14 (skanda.8.129.14)

आक्रोशन्तोपरे ताँस्तु अभिजघ्नुश्च दारुणम् । बबन्धुश्च यथाकामं मुमुचुश्च तथापरे

ākrośantopare tā~stu abhijaghnuśca dāruṇam | babandhuśca yathākāmaṁ mumucuśca tathāpare

उन्हें फटकारते हुए कुछ ने क्रूरतापूर्वक मारा, कुछ ने इच्छानुसार बाँध दिया, और कुछ ने छोड़ दिया।

श्लोक 15 (skanda.8.129.15)

एवं तेषां तदा व्यास वर्ततां शुभकर्मणाम् । सुमहानभवद् धर्मः असुराणां व्यनीनशत्

evaṁ teṣāṁ tadā vyāsa vartatāṁ śubhakarmaṇām | sumahānabhavad dharmaḥ asurāṇāṁ vyanīnaśat

हे व्यास! इस प्रकार शुभ आचरणवाले उन देवताओं का महान् धर्म-संचय हुआ, जिसने असुरों का नाश कर दिया।

श्लोक 16 (skanda.8.129.16)

तेषां तेनापचारेण असुराणां दुरात्मनान् । धर्मनाशाद् बलं क्षीणं बुबुधुर्देवतागणाः

teṣāṁ tenāpacāreṇa asurāṇāṁ durātmanān | dharmanāśād balaṁ kṣīṇaṁ bubudhurdevatāgaṇāḥ

उनके उस दुराचार से उन दुरात्मा असुरों का धर्म नष्ट हो गया, जिससे उनका बल क्षीण होने लगा - यह देवगणों ने जान लिया।

श्लोक 17 (skanda.8.129.17)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते ब्रह्मणाभ्युक्ताः सर्वे दिव्यास्त्रधारिणः । आहूयासुरशार्दूलान् युद्धे सर्वान्न्यसूदयत्

sanatkumāra uvāca | tataste brahmaṇābhyuktāḥ sarve divyāstradhāriṇaḥ | āhūyāsuraśārdūlān yuddhe sarvānnyasūdayat

सनत्कुमार बोले - तब ब्रह्मा द्वारा प्रेरित होकर सब दिव्यास्त्रधारी देवताओं ने असुर-श्रेष्ठों को ललकारकर युद्ध में उन सबका वध कर दिया।

श्लोक 18 (skanda.8.129.18)

बलो यत्र हतः संख्ये वज्रेण शतपर्वणा । देवेन्द्रेणाभिविक्रम्य बलहा स यतः स्मृतः

balo yatra hataḥ saṁkhye vajreṇa śataparvaṇā | devendreṇābhivikramya balahā sa yataḥ smṛtaḥ

जहाँ बल नामक असुर युद्ध में देवेन्द्र द्वारा पराक्रमपूर्वक शतपर्वा वज्र से मारा गया, वहीं इन्द्र 'बलहा' के नाम से स्मरण किये गये।

श्लोक 19 (skanda.8.129.19)

सनत्कुमार उवाच । अन्धकारकमन्यच्च युद्धमासीत् सुभैरवम् । दशवर्षसहस्राणि शतानि च पुनर्दश

sanatkumāra uvāca | andhakārakamanyacca yuddhamāsīt subhairavam | daśavarṣasahasrāṇi śatāni ca punardaśa

सनत्कुमार बोले - एक और अत्यन्त भयंकर युद्ध अंधकारकारी हुआ, जो दस हजार वर्ष और पुनः दस सौ वर्षों तक चला।

श्लोक 20 (skanda.8.129.20)

आसीद् दनुसुतः श्रीमान् देवतान्तक इत्युत । स मायां संपरीप्सन् वै रुद्रमाराधयत् पुरा

āsīd danusutaḥ śrīmān devatāntaka ityuta | sa māyāṁ saṁparīpsan vai rudramārādhayat purā

दनु का एक श्रीमान् पुत्र था, जिसे देवतान्तक कहते थे; माया प्राप्त करने की इच्छा से उसने पहले रुद्र की आराधना की।

श्लोक 21 (skanda.8.129.21)

तस्मै वर्षसहस्रेण वरकाल उपस्थिते । ब्रह्मा ददौ वरं व्यास दनोः पुत्राय धीमते

tasmai varṣasahasreṇa varakāla upasthite | brahmā dadau varaṁ vyāsa danoḥ putrāya dhīmate

हे व्यास! एक हजार वर्ष बाद वरदान का समय आने पर ब्रह्मा ने उस बुद्धिमान् दनुपुत्र को वर दिया।

श्लोक 22 (skanda.8.129.22)

स वव्रे तामसीं मायां सर्वभूतप्रबाधनीम् । अभेद्यामनिवार्याञ्च यां तु वेत्ति न कश्चन

sa vavre tāmasīṁ māyāṁ sarvabhūtaprabādhanīm | abhedyāmanivāryāñca yāṁ tu vetti na kaścana

उसने ऐसी तामसी माया माँगी जो समस्त प्राणियों को पीड़ित करनेवाली, अभेद्य, अनिवार्य और किसी के द्वारा भी न जानी जा सके।

श्लोक 23 (skanda.8.129.23)

तस्मै प्रादात् स तां मायामिदं चोवाच तं तदा । भविष्यति हि मायेयं यथोक्ता ते महाबल । करिष्यसि न चेच्छब्दं यथाकामं दनोः सुत

tasmai prādāt sa tāṁ māyāmidaṁ covāca taṁ tadā | bhaviṣyati hi māyeyaṁ yathoktā te mahābala | kariṣyasi na cecchabdaṁ yathākāmaṁ danoḥ suta

उन्होंने उसे वह माया दी और तब उससे यह कहा - हे महाबल, हे दनुपुत्र! जैसा तुमसे कहा गया, यह माया वैसी ही होगी, बशर्ते तुम शब्द न करो; तब यह इच्छानुसार कार्य करेगी।

श्लोक 24 (skanda.8.129.24)

सनत्कुमार उवाच । अथ लब्धवरो व्यास मायाच्छन्तोसुरस्ततः । बहुभिर्दानवैः सार्धं सर्वाँल्लोकानबाधत

sanatkumāra uvāca | atha labdhavaro vyāsa māyācchantosurastataḥ | bahubhirdānavaiḥ sārdhaṁ sarvā~llokānabādhata

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! फिर वर पाकर, माया से आच्छादित होकर वह असुर अनेक दानवों सहित सम्पूर्ण लोकों को पीड़ित करने लगा।

श्लोक 25 (skanda.8.129.25)

देवा अपि भयात्तस्य नावतिष्ठन् तदग्रतः । देवाः सर्वे भयोद्विग्नास्तस्थुर्नैव तदग्रतः । स्थानानि ते परित्यज्य यत्र तत्रावतस्थिरे

devā api bhayāttasya nāvatiṣṭhan tadagrataḥ | devāḥ sarve bhayodvignāstasthurnaiva tadagrataḥ | sthānāni te parityajya yatra tatrāvatasthire

देवता भी उससे भयभीत होकर उसके सामने खड़े नहीं होते थे; सभी देवता भय से व्याकुल होकर उसके सामने कभी नहीं टिकते थे, और अपने-अपने स्थान छोड़कर इधर-उधर जा बसे।

श्लोक 26 (skanda.8.129.26)

आहूताः क्रूरशब्देन दानवैर्बलदर्पितैः । तथापि नावतिष्ठन्त तेषामग्रे दिवौकसः

āhūtāḥ krūraśabdena dānavairbaladarpitaiḥ | tathāpi nāvatiṣṭhanta teṣāmagre divaukasaḥ

बलगर्वित दानवों द्वारा क्रूर वचनों से ललकारे जाने पर भी देवता उनके सामने नहीं टिकते थे।

श्लोक 27 (skanda.8.129.27)

ऋषयस्तानिदं प्राप्य ऊचुः सर्वे प्रमन्यवः । रक्षां कुरुत लोकानां मावलीनावतिष्ठत

ṛṣayastānidaṁ prāpya ūcuḥ sarve pramanyavaḥ | rakṣāṁ kuruta lokānāṁ māvalīnāvatiṣṭhata

ऋषिगण उन्हें इस दशा में पाकर क्रुद्ध होकर सबने कहा - लोकों की रक्षा करो, छिपे मत रहो।

श्लोक 28 (skanda.8.129.28)

वयं च तपसा देवा धारयिष्याम संयताः । मा भयं वोस्तु युध्यध्वं कुरुध्वं विज्वरं जगत्

vayaṁ ca tapasā devā dhārayiṣyāma saṁyatāḥ | mā bhayaṁ vostu yudhyadhvaṁ kurudhvaṁ vijvaraṁ jagat

'हे देवो! और हम संयमपूर्वक तप से तुम्हें सहारा देंगे। भय मत करो, युद्ध करो, संसार को संतापरहित करो।'

श्लोक 29 (skanda.8.129.29)

त एवमुक्तास्तैर्व्यास ऋषिभिर्लोककारणात् । भयान्नैवावतिष्ठन्त तस्य दस्योस्तदाग्रतः

ta evamuktāstairvyāsa ṛṣibhirlokakāraṇāt | bhayānnaivāvatiṣṭhanta tasya dasyostadāgrataḥ

हे व्यास! लोक के हित के लिये ऋषियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी वे भय से उस दस्यु के सामने कभी नहीं टिके।

श्लोक 30 (skanda.8.129.30)

सनत्कुमार उवाच । यदा नैवावतिष्ठन्ते तथाप्युक्ता दिवौकसः । उपायमपरं प्राहुस्तदा ते मुनिसत्तमाः

sanatkumāra uvāca | yadā naivāvatiṣṭhante tathāpyuktā divaukasaḥ | upāyamaparaṁ prāhustadā te munisattamāḥ

सनत्कुमार बोले - जब इतना कहे जाने पर भी देवता नहीं टिके, तब उन मुनिश्रेष्ठों ने दूसरा उपाय बताया।

श्लोक 31 (skanda.8.129.31)

आहूयाप्सरसः सर्वा विसृज्यन्तां सुरोत्तमाः । कामेनाविष्टमनसामसुराणामुपान्तिकम्

āhūyāpsarasaḥ sarvā visṛjyantāṁ surottamāḥ | kāmenāviṣṭamanasāmasurāṇāmupāntikam

'हे सुरोत्तमो! सब अप्सराओं को बुलाकर उन असुरों के पास भेजो, जिनका मन काम से आविष्ट हो जायेगा।'

श्लोक 32 (skanda.8.129.32)

ताँस्तास्वासक्तहृदयान् पीतमैरेयविह्वलान् । विक्रम्य हंस्यथ सुरा बलाद्युद्धे बलीयसः

tā~stāsvāsaktahṛdayān pītamaireyavihvalān | vikramya haṁsyatha surā balādyuddhe balīyasaḥ

'उनमें आसक्त-हृदय, मदिरा पीकर विह्वल हुए उन असुरों को, हे सुरो! युद्ध में बलपूर्वक पराक्रम से मार डालो, चाहे वे बलवान् ही क्यों न हों।'

श्लोक 33 (skanda.8.129.33)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ताः प्रहिता देवैर्वञ्चनार्थं सुरद्विषाम् । क्वणन्नूपुरनिर्ह्रादकूजितोत्कर्णसारसाः

sanatkumāra uvāca | tatastāḥ prahitā devairvañcanārthaṁ suradviṣām | kvaṇannūpuranirhrādakūjitotkarṇasārasāḥ

सनत्कुमार बोले - तब देवताओं के शत्रुओं को छलने के लिये देवताओं द्वारा भेजी गयी वे अप्सराएँ, अपनी नूपुर-ध्वनि से सारसों को चौंकाती हुईं,

श्लोक 34 (skanda.8.129.34)

पीनोत्तुङ्गस्तनाभोगहारविक्षिप्तयष्टयः । वित्रस्तबालहरिणीसदृशायतलोचनाः

pīnottuṅgastanābhogahāravikṣiptayaṣṭayaḥ | vitrastabālahariṇīsadṛśāyatalocanāḥ

अपने पुष्ट, उन्नत स्तनों और हारों से युक्त छरहरी काया लिये, चौंकी हुई मृगशावकी के समान विशाल नेत्रोंवाली,

श्लोक 35 (skanda.8.129.35)

चलत्कुण्डलसंघृष्टपाण्डरागण्डमण्डलाः । शिखिकण्ठच्छविहरश्लक्ष्णवासोधराः पराः

calatkuṇḍalasaṁghṛṣṭapāṇḍarāgaṇḍamaṇḍalāḥ | śikhikaṇṭhacchaviharaślakṣṇavāsodharāḥ parāḥ

हिलते कुण्डलों से रगड़े गये गौरवर्ण गोल कपोलोंवाली, मयूर-कण्ठ के समान रंग के कोमल वस्त्र धारण किये हुए उत्तम स्त्रियाँ,

श्लोक 36 (skanda.8.129.36)

प्रत्यग्रविद्रुमच्छेदताम्रोष्ठाधरपंक्तयः । वस्त्रान्तकुसुमापीडसंसक्तकरपल्लवाः

pratyagravidrumacchedatāmroṣṭhādharapaṁktayaḥ | vastrāntakusumāpīḍasaṁsaktakarapallavāḥ

ताजे कटे मूँगे के समान लाल अधरोंवाली, वस्त्र के छोर पर लगी पुष्पमालाओं से जुड़े कोमल हाथोंवाली,

श्लोक 37 (skanda.8.129.37)

नैकरत्नप्रभाकीर्ण्णकेयूराबद्धबाहवः । मयूरबर्हसंकाशचारुकुञ्चितमूर्धजाः

naikaratnaprabhākīrṇṇakeyūrābaddhabāhavaḥ | mayūrabarhasaṁkāśacārukuñcitamūrdhajāḥ

अनेक रत्नों की आभा बिखेरते केयूरों से बँधी भुजाओंवाली, मयूरपंख के समान सुन्दर घुँघराले केशोंवाली,

श्लोक 38 (skanda.8.129.38)

कल्पद्रुमसमुद्भूतकुसुमस्रग्विभूषणाः । शुकाङ्गहरिताकारकञ्चुकोत्तंसितस्तनाः

kalpadrumasamudbhūtakusumasragvibhūṣaṇāḥ | śukāṅgaharitākārakañcukottaṁsitastanāḥ

कल्पवृक्ष से उत्पन्न फूलों की मालाओं से विभूषित, तोते के शरीर के समान हरे रंग के अंगिया से ढके स्तनोंवाली,

श्लोक 39 (skanda.8.129.39)

मत्तमातङ्गविक्रान्तलीलाविभ्रमरेचकाः । मत्तकोकिलदात्यूह कलनिस्वनभाषिताः

mattamātaṅgavikrāntalīlāvibhramarecakāḥ | mattakokiladātyūha kalanisvanabhāṣitāḥ

मतवाले हाथी की सी विलासपूर्ण चाल चलती हुईं, मतवाली कोकिला और दात्यूह पक्षी के समान मधुर स्वर में बोलती हुईं,

श्लोक 40 (skanda.8.129.40)

महतामप्युपात्तानां तपसां विघ्नहेतवः । दर्शयामासुरात्मानं विद्विषां वधहेतवः

mahatāmapyupāttānāṁ tapasāṁ vighnahetavaḥ | darśayāmāsurātmānaṁ vidviṣāṁ vadhahetavaḥ

महान् संचित तपस्याओं के लिये भी विघ्नकारिणी वे अप्सराएँ, शत्रुओं के वध का साधन बनकर, स्वयं को प्रकट करने लगीं।

श्लोक 41 (skanda.8.129.41)

अथ तेप्सरसो दृष्टवा दैतेयाः काममोहिताः । तासामर्थे वराङ्गीनामभिजघ्नुः परस्परम्

atha tepsaraso dṛṣṭavā daiteyāḥ kāmamohitāḥ | tāsāmarthe varāṅgīnāmabhijaghnuḥ parasparam

फिर उन अप्सराओं को देखकर काम-मोहित दैत्य उन सुन्दरियों के लिये आपस में लड़ने लगे।

श्लोक 42 (skanda.8.129.42)

गदा परिघचक्रासिशूलमुद्गरशक्तिभिः । धनुःकुलिशतीक्ष्णाग्र भिन्दिपालपरश्वधैः

gadā parighacakrāsiśūlamudgaraśaktibhiḥ | dhanuḥkuliśatīkṣṇāgra bhindipālaparaśvadhaiḥ

गदा, परिघ, चक्र, तलवार, त्रिशूल, मुद्गर, शक्ति से; धनुष, तीक्ष्ण अग्रवाले वज्र, भिन्दिपाल और फरसों से -

श्लोक 43 (skanda.8.129.43)

ममेयञ्चारुसर्वाङ्गी न तवेयं सुमध्यमा । अथवा युद्धशुल्कास्तु मुञ्चैनां प्रहरस्व माम्

mameyañcārusarvāṅgī na taveyaṁ sumadhyamā | athavā yuddhaśulkāstu muñcaināṁ praharasva mām

- 'यह सर्वांगसुन्दरी मेरी है, तुम्हारी नहीं, यह सुमध्यमा! या फिर यह युद्ध की विजय-सामग्री बने - इसे छोड़ो, मुझ पर वार करो' - कहते हुए,

श्लोक 44 (skanda.8.129.44)

इत्युक्त्वा विविधा वाचो दैतेयाः कालचोदिताः । अन्योन्यवधमासाद्य प्रजग्मुस्ते यमक्षयम्

ityuktvā vividhā vāco daiteyāḥ kālacoditāḥ | anyonyavadhamāsādya prajagmuste yamakṣayam

इस प्रकार अनेक बातें कहकर, काल से प्रेरित होकर, वे दैत्य आपस में एक-दूसरे का वध करके यमलोक को चले गये।

श्लोक 45 (skanda.8.129.45)

हतशिष्टास्तु ये तत्र दानवाः शान्तपौरुषाः । विबुधैरुग्रतेजोभिस्तेपि सर्वे रणे हताः

hataśiṣṭāstu ye tatra dānavāḥ śāntapauruṣāḥ | vibudhairugratejobhistepi sarve raṇe hatāḥ

और जो दानव वहाँ वध से बचे रह गये और जिनका पौरुष शान्त हो गया था, उन्हें भी उग्रतेजस्वी देवताओं ने युद्ध में मार डाला।

श्लोक 46 (skanda.8.129.46)

य इदं पठते विशुद्धबुद्धिर्निधनं संसदि दानवेश्वराणाम् । मनुजो युवतीरिहैव लोके स लभेदप्सरसां समानरूपाः

ya idaṁ paṭhate viśuddhabuddhirnidhanaṁ saṁsadi dānaveśvarāṇām | manujo yuvatīrihaiva loke sa labhedapsarasāṁ samānarūpāḥ

जो विशुद्धबुद्धि मनुष्य किसी सभा में दानवेश्वरों के इस संहार-वृत्तान्त को पढ़ता है, वह इसी लोक में अप्सराओं के समान रूपवाली युवतियों को प्राप्त करता है।

अध्याय 128अध्याय-सूचीअध्याय 130